सोमवार, 5 अप्रैल 2010

अस्पताल है या कत्लखाना ?

पैसे की लालच में जान ले ली
डॉक्टरों में भगवान का रूप देखकर अपने अजीजों का जीवन सौंपने वालों को अब समझ लेना चाहिए कि बड़े-बड़े भवनों में अस्पताल चलाने वाले रुपयों की लालच में किसी की जान तक ले सकते हैं। अस्पताल में आए मरीजों से रुपये कमाने की होड़ में लगे डाक्टर अब मरीजों को उचित सलाह देने की बजाय इस चिन्ता में यादा रहते हैं कि मरीज उनकी बजाय दूसरे अस्पताल में न चला जाए। शायद डाक्टर की ऐसी ही लापरवाही की वजह से ही सतीश को अपना बेटा खोना पड़ गया और अब वह अपने बेटे के ईलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाकर डॉ. केदार अग्रवाल, डॉ. जवाहर अग्रवाल, डॉ. ओ.पी. सिंघानिया और डॉ. केडिया के खिलाफ जुर्म दर्ज करने की मांग को लेकर पुलिस व न्यायालय की शरण में भटक रहा है। पोस्टमार्टम में बच्चे की मौत की वजह जटील मारक आघात बताया गया है।
मामला 18 जनवरी 2010 का है जब कोटा निवासी सतीश ताण्डी के 14 वर्षीय पुत्र मुकेश को पसली के पास दर्द की वजह से अग्रसेन अस्पताल लाया गया। इसके बाद डॉ. केदार अग्रवाल की सलाह पर एक्स-रे और सोनोग्राफी कराया गया। रिपोर्ट देखकर डॉ. केदार अग्रवाल ने पेट में तिल्ली फटने की जानकारी देकर तत्काल आपरेशन कराने की सलाह देते हुए 25 हजार रुपए खर्च बताया। दूसरे दिन सतीश द्वारा 20 हजार रुपए जमा कराया तब बताया गया कि पूरा खर्च करीब 45 हजार रुपये बताते हुए शाम को आपरेशन किया गया।
दूसरे दिन सतीश ने 20 हजार रुपए फिर जमा किया। इसके बाद बच्चे की तबियत बिगड़ने लगी तो डॉ. केदार अग्रवाल ने मरीज मुकेश को लाईफवर्थ अस्पताल के लिए रिफर कर दिया और 22 जनवरी को 11 बजे लाईफ वर्थ में शिफ्ट किया गया। रात में बच्चे के पेट में असहनीय दर्द से जब बच्चे के परिजनों ने हल्ला मचाना शुरु किया तो डाक्टरों की अनुपस्थिति में नर्स द्वारा बच्चे को दवा व इंजेक्शन दिया गया। बच्चे की तबियत बिगड़ते देख परिजनों ने पुन: डॉ. केदार अग्रवाल से संपर्क किया तो उन्होंने डॉ. ओ.पी. सिंघानिया से चर्चा की और फिर ओ.पी. सिंघानिया लाईफवर्थ में राउण्ड में आए और जानकारी दी कि बच्चे के फेफड़े में पानी भर गया और आईसीयू में भर्ती कर दिया गया और अचानक 26 जनवरी को बच्चे को जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया जबकि बच्चे की तबियत में कोई खास सुधार नहीं देखा जा रहा था।
इसके बाद 27 जनवरी को डॉ. जवाहर अग्रवाल ने सतीश को फीस के लिए न केवल डांटा बल्कि राजेश मूणत मंत्री के पास तत्काल सहायता उपलब्ध कराने कहा। तब सतीश भागा-भागा राजेश मूणत के पास गया वहां बताया गया कि 20 हजार सहायता राशि स्वीकृत हो गई है और लाईफवर्थ के नाम पर चेक जारी कर दिया जाएगा। इस सूचना के बाद सतीश ने लाईफवर्थ में अपना गरीबी रेखा वाला स्मार्ट कार्ड जमा करा दिया। इसके बाद 5 फरवरी को मुकेश को अचानक छुट्टी दे गई और 6 फरवरी को बच्चे की तबियत फिर यादा बिगड़ने पर डॉक्टरों के पास दौड़ लगाई तो लाईफवर्थ में पुन: बच्चे को भर्ती कर दिया गया। 8 फरवरी को डॉ. ओ.पी. सिंघानिया ने रात्रि 8 बजे बताया कि आपरेशन की गलती की वजह से अतड़ी चिपक गई है और पुन: आपरेशन करना होगा। इसके बाद राउण्ड में आए डॉ. केडिया ने भी आपरेशन की बात कही।
26 फरवरी को बच्चे का दुबारा ऑपरेशन किया गया लेकिन इसकी जानकारी डाक्टरों ने बच्चे के परिजनों को देने की जरूरत नहीं समझी और इसके बाद भी बच्चे के तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि मामला बिगड़ता गया और 3 मार्च को बच्चे की मौत हो गई। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है सतीश के मुताबिक बच्चे के मौत की खबर छुपाई गई और फीस का तीस हजार रुपए जमा करने दबाव बनाया गया और जब बच्चे के परिजनों ने हंगामा किया तब पुलिस की मौजूदगी में डॉ. अम्बेडकर अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया गया तब पता चला कि बच्चे की मौत की वजह पेट में जटील मारक आघात के कारण मौत हुई है।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस मामले में न तो बच्चों के विशेषज्ञ डाक्टर को ही बुलाया गया और न ही मरीज के परिजनों को ही उचित सलाह दी गई। इधर सतीश तांडी का कहना है कि मरीज भाग न जाए इसलिए ईलाज न होने के बावजूद फीस के चक्कर में रोका गया। सतीश का यह भी आरोप है कि हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. केदार ने ही पहला आपरेशन किया। इधर इस संबंध में जब अग्रसेन अस्पताल व लाईफवर्थ से संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं थे। बार-बार संपर्क की कोशिश बेकार रही। वहीं सतीश ताण्डी ने पूरे घटनाक्रम की शिकायत पुलिस से की है और कार्रवाई नहीं होने पर न्यायालय जाने की बात कही है। राजधानी के बड़े अस्पतालों में चल रहे इस तरह के खेल की आम लोगों में जबरर्दस्त चर्चा है।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

साल में अंदर 20 करोड़ ,पक्ष-विपक्ष का गठजोड़

कहने तो तो छत्तीसगढ़ के विधायक समाजसेवा कर रहे हैं लेकिन वास्तव में इनकी रूचि ऐन-केन प्रकारेण पैसे कमाने की है यही वजह है कि वेतन भत्ते बढाने के मामले में सभी विधायक एक हो जाते हैं और महंगाई से त्रस्त आम आदमी का मामला हाशिये पर चला जाता है। छत्तीसगढ़ के लोगों की गाढ़ी कमाई का 20 करोड़ रुपया हर साल सीधे इन्हीं मंत्रियों व विधायकों की जेब में जाता है।
वास्तव में राजनीति अब व्यवसाय का रूप ले चुकी है। सिध्दांतों की बात करने वाले राजनैतिक दल के नेता पैसा कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। इसलिए पैसा लेकर सवाल करने का सवाल लगाकर पैसा लेकर गायब होने की परम्परा ने लोकतंत्र के मंदिर को अपवित्र करना शुरू कर दिया है। जनसेवा के नाम पर राजनीति की वकालत करने वाले छत्तीसगढ़ के किसी विधायक ने यह नहीं कहा कि सेवा वे मुफ्त में करेंगे बल्कि अपनी तनख्वाह और भत्ता बढ़ाने गलबट्टियां करने लगते हैं।
छत्तीसगढ़ में बजट सत्र में सरकार ने महंगाई का हवाला देकर जिस पैमाने पर विधायकों के वेतन भत्ते में बढ़ोत्तरी की है वह जनसेवा के नाम पर कलंक है। इस बड़े हुए वेतन भत्ते का हिसाब लगाया जाए तो अब हर विधायक 46 हजार रुपए महिना पायेंगे। आश्चर्य का विषय तो यह है कि आम लोगें की महंगाई की तकलीफ पर आंसू बहाने वाले किसी भी विधायक ने न तो इस विधेयक का विरोध ही किया और न ही किसी ने मुफ्त में जनसेवा करने की बात ही कही। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य क्या होता जा रहा है। छत्तीसगढ नया राय है और वहां विकास करने की जरूरत है। सरकारी धन का बंदरबांट कर विकास में रोड़ा अटकाया गया तो राय निर्माण की वजह पर सवाल उठेंगे। भ्रष्टाचार तो चरम पर है ही सरकारी अधिकारी अपनी सुविधा के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा चुरा लेते है ऐसे में जनप्रतिनिधि भी सरकारी धन का बंदरबांट करे तो स्थिति विकराल हो सकती है। इसलिए अब आम लोगों को सोचना होगा कि उसे कैसा नेता चाहिए।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

घर के जोगी जोगड़ा , आन गांव के सिध्द

संवाद में भारी अव्यवस्था
सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करने वाले जनसंपर्क और संवाद में इन दिनों भारी अव्यवस्था है। विभाग के पदाधिकारियों द्वारा पैसे खाकर दूसरे प्रांत के कर्मियों को नियमित करने और छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने का मामला गरमाने लगा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ संवाद के द्वारा शासन के नियमों को ताक में रख कर छत्तीसगढ़ के बाहर के ऐसे लोग जिनके पास संबंधित पद की शैक्षणिक योग्यताएं और रोजगार पंजीयन नहीं हैं उन्हें नियमित करने की कोशिशें लंबे समय से की जा रही है। समानता का संवैधानिक अधिकार छीने जाने के खिलाफ बोलने वाले कापी राईटर मोहन मिश्रा को सात साल बाद नौकरी से निकाल दिया गया है ताकि सुखदेव राम को लाखों रुपए कमीशन लाकर देने वाले छत्तीसगढ़ के बाहर के कर्मचारियों को नियमित करने में कोई बाधा नहीं आए।
करीबन तीन पहले छत्तीसगढ़ मूल के कर्मचारियों की संविदा अवधि तीन-तीन महीने और छत्तीसगढ़ के बाहर के ऐसे कर्मचारियों जिन्हें काम नहीं आने के कारण नौकरी से निकाले जाने का प्रस्ताव था उनसे पैसे लेकर उनके काम को सर्वश्रेष्ठ बताकर तीन-तीन साल के लिए संविदा अवधि बढ़ा दी गई थी। यहां के कापी राईटर मोहन मिश्रा ने इस अत्याचार के खिलाफ छत्तीसगढ क़े कर्मचारियों को खड़े करने की कोशिश की थी जिसके बाद छत्तीसगढ संवाद के अध्यक्ष डा. रमन सिंह के आदेश से छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों की संविदा (तीन-तीन महीने संविदा वाले) एक-एक साल के लिए बढ़ाई गई। नियमित पदों पर भर्ती के लिए नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया अपनानी पड़ती है विज्ञापन निकालकर आवेदन आमंत्रित करके लिखित परीक्षा और इंटरव्यू किए जाने का नियम है। उक्त नियम का पालन करते तो उन्हें कमीशन की कमाई देने वाले छत्तीसगढ़ के बाहर के कर्मचारी सव्यसांचीकर, शरदचंद्र पात्र, किशोर गनोदवाले, के.एम. ललिता वापस संवाद में नजर नहीं आएंगे। दिनांक 19-1-2005 को अध्यक्ष छत्तीसगढ़ संवाद डॉ. रमन सिंह के समक्ष आठ कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत आवेदन उल्लेख किया गया था कि छत्तीसगढ़ के बाहर के पांच लोगों सव्यसांचीकर (बंगाल), शरदचंद्र पात्र (उड़ीसा), किशोर गनोदवाले (महाराष्ट्र), के.एम. ललिता और जमीनल चौहान (राजस्थान) की संविदा अवधि तीन-तीन साल के लिए बढ़ा दी गई है। छत्तीसगढ़ के रहवासी मोहन मिश्रा, गोकुल ध्रुव, हेमंत मांजरे, अंजुरानी गोंडाने, सनत कुमार क्षत्री, चंद्रशेखर साहू, द्रोण कुमार कौशल और नीला ध्रुव की संविदा अवधि मात्र तीन-तीन महीने बढ़ाई गई है। उक्त आठ कर्मचारियों ने भी तीन-तीन साल संविदा बढ़ाने की मांग डॉ. सिंह से की थी लेकिन 1-1 साल के लिए उनकी संविदा बढ़ाई गई।
बताया जाता है कि बाहर के जिन पांच कर्मचारियों की संविदा कर्मचारियों की संविदा 3-3 साल बढ़ाई गई पहले उन्हें काम नहीं आने के कारण नौकरी से निकाले जाने का प्रस्ताव सुखदेवराम के वरिष्ठ अधिकारी ने रखा था लेकिन रातों-रात उनका काम सर्वश्रेष्ठ हो गया और संवाद के बोर्ड के सदस्यों को बिना जानकारी के ही इस बात से सहमत होना बताया गया। सुखदेवराम के इस कुकर्म को पुष्ट करने वाली बात यह भी है कि उक्त पांच कर्मचारियों में दो ऐसे हैं जो फाईलों को चढ़ाने उतारने के काम करते थे। बाकी के तीन लोग बड़े पदों से हैं इससे यह साबित होता है कि छोटे पद पर काम करने वाले अच्छे से काम करने वाले नहीं हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ संवाद के कार्यालय आदेश के अनुसार दिनांक 4 अक्टूबर 2001 को भर्ती किए गए सभी संविदा कर्मियों को भर्ती के समय आरक्षण नियमों का पालन नहीं किए जाने के कारण दिनांक 16 सितंबर 2002 को (दिनांक एक अक्टूबर 2002 के संविदा अनुबंध की शर्त क्रमांक 18 का हवाला देते हुए) सेवामुक्त कर दिया गया था। इसके बाद दो पदों को छोड़कर बाकी के लिए विज्ञापन निकाला (सभी पदों के लिए निकाला जाना था)। प्रकाशन विशेषज्ञ और लेखाधिकारी पदों का विज्ञापन भी निकाला जाना था, क्योंकि इन पदों पर काम करने वालों सव्यसांचीकर और शरदचन्द्र पात्र को अन्य कर्मचारियों के साथ ही 19 सितम्बर 2002 को सेवामुक्त कर दिया गया था। दोबारा भर्ती में उक्त कर्मचारी (अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता नहीं होने के कारण) वापस नहीं आ सकते थे। इसलिए सव्यसांचीकर और शरदचन्द्र पात्र से रिश्वत लिया और बिना भर्ती प्रक्रिया के दिनांक 12 अक्टूबर 2002 से संविदा नियुक्ति बढ़ा दी। बाकी कर्मचारियों को विज्ञापित पदों के लिए फिर से आवेदन करके भर्ती प्रक्रिया से गुजरना पड़ा जिससे कुछ कर्मचारी वापस संवाद में नियुक्त नहीं हो पाए। अनिवार्य योग्यता नहीं होने और फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों की जानकारी होने पर सी.के. खेताम तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने सुखदेवराम को उक्त कर्मचारियों के प्रमाण पत्रों की जांच पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से कराने के लिए निर्देश किया था। लेकिन सुखदेवराम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे उक्त कर्मचारियों से रिश्वत खा चुके थे। प्रकाशन विशेषज्ञ पद पर भर्ती के लिए निकाले गए विज्ञापन की छायाप्रति के अनुसार संबंधित पद के लिए प्रिंटिंग टेक्नालाजी में डिग्री या डिप्लोमा अनिवार्य है। सुखदेवराम द्वारा इस पद पर पदस्थ किए गए बंगाल निवासी सव्यसांचीकरण द्वारा प्रस्तुत आवेदन में प्रिंटिंग टेक्नालॉजी में कोई योग्यता हासिल करने का उल्लेख नहीं है। रोजगार पंजीयन भी प्रमाण के साथ संलग्न नहीं है। मतलब पढ़ाई ऐसे फर्जी विश्वविद्यालय से की गई थी उसका रोजगार कार्यालय में पंजीयन नहीं हो सकता था। अनुभव प्रमाण पत्र की छायाप्रति संलग्न है, जिस संस्था ने अनुभव प्रमाण पत्र बनाया है। उसे खुद को बने ही करीब 3 साल हुए थे। दरअसल इसमें भी एक सौदा हुआ था जिसके अनुसार यहां नियुक्ति के बाद उक्त संस्था को अनैतिक रुप से लाभ पहुंचाने के लिए सव्यसांची द्वारा अब तक शासन को लाखों का चूना लगाया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि आज उक्त अनुभव प्रमाण पत्र देने वाली संस्था युगबोध प्रकाशन को भ्रष्ट तरीकों से लाभ पहुंचाया जा रहा है। फर्जी तरीके से नौकरी कर रहे उक्त कर्मचारियों के साथ मिलकर सुखदेवराम द्वारा संवाद से होने वाले कामों में क्वांटिटी और क्वालिटी की हेराफेरी करके और न जाने कितने तरीकों से शासन को लाखों-करोड़ों का चूना रोज लगाया जा रहा है।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

पद का घमंड या संस्कार


क्या बृजमोहन इन सबसे बडे हैं
छत्तीसगढ़ में सरकार के मंत्री और अधिकरियों की करतूतें नई नहीं है। ताजा मामला विधानसभा में आयोजित उत्कृष्ठता अलंकरण समारोह का है जहां मंच पर डॉ. रमन सिंह, रविन्द्र चौबे, धरमलाल कौशिक और कवि सम्राट गोपाल दास (नीरज) के अलावा पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी पहुंचे। गद्दे लगे इस स्टेज पर पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को छोड़ सभी ने जूते उतारे। अब इस मामले से क्या अंदाजा लगाया जा सकता है।
दरअसल विधानसभा में हुए इस उत्कृष्ठता अलंकरण समारोह को लेकर कई तरह के सवालों ने इसे विवाद में ले लिया है। अलंकरण समारोह के नाम पर मनमानी और सरकारी रवैये से अतिथियों को अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। बताया जाता है कि इस अवसर पर विख्यात कवि गोपाल दास नीरज को बुलाया गया था उनके कार्यक्रम शुरू होने के पहले देवी सरस्वती की प्रतिमा पर मार्ल्यापण व श्री नीरज को सम्मानित किया जाना था। इस अवसर पर मंच में जब नेताओं को बुलाया गया तो विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, मुख्यमंत्री रमन सिंह, नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे सहित मंचस्थ सभी लोगों ने जूता नीचे उतार दिया लेकिन पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जूता पहने ही मंच पर चढ ग़ए। इसे लेकर दर्शकदीर्घा में काना-फूसी भी होने लगी।
मौजूद लोगों ने पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के इस रवैये पर न केवल आश्चर्य जताया बल्कि कटु आलोचना भी की। किसी ने उसके पद पाने की घमंडता पर भाषण शुरू कर दिया तो कई लोगों ने तो संस्कार पर ही सवाल उठाये। बताया जाता है कि इस मामले को लेकर कांग्रेसियों की चुप्पी पर भी सवाल उठाये जाने लगे और कई लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि चूंकि बृजमोहन अग्रवाल की कांग्रेस के कई लोगों से सेटिंग है इसलिए मामला दब गया अन्यथा कोई दूसरा मंत्री होता तो इस करतूत के लिए बवाल मच जाता। बहरहाल इस मामले को लेकर शहर में कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि यह अपमानजनक स्थिति है।
प्रेस नोट से नीरज गायब
इधर बृजमोहन अग्रवाल के जूते पहनकर स्टेज पर चढ़ने का मामले की चर्चा समाप्त भी नहीं हुई है कि श्री नीरज को प्रेस नोट से गायब करने का मामला भी चर्चा में आ गया है। कहा जाता है कि अतिथि को बुलाकर ऐसा अपमान कहीं अंयंत्र देखने को नहीं मिलेगा। क्योंकि श्री नीरज ने वहां जिस प्रकार से शमां बांधा और उन्हें बुलाया गया उसके बाद तो अखबारों को जारी किए जाने वाले प्रेस नोट में नीरज के कार्यक्रमों को स्थान दिया जाना था।

बुधवार, 31 मार्च 2010

ये कैसा सम्मान...

उत्कृष्ठ में निकृष्ठ प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ विधानसभा में उत्कृष्ठता अलंकरण समारोह में जो कुछ हुआ वह इस प्रदेश को शर्मसार कर देने वाला है। यह मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सरकारी नुमाईश है या अपमान करने का तरीका यह तो वे ही जाने लेकिन अलंकरण समारोह में मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया न केवल तीखी रही बल्कि इसे अपमान समारोह का भी नाम दिया जा रहा है।
1. रसीद टिकिट से पैसा मिला
उत्कृष्ठता अलंकरण समारोह में जिन दो विधायकों व एक पत्रकार को चुना गया उन्हें 21 हजार रूपए नगद दिया गया। कहीं भी पुरस्कार में मिलने वाली राशि के लिए रसीदी टिकिट पर दस्तखत नहीं कराये जाते लेकिन यहां पुरस्कार चाहिए तो रसीदी टिकिट पर दस्ताखत करने होंगे। दबी जुबान पर इसका विरोध हुआ लेकिन पैसा आजकल यादा प्यारा है।
2. राशि में फर्क...
जनसंपर्क द्वारा जारी किए गए प्रेस नोट में पुरस्कार की राशि 25 हजार रुपए बताई गई लेकिन विधानसभा में हुए इस कार्यक्रम के दौरान पुरस्कृत दोनों विधायकों व पत्रकार को केवल 21 हजार रुपए नगद दिए गए।
सम्मानितों के फोटो नहीं
यह घोर नौकरशाही नहीं तो और क्या है कि इतने बड़े सम्मान समारोह के आयोजन का फोटो को लेकर भी सरकारी अधिकारी गणितबाजी करें यानी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खास अधिकारियों ने तय कर लिया कि मीडिया को सम्मान पाने वालों का फोटो नहीं भेजना है केवल रायपाल, विधानसभा अध्यक्ष, बृजमोहन अग्रवाल और मुख्यमंत्री वाला ही फोटो भेजना है।
4. इसलिए खबर नहीं छपा
कहते है राजधानी के एक अखबार के संपादक ने अपने चहेते को उत्कृष्ठ पत्रकार का पुरस्कार दिलवाने के लिए लॉबिंग की थी लेकिन उसकी लॉबिंग धरी रह गई इससे वह इतना नाराज हुआ कि अपने अखबार से उसने यह समाचार ही गायब कर दिया।

मंगलवार, 30 मार्च 2010

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे...



छत्तीसगढ़ में शासन प्रशासन में इन दिनों कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। प्रदेश के मुखिया भले ही सर्वे रिपोर्ट के आधार पर स्वयं को असरदार समझते रहे लेकिन प्रशासनिक हल्कों में अंधेरगर्दी बढ़ते ही जा रही है। रमन सिंह के हाथ से शासन-प्रशासन बेकाबू हो चला है। प्रशासनिक अफसर तो 'ढीट' हो गए हैं और स्वेच्छाचारिता चरम पर है।
सर्वाधिक दिक्कत उन मंत्रियों को हो रही है जो आरक्षण कोटे से चुनाव जीतकर मंत्री बने है चूंकि प्रशासनिक कामकाज में 6 साल भी कसावट नहीं आ पाया है। परिणाम स्वरुप सब कुछ उल्टा पुल्टा होने लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बायोडीजल और मुफ्त चावल योजना का फ्लॉप शो है। सरकार ने जनहित में योजनाएं तो बनाई लेकिन इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। प्रशासनिक भ्रष्टाचार का यह आलम है कि दर्जनभर से अधिक सचिव सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने में लगे है और अब तो वे इतना पैसा कमा चुके हैं कि नौकरी छोड़ने तक की धमकी देने लगे है। हर कोई अपने को मुख्यमंत्री का करीबी बताकर मनमानी करने पर उतारू है।
इन दिनों आदिवासी मंत्री रामविचार नेताम विवाद में है। उन पर प्रशासनिक अधिकारी को थप्पड़ मारने का आरोप है। अधिकारियों ने जब उन पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाया तो मंत्रीजी भी कहां चुप रहने वाले थे उन्होंने भी मोर्चा खोल दिया। जो सरकार के मुखिया आयकर छापे के बाद बाबूलाल अग्रवाल पर कार्रवाई करने में हफ्ता गुजार दिया हो उनसे इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की उम्मीद बेमानी भी है यही वजह है कि दोनों ही पक्ष राजनैतिक रोटी सेकेने लगे है और सड़क पर उतर आए हैं। यह तो सरकारी अंधेरगर्दी का नमूना है जब दोनों पक्ष एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं। आदिवासी एक्सप्रेस चलाने के लिए बदनाम हो चुके रामविचार नेताम वैसे भी मुख्यमंत्री के आंख की किरकिरी बने हुए हैं और मुखिया को मौके की तलाश भी रही है ऐसे में पूरे घटनाक्रम से स्वयं को अलग रखने की मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कोशिश भी बेकार होने लगी है जबकि प्रशासनिक संबंधों की वजह से यह मामला दूसरा भी रूप ले सकता है।
कांग्रेस ने भी इस मामले को तूल देना शुरु कर दिया है और वे मंत्री को हटाने दबाव बना रहे हैं ऐसे में निरकुंश व भ्रष्ट प्रशासन के चलते हुई इस घटना में मुख्यमंत्री भले ही अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर ले लेकिन आदिवासी मंत्रियों ने जिस तरह से समय-समय पर अफसरशाही की शिकायत की है यह उसके दुष्परिणाम का नतीजा है।

सोमवार, 29 मार्च 2010

क्या कानून से विश्वास उठ गया...




इन दिनों छत्तीसगढ़ में अजीब किस्म की पत्रकारिता चल रही है तो इसकी वजह पत्रकारिता का ग्लैमर है। समय-समय पर कानून का पाठ सीखाने वाले अखबार अब कानून हाथ में लेने की न केवल वकालत कर रहे हैं बल्कि आम लोगों को प्रेरित भी कर रहे हैं। पिछले दिनों राजधानी से प्रकाशित हो रहे सांध्य दैनिक छत्तीसगढ ने कानून हाथ में लेने से संबंधित एक विज्ञापन जनहित में प्रकाशित किया। विज्ञापन का उद्देश्य वाकई में जनहित का है लेकिन जनहित से जुड़े मसलों पर इसी तरह से कानून हाथ में लिया जाने लगा तो फिर नक्सली और आम लोगों में फर्क क्या रह जाएगा। क्या नक्सली भी इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं करते।
हालांकि इस अखबार के संपादक सुनील कुमार एक सुलझे हुए व्यक्ति है लेकिन उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी लेकिन जब सरकार पूरी तरह निकम्मी और भ्रष्ट हो तो अच्छे-अच्छे आदमी का दिमाग खराब हो जाता है शायद तभी कानून हाथ में लेने की बात की जाती है। मुझे रोज सदर बाजार से गुजरना पड़ता है और सेठों की गाड़ियों की वजह से यातायात में घंटों फंसना होता है इस बारे में खूब लिखा भी और कभी-कभी कानून हाथ में लेकर इन खड़ी गाड़ियों में तोड़फोड़ कर या करवा देने का विचार भी आया लेकिन मेरे विचार को दूसरे पर थोपने और कानून हाथ में लेने से बचता रहा हूं। लेकिन सुनील कुमार शायद सरकारी करतूतों में अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए और लोकतंत्र से विश्वास उठ गया।
और अंत में...
इन दिनों पत्रकारों को प्रशासन को चुस्त करने नए-नए उपाय सुझ रहे हैं एक पत्रकार ने प्रेसक्लब में भ्रष्ट तंत्र की आलोचना करते एक मंत्री के खिलाफ खबर बनाने का दावा किया लेकिन दफ्तर पहुंचते ही उनके हाथ कांपने लगे जब पता चला कि नगर भैया के पास उनका दावा पहले ही पहुंच गया और संपादक ने उसे उसकी हरकत के लिए चेतावनी तक दे डाली।