छत्तीसगढ़ की भाजपाई राजनीति में धीरे-धीरे कब्जा जमा रहे सूर्या फाउण्डेशन को लेकर आम भाजपाईयों में नाराजगी तो है लेकिन वे इसके पीछे सौदान सिंह का हाथ होने की चर्चा की वजह से खामोश है। हालत यह है कि असंतुष्ट भाजपाईयों ने सूर्या फाउण्डेशन के लोगों के खिलाफ रणनीति बनाने जुट गए हैं।
वैसे तो सूर्या फाउण्डेशन का गठन 18 साल पहले हुआ था लेकिन छत्तीसगढ़ में यह तब सक्रिय हुआ जब यहां भाजपा की सरकार बनी। कहा जाता है कि सूर्या फाउण्डेशन के प्रशिक्षित युवकों को यहां लाने का काम भाजपा के दमदार नेता सौदान सिंह ने किया। एक तरह से इसे सौदान सिंह का निजी जासूस भी कहा जाने लगा है।
बताया जाता है कि इन युवकों को सुनियोजित ढंग से छत्तीसगढ़ के सभी भाजपा कार्यालयों में ही नहीं बल्कि भाजपाई मंत्री व विधायकों के बंगलों पर भी काम पर लगाया गया है। नेताओं पर लगाम कसने की रणनीति ने सौदान सिंह को ताकतवर बनाया है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक राजधानी के एकात्म परिसर में इन दिनों सूर्या फाउण्डेशन से जुड़े युवाओं का भारी दबदबा है और कहा जाता है कि मीडिया विभाग से लेकर कार्यालय चलाने और भोजन कक्ष में भी इनकी जबरदस्त घुसपैठ है। किस नेता को क्या बोलना है कितना बोलना है यह निर्देश भी यही से आने की चर्चा है।
दूसरी तरफ इस नए व्यवस्था से स्थानीय भाजपाईयों में जबरदस्त रोष व्याप्त है। कहा जाता है कि एकात्म परिसर में आधा दर्जन युवा सालों से काम कर रहे हैं उन्हें नए-नए तरीके से प्रताड़ित किए जाने की चर्चा है। कहा जाता है कि यहां काम करने वाले लोग पहले यहां काम की अधिकता पर भोजन वगैरह कर लेते थे इस पर अब प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसी तरह कई मामलों में उन पर दबाव डाला जाता है। बताया जाता है कि इस बात का दुखड़ा यहां आए दिन सुना जा सकता है।
बताया जाता है कि एकात्म परिसर आने वाले भाजपाईयों के साथ भी इनका कई बार विवाद हो चुका है कौन कहां तक जाएगा यह भी यही लोग तय करते हैं। बहरहाल चर्चा के पीछे सौदान सिंह का हाथ होने की खबर ने स्थानीय नेताओ के मुंह में ताला जड़ दिया है जो कभी भी विस्फोटक रुप ले सकती है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
गुरुवार, 3 जून 2010
बुधवार, 2 जून 2010
उद्योगपति है भाता , अपराध से है नाता
एसईसीएल के सीएमडी एम.पी. दीक्षित रिश्वत लेते गिरफ्तार क्या हुए सारा संसार बताने वाले एक अखबार के मालिक की पोल खुलने लगी है। शराब के धंधे से अखबार के धंधे होते हुए लोहे के धंधे में आए इस अखबार मालिक का संबंध हीरा ग्र्ुप से बताया जा रहा है और यह खबर सच है तो अखबार जगत की यह सबसे अनोखी खबर होगी।
हालांकि अपराधियों के द्वारा अखबार के धंधे में पर्दापण नया नहीं है लेकिन अखबार के दबाव में खदानें से लेकर कीमती जमीनें डकारने की कहानियां आम चर्चा में आने लगी है जो पत्रकारिता के लिहाज से उचित नहीं माना जाता। छत्तीसगढ़ में ऐसी पत्रकारिता को कभी भी जगह नहीं मिली जो सरकारी विज्ञापन के लिए सरकार की गोद में जा बैठे हो या अपराध जगत से आकर अखबार निकाल रहे हो। लेकिन समय के साथ बदलाव जरूर आया है और ऐसे लोगों की घुसपैठ भी हुई है। रायपुर में ही ऐसे कुछ अखबार निकाले जा रहे हैं जिनके धंधे कुछ और हैं और इन धंधों को संरक्षण देने अखबार निकाले जा रहे हैं।
और अंत में...
संवाद में एक अधिकारी के पुत्र की शादी का खर्चा निकालने की कई तरह की चर्चा है। इन चर्चाओं में सबसे बड़ी चर्चा बगैर विज्ञापन के आधा दर्जन लोगों की संविदा नियुक्ति से हुई कमाई को लेकर है।
हालांकि अपराधियों के द्वारा अखबार के धंधे में पर्दापण नया नहीं है लेकिन अखबार के दबाव में खदानें से लेकर कीमती जमीनें डकारने की कहानियां आम चर्चा में आने लगी है जो पत्रकारिता के लिहाज से उचित नहीं माना जाता। छत्तीसगढ़ में ऐसी पत्रकारिता को कभी भी जगह नहीं मिली जो सरकारी विज्ञापन के लिए सरकार की गोद में जा बैठे हो या अपराध जगत से आकर अखबार निकाल रहे हो। लेकिन समय के साथ बदलाव जरूर आया है और ऐसे लोगों की घुसपैठ भी हुई है। रायपुर में ही ऐसे कुछ अखबार निकाले जा रहे हैं जिनके धंधे कुछ और हैं और इन धंधों को संरक्षण देने अखबार निकाले जा रहे हैं।
और अंत में...
संवाद में एक अधिकारी के पुत्र की शादी का खर्चा निकालने की कई तरह की चर्चा है। इन चर्चाओं में सबसे बड़ी चर्चा बगैर विज्ञापन के आधा दर्जन लोगों की संविदा नियुक्ति से हुई कमाई को लेकर है।
मंगलवार, 1 जून 2010
संवाद में करोड़ों की घपलेबाजी
घपलों की कहानी
आडिट की जुबानी
सालों से जमें अफसर किस तरह का खेल खेलकर लाखों-करोड़ों की घपलेबाजी करते हैं यह देखना हो तो आडिट रिपोर्ट देखी जा सकती है। नियम कानून ताक पर रखकर सरकारी प्रचार के लिए जिस तरह से कमीशन देने वालों को करोड़ों रुपए बांटे गए वह आश्चर्यजनक इसलिए है क्योंकि इस विभाग के मुखिया डॉ. रमन सिंह है जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं।
पिछली बार संजीवनी एग्रोविजन इंटरप्राइजेस को किए गए भुगतान पर आडिट आपत्ति की खबर प्रकाशित किया था। इस बार ऐसे ही संवाद के कारनामें प्रकाशित किए जा रहे हैं। जिसके भुगतान पर आपत्ति की गई है। जनसंपर्क विभाग ने संवाद के माध्यम से रमन सरकार के चार साल पूरे होने पर विज्ञापन जारी किया था। इसके निर्माण व प्रसारण के लिए संवाद ने न तो कोई निविदा ही बुलाई और न ही किसी तरह का कोटेशन ही मंगाया। यही नहीं यह काम 1 लाख रुपए पर सेकण्ड के हिसाब से टीवी स्पॉट के लिए भुगतान किया गया वह भी 30 से 60 सेकेण्ड समय का भुगतान किया गया यह भुगतान बीएसआर फिल्म को किया गया। इसके लिए न तो किसी तरह के नियम बनाए गए और न ही कोई मापदंड ही तय किया गया।
यह बीएसआर फिल्म को लेकर भी कई तरह की चर्चा है। बहरहाल संवाद में चल रहे घपलेबाजी की वजह सालों से बैठे अधिकारियों की कमीशनखोरी में रूचि को बताया जा रहा है।
आडिट की जुबानी
सालों से जमें अफसर किस तरह का खेल खेलकर लाखों-करोड़ों की घपलेबाजी करते हैं यह देखना हो तो आडिट रिपोर्ट देखी जा सकती है। नियम कानून ताक पर रखकर सरकारी प्रचार के लिए जिस तरह से कमीशन देने वालों को करोड़ों रुपए बांटे गए वह आश्चर्यजनक इसलिए है क्योंकि इस विभाग के मुखिया डॉ. रमन सिंह है जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं।
पिछली बार संजीवनी एग्रोविजन इंटरप्राइजेस को किए गए भुगतान पर आडिट आपत्ति की खबर प्रकाशित किया था। इस बार ऐसे ही संवाद के कारनामें प्रकाशित किए जा रहे हैं। जिसके भुगतान पर आपत्ति की गई है। जनसंपर्क विभाग ने संवाद के माध्यम से रमन सरकार के चार साल पूरे होने पर विज्ञापन जारी किया था। इसके निर्माण व प्रसारण के लिए संवाद ने न तो कोई निविदा ही बुलाई और न ही किसी तरह का कोटेशन ही मंगाया। यही नहीं यह काम 1 लाख रुपए पर सेकण्ड के हिसाब से टीवी स्पॉट के लिए भुगतान किया गया वह भी 30 से 60 सेकेण्ड समय का भुगतान किया गया यह भुगतान बीएसआर फिल्म को किया गया। इसके लिए न तो किसी तरह के नियम बनाए गए और न ही कोई मापदंड ही तय किया गया।
यह बीएसआर फिल्म को लेकर भी कई तरह की चर्चा है। बहरहाल संवाद में चल रहे घपलेबाजी की वजह सालों से बैठे अधिकारियों की कमीशनखोरी में रूचि को बताया जा रहा है।
सोमवार, 31 मई 2010
पर्यटन के नाम पर डकैती
मंत्री मेहरबान,अजय पहलवान
जिस व्यक्ति पर अपनी हवस के लिए कालगर्ल को कार से कुचलकर मार डालने का आरोप हो और जिसके दुग्ध संघ से पर्यटन मंडल में संविलियन को ही गलत माना जा रहा हो ऐसे अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंडल में पीआरओर बनना और मंत्री का करीबी कहलाना कहां तक उचित है।
छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल में चल रहे घपलेबाजी को डकैती की संज्ञा दी जाए तो कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब से बृजमोहन अग्रवाल ने पर्यटन विभाग संभाला है तभी से यह विभाग अपने कारनामों से सुर्खियों में रहा है। प्रचार प्रसार में माहिर पर्यटन मंडल में चल रहे डकैती की चर्चा तो अब आम हो चुकी है।
ऐसे में यहां हुई संविदा नियुक्ति की कहानी शर्मनाक है यही नहीं दुग्ध संघ के कर्मचारी अजय श्रीवास्तव को लेकर यह विभाग इन दिनों सुर्खियों में है। सुखर्िाें में रहने की वजह अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का करीबी होना है और कहा जाता है कि मंत्री की रूचि की वजह से ही अजय श्रीवास्तव को असंवैधानिक रुप से पर्यटन मंडल में लाया गया जबकि जिस पद पर उनकी नियुक्ति की गई अजय श्रीवास्तव तब उस पद की योग्यता ही नहीं रखते थे। लेकिन उच्चस्तरीय दबाव में वे पर्यटन मंडल पर बने हुए है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक अजय श्रीवास्तव की संविलियन को लेकर मामला न्यायालय तक भी पहुंच चुका है जहां पर्यटन मंडल के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि अजय श्रीवास्तव का संविलियन गलत ढंग से किया गया है। दुग्ध संघ से पुलिस फिर पर्यटन मंडल में कार्य करने की कहानी यहां पूरे शहर में चर्चा है। चर्चा इस बात की भी है कि अय्याशी के लिए हत्या जैसे मामले के आरोपी को किस तरह से राजनैतिक संरक्षण दिया जा रहा है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पर्यटन मंडल के इस पीआरओ की विभाग में तूती बोलती है और उच्च अधिकारी भी उनसे खौफ खाते हैं।
एक अधिकारी ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि इस सरकार में ऐसे कई मामले हैं जो उच्चस्तरीय राजनैतिक संरक्षण के कारण दबे हुए हैं। दूसरी तरफ इस मामले को लेकर आम लोगों में जो चर्चा है उससे सरकार की छवि पर असर पड़ रहा है। बहरहाल पर्यटन मंडल के पीआरओ अजय श्रीवास्तव को लेकर पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल घेरे में हैं और इस संबंध में पर्यटन मंत्री से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे।
जिस व्यक्ति पर अपनी हवस के लिए कालगर्ल को कार से कुचलकर मार डालने का आरोप हो और जिसके दुग्ध संघ से पर्यटन मंडल में संविलियन को ही गलत माना जा रहा हो ऐसे अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंडल में पीआरओर बनना और मंत्री का करीबी कहलाना कहां तक उचित है।
छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल में चल रहे घपलेबाजी को डकैती की संज्ञा दी जाए तो कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब से बृजमोहन अग्रवाल ने पर्यटन विभाग संभाला है तभी से यह विभाग अपने कारनामों से सुर्खियों में रहा है। प्रचार प्रसार में माहिर पर्यटन मंडल में चल रहे डकैती की चर्चा तो अब आम हो चुकी है।
ऐसे में यहां हुई संविदा नियुक्ति की कहानी शर्मनाक है यही नहीं दुग्ध संघ के कर्मचारी अजय श्रीवास्तव को लेकर यह विभाग इन दिनों सुर्खियों में है। सुखर्िाें में रहने की वजह अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का करीबी होना है और कहा जाता है कि मंत्री की रूचि की वजह से ही अजय श्रीवास्तव को असंवैधानिक रुप से पर्यटन मंडल में लाया गया जबकि जिस पद पर उनकी नियुक्ति की गई अजय श्रीवास्तव तब उस पद की योग्यता ही नहीं रखते थे। लेकिन उच्चस्तरीय दबाव में वे पर्यटन मंडल पर बने हुए है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक अजय श्रीवास्तव की संविलियन को लेकर मामला न्यायालय तक भी पहुंच चुका है जहां पर्यटन मंडल के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि अजय श्रीवास्तव का संविलियन गलत ढंग से किया गया है। दुग्ध संघ से पुलिस फिर पर्यटन मंडल में कार्य करने की कहानी यहां पूरे शहर में चर्चा है। चर्चा इस बात की भी है कि अय्याशी के लिए हत्या जैसे मामले के आरोपी को किस तरह से राजनैतिक संरक्षण दिया जा रहा है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पर्यटन मंडल के इस पीआरओ की विभाग में तूती बोलती है और उच्च अधिकारी भी उनसे खौफ खाते हैं।
एक अधिकारी ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि इस सरकार में ऐसे कई मामले हैं जो उच्चस्तरीय राजनैतिक संरक्षण के कारण दबे हुए हैं। दूसरी तरफ इस मामले को लेकर आम लोगों में जो चर्चा है उससे सरकार की छवि पर असर पड़ रहा है। बहरहाल पर्यटन मंडल के पीआरओ अजय श्रीवास्तव को लेकर पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल घेरे में हैं और इस संबंध में पर्यटन मंत्री से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे।
रविवार, 30 मई 2010
लूट या संतुष्टिकरण
छत्तीसगढ में लूट-खसोट की राजनीति ने यहां के सरकारी खजाने को खाली करना शुरु कर दिया है। तमाम विरोध के बाद भी डा. रमन सिंह ने आखिरकार निगम मंडलों में नियुक्ति कर अपने लोगों को उपकृत करना शुरु कर ही दिया।
निगम मंडलों में नियुक्तियां क्यों की जाती है यह किसी से छिपा नहीं है। राजनैतिक नियुक्तियां ने निगम-मंडलों को जिस तरह से लूटा है वह भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसी नियुक्यिां का हर बार विरोध तो होता है लेकिन संतुष्टिकरण की राजनीति ने ऐसे विरोध को किनारे किया है। डॉ. रमन सिंह भी विरोध के चलते नियुक्तियां टालते रहे लेकिन पहली खेप में 9 ऐसे लोगों को पुन: निगम-मंडलों के अध्यक्ष बना दिए गए जिनकी छवि को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। निगम-मंडलों को लुटने की ऐसी कोशिश अखिर बार-बार क्यों किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार की खबरें आ रही वह शर्मनाक है। रमन सरकार के पिछले कार्यकाल में भी निगम मंडलों में जमकर नियुक्तियां हुई थी और इनमें से दो-चार को छोड़ सभी ने खुलेआम डकैती डाली है। यही वजह है कि इस बार भी निगम-मंडल में की जा रही नियुक्तियां को लेकर भारी विरोध चल रहा था। सबसे यादा अंधेरगर्दी की कहानी तो ब्राम्हण विधायक बद्रीधर दीवान की नियुक्ति को लेकर हुई है। कहा जाता है कि मंत्री नहीं बनाने से नाराज ब्राम्हण समाज को खुश करने इस विधायक को औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है हालांकि चर्चा इस बात की भी रही कि उन्हें निगम मंडल में नियुक्ति करने को लेकर विरोध था। इसी तरह कुछ ऐसे लोगों को पुन: उसी पद पर बिठा दिया गया जिनके कार्यकाल का विवाद आज भी चर्चा में है। इनमें से कुछ ने तो सैकड़ों एकड़ जमीन बेनामी खरीदी है। निगम मंडलों की ऐसी नियुक्तियां जिसका उद्देश्य सिर्फ लूट-खसोट हो अंधेरगर्दी से कम नहीं है।
निगम मंडलों में नियुक्तियां क्यों की जाती है यह किसी से छिपा नहीं है। राजनैतिक नियुक्तियां ने निगम-मंडलों को जिस तरह से लूटा है वह भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसी नियुक्यिां का हर बार विरोध तो होता है लेकिन संतुष्टिकरण की राजनीति ने ऐसे विरोध को किनारे किया है। डॉ. रमन सिंह भी विरोध के चलते नियुक्तियां टालते रहे लेकिन पहली खेप में 9 ऐसे लोगों को पुन: निगम-मंडलों के अध्यक्ष बना दिए गए जिनकी छवि को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। निगम-मंडलों को लुटने की ऐसी कोशिश अखिर बार-बार क्यों किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार की खबरें आ रही वह शर्मनाक है। रमन सरकार के पिछले कार्यकाल में भी निगम मंडलों में जमकर नियुक्तियां हुई थी और इनमें से दो-चार को छोड़ सभी ने खुलेआम डकैती डाली है। यही वजह है कि इस बार भी निगम-मंडल में की जा रही नियुक्तियां को लेकर भारी विरोध चल रहा था। सबसे यादा अंधेरगर्दी की कहानी तो ब्राम्हण विधायक बद्रीधर दीवान की नियुक्ति को लेकर हुई है। कहा जाता है कि मंत्री नहीं बनाने से नाराज ब्राम्हण समाज को खुश करने इस विधायक को औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है हालांकि चर्चा इस बात की भी रही कि उन्हें निगम मंडल में नियुक्ति करने को लेकर विरोध था। इसी तरह कुछ ऐसे लोगों को पुन: उसी पद पर बिठा दिया गया जिनके कार्यकाल का विवाद आज भी चर्चा में है। इनमें से कुछ ने तो सैकड़ों एकड़ जमीन बेनामी खरीदी है। निगम मंडलों की ऐसी नियुक्तियां जिसका उद्देश्य सिर्फ लूट-खसोट हो अंधेरगर्दी से कम नहीं है।
शनिवार, 29 मई 2010
सजा के जिश्म न बेचे तो और क्या बेंचे,गरीब लोग हैं घर में दूकान रखते हैं
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के मायने बदलते जा रहे हैं। रोज प्रकाशित हो रहे नए-नए अखबारों की अपनी कहानी है और इन कहानियों का आखरी अध्याय सरकारी विज्ञापनों की लूट खसोट में ही समाप्त हो जाता है। इस बात को जनसंपर्क विभाग भी भली भांति जानता है इसलिए वह भी वही सब कुछ करता है जो अखबारों पर लगाम कस सके। जनसंपर्क विभाग को खुश करने में ही अखबारों का समय निकल जाता है और पत्रकारिता का मतलब अब सिर्फ सूचना तंत्र ही रह गया है। खोजी पत्रकारिता को तो जैसे सांप सूंघ गया है और सिर्फ सजावट पर ध्यान अधिक दिया जाने लगा है।
पिछले दिनों शिवनाथ बचाने की घोषणा करते हुए जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने फावड़ा चलाया तो अखबार वालों ने इसे इतनी प्राथमिकता दी जैसे सरकार अब पानी बचाने की कोई ठोस कार्ययोजना बना चुकी है लेकिन दुख की बात यह है कि जब डॉ. रमन पानी बचाने शिवनाथ पर फावड़ा चला रहे थे तब उसी दौरान गौरवपथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब के पाटे जाने या मंत्री की कीमती जमीन के लिए आमापारा स्थित कारी तालाब को पाटे जाने की खबर गायब थी। जब राय नहीं बना था तब ऐसी खबरें जरूर लगती लेकिन सरकारी विज्ञापन के मोह में अखबारों को ऐसा सजाने की होड़ मची है कि मंत्री अफसर नाराज न हो। यही वजह है कि अब शहर के कई अखबारों में पत्रकारों की स्थिति विज्ञापन या प्रसार विभाग के सबसे छोटे कर्मचारियों से भी दयनीय है।
और अंत में....
एक मंत्री के विभाग में हो रहे गड़बड़ी की खबर छापने के बाद जब एक अखबार नवीस विज्ञापन लेने जनसंपर्क विभाग पहुंचा तो उसे वहां के अधिकारियों ने समझाईश देते हुए कहा कि पहले इस खबर का खंडन करों तभी विज्ञापन मिलेंगे।
पिछले दिनों शिवनाथ बचाने की घोषणा करते हुए जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने फावड़ा चलाया तो अखबार वालों ने इसे इतनी प्राथमिकता दी जैसे सरकार अब पानी बचाने की कोई ठोस कार्ययोजना बना चुकी है लेकिन दुख की बात यह है कि जब डॉ. रमन पानी बचाने शिवनाथ पर फावड़ा चला रहे थे तब उसी दौरान गौरवपथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब के पाटे जाने या मंत्री की कीमती जमीन के लिए आमापारा स्थित कारी तालाब को पाटे जाने की खबर गायब थी। जब राय नहीं बना था तब ऐसी खबरें जरूर लगती लेकिन सरकारी विज्ञापन के मोह में अखबारों को ऐसा सजाने की होड़ मची है कि मंत्री अफसर नाराज न हो। यही वजह है कि अब शहर के कई अखबारों में पत्रकारों की स्थिति विज्ञापन या प्रसार विभाग के सबसे छोटे कर्मचारियों से भी दयनीय है।
और अंत में....
एक मंत्री के विभाग में हो रहे गड़बड़ी की खबर छापने के बाद जब एक अखबार नवीस विज्ञापन लेने जनसंपर्क विभाग पहुंचा तो उसे वहां के अधिकारियों ने समझाईश देते हुए कहा कि पहले इस खबर का खंडन करों तभी विज्ञापन मिलेंगे।
क्रेशरों को छूट, खदानों में लूट , स्क्वाड को भी जाता है महिना
रायपुर जिले में खनिज से लाखों रुपए के राजस्व का चूना लगा रहे खनिज अधिकारियों ने मंजीत, शर्मा, कुलदीप जैसे लोगों के चल रहे अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उनसे अवैध वसूली कर अपनी जेबें गरम कर रहे हैं जबकि अवैध कार्यों में लिप्त लोग यह दावा करते नहीं थकते कि उनके द्वारा स्क्वाड तक को पैसा दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभाग की यह कहानी नई नहीं है। कहानी का नयापन यह है कि इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। खनिज विभाग में चल रहे लूट-खसोट को लेकर रोज नई कहानी सामने आने लगी है। सालों से राजधानी में पदस्थ अफसरों के वरदहस्त ने अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन करने वालों को इतना ताकतवार बना दिया है कि कई कर्मचारी तो कार्रवाई करने तक से डरते हैं।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि जिले में दर्जनभर से अधिक क्रेशर अवैध ढंग से संचालित है और इन अवैध क्रेशरों के एवज में अधिकारियों को बड़ी रकम भी मिलती है। हालत यह है कि अवैध क्रेशर के संचालन से हर साल सरकार को लाखों-करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि हो रही है इसके बाद भी इन अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना आश्चर्यजनक है।
बताया जाता है कि खनिज विभाग में बैठे कई अधिकारियों के संरक्षण में हो रहे अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन से होने वाली अवैध कमाई इतनी यादा है कि ऊपर तक एक बड़ी रकम पहुंचाई जाती है इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही है। बहरहाल खनिज विभाग के लूट खसोट की शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद कार्रवाई नहीं होते देख कई लोग आश्चर्यचकित हैं।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभाग की यह कहानी नई नहीं है। कहानी का नयापन यह है कि इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। खनिज विभाग में चल रहे लूट-खसोट को लेकर रोज नई कहानी सामने आने लगी है। सालों से राजधानी में पदस्थ अफसरों के वरदहस्त ने अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन करने वालों को इतना ताकतवार बना दिया है कि कई कर्मचारी तो कार्रवाई करने तक से डरते हैं।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि जिले में दर्जनभर से अधिक क्रेशर अवैध ढंग से संचालित है और इन अवैध क्रेशरों के एवज में अधिकारियों को बड़ी रकम भी मिलती है। हालत यह है कि अवैध क्रेशर के संचालन से हर साल सरकार को लाखों-करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि हो रही है इसके बाद भी इन अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना आश्चर्यजनक है।
बताया जाता है कि खनिज विभाग में बैठे कई अधिकारियों के संरक्षण में हो रहे अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन से होने वाली अवैध कमाई इतनी यादा है कि ऊपर तक एक बड़ी रकम पहुंचाई जाती है इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही है। बहरहाल खनिज विभाग के लूट खसोट की शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद कार्रवाई नहीं होते देख कई लोग आश्चर्यचकित हैं।
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