रविवार, 9 मई 2010

खनिज में चल रहा है खेल, अवैध उत्खनन वालों से मेल


मुख्यमंत्री के विभाग में खुलेआम लेन-देन
प्रदेश के मुखिया डा. रमन सिंह का खनज विभाग इन दिनों सुर्खियों में हैं अवैध उत्खनन वालों से गलबहियां में मशगुल अधिकारी नियम कानून को ताक पर रखकर पैसा कमा रहे हैं। राजेश शर्मा, शेखर वर्मा और संतोष वर्मा को अवैध उत्खनन करने की छूट दिया गया है जबकि कागजात पूरा नहीं करने वाले अशोक मंजीत कुलदीप और महेश चांदी काट रहे हैं।
कहने को तो खनिज विभाग प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के पास है लेकिन वास्तव में इस विभाग में अधिकारियों के अलावा किसी की नहीं चलती। खुलेआम अवैध उत्खनन करने वालों को संरक्षण दिया जाता है और इसके एवज में मोटी रकम ली जाती है। यही नहीं मंत्रियों को भी कमीशन पहुंचाने की बात करते अधिकारी नहीं थकते जबकि इस विभाग के मंत्री डा. रमन सिंह है। खनिज विभाग में यह खेल नया नहीं है और हर आने वाला अधिकारी अपनी जेबें गरम करने के पीछे नहीं हटता। कभी सचिव तो कभी विभागीय मंत्री के नाम पर अवैध उत्खनन करने वालों को छूट दी जाती है।
ताजा मामला राजेश शर्मा, शेखर वर्मा और संतोष वर्मा सहित आधा दर्जन लोगों का है। बताया जाता है कि इनके पास कोई खदान लीज पर नहीं है इसके बावजूद इन्हें उत्खनन की छूट मिली हुई है और यह सब खुलेआम चल रहा है इनकी शिकायतें तक हो चुकी है लेकिन पैसा खिलाने में माहिर इन लोगों के आगे खनिज अफसरों को भी झूकना पड़ता है। सूत्रों ने बताया कि ऐसे अवैध उत्खनन खनिज अफसरों के इशारें पर चल रहे हैं जिससे पट्टा लेने वाले खदान मालिक बेहद नाराज हैं लेकिन वे चाहकर भी इसलिए कुछ नहीं करते क्योंकि यह सब खनिज विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा है।
इसी तरह ऐसे और पट्टाधारियों को खनिज विभाग द्वारा सरंक्षण दिया जा रहा है जिन्होंने आश्यक कागजात तक पूरे नहीं किए हैं। न माईनिंग प्लान का पता है और न ही पर्यावरण विभाग का एनओसी ही इनके पास है और यह सब बात खनिज अधिकारी जानते भी हैं लेकिन यहां से मिल रहे मोटी रकम की वजह से वे खामोश है। बहरहाल मुख्यमंत्री के नाक के नीचे चल रहे इस भ्रष्टाचार के खेल की चर्चा यहां जोरों पर है और मुख्यमंत्री की खामोशी को दूसरे अर्थों में लिया जा रहा है।
बृजमोहन की भी यहां नहीं चलती...
प्रदेश के दमदार माने जाने वाले पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की भी खनिज विभाग में नहीं चलती। बताया जाता है कि 14 अप्रैल को ग्राम सुराज अभियान के तहत पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जब दोंदेकला पहुंचे तो वहां उपस्थित ग्रामीणों ने दोंदेकला, मटिया, लालपुर और दोंदेखुर्द में अवैध उत्खनन एवं खनिज के अवैध परिवहन की शिकायत की तब मंत्री जी ने उपस्थित खनिज अधिकारियों को डांटे हुए तत्काल रोक लगाने कहा। इसके बाद उपसंचालक ने आदेश तो निकाल दिया लेकिन जिला खनिज के अधिकारी इस पर अमल करने की बजाय मंत्रीजी का ही मजाक उड़ाते नहीं थकते।

शनिवार, 8 मई 2010

तेल लगाओ, विज्ञापन पाओ

संवाद में विज्ञापन देने नियम कानून नहीं
छत्तीसगढ़ संवाद में विज्ञापन जारी करने का कोई नियम कानून नहीं है। जो जितना चापलूती करेगा उसे उतना विज्ञापन जारी किया जाता है। चापलूसी के आगे प्रसार संख्या भी बेमानी है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के इस विभाग में भर्राशाही और अफसर शाही इस कदर हावी है कि कई अखबार वाले भी कुछ कहने-छापने से हिचकते हैं। इस संबंध में जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तो यह जानकारी संवाद में चल रहे भर्राशाही का पोल खोलने के लिए काफी है।
संवाद ने 1 मई 2009 से 25 जुलाई 2009 से 25 जुलाई 2009 के बीच जो विज्ञापन जारी किए है दिल्ली से प्रकाशित होने वाले महामेघा को 50 हजार का विज्ञापन दिया गया। इसी तरह भिलाई से प्रकाशित अगास दिया को 80 हजार का विज्ञापन दिया गया। हरिभूमि और प्रखर समाचार को एक ही ग्रेट का बनाया गया और दोनों को तीन-तीन लाख का विज्ञापन दिया गया। सर्वाधिक विज्ञापन मुख्यमंत्री के गृह जिले राजनांदगांव के अखबारों को दिया गया जबकि दिल्ली के हिन्दी जगत को 50 हजार और इंदौर के ग्राम संस्कृति को 30 हजार का विज्ञापन दिया गया दिल्ली के ही नया ज्ञानोदय को 25 हजार लोकमाया हिन्दसत को 50-50 हजार का विज्ञापन दिया गया पटना के राष्ट्रीय प्रसंग को 75 हजार का विज्ञापन दिया गया।
इसके मुकाबले छत्तीसगढ़ के अखबारों को 5-10 हजार का विज्ञापन ही दिया गया। इस आंकड़े से स्पष्ट है कि जनसंपर्क और संवाद में किस तरह का भर्राशाही व चापलूसी चल रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इन विज्ञापनों की आड़ में कमीशनखोरी की चर्चा भी जोर-शोर से है।

शराब लॉबी का बढ़ता दबाव

राजधानी में इन दिनों शराब आंदोलन जोरों पर है नियम कानून को ताक पर रखकर शराब दुकानें खोली जा रही है। कई जगह इसके खिलाफ आंदोलन भी चल रहे हैं और अखबार भी इस आंदोलन को छाप रहे हैं लेकिन कई आंदोलनकारी के चहेरे की वजह से खबर को प्रमुखता नहीं दी जा रही है। यह सच है कि इसके पीछे शराब माफियाओं का दबाव।
दरअसल शराब माफियाओं की पकड़ इतनी मजबूत है कि वे सरकार बनाने-बिगाड़ने का दावा करते नहीं थकते इसलिए पुलिस भी नियम-कानून का उल्लंघन कर रही शराब दुकानों की तरफ से न केवल आंखे फेर लेती है बल्कि आंदोलनकारियों को ही कुचलने की कोशिश करती है। मांगे कितनी भी जायज हो व्यवस्था बनाने के नाम पर जिस तरह से आंदोलन कुचले जाते हैं कमोबेश कुछ अखबारों का रवैया भी यही है। इसलिए आंदोलनकारियों के चेहरे देख खबरें छापी जाने लगी है।
वैसे शराब माफियाओं ने अपने पैसे की ताकत अखबारों पर भी दिखाना शुरु कर दिया है यह अलग बात है कि रिपोर्टर अब भी आंदोलनकारियों के साथ है लेकिन विज्ञापन विभाग का दबाव खबरों को रोकने की ताकत रखने लगी है। इस खबर में कितना दम है यह तो अखबार वाले ही जाने लेकिन शराब आंदोलन की खबरों को लेकर माफियाओं द्वारा पैकेज पहुंचाने की चर्चा ने अखबार की विश्वसनियता पर सवाल उठाया है। प्रतिस्पर्धा के युग में अधिकाधिक विज्ञापन बटोरने की ललक ने खबरों के साथ समझौता भी सिखाने लगा है। अब तो यह चर्चा आम होने लगी है कि किस सिटी चीफ को उसके अखबार की औकात के अनुसार पैसा दिया जाने लगा है ताकि आंदोलन को कुचला जा सके।
और अंत में....
शराब दुकान को लेकर शास्त्री बाजार के व्यापारी प्रकोष्ठ दुखी है सरकार के अड़ियल रवैये से दुखी एक व्यापारी ने जब एक पत्रकार से खबर अच्छे से छापने की गुजारिश की तो इस पत्रकार का जवाब था पहले रिश्ता रखने वाले को अपने आंदोलन से बाहर करो फिर देखना हमारे यहां खबरें कैसे छपती है।

बुधवार, 5 मई 2010

सिर्फ अनुदान लेने से काम नहीं चलेगा...


छत्तीसगढ़ इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में हैं। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मचा हुआ है और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी पानी बचाने की अपील करते नहीं थक रहे हैं लेकिन राजधानी में ही उनके अपील का किस तरह धाियां उड़ाई जा रही है इससे वे शायद वाकिफ भी होंगे। गौरव पथ निर्माण के नाम पर ऐतिहासिक तेलीबांधा तालाब पाटा जा रहा है। यहां से मंदिर तक हटाई गई लेकिन गौरवपथ का निर्माण सड़क के दूसरी तरफ से चौड़ा कर तालाब बचाया जा सकता था। तेलीबांधा तालाब कहने को तो 42 एकड़ क्षेत्र में फैला है लेकिन वास्तविकता इससे परे है एक तरफ गौरवपथ के नाम पर तालाब पाटी जा रही है तो दूसरी ओर अवैध कब्जाधारियों ने इस ऐतिहासिक तालाब पर कब्जा कर रखा है। ऐसे में मुख्यमंत्री की करनी और कथनी में फर्क का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि राजधानी में सिर्फ यही एक तालाब पाटे जा रहे हैं आमापारा बाजार स्थित कारी तालाब भी पाटा जा रहा है। इस तालाब को पाट कर बिल्डिरों को बेची जाएगी और कांक्रीट का एक और महल तैयार कर लिया जाएगा। राजधानी में पानी की भीषण समस्या है। जलस्तर दिन ब दिन गिरता जा रहा है और ऐसे में तालाबों को पाटा जाना कहां तक उचित है। आखिर इसके पहले जो तालाब पाटे गए उससे आम लोगों का कितना भला हुआ है। एक तरफ सरकार से लेकर नाबार्ड तालाब खोदने पैसा दे रही है और दूसरी तरफ सरकार के नाक के नीचे राजधानी में तालाबों को संवारने की बजाए तालाबों से अवैध कब्जे हटाने की बजाय उसे पाटा जाना अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है।
छत्तीसगढ़ ही नहीं राजधानी में ही पर्यावरण को लेकर दो दर्जन से अधिक संस्थाएं कार्य कर रही है। ये लोग पोस्टर से लेकर वृक्षारोपण का भरपूर प्रचार करते हैं पानी बचाने आंदोलन का भी दावा करते है इसके बदले में इन संस्थाओं को सरकार अनुदान भी देती है लेकिन राजधानी में पाटी जा रही है तालाबों से इनका कोई लेना देना नहीं है। अवैध कब्जा होते तालाबों के मामले में हम यह मान लें कि यह विवादास्पद है इसलिए ये हाथ नहीं डालते लेकिन तालाब पाटने की घटना तो सरकारी स्तर पर हो रही है। शराब से लेकर बिल्डरों के आगे नतमस्तक सरकार से आम लोगों के जीवन बचाने की कल्पना बेमानी होने लगी है लेकिन सरकार से अनुदान लेकर पानी बचाने के लिए ताम-झाम कर रही संस्थाएं भी यदि खामोश बैठ गई तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।आज अप्रेल में पारा 44 के पार जा रहा है कल मार्च या फरवरी में जाने लगेगा तब आने वाली पीढ़ियों के लिए या अपने बच्चों के लिए कम से कम हमें सोचना होगा। वरना वर्तमान अंधेरगर्दी का खामियाजा पूरी पीढ़ी को भुगतना होगा।

अनुमति मिली नहीं कोल ब्लॉक 32 करोड़ में बेच दी...

भाजपा नेता का मामला सुर्खियों में
केन्द्र सरकार द्वारा 14 कोल ब्लाकों को अनापत्ति देने से मना करने से राय सरकार ही नहीं भाजपा के एक नेता की भी नींद उड़ गई है। इस नेता ने स्पंज आयरन के लिए कोल ब्लाक मांगा था लेकिन इसे उसने महाराष्ट्र की एक कंपनी को 32 करोड़ में बेच दिया था। अब केन्द्र सरकार द्वारा अनुमति नहीं देने से बवाल मच गया है।
उल्लेखनीय है कि राय सरकार की मांग पर केन्द्र के पर्यावरण मंत्रालय ने प्रदेश के 14 बड़े कोल ब्लाकों को अनापत्ति देने से साफ तौर पर मना कर दिया है। हालांकि इसकी वजह से दर्जनभर बिजली परियोजनाएं अटक गई है। पर्यावरण विभाग के इस रोड़े से राय सरकार में हड़कम्प तो मचा ही है कोल ब्लाक लेने वाले कई उद्योगपतियों में भी हड़कम्प मच गया है।
जिन कोल ब्लाकों को अनुमति नहीं मिली उनमें हाल ही में सीबीआई छापे का शिकार प्रकाश इण्ड्रस्ट्रीज के अलावा श्रीराधे इण्ड्रस्ट्रीज, अक्षय स्पात उद्योग, एमएसपी स्टील, शारदा एनर्जी, अल्ट्राटेक, सींघन इंटरप्राईजेस, नवभारत कोलफिल्ड, वंदना एनर्जी, अंजली स्टील शामिल है। बताया जाता है कि इनमें से एक कोल ब्लाक प्रदेश के एक भाजपा नेता को भी आबंटित किया था कहने को तो वे स्पंज आयरन के लिए कोल ब्लाक मांगा था और भाजपाई होने के कारण राय सरकार ने उन्हें आबंटित भी कर दिया था। लेकिन इस भाजपा नेता की मंशा का पता अभी चला जब केन्द्र की आपत्ति के बाद महाराष्ट्र की उस पार्टी ने अपने 32 करोड़ वापस मांगे।
कभी राजिम से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके इस भाजपा नेता ने जिस तरह से पर्यावरण का मुखौटा लगाया है उससे भी उनकी इस मंशा का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बताया जाता है कि अपनी पहुंच का फायदा उठाकर कोल ब्लाक महाराष्ट्र की कंपनी को 32 करोड़ में बेचे जाने की चर्चा जबरदस्त है और इसमें सरकार में एक मंत्री के शेयर की भी कहानी अब सामने आने लगी है।
बताया जाता है कि प्रदेश में पार्टी की सरकार होने का कई भाजपा नेता फायदा उठाने लगे हैं और कई खदानों में पार्टनर बनकर बैठ गए है या अनाप शनाप कीमत में बेच रहे हैं। इसी तरह अन्य कोल ब्लाक को लेकर भी कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि कई लोगों को सोची समझी रणनीति के तहत कोल ब्लाक दी जा रही थी।
बहरहाल भाजपा नेता के द्वारा महाराष्ट्र की कंपनी को 32 करोड़ में कोल ब्लाक बेचे जाने की यहां जमकर चर्चा है और कहा जा रहा है कि रुपए भी डकारे जा रहे हैं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर महाराष्ट्र की कंपनी को दो टूक भाषा में भगा दिया गया।

बहु को नहीं पकड़ पा रही पुलिस!

घोटालेबाजों का जमाना
महाधिवक्ता है सुराना - 7
छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग किस तरह से सरकार के आगे नतमस्तक है इसका उदाहरण श्रीमती चेतना सुराना के केस से समझा जा सकता है। कोर्ट में पेश करने के आदेश के बाद भी स्थानीय पुलिस को श्रीमती सुराना नहीं मिल पा रही है या वे दबाव में कार्रवाई नहीं कर रही है यह तो पुलिस महकमा ही जाने लेकिन इस मामले की चर्चा जोरों पर है कि शासन से सांठगांठ कर अपराधी आसानी से बच जाते हैं।
मंदिर की जमीन से लेकर आदिवासियों की जमीन हड़पने के आरोप में फंसे सुराना परिवार के ऊपर कई तरह के आरोप है उनके पार्टनर रह चुके कई लोगों ने तो सत्ता के दुरूपयोग का कई आरोप लगाया है। ऐसा ही मामला सुराना परिवार की बहु श्रीमती चेतना सुराना पर भी लगाया जा रहा है। बताया जाता है कि श्रीमती चेतना सुराना पति आनंद सुराना ने डीपी गांधी व अन्य के खिलाफ थाना गोल बाजार में आपराधिक प्रकरण 420, 467, 468, 471 एवं 34 भादवि के तहत मामला दर्ज करवाया था। प्रभावशाली होने के कारण गोलबाजार पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया लेकिन जांच में यह मामला झूठा पाया गया और न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया।इस संबंध में छत्तीसगढ़ शासन के पुलिस निदेशक की शिकायत जांच रिपोर्ट में कहा गया कि श्रीमती चेतना सुराना और उनके मुख्तयार पति आनंद सुराना को आभास था कि वे झूठी शिकायत कर रहे हैं फिर भी उसने प्रशासन को गुमराह करते हुए थाना स्तर पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर प्रकरण दर्ज कराया। इसके बाद थाना प्रभारी गोल बाजार ने श्रीमती चेतना सुराना के विरुध्द इस्तगासा 12009 अंतर्गत धारा 182, 211 के तहत दंडित कराने माननीय न्यायालय में पेश किया जहां वह उपस्थित नहीं हुई और पुलिस भी उसे पेश नहीं करा सकी। बहरहाल सुराना परिवार पर लग रहे आरोपों की कई तरह की चर्चा है और लोग आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि इतने आरोपों के बाद भी कोई महाधिवक्ता कैसे बन सकता है?

मंगलवार, 4 मई 2010

मुंबई घुमने पर्यटन मंडल की कार का उपयोगलाखों रुपयों का चूना लगाया


लगता है मुंबई में पर्यटन मंडल ने जो कार्यालय खोला है वह पर्यटन के प्रचार प्रसार की बजाय मंत्रियों और अधिकारियों की मित्र मंडलियों का ऐशगाह बनकर रह गया है। इसका ताजा उदाहरण मुंबई पर्यटन मंडल द्वारा टेक्सियों का बकाया बिल है जो 25 लाख से उपर बताया जा रहा है।छत्तीगढ़ शासन ने पर्यटन को बढ़ावा देने प्रदेश के बाहर भी पर्यटन मंडल का कार्यालय खोल रखा है इसमें से एक कार्यालय मुंबई में स्थित है। बताया जाता है कि जब से मुंबई में पर्यटन मंडल ने कार्यालय खोला है तभी से सरकार में बैठे अधिकारियों व मंत्रियों के मित्रों की निकल पड़ी है। आए दिन मुंबई घुमने वालों की बढ़ती संख्या से पर्यटन मंडल के कई अधिकारी हैरान है।बताया जाता है कि मुंबई कार्यालय के बढ़ते खर्चे को लेकर इसे बंद किए जाने की भी चर्चा हो चुकी है। लेकिन कुछ अधिकारी व कुछ मंत्रियों की वजह से मुंबई कार्यालय बंद किए जाने का मामला आगे नहीं बढ़ पाया। सूत्रों के मुताबिक मुंबई पर्यटन मंडल द्वारा छत्तीसगढ़ से पहुंचने वालों के लिए किराए की टैक्सियों का इंतजाम करने लगा है और यही खर्चा ही लाखों-करोड़ों में होने लगा है। हालांकि खर्चे विभागीय कार्य के बताए जा रहे हैं लेकिन कार में घुमने वाले किसी न किसी मंत्री या अधिकारी के सिफारिश के साथ पहुंचते हैं।बताया जाता है कि पिछले माह एक अधिकारी के रिश्तेदार ने 15 दिनों तक मुंबई का सैर किया और इस किराये की टैक्सी का खर्च पर्यटन मंडल के जिम्मे चला गया। लेकिन इस मामले की लीपापोती कर दी गई। इधर इस मामले में मुंबई कार्यालय में संजय जैन से बात की गई तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। बहरहाल पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर मुंबई में घुमने-फिरने वालों का खर्च उठाने का मामला तूल पकड़ने लगा है देखना है इस पर क्या कार्रवाई होती है।