शनिवार, 2 अगस्त 2025

एक लाख की कंपनी दस साल में तीस करोड़ की कैसे हो गई

 एक लाख की कंपनी दस साल में तीस करोड़ की कैसे हो गई 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की यह कहानी भी 


वैसे तो मोदी सरकार पर इलेक्ट्रोलर बॉण्ड के ज़रिए ही नहीं बड़े क़र्ज़दारों के बैंक लोन माफ़ कर चंदा वसूलने का आरोप लगता रहा है लेकिन आज हम पीयूष गोयल की वह चौंकाने वाली कहानी लेकर आये हैं जिसे सुनकर शायद आपके आँखों में बंधी पट्टी हट जाये…

नरेंद्र मोदी की सत्ता ने 2014 में कुर्सी कब्जाने के बाद से देश में फर्जीवाड़े से तिजोरी भरने का खुला खेल शुरू किया, लेकिन सिर्फ अपनों के लिए। 


आम जनता बिना भगवा ओढ़े यह काम नहीं कर सकती। 


ये कहानी मोदी के पीएम बनने से बहुत पहले, यानी 2005–06 से शुरू होती है। 


मोदी के कद्दावर मंत्री और पेशे से CA पीयूष गोयल ने अपनी पत्नी सीमा गोयल के साथ मिलकर 1 लाख रुपए की जमा पूंजी से एक कंपनी खोली। 


नाम रखा–इंटरकॉन एडवाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड। 


गोयल 13 मई 2014 तक इसके डायरेक्टर रहे। फिर मोदी सत्ता के आते ही पद छोड़ दिया। 


1 लाख की पूंजी वाली इस कंपनी के 10 हजार शेयर्स थे–यानी 10 रुपए प्रति शेयर। 


गोयल के पद छोड़ते ही सीमा के पास 9999 शेयर आ गए। एक शेयर जेबखर्च के रूप में बेटे ध्रुव के नाम कर दिया गया। 


अब यहां से सारा खेल शुरू होता है। 


गोयल के मंत्री बनते ही इंटरकॉन की आय 10 साल (2005 से) में बढ़कर 30 करोड़ हो गई। 


इस 1 लाख के 30 करोड़ में (3000 %) बढ़ने की कहानी बहुत दिलचस्प है, क्योंकि इंटरकॉन ने आज तक कॉरपोरेट मंत्रालय को यह नहीं बताया कि कंपनी ने ऐसा कौन सा काम किया कि आय 30 करोड़ हो गई। 


इस लूट के खेल को यूं समझें। 


असल में, गोयल परिवार और दोस्तों–रिश्तेदारों का कुनबा 11 ऐसी कंपनियों से जुड़ा हुआ था, जिन्होंने बैंकों का लोन हड़पा। 


गोयल के मंत्री बनते ही कुछ कंपनियों का लोन माफ हुआ तो कुछ दीवालिया होकर बेदाग निकल गईं। 


इन्हीं में एक कंपनी थी शिरडी इंडस्ट्रीज। इस कंपनी ने 651 करोड़ का लोन लिया। नहीं चुकाया तो 2017 में 65% लोन माफ करवाया गया। 


एक और कंपनी असीस प्लाईवुड ने 458 करोड़ का लोन हड़पकर खुद को कंगाल घोषित करवा दिया। 


असीस इंडिया इंफ्रा पर भी 457 करोड़ का लोन था। असीस इंडस्ट्रीज को भी 258 करोड़ का लोन मिला। 


सारे लोन का अधिकांश हिस्सा माफ हुआ। दिलचस्प है कि शिरडी से लेकर असीस ग्रुप तक की कंपनियों का ईमेल bknath@asisindia.com ही था। यानी चारों घपलेबाज कंपनियां एक ही शख्स की थीं। 


इसी तरह की 11 कंपनियों के साथ गोयल परिवार के करीबी रिश्ते रहे और पीयूष बतौर केंद्रीय मंत्री उनके लिए काम करते रहे। 


इन सभी 11 कंपनियों में मोदी सत्ता के आते ही गोयल और उसके परिवार के बतौर निदेशक इस्तीफे तो हुए, लेकिन जिन नए लोगों को बदले में लाया गया, वे भी गोयल परिवार से जुड़े थे। 


इनमें राकेश अग्रवाल, मुकेश बंसल, अमित बंसल, मुकेश शाह और प्रशांत शेणॉय जैसे नाम हैं।


राकेश और मुकेश बंसल ने तो सरेआम कहा कि उनके पीयूष के परिवार से रिश्ते हैं। 


वहीं, पीयूष गोयल परिवार का दावा है कि इंटरकॉन का काम सिर्फ एडवाइस देना था। यानी कंपनी पैसा लेकर सलाह देती है। 


कैसी सलाह? जाहिर है लोन हड़पने की, दीवालिया होकर निकल लेने की, अपना लोन माफ करवा लेने की। 


फिर मंत्री बनकर पीयूष गोयल किस तरह इन 11 कंपनियों की मदद कर रहे थे?


सत्ता के रसूख में अपने दोस्तों का लोन माफ करवाना, उन्हें बच निकलने का रास्ता बताना। 


क्या यह हितों का टकराव नहीं है? याद रखे–पीयूष गोयल अभी भी केंद्रीय मंत्री है। 


लेकिन, न खाऊंगा, न खाने दूंगा का जुमला फेंककर देश को बरगलाने वाले नरेंद्र मोदी ने सब जानते हुए पीयूष की फाइल दबाकर रखी। 


कांग्रेस ने जब 2018 में इस मामले को उठाया तो इसी मोदी सत्ता ने झूठा बताकर हवा में उड़ा दिया। 


तब तक गोदी मीडिया भी बिक चुकी थी। 


आज भी किसी पत्रकार में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह इस मामले को दोबारा उठाने की हिम्मत कर सके।


अब यह साफ हो चुका है कि इसी मोदी सत्ता के मंत्री, संत्री, माननीयों ने किस तरह ऐसी करप्ट कंपनियों के लिए दलाली की और बैंकों से 14 लाख करोड़ के लोन माफ करवा दिए। 


अभी भी करीब 150 माननीय देश के लिए नहीं, कंपनियों के लिए काम करते हैं। 


नतीजा इंटरकॉन जैसी और भी कंपनियां खड़ी हो रही हैं और गरीब जनता के टैक्स का पैसा लूट रही हैं। 


देश को बचाने के लिए सिर्फ नरेंद्र मोदी का ही जाना जरूरी नहीं। 


उनके साथ देश की करप्ट सत्ता को भी अगले 200 साल तक उखाड़ फेंकना जरूरी है। (साभार)


वरना ऐसी सत्ता सैकड़ों पीयूष को पालती रहेगी।


Soumitra Roy

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

ट्रंप कितना भी जुतियाये पर राहुल को कोई हक़ नहीं…

 ट्रंप कितना भी जुतियाये  पर राहुल को कोई हक़ नहीं…


क्या हो गया है बीजेपी को, क्या हो गया है मोदी सत्ता को, यह सवाल अब इसलिए बड़ा होने लगा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार मर्यादा लांघ भारत और प्रधानमंत्री का लगातार अपमान करते जा रहे है, यहाँ तक कि अब अर्थव्यवस्था को ही मृत कह दिया लेकिन पूरी बीजेपी चुप रही लेकिन जब पत्रकारों ने राहुल से ट्रंप के इस मृत अर्थव्यवस्था को लेकर सवाल पूछा तो राहुल ने जैसे ही इस पर हामी भरी पूरी बीजेपी राहुल पर पिल पड़ी, ऐसे में ट्रंप पर चुप्पी से उठते सवाल….

सवाल ये है कि_

ट्रंप ने जब भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कह दिया,

तब पूरी मोदी/बीजेपी सरकार ने ट्रंप की निंदा क्यों नहीं की..? 


लेकिन प्रेस के पूछने पर जैसे ही

राहुल गांधी ने कहा_ हां सही कहा है कि 

मोदी/बीजेपी ने अपनी नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था को मृत कर दिया है..


तो ट्रम्प पर चुप्पी और पूंछ दबाये 

बीजेपी के सांसदों ने राहुल पर हमला बोल दिया..


सवाल ये है कि जब ट्रम्प ने ये बात कही तब_

बीजेपी ने ऐसी बात कहने के लिये ट्रंप की आलोचना में कुछ भी क्यों नहीं कहा? 


बात केवल ट्रेड टैरिफ की नहीं है, 

सवाल इसका है कि ट्रंप भारत का नाम जिस संदर्भ में ले रहे हैं, उसे क्यों सहन किया जा रहा है? 

वे भारत की नीतियों का मज़ाक उड़ा रहे हैं, 

रुस से तेल खरीदने पर भारत पर जुर्माना लगा रहे हैं, 

भारत की कंपनियों पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, 

क्या यह किसी भी तरह से मोदी के मित्र का व्यवहार है? 

राहुल पर बोलने वाला मोदी गैंग_ट्रम्प पर चुप क्यों है..??

क्या अंग्रेजी की गुलामी से पैंशन लेने‌ वाले मुखबिर क्या फिर से ट्रम्प को ईस्ट इंडिया बनाने की साजिश में मुंह में दही जमा लिये हैं..??

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

महाभियोग-दो जज, दो नीति…

महाभियोग-दो जज, दो नीति…


ग़ज़ब देश है और अजब सत्ता, वैसे भी यह बात घर कर गई है कि क़ानून सिर्फ़ कमज़ोर लोगो के लिये है , पैसा और पहुँच वालों ने क़ानून को किस तरह अपनी जूती का खाल बनाया है यह किसी से छिपा नहीं है , ऐसे में जज द्वय शेखर यादव और यशवंत वर्मा पर चलाये जाने वाले महाभियोग भी क्या पहुँच के आगे घुटने पर आ जाएगा…

दो जज साहिबान हैं जिन पर विपक्ष ने महाभियोग चलाने के लिए मुहीम चलाई है। एक जज हैं यशवंत वर्मा जी, जिन पर भ्रष्टाचार के मामले मे महाभियोग लगाने के लिए आवेदन किया गया है। दूसरे जज हैं शेखर यादव जी, जिन पर विश्व हिन्दू परिषद की सभा में नफ़रती बयान बाज़ी का आरोप है। 


अब सरकार जस्टिस वर्मा जी के विरूद्ध तो कार्रवाई करने की बात तो कर रही है लेकिन जस्टिस यादव जी के मामले में ख़ामोशी अख्तियार किये हुए है। इन दोनों जजों के विरूद्ध एकसाथ कार्रवाई की जानी चाहिए। 


कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने दिनांक 21-07-2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 63 राज्य सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन किया था। वहीं जस्टिस यादव के विरूद्ध 152 लोक सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन पत्र  दिया था।


जब पूर्व राज्यसभा के सभापति धनखड़ इन महाभियोग पत्र पर बोल रहे थे तब वह स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि पर्याप्त संख्या में सदस्यों ने हस्ताक्षरित आवेदन पत्र लिखकर दिये हैं। पार्लियामेंट के एक्ट अनुसार यदि इस तरह से दो आवेदन पत्र दिए जाते हैं तो इसे दोनों सदनों में संयुक्त रूप से देखा जाएगा। इन दोनों आवेदन पत्रों को हाऊस की संपत्ति माना जायेगा।


लेकिन सरकार अब इन आवेदन पत्रों पर कार्रवाई करने से हिचकिचाहट दिखा रही है। इससे सरकार की दोमुंही नीति सामने आ रही है और वह विपक्ष के साथ सहयोग नहीं कर रही है।

बुधवार, 30 जुलाई 2025

मिडिल क्लास को ऐसी लताड़ पर चुप्पी क्यों…

 मिडिल क्लास को ऐसी लताड़ पर चुप्पी क्यों… 


वैसे तो मोदी सरकार के आने के बाद मिडिल क्लास की स्थिति को लेकर कितनी ही आलोचना होते रहती है लेकिन पिछले दिनों इक्विटी निवेशक बसंत माहेश्वरी ने ऐसी बात कर दी जिसे सुनकर न तो बीजेपी आईटी सेल को ग़ुस्सा आया न तो भक्तों की भावना ही आहत हुई, आख़िर कौन है ये बसंत माहेश्वरी जिसने सत्ता के मुँह में ताला जड़ दिया और उन्होंने क्या कहा…


◆ बसंत माहेश्वरी साहब, भारत के बड़े इन्वेस्टर, ने आज भारतीय मिडल क्लास को लताड़ दिया है..पहली बार किसी इन्वेस्टर ने मोदी को भी लताड़ा है..पूरी दुनिया में ट्वीट वायरल है..

TCS ने 12,000 एम्प्लॉईज़ को निकाल दिया..इस पर बसंत माहेश्वरी ने ट्वीट किया


~ अब इन 12,000 बेकारों को मंदिर मस्जिद पर ट्वीट करने के लिए वक़्त की कोई कमी नहीं रहेगी..


~ भारत का मिडल क्लास इसी लाइक़ रहा है..


~ मिडल क्लास ने मंदिर मस्जिद मांगा था..और उसे जो चाहिए था वही मिला है


◆ बसंत माहेश्वरी से सवाल पूछा गया कि मिडल क्लास किधर जा रहा है? जवाब दिया कि


 मिडल क्लास "अयोध्या" जा रहा है ✌️


● मुझ जैसे लाखों लोग जब मिडल क्लास के गिरते हालात पर लिखते थे तब हमें हिंदू विरोधी, देशद्रोही, पाकिस्तानी कहा गया था


● अब किसी में हिम्मत है तो बसंत माहेश्वरी को हिंदू विरोधी बोले..बसंत माहेश्वरी ने देश के नौजवानों और नफ़रती नेताओं को बीच सड़क खड़ा कर नंगा कर दिया है..बसंत माहेश्वरी, शुक्रिया💐

मुमकिन है कि बहुत जल्द बसंत माहेश्वरी पर IT, ED, CBI की रेड पड़ेगी..मगर सच नहीं बदलेगा..

अय्यर जी अपने वॉल में आगे लिखते हैं  मोदी, शाह और आदित्यनाथ और इस फ़र्ज़ी हिंदूवादी गैंग ने भारतीय मिडल क्लास को भिकारी बना दिया है..वापस लिखता हूँ कि इन विनाशकों से आज़ादी की लड़ाई लड़िए..वरना भारत बरबाद हो जाएगा..

बसंत माहेश्वरी को इक्विटी निवेश में दो दशकों से ज़्यादा का अनुभव है। वे एक कॉस्ट अकाउंटेंट हैं और सेंट जेवियर्स कॉलेज , कोलकाता से स्नातक हैं। वे सूचीबद्ध प्रतिभूतियों में निवेश करके अपनी आजीविका चलाते हैं।

पैंटालून रिटेल, टीवी18, टाइटन, पेज इंडस्ट्रीज और हॉकिन्स कुकर जैसे कई मल्टीबैगर शेयरों की पहचान करने का उनका अनुभव रहा है । यह पुस्तक उन रणनीतियों का एक प्रतिबिंब है जिनसे उन्हें पिछले कई वर्षों में बेहतर लाभ अर्जित करने में मदद मिली है। वह लोकप्रिय ऑनलाइन निवेश पोर्टल www.theequitydesk.com के संस्थापक भी हैं , जिस पर हर महीने भारत और विदेश से हज़ारों लोग आते हैं।

मंगलवार, 29 जुलाई 2025

जम्मू में 35 सिखों की हत्या का सच

 जम्मू में 35 सिखों की हत्या का सच…आ गया सामने 


उधर जब संसद में पहलगाम हमले को लेकर बहस चल रही थी तब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान २००० में हुए छत्तीसिंहपूरा हत्याकांड का सच झकझोर देने वाला है कि क्या ऐसा इस देश में हो सकता है… २१ मार्च २००० को हुई इस हत्याकांड का सच हर भारतीय को जानना चाहिए…


मीडिया विजिलमीडिया विजिल

ग्राउंड रिपोर्ट

मीडिया विजिल डेस्‍क


पूरे 18 साल पहले की बात है जब 20 मार्च सन् 2000 को अमेरिका के राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के समानांतर जम्‍मू और कश्‍मीर में अल्‍पसंख्‍यक सिख समुदाय के 35 लोगों की अनंतनाग जिले के छत्‍तीसिंहपुरा गांव में गोली मार कर हत्‍या कर दी गई थी। सेना ने दावा किया था कि यह काम ”पाकिस्‍तान समर्थित इस्‍लामिक कट्टर समूह लश्‍कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों का है”।


इस घटना के इतने बरस बाद तमाम ऐसे साक्ष्‍य सामने आ चुके हैं जो बताते हैं कि सेना का दावा गलत था। सिखों के साथ भारतीय राज्‍य द्वारा किए गए इस ऐतिहासिक विश्‍वासघात को याद किया जाना ज़रूरी है ताकि यह समझा जा सके कि लोकतांत्रिक कहलाने वाला एक राज्‍य कैसे काम करता है।


इंडिया टुडे में एक रिपोर्ट छपी जिसका शीर्षक था, ”आतंकवादियों ने कश्‍मीर घाटी में किया सिखों का पहला नरसंहार…”। पत्रिका ने दावा किया कि ”लश्‍कर-ए-तैयबा के विदेशी सदस्‍य जिन्‍होंने हत्‍याकांड को अंजाम दिया भारतीय फौज की वर्दी पहनकर आए थे जो फर्जी या चोरी की थी।” छत्‍तीसिंहपुरा के  बाद राष्‍ट्रीय राइफल्‍स से पांच ”विदेशी आतंकवादियों” को मार गिराने का दावा किया। ये लड़के बाद में स्‍थानीय निकले। इसे पाथरीबल फर्जी मुठभेड़ कांड के नाम से जाना जाता है।


इकनॉमिक टाइम्‍स की रिपोर्ट के मुताबिक सीबीआइ ने 2006 में राष्‍ट्रीय राइफल्‍स के पांच सदस्‍यों को कथित तौर पर पांच नागरिकों की हत्‍या का दोषी पाया, जिनमें तीन पर इलज़ाम लगाया गया था कि वे पाकिस्‍तानी आतंकवादी थे जिन्‍होंने छत्‍तीसिंहपुरा में 35 सिखों का कत्‍ल किया था। दो अन्‍य को अज्ञात आतंकवादी बताया गया था।


इस जांच का हिस्‍सा रहे अवकाश प्राप्‍त लेफ्टिनेंट जनरल केएस गिल ने 2017 में सिख न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस को दिए एक इंटरव्‍यू में पत्रकार जसनीत सिंह को बताया कि छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍याकांड में सीधे भारतीय सेना का हाथ था और इस बारे में रिपोर्ट तत्‍कालीन एनडीए सरकार के गृहमंत्री एल.के. आडवाणी को सौंपी गई थी।


आखिर क्‍या वजह थी सिखों को मारने की? शाहनवाज़ आलम अपने लेख ”नेशनल इंटरेस्‍ट, फिफ्थ कॉलम एंड दि रोमांटिक किलर्स” में लिखते हैं- ”पहला, अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर पाकिस्‍तान के ऊपर बढ़त बनाना। दूसरा, प्रवासी सिखों की सहानुभूति बटोरना जो खालिस्‍तान के दिनों से ही भारत की सरकारों के विरोधी रहे हैं। तीसरा, क्षेत्र में परमाणु प्रसार की भारत की कोशिशों पर अमेरिका द्वारा चिंता जताए जाने को आंशिक तौर पर भटकाना।” वे लिखते हैं कि स्‍वदेशी के मोर्चे पर यह इस हत्‍याकांड का इस्‍तेमाल सिखों को घाटी छोड़कर जाने में उकसाने के लिए किया गया, ठीक वैसे ही जैसा जगमोहन ने हिंदुओं के साथ किया था।


अमेरिकी राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन की यात्रा से ठीक एक दिन पहले 20 मार्च, 2000 को हुए इस हत्‍याकांड पर रिपोर्ट करते हुए फ्रंटलाइन ने लोगों के हवाले से लिखा कि, ”उन्‍होंने जैसे ही गोली चलानी शुरू की, बंदूकधारी जय माता दी और जय हिंद के नारे लगाने लगे। बिलकुल नाटकीय अंदाज़ में उनमें से एक शख्‍स हत्‍याओं के बीच ही रम की बोतल से घूंट मारता रहा। जाते वक्‍त एक ने अपने साथी से कहा- गोपाल, चलो हमारे साथ।”


दिलचस्‍प है कि इस हत्‍याकांड के रहस्‍य का पहला परदाफाश खुद क्लिंटन ने मेडलीन अलब्राइट की किताब ”दि माइटी एंड दि ऑलमाइटी: रिॅ्लेक्‍शंस ऑन अमेरिका, गॉड एंड वर्ल्‍ड अफेयर्स” के फोरवर्ड में किया:


”2000 में भारत के अपने दौरे के दौरान कुछ हिंदू आतंकवादियों ने 38 सिखों की हत्‍या कर दी। अगर मैंने वह यात्रा नहीं की होती तो मारे गए लोग शायद अब भी जिंदा रहते। अगर मैंने इस डर से यात्रा न की होती कि पता नहीं धार्मिक चरमपंथी क्‍या करेंगे, तो अमेरिका के राष्‍ट्रपति के बतौर मैं अपना काम नहीं कर रहा होता।”


हिंदुत्‍ववादी ताकतों के हो हल्‍ले के बाद प्रकाशक को फोरवर्ड का यह हिस्‍सा हटाना पड़ गया था लेकिन क्लिंटन ने वही लिखा था जो वह मानते थे। इसकी पुष्टि बाद में स्‍ट्रोब टालबोट ने अपनी पुस्‍तक ”इंगेजिंग इंडिया: डिप्‍लोमेसी, डेमोक्रेसी एंड दि बॉम्‍ब” में की जब उन्‍होंने क्लिंटन के बारे में लिखा:


”उन्‍होंने इस आरोप को समर्थन नहीं दिया कि पाकिस्‍तान उस हिंसा के पीछे था…।”


इतना ही नहीं, पाथरीबल में जो मुठभेड़ सेना ने छत्‍तीसिंहपुरा के दोषियों की बताई थी और पांच युवकों को मार गिराया था वह बाद में फर्जी साबित हुई। मोहम्‍मद सुहैल और वसीम अहमद नाम के दो पाकिस्‍तानियों को दिसंबर 2000 में छत्‍तीसिंहपुरा का ”मास्‍टरमाइंड” बताकर पकड़ा गया था, वे बाद में निर्दोष बरी हो गए। फिर सवाल उठता है कि छत्‍तीसिंहपुरा के सिखों का कत्‍लेआम किसने किया?


फ्रंटलाइन के अनुसार: ”31 अक्‍टूबर 2000 को जम्‍मू कश्‍मीर के मुख्‍यमंत्री फ़ारुख अब्‍दुल्‍ला ने एलान किया कि सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्‍त जज एस. रत्‍नवेल पांडियन से हत्‍याकांड की जांच के लिए कहा जाएगा। जब पूछा गया कि क्‍या उन्‍होंने इस जांच के लिए क्‍या दिल्‍ली की मंजूरी ली है, तो उन्‍होंने ज़ोर देकर कहा कि उन्‍हें ऐसी किसी मंजूरी की दरकार नहीं है। अचानक चीजें बदल गईं। केवल एक पखवाड़ा बीता और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी एक मुलाकात हुई और बाद में छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍याकांड की जांच को खत्‍म कर दिया गया… दिल्‍ली में अफसरों का कहना है कि केंद्र सरकार छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍साकांड की जांच के निर्णय पर नाराज़ थी। कहते हैं कि वाजपेयी ने मुख्‍यमंत्री को कहा था कि उनके इस फैसले ने केंद्र सरकार को शर्मिंदा किया है।”


आज 18 साल बाद छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍याकांड और पाथरीबल फर्जी मुठभेड़ के बारे में जानना-समझना भारतीय राज्‍य के चरित्र को समझने के लिए बहुत आवश्‍यक है। लेफ्टिनेंट जनरल केएस गिल का सिख न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस को दिया यह साक्षात्‍कार ज़रूर देखें। 30 मिनट 18 सेकेंड पर आपको छत्तीसिंहपुरा हत्याकांड से संबंधित सवाल जवाब मिल जाएँगे। अगर इस बातचीत को पढ़ना हो तो यहाँ क्लिक करें। फ्री प्रेस कश्मीर ने 20 मार्च यानी इस हत्याकांड की बरसी पर छापा है।(साभार)

सोमवार, 28 जुलाई 2025

हिन्दी सिनेमा की आख़री ब्लेक एंड व्हाईट फ़िल्म

 हिन्दी सिनेमा की आख़री ब्लेक एंड व्हाईट फ़िल्म 


क्या आप जानते हैं हिन्दी सिनेमा की आख़री ब्लेक एंड व्हाइट फ़िल्म कौन सी थी, सुपर डुपर इस फ़िल्म को फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार तो मिला ही इसके गीत आज भी लोग गुनगुनाते नहीं थकते…

यह फ़िल्म गुजराती भाषा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है जिसे गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी ने लिखा था जो बीसवीं सदी के शुरुआती काल के प्रसिद्ध गुजराती लेखक थे। इस फ़िल्म को उत्कृष्ट छायांकन और उत्कृष्ट संगीत के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले थे।[

फ़िल्म की कहानी…

सरस्वती (मनीष) उसकी सौतेली माँ द्वारा उदासीनता के साथ पाला जाता है और फिर भी वह एक उदार व्यक्ति के रूप में बड़ा होता है। उसके अपने विचार हैं जो वह अपने पिता के साथ बांटता नहीं है। उसके पिता उसकी शादी एक अमीर परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की कुमुद (नूतन) के साथ तय कर देते हैं, लेकिन क्रान्तिकारी सरस्वती इस रिश्ते को मंज़ूर नहीं करता है। फिर भी वह कुमुद को चिट्ठी लिखता है और उस ज़माने की रीतियों के विपरीत कुमुद से मिलने चला जाता है। वहाँ उनका प्रेम परवान चढ़ता है और दोनों मंगेतर एक दूसरे के आशिक़ हो जाते हैं। लेकिन तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है। कुमुद की शादी रमेश देव से हो जाती है जोकि एक बिगड़ा शराबी अमीर आदमी है, वो कुमुद को बहुत तंग करता है उसके वेशया के साथ संबंद है। एक बार एक झगड़े मे उसके साथों खून हो जाता है और उसकी मौत हो जाती है । कुमुद अपने देवर का लालन पोषण करने की ठान लेती है । सरस्वती जोकि अब सन्यासी बनने की तैयारी कर रहा है तब कुमुद उसे समझती है की सन्यासी बनना ठीक नहीं है एक उसके लिए और फिर उसकी बात मान कर सरस्वती कुमुद की छोटी बहन से शादी कर लेता है ।

अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि यह फ़िल्म थी सरस्वती चंद्र।

१९६८ में बनी एक काली-सफ़ेद चलचित्र है। इसे गोविन्द सरैया ने निदेशित किया है और इसके मुख्य कलाकार हैं नूतन और मनीष। 

फ़िल्म के गीत लिखे थे इंदीवर और संगीत कल्याण जी आनंद जी ने दिये थे।

गीत

चन्दन सा बदनमुकेश
चन्दन सा बदनलता मंगेशकर
छोड़ दे सारी दुनियालता मंगेशकर
हमने अपना सब कुछ खोयामुकेश
फूल तुम्हें भेजा है ख़त मेंलता मंगेशकर, मुकेश
ओ मैं तो भूल चली बाबुल का देसलता मंगेशकर


रविवार, 27 जुलाई 2025

अहमदाबाद प्लेन क्रैश साज़िश…

 अहमदाबाद प्लेन क्रैश साज़िश…


अहमदाबाद में हुई हवाई जहाज़ दुर्घटना क्या किसी की साज़िश थी, इस खेल में कौन शामिल है, प्रारंभिक रिपोर्ट का सामने आना भी क्या षड्यंत्र का हिस्सा है , ऐसे कई सवालों के जवाब इंटरनेट में बिखरे पड़े है ऐसे में भास्कर की रिपोर्ट भी तो साज़िश की ओर इशारा कर रही है , तब कुछ बातें ऐसी समझी जानी चाहिए 

मात्र 43 सेकेंड मे टेक आँफ और क्रँश की घटना हुवी..

अगर ये आखरी सेकेंड थे तो फिर एक पायलट द्वारा ये पुछा जाना - क्या तुमने इंजन बंद किया ?

दुसरे पायलट का जवाब - मैने इंजन बंद नही किया..


फिर मेडे..मेडे..मेडे का मँसेज.


ब्लँक बाँक्स के आधार पर बनाई गई लगभग 35 पन्नो की प्रायमरी जांच मे ये सबकुछ बतलाया गया है..


ये किस आधार पर बतलाया गया ?


विमान मे 2 ब्लँक बाँक्स होते है और इन्हे विमान के पिछले हिस्से मे पुछ की तरफ रखा जाता है..


विमान की पुछ सुरक्षित थी..

मोदी जब घटनास्थल गए तो विमान के पिछले हिस्से की फोटो और वीडियो सार्वजनिक की गई थी..


भौतिकी नियम के अनुसार विमान मुंंह की तरफ से गिरता है..


इस लिये ब्लँक बाँक्स को विमान की पिछली साईड मे रखा जाता है..


दुर्घटना होने के एक दिन पहेले ये विमान पँरीस से आया था..


रात भर अडानी एअरपोर्ट (सरदार वल्लभभाई एअरपोर्ट) पर पार्क किया हुवा था..


मतलब ये विमान अडानी एअरपोर्ट के संबंधित प्रशासन की कस्टडी मे था..


टर्कीश कंपनी की तरफ ध्यान भटकाए जाने के बाद टर्कीश कंपनी ने बयान देकर कहा के इस विमान का मेंटेनेंस हमने नही किया है..


जिस कंपनी ने किया है ऊसका नाम हमे पता है मगर हम किसी विवाद मे पडना नही चाहते..


संघ के और भाजपा के पुर्व मुख्यमंत्री की इस दुर्घटना मे मौत होने के बाद भी देश के किसी भी संघी या भाजपाई के मुंह से ' श्र 'ध्दांजलि का 'श्र' शब्द भी ना निकलना परेशान करता है..


ग्रीन एनर्जी से संबंधित देश का बिजनेस टाइकुन कौन है..?

संबंधित विमान रातभर कहां पार्क था..?

ग्रीन एनर्जी से रूपाणी क्यो खफा थे ?

पता नही..


ऐसे संदेहास्पद वातावरण मे..

ऊसी दिन सुबह 'मिड डे' अखबार मे विमान का बिल्डिंग के बाहर निकला हुवा हिस्सा बतलाया गया था और कुछ घंटो बाद इसी तरह से अहमदाबाद विमान हादसा हुवा..


विश्व को यूरोप अमेरिका  नही चलाते..


विश्व को खुफिया ताकते चलाती है..


यूरोप अमेरिका समेत विश्व के सभी देशो के शासको को यही खुफिया ताकते अपने इशारो से चलाती है..


ये ताकते Jओ* निस्ट है मगर शैतान की ऊपासक होती है..


इन ताकतो को जब भी कोई षडयंत्र या कांड करना होता है तो ये इशारो इशारो मे पहेले ही सार्वजनिक रूप से बतला देते है..


ऐसा करने से पाप नही लगता ऐसा शैतान ऊपासको का विश्वास होता है..


सिमसन कार्टून , द इकानामिक टाईम्स वगैरह के माध्यम से अगले साल दस साल वाली प्रमुख घटनाए सांकेतिक तौर पर बतला दी जाती है..


ऐसे बहोत सारे ऊदाहरण दिये जा सकते है..


खुफिया ताकतो द्वारा बिल्डिंग मे फंसे एअर इंडिया लिखे विमान का फोटो ऊसी दिन सुबह मतलब 12 जुन को प्रकाशित किया जाना और  गुजरात के पुर्व मुख्यमंत्री रूपाणी का ग्रीन एनर्जी से जुडे किसी विवाद के दरमियान हवाई यात्रा करना..


खुफिया ताकतो और रूपाणी  के दुश्मनो का गठजोड होने का संदेह पैदा करती है..


खुफिया ताकतो की अपनी एक सच्चाई है..


टारटेनिक जहाज भी खुफिया ताकतो ने ही डुबोया था..


इस जहाज मे सैर करने के लिये ऊन ऊद्योगपतियो को आमंत्रित किया गया था जो फेडरल बँन्क की स्थापना का विरोध कर रहे थे..


और जहुदियो के आर्थिक जाल को तोडने के लिये समानांतर आर्थिक संस्था खडी करना चाहते थे..


मिड डे मे प्रकाशित चित्र की वजह से विमान मे कोई खराबी हुवी हो ऐसा मानने को मन नही करता..


क्यो की ऐसी घटना घटित होने का समय से पहेले ही इशारा कर देना खुफिया ताकतो की मोडस आँपरेंडी है..


ऊपरोक्त सभी जानकारी के आधार इंटरनेट पर जगह जगह फैले पडे है..


कमेंट मे इसी पर आधारित एक रिल का लिंक कमेंट करने का प्रयास किया जाऐंगा..(साभार)