बुधवार, 23 अप्रैल 2025

आपदा में अवसर और गिद्धों की वोटों पर निगाह


 आपदा में अवसर और गिद्धों की वोटों पर निगाह 

करोना काल में जब देश के प्रधान सेवक ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी कुछ लोग आक्सीजन और रेमडीसीवीर की कालाबाज़ारी कर रहे थे

शायद उन्हीं लोगो को अब पहलगाम में हुए आतंकी हमला से मारे गये लोगों की चिता की राख ठंडी होने का भी सब्र नहीं है और वे लोग नफ़रत की बीज बोकर वोटों की फसल काटने आतुर है

आतंकवादियों की नीचताई पर सरकार से सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा…

नीचता की भी हद होती है, लेकिन भाजपाइयों ने तो उसे भी पार कर दिया है...


वोटिंग कैंपेन में लगे हो तुम?

27 भारतीयों की लाशें पड़ी हैं, और तुम्हारी आंखों में सिर्फ वोट नाच रहा है?


सरकार तुम्हारी, गृहमंत्री तुम्हारा, जिम्मेदारी भी तुम्हारी — फिर क्यों नहीं जवाब दे रहे हो?

कश्मीर में 2000 पर्यटकों की मौजूदगी में आतंकवादी घुस आए, हमला किया, लोगों को बेरहमी से मार डाला और आराम से निकल भी गए — कहाँ थी तुम्हारी सुरक्षा? कहाँ था तुम्हारा इंटेलिजेंस?


गृहमंत्री कहां थे उस वक़्त? चुप क्यों हैं अब?

क्या गृहमंत्री सिर्फ चुनावी भाषणों और रैलियों के लिए हैं? जब देश के नागरिक मारे जा रहे हों, तब क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं?


पूछो सवाल! उठाओ आवाज़! मांगो इस्तीफा उस निकम्मे गृहमंत्री से!

और पाकिस्तान से आये इन दरिंदों के आकाओं को सबक सिखाने की बात करो, सिर्फ टीवी पर गाल बजाने से कुछ नहीं होगा!


लेकिन नहीं —

तुम्हारा ज़मीर तो कब का मर चुका है…

तुम्हें हर लाश में सिर्फ एक नया वोट बैंक दिखता है,

तुम्हें हर आतंकवादी हमले में चुनावी रणनीति नज़र आती है,

तुम इंसान नहीं, प्रचार के गुलाम बन चुके हो।


कल से देख रहा हूँ —

कोई नहीं पूछ रहा कि सुरक्षा कहाँ थी,

कोई नहीं पूछ रहा गृहमंत्री क्या कर रहे थे,

कोई नहीं कह रहा कि इस बर्बर हमले का ज़ोरदार बदला लिया जाए!


नीचता की भी कोई हद होती है...

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

ग्राहम स्टेन्स की हत्या करने वाला महेंद्र की रिहाई

 ग्राहम स्टेन्स की हत्या करने वाला महेंद्र की रिहाई  




आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जलाकर मार डालने के अपराध में शामिल महेंद्र हेम्ब्रम को अच्छे व्यवहार के आधार पर जेल से रिहा कर दिया गया है । 


ऑस्ट्रेलिया के एक पादरी थे ग्राहम स्टेन्स । ओडिशा के आदिवासी इलाकों में कुष्ठ रोगियों की सेवा करते थे। 30 सालों से वहां एक्टिव थे । 

22-23 जनवरी 1999 के रात की बात है जब वह अपने दो बेटों 10 साल के फिलिप और 6 साल के टिमोथी के साथ ग्राहम अपनी जीप में सो रहे थे । तभी कुछ लोगों ने उनकी जीप में आग लगा दी । उन्हें शक था कि ग्राहम सेवा की आड़ में धर्मांतरण कराते हैं । अपने 2 बेटों के साथ ग्राहम स्टेन्स जीप में जिंदा जलकर मर गए । 

इस घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था । इस केस में 51 लोगों की गिरफ्तारी हुई जिसमे 14 लोग दोषी पाए गए पर सजा 3 को ही हुई । सजा पाए इन्हीं लोगों में से एक था महेंद्र हेम्ब्रम । कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी लेकिन 25 साल की कैद के बाद अब उसे कोर्ट ने रिहा कर दिया गया है क्योंकि कैद मे उसका व्यवहार ‘ अच्छा ‘ पाया गया है । 

'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, महेंद्र हेम्ब्रम की रिहाई के लिए ओडिशा राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (Odisha State Sentence Review Board) ने सिफारिश की थी । इसके बाद कोर्ट ने जेल में 'अच्छे व्यवहार’ के आधार पर हेम्ब्रम को रिहा करने का आदेश दिया। 25 साल की उम्र में सजा मिली । 50 साल का हेंब्रम बुधवार को जेल से बाहर आया । स्वागत में उसके समर्थकों ने उसे माला पहनाई और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए । 

दारा सिंह जेल में- 

ग्राहम स्टेन्स को बेटों समेत जिंदा जलाने वाले लोगों में हेम्ब्रम के अलावा दारा सिंह भी मुख्य दोषी पाया गया था । उसे कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी । पर बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था । दारा सिंह अब इस मामले का अकेला दोषी है, जो अभी भी जेल में है । उसकी भी रिहाई के लिए भी लगातार अभियान चलाया जा रहा है और उम्मीद है कि वह भी ‘ अचछे व्यवहार ‘ के आधार पर शीघ्र रिहा हो जाएगा । 

इन लोगों की रिहाई कैंपेन को प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने भी तब समर्थन दिया था , जब वो क्योंझर से विधायक होते थे ।

शनिवार, 5 अप्रैल 2025

रग रग में राम

 


रामचरित मानस में तुलसीदासजी कहते हैं-
सीय राम मय सब जग जानी। 
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी ।। 
सबसे कठिन और सबसे अद्भूत इस एक चौपाई में राम -सीता के जीवन का पूरा सार छिपा है। इस देश के पूरब से पछचिम और उत्तर से ठत दक्छिन तक राम  रचे बसे हैं,तो इसकी वजह राम  का वह जीवन-दर्शन है जो उन्हें आम जन के साथ खड़ा करता है।  वे चाँद पाने माता कौशल्या से हट करते हैं,तो पिता के वनवास की आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं। विश्वामित्र की यज्ञ की रक्छा से लेकर सीता वनवास का निर्मम फैसला हो या शबरी के जूठे बेर खाने का निर्णय , सबमे राम अलग से दिखलाई पड़ते हैं। सीता के अपहरण के बाद वन में भटकने से लेकर राम का सारा निर्णय राजा को राजघरानों और महलों से निकालकर भाषा-बानी ,मिटटी-पानी ,जड़-चेतन में फैलने का  उपक्रम है।  मनुष्य-मात्र का आख्यान वाले इन निर्णयों की वजह से ही राम पुष्प गंध की तरह हवा-पानी में रचे बसे हैं। राजशक्ति पर उठती ऊँगली को आमजन का अधिकार मानने की वजह से ही वे साधारण बन कर रग  रग में समाते चले गए।
यह साधारण सहजता ही राम को जन जन जन से जोड़ती है। वे कैकेई के  पुत्र मोह को सहज मानवीय प्रवृति के रूप में देखते हैं। राम की यही दृष्टि उन्हें वनवासियों से जोड़ती है,केवंट के दिल में उतारती है तो आमजन के सुख-दुःख का हिस्सेदार बनाती है। विश्वामित्र की यज्ञ की रक्छा से लेकर वनवास काल में जो उनसे मिलता है,अपना दुखड़ा सुनाते है,और राम उन सबको उबारते हैं। माता अहिल्या से लेकर सुग्रीव-हनुमान और फिर विभीषण सबमे वे ताकत बनकर समाते हैं।
राम से मिलन तब भी उत्सव था और आज भी उत्सव है। ऐसा उत्सव जिसमे राम न  स्वयं के रह जाते हैं और न ही उनका उत्सव मनाने वाले ही स्वयं के रह पाते हैं। राम का इस तरह मिलना ही राम राज्य की कल्पना को मूर्तरूप देता है। राम राजा है फिर भी वे किसी को अपने दरबार तक नहीं बुलाते , वे स्वयं सब तक जातें हैं। वे केंवट,शबरी , काक ,बंदर भालू सबको मान देते हैं। राम सबके बीच जाकर घुलते-मिलते हैं। यह घुलना-मिलना ही राम को व्यापकता देती है। राम सबको अपने लगते हैं। यंहा तक कि मृत्यु शैया में पड़े रावण से वे राजनीती का पाठ सीखने  लक्छ्मन को सलाह देते हैं। राम ने मानो कहा हो अच्छे गुण सीखने में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए। दुश्मन की शक्ति को रेखांकित व् मान देने वाला यह निर्णय अद्भुत है।
इतिहास के सत्य से बड़ा कोई नहीं   होता। इतिहास आमजन का दर्शन बने। राम की यह कोशिश उनके हर निर्णय में शामिल है। इसलिए उनके हर निर्णय के पीछे साफ दिखता है कि व्यक्ति कितना भी बलवान हो जाये वह सत्य से बड़ा नहीं है। पिता की आज्ञा पर वनगमन का उनका निर्णय सत्ता का जन जन तक पहुंचने का अद्भुत मेल है। यह सहजता राम को जन जन से जोड़ती है। धरती-पुत्रों के नजदीक लाती है। पेड़-पौधों,पशु-पकछियों वनवासियों सबसे जोड़ती है। इस सहजता में सर्वशक्तिमान का कंही आभास नहीं होने देते राम। कठिन परिस्थितियों में भी राम की सहजता उन्हें सबसे अलग तो करती है,लेकिन इस अलगपन में भी वे सबसे घुल-मिल जाते हैं। वे कोई घोषणा नहीं करते। बल्कि वे स्वयं को लोगों की रक्त धमनियों में प्रवाहित करते हैं।
वनवास काल की सहजता में सीता को पाने की अधीरता के बाद भी राम सत्य के साथ  हैं। साधारण जन के प्रश्न पर सीता को वन वन में छोड़ने का आदेश सत्य को न्याय देने का निर्णय है। धरती-पुत्री की पवित्रता पर उठी ऊँगली को न्याय देने का यह निर्मम निर्णय ही सीता-राम को एक करता है।
मनुष्य मात्र की नियति कर्म मात्र है। नियति के  इस खेल से कोई अछूता नहीं है। समय की माप का सृष्टा सूर्य भी कंहा इससे बच पाया है। फिर राम और सीता कर्म से परे कैसे हो सकते थे। उन्हें कितनी परीक्छा देनी पड़ी। पूरे  जीवन में राम अकेले दिखलाई पड़ते हैं।चौदह साल के वनवास और फिर एक साधारण जन के सवाल पर सीता का वनवास। फिर भी राम-सीता कभी अलग नहीं हुए। सीता,राम के पार्श्व में नहीं सदा साथ-संग बगल में खड़ी हैं। सही मायने में राम की पूर्णता सीता की भूमिका के बगैर क्रियान्वित हो ही नहीं सकता। अन्याय का विरोध और उसके नाश का कारण की भूमिका में सीता खड़ी ही है,साधारण जन के आरोप में न्याय की सत्ता स्थापित करने की बड़ी भूमिका भी सीता की रही है।
राम-सीता का जैसे कुछ था ही नहीं,वे तो न्याय की सत्ता स्थापित करने ही अवतरित हुए थे। और इस कार्य में दोनों को सहस्त्रधाराओं में बंटना पड़ा। वे बंटे पर धरती  के प्राण में समाकर एक हो गए। पेड़-पौधों,,मिट्टी पानी में अलग-अलग  समाते हुए एक होते चले गए। वे एक-दूसरे में इतना समा गए कि आज भी भारत की हर स्त्रियां अपने पति में राम का रूप देखती हैं,और हर पति अपनी पत्नी में सीता का स्वरूप देखता है।
राम के निर्मम निर्णय के बाद भी राम-सीता अलग नहीं हुए। वे अलग कभी थे ही नहीं बल्कि अपने में       अडिग सत्य की स्थापना का प्रतिमान बने रहे। सत्य की मर्यादा में दोनों ऐसे घुलते रहे कि वे लोगों के रग रग में समाते चले गए। आदमी को आदमी बनाए रखने वे साधारण जन को मान देते रहे। राम ने राज्य और साधारण जन की अवधारणा ही बदल दी। वे अपनी सत्ता स्थापित करने की बजाय सत्य की सत्ता की स्थापना के कर्म में लगे रहे। यही वजह है कि राम आज भी इस देश के पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्छिन तक पूजे जाते हैं। वे देश के बोली,भाषा,मिट्टी ,पानी और जड़-पत्ते के शिराओं में आमजन के रग रग में रमे हैं। 

गुरुवार, 27 मार्च 2025

जज कर्णन रिहा हो गये, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना भारी पड़ा था

 जज कर्णन रिहा हो गये, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना भारी पड़ा था  

सच कड़वा होता है लेकिन यह वह सच है जो दलितों को उसकी हैसियत बताता है, अम्बेडकर के संविधान के रहते 


 पढ़िए. समझिये. कोई दलित जज बनकर भी आवाज़ नहीं उठा सकता है. और अगर हिमाकत की तो सजा तय है, भले ही आप जज क्यों नहीं हों।



यह व्यक्ति जस्टिस कर्णन है जो कोट पहनकर फिल्मी स्टाइल में घूमता है। चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन। वह न्यायालय की अवमानना के लिए छह महीने की जेल की सजा काटकर बाहर आ रहे हैं। 


कर्णन कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वह मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। वहां के पहले दलित न्यायाधीश। वह न्यायाधीश रहते हुए जेल की सजा काटने वाले पहले न्यायाधीश भी हैं। अब उनके बारे में बात करने की वजह भी है। 


2017 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा था। एक पत्र जिसमें 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार की जानकारी थी। यह पत्र एक बड़ा विवाद बन गया। इससे संवैधानिक संकट पैदा हो गया।


 इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। केंद्र सरकार इस पत्र को जारी करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज किया। 


न्यायमूर्ति कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला जीत लिया। 


उन्होंने छह महीने की जेल की सजा काटी। उस समय उनका विरोध करने वालों ने कहा था कि वे पागल हैं। लेकिन अब जब एक जज के घर से करोड़ों रुपए का काला धन बरामद हुआ है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि कर्णन सही थे।


न्यायपालिका को न्यायालय के अलावा कोई और नहीं सुधार सकता। जस्टिस कर्णन की ओर से यह एक विनम्र प्रयास था। हमारे पास यह उम्मीद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है कि ऐसे और भी जज होंगे!!

(साभार)

सोमवार, 24 मार्च 2025

सुशांत केस बंद..पर रिया को इंसाफ़ कौन देगा!

 समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में सीबीआई ने दो क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल कर दी हैं. इन रिपोर्टों में अभिनेता की मौत के मामले में किसी साज़िश से इनकार किया गया है.

महीनों तक रिया चक्रवर्ती का मीडिया ट्रायल हुआ और उसे अपराधी घोषित कर दिया गया.



सुशांत केस बंद..पर रिया को इंसाफ़ कौन देगा!

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रिया दोषी थी या नहीं, ये अब कोई नहीं पूछ रहा…

मीडिया का काम पूरा हो चुका है।

उस दिन एक नहीं, दो मौतें हुई थीं।

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पहली— सुशांत की।

दूसरी— रिया की निजता, करियर और चरित्र की।

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1998 में मोनिका लेविंस्की के साथ भी यही हुआ था।

राष्ट्रपति क्लिंटन को बचाने के लिए मीडिया ने मोनिका को शिकार बना दिया।

आज वही खेल रिया के साथ खेला गया।

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"क्या रिया ने ड्रग्स लिए?"

"क्या रिया ने सुशांत को मारा?"

"रिया 'विषकन्या' थी?"

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सवालों का ढोंग था…

फैसला तो पहले ही सुना दिया गया था।

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राजकुमारी डायना मीडिया से बचते-बचते मर गईं।

मोनिका लेविंस्की ने लड़ाई लड़ी, और आज ऑनलाइन उत्पीड़न के खिलाफ खड़ी हैं।

रिया को भी लड़ना होगा…

क्योंकि उसका सामना ऐसे शिकारी से है जो मरने के बाद भी शिकार को बेचता है।

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जब समाज ही जल्लाद बन जाए, तो समझो सभ्यता की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी 

                सीबीआई आज़ जिस निष्कर्ष पर पहुंची है तब मुंबई पुलिस ने भी यही कहा था और इसे आत्महत्या क़रार दिया था. लेकिन मीडिया ट्रायल के दबाव एवं राजनीतिक लाभ के मद्देनजर यह केस सीबीआई को सौंप दिया गया.

 सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट के बाद न्यूज चैनलों के खिलाफ ग़लत खबर चलाने एवं एक महिला के उत्पीड़न मामले में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए. 

https://youtu.be/VVmOxeYQyIE?si=eky00ThRywHw-Cok

शुक्रवार, 14 मार्च 2025

सांसद से रिश्तेदारी भारी पड़ी डॉक्टर को

सांसद से रिश्तेदारी भारी पड़ी डॉक्टर को 


छत्तीसगढ़ बीजेपी में चल रहे उठापटक के बीच अब जो खबर आ रही है वह बेहद ही चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि अब बीजेपी की लड़ाई राजनीति से इतर जाकर शुरू होने की बात कही जा रही है, और अब आयकर विभाग के द्वारा मारे गये छापे को भी बीजेपी के अंदरूनी राजनीति से जोड़ा जा रहा है।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में बीजेपी के क़द्दावर माने जाने वाले रायपुर के सांसद के अपमान और उपेच्छा को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच अब यह क़िस्सा भी ज़ोर पकड़ने लगा है कि पिछले दिनों जिस तरह से उनके भाई योगेश अग्रवाल को राईस मिल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था , उसके बाद अब उनके एक और रिश्तेदार भी बीजेपी के निशाने पर आ गये है।

पिछले दिनों देवेंद्र नगर में डॉ सुनील खेमका के हॉस्पिटल में आयकर विभाग की छापेमारी को भी राजनीति से जोड़ा जा रहा है।

ज़मीन से लेकर अस्पताल और इलाज में लापरवाही के लिये चर्चित इस अस्पताल की कहानी कम चर्चित नहीं है और कहा जाता है कि विवादों में रहने के बावजूद बृजमोहन अग्रवाल से रिश्तेदारी की वजह से वे बचते रहे हैं।

लेकिन अब वे बीजेपी की अंदरूनी लड़ाई के चलते निशाने पर हैं ।पिछले दिनों आयकर विभाग ने छापेमारी कर जिस तरह आरोप लगाये हैं वह चौंकाने वाला है । इस कार्रवाई का नेतृत्व मुख्य आयकर आयुक्त (CCIT) अपर्णा करन और प्रधान आयकर आयुक्त (PCIT) प्रदीप हेडाऊ के निर्देशन में किया गया। संयुक्त आयुक्त बीरेंद्र कुमार और उप आयुक्त राहुल मिश्रा के नेतृत्व में 26 सदस्यीय टीम ने 48 घंटे तक अस्पताल के वित्तीय दस्तावेजों की गहन जांच की।

एक वरिष्ठ आयकर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि डॉ. सुनील खेमका ने पूछताछ के दौरान कर गड़बड़ी स्वीकार की। आयकर विभाग ने उन्हें तत्काल 11 करोड़ रुपये का अग्रिम कर जमा करने के निर्देश दिए हैं, जबकि शेष राशि पर ब्याज और अतिरिक्त दंड की गणना कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।