गुरुवार, 26 जून 2025

आपात काल का एक और सच…

 आधी रोटी खाएँगे , इंदिरा वापस लायेंगे…

और इस नारे ने इंदिरा को वापस सत्ता में ले आये..


लेकिन संसद की देहरी से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपातकाल की याद दिलाते समय यह बात भूल गये, भूले तो वे विनोबा जी द्वारा इस आपात काल को अनुशासन पर्व कहा था,, हम आपात काल की वकालत नहीं बल्कि एक और सच्चाई आपको दिखा रहे है…

दरअसल आरएसएस और बीजेपी के पास गाड़े मुर्दे उखाड़ने के अलावा कुछ बचा भी नहीं है तब सीतामढ़ी के राजकुमार गुप्ता ने जो लिखा वह भी लोगों को जानना चाहिए…  

इंदिरा गांधी ने संविधान के दायरे में रहते हुए अराजकता, देशविरोध और विदेशी एजेंटों से  देश को बचाया. अगर वह निर्णय नहीं लिया गया होता, तो भारत का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा नष्ट हो जाता.


आपातकाल को केवल एकतरफा आलोचना से नहीं, बल्कि उस समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक विघटन और विद्रोह के प्रयासों की पृष्ठभूमि में देखना होगा।


जब देश अराजकता के कगार पर था, तब एक स्त्री ने " आयरन लेडी " ने सही निर्णय लेकर भारत को बचाया.... 

                        


नए संसद सत्र प्रारंभ के ठीक पूर्व संसद की देहरी से आपातकाल की याद दिलाते नरेंद्र मोदी शायद यह भूल रहे हैं कि इन्हीं के पितृ संगठन आरएसएस की बढ़ती अनुशासनहीनता के कारण ही आपातकाल लगाया गया था जिसे विनोबा जी ने अनुशासन पर्व की संज्ञा दी थी. 


इस दौर में हर जगह संघ के संधियों की साहूकारी चल रही थी. मुनाफाखोरी और गोदामों में अनाज भरकर कालाबाजारी की जा रही थी. जबकि किसान और आम आदमी कर्ज़ के तले दबा जा रहा था. लोगों की निजी संपत्ति और ज़मीन जायदाद इन लोगों के अधीन गिरवी होते जा रहे थे. मजदूर बंधुआ मजदूरी करने विवश किए जा रहे थे.


कालेज, यूनिवर्सिटीज बंद से हो गए थे और पाठ्यक्रम तीन साल पीछे चल रहा था. हर जगह अव्यवस्था का आलम सम्पूर्ण क्रांति के नाम पर चल रहा था. 


ट्रेन घंटों पीछे चला करती थी और इनके साथी जार्ज फर्नांडिस डायनामाइट लगा कर बड़ौदा में ट्रेन उड़ाने का षड्यंत्र रच रहे थे. 

जेपी ने पुलिस और सेना से सरकार का आदेश न मानने का आह्वाहन कर डाला. यह सब भारत जैसे लोकतंत्र में सीधे विद्रोह की चेष्टा थी. अगर यह सब चलता रहता, तो भारत एक अराजक, विखंडित और गृहयुद्ध की ओर बढ़ता देश बन जाता.


इंदिरा जी ने आपातकाल लगा कर देश को विखंडन और विदेशी षड्यंत्रों से बचाने का एक रणनीतिक कदम उठाया, सब चीजों को व्यवस्थित किया. बीस सूत्री कार्यक्रम लागू किया जिससे हर वंचित को लाभ पहुंचाने के वास्तविक प्रयत्न किए गए. बैंक फाइनेंस की झड़ी लगा दी गई ताकि हर व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार व्यवसाय और जीवनयापन कर सके. 


ट्रेन इतने समय पर चलने लगी थीं कि उनके आगमन से लोग अपनी घड़ी मिलाने लगे थे. हर किस्म की हड़तालें बंद हो गई थी और कल कारखाने पूर्ववत चालू हो गए थे.  जनता एक तरह से खुश हो रही थी. यह कदम भारत को अराजकता, सामाजिक विघटन, और विदेशी प्रायोजित "टुकड़े-टुकड़े गैंग" के हाथों में गिरवी रखने से बचाने का था।


सबसे ज्यादा  संघ परिवार के लोग ही जेल भेजे गए थे. यही वे संघी थे जो जेल से अपने माफीनामे सरकार को भेजा करते थे और उनका विधिवत प्रकाशन समाचार पत्रों में सशुल्क छपवाते थे, और तब पैरोल पर जेल से छूटते थे. एक प्रकार से तब वे अपने आप में सावरकर को दोहरा रहे थे. देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने की यह कोई बड़ी सजा नहीं.

सेना के साथ मिलकर कुछ लोग सत्ता हथियाना चाहते थे. वो इलाहाबाद का जज भी जे पी का रिश्तेदार था. कमाल तो देखो, इनके समुदाय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने को sc ( हरिजन ) घोषित करने का मुकदमा कर रखा है जो आज भी लंबित है. बुरा दौर था. मैं उसका समर्थन नहीं करता. लेकिन आज का दौर उससे भी बुरा है.

यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि इंदिरा गांधी जब इमरजेंसी हटाने पर विचार कर रही थीं तो कौन लोग इमरजेंसी के पक्ष में बयान दे रहे थे? अगर विकीपीडिया पर भरोसा करें तो इमरजेंसी हटाए जाने की घोषणा के महज चार महीने पहले- यानी नवंबर 1976 में माधवराव मुले, दत्तोपंत ठेंगड़ी और मोरोपंत पिंगले के नेतृत्व में 30 से ज़्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखकर कहा था कि अगर आरएसएस कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया जाए तो वे लोग इमरजेंसी का समर्थन करेंगे. वाजपेयी भी इसके पक्ष में थे.

संजय गांधी की नसबंदी की जबराना हरकतों की वजह से इंदिरा गांधी चुनाव हारी और बाद में जो संघनीत सरकार बनी, उसने सबसे पहले ऐसे तमाम जेल यात्रियों के लिए स्वतंत्रता सेनानियों की तरह पेंशन शुरू की गई जिसका लाभ उन्हें अब तक मिल रहा है जो अभी शायद 25000 प्रतिमाह है. आंदोलनजीवी को अशांति फैलाने का यह पुरस्कार कितना वाजिब है यह देश तय करेगा.

 इमरजेंसी उपरांत इंदिरा जी चुनाव हार गयीं और इंदिरा जी के विरूद्ध भ्रष्टाचार और तमाम फालतू के आरोप लगाकर जांच करने के लिए गुजरात के एक जज छोटा भाई शाह के नेतृत्व में शाह कमीशन बनाया गया ।

वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने कहा था कि शाह कमीशन में कार्यवाही नहीं खिलवाड़ हो रहा था।

उस कमीशन के सामने कांग्रेस सांसद शशि भूषण बाजपेई ने ३५० पन्नों की साक्ष्य प्रस्तुत की जिसमें जनसंघ के एकाउंट नंबर और उनमें आने वाले पैसे का जिक्र किया गया और शाह कमीशन की रिपोर्ट बिल्कुल पढ़ी नहीं गयी।

जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी और वो बेटे को दलाली करवाने लगे और ये पहले लिख चुका हूं और जयप्रकाश नारायण दिल्ली आये और दलाली देखी तो उनको दिल्ली के मौर्या शेरेटन होटल में पूरे सम्मान के साथ नजरबंद कर दिया गया और कुछ दिन बाद जेपी किडनी पकड़कर बिहार वापस चले गये।

 कुछ ही दिनों बाद सारा झूठ का महल भरभरा कर गिर गया और लोग चीखने लगे " आधी रोटी खाएंगे इंदिरा वापस लायेंगे" 

कुदरत ने आगे और खेल दिखाया आगे चलकर। 

देश के साथ गद्दारी करने वाले निक्सन के दलाल जेपी कैसे निपटे? अटल बिहारी वाजपेई और जार्ज फर्नांडिस दस दस साल देश के साथ गद्दारी करने की सजा पाकर मरे और उनका बास रिचर्ड निक्सन अमरीका में जलील करके वाटरगेट कांड में महाभियोग के जरिए हटाया गया और आज कैनेडी, आइजनहावर या ओबामा की तरह उसे कोई याद करने वाला नहीं है और शेरनी की तरह मुस्कुराते हुए शहीद हुयीं इंदिरा जी को कोई भूलने वाला नहीं है। 

तुम मर जाओ जेपी ... 

क्या आप जानते है कि जेपी के कंधों पर सवार होकर आने वाली जनता सरकार, जेपी की मौत के लिए कितनी उत्साह से भरी हुई थी। जेपी, जो आंदोलन के नेता थे, जनता सरकार की सत्ता में दलाली देखकर टूट गए। मौर्या शेरेटन होटल में नजरबंद किए गए और बीमार होकर लौटे।

हांजी, बीमार जेपी के मरने के पहले ही उन्हें संसद में हड़बड़ तड़बड़ श्रद्धाजंलि भी दे दी थी। फिर पता चला, अभी साहब जिंदा है, तो भरी संसद से माफी मांगी गयी। 

गूगल कीजिए, मिल जाएगा। 

इंदिरा की "तानाशाही" के खिलाफ...? 

जेपी आंदोलन आखिर था क्यों? ऐसा कौन सा भ्रष्टाचार हो गया? जब नियमित चुनाव हो ही रहे थे, तो तानाशाही कैसे आ गयी? और जब माँग बिहार विधानसभा बरखास्त करने की थी, तो यह इंदिरा गांधी की सत्ता उखाड़ने की ओर क्यों बढ़ गयी?

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वे तानाशाहीपूर्ण निर्णय क्या थे?


प्रिवीपर्स खत्म करना?? बैंक नेशनलाइजेशन?? हरित क्रांति?? पाकिस्तान को दो टुकड़े करना??? या कांग्रेस के मोरारजी सहित कांग्रेस के सिंडिकेट को बेरोजगार कर देना?? 

आह, क्या मेस के खाने की फीस बढ़ जाना, गेहूं की कीमत बढ़ जाना, बेरोजगारी बढ़ जाना, रेलवे के वेतम भत्ते न बढ़ाना?? ये इतना बड़ा संकट था, कि देश की सेना और पुलिस से विद्रोह का आव्हान किया जाए। 

अगर हां, तो क्या आप आज के विपक्ष को, इन्हीं कृत्यों के लिए आप समर्थन देंगे?? 

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दरअसल 1975 की इमरजेंसी के बाद तो आप नसबन्दी, संजय गांधी, तुर्कमान गेट, मीसाबन्दी और किशोर कुमार के गाने न बजाने को तानाशाही गिना सकते हैं। 

लेकिन 1975 के इसके पहले कौन से निर्णय थे, जिसके खिलाफ जेपी आकर खड़े हो गए। 

कोई बताये...

मुस्लिम लीग जिन्ना के साथ सरकार बनाने वाले, अंग्रेजों के मुखबिर, गांधी के हत्यारे, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के विरोधी, संविधान और तिरंगा को जलाने वाले किस मुंह से संविधान रक्षा की बात करते हैं? 

जनता ने जल्द ही देखा कि संघ-जनसंघ-जनता पार्टी की सरकार न तो अनुशासन ला सकी, न विकास दे सकी। जल्द ही पूरे देश में नारा गूंजा —

"आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को लाएंगे!"

जनता का मन पलटा और 1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटीं।

बा'द में जेपी ने इंदिराजी से माफ़ी मांगी थी- जेपी ने क़ुबूल किया था कि इंदिराजी के ख़िलाफ़ आंदोलन ग़लत था.(साभार)

बुधवार, 25 जून 2025

सीज़फ़ायर-युद्ध और ट्रंप…

 सीज़फ़ायर-युद्ध और ट्रंप…


यह दुनिया के लिए राहत की खबर है कि इज़राइल ईरान या भारत पाकिस्तान के बीज सीज़फ़ायर हो गया लेकिन युद्ध और सीज़फ़ायर के बीच जो कुछ हुआ वह क्या सब पूर्व में लिखी स्क्रिप्ट है ताकि कोई खेल खेला जा सके… राष्ट्रवाद के जुनून में जनता को धकेला जा सके…


जैसे भारत-पाकिस्तान में आभासी युद्ध करवाया गया था ड्रोन ड्रोन मिसाइल मिसाइलों का खेल किया गया था कुछ उसी तरह से यह स्क्रिप्ट भी लिख दी गई!


भारत-पाक युद्ध में भी क्या हुआ था सरकार ने स्वयं अपनी पीठ ठोकी थी पाकिस्तान को सूचना देकर आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए थे जहां से पहले ही आतंकवादी हटा लिए गए थे और अब तो यह भी साबित हो गया है की पहलगाम आतंकवादियों के लिए जिन आतंकवादियों को नामांकित किया गया था उसमें भी भारत सरकार चूक कर गई थी और वह आतंकवादी वह नहीं थे जिन्होंने हमला किया!


भारत में यह परसेप्शन बनाया गया कि हमने चुन चुन कर टारगेट हिट किया और पाकिस्तान ने इस बात के लिए जश्न बनाया की पहली बार पाकिस्तान की वायु सेना ने भारत के बड़े-बड़े विमान को मार गिराया!


 दोनों तरफ से विन विन सिचुएशन का परसेप्शन मीडिया बनाता रहा और दोनों देश की जनता तमाशा देखते रही और दोनों देश के शासक सत्ता के पुनरप्राप्ति के प्रयासों पर अपने कदम बढ़ाते रहे और अमेरिका का राष्ट्रपति अपने व्यापारिक फायदा और अंतर्राष्ट्रीय सरपंची के लिए अपनी स्थिति मजबूत करता रहा!

पूरे देश में सेना की वर्दी पहनकर घूमने वाले तथाकथित 56 इंच कमांडर की जबान पर अभी तक पहलगाम के आतंकवादियों का सवाल वह कौन थे कब गिरफ्तार होंगे नहीं आ पाया है! 

समय की बिसात पर राजनीति के पासे  जब कूटनीति के सांचो में ढलते हैं, तो यह समझना मुश्किल हो जाता है क्या सच है क्या झूठ? 

बाहर से दिखने वाली परिस्थितियों अंदर से कितनी शालीनता से एक दूसरे का सहयोगी बन जाती है हम अपेक्षित ही नहीं कर पाते!  और शायद इसी का नाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति है !

फोर्दो पर हमले के बाद ईरान के चट्टानी संकल्प की परीक्षा लेते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कुछ कहा ,किया वह चौंकाने वाला था! 

आज ईरान ने भी कतर स्थित अमेरिकन बेस पर हमला किया लेकिन उसके पहले उसने कतर को आगाह किया इसलिए एयर बेस पर ईरानी मिसाइल तो विस्फोट करती नजर आई, लेकिन जनधन की हानि बहुत न्यूनतम थी हमले के वेग के अनुपात में 

और इस एक घटना से विमर्श उपजने लगा क्या कहीं सब कुछ स्क्रिपटेड तो नहीं चल रहा!

ईरान की पहाड़ियों में दफन सुरक्षित किला फॉरदो पर अमेरिका की बंकर रोधी मिसाइल ने हमले किए और सुरक्षित अमेरिका का विमान इसराइल लौट गए! 

एक बारगी लगा नोबेल पीस प्राइज की दौड़ में शामिल ट्रंप ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं? 

जो संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों का उल्लंघन ही नहीं बल्कि अमेरिकन नागरिकों की मानसिकता को भी हिट करता था!

लेकिन जैसा भारत-पाक युद्ध में हुआ ठीक वही परसेप्शन वहां क्रिएट किया गया!

 अमेरिका ने ईरान को पूर्व सूचना दी थी कि हमें इजरायल की संतुष्टि और अमेरिका की जो सीनेट की यहूदी लाबी है , उसकी मानसिकता को तुष्ट करने के लिए ऐसा प्रदर्शित करना पड़ेगा !

आप वहां से अपने आवश्यक और जो आपको हानि पहुंचा सकते हैं ऐसी सामग्रियों को हटा ले जो 15 दिन का समय दिया गया था ट्रंप के द्वारा शायद उसकी प्रति ध्वनि भी अब समझी जा सकती है! चट्टान का वह किला अमेरिका की बंकर रोधी मिसाइलों ने हिलाया, एक सीमा तक नष्ट भी किया लेकिन फिर भी कोई रेडियोएक्टिव प्रभाव ईरान पर दुनिया ने नहीं देखा मतलब साफ था वहां से यूरेनियम हटा लिया गया था! 

यह सब इतना आसान भी नहीं रहा होगा क्योंकि

 ईरान को इस बात के लिए राजी करने के लिए शायद यह भी कहा होगा कि हम इसराइल के माध्यम से सीज फायर का निवेदन आप तक पहुंचाएंगे और वह उस ईरान की मानसिकता को संतुष्ट करेगा जिसका परसेप्शन आपने बनाया है! 

नेतन्याहू भी इजरायल के लगातार होते नुकसान से परेशान थे एक के बाद एक मुस्लिम देशों पर हमले के बाद इजरायल की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई थी और युद्ध सामग्री का भंडार भी! 

कहीं की भी जनता युद्ध नहीं चाहती इजरायल की भी नहीं! नेतन्याहू परेशान थे, विद्रोह के स्वर इजराइल में भी उठने लगे थे!

अमेरिका ने समझाया इजराइल का प्राथमिक उद्देश्य युद्ध को लेकर यह था कि ईरान परमाणु संवर्धन नहीं कर पाए परमाणु बम नहीं बना पाए बंकर रोधी आक्रमण के बाद ईरान लगभग 10 साल पीछे चला गया है और यह इजरायल के लिए विन विन सिचुएशन है 

मिडिल ईस्ट में इजरायल के साथ सीधे युद्ध में शिरकत कर कर अमेरिका ने इजरायल की स्थिति को मजबूत किया है और इन्हीं सब तथ्यों की रोशनी में उन्होंने इसराइल पर दबाव डाला की  वह ईरान से  सीज फायर की रिक्वेस्ट करें!

एक चालाकीअमेरिका नेऔर की उन्होंने ईरान से अपनी एयरबेस जो कतर में थी उस पर भी हमला करवाया ताकि ईरानी मानसिकता और अमेरिका विरोधी मानसिकता इस बात से संतुष्ट हो सके कि ईरान ने सरेंडर नहीं किया नरेंद्र की तरह बल्कि अमेरिका के आक्रमण पर भी प्रत्यक्रमण कर जवाब दिया!

 ठीक इसी तरह जिस तरह इजराइल को समझाया गया कि चीन उत्तर कोरिया और सोवियत रूस ईरान को परमाण्विक हथियार दे सकते हैं इसलिए इस विषय को आगे बढ़ना तर्कसंगत नहीं!

अब व्यापार की बात होगी, शेयर मार्केट में तेजी होगी सोने के भाव गिरेंगे और पेट्रोल की आपूर्ति निरंतर रहेगी लेकिन सवाल सबसे बड़ा है क्या ईरान इजरायल युद्ध में भारत की विदेश नीति और कूटनीति एक बार फिर से आहत नहीं हुई है? 

अपने अपने तर्कों से आपके जवाब प्रतीक्षित रहेंगे पर फिलहाल ऐसा लगता है तीसरे विश्व युद्ध का खतरा कुछ दिनों के लिए तो आगे खिसक गया है!(साभार)

मंगलवार, 24 जून 2025

चुनाव आयोग क्यों डर रहा…

चुनाव आयोग क्यों डर रहा…



जब से राहुल गांधी की लिखी चिट्ठी ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाया है तब से चुनाव आयोग ही नहीं पूरा सिस्टम एक तनाव में नजर आ रहा है! 

आज चुनाव आयोग ने यह घोषणा की वीडियोग्राफी फोटोग्राफी और इलेक्ट्रॉनिक डॉक्यूमेंट के सारे डेटा सिर्फ 45 दिन तक सुरक्षित रखें जायेंगे!

उल्लेखनीय है कि पहले मतदान की प्रक्रिया जिसमे वोटर वोट डालता था 6 महीने से 1 साल तक सुरक्षित रखी जाती थी, इलेक्ट्रानिक मशीनों में 6 महीने से 1 साल तक डाटा सुरक्षित रखने की बात पहले चुनाव आयोग कहता था! 

चुनाव आयोग का तर्क है मतदाता की निजता और सोशल मीडिया के माध्यम से जो गलत खबरें चुनाव आयोग को लेकर फैलाई जाती है उसको रोकने के लिए ये कदम उठाए गए हैं! 

अगर 45 दिन तक सबूत के साथ चुनाव पर कोई याचिका दायर नहीं हुई तो यह डाटा डिलीट कर दिए जाएंगे! 

वीडियो फुटेज जो ऑन डिमांड दिए जाते थे वह भी ऑन जुडिशरी आर्डर दिए जाएंगे अगर 45 दिन में यह सब कुछ नहीं हुआ तो डाटा डिलीट कर दिया जाएगा! 

जिस देश मेंअदालत की इतनी पेंडेंसी हो और सामान्य न्याय के लिए भी वर्षों लग जाते हैं कैसे संभव होगा की 45 दिन में संबंधित न्यायालय शिकायतों पर विचार कर पाएगा! सूचना  के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाए साल साल भर तक सुनी नहीं जाती वहां पर 45 दिन का यह प्रावधान क्या पार दर्शित का गला घोंटने की कोशिश नहीं?

चुनाव आयोग के इन बदलावों पर सारे राजनीतिक दल हमलावर है और इसे पारदर्शिता के प्रति कुठाराघात मान रहे हैं!

जिस लोकतंत्र के लिए चुनाव हो रहे हैं उस लोकतंत्र में आपको सवाल पूछने की आजादी तो है पर जवाब दिया जाए जरूरी नहीं है !


दरअसल चुनाव भी अब तकनीक का खेल हो गया है और इसलिए प्रक्रिया सिस्टम कैसे हैक किया जाए उसे लेकर रोज नई-नई योजनाएं बनाई जाती है !


राहुल गांधी के आरोपो के बाद जो पुराना सिस्टम हैक करने का तरीका था उसकी परत खुल जाने की वजह से अब सत्ता को और सत्ता के गुलाम चुनाव आयोग को नई तकनीक का उपयोग करने पर मजबूर होना पड़ा है! 


यह विमर्श तो आम है की चुनाव आयोग पर भरोसा खत्म हो गया है और आज इस बात को फिर से बल मिला है! 

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लेकिन चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव के पहले भी 10 महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं! 


1_ ई वोटिंग की शुरुआत बिहार चुनाव में अब आप E वोटिंग कर सकते हैं घर बैठे लेकिन सवाल यह है कि जो लोग शहरों में रहते हैं जिनके पास स्मार्टफोन है वहीं इसका लाभ उठा पाएंगे ग्रामीण क्षेत्रों में यह कितना उपयोगी होगा यह विश्लेषण का विषय होगा! और ई वोटिंग में मतदाता को डराने धमकाने या मजबूर करने और उसकी निजता के उल्लंघन की पूरी पूरी संभावना रहेगी!


2_ बायोमेट्रिक सिस्टम से मतदाता पहचान जाएगा मतलब जब मतदाता मतदान करने  जाएगा तो आधार कार्ड पर जो उसका अंगूठा है वही अंगूठे का निशान बायोमेट्रिक सिस्टम से मैच किया जाएगा पर सवाल यह है कि जब एक ही अंगूठे वाले बहुत सारे जगह पर मतदाता का नाम होगा तो उसे बायोमेट्रिक सिस्टम से चुनाव आयोग कैसे पहचानेगा कि यह डुप्लीकेट वोटिंग हो रही है! 


 3_  बदलाव जो चुनाव आयोग ने किया है वह यह है किai आधारित चैट बॉक्स पर मतदान की सूचनाओं दी जाएगी यहां पर भी एक सवाल हैai जेनरेटेड चैट box क्या सिर्फ मतदान की जानकारी देगा या मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए या प्रचारित करने के   के लिए किसी सत्ता का सहयोग करेंगे!


4_ E पास इशू किए जाएंगे, वृद्ध दिव्यांग या बीमार लोगों के लिए यह सुविधा दी जाएगी! इस सुविधा के लिए ऑनलाइन आवेदन करना पड़ेगा सवाल यह है जो लोग ऑनलाइन आवेदन नहीं कर पाएंगे क्या वह सुविधा के अधिकारी नहीं होंगे! 


5_मतदान केंद्र की देखरेख के लिए ड्रोन सर्विलांस का उपयोग किया जाएगा मतलब आप आसमान से मतदान केदो पर नजर रखी जाएगी पर यदि कोई जमीन पर गड़बड़ हो रही है कमरे के अंदर तो बेचारा ड्रोन सर्विलांस क्या करेगा! 


6_ मतदान केदो में वृद्धि की जाएगी यह स्वागत योग्य बात है ताकि मतदान केंद्र पर किसी तरह की भीड़ नहीं हो लेकिन क्या यह भी तय किया जाएगा के मतदान केंद्र आसान पहुंच में हो सुलभ हो और बस्ती के पास हो!


7_मोबाइल ऐप से मतदान केदो की जानकारी दी जाएगी ताकि आप यह जान सके कि मतदान केंद्र पर कितनी भीड़ है और क्या आप समय पर वोट दे पाएंगे!


8_शिकायत निवारण में तेजी की जाएगी लेकिन चुनाव आयोग का जो वर्तमान का स्वरूप है उसमें बरसों बरस शिकायतें नहीं सुनी जाती क्या यह बदलाव सिर्फ कागजी रहेगा या व्यवहारिक रूप से परिवर्तित किया जाएगा? 


9_वृद्ध दिव्यांग या विशेष वर्गों के लिए रैंप बनाई जाएगी ताकि किसी तरह के असुविधा न हो यह स्वागत योग्य बात है! 


10_और अंतिम बदलाव यह है की सोशल मीडिया पर अंकुश लगाया जाएगा और सोशल मीडिया की मॉनिटरिंग होगी सवाल यह है की सोशल मीडिया को आप प्रतिबंधित करना चाहते हो पर टीवी मीडिया और प्रिंट मीडिया का लेकर कोई गार्ड लाइन नहीं है! (साभार)

सोमवार, 23 जून 2025

उपचुनाव-चार राज्य, आठ परिणाम…

 उपचुनाव- चार राज्य,आठ परिणाम…


चार राज्यों में हुए उपचुनाव के आज परिणाम जारी हुए, केरल, बंगाल, पंजाब और गुजरात के चुनाव परिणाम ने एक बार फिर बीजेपी की चूलें हिला दी.. तो दिल्ली हार चुकी आप पार्टी के लिए यह परिणाम ने उम्मीद की नई किरण को जन्म दिया है ऐसे में कांग्रेस के लिए यह परिणाम आत्म चिंतन का विषय भी है…

वैसे तो उपचुनाव के परिणाम का कोई ख़ास असर नहीं होता लेकिन एक संकेत तो उभरते ही है. । क्या है वह संकेत…

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी के तमाम प्रयासों के बावजूद मजबूती के साथ खड़ी है और भारतीय जनता पार्टी कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं कर पाई है , सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशें के बावजूद तृणमूल कांग्रेस मजबूत है, और ममता बनर्जी की स्थिति आज के परिणाम को देखते हुए आने वाले विधानसभा के आम चुनाव में बहुत मजबूत नजर आती है!

ठीक इसी तरह कांग्रेस के तमाम दावों के बावजूद पंजाब  में  आप ने लुधियाना पश्चिम सीट जीतकर अपनी स्थिति को मजबूत किया है और कांग्रेस को आत्म चिंतन पर मजबूर यह सही है कांग्रेस का उम्मीदवार अच्छा चुनाव लड़ा लेकिन कांग्रेस का जो जातिगत आधार रहता था उसे भाजपा के उम्मीदवार ने पूरी तरह डेंट किया है और ऐसे में कांग्रेस को वहां नए सिरे से अपने जातिगत समीकरण उलट पलट करने पड़ेंगे!

 दरअसल पंजाब में कांग्रेस के नेतृत्व को जनता  ने  विकल्प के तौर पर स्वीकार नहीं किया है !

इसलिए सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद भी आप परिणाम देने में सक्षम रही है! 

केरल ऐसा उदाहरण है जहां कांग्रेस ने एलडीएफ की सत्ता के बावजूद अपना उम्मीदवार को जीता लाने में कामयाबी हासिल की है!

 लेकिन चुकि ये विधानसभा प्रियंका गांधी की लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा थी इसलिए यह कांग्रेस के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती थी ! लेकिन फिर भी केरल के विधानसभा चुनाव भी आने वाले हैं और कांग्रेस इस एक राज्य में और उम्मीद कर सकती है!

भाजपा यहां अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं कर पाई है और यह उसके लिए शुभ संकेत नहीं है क्योंकि दक्षिण में अभी भी उसकी स्वीकार्यता नजर नहीं आ रही है!

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण राज्य गुजरात था जहां राहुल गांधी ने काफी परिश्रम किया था और उम्मीद थी कांग्रेस कुछ बेहतर करेगी लेकिन राहुल गांधी का जो कार्यक्रम था या कोशिश थी वह जनता के बीच नहीं पहुंच पाई है, और सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद कांग्रेस  अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं कर पाई,

गुजरात को लेकर कांग्रेस को आत्म चिंतन करना पड़ेगा!

लेकिन इसके विपरीत गुजरात की विसवादर सीट पर आप पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और उपचुनाव के उम्मीदवार गोपाल इटालिया ने शानदार जीत दर्ज कर भारतीय जनता पार्टी को मोचक्का कर दिया है! 

सत्ता विरोधी माहौल जो कांग्रेस ने तैयार किया था इसका लाभ गोपाल इटालिया को मिला है लेकिन कांग्रेस जमीन पर उस माहौल का लाभ नहीं ले पाई यह कांग्रेस के लिए आत्म चिंतन का विषय है!

कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने कंफर्टेबल जीत हासिल की लेकिन जिस तरह गुजरात के परिणाम आए हैं भाजपा के लिए चिंता का विषय है क्योंकि कहीं ना कहीं परिणाम सत्ता विरोधी माहौल को इंगित कर रहा है! 

आप के लिए दिल्ली के बाद उपचुनाव के परिणाम उत्साह बढ़ाने वाले हैं और राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर से केजरीवाल भी मुख्य भूमिका में अपने शिरकत निभाते नजर आ सकते हैं!

रविवार, 22 जून 2025

ईरान का डर, ज़िद और गर्व…

ईरान का डर, ज़िद और गर्व…


इज़राइल और अमेरिका के हमले के बाद ईरान ने दोगुनी ताक़त से इज़राइल पर हमला किया, क्या अमेरिका के युद्ध में कूदने से तीसरे विश्व युद्ध की घंटी बज़ गई है , क्या है ईरान का परमाणु ठिकाना…


ईरान के क़ुम शहर के करीब, एक ऐसा किला सांस ले रहा है जो दुनिया की नींद उड़ाए हुए है — इसका नाम है Fordow Fuel Enrichment Plant। यह कोई आम परमाणु ठिकाना नहीं, बल्कि ईरानी सत्ता का गर्व, डर और जिद तीनों है। सतह से करीब 300 फीट नीचे, सख़्त चट्टानों में सुरंगों के भीतर इस किले को इस तरह बनाया गया है कि कोई बम इसे छू भी न सके। पर जो चीज़ इसे अजेय नहीं बनाती, वो है इज़राइल और अमेरिका का बारीक इंटेलिजेंस जाल — जो Fordow के बाहर नहीं, इसके अंदर तक हर आवाज़ सुनता है

 पत्थर की दीवारें, धातु के रोटर और अंदरूनी डर

Fordow में ईरान वो काम करता है जिससे पश्चिमी दुनिया को सबसे बड़ा खतरा लगता है — high-grade यूरेनियम enrichment। इसका मतलब होता है कि परमाणु बम बनाने की बुनियाद यहीं से तैयार होती है। Iran ने Saddam और Gaddafi से सबक लिया — ओपन field में enrichment रखोगे तो अमेरिका बम गिरा देगा। इसलिए Fordow को पहाड़ के नीचे छिपा दिया गया।

लेकिन दुनिया के सबसे बेहतरीन जासूसों ने ये भी सबक सीख रखा था कि चट्टान से नहीं, इंसान से इन्फॉर्मेशन निकाली जाती है। और वहीं से शुरू होता है Mossad और CIA का अदृश्य खेल।

Mossad की इंसानी जंजीर

इज़राइल की सबसे घातक एजेंसी Mossad ने Fordow के चारों ओर एक ऐसा इंसानी घेरा बनाया है जिसमें कोई scientist, कोई engineer, कोई driver या कोई सुरक्षा गार्ड भी शामिल हो सकता है।

कई बार पैसों से, कई बार ब्लैकमेल से, और कई बार परिवार की सुरक्षा के नाम पर ये लोग अपने ही प्लांट की खबर बाहर भेजते हैं — कब कौन सा rotor बदलना है, कौन सी सुरंग में नया ventilation shaft खोदा जा रहा है।

इसी नेटवर्क ने Fordow के जैसे ही Natanz enrichment plant में centrifuge sabotage कराया था — कभी magnetic bomb से scientist उड़े, कभी remote sniper ने कार रोक कर गोली चलाई।

Unit 8200 और NSA की आंखें

इज़राइल की Unit 8200 और अमेरिका की NSA — ये दोनों agencies Fordow के बाहर की हर communication line, radio chatter, और tunnel sensor को real time में पढ़ती हैं।

Fordow से Tehran तक रोज़ाना जो encrypted report जाती है, वो cipher टूटते ही Tel Aviv और Langley की टेबल पर आ जाती है।

अमेरिकी KH-11 और KH-12 satellite Fordow की छत पर रखे ट्रकों की गिनती भी बदलते देख लेते हैं।

आजकल hyperspectral और AI-based imagery से thermal anomaly से पता चलता है कि पत्थर के नीचे कौन सी सुरंग active है और कौन सी dummy।

Cyber के कीड़े : Stuxnet और उसके वारिस

एक बार Mossad और NSA ने मिलकर दुनिया का सबसे चालाक cyber worm बनाया था — Stuxnet।

इसने Fordow की बहन site Natanz में centrifuge के rotors को खुद-ब-खुद overspeed करवा कर फाड़ दिया था।

आज के दौर में ईरान ने air-gapped systems बनाकर direct hacking रोक दी है, लेकिन phishing emails, fake research links और USB traps से इज़राइल-अमेरिका अब भी firmware poisoning करते हैं।

Smart Dust और Mini Drones : हवा में घुले जासूस

नए दौर में जासूसी सिर्फ उपग्रह या कंप्यूटर तक नहीं है। Mossad छोटे छोटे drones, और smart dust sensors Fordow के ventilation shaft में छोड़ सकता है। ये sensors vibration, gas leaks, और unusual heat record कर AI dashboard पर भेजते रहते हैं।

जैसे ही कोई suspicious drill या centrifuge overspin होता है — Israel Defense Forces या US Fifth Fleet को alert जाता है।

Azerbaijan से लेकर Gulf तक : चारों तरफ जाल

Fordow को घेरने के लिए जमीनी logistics भी active हैं। इज़राइल ने Azerbaijan border पर discrete drone hub बना रखा है।

अमेरिका के पास Iraq, Bahrain और UAE में forward bases हैं — जहां से rapid strike या sabotage squad कुछ ही घंटे में Fordow की logistic lifeline को cut कर सकते हैं।

मतलब साफ है

Fordow की concrete shell उसे बम से तो बचा सकती है, लेकिन जासूसों से नहीं।

उसकी गहराई अमेरिकी Massive Ordnance Penetrator को delay कर सकती है, रोक नहीं सकती।

और Mossad का आदमी अंदर centrifuge poison करने में कितना वक्त लगाएगा — Tehran को खुद नहीं पता।

Fordow का सच : पाताल के भीतर भी डर

Fordow ईरान का गर्व है, लेकिन Tehran के लिए एक perpetual anxiety भी है।

एक तरफ अमेरिका-इज़राइल ने आज तक इसे फुल-scale bombing से बचा रखा, क्योंकि इसका political cost Strait of Hormuz बंद कर सकता है।

दूसरी तरफ, Fordow के दरवाज़े पर Mossad का जासूसी रडार हमेशा ON है — पहाड़ के बाहर भी और अंदर भी।

Fordow बंकर बम से ज्यादा Mossad के आदमी और AI की आंखों से डरता है — और यही इस पाताल का सच है।(साभार)

शनिवार, 21 जून 2025

राहुल का ऐसा जन्मदिन…

 राहुल का ऐसा जन्मदिन… 


राहुल गांधी को लेकर बीजेपी और संघ ने जो निरेटिव बनाया था वह तो कब का धुँआ धुँआ हो चुका है, ऐसे में राहुल को लेकर न केवल कांग्रेस में बल्कि आम लोगों में भी एक नई उम्मीद जगी है, तब भला काफ़ी हाउस में उनके जन्मदिन पर क्या हुआ, यह भी जानना ज़रूरी है… यह सब बताये उससे पहले राहुल का वह जवाब भी जान ले जब उन्हें ईडी दफ़्तर जाना पड़ा…

ईडी ऑफिसर्स ने पूछा कि हम इतने समय से आप से पूछताछ कर रहे हैं आप थकते नहीं हैं क्या ?

राहुल गांधी जी ने बताया उन्होंने ईडी ऑफिसर्स से कहा कि वे विपश्यना करते हैं।उसमें बैठना पड़ता है, तो आदत लग गई है।उन्हें कोई प्रॉब्लम नहीं है। 6-7-8 या 10 घंटे बैठने पर भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है।



एक आदमी को तो थकाया जा सकता है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के हर नेता हर कार्यकर्ता को थकाना संभव नहीं, सिर्फ कांग्रेस पार्टी के नेता-कार्यकर्ता उस कमरे में नहीं थे। उस कमरे में हर वह शख्स मौजूद था, जो सरकार से बिना डरे लड़ता है। हिंदुस्तान के लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले सब लोग मेरे साथ उस कमरे में बैठे हुए थे तो मैं थकूंगा कैसे?

#National Herald वो अख़बार था कि जिसने अंग्रेज़ी हुक्मरानों के नींद उड़ा दी थी,,, आजादी के दीवानों की पहचान थी National Herald,, जिसने दुनियां भर को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से रूबरू कराया,,,,,,,आज जिसको लेकर तुम  ED,के दम पर ,  उसकी बदनामी की कहानियां गढ़ रहे हो!! वो दरअसल तुम्हारी नाकाम साजिशों के कुंठित मानसिकता है,, 

वो E D,, डराते हैं,,, मै तो कहता हूं ABCD,से , पूरी Z तक का पूरा जोर लगा दो,,,,, ये आंधियों में चिराग जलाने वाले शूरवीरों का वंशज है,,,,जिसके पुरखे अंग्रेजी हुक्मरानों की जेलों में भारतीय सभ्यताओं का इतिहास लिखा करते थे,,,,जिसने अपने पुरखों  को बमों और गोलियों की बौछारें से छलनी लाशों को देखा हो,,,,वो पुरखे जिन्होंने भारत को बैलगाड़ी से अंतरिक्ष तक ऊँचाइयाँ दीं,,,,, आज वहीं भारत नफ़रतों के दौर से गुजर रहा है,,,, लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाई जा रहीं हैं,,,,आज भी ऐसी ताक़तों के खिलाफ़ बेखौफ लड़ने दंभ रखने का जुनून ही राहुल को लोकप्रियता की शिखर पर ले जा रहा है।

राहुल गांधी का जन्मदिन जगह जगह अपने ढंग से लोगो ने मनाया लेकिन कॉफ़ी हाउस में उनका जन्मदिन कुछ इस तरह से मनाया गया कि लोग याद रखेंगे…

सुबह से ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व आयोजन कर्ता बिरेश शुक्ला ने सभी वरिष्ठ जनों और पत्रकारों को सूचित किया था कि आज शाम 7 बजे राहुल गांधी जी का जन्मदिन मनाया जाएगा।

इंडियन काफी हाउस में यह पहली बार हुआ कि राहुल गांधी का बैनर पोस्टर लगाकर केक काटकर सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में यह कार्यक्रम का आयोजन किया गया बाद में स्वल्पाहार का भी आयोजन किया गया।




इस कार्यक्रम में प्रमुख
रूप से कार्यक्रम के आयोजक बिरेश शुक्ला, तिलक देवांगन, चंद्रदेव राय , नरेंद्र ठाकुर, पप्पू बंजारे , दिलीप चौहान , अवस्थी जी, नितिन ठाकुर , अनिल यादव , सुहैल खान ,रेहान खान , सद्दाम सोलंकी , संजय सोलंकी , वरिष्ठ पत्रकार कौशल शर्मा जी, खालसा समिति के जसवंत ग्रेवाल जी , अशोक तोमर (टाटा रिटायर्ड ) राकेश चौबे आरटीआई एक्टिविस्ट, वासु चटर्जी , विजय भट्टाचार्य , ललित सोनी, सजी वर्गीश, पत्रकार शिवशंकर सोनपिपरे , पत्रकार कौशल तिवारी, पत्रकार मोहन तिवारी , पत्रकार विप्लव दत्ता, पत्रकार रजनीश दिवान व अन्य सैकड़ों की संख्या में मौजूद रहे।

शुक्रवार, 20 जून 2025

सुनो…! ऑपरेशन सिंदूर जारी है…

सुनो…! ऑपरेशन सिंदूर जारी है…


 आपरेशन सिंदुर चल रहा हैं इसके समाप्त होने की  कोई अधिकृत घोषणा नहीं हुई मतलब आपरेशन सिंदुर के चलते तीन देशों की यात्रा भी हो गई और  ट्रंप से 
35 मिनिट की बातचीत भी हो गई। और ईधर आपरेशन सिंदुर चल रहा है और ऊधर असीम मुनीर का मजे में अमेरिका दौरा भी चल रहा हैं, लंच भी हो ही गया। कितना गंभीर आपरेशन हैं ये पाकिस्तान को कोई परेशानी नहीं फिर भी चल रहा है और तो और ऐसा भी चल रहा हैं कि मानो कोई बाई पास सर्जरी चल रही हो एकदम खामोशी से…

हैरानी हुई कि आख़िर ऑपरेशन सिंदूर के बीच ये सब हो क्या रहा है,इमेज तो सीज फ़ायर से ख़राब हुई ही है और अब जैसे ही मीडिया में खबर चली के पाकिस्तानी सेनापति मुनरो को ट्रंप ने लंच पर आमंत्रित किया है वैसे ही अमेरिका की पाकिस्तान को एक तरफा झुकाव वाली बात को गलत साबित करने के लिए और मोदी जी के विश्व गुरु चरित्र की रक्षा के लिए फोन कॉल का नॉरेटिव गढ़ा गया!

दरअसल् यह अर्ध सत्य रहा होगा !प्रधानमंत्री के फोन कॉल पर कभी विदेश मंत्रालय को ब्रीफिंग करते हुए नहीं देखा गया है !जब स्वयं प्रधानमंत्री छोटी-छोटी सी बातों के लिए ट्वीट करते है ,,मन की बात करते हैं , फिर इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके व्यक्तिगत वार्तालाप पर विदेश सचिव कोई वक्तव्य दे यह बात हजम नहीं होती!

तीसरी बात यह है यह सामान्य शिष्टाचार के खिलाफ है क्योंकि प्रधानमंत्री की किसी नेता के साथ हुई व्यक्तिगत बातचीत को विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड पर रखा जाए! विदेश सचिव सरकारके एक विभाग  अधिकारी  मात्र है प्रधानमंत्री की बात यदि विदेश मंत्री कहते केंद्रीय मंत्री परिषद की तरफ से कही जाती तो वह सरकार की बात होती तो ज्यादा असर कारक होती!

 अमेरिका में सिर्फ पाकिस्तान  के सेनापति को जिस तरह ग्लोरिफाई किया गया था लंच की डिप्लोमेसी से उसको न्यूट्रल करने के लिए यह नॉरेटिव घड़ा गया!

दरअसल श्रीमान ट्रंप ने फोन तो किया होगा लेकिन माय डियर फ्रेंड को फोन में उन्होने स्पष्ट रूप से अमेरिका आमंत्रित किया  था कि वह g7 समिट के बाद अमेरिका होते हुए भारत आए और जो  पाक सेनापति के साथ लंच था वह भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तान के सेनापति और अमेरिका के राष्ट्रपति एक साथ करें! 

इस डिप्लोमेसी की वजह थी एक तो ट्रंप यह स्थापित करना चाहते थे की मध्यस्थता उनकी वजह से हुई हुई है दूसरी पाकिस्तान के सेनापति ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए नामांकित किया है अगर भारत के प्रधानमंत्री भी  वहां उपस्थित होते हैं तो शायद इस पीस प्राइज के लिए उनके प्रतिनिधित्व को ज्यादा मान्यता   मिलने के अवसर थे !

बीजेपी की आईटी सेल लगातार एक नॉरेटिव स्थापित करने की कोशिश कर रही है कि ईरान पर पाकिस्तान आक्रमण करें या ईरान पर अमेरिका जो आक्रमण करेगा उसमें पाकिस्तान के हवाई अड्डा का इस्तेमाल किया जा सके इसके लिए पाकिस्तान के सेनापति को बुलाया गया था! 

पाकिस्तान खुलकर ईरान के साथ है वह उसकी मजबूरी भी है क्योंकि उसे अरब देशों का साथ चाहिए और मुस्लिम कंट्री का भी! ईरान उसका स्वाभाविक दोस्त है और हर बार ईरान पाकिस्तान के साथ रहा है! 

जिओ पॉलिटिक्स की भी बात करें, तो चीन तुर्की जैसे देश जो खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़े थे वह ईरान के समर्थन में है ऐसे में पाकिस्तान अमेरिका के दबाव में ईरान पर हमले की इजाजत दे दे इस नरेटीव में दम नहीं लगता!

दूसरा बीजेपी के दावों की पोल अमेरिका ने फिर खोल दी , जब विदेश सचिव के वक्तव्य के 24 घंटे के पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने फिर एक बार बयान दिया कि भारत पाक युद्ध को न्यूक्लियर व्यवहार से बचने के लिए उनकी मध्यस्थ की बहुत बड़ी भूमिका थी!

और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है जिस फोन की बात की गई है , उसके संदर्भ में अमेरिका से किसी प्रकार की पुष्टि नहीं की गई है !

जब साहेब 35 मिनट तक लालआंख कर कर ट्रंप को धमका सकते हैं, तो क्या कारण है ट्रंप के एक बार फिर बयान देने के बाद प्रधानमंत्री भी खामोश है विदेश मंत्री भी और तथाकथित विशेषज्ञों के अनुसार भारत का सफलतम विदेश मंत्रालय भी!

अमेरिका की स्पष्ट डिप्लोमेसी है उसे साउथ एशिया में अपना अड्डों के लिए पाकिस्तान चाहिए और रूस की नाक में नकल डालने के लिए अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए बलूचिस्तान में अपनी मनमानी चाहिए! पाक अमेरिका को क्यों प्रिय है , क्योंकि वह अमेरिका के बि हाफ पर ही आतंकवादी गतिविधियों को मॉनिटर करता है! 

चीन के लिए पाकिस्तान व्यापारिक मजबूरी है क्योंकि पाकिस्तान से होकर उसके ट्रेड का एक बहुत बड़ा रास्ता गुजरता है और पाकिस्तान में लगभग सरेंडर की मुद्रा में उसे चीन को सौंप रखा है!

अमेरिका जानता है भारत और चीन के बीच में बहुत सारे विवाद है इसलिए हथियारों की होड़ में चीन भारत को मदद नहीं करेगा और रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा  होने के कारण वैसे ही निर्माण क्षमता में बहुत पीछे हो गया है ऐसे में अमेरिका ही एकमात्र ऐसा प्रतिद्वंदी है जिसे भारत में बाजार के अवसर प्राप्त हो सकते हैं भारत एक बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है और हथियारों के बाजार के लिए एक उपयुक्त ग्राहक! इसलिए अमेरिका की नीति भारत को बैलेंस करने की भी है!

भाजपा का थिंक टैंक इस वक्त घबराया हुआ है, क्योंकि जिस तरह इन दिनों मोदी जी की वैश्विक छवि को डेंट लगा है विश्व गुरु की छवि आहत हुई है और सीज फायर करने के बाद , फिर ट्रंप के आगे घुटने देखने के बाद और सबसे बड़ी बात तो यह है पहलगाम और पुलवामा का आतंकवादियों पर साहेब के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकलता! इन सब बातों ने उनके परसेप्शन की हवा निकाल दी है और बुरी तरह बेचैनी महसूस करती हुई उनके आई टी सेल इस तरह रोज नए-नए झूठ नरेटिव गढ़कर सोशल मीडिया और गोदी मीडिया के माध्यम से उस आभामंडल को बचाए रखने की कोशिश कर रही है!(साभार)