मंत्री मेहरबान,अजय पहलवान
जिस व्यक्ति पर अपनी हवस के लिए कालगर्ल को कार से कुचलकर मार डालने का आरोप हो और जिसके दुग्ध संघ से पर्यटन मंडल में संविलियन को ही गलत माना जा रहा हो ऐसे अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंडल में पीआरओर बनना और मंत्री का करीबी कहलाना कहां तक उचित है।
छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल में चल रहे घपलेबाजी को डकैती की संज्ञा दी जाए तो कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब से बृजमोहन अग्रवाल ने पर्यटन विभाग संभाला है तभी से यह विभाग अपने कारनामों से सुर्खियों में रहा है। प्रचार प्रसार में माहिर पर्यटन मंडल में चल रहे डकैती की चर्चा तो अब आम हो चुकी है।
ऐसे में यहां हुई संविदा नियुक्ति की कहानी शर्मनाक है यही नहीं दुग्ध संघ के कर्मचारी अजय श्रीवास्तव को लेकर यह विभाग इन दिनों सुर्खियों में है। सुखर्िाें में रहने की वजह अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का करीबी होना है और कहा जाता है कि मंत्री की रूचि की वजह से ही अजय श्रीवास्तव को असंवैधानिक रुप से पर्यटन मंडल में लाया गया जबकि जिस पद पर उनकी नियुक्ति की गई अजय श्रीवास्तव तब उस पद की योग्यता ही नहीं रखते थे। लेकिन उच्चस्तरीय दबाव में वे पर्यटन मंडल पर बने हुए है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक अजय श्रीवास्तव की संविलियन को लेकर मामला न्यायालय तक भी पहुंच चुका है जहां पर्यटन मंडल के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि अजय श्रीवास्तव का संविलियन गलत ढंग से किया गया है। दुग्ध संघ से पुलिस फिर पर्यटन मंडल में कार्य करने की कहानी यहां पूरे शहर में चर्चा है। चर्चा इस बात की भी है कि अय्याशी के लिए हत्या जैसे मामले के आरोपी को किस तरह से राजनैतिक संरक्षण दिया जा रहा है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पर्यटन मंडल के इस पीआरओ की विभाग में तूती बोलती है और उच्च अधिकारी भी उनसे खौफ खाते हैं।
एक अधिकारी ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि इस सरकार में ऐसे कई मामले हैं जो उच्चस्तरीय राजनैतिक संरक्षण के कारण दबे हुए हैं। दूसरी तरफ इस मामले को लेकर आम लोगों में जो चर्चा है उससे सरकार की छवि पर असर पड़ रहा है। बहरहाल पर्यटन मंडल के पीआरओ अजय श्रीवास्तव को लेकर पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल घेरे में हैं और इस संबंध में पर्यटन मंत्री से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
सोमवार, 31 मई 2010
रविवार, 30 मई 2010
लूट या संतुष्टिकरण
छत्तीसगढ में लूट-खसोट की राजनीति ने यहां के सरकारी खजाने को खाली करना शुरु कर दिया है। तमाम विरोध के बाद भी डा. रमन सिंह ने आखिरकार निगम मंडलों में नियुक्ति कर अपने लोगों को उपकृत करना शुरु कर ही दिया।
निगम मंडलों में नियुक्तियां क्यों की जाती है यह किसी से छिपा नहीं है। राजनैतिक नियुक्तियां ने निगम-मंडलों को जिस तरह से लूटा है वह भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसी नियुक्यिां का हर बार विरोध तो होता है लेकिन संतुष्टिकरण की राजनीति ने ऐसे विरोध को किनारे किया है। डॉ. रमन सिंह भी विरोध के चलते नियुक्तियां टालते रहे लेकिन पहली खेप में 9 ऐसे लोगों को पुन: निगम-मंडलों के अध्यक्ष बना दिए गए जिनकी छवि को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। निगम-मंडलों को लुटने की ऐसी कोशिश अखिर बार-बार क्यों किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार की खबरें आ रही वह शर्मनाक है। रमन सरकार के पिछले कार्यकाल में भी निगम मंडलों में जमकर नियुक्तियां हुई थी और इनमें से दो-चार को छोड़ सभी ने खुलेआम डकैती डाली है। यही वजह है कि इस बार भी निगम-मंडल में की जा रही नियुक्तियां को लेकर भारी विरोध चल रहा था। सबसे यादा अंधेरगर्दी की कहानी तो ब्राम्हण विधायक बद्रीधर दीवान की नियुक्ति को लेकर हुई है। कहा जाता है कि मंत्री नहीं बनाने से नाराज ब्राम्हण समाज को खुश करने इस विधायक को औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है हालांकि चर्चा इस बात की भी रही कि उन्हें निगम मंडल में नियुक्ति करने को लेकर विरोध था। इसी तरह कुछ ऐसे लोगों को पुन: उसी पद पर बिठा दिया गया जिनके कार्यकाल का विवाद आज भी चर्चा में है। इनमें से कुछ ने तो सैकड़ों एकड़ जमीन बेनामी खरीदी है। निगम मंडलों की ऐसी नियुक्तियां जिसका उद्देश्य सिर्फ लूट-खसोट हो अंधेरगर्दी से कम नहीं है।
निगम मंडलों में नियुक्तियां क्यों की जाती है यह किसी से छिपा नहीं है। राजनैतिक नियुक्तियां ने निगम-मंडलों को जिस तरह से लूटा है वह भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसी नियुक्यिां का हर बार विरोध तो होता है लेकिन संतुष्टिकरण की राजनीति ने ऐसे विरोध को किनारे किया है। डॉ. रमन सिंह भी विरोध के चलते नियुक्तियां टालते रहे लेकिन पहली खेप में 9 ऐसे लोगों को पुन: निगम-मंडलों के अध्यक्ष बना दिए गए जिनकी छवि को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। निगम-मंडलों को लुटने की ऐसी कोशिश अखिर बार-बार क्यों किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार की खबरें आ रही वह शर्मनाक है। रमन सरकार के पिछले कार्यकाल में भी निगम मंडलों में जमकर नियुक्तियां हुई थी और इनमें से दो-चार को छोड़ सभी ने खुलेआम डकैती डाली है। यही वजह है कि इस बार भी निगम-मंडल में की जा रही नियुक्तियां को लेकर भारी विरोध चल रहा था। सबसे यादा अंधेरगर्दी की कहानी तो ब्राम्हण विधायक बद्रीधर दीवान की नियुक्ति को लेकर हुई है। कहा जाता है कि मंत्री नहीं बनाने से नाराज ब्राम्हण समाज को खुश करने इस विधायक को औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है हालांकि चर्चा इस बात की भी रही कि उन्हें निगम मंडल में नियुक्ति करने को लेकर विरोध था। इसी तरह कुछ ऐसे लोगों को पुन: उसी पद पर बिठा दिया गया जिनके कार्यकाल का विवाद आज भी चर्चा में है। इनमें से कुछ ने तो सैकड़ों एकड़ जमीन बेनामी खरीदी है। निगम मंडलों की ऐसी नियुक्तियां जिसका उद्देश्य सिर्फ लूट-खसोट हो अंधेरगर्दी से कम नहीं है।
शनिवार, 29 मई 2010
सजा के जिश्म न बेचे तो और क्या बेंचे,गरीब लोग हैं घर में दूकान रखते हैं
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के मायने बदलते जा रहे हैं। रोज प्रकाशित हो रहे नए-नए अखबारों की अपनी कहानी है और इन कहानियों का आखरी अध्याय सरकारी विज्ञापनों की लूट खसोट में ही समाप्त हो जाता है। इस बात को जनसंपर्क विभाग भी भली भांति जानता है इसलिए वह भी वही सब कुछ करता है जो अखबारों पर लगाम कस सके। जनसंपर्क विभाग को खुश करने में ही अखबारों का समय निकल जाता है और पत्रकारिता का मतलब अब सिर्फ सूचना तंत्र ही रह गया है। खोजी पत्रकारिता को तो जैसे सांप सूंघ गया है और सिर्फ सजावट पर ध्यान अधिक दिया जाने लगा है।
पिछले दिनों शिवनाथ बचाने की घोषणा करते हुए जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने फावड़ा चलाया तो अखबार वालों ने इसे इतनी प्राथमिकता दी जैसे सरकार अब पानी बचाने की कोई ठोस कार्ययोजना बना चुकी है लेकिन दुख की बात यह है कि जब डॉ. रमन पानी बचाने शिवनाथ पर फावड़ा चला रहे थे तब उसी दौरान गौरवपथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब के पाटे जाने या मंत्री की कीमती जमीन के लिए आमापारा स्थित कारी तालाब को पाटे जाने की खबर गायब थी। जब राय नहीं बना था तब ऐसी खबरें जरूर लगती लेकिन सरकारी विज्ञापन के मोह में अखबारों को ऐसा सजाने की होड़ मची है कि मंत्री अफसर नाराज न हो। यही वजह है कि अब शहर के कई अखबारों में पत्रकारों की स्थिति विज्ञापन या प्रसार विभाग के सबसे छोटे कर्मचारियों से भी दयनीय है।
और अंत में....
एक मंत्री के विभाग में हो रहे गड़बड़ी की खबर छापने के बाद जब एक अखबार नवीस विज्ञापन लेने जनसंपर्क विभाग पहुंचा तो उसे वहां के अधिकारियों ने समझाईश देते हुए कहा कि पहले इस खबर का खंडन करों तभी विज्ञापन मिलेंगे।
पिछले दिनों शिवनाथ बचाने की घोषणा करते हुए जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने फावड़ा चलाया तो अखबार वालों ने इसे इतनी प्राथमिकता दी जैसे सरकार अब पानी बचाने की कोई ठोस कार्ययोजना बना चुकी है लेकिन दुख की बात यह है कि जब डॉ. रमन पानी बचाने शिवनाथ पर फावड़ा चला रहे थे तब उसी दौरान गौरवपथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब के पाटे जाने या मंत्री की कीमती जमीन के लिए आमापारा स्थित कारी तालाब को पाटे जाने की खबर गायब थी। जब राय नहीं बना था तब ऐसी खबरें जरूर लगती लेकिन सरकारी विज्ञापन के मोह में अखबारों को ऐसा सजाने की होड़ मची है कि मंत्री अफसर नाराज न हो। यही वजह है कि अब शहर के कई अखबारों में पत्रकारों की स्थिति विज्ञापन या प्रसार विभाग के सबसे छोटे कर्मचारियों से भी दयनीय है।
और अंत में....
एक मंत्री के विभाग में हो रहे गड़बड़ी की खबर छापने के बाद जब एक अखबार नवीस विज्ञापन लेने जनसंपर्क विभाग पहुंचा तो उसे वहां के अधिकारियों ने समझाईश देते हुए कहा कि पहले इस खबर का खंडन करों तभी विज्ञापन मिलेंगे।
क्रेशरों को छूट, खदानों में लूट , स्क्वाड को भी जाता है महिना
रायपुर जिले में खनिज से लाखों रुपए के राजस्व का चूना लगा रहे खनिज अधिकारियों ने मंजीत, शर्मा, कुलदीप जैसे लोगों के चल रहे अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उनसे अवैध वसूली कर अपनी जेबें गरम कर रहे हैं जबकि अवैध कार्यों में लिप्त लोग यह दावा करते नहीं थकते कि उनके द्वारा स्क्वाड तक को पैसा दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभाग की यह कहानी नई नहीं है। कहानी का नयापन यह है कि इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। खनिज विभाग में चल रहे लूट-खसोट को लेकर रोज नई कहानी सामने आने लगी है। सालों से राजधानी में पदस्थ अफसरों के वरदहस्त ने अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन करने वालों को इतना ताकतवार बना दिया है कि कई कर्मचारी तो कार्रवाई करने तक से डरते हैं।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि जिले में दर्जनभर से अधिक क्रेशर अवैध ढंग से संचालित है और इन अवैध क्रेशरों के एवज में अधिकारियों को बड़ी रकम भी मिलती है। हालत यह है कि अवैध क्रेशर के संचालन से हर साल सरकार को लाखों-करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि हो रही है इसके बाद भी इन अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना आश्चर्यजनक है।
बताया जाता है कि खनिज विभाग में बैठे कई अधिकारियों के संरक्षण में हो रहे अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन से होने वाली अवैध कमाई इतनी यादा है कि ऊपर तक एक बड़ी रकम पहुंचाई जाती है इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही है। बहरहाल खनिज विभाग के लूट खसोट की शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद कार्रवाई नहीं होते देख कई लोग आश्चर्यचकित हैं।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभाग की यह कहानी नई नहीं है। कहानी का नयापन यह है कि इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। खनिज विभाग में चल रहे लूट-खसोट को लेकर रोज नई कहानी सामने आने लगी है। सालों से राजधानी में पदस्थ अफसरों के वरदहस्त ने अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन करने वालों को इतना ताकतवार बना दिया है कि कई कर्मचारी तो कार्रवाई करने तक से डरते हैं।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि जिले में दर्जनभर से अधिक क्रेशर अवैध ढंग से संचालित है और इन अवैध क्रेशरों के एवज में अधिकारियों को बड़ी रकम भी मिलती है। हालत यह है कि अवैध क्रेशर के संचालन से हर साल सरकार को लाखों-करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि हो रही है इसके बाद भी इन अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना आश्चर्यजनक है।
बताया जाता है कि खनिज विभाग में बैठे कई अधिकारियों के संरक्षण में हो रहे अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन से होने वाली अवैध कमाई इतनी यादा है कि ऊपर तक एक बड़ी रकम पहुंचाई जाती है इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही है। बहरहाल खनिज विभाग के लूट खसोट की शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद कार्रवाई नहीं होते देख कई लोग आश्चर्यचकित हैं।
शुक्रवार, 28 मई 2010
सरकार कहां है...
छत्तीसगढ़ के लोग इन दिनों चौतरफा मार झेल रहे है। एक समूचा इलाका आतंकवादियों से त्रस्त है तो पुलिस विभाग इस इलाके में नौकरी करना पसंद नहीं करता। राजधानी सहित छत्तीसगढ़ का शहरी क्षेत्र पानी के लिए तरस रहा है और किसानों की हालत बद से बदतर होते जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
सरकार कहां है...
छत्तीसगढ़ के लोग इन दिनों चौतरफा मार झेल रहे है। एक समूचा इलाका आतंकवादियों से त्रस्त है तो पुलिस विभाग इस इलाके में नौकरी करना पसंद नहीं करता। राजधानी सहित छत्तीसगढ़ का शहरी क्षेत्र पानी के लिए तरस रहा है और किसानों की हालत बद से बदतर होते जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
गुरुवार, 27 मई 2010
मुख्यमंत्री के नाक के नीचे घपलेबाजी , आडिटर ने संवाद की गड़बड़ी खोली
प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह भले ही अपने को कितना ही पाक-साफ बता लें लेकिन उनके अपने ही विभाग संवाद में जिस तरह से करोड़ों रुपए की घपलेबाजी की गई है उसका खुलासा आडिट रिपोर्ट से हो रहा है और अब तो सीधे मुख्यमंत्री पर उंगली उठाई जाने लगी है और कहा जा रहा है कि सरकारी खजाने को लुटने की इस साजिश में डॉ. रमन सिंह भी साथ में हैं।
छत्तीसगढ़ संवाद और जनसंपर्क में लूट खसोट की घटना नई नहीं है संवाद बनते ही जिस तरह से किराये के भवन के नाम पर सरकारी खजानों को लुटा गया वह किसी से छिपा नहीं है तब से आज तक संवाद का प्रभार सुखदेव कुरोटी के पास है कभी विज्ञापन के कमीशन तो कभी प्रचार सामग्री में घपलेबाजी को लेकर चर्च में रहे संवाद में इन दिनों इस बात की भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल सरकार को सौ करोड़ से ऊपर का चुना लगाया जा रहा है।
ताजा मामला संवाद के चाटर्ड एकाउण्टेन्ट योति अग्रवाल एंड कंपनी की रिपोर्ट है सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई इस रिपोर्ट में सी.ए. ने संवाद में चल रहे गड़बड़ियों का खुलासा किया है। संवाद के फिल्म सेक्शन में ही करोड़ों रुपए की गड़बड़ी की ओर इशारा किया गया है। बिल नम्बर 661 और 874 में नवा अंजोर को ढाई लाख और 15 लाख का भुगतान किया गया है। यह डाकुमेंट्री फिल्म बनाने संजीवनी एग्रो विजन इंटरप्राइजेस को दिया गया जो एक कलेक्टर के साले की बताई जाती है। इस पर सीए ने आपत्ति की है।
सूत्रों ने बताया कि इस मामले में संवाद ने न तो डीएवीपी रेट का ही ध्यान रखा। बताया जाता है कि कलेक्टर की सिफारिश पर ही गई इस कार्य की गुणवत्ता भी खराब रही है और इसे लेकर विवाद भी हो चुका है। सीए ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि जब यह संस्था रजिस्ट्रर्ड ही नहीं था तब इसे किस तरह से इतनी बड़ी राशि का काम दिया गया और भुगतान किया गया।
बताया जाता है कि संवाद में इस घपलेबाजी की चर्चा जोरों पर है और अधिकारियों की मुख्यमंत्री से सेटिंग की बात भी कही जा रही है। बहरहाल संवाद में घपलेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है और इस लूट-खसोट में उच्च स्तरीय मिलीभगत को लेकर आम लोगों में कई तरह की चर्चा है।
छत्तीसगढ़ संवाद और जनसंपर्क में लूट खसोट की घटना नई नहीं है संवाद बनते ही जिस तरह से किराये के भवन के नाम पर सरकारी खजानों को लुटा गया वह किसी से छिपा नहीं है तब से आज तक संवाद का प्रभार सुखदेव कुरोटी के पास है कभी विज्ञापन के कमीशन तो कभी प्रचार सामग्री में घपलेबाजी को लेकर चर्च में रहे संवाद में इन दिनों इस बात की भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल सरकार को सौ करोड़ से ऊपर का चुना लगाया जा रहा है।
ताजा मामला संवाद के चाटर्ड एकाउण्टेन्ट योति अग्रवाल एंड कंपनी की रिपोर्ट है सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई इस रिपोर्ट में सी.ए. ने संवाद में चल रहे गड़बड़ियों का खुलासा किया है। संवाद के फिल्म सेक्शन में ही करोड़ों रुपए की गड़बड़ी की ओर इशारा किया गया है। बिल नम्बर 661 और 874 में नवा अंजोर को ढाई लाख और 15 लाख का भुगतान किया गया है। यह डाकुमेंट्री फिल्म बनाने संजीवनी एग्रो विजन इंटरप्राइजेस को दिया गया जो एक कलेक्टर के साले की बताई जाती है। इस पर सीए ने आपत्ति की है।
सूत्रों ने बताया कि इस मामले में संवाद ने न तो डीएवीपी रेट का ही ध्यान रखा। बताया जाता है कि कलेक्टर की सिफारिश पर ही गई इस कार्य की गुणवत्ता भी खराब रही है और इसे लेकर विवाद भी हो चुका है। सीए ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि जब यह संस्था रजिस्ट्रर्ड ही नहीं था तब इसे किस तरह से इतनी बड़ी राशि का काम दिया गया और भुगतान किया गया।
बताया जाता है कि संवाद में इस घपलेबाजी की चर्चा जोरों पर है और अधिकारियों की मुख्यमंत्री से सेटिंग की बात भी कही जा रही है। बहरहाल संवाद में घपलेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है और इस लूट-खसोट में उच्च स्तरीय मिलीभगत को लेकर आम लोगों में कई तरह की चर्चा है।
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