शुक्रवार, 4 जून 2010

मंत्री को फटकार,अफसर को दुलार!

वेयर हाउसिंग का उमेश अग्रवाल हैं ताकतवर
अनुमति के विदेश यात्रा पर गए खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले को मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के द्वारा फटकार लगाए जाने के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है कि विदेश यात्रा के सूत्रधार उमेश अग्रवाल को शासन द्वारा कुछ भी नहीं किया गया जबकि सचिव विवेक ढांड से भी जवाब तलब किए जाने की खबर है।
छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउसिंग में अफसरों की भर्राशाही का इससे दूसरा उदाहरण और क्या होगा कि मुख्यमंत्री के द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद भी वेयर हाउसिंग के खर्चे पर विदेश यात्रा की गई। बताया जाता है कि विदेश यात्रा को लेकर मुख्यमंत्री ने न केवल खाद्य मंत्री बल्कि सचिव को भी फटकार लगाई है लेकिन उमेश अग्रवाल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जबकि उनकी मनमानी की ढेरों शिकायतों मुख्मयंत्री तक की जा चुकी है।
सदैव चर्चा में रहे राय शासन के अफसर उमेश अग्रवाल जिनके कारनामों से छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन के कर्मचारी त्रस्त है। बताया जाता है कि उक्त अफसर का संपूर्ण सेवा काल विवादित ही रहा है, निगम के इस गरिमापूर्ण पद पर आने से पहले वे रायपुर जनपद के सी.ओ.के. पद पर अपनी हठी मानसिकता के कारण इतने अधिक विवादित रहे कि जनपद के त्रस्त कर्मचारियों को सड़क पर अआकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा। जिसके कारण शासन को मजबूरन इन्हें सी.ओ. पद से हटाना पड़ा था।
जिस छत्तीसगढ़ राय में मुख्यमंत्री गरीबों एवं मैदानी स्तर के कर्मचारियों के उत्थान के लिए प्रत्यनशील है उन्हीं के शासनकाल में राय की एकमात्र स्टोरेज एजेन्सी के कर्मचारी प्रताड़ना एवं भय के साम्राय में जीवन काट रहे हैं जिसकी वास्तविक तस्वीर समय-समय पर बुलंद छत्तीसगढ़ में प्रकाशित की है। सूत्रों के मुताबिक अफसर की मनमानी से आश्चर्य होता है कि शाखा रायगढ़ एवं शाखा जगदलपुर में भारी मात्रा मे ंचावल के बोरे कम पाए गए परन्तु शाखा रायगढ़ के शाखा प्रबंधक को रायगढ़ से हटाकर पुन: अन्य शाखा पर प्रबंधक पदस्थ किया गया एवं शाखा जगदलपुर के शाखा प्रबंधक पर प्रभावशाली सांसद के दबाव में उमेश अग्रवाल द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई जबकि इस वर्ष के अलावा पूर्व वर्ष भी उक्त प्रबंधक द्वारा लगभग 1100 बोरी की अफरातफरी की गई थी आज भी उसे जगदलपुर शाखा पर प्रबंधक बना कर रखा गया है। यह भी एक मिसाल है कि शाखा अम्बिकापुर के घोटालेबाज प्रबंधक को मात्र दिखावे के लिए कुछ समय के लिए शाखा दुर्ग अटैच किया गया एवं शीघ्र ही उसे शाखा खरोरा पर प्रबंधक की हैसियत से नवाजा गया। जबकि नियमानुसार इस तरह के अपराधिक कृत्य करने वाले कर्मचारी को शाखा प्रबंधक जैसे जिम्मेदार पद से हमेशा के लिए पृथक कर दिया जाता है।
निरंकुशता एवं मनमानी की इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी कि निगम के प्रबंध संचालक के पद पर विराजित उक्त अफसर ने 18 मई को निगम के जिला शाखा प्रबंधकों की बैठक में खुला ऐलान किया कि मैं इस निगम से अपनी इच्छा से जाऊंगा कोई मेरी इच्छा के बगैर मुझे नहीं हटा सकता है। जो कि परोक्ष रुप में शाखा को खुली चुनौती का दर्जा रखती है। शासन के इस अफसर ने नवपदस्थ एवं अनुभवहीन तकनीकि सहायकों को जिनकी परिवीक्षा अवधि समाप्त नहीं हुई है तथा निगम में मात्र 8 माह पूर्व ही पदस्थ हुए है को विभि शाखाओं पर शाखा प्रबंधक बना कर पूर्व में पदस्थ अनुभवी एवं वरिष्ठ कर्मचारियों को जो कि शाखा प्रबंधक की हैसियत से कार्य कर रहे थे उन्हें नवपदस्थ तकनीकि सहायकों के अधीनस्थ कार्य करने का गैर जिम्मेदाराना आदेश जारी कर दिया गया है।
जहां पूरे प्रदेश में समस्त शासकीय एवं निगम मंडल के कर्मचारियों को छठवां वेतन दिया जा चुका है एवं एरियस की द्वितीय किश्त देने की घोषणा की जा चुकी है वहीं सदैव लाभ देने वाले इस निगम के कर्मचारियों को पुनरीक्षित वेतनमान का आदेश जारी करने के बाद भी नए वेतनमान से आज तक वेतन नही दिया गया है। प्रश्न यह उठता है कि निगम के प्रबंध संचालक के ऐसे कई मनमानीपूर्ण एवं तुगलकी रवैये को क्या शासन अंकुश लगा पाएगा। या राय के जिम्मेदार अफसरों को शासन ने मनमानी करने की खुली छूट एवं अभयदान दिया है। क्या ऐसे अफसरों के माध्यम से शासन की छवि विश्वसनीय एवं साफ-सुथरी रह सकती है। बहरहाल उमेश अग्रवाल को एक मंत्री का रिश्तेदार बताया जाता है और सिर्फ यही वजह से कार्रवाई नहीं होने को लेकर कर्मचारियों में रोष व्याप्त है।

गुरुवार, 3 जून 2010

सूर्या का कमाल , सौदान का धमाल

छत्तीसगढ़ की भाजपाई राजनीति में धीरे-धीरे कब्जा जमा रहे सूर्या फाउण्डेशन को लेकर आम भाजपाईयों में नाराजगी तो है लेकिन वे इसके पीछे सौदान सिंह का हाथ होने की चर्चा की वजह से खामोश है। हालत यह है कि असंतुष्ट भाजपाईयों ने सूर्या फाउण्डेशन के लोगों के खिलाफ रणनीति बनाने जुट गए हैं।
वैसे तो सूर्या फाउण्डेशन का गठन 18 साल पहले हुआ था लेकिन छत्तीसगढ़ में यह तब सक्रिय हुआ जब यहां भाजपा की सरकार बनी। कहा जाता है कि सूर्या फाउण्डेशन के प्रशिक्षित युवकों को यहां लाने का काम भाजपा के दमदार नेता सौदान सिंह ने किया। एक तरह से इसे सौदान सिंह का निजी जासूस भी कहा जाने लगा है।
बताया जाता है कि इन युवकों को सुनियोजित ढंग से छत्तीसगढ़ के सभी भाजपा कार्यालयों में ही नहीं बल्कि भाजपाई मंत्री व विधायकों के बंगलों पर भी काम पर लगाया गया है। नेताओं पर लगाम कसने की रणनीति ने सौदान सिंह को ताकतवर बनाया है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक राजधानी के एकात्म परिसर में इन दिनों सूर्या फाउण्डेशन से जुड़े युवाओं का भारी दबदबा है और कहा जाता है कि मीडिया विभाग से लेकर कार्यालय चलाने और भोजन कक्ष में भी इनकी जबरदस्त घुसपैठ है। किस नेता को क्या बोलना है कितना बोलना है यह निर्देश भी यही से आने की चर्चा है।
दूसरी तरफ इस नए व्यवस्था से स्थानीय भाजपाईयों में जबरदस्त रोष व्याप्त है। कहा जाता है कि एकात्म परिसर में आधा दर्जन युवा सालों से काम कर रहे हैं उन्हें नए-नए तरीके से प्रताड़ित किए जाने की चर्चा है। कहा जाता है कि यहां काम करने वाले लोग पहले यहां काम की अधिकता पर भोजन वगैरह कर लेते थे इस पर अब प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसी तरह कई मामलों में उन पर दबाव डाला जाता है। बताया जाता है कि इस बात का दुखड़ा यहां आए दिन सुना जा सकता है।
बताया जाता है कि एकात्म परिसर आने वाले भाजपाईयों के साथ भी इनका कई बार विवाद हो चुका है कौन कहां तक जाएगा यह भी यही लोग तय करते हैं। बहरहाल चर्चा के पीछे सौदान सिंह का हाथ होने की खबर ने स्थानीय नेताओ के मुंह में ताला जड़ दिया है जो कभी भी विस्फोटक रुप ले सकती है।

बुधवार, 2 जून 2010

उद्योगपति है भाता , अपराध से है नाता

एसईसीएल के सीएमडी एम.पी. दीक्षित रिश्वत लेते गिरफ्तार क्या हुए सारा संसार बताने वाले एक अखबार के मालिक की पोल खुलने लगी है। शराब के धंधे से अखबार के धंधे होते हुए लोहे के धंधे में आए इस अखबार मालिक का संबंध हीरा ग्र्ुप से बताया जा रहा है और यह खबर सच है तो अखबार जगत की यह सबसे अनोखी खबर होगी।
हालांकि अपराधियों के द्वारा अखबार के धंधे में पर्दापण नया नहीं है लेकिन अखबार के दबाव में खदानें से लेकर कीमती जमीनें डकारने की कहानियां आम चर्चा में आने लगी है जो पत्रकारिता के लिहाज से उचित नहीं माना जाता। छत्तीसगढ़ में ऐसी पत्रकारिता को कभी भी जगह नहीं मिली जो सरकारी विज्ञापन के लिए सरकार की गोद में जा बैठे हो या अपराध जगत से आकर अखबार निकाल रहे हो। लेकिन समय के साथ बदलाव जरूर आया है और ऐसे लोगों की घुसपैठ भी हुई है। रायपुर में ही ऐसे कुछ अखबार निकाले जा रहे हैं जिनके धंधे कुछ और हैं और इन धंधों को संरक्षण देने अखबार निकाले जा रहे हैं।
और अंत में...
संवाद में एक अधिकारी के पुत्र की शादी का खर्चा निकालने की कई तरह की चर्चा है। इन चर्चाओं में सबसे बड़ी चर्चा बगैर विज्ञापन के आधा दर्जन लोगों की संविदा नियुक्ति से हुई कमाई को लेकर है।

मंगलवार, 1 जून 2010

संवाद में करोड़ों की घपलेबाजी

घपलों की कहानी
आडिट की जुबानी
सालों से जमें अफसर किस तरह का खेल खेलकर लाखों-करोड़ों की घपलेबाजी करते हैं यह देखना हो तो आडिट रिपोर्ट देखी जा सकती है। नियम कानून ताक पर रखकर सरकारी प्रचार के लिए जिस तरह से कमीशन देने वालों को करोड़ों रुपए बांटे गए वह आश्चर्यजनक इसलिए है क्योंकि इस विभाग के मुखिया डॉ. रमन सिंह है जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं।
पिछली बार संजीवनी एग्रोविजन इंटरप्राइजेस को किए गए भुगतान पर आडिट आपत्ति की खबर प्रकाशित किया था। इस बार ऐसे ही संवाद के कारनामें प्रकाशित किए जा रहे हैं। जिसके भुगतान पर आपत्ति की गई है। जनसंपर्क विभाग ने संवाद के माध्यम से रमन सरकार के चार साल पूरे होने पर विज्ञापन जारी किया था। इसके निर्माण व प्रसारण के लिए संवाद ने न तो कोई निविदा ही बुलाई और न ही किसी तरह का कोटेशन ही मंगाया। यही नहीं यह काम 1 लाख रुपए पर सेकण्ड के हिसाब से टीवी स्पॉट के लिए भुगतान किया गया वह भी 30 से 60 सेकेण्ड समय का भुगतान किया गया यह भुगतान बीएसआर फिल्म को किया गया। इसके लिए न तो किसी तरह के नियम बनाए गए और न ही कोई मापदंड ही तय किया गया।
यह बीएसआर फिल्म को लेकर भी कई तरह की चर्चा है। बहरहाल संवाद में चल रहे घपलेबाजी की वजह सालों से बैठे अधिकारियों की कमीशनखोरी में रूचि को बताया जा रहा है।

सोमवार, 31 मई 2010

पर्यटन के नाम पर डकैती

मंत्री मेहरबान,अजय पहलवान
जिस व्यक्ति पर अपनी हवस के लिए कालगर्ल को कार से कुचलकर मार डालने का आरोप हो और जिसके दुग्ध संघ से पर्यटन मंडल में संविलियन को ही गलत माना जा रहा हो ऐसे अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंडल में पीआरओर बनना और मंत्री का करीबी कहलाना कहां तक उचित है।
छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल में चल रहे घपलेबाजी को डकैती की संज्ञा दी जाए तो कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब से बृजमोहन अग्रवाल ने पर्यटन विभाग संभाला है तभी से यह विभाग अपने कारनामों से सुर्खियों में रहा है। प्रचार प्रसार में माहिर पर्यटन मंडल में चल रहे डकैती की चर्चा तो अब आम हो चुकी है।
ऐसे में यहां हुई संविदा नियुक्ति की कहानी शर्मनाक है यही नहीं दुग्ध संघ के कर्मचारी अजय श्रीवास्तव को लेकर यह विभाग इन दिनों सुर्खियों में है। सुखर्िाें में रहने की वजह अजय श्रीवास्तव का पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का करीबी होना है और कहा जाता है कि मंत्री की रूचि की वजह से ही अजय श्रीवास्तव को असंवैधानिक रुप से पर्यटन मंडल में लाया गया जबकि जिस पद पर उनकी नियुक्ति की गई अजय श्रीवास्तव तब उस पद की योग्यता ही नहीं रखते थे। लेकिन उच्चस्तरीय दबाव में वे पर्यटन मंडल पर बने हुए है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक अजय श्रीवास्तव की संविलियन को लेकर मामला न्यायालय तक भी पहुंच चुका है जहां पर्यटन मंडल के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि अजय श्रीवास्तव का संविलियन गलत ढंग से किया गया है। दुग्ध संघ से पुलिस फिर पर्यटन मंडल में कार्य करने की कहानी यहां पूरे शहर में चर्चा है। चर्चा इस बात की भी है कि अय्याशी के लिए हत्या जैसे मामले के आरोपी को किस तरह से राजनैतिक संरक्षण दिया जा रहा है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पर्यटन मंडल के इस पीआरओ की विभाग में तूती बोलती है और उच्च अधिकारी भी उनसे खौफ खाते हैं।
एक अधिकारी ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि इस सरकार में ऐसे कई मामले हैं जो उच्चस्तरीय राजनैतिक संरक्षण के कारण दबे हुए हैं। दूसरी तरफ इस मामले को लेकर आम लोगों में जो चर्चा है उससे सरकार की छवि पर असर पड़ रहा है। बहरहाल पर्यटन मंडल के पीआरओ अजय श्रीवास्तव को लेकर पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल घेरे में हैं और इस संबंध में पर्यटन मंत्री से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे।

रविवार, 30 मई 2010

लूट या संतुष्टिकरण

छत्तीसगढ में लूट-खसोट की राजनीति ने यहां के सरकारी खजाने को खाली करना शुरु कर दिया है। तमाम विरोध के बाद भी डा. रमन सिंह ने आखिरकार निगम मंडलों में नियुक्ति कर अपने लोगों को उपकृत करना शुरु कर ही दिया।
निगम मंडलों में नियुक्तियां क्यों की जाती है यह किसी से छिपा नहीं है। राजनैतिक नियुक्तियां ने निगम-मंडलों को जिस तरह से लूटा है वह भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसी नियुक्यिां का हर बार विरोध तो होता है लेकिन संतुष्टिकरण की राजनीति ने ऐसे विरोध को किनारे किया है। डॉ. रमन सिंह भी विरोध के चलते नियुक्तियां टालते रहे लेकिन पहली खेप में 9 ऐसे लोगों को पुन: निगम-मंडलों के अध्यक्ष बना दिए गए जिनकी छवि को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। निगम-मंडलों को लुटने की ऐसी कोशिश अखिर बार-बार क्यों किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार की खबरें आ रही वह शर्मनाक है। रमन सरकार के पिछले कार्यकाल में भी निगम मंडलों में जमकर नियुक्तियां हुई थी और इनमें से दो-चार को छोड़ सभी ने खुलेआम डकैती डाली है। यही वजह है कि इस बार भी निगम-मंडल में की जा रही नियुक्तियां को लेकर भारी विरोध चल रहा था। सबसे यादा अंधेरगर्दी की कहानी तो ब्राम्हण विधायक बद्रीधर दीवान की नियुक्ति को लेकर हुई है। कहा जाता है कि मंत्री नहीं बनाने से नाराज ब्राम्हण समाज को खुश करने इस विधायक को औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है हालांकि चर्चा इस बात की भी रही कि उन्हें निगम मंडल में नियुक्ति करने को लेकर विरोध था। इसी तरह कुछ ऐसे लोगों को पुन: उसी पद पर बिठा दिया गया जिनके कार्यकाल का विवाद आज भी चर्चा में है। इनमें से कुछ ने तो सैकड़ों एकड़ जमीन बेनामी खरीदी है। निगम मंडलों की ऐसी नियुक्तियां जिसका उद्देश्य सिर्फ लूट-खसोट हो अंधेरगर्दी से कम नहीं है।

शनिवार, 29 मई 2010

सजा के जिश्म न बेचे तो और क्या बेंचे,गरीब लोग हैं घर में दूकान रखते हैं

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के मायने बदलते जा रहे हैं। रोज प्रकाशित हो रहे नए-नए अखबारों की अपनी कहानी है और इन कहानियों का आखरी अध्याय सरकारी विज्ञापनों की लूट खसोट में ही समाप्त हो जाता है। इस बात को जनसंपर्क विभाग भी भली भांति जानता है इसलिए वह भी वही सब कुछ करता है जो अखबारों पर लगाम कस सके। जनसंपर्क विभाग को खुश करने में ही अखबारों का समय निकल जाता है और पत्रकारिता का मतलब अब सिर्फ सूचना तंत्र ही रह गया है। खोजी पत्रकारिता को तो जैसे सांप सूंघ गया है और सिर्फ सजावट पर ध्यान अधिक दिया जाने लगा है।
पिछले दिनों शिवनाथ बचाने की घोषणा करते हुए जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने फावड़ा चलाया तो अखबार वालों ने इसे इतनी प्राथमिकता दी जैसे सरकार अब पानी बचाने की कोई ठोस कार्ययोजना बना चुकी है लेकिन दुख की बात यह है कि जब डॉ. रमन पानी बचाने शिवनाथ पर फावड़ा चला रहे थे तब उसी दौरान गौरवपथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब के पाटे जाने या मंत्री की कीमती जमीन के लिए आमापारा स्थित कारी तालाब को पाटे जाने की खबर गायब थी। जब राय नहीं बना था तब ऐसी खबरें जरूर लगती लेकिन सरकारी विज्ञापन के मोह में अखबारों को ऐसा सजाने की होड़ मची है कि मंत्री अफसर नाराज न हो। यही वजह है कि अब शहर के कई अखबारों में पत्रकारों की स्थिति विज्ञापन या प्रसार विभाग के सबसे छोटे कर्मचारियों से भी दयनीय है।
और अंत में....
एक मंत्री के विभाग में हो रहे गड़बड़ी की खबर छापने के बाद जब एक अखबार नवीस विज्ञापन लेने जनसंपर्क विभाग पहुंचा तो उसे वहां के अधिकारियों ने समझाईश देते हुए कहा कि पहले इस खबर का खंडन करों तभी विज्ञापन मिलेंगे।