सोमवार, 14 जून 2010

वेदांता की दादागिरी,गैस त्रासदी पर न्याय?

न्याय प्रणाली को लेकर इन दिनों पूरे देश में बहस चल पड़ी है। प्रक्रिया से विलंब होते फैसले ने नैसर्गिक न्याय के सिध्दांत को तो पीछे छोड़ा ही है आम लोगों का विश्वास भी तोड़ा है। पिछले दिनों न्यायालय के दो फैसले ऐसे आए जिन पर आम जनमानस कहीं से भी सहमत नहीं है और लोकतंत्र के लिए ऐसे फैसलों को उचित भी कैसे माना जा सकता है जिस पर आम लोग ही सहमत न हो।
पहला फैसला छत्तीसगढ क़े न्यायालय से आया कि बालकों ने जो 6 सौ एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा कर रखा है उसे सरकार पैसा ले कर बालको को उपयोग के लिए दे दे। इस पर आम आदमी अवाक है कि अपने लिए अशियाना बनाने वालों को हटा देने वाली सरकार किस तरह से बालको को कोर्ट के फैसले की आड़ पर जमीन देने आमदा है। ऐसी बेशर्मी बहुत कम देखने को मिलती है लेकिन छत्तीसगढ सरकार ने कुछ एक मंत्रियों की असहमति के बाद भी बालको को उसके अवैध कब्जे को देने आमदा है। संवैधानिक व्यवस्था के तहत बने सरकारों को ऐसे फैसलों से इसलिए रोकना चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार को जनादेश नहीं मिला है वह 40-42 प्रतिशत वोट पाकर सकरार बना सकी है यानी उसके खिलाफ 58 से 60 प्रतिशत लोग हैं। ऐसी दशा में नीतिगत फैसले की बात ही बेमानी है।
दूसरा फैसला भोपाल गैस कांड का है और यहां भी भाजपा की सरकार ही बैठी है और जिस तरह से 15 हजार मौतों पर 2 साल की सजा सुनाई गई उससे लोक आवक है। हम यहां यह नहीं कह रहे हैं कि ऐसे फैसले सिर्फ भाजपा शासित रायों में हो रहे हैं और न ही हम यह कहते हैं कि न्यायालय का फैसला ही गलत है लेकिन न्यायप्रणाली के इस दो फैसलों ने आम लोगों में सवाल तो खड़ा किया ही है कि क्या बालको का अवैध कब्जा उचित है और आम आदमी के द्वारा किया गया कब्जा गलता है। क्या उद्योगों और आम आदमी के जमीन कब्जे अलग-अलग श्रेणी में आते हैं तो फिर समान न्याय की बात कहां होगी। ऊपर से न्यायालय के फैसले के बाद डॉ. रमन सरकार ने जिस बेशर्मी से बालको को जमीन देने आमदा दिखी वह सरकार की नीति और नियत बताने के लिए काफी है। एक तरफ राजधानी में पीढ़ियों से व्यापार करने वालों को हटाने की बात की जा रही है और दूसरी तरफ बालको को जमीन देने की बात हो रही है यह सरकार की नीति अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। ऐसे में अरूंधति राय यदि नक्सलियों का समर्थन करती है तो यह उसकी हिमाकत तो है लेकिन गांधी के देश में उसकी प्रासंगिता पर भी सवाल उठने लगेंगे। सरकार अंधेरगर्दी बंद करे वरना जनता का फैसला नई मुसीबत खड़ी सकती है।

रविवार, 13 जून 2010

गेंदाराम चन्द्राकर के आगे स्कूली शिक्षा विभाग बेबस



जांच रिपोर्ट के बाद भी गेंदाराम पर कार्रवाई नहीं
मंत्री को महिना पहुंचाने की चर्चा?
क्या कोई कल्पना कर सकता है कि पीएससी में चयन के लिए दस्तावेजों में धोखाधड़ी करने के आरोप सिध्द होने के बाद भी कोई व्यक्ति पर कार्रवाई न हो। लेकिन प्रदेश के दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के इस विभाग में गेंदाराम चंद्राकर ने यह कारनामा दिखलाया है। तत्कालीन शिक्षा सचिव नंद कुमार और पीएससी के सचिव प्रदीप पंत के द्वारा अलग-अलग की गई जांच के बाद पेश रिपोर्ट में गेंदाराम चंद्राकर को दोषी तो पाया गया लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई नहीं होने की वजह उनके राजनैतिक पहुंच के अलावा ऊपर तक पैसा पहुंचाने को बताया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ सरकार में बैठे लोग किस तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और कैसे अपराधियों को बचा रहे हैं यह गेंदाराम चन्द्राकर के मामले में देखा जा सकता है। वैसे तो पीएससी ने जो परीक्षा ली थी उसके चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठाये जाते रहे हैं और गेंदाराम चन्द्राकर का मामला तो सरकार के मुंह पर कालिख है। पीएससी में गेंदाराम चन्द्राकर को सर्वाधिक अंक दिए गए इसकी वजह भी उनके राजनैतिक एप्रोच और परीक्षा नियंत्रक रहे उनके सहपाठी बद्रीप्रसाद कश्यप को बताया जा रहा है।
दरअसल पीएससी की इस गड़बड़ी की जब शिकायत हुई तो सबसे पहले उनके चयन और उनके द्वारा चयन हेतु दिए गए दस्तावेज की जांच पीएससी ने ही की और पीएससी के सचिव प्रदीप पंत ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि गेंदाराम चन्द्राकर द्वारा कूट रचित दस्तावेज प्रस्तुत किया जाना एवं उसके आधार पर चयनित हो जाना परिलक्षित हुआ है और उन्होंने शिक्षा सचिव नंदकुमार को कार्रवाई करने पत्र लिखा। इस पत्र के शिक्षा विभाग में आते ही हड़कम्प मच गया और प्रकरण की जांच कराने के बाद शिक्षा सचिव नंदकुमार ने माना कि गेंदाराम चन्द्राकर ने पीएससी में चयनित होने दस्तावेजों में कूट रचना की है।
बताया जाता है कि जैसे ही गेंदाराम को अपने खिलाफ होने वाली कार्रवाई का पता चला उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया। कहा तो यहां तक जाता है कि भाजपा के एक सांसद से लेकर विभागीय मंत्री तक पैसा पहुंचाया गया और फाईल दबा दी गई।
छत्तीसगढ शिक्षा विभाग का यह इकलौता कारनामा नहीं है और न ही गेंदाराम चन्द्राकर का यह इकलौता प्रकरण है। उच्च स्तरीय लेन-देन कर जिस तरह से शिक्षा विभाग में खेल चल रहा है यदि इसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तो कई लोग जेल के सलाखों तक पहुंच सकते हैं। बहरहाल गेंदाराम चन्द्राकर के मामले में सचिव स्तर के रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई नहीं होना अनेक संदेहों को जन्म देता है साथ ही सरकार की नियत पर भी सवालिया निशान लगाता है।

संवाद के प्रबंध समिति हैं,भ्रष्ट अफसरों के मोहरे!

खास लोगों को नियमित करने की कोशिश
जनसंपर्क की सहयोगी माने जाने वाली संवाद में लूट खसोट चरम पर है और इसके संचालन के लिए बनी प्रबंध समिति के सदस्य सिर्फ अफसरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं यही वजह है कि इस बैठक में अफसरों को भुगतान की स्वीकृति दी जाती है और अब तो गलत ढंग से संविदा नियुक्ति वालों को अफसरों के इशारे पर नियमित करने की योजना बनाई जा रही है।
संवाद में चल रहे खेल पर शासन का ध्यान क्यों नहीं है इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। बताया जाता है कि अब भ्रष्ट अफसरों ने संविदा के पदों से उनके कमीशनखोरी और हेराफेरी में साथ देने वालों की एक टीम बना ली है। पिछले दिनों 40 करोड़ रुपयों की आडिट आपत्तियां की गई। इन आपत्तियों के बाद से टीम भावना बढ़ती देखी जा रही है। जिस आडिट रिपोर्ट में आपत्तियां का उल्लेख हैं, उसे दबाने के कुकर्म में सभी एकजुट दिख रहे हैं। भ्रष्ट अफसरों द्वारा अपने ऐसे संविदा साथियों को संवाद में कथित प्रबंध समिति की आड़ में नियमित करने की कोशिश की जा रही है। प्रबंध समिति के अध्यक्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह है इसलिए कुछ लिखकर पास करा लो आपत्ति कोई कर नहीं सकता।
संवाद के संचालन के लिए एक प्रबंध समिति बनी है। प्रबंध समिति के माध्यम से लिए गए फैसले को देखकर ऐसा नहीं लगता कि इसके सदस्यों ने कभी संस्था के हित में कुछ सोचा भी होगा। कोई भी कह सकता है कि समिति के सदस्यों को संवाद के फैसलों में उनके अधिकारों और दायित्वों की सीमा तक का पता नहीं होगा। यही कारण है कि सदस्य संवाद पर शासन करने वाले जनसंपर्क अफसरों के लिए मोहरों के समान है। दरअसल प्रबंध समिति के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। प्रबंध समिति के सदस्य अफसर गांधीजी के तीन बंदरों की तरह हैं जो पिछले दस सालों में कुछ भी न देख पाए, न सुन पाए और न ही कुछ बोल ही पाए। किसी भी सदस्य ने कभी किसी मामले में पूछताछ करना भी जरूरी नहीं समझा तो आपत्ति करने की हिम्मत दिखाना तो बहुत दूर की बात है। मुख्यमंत्री का विभाग होने से कोई भी पूछताछ के बारे में सोच भी कैसे सकता है। ऐसी समिति के नाम पर किए गए फैसलो को क्यों मान्य किया जाना चाहिए जिनके सदस्यों को किसी बात पर सहमत और असहमत होने का अधिकार न हो तो। जनसंपर्क और संवाद के प्रभारी अधिकारियों ने बहुत अच्छी तरह से गांधीजी के इन बंदरों को इस्तेमाल किया है यही कारण है कि राय के बाहर के लोग यहां बिना सर्टिफिकेट के नौकरी कर रहे हैं। संवाद के संविदा के सबसे बड़े पद पर एक पश्चिम बंगाल का आदमी बैठा है जिसके पास संबंधित पद की अनिवार्य शैक्षिणक योग्यता नहीं है। उसने ऐसी पढ़ाई की है कि कहीं भी उसके प्रमाण पत्रों के आधार पर रोजगार पंजीयन नहीं हो सका। बर्थ डेट सर्टिफाई करने के लिए उसे 10 कक्षा का प्रवेश पत्र आवेदन के साथ संलग्न करना पड़ा है। अनुभव प्रमाण पत्र भी फर्जी है, जिस संस्था को खुद बने 3 साल हुए थे उसने अपने यहां काम करने का 5 साल का अनुभव प्रमाण पत्र दिया।

शनिवार, 12 जून 2010

सेटिंग और दलाली का मजा...

राज्य बनने के पहले भोपाल के पत्रकारों और पत्रकारिता की स्थिति को लेक रायपुर में अक्सर निंदा की जाती थी कि वहां किस तरह की पत्रकारिता होती है कैसे पत्रकार दो-पांच के लिए मंत्रियों और अधिकारियों से सेटिंग कर लेते हैं।
छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद एक-दो साल तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। मत्था बदल अखबार से लेकर मंत्रियों व अधिकारियों के दलाली करते पत्रकार नजर आने लगे हैं। पिछले दिनों एक अखबार में जब एक अधिकारी के खिलाफ लगातार खबरें छपने लगी तो साप्ताहिक निकालने वाले अखबार के कथित पत्रकार ने खबर रूकवाने सौदेबाजी की और सेटिंग के एवज में न केवल अधिकारी से पैसे लिए बल्कि पत्रकार से भी कमीशन ले लिया। सौदा भी बड़ा नहीं था लेकिन इसकी चर्चा काफी हाउस तक जा पहुंचा है।
छत्तीसगढ में चल रहे इस दलाली और सेटिंग के खेल में कुछ प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार भी शामिल है कुछ इश्योरेंस पालिसी बेच रहे हैं तो कुछ काम ले रहे हैं। इस पत्रकार के द्वारा तो एक मंत्री से भी सेटिंग कर खबर रुकवाने का काम करने की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पत्रकारिता के इस नए परिवादी से आम लोगों का कितना भला होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन नेताओं और अधिकारियों की डकैती जोर-शोर से चल पड़ी है।
और अंत में...
प्रतिष्ठित माने जाने वाले एक अखबार के पत्रकार को एक अधिकारी की खबर लग गई। पहले उसने उससे खबर पर चर्चा की और उठते हुए एक पॉलिसी थमा दी।

शुक्रवार, 11 जून 2010

विकास या विनाश

पर्यावरण की चिंता में दुबले हो रहे लोगों के लिए यह खबर और भी दुखदायी होगी कि मोवा से विधानसभा के बीच सड़क चौड़ीकरण के नाम से डेढ़ हजार से अधिक पेड़ काट डाले गए। यह पेड़ तब काटे जा रहे थे जब प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह के द्वारा शिवनाथ नदी को बचाने फावड़ा उठाया जा रहा था। छत्तीसगढ़ को वन प्रदेश कहने वालों के लिए यह दुखद स्थिति है कि सरकार विकास के नाम पर विनाश करने में लगी है। उसके पास आने वाले पीढ़ी को सुखद जिंदगी देने की कोई योजना नहीं है वह तो सिर्फ अपने राजनैतिक फायदे के लिए ही कार्य करती है। फावड़ा उठाया फोटो खिंचवाया काम खत्म। पिछले 6 सालों में रमन सरकार की पर्यावरण के क्षेत्र में यही भूमिका रही है।
राजधानी के ही आमापारा स्थित कारी तालाब को बचाने कितने ही बार अपील की जा चुकी है लेकिन सरकार को इससे कोई लेना देना नहीं है वह तो गौरव पथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब को पटवा रही है। विधानसभा मार्ग को चौड़ा करने डेढ-दो हजार वृक्ष काट डाले गए और इसमें भी सबसे दुखद पहलु यह है कि हर साल सैकड़ों वृक्ष लगाने का दावा करने वाले समाजसेवी भी इस बारे में खामोश है। सरकार बेशक सड़क चौड़ी कराये, तालाबों का सौंदर्यीकरण करें लेकिन वह यह ध्यान रखे कि इससे पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचेगा और इसकी भरपाई के उपाय भी सरकार को करने चाहिए। सड़कें किसी भी राय के विकास की कहानी कहती है लेकिन यदि हम विकास के नाम पर अप्रैल में ही 45 डिग्री पारे का तपन झेलते रहे तो ऐसा विकास किस काम का है।
क्या विधानसभा मार्ग के चौड़ीकरण में वृक्षों को काटना जरूरी था? और यदि वृक्ष हटाना जरूरी था तब इन वृक्षों को काटने की बजाय इसे आसपास की सरकारी जमीनों पर क्यों नहीं रोपा गया। सरकार की नीतियां यदि पर्यावरण को लेकर इस तरह लापरवाह रही तो फिर वे समाज प्रेमी कहां है जो हर साल पर्यावरण दिवस के दिन पर्यावरण बचाने के नाम पर अखबारों में फोटो छपवाते रहते हैं। क्या उनकी जिम्मेदारी अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए इतना भी नहीं है कि वे तालाब पाटे जाने या वृक्ष काटे जाने का विरोध तक कर सके।
आश्चर्य विषय तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भी है। वे तक ऐसे मामले में चुप बैठे हैें। क्या ऐसी खामोशी छत्तीसगढ़ के पर्यावरण बिगाड़ने में उन्हें देषी नहीं ठहराती। अब भी समय है पर्यावरण के हिमायती चाहे तो एक ठोस नीति के लिए सरकार पर दबाव बनाए अन्यथा छत्तीसगढ़ में चल रहे विनाश लीला आम लोगों का जीवन दूभर कर देगी और इस अंधेरगर्दी के लिए आने वाली पीढ़ी से सिर्फ गाली ही मिलेगी?

गुरुवार, 10 जून 2010

जमकर पैसा खिलाओं,अवैध निर्माण कराओं

एमजीरोड में अवैध निर्माण से परिवार परेशान
क्या राजधानी में नियम कानून के मायने बदल गए हैं या पैसा या पहुंच वालों के सामने निगम प्रशासन पंगु बन गया है। यह सब नामदेव परिवार की व्यथा के रुप में सामने आई है। यह परिवार अवैध निर्माण और अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ चिखता रहा लेकिन निगम के अधिकारियों के कान संजय जादवानी के रुपयों ने ऐसा भर दिया था कि न अवैध निर्माण रुका और न ही निगम के किसी अफसर पर कार्रवाई ही हुई।
जब राजधानी का यह आलम है तो प्रदेश का हाल क्या होगा सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसकी शिकायत नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत से भी की गई लेकिन वहां भी कुछ नहीं हुआ सब जगह जांच का नाम लिया गया और मामले को दबा दिया गया। इस तरह के अवैध निर्माण तो निगम के अफसरों के संरक्षण में नया नहीं है और इसका पता तब लगता है जब निर्माण पूरा हो जाता है लेकिन इस मामले में तो शिकायत के बाद भी अवैध निर्माण होता रहा।
निगम में जब सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाया गया तो पता चला कि आवासीय क्षेत्र में यह व्यवसायिक प्रतिष्ठान बन गया और जोन कमिश्नर ने स्वीकार किया कि यह निर्माण त्रटिपूर्ण है। इसके बाद भी यह निर्माण हटाया नहीं जा रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस अवैध निर्माण के चलते नामदेव परिवार का जीना दूभर हो गया है। जबकि सूचना अधिकारी जोन क्रमांक 7 ने भी स्वीकार किया है कि निगम ने संजय जादवानी को केवल प्रथम तल के निर्माण की अनुमति दी है द्वितीय तल का निर्माण पूरी तरह अवैध है।
हालत यह है कि इस अवैध निर्माण से पीढित नामदेव परिवार ने मुख्यमंत्री तक को शिकायत की है लेकिन संजय की पहुंच के आगे सब बेकार हो रहा है और पीड़ित पक्ष अब न्यायालय की शरण में जाने मजबूर है। बहरहाल इस संबंध में मंत्री और कमिश्नर तक पैसा पहुंचाने की चर्चा है और यही स्थिति रही तो नए महापौर किरणमयी नायक पर भी उंगली उठ सकती है।

बुधवार, 9 जून 2010

बाबूलाल दमदार,लाचार है सरकार!

ऐसे फैसलों से ही ईमानदार होते हैं हताश
वैसे तो पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि आईएएस बाबूलाल अग्रवाल साफ बच निकलेंगे। अपनी दमदारी का लोहा मनवा चुके पूर्व कृषि सचिव बाबूलाल को जिस तरह से निलंबित करने में सरकार ने विलंब किया था उतनी ही जल्दी आनन फानन में बहाली का आदेश भी निकाल दिया। प्रदेश सरकार के इस निर्णय ने एक बार फिर ईमानदारों में हताशा पैदा हुई है वहीं बाबूलाल अग्रवाल की दमदारी भी सामने आई है।
कभी स्वास्थ्य सचिव रहे बाबूलाल अग्रवाल के कार्यकाल में हुए घपले की कहानी अभी लोग ठीक से भूले भी नहीं थे और उन पर होने वाली कार्रवाई से निगाह भी नहीं हटी थी कि उनकी बहाली आदेश ने आम लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि आखिर सरकार को हो क्या गया है। राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा अचानक सत्ता पाते ही कैसे बदल गई।
बाबूलाल अग्रवाल के निवास में जब आयकर विभाग ने छापे की कार्रवाई की तब देर है अंधेर नहीं का राग अलापने वाले भी सरकार के इस फैसले से हतप्रभ है। तब आयकर विभाग ने बाबूलाल अग्रवाल पर आय से अधिक संपत्ति का मामला बनाया था दो-चार सौ करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति का दावा किया गया और कहा जाने लगा था कि बाबूलाल अग्रवाल का बच पाना आसा नहीं है। हालांकि अंदेशा तब भी था कि अपनी पहुंच और ताकत के बल पर राज करने वालों पर कार्रवाई आसान नहीं है।
इधर पता चला है कि उच्च स्तरीय राजनैतिक दबाव के चलते सरकार ने निर्णय लिया है इसके लिए मध्यप्रदेश में भाजपा विधायक ने भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से चर्चा की थी और मुलाकात भी कराई थी। कहा जाता है कि सरकार पर भाजपा के ही राष्ट्रीय नेताओं का जबरदस्त दबाव था और इसके चलते ही यह तय माना जा रहा था कि बाबूलाल अग्रवाल की बहाली शीघ्र हो जाएगी। इधर सरकार के इस फैसले से आम आदमी में तीखी प्रतिक्रिया व्याप्त है और कहा जा रहा है कि इससे सरकार की छवि पर भी विपरित प्रभाव पड़ने वाला है।
गौरतलब है कि इस छापे में आयकर दस्ते ने श्री अग्रवाल व उनके परिजनों के यहां से 70 करोड़ रुपए से अधिक की अघोषित संपत्ति का खुलासा किया था। 4 फरवरी से 7 मार्च तक आयकर दस्ते की जांच में पारिवारिक व्यवसाय में श्री अग्रवाल के निवेश के भी दस्तावेज जब्त किए थे। इससे उन पर अपनी आय से अधिक अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने के भी आरोप लगाए थे। आयकर विभाग की फौरी रिपोर्ट के आधार पर राय शासन ने 12 फरवरी को एक आदेश जारी कर श्री अग्रवाल को निलंबित कर दिया था। इसके बाद से श्री अग्रवाल अपनी बहाली के लिए प्रयासरत थे। उनकी बहाली में छापे को लेकर आयकर विभाग की मुकम्मल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था। इस रिपोर्ट के लिए आयकर विभाग की लंबी जांच प्रक्रिया जारी थी। 90 दिनों के भीतर राय सरकार को आयकर रिपोर्ट के हवाले से श्री अग्रवाल को आरोप पत्र दिया जाना था। जो संभव नहीं हो पाया। इसे देखते हुए राय सरकार ने अपनी तरफ से (बिना आयकर रिपोर्ट के) जांच शुरु करते हुए श्री अग्रवाल से अघोषित व आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूछताछ की थी। इस पर श्री अग्रवाल ने मय दस्तावेज अपनी आय व चल अचल संपत्ति का ब्यौरा के साथ अपनी बहाली के लिए राय शासन को आवेदन भी प्रस्तुत किया था। जवाब के परीक्षण के बाद राय शासन ने गुरुवार को श्री अग्रवाल का निलंबन खत्म कर सेवा में बहाल कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक श्री अग्रवाल को राजस्व मंडल बिलासपुर में सदस्य नियुक्त किया गया है। इन्हें मिलाकर राजस्व मंडल में दो सदस्य हो गए हैं। श्री अग्रवाल के अलावा आर.सी. सिन्हा भी सदस्य है। बहरहाल अग्रवाल की बहाली ने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल तो उठाये ही है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि यह कदम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला होगा।