शनिवार, 24 मई 2025

जादू भरी आँखों वाले गाने का हीरो चला गया

 जादू भरी आँखों वाले गाने का हीरो चला गया 


मुकुल देव एक ऐसा नाम जिसने अपनी प्रतिभा के दम पर न केवल फ़िल्मो का सफ़र शुरू किया, बल्कि टेलीविजन की दुनिया में भी डंका बजाया।

चला गया, जादू भरी आंखों वाले गाने का ये हीरो...


सन 94 में सुष्मिता सेन मिस यूनीवर्स बनीं, दो साल बाद महेश भट्ट उन्हें फ़िल्मों में काम करने के लिए मना लाए। फ़िल्म थी, दस्तक और उसके लिए जावेद अख़्तर का लिखा वो गाना बहुत फेमस हुआ कि, जादू भरी आंखों वाली सुनो तुम ऐसे मुझे देखा न करो...!


टू इन वन में लूप पर बजता था ये गाना। उदित नारायण की आवाज़ ऐसी कम ही हीरोज पर फबी है। नया लड़का था, मुकुल देव। सब एक दूसरे से पूछते कि यार, इसे पहले तो कहीं देखा नहीं। तो कोई बताता अरे ये वही वाला है धारावाहिक 'मुमकिन' वाला। बड़े भैया का नाम पता चला फिर कि ये तो राहुल देव का छोटा भाई है।


मुकुल देव कल दुनिया छोड़ गए। हिंदी सिनेमा में उनको लेकर कभी कोई कंट्रोवर्सी नहीं सुनाई दी। फ़ुर्सतगंज जाकर उन्होंने हवाई जहाज उड़ाने का लाइसेंस भी लिया था। पिता पुलिस में बड़े अफ़सर रहे तो शुरू से क्रिएटिव चीजें करने की छूट रही।


बताते हैं कि आठ साल के थे मुकुल जब उनके हाथ में पहली कमाई दूरदर्शन की तरफ से आई थी। किसी कार्यक्रम में माइकल जैक्सन बनकर नाचे थे वो। वैसे बताते ये भी चलें कि अरशद वारसी और चंद्रचूड़ सिंह को लॉन्च करने वाली अमिताभ बच्चन की कंपनी एबीसीएल ने मुकुल देव को भी एक फ़िल्म के लिए साइन कर लिया था। 'नाम क्या है' नामक ये फ़िल्म बनी होती तो मुकुल की पहली फ़िल्म होती।


भाई मुकुल 54 साल कोई उमर नहीं जाती, यूं ज़िंदगी से रूठ जाने की लेकिन ये एक ऐसी बात भी है जो रिवर्स नहीं हो सकती। जहां रहना खुशहाल रहना, कोशिश करते रहना कि यादों में आकर किसी को ज़्यादा सताना मत और हां, वहां ऊपर कोई जादुई आंखों वाली मिले तो बिंदास अपना गाना जऱूर गाना, जादू भरी आंखों वाली सुनो, तुम ऐसे मुझे देखा न करो...!


बहुत याद आओगे, मुकुल...


.साभार  पंकज शुक्ला


मुकुल देव कौशल (17 सितंबर 1970 - 23 मई 2025) [ 3 ]एक भारतीय टेलीविजन और फिल्म अभिनेता थे। उन्हें हिंदी फिल्मों , पंजाबी फिल्मों , टीवी सीरीज और संगीत एल्बमों में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता था । वह कई बंगाली , मलयालम , कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों में दिखाई दिए । [ 4 ]उन्होंने यमला पगला दीवाना में अपनी भूमिका के लिए अभिनय में उत्कृष्टता के लिए 7वां अमरीश पुरी पुरस्कार जीता । [ 5 ] 23 मई 2025 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 54 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

टेलीविजन

मुकुल देव ने 1996 में विजय पांडे की भूमिका निभाकर धारावाहिक मुमकिन के माध्यम से टीवी पर अपने अभिनय की शुरुआत की। [ 13 ] उन्होंने दूरदर्शन के एक से बढ़कर एक , कॉमेडी बॉलीवुड काउंटडाउन शो में भी अभिनय किया।

वह फियर फैक्टर इंडिया सीज़न 1 के होस्ट भी थे। [ 14 ] उन्होंने 2000 के दशक में कहीं दिया जले कहीं जिया (2001), कहानी घर घर की (2003), प्यार जिंदगी है (2003) जैसे कई टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया । उन्होंने 2008 में एक नृत्य प्रतियोगिता शो कभी कभी प्यार कभी कभी यार में भाग लिया।

फिल्में

उन्हें अमिताभ बच्चन की कंपनी एबीसीएल ने देखा और नाम क्या है नामक फिल्म में भूमिका दी, लेकिन यह फिल्म ठंडे बस्ते में चली गई । [ 11 ] उन्होंने 1996 में दस्तक के साथ एसीपी रोहित मल्होत्रा ​​के रूप में अपनी फ़िल्मी शुरुआत की, उसी फ़िल्म में मिस यूनिवर्स 1994 सुष्मिता सेन भी नज़र आईं। वह किला (1998), वजूद (1998), कोहराम (1999) और मुझे मेरी बीवी से बचाओ(2001) जैसी कई फ़िल्मों में नज़र आए । हाल के वर्षों में उन्होंने यमला पगला दीवाना (2011), सन ऑफ़ सरदार (2012), आर...राजकुमार (2013) और जय हो (2014) फ़िल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं।

शुक्रवार, 23 मई 2025

स्वाभिमान और सिंदूर…

 स्वाभिमान और सिंदूर…


अमेरिका की दादागिरी किसी से छिपा नहीं है और ट्रंप ने दोबारा सत्ता सँभालते ही जिस तरह से अति मचाना शुरू किया है, उसके आगे मोदी सत्ता की चुप्पी भी कम हैरान करने वाली नहीं है

ऐसा शायद इतिहास में पहली बार हो रहा है कि ट्रंप की दादागिरी पर भारत ख़ामोश है और वह भारत की खामोशी का फ़ायदा उठाकर देश की बेइज्जति करने आमादा है

भारतीयों को हथकड़ी लगाने वाली बात को जायज़ ठहराने वाले शायद भारत-पाक के बीच सीजफ़ायर वाले ट्रंप के फ़ैसले को भी अपनी कुतर्कों से जायज़ ठहरा दे ?

लेकिन सवाल तब उठता है जब ट्रंप की दादागिरी पर चीन और फ़्रांस के नेता माकूल जवाब देकर ट्रंप को घुटने में ले आते है लेकिन मोदी सत्ता अब भी ख़ामोश है 

और अब तो साउथ अफ़्रीका जैसे देश भी ट्रंप को जवाब देने लग गये तब जो  फ़ेसबुक में चल रहा है… या सोशल मीडिया में सुर्ख़ी बटोरने वाले इन सवालों को समझे…

*दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति का स्वाभिमान और हमारे प्रधानमंत्री जी की रगों में दौड़ता सिंदूर*


★ कल "व्हाइट हाउस" में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और साउथ अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति रामाफोसा के बीच "जेलेन्सकी" वाली 'जूतम पैजार' हो गई..


★ ट्रंप Tv स्क्रीन लगा कर पूरी तैयारी के साथ बैठा था ताकि साउथ अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति की बे-'इज़्ज़ती की जाए..


★ ट्रंप ने रामाफोसा को साउथ अफ़्रीक़ा के कुछ VDO दिखाते हुए बोला कि तुम्हारे देश में काले लोग गोरों का क़त्ल कर रहे हैं..ट्रंप का ऐसा कहना ग़लत था


★ राष्ट्रपति रामाफोसा ने बोला कि VDO फ़र्ज़ी है..बल्कि साउथ अफ़्रीक़ा में काले लोगों का ही क़त्ल हुआ है..ट्रम्प को झूटा बोल दिया😃


◆ राष्ट्रपति रामाफोसा ने ट्रम्प को बोला कि मेरे पास आप को देने के लिए 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ नहीं है..


◆ क़तर ने ट्रम्प को 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ दिया था, यह उस पर तंज़ था🤣


◆ ट्रम्प एक बार सकपका गया था..संभलते हुए ट्रम्प ने राष्ट्रपति रामाफोसा को कहा कि अगर आप 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ देंगे तो अमरीका क़ुबूल करेगा🔔🔔🔔


👉 राष्ट्रपति रामाफोसा साहब, हम भारतवासी आप को सलाम करते हैं..क्योंकि ट्रम्प जैसे बदतमीज़ को आप ने सही सबक़ सिखाया..


👉 राष्ट्रपति रामाफोसा साहब, आप ने अपने देश की 'इज़्ज़त, ग़ैरत और आज़ादी का समझौता नहीं किया


✋ भक्तों एक भारत के PM मोदी जी हैं ट्रम्प रोज़ मोदी जी को ज़लील करता है..पर मोदी जी के मुंह से एक लफ़्ज़ नहीं निकलता है..


👉 ख़ून में ख़ुद दारी दौड़नी चाहिए  ख़ून में सिंदूर नहीं दौड़ता... और हां व्यापार भी नहीं दौड़ना चाहिए;;;;;



इस तस्वीर से युद्ध नहीं चुनाव जीते जाते हैं

 इस तस्वीर से युद्ध नहीं चुनाव जीते जाते हैं


पाकिस्तान की पीठ पर सवार होकर अमेरिका ने जो सीजफ़ायर का एलान किया, उसे क्या कोई भुला पाएगा

चीन ने पाकिस्तान की संप्रभुता की आड़ लेकर भारत को धमकाया क्या उसे नज़र अन्दाज़ किया जा सकता है

लेकिन यदि खून की जगह ठंडा तासीर वाला सिंदूर बहे तब क्या किया जा सकता है 

ऐसे में अब यदि राम को लायें है कि तर्ज़ पर हर रेलवे की टिकिट पर और चौक चौराहों में सेना की वर्दी पहने मोदी दिखे तो इसका मतलब क्या है यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए 

ऐसे में राजेश जे जैन ने फ़ेसबुक में जो लिखा वह आप भी पढ़िए..

ये कैसा खून है जो समय के साथ बदल जाता है ? कभी ये धंधा बन जाता है ,कभी व्यापार और आज तो  ये सिंदूर बन गया !! ट्रम्प के सामने ठंडा पड़  जाता है ! चाइना का नाम आते ही सूख  जाता है। चलिए मान लेते है.  गरम सिंदूर बन गया तो बताए कि पहलगाम के पीड़ितों के लिए आपने क्या किया ? लफ्फबाजी ! किसी को दिलासा देने की कोशिश की ? उनसे मिलकर सांत्वना के दो शब्द कहे ? बिलकुल नहीं ! हाँ नितीश कुमार के साथ ठिलवाई जरूर की।

राहुल गांधी दुरुस्त कह रहे है कि आपके खून में केमिकल रिएक्शन ' कैमेरा ' देखकर ही होने लगता है। अन्यथा तो आप सर्वदलीय बैठक से ही कल्टी मार जाते है। अगर यह खून वाकई रिएक्शन करता तो 22 अप्रैल को ही उबल जाता , विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री की ट्रोलिंग पर आपकी नींद उड़ा देता , सोफिया कुरैशी और सेना के अपमान के जिम्मेदार दोनों मंत्रियों को सड़क पर ला देता। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से खून ने कोई हरकत नहीं की !

तो अब थोड़ा विश्राम कीजिये  श्रीमान।  बातों की जलेबियाँ तलना बंद कीजिये। एक काम कीजिये ,  अपना ये होर्डिंग भी  उतरवा लीजिये , लोग मजाक बना रहे है  , हंसा हंसा कर जान लेंगे क्या ? इस तरह के इवेंट से अब आपके अंधभक्तो को भी कोफ़्त होने लगी है , आते जाते लोग उन्हें मुस्कुराकर देखते है।  इससे उनका खून जरूर उबल जाता है।

डॉ पंकज यादव ने जो लिखा…

कथा: एक जाबांज की...

22 अप्रैल को हुये कायर आतंकियों के हमले में जान गंवाने वाले बेगुनाहों की मौत का बदला लेने को हमारा वो वीर योद्धा पल-पल व्याकुल था, देश के इंटेलीजेंस फेल्योर पर उठ रहे सवालों के बीच वो नापाक आतंकियों को सबक सिखाने को व्याकुल होता ही जा रहा था, हालांकि आतंकी घटना के बाद उसने बिहार में जंग के मैदान से शब्दभेदी बाण छोड़े, पर इंतकाम की आग उसे चैन नहीं लेने दे रही थी। 


आखिरकार 06-07 मई, 2025 की आधी रात को वो घड़ी आई जब रडार परास्त तकनीकी का इस्तेमाल करते हुये वो अकेला ही लड़ाकू विमान लेकर दुश्मन देश के आतंकी ठिकानों पर टूट पड़ा। खाकी वर्दी, काला चश्मा और कार्गो पहन हमारा वो वीर योद्धा उस रात एको एक आतंकी को नेस्तानाबूद कर देने को आतुर था, उसने पूरी ड्रेस पहन अपनी सभी जेबों में बम भर रखे थे, अपने पूरे विमान को गोला बारूद से फुल कर रखा था। दुश्मन खेमे में लड़ाकू विमान के घुसते ही उसने आतंकी ठिकानों पर बमबारी शुरु कर दी। धमाके पे धमाका, बूम-बूम की आवाज से दुश्मनों के होश उड़ गये, उन्होंने आकाश की ओर देखा तो वो जाबांज अकेला ही मोर्चे पर डटा था, कभी धाँय-धाँय, कभी धम-धम, कभी बूम-बूम करके जब उसने ब्लास्ट किये तो आतंकियों को सम्भलने का मौका भी नहीं मिला, एक-एक बम के धमाके के साथ सैकड़ों आतंकी ढेर हो रहे थे।


दुश्मनों ने भी अपने हथियार उठाये धाँय-धाँय, ठिचकियाऊँ-ठिचकियाऊँ करके एक के बाद कई प्रहार हमारे वीर योद्धा पर किये गये, लेकिन हमारे जाबांज ने उस दिन दुश्मनों की एक न चलने दी। सू-सांय, सू-सांय, घर्र-घर्र करते उसके लड़ाकू विमान ने दुश्मनों के हमले को फेल कर दिया। हमारे जाबांज योद्धा ने लगातार 2 घण्टे तक मौत बनकर दुश्मनों के सीने पर तांडव किया और फिर वो योद्धा आखिरकार 07 मई की अलसुबह अपने वतन वापस लौटा, लड़ाकू विमान स्टैंड पर खड़ा कर, हैलमेट हाथ में लेकर जब वो उतरा तो उसकी जाबांजी देखते ही बनती थी, तसवीर उसी वक्त की है। गौर से देख लो, हजारों सालों में एक बार पैदा होते हैं ऐसे वीर योद्धा। शत-शत नमन है हमारे देश के ऐसे वीर, जाबांज योध्दा को...


बुधवार, 21 मई 2025

राजीव का सच…

राजीव का सच…



राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी तो राजीव से जुड़े क़िस्से एक बार फिर लोगों के ज़ेहन में समा गया।

वह सौम्य और मुस्कुराता चेहरा, जिस पर किसे प्यार न आ जाये

उपलब्धियों का ऐसा पिटारा जिस पर देश को गर्व हो, 

नवोदय स्कूल, पंचायती राज, सूचना क्रांति, राममंदिर का ताला खुलवाना और वोट देने १८ साल के युवाओं को अधिकार ।

और शायद यही वजह थी कि स्वराजीव गॉधी की अंतिम यात्रा में शामिल होने दुनिया के 64 देशों से उच्च स्तरीय प्रतिनिधि आये थे , जिसमें से 20 राष्ट्राध्यक्ष थे।किसी भी देश के पूर्व प्रधानमंत्री की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिये इतनी बड़ी संख्या में विदेशी प्रतिनिधियों  राष्ट्राध्यक्षों काशामिल होना यह दर्शाता है कि राजीव गॉधी को पूरा विश्व कितनी अहमियत देता था  यूएनओ के महासचिव  फ़िलिस्तीन के यासीरअराफात भी आये थे। यासीर अराफ़ात साहब जैसे मज़बूत शख़्स को भी राजीव जी के मृत शरीर के पास रोते हुऐ देखा गया था अमेरिका के House of Representatives के सदस्यों ने सदन में दो मिनट का मौन रखकर राजीव जी को श्रद्धांजलि दी थी औरतत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुऐ राजीव जी अपने संबंधों को याद किया था।

राजीव को बस पांच साल मिले। प्रशासनिक रूप से वे बेहद कल्पनाशील,सफल थेराजनैतिक रूप से उतने ही अल्हड़। मित्रो और सलाहकारो पर भरोसा भी प्रेम का एक रूप है। उनके दौर के कुछ फैसले सम्प्रदायिक राजनीति की जड़ में माने जाते है। मगर कोई ये नही कह सकता कि राजीव साम्प्रदायिक व्यक्ति थे। प्रेमिल व्यक्ति वैसा हो ही नही सकता। 

राजीव के परिवार में प्रेम की वही धारा बहती है। राजीव की हत्या के बाद तीस बरसो में उन्होंने क्या नही देखा। सत्ता का सुखअपमानका सागर। बच्चो का चाइल्डहुड ट्रामाउससे उबरनाडूबना , झूलनासँघर्ष करनासामना करना.. चाहे आप उनके तरीकों औरस्मार्टनेस पर सवाल उठा लें। उनके जूतेकपड़ेजीवन शैली पर बदनाम करेंएब्यूज करें। मगर उनकी आंखों में नफरत कभी नहीमिलेगी।

नफ़रत के इस दौर में राजीव को याद करने के कई मायने है..

इसमें सोनिया गांधी के पत्र के उस अंश को भी पढ़ें और सुने की राजनीति हमे कहाँ पर ला कर पटक दिया है…

मुझे मेरा राजीव लौटा दीजिए मैं लौट जाऊंगी, नहीं लौटा सकते तो मुझे भी इसी मिट्टी में मिल जाने दो


आपने देखा है न उन्हें। चौड़ा माथा, गहरी आंखे, लम्बा कद और वो मुस्कान। जब मैंने भी उन्हें पहली बार देखा, तो बस देखती रह गयी। साथी से पूछा- कौन है ये खूबसूरत नवजवान। हैंडसम! हैंडसम कहा था मैंने। साथी ने बताया वो इंडियन है। पण्डित नेहरू की फैमिली से है। मैं देखती रही। नेहरू की फैमिली के लड़के को।


कुछ दिन बाद, यूनिवर्सिटी कैंपस के रेस्टोरेन्ट में लंच के लिए गयी। बहुत से लड़के थे वहां। मैंने दूर एक खाली टेबल ले ली। वो भी उन दूसरे लोगो के साथ थे। मुझे लगा, कि वह मुझे देख रहे है। नजरें उठाई, तो वे सचमुच मुझे ही देख रहे थे। क्षण भर को नज़रें मिली, और दोनो सकपका गए। निगाहें हटा ली, मगर दिल जोरो से धड़कता रहा।


अगले दिन जब लंच के लिए वहीं गयी, वो आज भी मौजूद थे। वो पहली नजर का प्यार था। वो दिन खुशनुमा थे। वो स्वर्ग था। हम साथ घूमते, नदियों के किनारे, कार में दूर ड्राइव के लिए निकलते, हाथों में हाथ लिए सड़कों पर घूमना, फिल्में देखना। मुझे याद नहीं कि हमने एक दूसरे को प्रोपोज भी किया हो। जरूरत नही थी, सब नैचुरल था, हम एक दूसरे के लिए बने थे। हमे साथ रहना था। हमेशा।


उनकी मां प्रधानमंत्री बन गयी थीं। जब इंग्लैंड आईं तो राजीव ने मिलाया। हमने शादी की इजाजत मांगी। उन्होंने भारत आने को कहा। भारत? ये दुनिया के जिस किसी कोने में हो राजीव के साथ कहीं भी रह सकती थी। तो आ गयी। गुलाबी साड़ी, खादी की, जिसे नेहरू जी ने बुना था, जिसे इंदिरा जी ने अपनी शादी में पहना था, उसे पहन कर इस परिवार की हो गयी। मेरी मांग में रंग भरा, सिन्दूर कहते हैं उसे। मैं राजीव की हुई, राजीव मेरे, और मैं यहीं की हो गयी।


दिन पंख लगाकर उ’ड़ गए। राजीव के भाई नही रहे। इंदिरा जी को सहारा चाहिए था। राजीव राजनीति में जाने लगे। मुझे नही था पसंद, मना किया। हर कोशिश की, मगर आप हिंदुस्तानी लोग, मां के सामने पत्नी की कहां सुनते हैं। वो गए, और जब गए तो बंट गये। उनमें मेरा हिस्सा घट गया। फिर एक दिन इंदिरा जी बाहर निकलीं तो गो’लियों की आवाज आई। दौड़कर देखा तो खू’न से ल’थप’थ। आप लोगों ने छ’लनी कर दिया था। उन्हें उठाया, अस्पताल दौड़ी, उन खू’न से मेरे कपड़े भीगते रहे। मेरी बांहों में द’म तोड़ा। आपने कभी इतने करीब से मौ’त देखी है?


उस दिन मेरे घर के एक नही, दो सदस्य घट गए। राजीव पूरी तरह देश के हो गए। मैंने सहा, हंसा, साथ निभाया। जो मेरा था, सिर्फ मेरा उसे देश से बांटा। और क्या मिला। एक दिन उनकी भी ला’श लौटी। कपड़े से ढंका चेहरा। एक हंसते, गुलाबी चेहरे को लोथड़ा बनाकर लौटा दिया आप सबने।

उनका आखरी चेहरा मैं भूल जाना चाहती हूं। उस रेस्टोरेंट में पहली बार की वो निगाह, वो शामें, वो मुस्कान।बस वही याद रखना चाहती हूं। इस देश में जितना वक्त राजीव के साथ गुजारा है, उससे ज्यादा राजीव के बगैर गुजार चुकी हूं। मशीन की तरह जिम्मेदारी निभाई है। जब तक शक्ति थी, उनकी विरासत को बिखरने से रोका। इस देश को समृद्धि के सबसे गौरवशाली लम्हेे दिए। घर औऱ परिवार को संभाला है।एक परिपूर्ण जीवन जिया है। मैंने अपना काम किया है। राजीव को जो वचन नही दिए, उनका भी निबाह मैंने किया है।


सरकारें आती जाती हैं। आपको लगता है कि अब इन हार जीत का मुझ पर फर्क पड़ता है। आपकी गालियां, विदेशी होने की तोहमत, बार बाला, जर्सी गाय, विधवा, स्मगलर, जासूस … इनका मुझे दुख होता है? किसी टीवी चैनल पर दी जा रही गालियों का दुख होता है, ट्विटर और फेसबुक पर अनर्गल ट्रेंड का दुख होता है?? नही, तरस जरूर आता है।


याद रखिये, जिससे प्रेम किया हो, उसकी लाश देखकर जो दुख होता है। इसके बाद दुख नही होता। मन पत्थर हो जाता है। मगर आपको मुझसे नफरत है, बेशक कीजिये। मैं आज ही लौट जाऊंगी। बस, राजीव लौटा दीजिए। और अगर नहीं लौटा सकते, तो शांति से, राजीव के आसपास, यहीं कहीं इसी मिट्टी में मिल जाने दीजिए। इस देश की बहू को इतना तो हक मिलना चाहिए शायद।


(सोनिया गांधी के पत्र का एक अंश!) The Unreal Realities से साभार

इस सवाल का जवाब मोदी को देना चाहिए…

 इस सवाल का जवाब मोदी को देना चाहिए…


सवाल यह नहीं है कि मोदी सरकार के आने के बाद हिंदू ख़तरे में है? और न ही सवाल मोदी सत्ता के रहते बारह लाख लोगों का इस देश की नागरिकता छोड़ देने का है? सवाल तो मोदी के उन लाड़लों का है जिन्हें देश के कर्णधार बनाये गये है लेकिन इन कर्णधारों का भविष्य इस देश में नहीं विदेश में जा बसे हैं।


आप सुनकर और जानकार हैरान हो जाएँगे कि भारत की सुरक्षा और विदेश नीति के शीर्ष निर्णय जिन हाथों से लिए जाते हैं, आज उन्हीं हाथों के उत्तराधिकारी इस देश से मुँह मोड़ चुके हैं। और उसके बाद यदि वे पद पर हैं तो इस देशभक्ति पर क्या संदेह नहीं करना चाहिए ?


NSA अजीत डोभाल — देश की सुरक्षा का चेहरा।

उनके बेटे विवेक डोभाल — अब ब्रिटिश नागरिक।


विदेश मंत्री एस. जयशंकर — भारत की वैश्विक नीति के शिल्पकार।

उनके बेटे ध्रुव जयशंकर — अब अमेरिकी नागरिक।


यह सिर्फ दो लोगों का  मामला नहीं है। यह दर्शाता है कि जिनके पास इस देश के भविष्य की कमान है, उनके अपने भविष्य इस देश से बाहर बँधे हैं।

यह विचारणीय नहीं, बल्कि खतरनाक है।

जब नीति-निर्माताओं की अगली पीढ़ी इस देश में नहीं, तो क्या उनकी नीतियाँ इस देश के भविष्य के प्रति समर्पित होंगी?

जब उनके बच्चे यहाँ के स्कूल, अस्पताल, सड़कों, प्रदूषण, बेरोज़गारी, सैनिकों की शहादत — किसी भी सच्चाई से नहीं जुड़ते, तो क्या वे नीतियाँ आम भारतीय के जीवन की सच्ची परछाईं होंगी?

क्या भारत अब ‘सेवा का स्थान’ मात्र रह गया है, और ‘जीवन का सपना’ कहीं और?

क्या यह देश नेतृत्व की प्रयोगशाला बनकर रह गया है, जहाँ नेता अपने बच्चों के लिए पश्चिमी जीवन की नींव डालते हैं?

यह सवाल अब सत्ता से नहीं — जनता से है।

क्या हम ऐसे नेतृत्व को आँख मूंदकर स्वीकारते रहेंगे, जिनका भावी वंश इस देश में साँस लेने तक को तैयार नहीं?

तब सबसे बड़ा सवाल है कि इन लोगों के द्वारा सिर्फ नागरिकता नहीं छोड़ी गई है, ये भरोसा छोड़ा गया है।

तब देश के प्रधान सेवक को जवाब देना चाहिए कि वे कैसा देश गढ़ रहे है जिनमे उनके ही विश्वास पात्रों को इस देश पर विश्वास नहीं?

मंगलवार, 20 मई 2025

पहलगाम के बाद आई एपीसीआर की रिपोर्ट भयावह…

 पहलगाम के बाद आई एपीसीआर की रिपोर्ट भयावह…



एपीसीआर (Association for Protection of Civil Rights) की रिपोर्ट के अनुसार, पहलगाम हमले के बाद भारत में 184 घृणास्पद घटनाएं हुई हैं, जिनमें 316 लोग प्रभावित हुए हैं. इन घटनाओं में से 116 में पहलगाम हमला एक ट्रिगरिंग फैक्टर के रूप में कार्य कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 43 घटनाएं हुई हैं, इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश का स्थान है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन घटनाओं में 36 लोग शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं. 
एपीसीआर की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु: 
  • घृणास्पद घटनाओं में वृद्धि:
    पहलगाम हमले के बाद भारत में घृणास्पद घटनाओं में वृद्धि हुई है. 
  • उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा घटनाएं:
    रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 43 घृणास्पद घटनाएं हुई हैं, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
  • पहलगाम हमले का प्रभाव:
    इन घटनाओं में से 116 में पहलगाम हमला एक ट्रिगरिंग फैक्टर के रूप में कार्य कर सकता है, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
  • प्रभावित लोगों की संख्या:
    316 लोग इन घटनाओं से प्रभावित हुए हैं, जिनमें 36 लोग शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
एपीसीआर के वकील, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और अर्ध-कानूनी स्वयंसेवक अन्य मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जांच करने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों का दौरा करते हैं और मामले से संबंधित मुद्दों को चिह्नित करने के लिए रिपोर्ट पेश करते हैं।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राईट्स (APCR) द्वारा जारी एक 178-पृष्ठीय रिपोर्ट में 22 अप्रैल से 6 मई के बीच भारत के 19 राज्यों में मुस्लिमों के खिलाफ 184 हेट क्राईम दर्ज किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन हमलों की प्रकृति संगठित, योजनाबद्ध और लगातार थी — औसतन हर दिन 10 से अधिक घटनाएँ। पीड़ितों में महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दिहाड़ी मज़दूर शामिल हैं।_
मुख्य निष्कर्ष:
• 84 हेट स्पीच, जिनमें नरसंहार और नसबंदी की मांगें शामिल।
• 39 मार-पीट की घटनाएँ, कई मामलों में भीड़ द्वारा खुलेआम हिंसा।
• 19 तोड़फोड़ की घटनाएँ — दुकानों, मस्जिदों और घरों पर हमले।
• 12 मॉब लिंचिंग प्रयास, 3 हत्याएँ।
• कम से कम 316 मुसलमानों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित या विस्थापित किया गया।
“पहलगाम का बदला” — खतरनाक तर्क
रिपोर्ट के अनुसार 106 घटनाओं को हमलावरों ने “पहलगाम का बदला” कहकर जायज़ ठहराया। दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा फैलाई गई अफवाहों और घृणात्मक भाषणों ने इस हिंसा को उकसाया।

कुछ गंभीर घटनाएँ:
• आगरा: एक मुस्लिम युवक की गोली मारकर हत्या, दूसरा गंभीर रूप से घायल।
• मैंगलुरु: झूठे आरोपों पर 32 वर्षीय मुस्लिम युवक की पीट-पीटकर हत्या।
• शामली: भीड़ ने “26 के बदले 2600” के नारे लगाते हुए युवक पर कुल्हाड़ी से हमला किया।
महिलाओं और बच्चों पर हमले
• हिजाब पहनने वाली महिला और उसके बच्चे को डंडों और तलवारों से पीटा गया।
• 15 वर्षीय लड़के को ज़बरदस्ती पाकिस्तानी झंडे पर पेशाब करवाया गया।
• कश्मीरी लड़की को हॉस्टल में पीटा गया और आतंकवादी कहा गया।
राज्य-प्रायोजित हेट स्पीच और बहिष्कार
• यति नरसिंहानंद ने मुस्लिमों के संहार की बात कही।
• बीजेपी सांसद आलोक शर्मा ने मुस्लिमों की नसबंदी की मांग की।
• कई राज्यों में मस्जिदों पर हमले, मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार,
संस्थागत भेदभाव:
• मुस्लिम महिलाओं को चिकित्सा सेवाएँ नकारना।
• हिजाब पहनने पर छात्राओं को स्कूलों से निकालना।
• मुस्लिम जवान को पाकिस्तानी महिला से शादी पर CRPF 
पुलिस की निष्क्रियता और पक्षपात:
• कई मामलों में FIR दर्ज नहीं हुई, पीड़ितों को ही गिरफ्तार कर लिया गया।
• वीडियो सबूत के बावजूद हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं।
निष्कर्ष: एक सुनियोजित उत्पीड़न की प्रक्रिया
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह हिंसा आकस्मिक नहीं, बल्कि एक विचारधारात्मक और संस्थागत नफरत के अभियान का हिस्सा है। मुस्लिमों को टारगेट करना आज राजनीतिक रूप से स्वीकृत, सामाजिक रूप से सामान्यीकृत, और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा अनदेखा किया जा रहा है।