बुधवार, 6 अगस्त 2025

अहिंसा का रास्ता और आदिवासियों का दिशोम गुरु शिबू सोरेन

अहिंसा का रास्ता और आदिवासियों का दिशोम गुरु  शिबू सोरेन


 

कितने ही क़िस्सों के बीच आदिवासियों के दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने जब इस दुनिया को अलविदा कहा तो सहसा विश्वास करना मुश्किल था , जीवन भर अहिंसा के इस राही ने आदिवासियों के लिये जो कुछ किया उसे भुला पाना मुश्किल है…

 1953 का साल। छोटा सा गाँव नेमरा, जहां एक 9 साल का बच्चा, शिबू, अपनी पालतू कोयल के साथ खेलता था। एक दिन गलती से कोयल मर गई। उस मासूम का अपनी कोयल से भावनात्मक लगाव इतना जुड़ चुका था कि उसने चिड़िया का दाह-संस्कार किया और कसम खाई,


“मैं अब किसी जीव को चोट नहीं पहुंचाऊंगा।”


उस दिन से वह अहिंसा के रास्ते पर चल पड़ा था।

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ब्रिटिश एम्पायर ने देश छोड़ते छोड़ते जो आदिवासी थे उनकी जमीनों को जमींदारों और महाजनों के हवाले सौंपने का पत्ता फेंक दिया था। हालात यह थे कि अपनी ही जमीन पर खेती करने के लिए बेचारे आदिवासी महाजनों के दिए कर्ज पर निर्भर रहते थे। बदले में महाजन उनकी जमीनों को कर्ज के ब्याज तले दबाकर हथिया लिया करते थे। आप इसका जमीनी क्रियान्वयन मुंशी प्रेमचंद की गोदान में पढ़ सकते है।


तब सोबान सोरेन नाम आदमी जो कि शिबू के पिता थे वो अपने आदिवासी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए महाजनों से जंग लड़ रहे थे। लोहा ले रहे थे।

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27 नवंबर 1957 ....


शिबू के पिता सोबान सोरेन की हत्या कर दी गई। महज 15 साल का शिबू उस रात चुपचाप बैठा रहा। दिल में एक आग जल रही थी जो मानो उसके पिता द्वारा जलाए रखने की दी गई जिम्मेदारी हो।


शिबू उस आग में फूंक मारता रहा।

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साल 1959...


“फसल हमारी, जमीन हमारी, अब कोई नहीं ले जाएगा।”


शिबू ने पिता की छोड़ी गई आंदोलन की विरासत को अपनाते हुए ये हुंकार भरी।


" उतर जाओ खेतों में, काट लो अपनी फसलें, ये तीर कमान जब तक हमारे हाथों में है हम देखते है कौन महाजन तुम्हें तुम्हारी मेहनत की कमाई लेने से रोक पाता है।"


महिलाएं हसिया लेकर खेत में उतर गईं। पुरुष तीर-कमान लेकर पहरेदारी करने लगे।

रातभर धान कटता रहा। सुबह जब महाजन आए, तीर आसमान में गूंजने। शिबू की दी गई साहस आदिवासियों के पुनर्जागरण में क्रांतिकारी भूमिका अदा करने लगी। धान काटो आंदोलन ने शिबू सोरेन को "दिशोम गुरु" (जंगल/भूमि का रक्षक) बना दिया।

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शिबू सोरेन ने अपने जीवन काल में तीन बार मुख्यमंत्री पद का शपथ लिया मगर एक भी बार वो पूर्ण कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इसके पीछे काफी हद आदिवासी हितों को लेकर उनकी कठोर नीतियां थी जो उनके सहयोगी गठबंधन दलों के क्राइटेरिया में फिट नहीं बैठ पाती थी और तख्त पलट जाता था। उसके बाद उन्होंने अपनी राजनीति का उत्तराधिकार अपने वंश हेमंत सोरेन को सौंप दिया।

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4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन ने इस दुनिया में अंतिम सांस ली। आदिवासियों का दिशोम गुरु आज इस दुनिया को अलविदा कह गया।


मंगलवार, 5 अगस्त 2025

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला 



मानहानि के एक केस में कोर्ट के जज ने चीन मामले में जो टिप्पणी की क्या वह सत्ता की बौखलाहट है इसे कुछ ऐसे समझ ले कि…


जब  संसद में ऑपरेशन सिंदूर के बहस के दौरान अमित शाह जी ने संसद में खड़े हो कर लगातार तीन गलत बयानी किया

(ऐसा नहीं है कि इसके पहले भाजपा के सांसदों ने संसद में गलत बयानी नहीं की है बहुत बार किया है)

उस के बाद एक बात बोला जो झूठ था या सच ये पता नहीं 

खैर पहले वो तीन गलत बयानी पढ़ लेते है

1. मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं (जबकि विकिपीडिया के हिसाब से अमित शाह जी बायो केमिस्ट्री पढ़े थे)

2. सरदार पटेल जी ने 1960 में विरोध किया (जबकि सरदार पटेल का देहांत 1950 में ही हो गया था)

3. जयशंकर home minister है (जबकि वो विदेश मंत्री है)


फिर सीज़फायर पर अमित शाह जी ने बोला कि

अपने देश के होम मिनिस्टर के बात पे यकीन नहीं है

वो एक संवैधानिक पद पे है

ट्रंप के बात पे यकीन है

फिर

राहुल गांधी जी ने उकसाया कि इंदिरा गांधी का 50% भी है तो मोदी जी संसद में बोले कि ट्रंप ने सीज़फायर नहीं कराया

अगर दम है तो आज शाम मोदी जी बोले कि ट्रंप झूठ बोल रहा है

"‘Say Donald Trump is a liar’.."


मोदी जी भावुक हो गए और सारा कूटनीति भूल गए 

और बोल दिया कि

किसी देश के किसी नेता ने सीज़फायर के लिए कुछ नहीं कहा


अगले दिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी

क्योंकि ट्रंप साहब को उनका नोबेल प्राइज छूटता दिख रहा था


*"आप क्रोनोलॉजी समझिएगा"*


और लास्ट में एक बात पे गौर कीजियेगा


ये राहुल गांधी कर क्या रहा है


विपक्ष में रह कर मोदी जी और अमित शाह जी से वो बोलवा दे रहा है जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था

और

विपक्ष में रह कर सरकार से वो काम करवा दे रहा है जिसको मोदी जी और अमित शाह जी ने मना कर दिया था

जैसे

जाति जनगणना


राहुल गांधी जी ने बोला था

हम सरकार को मजबूर कर देंगे जाति जनगणना के लिए


एक so called "पप्पू" क्या क्या कर रहा है

ऐसे में मानहानि के एक मामले पर भी बातें होनी चाहिए कि क्या चीन को लेकर कोर्ट ने राहुल गांधी को जो बात बोली है, असल में वो पूरे देश के लिए ये संदेश है कि इस सरकार के खिलाफ अपना मुंह बंद रखिए।


वरना कौन नहीं जानता की चीन ने हमारी ज़मीन कब्जाई है, कुछ नये मैप भी जारी हुए जहां भारत के कयी हिस्सों को चीन का हिस्सा बताया गया।


विदेशी अखबारों से लेकर सैकड़ों आर्टिकलों में भी ये खबर छपी है। स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया कि हमारी ज़मीन पर चीन घुसा है।


राहुल गांधी ने वही बात कही है,जिसे कोर्ट गलत बता रहा है,एक बात नोट कर लीजिए, आहिस्ता आहिस्ता हमारे देश की एक एक ईंट गिराई जा रही है।


लोकतांत्रिक ढांचे को जर्जर किया जा रहा है, दुश्मन के खिलाफ मुंह खोलने वाले को चुप किया जा रहा है।


कुल मिलाकर देश को बर्बाद करने की प्रषठभूमि तैयार है, उसमें एक यही बंदा है जो आड़े आ रहा है, इसलिए ये संघियों की नजर में खटकता है।


और हां दुनियां में चीन से बढ़कर हमारा कोई दुश्मन नहीं है, दुश्मन की सरपरस्ती अब कोर्ट भी कर रहा है,वो पट्ठा तो पहले से कर ही रहा था।


हम लुट पिट चुके हैं, और इस लूट में मीडिया और सरकार के साथ अब कोर्ट भी आ गया है.. क्योंकि गौतम अडाणी को चाइना के साथ मिलकर धंधा भी करना है।


और जो धंधे के लिए देश के साथ गद्दारी करेगा, ज्यादा दिन तक आवाम अब उसे मांफ नहीं करने वाली है, सत्ता परिवर्तन के बाद इन लोगों को राहुल गांधी भी नहीं छोड़ने वाले हैं।


ये बात राहुल गांधी खुद भी बोल चुके हैं,भूल ना जाये, इसलिए मैं भी लिखे दे रहा हूं।

हमलोग उसका memes खोजने में व्यस्त है

वो विपक्ष का नेता का भूमिका बेहतरीन तरीके से निभा रहा है(साभार)

सोमवार, 4 अगस्त 2025

नाम श्रीराम सेना, काम रावण से भी घटिया…

 नाम श्रीराम सेना, काम रावण से भी घटिया… 


नफ़रत की राजनीति इस देश को कहाँ ले जाएगा, और क्या क्या देखना पड़ेगा, क्या श्रीराम सेना के इन दरिंदों को मासूम बच्चों पर भी दया नहीं आई, स्कूल में पीने के पानी की टंकी में ज़हर… कैसे नफ़रत का यह खेल ख़त्म होगा, बहुसंख्यक होने के कारण उन्हें हर वह बात जायज लगती है जो मुसलमान के ख़िलाफ़ होती है. अब चाहे कितने ही बेकसूर और निर्दोष लोग मारे जाएं लेकिन अधिकांश हंसी की इमोजी और अश्लील वक्तव्य देते हुए एक कट्टर विचार को महानता की तरफ पेश करते हैं. लेकिन इन अपराधियों को नज़र नहीं आया कि कम से कम बच्चों को नुकसान ना पहुंचाए, नफरत की आग में अंधे होकर मासूम बच्चों को ही निशाना बनाने लगे. 

कर्नाटक के बेलगावी में एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। कुछ शरारती तत्वों ने साजिश के तहत एक सरकारी स्कूल के टैंक में जहरीला पदार्थ मिला दिया। इस घटना से स्कूल के दर्जन भर छात्र बीमार पड़ गए। 14 जुलाई को हुई इस घटना में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, इनमें श्री राम सेना का एक स्थानीय नेता भी शामिल है। 

पुलिस के अनुसार आरोपियों का उद्देश्य प्रधानाध्यापक सुलेमान गोरिनाइक के इर्द-गिर्द दहशत और संदेह पैदा करना था। जो 13 सालों से हुलिकट्टी के सरकारी निचले प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत हैं। पुलिस ने ऐसा प्रतिष्ठा को धूमिल करने और ट्रांसफर कराने के इरादे से किया गया था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जहर देने की इस कोशिश की निंदा की और इसे धार्मिक कट्‌टरपंथ करार दिया है।

पानी की टंकी में जहर मिलाने से 12 छात्र बीमार पड़ गए थे। गनीमत यह रही है कि किसी बच्चे की जान नहीं गई। पुलिस ने अब पूरे मामले की गहराई से जांच करने के बाद चौंकानेवाला खुलासा किया है। स्कूल में काफी बच्चों के बीमार पड़ने पर हड़कंप मच गया था। इससे अधिकारियों और अभिभावकों के बीच चिंता खड़ी हो गई थी। ये सभी बच्चे अब ठीक हो गए हैं लेकिन इस घटना की जांच में सन्न कर देने वाला खुलासा सामने आया है।

पुलिस ने पाया कि जहर देने की यह घटना पांचवीं कक्षा के एक छात्र द्वारा की गई थी। यह घटना बेलगावी के सवादत्ती तालुक के हुलिकट्टी गांव में हुई। छात्र से जब और पूछताछ की गई तो उसने बताया कि बोतल में एक हानिकारक पदार्थ दिया गया था। इसे पानी की टंकी में डालने को कहा गया था। छात्र ने बोतल देने का नाम पुलिस को कृष्ण मदार बताया।

जांच में पता चला कि कृष्ण ने दबाव में आकर यह काम किया था। पुलिस के अनुसार सागर पाटिल और नागनगौड़ा पाटिल उसे ब्लैकमेल कर रहे थे, जिन्होंने कथित तौर पर उसके अंतर्जातीय प्रेम संबंधों का पर्दाफाश करने की धमकी दी थी। कृष्ण ने उनकी मांग मान ली। 

पुलिस के अनुसार सागर पाटिल श्री राम सेना का तालुक स्तरीय का नेता है। वह इस पूरे घटना का माटरमाइंड था। पुलिस का कहना है कि पाटिल ने पूछताछ के दौरान कबूल किया कि वह स्थानीय सरकारी स्कूल में एक मुस्लिम प्रधानाध्यापक के पद पर आसीन होने से नाराज था। पुलिस ने तीनों आरोपियों सागर पाटिल, नागनगौड़ा पाटिल और कृष्ण मदार को गिरफ्तार कर लिया गया है।

रविवार, 3 अगस्त 2025

पर उपदेश कुशल बहुतेरे…

 पर उपदेश कुशल बहुतेरे… 


पर उपदेश कुशल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।। — गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह बात कही थी जिसका अर्थ है दूसरों को उपदेश देना तो बहुत आसान है लेकिन स्वयं उन उपदेशों पर अमल करना बेहद कठिन है, लेकिन इन बातों को याद करने का मतलब मोदी के दौर में इसलिए बेमानी हैं क्योंकि पिछले दस सालों से जो सरकार कारपोरेट के आसरे  विदेशी पूँजी और विदेशी सामनों से इस देश को अपने अनुकूल करने में लगा था जिसने नफ़रत का बाज़ार तैयार कर देश को ही नहीं संसद जैसे पवित्र स्थान में वैमनस्यता की दीवार खड़ी कर दी उसे अचानक हिंदुस्तानियों का पसीना कैसे याद आया , हालाँकि यह देर आये वाली कहावत मान ख़ुशी मनाई जा सकती है लेकिन पिछले ११ सालों की नौटंकी को देखते हुए या संघ की नीति को समझते हुए इस पसीने  की बात पर विश्वास करना मुश्किल है, संसद  कैसे बदल गया और पर उपदेश की कहावत को सरल भाषा में समझिये…

कुछ लोग बोल रहे हैं कि

मोदी जी जर्मनी का मांटब्लैक पेन, इटली का बना मैबैक चश्मा, स्विट्जरलैंड की बनी रोलेक्स घड़ी, अमेरिका में बना आइफोन, जर्मनी की बनी बीएमडब्लू कार, अमेरिका में बना बोईंग हवाईजहाज इस्तेमाल करते है । 

उनको मैं बोलना चाहूंगा कि मोदी जी देश हित मे विदेशी ब्रांडेड सामान उपयोग करते हैं । अरे देश को विदेशी निवेश भी तो चाहिये । अगर कोई विदेशी सामान यूज ही नही करेगा तो दूसरे देश हमारे देश मे निवेश क्यों करेंगे ? 

इसीलिये मोदी जी को विदेशी सामान यूज करने दीजिए । 

स्वदेशी को अपनाने की जिम्मेदारी आपकी और हमारी है । 

अब 11 साल पहले के संसद पर बात करें उससे पहले इस खबर पर…


जिस कुर्सी पर बैठने का अधिकार मुझे मिला है उस कुर्सी पर मै अपने किसी भी खून के रिश्ते को बैठने की इजाज़त दूंगा। ये एक इमोशनल हिस्सा है किसी भी कामयाब इंसान के जिंदगी का।

अगर उस थाना प्रभारी ने अपने खून के रिश्ते को अपनी ही कुर्सी पर बैठा लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई? रिश्वत लेकर कुर्सी का ईमान बेचने से क्या नियम नहीं टूटता?

अब संसद पर…

सन दौ हज़ार के आसपास संसद मैदान का माहौल खुशनुमा होता था । हँसी मज़ाक संजीदगी मुद्दे पे बात तर्क वितर्क सब था । वाजपई जी मुल्क के मुख्या थे, संजीदा आदमी थे लेकिन हर माहौल के हिसाब से सेट हो जाते थे । लालू प्रसाद यादव उसे वक़्त सबसे ताकतवर बोलकार थे, बोलने में माहिर थे दलील देना जानते थे सीधा मुद्दे पर बोलते थे, कभी कभी अपनी ज़बान से वो माहौल तब्दील कर देते थे, तरफ़दार और विरोधी खेमा दोनों लालू जी की बातों पर ठहाका लगा देता था, लालू जी का हुकूमत पर हसमुख हमला वाजपई जी को गुदगुदा देता था, वाजपई जी खुलकर हँसते थे, उनके ठीक पीछे उस वक़्त देश की रक्षा के ज़िम्मेदार जॉर्ज फ़र्नान्डिस भी लालू जी के तर्क पर मासूमाना हँसी हँसते थे, फ़र्नान्डिस लालू जी के सियासी गुरु रहे । उस दौर में हुकूमत के जितने बड़े रहे सब पर लालू जी के लफ्ज़ो का असर था, संजीदगी हँसना हँसाना तर्क वितर्क सब था, सख्त कोई नहीं था आज बीस बरस बाद मुल्क के संसद भवन के हालात बिलकुल बदल गए हैं , अब हुकूमत से सवाल पूछने पर जवाब मांगने पर गालियाँ दे दी जाती हैं, बुरे लफ्ज़ कहे जाते हैं पिछले बरस रमेश बिधूड़ी ने हदे लांग दी थी, कल भी जब संसद भवन में बहस हुई सिर्फ हाथापाई की कमी रही, बाकी सब हो गया, मुल्क के सबसे मज़बूत किले का एहतराम और तहज़ीब बिलकुल ख़त्म हो गयी है, क़सूरवार सब भवन में बैठे हैं, पक्ष विपक्ष सब ज़िम्मेदार हैं मुल्क को लेकर कोई संजीदा नहीं है कोई समझदार नहीं है । इस दौर की संसद भवन में बदज़ुबानी सुनकर थक गए हैं तो बीस बरस पहले की बहस यूट्यूब पर देख लीजिये, सवाल जवाब सब होते थे लेकिन किसी को शर्मिंदा नहीं किया जाता था, एहतराम था, ख़िलाफ़ होते हुए एक दूसरे की इज़्ज़त थी । आज कल तो संसद भवन में पगड़ियाँ उछाल दी जाती हैं । (साभार)

शनिवार, 2 अगस्त 2025

एक लाख की कंपनी दस साल में तीस करोड़ की कैसे हो गई

 एक लाख की कंपनी दस साल में तीस करोड़ की कैसे हो गई 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की यह कहानी भी 


वैसे तो मोदी सरकार पर इलेक्ट्रोलर बॉण्ड के ज़रिए ही नहीं बड़े क़र्ज़दारों के बैंक लोन माफ़ कर चंदा वसूलने का आरोप लगता रहा है लेकिन आज हम पीयूष गोयल की वह चौंकाने वाली कहानी लेकर आये हैं जिसे सुनकर शायद आपके आँखों में बंधी पट्टी हट जाये…

नरेंद्र मोदी की सत्ता ने 2014 में कुर्सी कब्जाने के बाद से देश में फर्जीवाड़े से तिजोरी भरने का खुला खेल शुरू किया, लेकिन सिर्फ अपनों के लिए। 


आम जनता बिना भगवा ओढ़े यह काम नहीं कर सकती। 


ये कहानी मोदी के पीएम बनने से बहुत पहले, यानी 2005–06 से शुरू होती है। 


मोदी के कद्दावर मंत्री और पेशे से CA पीयूष गोयल ने अपनी पत्नी सीमा गोयल के साथ मिलकर 1 लाख रुपए की जमा पूंजी से एक कंपनी खोली। 


नाम रखा–इंटरकॉन एडवाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड। 


गोयल 13 मई 2014 तक इसके डायरेक्टर रहे। फिर मोदी सत्ता के आते ही पद छोड़ दिया। 


1 लाख की पूंजी वाली इस कंपनी के 10 हजार शेयर्स थे–यानी 10 रुपए प्रति शेयर। 


गोयल के पद छोड़ते ही सीमा के पास 9999 शेयर आ गए। एक शेयर जेबखर्च के रूप में बेटे ध्रुव के नाम कर दिया गया। 


अब यहां से सारा खेल शुरू होता है। 


गोयल के मंत्री बनते ही इंटरकॉन की आय 10 साल (2005 से) में बढ़कर 30 करोड़ हो गई। 


इस 1 लाख के 30 करोड़ में (3000 %) बढ़ने की कहानी बहुत दिलचस्प है, क्योंकि इंटरकॉन ने आज तक कॉरपोरेट मंत्रालय को यह नहीं बताया कि कंपनी ने ऐसा कौन सा काम किया कि आय 30 करोड़ हो गई। 


इस लूट के खेल को यूं समझें। 


असल में, गोयल परिवार और दोस्तों–रिश्तेदारों का कुनबा 11 ऐसी कंपनियों से जुड़ा हुआ था, जिन्होंने बैंकों का लोन हड़पा। 


गोयल के मंत्री बनते ही कुछ कंपनियों का लोन माफ हुआ तो कुछ दीवालिया होकर बेदाग निकल गईं। 


इन्हीं में एक कंपनी थी शिरडी इंडस्ट्रीज। इस कंपनी ने 651 करोड़ का लोन लिया। नहीं चुकाया तो 2017 में 65% लोन माफ करवाया गया। 


एक और कंपनी असीस प्लाईवुड ने 458 करोड़ का लोन हड़पकर खुद को कंगाल घोषित करवा दिया। 


असीस इंडिया इंफ्रा पर भी 457 करोड़ का लोन था। असीस इंडस्ट्रीज को भी 258 करोड़ का लोन मिला। 


सारे लोन का अधिकांश हिस्सा माफ हुआ। दिलचस्प है कि शिरडी से लेकर असीस ग्रुप तक की कंपनियों का ईमेल bknath@asisindia.com ही था। यानी चारों घपलेबाज कंपनियां एक ही शख्स की थीं। 


इसी तरह की 11 कंपनियों के साथ गोयल परिवार के करीबी रिश्ते रहे और पीयूष बतौर केंद्रीय मंत्री उनके लिए काम करते रहे। 


इन सभी 11 कंपनियों में मोदी सत्ता के आते ही गोयल और उसके परिवार के बतौर निदेशक इस्तीफे तो हुए, लेकिन जिन नए लोगों को बदले में लाया गया, वे भी गोयल परिवार से जुड़े थे। 


इनमें राकेश अग्रवाल, मुकेश बंसल, अमित बंसल, मुकेश शाह और प्रशांत शेणॉय जैसे नाम हैं।


राकेश और मुकेश बंसल ने तो सरेआम कहा कि उनके पीयूष के परिवार से रिश्ते हैं। 


वहीं, पीयूष गोयल परिवार का दावा है कि इंटरकॉन का काम सिर्फ एडवाइस देना था। यानी कंपनी पैसा लेकर सलाह देती है। 


कैसी सलाह? जाहिर है लोन हड़पने की, दीवालिया होकर निकल लेने की, अपना लोन माफ करवा लेने की। 


फिर मंत्री बनकर पीयूष गोयल किस तरह इन 11 कंपनियों की मदद कर रहे थे?


सत्ता के रसूख में अपने दोस्तों का लोन माफ करवाना, उन्हें बच निकलने का रास्ता बताना। 


क्या यह हितों का टकराव नहीं है? याद रखे–पीयूष गोयल अभी भी केंद्रीय मंत्री है। 


लेकिन, न खाऊंगा, न खाने दूंगा का जुमला फेंककर देश को बरगलाने वाले नरेंद्र मोदी ने सब जानते हुए पीयूष की फाइल दबाकर रखी। 


कांग्रेस ने जब 2018 में इस मामले को उठाया तो इसी मोदी सत्ता ने झूठा बताकर हवा में उड़ा दिया। 


तब तक गोदी मीडिया भी बिक चुकी थी। 


आज भी किसी पत्रकार में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह इस मामले को दोबारा उठाने की हिम्मत कर सके।


अब यह साफ हो चुका है कि इसी मोदी सत्ता के मंत्री, संत्री, माननीयों ने किस तरह ऐसी करप्ट कंपनियों के लिए दलाली की और बैंकों से 14 लाख करोड़ के लोन माफ करवा दिए। 


अभी भी करीब 150 माननीय देश के लिए नहीं, कंपनियों के लिए काम करते हैं। 


नतीजा इंटरकॉन जैसी और भी कंपनियां खड़ी हो रही हैं और गरीब जनता के टैक्स का पैसा लूट रही हैं। 


देश को बचाने के लिए सिर्फ नरेंद्र मोदी का ही जाना जरूरी नहीं। 


उनके साथ देश की करप्ट सत्ता को भी अगले 200 साल तक उखाड़ फेंकना जरूरी है। (साभार)


वरना ऐसी सत्ता सैकड़ों पीयूष को पालती रहेगी।


Soumitra Roy

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

ट्रंप कितना भी जुतियाये पर राहुल को कोई हक़ नहीं…

 ट्रंप कितना भी जुतियाये  पर राहुल को कोई हक़ नहीं…


क्या हो गया है बीजेपी को, क्या हो गया है मोदी सत्ता को, यह सवाल अब इसलिए बड़ा होने लगा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार मर्यादा लांघ भारत और प्रधानमंत्री का लगातार अपमान करते जा रहे है, यहाँ तक कि अब अर्थव्यवस्था को ही मृत कह दिया लेकिन पूरी बीजेपी चुप रही लेकिन जब पत्रकारों ने राहुल से ट्रंप के इस मृत अर्थव्यवस्था को लेकर सवाल पूछा तो राहुल ने जैसे ही इस पर हामी भरी पूरी बीजेपी राहुल पर पिल पड़ी, ऐसे में ट्रंप पर चुप्पी से उठते सवाल….

सवाल ये है कि_

ट्रंप ने जब भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कह दिया,

तब पूरी मोदी/बीजेपी सरकार ने ट्रंप की निंदा क्यों नहीं की..? 


लेकिन प्रेस के पूछने पर जैसे ही

राहुल गांधी ने कहा_ हां सही कहा है कि 

मोदी/बीजेपी ने अपनी नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था को मृत कर दिया है..


तो ट्रम्प पर चुप्पी और पूंछ दबाये 

बीजेपी के सांसदों ने राहुल पर हमला बोल दिया..


सवाल ये है कि जब ट्रम्प ने ये बात कही तब_

बीजेपी ने ऐसी बात कहने के लिये ट्रंप की आलोचना में कुछ भी क्यों नहीं कहा? 


बात केवल ट्रेड टैरिफ की नहीं है, 

सवाल इसका है कि ट्रंप भारत का नाम जिस संदर्भ में ले रहे हैं, उसे क्यों सहन किया जा रहा है? 

वे भारत की नीतियों का मज़ाक उड़ा रहे हैं, 

रुस से तेल खरीदने पर भारत पर जुर्माना लगा रहे हैं, 

भारत की कंपनियों पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, 

क्या यह किसी भी तरह से मोदी के मित्र का व्यवहार है? 

राहुल पर बोलने वाला मोदी गैंग_ट्रम्प पर चुप क्यों है..??

क्या अंग्रेजी की गुलामी से पैंशन लेने‌ वाले मुखबिर क्या फिर से ट्रम्प को ईस्ट इंडिया बनाने की साजिश में मुंह में दही जमा लिये हैं..??

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

महाभियोग-दो जज, दो नीति…

महाभियोग-दो जज, दो नीति…


ग़ज़ब देश है और अजब सत्ता, वैसे भी यह बात घर कर गई है कि क़ानून सिर्फ़ कमज़ोर लोगो के लिये है , पैसा और पहुँच वालों ने क़ानून को किस तरह अपनी जूती का खाल बनाया है यह किसी से छिपा नहीं है , ऐसे में जज द्वय शेखर यादव और यशवंत वर्मा पर चलाये जाने वाले महाभियोग भी क्या पहुँच के आगे घुटने पर आ जाएगा…

दो जज साहिबान हैं जिन पर विपक्ष ने महाभियोग चलाने के लिए मुहीम चलाई है। एक जज हैं यशवंत वर्मा जी, जिन पर भ्रष्टाचार के मामले मे महाभियोग लगाने के लिए आवेदन किया गया है। दूसरे जज हैं शेखर यादव जी, जिन पर विश्व हिन्दू परिषद की सभा में नफ़रती बयान बाज़ी का आरोप है। 


अब सरकार जस्टिस वर्मा जी के विरूद्ध तो कार्रवाई करने की बात तो कर रही है लेकिन जस्टिस यादव जी के मामले में ख़ामोशी अख्तियार किये हुए है। इन दोनों जजों के विरूद्ध एकसाथ कार्रवाई की जानी चाहिए। 


कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने दिनांक 21-07-2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 63 राज्य सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन किया था। वहीं जस्टिस यादव के विरूद्ध 152 लोक सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन पत्र  दिया था।


जब पूर्व राज्यसभा के सभापति धनखड़ इन महाभियोग पत्र पर बोल रहे थे तब वह स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि पर्याप्त संख्या में सदस्यों ने हस्ताक्षरित आवेदन पत्र लिखकर दिये हैं। पार्लियामेंट के एक्ट अनुसार यदि इस तरह से दो आवेदन पत्र दिए जाते हैं तो इसे दोनों सदनों में संयुक्त रूप से देखा जाएगा। इन दोनों आवेदन पत्रों को हाऊस की संपत्ति माना जायेगा।


लेकिन सरकार अब इन आवेदन पत्रों पर कार्रवाई करने से हिचकिचाहट दिखा रही है। इससे सरकार की दोमुंही नीति सामने आ रही है और वह विपक्ष के साथ सहयोग नहीं कर रही है।