यह सरकारी भर्राशाही है या अखबार वालों की बेशर्मी यह तो आम लोग तय करे लेकिन कभी प्रेस काम्पलेक्स के नाम पर चर्चित रजबंधा मैदान में इन दिनों काम्पलेक्स खड़ा होने लगा है सरकार ने अखबारों की दादागिरी बर्दाश्त की तो हालत इंदौर जैसे हो जाएगी जहां कभी बारूद लगाकर अखबारों के बिल्डिंग उड़ाए गए थे।
अखबार वैसे तो एक मिशन के रूप में जाना जाता रहा है जिसका काम आम लोगों के हित साधना है लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में अब यह एक व्यवसाय का रुप ले चुका है और आम आदमी में भी अखबार के प्रति यही सोच बलवती होने लगी है तो इसकी वजह बड़े अखबारों का व्यवहार है जो अखबार के लिए दी गई सरकारी जमीन के उपयोग से सीधे परिलक्षित होती है। अमृत संदेश हो या नवभारत, देशबंधु हो या दैनिक भास्कर यहां तक कि तरुण छत्तीसगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ में यही हाल है। अखबार के दफ्तर कम काम्पलेक्स नजर आने वाले इन मीडिया वाले भले गलतफहमी पाल ले कि इससे आम लोग में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन जो लोग जानते हैं कि अखबार खोलने के नाम पर दी गई सरकारी जमीनों को दादागिरी के दम पर कैसे काम्पलेक्स में बदला जा रहा है।
पिछले कुछ दिनों से भास्कर के 14 मॉले के काम्पलेक्स की राजधानी में जमकर चर्चा है और यह भी कहा जा रहा है कि इसके भूउपयोग से लेकर नक्शे तक की स्वीकृति में जमकर दादागिरी चली है और यह चर्चा सच है तो सरकार को भी सोचना चाहिए कि अब अखबारों को सस्ते दर पर जमीनें क्यों दी जाए।
और अंत में....
एक अखबार वाले ने तो नई राजधानी में ही नए प्रेस काम्पलेक्स का प्रस्ताव बना लिया है जबकि शुक्ला पेट्रोल पम्प को दूसरे जगह जमीन देने पर बस स्टैण्ड की जमीन खाली करने की खबरें इसी के यहां सबसे यादा छपती रही है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
बुधवार, 16 जून 2010
धनेन्द्र साहू के गांव में चंद्रशेखर की दमदारी
तोरला में अवैध कब्जे की बाढ क़ो संरक्षण
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू चुनाव क्या हारे उन्हें अपने गांव में ही चुनौती मिलने लगी है कहा जाता है कि कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू ने यहां अपने समर्थकों की फौज खड़ी करना शुरू कर दिया है और तोरला में हो रहे बेतहाशा अवैध कब्जों को इसी राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।
अभनपुर विधानसभा क्षेत्र में वैसे तो कई गांवों में अवैध कब्जों की शिकायत आने लगी है लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू के गृह ग्राम तोरला में जिस बड़े पैमाने पर सरकारी जमीनों पर कब्जे किए जा रहे हैं उससे गांव वाले परेशान है। बताया जाता है कि सरकारी जमीनों पर हो रहे अवैध निर्माण की शिकायत तहसीलदार पटवारी से भी कई गई है। लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा समर्थकों की फौज खड़ी करने पूरे विधानसभा क्षेत्र में इस तरह की रणनीति बनाई गई है और इस कार्य में तहसीलदार व पटवारियों को भी मदद करने के मौखिक निर्देश दिए गए है।
हमारे सूत्रों ने बताया कि जिन गांवों में भाजपा समर्थित पंचायत पदाधिकारी है वहां रणनीति के तहत अवैध कब्जों को प्रश्रय दिया जा रहा है। इधर तोरला में ग्रामीणों ने कहा कि जिस स्तर पर यहां सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं उससे आने वाले दिनों में नई मुसिबतों का सामना करना पड़ सकता है। ग्रामीणों ने बताया कि अवैध कब्जों की शिकायत लिखित में पटवारियों व तहसीलदार से करते हुए कब्जे तोड़ने की मांग की गई है लेकिन राजनैतिक संरक्षण के चलते अधिकारी भी चुप है।
दूसरी तरफ तोरला में चल रहे अवैध कब्जों को राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है और कहा जा रहा है कि धनेन्द्र साहू के गढ़ में सेंध मारने नई टीम तैयार की जा रही है। बहरहाल अभनपुर क्षेत्र में बढ रहे अवैध कब्जों की शिकायतों पर अधिकारियों की खामोशी से मामला गंभीर होता जा रहा है और जिस हिसाब से नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं उससे रमन सरकार की छवि पर असर पड़ सकता है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू चुनाव क्या हारे उन्हें अपने गांव में ही चुनौती मिलने लगी है कहा जाता है कि कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू ने यहां अपने समर्थकों की फौज खड़ी करना शुरू कर दिया है और तोरला में हो रहे बेतहाशा अवैध कब्जों को इसी राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।
अभनपुर विधानसभा क्षेत्र में वैसे तो कई गांवों में अवैध कब्जों की शिकायत आने लगी है लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू के गृह ग्राम तोरला में जिस बड़े पैमाने पर सरकारी जमीनों पर कब्जे किए जा रहे हैं उससे गांव वाले परेशान है। बताया जाता है कि सरकारी जमीनों पर हो रहे अवैध निर्माण की शिकायत तहसीलदार पटवारी से भी कई गई है। लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा समर्थकों की फौज खड़ी करने पूरे विधानसभा क्षेत्र में इस तरह की रणनीति बनाई गई है और इस कार्य में तहसीलदार व पटवारियों को भी मदद करने के मौखिक निर्देश दिए गए है।
हमारे सूत्रों ने बताया कि जिन गांवों में भाजपा समर्थित पंचायत पदाधिकारी है वहां रणनीति के तहत अवैध कब्जों को प्रश्रय दिया जा रहा है। इधर तोरला में ग्रामीणों ने कहा कि जिस स्तर पर यहां सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं उससे आने वाले दिनों में नई मुसिबतों का सामना करना पड़ सकता है। ग्रामीणों ने बताया कि अवैध कब्जों की शिकायत लिखित में पटवारियों व तहसीलदार से करते हुए कब्जे तोड़ने की मांग की गई है लेकिन राजनैतिक संरक्षण के चलते अधिकारी भी चुप है।
दूसरी तरफ तोरला में चल रहे अवैध कब्जों को राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है और कहा जा रहा है कि धनेन्द्र साहू के गढ़ में सेंध मारने नई टीम तैयार की जा रही है। बहरहाल अभनपुर क्षेत्र में बढ रहे अवैध कब्जों की शिकायतों पर अधिकारियों की खामोशी से मामला गंभीर होता जा रहा है और जिस हिसाब से नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं उससे रमन सरकार की छवि पर असर पड़ सकता है।
मंगलवार, 15 जून 2010
क्या पोल-खोल की धमकी की वजह से हुई बाबूलाल की बहाली
बाबूलाल और डा. प्रमोद पहुंचाते थे सीधे पैसा?
करोड़ों रुपए की अघोषित संपत्ति के आरोप में निलंबित आईएएस बाबूलाल अग्रवाल की बहाली को लेकर आम लोगों में जबरदस्त हैरानी है और कहा जा रहा है कि उनके द्वारा पोल खोल देने की धमकी की वजह से ही उनकी बहाली आनन-फानन में की गई और राजस्व मंडल जैसे न्यायालयीन विभाग में बिठाया गया।
ज्ञात हो कि आयकर विभाग ने आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के घर छापे की कार्रवाई कर करोड़ों रुपए के अघोषित आय की संपत्ति बरामद होने की घोषणा की थी इसके बाद सरकार ने बाबूलाल अग्रवाल को निलंबित किया था वह भी निलंबित नहीं करने को लेकर जब हल्ला मचाया गया। बताया जाता है कि तभी से यह अंदेशा था कि बाबूलाल अग्रवाल यादा दिन निलंबित नहीं रह पाएंगे। हमारे एक भरोसेमंद सूत्रों का तो दावा था कि बाबूलाल के पास कई ऐसे सबूत हैं जिससे सरकार को परेशानी हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग के एक सूत्र का तो दावा था कि यहां के बाबूलाल और डा. प्रमोद दो ऐसे अधिकारी रहे हैं जो सीधे पैसा पहुंचाते थे। हालांकि इस आरोप की कोई पुष्टि नहीं हुई है लेकिन जिस तरह से आनन-फानन में बाबूलाल अग्रवाल की बहाली हुई है इसके पीछे पोल-खोल की धमकी का परिणाम ही बताया जा रहा है।
दूसरी तरफ शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल और महामंत्री डॉ. निरंजन हरितवाल ने बाबूलाल अग्रवाल की बहाली पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार गलत और अपराधिक लोगों को संरक्षण दे रही है। अभी ठीक से मामले की जांच भी नहीं हुई है और सरकार ने न केवल बहाली आदेश निकाल दिया बल्कि राजस्व मंडल जैसे न्यायालीन जगह में सदस्य बना दिया। शहर कांग्रेस कमेटी ने बाबूलाल अग्रवाल की बहाली पर बड़ी राशि का लेन-देन होने का आरोप लगाते हुए सीबीआई जांच की मांग भी की है। बहरहाल बाबूलाल अग्रवाल की बहाली को लेकर कई तरह की चर्चा है और इस प्रकरण से सरकार की छवि पर भी असर पड़ा है।
करोड़ों रुपए की अघोषित संपत्ति के आरोप में निलंबित आईएएस बाबूलाल अग्रवाल की बहाली को लेकर आम लोगों में जबरदस्त हैरानी है और कहा जा रहा है कि उनके द्वारा पोल खोल देने की धमकी की वजह से ही उनकी बहाली आनन-फानन में की गई और राजस्व मंडल जैसे न्यायालयीन विभाग में बिठाया गया।
ज्ञात हो कि आयकर विभाग ने आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के घर छापे की कार्रवाई कर करोड़ों रुपए के अघोषित आय की संपत्ति बरामद होने की घोषणा की थी इसके बाद सरकार ने बाबूलाल अग्रवाल को निलंबित किया था वह भी निलंबित नहीं करने को लेकर जब हल्ला मचाया गया। बताया जाता है कि तभी से यह अंदेशा था कि बाबूलाल अग्रवाल यादा दिन निलंबित नहीं रह पाएंगे। हमारे एक भरोसेमंद सूत्रों का तो दावा था कि बाबूलाल के पास कई ऐसे सबूत हैं जिससे सरकार को परेशानी हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग के एक सूत्र का तो दावा था कि यहां के बाबूलाल और डा. प्रमोद दो ऐसे अधिकारी रहे हैं जो सीधे पैसा पहुंचाते थे। हालांकि इस आरोप की कोई पुष्टि नहीं हुई है लेकिन जिस तरह से आनन-फानन में बाबूलाल अग्रवाल की बहाली हुई है इसके पीछे पोल-खोल की धमकी का परिणाम ही बताया जा रहा है।
दूसरी तरफ शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल और महामंत्री डॉ. निरंजन हरितवाल ने बाबूलाल अग्रवाल की बहाली पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार गलत और अपराधिक लोगों को संरक्षण दे रही है। अभी ठीक से मामले की जांच भी नहीं हुई है और सरकार ने न केवल बहाली आदेश निकाल दिया बल्कि राजस्व मंडल जैसे न्यायालीन जगह में सदस्य बना दिया। शहर कांग्रेस कमेटी ने बाबूलाल अग्रवाल की बहाली पर बड़ी राशि का लेन-देन होने का आरोप लगाते हुए सीबीआई जांच की मांग भी की है। बहरहाल बाबूलाल अग्रवाल की बहाली को लेकर कई तरह की चर्चा है और इस प्रकरण से सरकार की छवि पर भी असर पड़ा है।
सोमवार, 14 जून 2010
वेदांता की दादागिरी,गैस त्रासदी पर न्याय?
न्याय प्रणाली को लेकर इन दिनों पूरे देश में बहस चल पड़ी है। प्रक्रिया से विलंब होते फैसले ने नैसर्गिक न्याय के सिध्दांत को तो पीछे छोड़ा ही है आम लोगों का विश्वास भी तोड़ा है। पिछले दिनों न्यायालय के दो फैसले ऐसे आए जिन पर आम जनमानस कहीं से भी सहमत नहीं है और लोकतंत्र के लिए ऐसे फैसलों को उचित भी कैसे माना जा सकता है जिस पर आम लोग ही सहमत न हो।
पहला फैसला छत्तीसगढ क़े न्यायालय से आया कि बालकों ने जो 6 सौ एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा कर रखा है उसे सरकार पैसा ले कर बालको को उपयोग के लिए दे दे। इस पर आम आदमी अवाक है कि अपने लिए अशियाना बनाने वालों को हटा देने वाली सरकार किस तरह से बालको को कोर्ट के फैसले की आड़ पर जमीन देने आमदा है। ऐसी बेशर्मी बहुत कम देखने को मिलती है लेकिन छत्तीसगढ सरकार ने कुछ एक मंत्रियों की असहमति के बाद भी बालको को उसके अवैध कब्जे को देने आमदा है। संवैधानिक व्यवस्था के तहत बने सरकारों को ऐसे फैसलों से इसलिए रोकना चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार को जनादेश नहीं मिला है वह 40-42 प्रतिशत वोट पाकर सकरार बना सकी है यानी उसके खिलाफ 58 से 60 प्रतिशत लोग हैं। ऐसी दशा में नीतिगत फैसले की बात ही बेमानी है।
दूसरा फैसला भोपाल गैस कांड का है और यहां भी भाजपा की सरकार ही बैठी है और जिस तरह से 15 हजार मौतों पर 2 साल की सजा सुनाई गई उससे लोक आवक है। हम यहां यह नहीं कह रहे हैं कि ऐसे फैसले सिर्फ भाजपा शासित रायों में हो रहे हैं और न ही हम यह कहते हैं कि न्यायालय का फैसला ही गलत है लेकिन न्यायप्रणाली के इस दो फैसलों ने आम लोगों में सवाल तो खड़ा किया ही है कि क्या बालको का अवैध कब्जा उचित है और आम आदमी के द्वारा किया गया कब्जा गलता है। क्या उद्योगों और आम आदमी के जमीन कब्जे अलग-अलग श्रेणी में आते हैं तो फिर समान न्याय की बात कहां होगी। ऊपर से न्यायालय के फैसले के बाद डॉ. रमन सरकार ने जिस बेशर्मी से बालको को जमीन देने आमदा दिखी वह सरकार की नीति और नियत बताने के लिए काफी है। एक तरफ राजधानी में पीढ़ियों से व्यापार करने वालों को हटाने की बात की जा रही है और दूसरी तरफ बालको को जमीन देने की बात हो रही है यह सरकार की नीति अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। ऐसे में अरूंधति राय यदि नक्सलियों का समर्थन करती है तो यह उसकी हिमाकत तो है लेकिन गांधी के देश में उसकी प्रासंगिता पर भी सवाल उठने लगेंगे। सरकार अंधेरगर्दी बंद करे वरना जनता का फैसला नई मुसीबत खड़ी सकती है।
पहला फैसला छत्तीसगढ क़े न्यायालय से आया कि बालकों ने जो 6 सौ एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा कर रखा है उसे सरकार पैसा ले कर बालको को उपयोग के लिए दे दे। इस पर आम आदमी अवाक है कि अपने लिए अशियाना बनाने वालों को हटा देने वाली सरकार किस तरह से बालको को कोर्ट के फैसले की आड़ पर जमीन देने आमदा है। ऐसी बेशर्मी बहुत कम देखने को मिलती है लेकिन छत्तीसगढ सरकार ने कुछ एक मंत्रियों की असहमति के बाद भी बालको को उसके अवैध कब्जे को देने आमदा है। संवैधानिक व्यवस्था के तहत बने सरकारों को ऐसे फैसलों से इसलिए रोकना चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार को जनादेश नहीं मिला है वह 40-42 प्रतिशत वोट पाकर सकरार बना सकी है यानी उसके खिलाफ 58 से 60 प्रतिशत लोग हैं। ऐसी दशा में नीतिगत फैसले की बात ही बेमानी है।
दूसरा फैसला भोपाल गैस कांड का है और यहां भी भाजपा की सरकार ही बैठी है और जिस तरह से 15 हजार मौतों पर 2 साल की सजा सुनाई गई उससे लोक आवक है। हम यहां यह नहीं कह रहे हैं कि ऐसे फैसले सिर्फ भाजपा शासित रायों में हो रहे हैं और न ही हम यह कहते हैं कि न्यायालय का फैसला ही गलत है लेकिन न्यायप्रणाली के इस दो फैसलों ने आम लोगों में सवाल तो खड़ा किया ही है कि क्या बालको का अवैध कब्जा उचित है और आम आदमी के द्वारा किया गया कब्जा गलता है। क्या उद्योगों और आम आदमी के जमीन कब्जे अलग-अलग श्रेणी में आते हैं तो फिर समान न्याय की बात कहां होगी। ऊपर से न्यायालय के फैसले के बाद डॉ. रमन सरकार ने जिस बेशर्मी से बालको को जमीन देने आमदा दिखी वह सरकार की नीति और नियत बताने के लिए काफी है। एक तरफ राजधानी में पीढ़ियों से व्यापार करने वालों को हटाने की बात की जा रही है और दूसरी तरफ बालको को जमीन देने की बात हो रही है यह सरकार की नीति अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। ऐसे में अरूंधति राय यदि नक्सलियों का समर्थन करती है तो यह उसकी हिमाकत तो है लेकिन गांधी के देश में उसकी प्रासंगिता पर भी सवाल उठने लगेंगे। सरकार अंधेरगर्दी बंद करे वरना जनता का फैसला नई मुसीबत खड़ी सकती है।
रविवार, 13 जून 2010
गेंदाराम चन्द्राकर के आगे स्कूली शिक्षा विभाग बेबस

जांच रिपोर्ट के बाद भी गेंदाराम पर कार्रवाई नहीं
मंत्री को महिना पहुंचाने की चर्चा?
क्या कोई कल्पना कर सकता है कि पीएससी में चयन के लिए दस्तावेजों में धोखाधड़ी करने के आरोप सिध्द होने के बाद भी कोई व्यक्ति पर कार्रवाई न हो। लेकिन प्रदेश के दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के इस विभाग में गेंदाराम चंद्राकर ने यह कारनामा दिखलाया है। तत्कालीन शिक्षा
सचिव नंद कुमार और पीएससी के सचिव प्रदीप पंत के द्वारा अलग-अलग की गई जांच के बाद पेश रिपोर्ट में गेंदाराम चंद्राकर को दोषी तो पाया गया लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई नहीं होने की वजह उनके राजनैतिक पहुंच के अलावा ऊपर तक पैसा पहुंचाने को बताया जा रहा है।छत्तीसगढ़ सरकार में बैठे लोग किस तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और कैसे अपराधियों को बचा रहे हैं यह गेंदाराम चन्द्राकर के मामले में देखा जा सकता है। वैसे तो पीएससी ने जो परीक्षा ली थी उसके चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठाये जाते रहे हैं और गेंदाराम चन्द्राकर का मामला तो सरकार के मुंह पर कालिख है। पीएससी में गेंदाराम चन्द्राकर को सर्वाधिक अंक दिए गए इसकी वजह भी उनके राजनैतिक एप्रोच और परीक्षा नियंत्रक रहे उनके सहपाठी बद्रीप्रसाद कश्यप को बताया जा रहा है।
दरअसल पीएससी की इस गड़बड़ी की जब शिकायत हुई तो सबसे पहले उनके चयन और उनके द्वारा चयन हेतु दिए गए दस्तावेज की जांच पीएससी ने ही की और पीएससी के सचिव प्रदीप पंत ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि गेंदाराम चन्द्राकर द्वारा कूट रचित दस्तावेज प्रस्तुत किया जाना एवं उसके आधार पर चयनित हो जाना परिलक्षित हुआ है और उन्होंने शिक्षा सचिव नंदकुमार को कार्रवाई करने पत्र लिखा। इस पत्र के शिक्षा विभाग में आते ही हड़कम्प मच गया और प्रकरण की जांच कराने के बाद शिक्षा सचिव नंदकुमार ने माना कि गेंदाराम चन्द्राकर ने पीएससी में चयनित होने दस्तावेजों में कूट रचना की है।
बताया जाता है कि जैसे ही गेंदाराम को अपने खिलाफ होने वाली कार्रवाई का पता चला उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया। कहा तो यहां तक जाता है कि भाजपा के एक सांसद से लेकर विभागीय मंत्री तक पैसा पहुंचाया गया और फाईल दबा दी गई।
छत्तीसगढ शिक्षा विभाग का यह इकलौता कारनामा नहीं है और न ही गेंदाराम चन्द्राकर का यह इकलौता प्रकरण है। उच्च स्तरीय लेन-देन कर जिस तरह से शिक्षा विभाग में खेल चल रहा है यदि इसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तो कई लोग जेल के सलाखों तक पहुंच सकते हैं। बहरहाल गेंदाराम चन्द्राकर के मामले में सचिव स्तर के रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई नहीं होना अनेक संदेहों को जन्म देता है साथ ही सरकार की नियत पर भी सवालिया निशान लगाता है।
संवाद के प्रबंध समिति हैं,भ्रष्ट अफसरों के मोहरे!
खास लोगों को नियमित करने की कोशिश
जनसंपर्क की सहयोगी माने जाने वाली संवाद में लूट खसोट चरम पर है और इसके संचालन के लिए बनी प्रबंध समिति के सदस्य सिर्फ अफसरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं यही वजह है कि इस बैठक में अफसरों को भुगतान की स्वीकृति दी जाती है और अब तो गलत ढंग से संविदा नियुक्ति वालों को अफसरों के इशारे पर नियमित करने की योजना बनाई जा रही है।
संवाद में चल रहे खेल पर शासन का ध्यान क्यों नहीं है इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। बताया जाता है कि अब भ्रष्ट अफसरों ने संविदा के पदों से उनके कमीशनखोरी और हेराफेरी में साथ देने वालों की एक टीम बना ली है। पिछले दिनों 40 करोड़ रुपयों की आडिट आपत्तियां की गई। इन आपत्तियों के बाद से टीम भावना बढ़ती देखी जा रही है। जिस आडिट रिपोर्ट में आपत्तियां का उल्लेख हैं, उसे दबाने के कुकर्म में सभी एकजुट दिख रहे हैं। भ्रष्ट अफसरों द्वारा अपने ऐसे संविदा साथियों को संवाद में कथित प्रबंध समिति की आड़ में नियमित करने की कोशिश की जा रही है। प्रबंध समिति के अध्यक्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह है इसलिए कुछ लिखकर पास करा लो आपत्ति कोई कर नहीं सकता।
संवाद के संचालन के लिए एक प्रबंध समिति बनी है। प्रबंध समिति के माध्यम से लिए गए फैसले को देखकर ऐसा नहीं लगता कि इसके सदस्यों ने कभी संस्था के हित में कुछ सोचा भी होगा। कोई भी कह सकता है कि समिति के सदस्यों को संवाद के फैसलों में उनके अधिकारों और दायित्वों की सीमा तक का पता नहीं होगा। यही कारण है कि सदस्य संवाद पर शासन करने वाले जनसंपर्क अफसरों के लिए मोहरों के समान है। दरअसल प्रबंध समिति के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। प्रबंध समिति के सदस्य अफसर गांधीजी के तीन बंदरों की तरह हैं जो पिछले दस सालों में कुछ भी न देख पाए, न सुन पाए और न ही कुछ बोल ही पाए। किसी भी सदस्य ने कभी किसी मामले में पूछताछ करना भी जरूरी नहीं समझा तो आपत्ति करने की हिम्मत दिखाना तो बहुत दूर की बात है। मुख्यमंत्री का विभाग होने से कोई भी पूछताछ के बारे में सोच भी कैसे सकता है। ऐसी समिति के नाम पर किए गए फैसलो को क्यों मान्य किया जाना चाहिए जिनके सदस्यों को किसी बात पर सहमत और असहमत होने का अधिकार न हो तो। जनसंपर्क और संवाद के प्रभारी अधिकारियों ने बहुत अच्छी तरह से गांधीजी के इन बंदरों को इस्तेमाल किया है यही कारण है कि राय के बाहर के लोग यहां बिना सर्टिफिकेट के नौकरी कर रहे हैं। संवाद के संविदा के सबसे बड़े पद पर एक पश्चिम बंगाल का आदमी बैठा है जिसके पास संबंधित पद की अनिवार्य शैक्षिणक योग्यता नहीं है। उसने ऐसी पढ़ाई की है कि कहीं भी उसके प्रमाण पत्रों के आधार पर रोजगार पंजीयन नहीं हो सका। बर्थ डेट सर्टिफाई करने के लिए उसे 10 कक्षा का प्रवेश पत्र आवेदन के साथ संलग्न करना पड़ा है। अनुभव प्रमाण पत्र भी फर्जी है, जिस संस्था को खुद बने 3 साल हुए थे उसने अपने यहां काम करने का 5 साल का अनुभव प्रमाण पत्र दिया।
जनसंपर्क की सहयोगी माने जाने वाली संवाद में लूट खसोट चरम पर है और इसके संचालन के लिए बनी प्रबंध समिति के सदस्य सिर्फ अफसरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं यही वजह है कि इस बैठक में अफसरों को भुगतान की स्वीकृति दी जाती है और अब तो गलत ढंग से संविदा नियुक्ति वालों को अफसरों के इशारे पर नियमित करने की योजना बनाई जा रही है।
संवाद में चल रहे खेल पर शासन का ध्यान क्यों नहीं है इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। बताया जाता है कि अब भ्रष्ट अफसरों ने संविदा के पदों से उनके कमीशनखोरी और हेराफेरी में साथ देने वालों की एक टीम बना ली है। पिछले दिनों 40 करोड़ रुपयों की आडिट आपत्तियां की गई। इन आपत्तियों के बाद से टीम भावना बढ़ती देखी जा रही है। जिस आडिट रिपोर्ट में आपत्तियां का उल्लेख हैं, उसे दबाने के कुकर्म में सभी एकजुट दिख रहे हैं। भ्रष्ट अफसरों द्वारा अपने ऐसे संविदा साथियों को संवाद में कथित प्रबंध समिति की आड़ में नियमित करने की कोशिश की जा रही है। प्रबंध समिति के अध्यक्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह है इसलिए कुछ लिखकर पास करा लो आपत्ति कोई कर नहीं सकता।
संवाद के संचालन के लिए एक प्रबंध समिति बनी है। प्रबंध समिति के माध्यम से लिए गए फैसले को देखकर ऐसा नहीं लगता कि इसके सदस्यों ने कभी संस्था के हित में कुछ सोचा भी होगा। कोई भी कह सकता है कि समिति के सदस्यों को संवाद के फैसलों में उनके अधिकारों और दायित्वों की सीमा तक का पता नहीं होगा। यही कारण है कि सदस्य संवाद पर शासन करने वाले जनसंपर्क अफसरों के लिए मोहरों के समान है। दरअसल प्रबंध समिति के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। प्रबंध समिति के सदस्य अफसर गांधीजी के तीन बंदरों की तरह हैं जो पिछले दस सालों में कुछ भी न देख पाए, न सुन पाए और न ही कुछ बोल ही पाए। किसी भी सदस्य ने कभी किसी मामले में पूछताछ करना भी जरूरी नहीं समझा तो आपत्ति करने की हिम्मत दिखाना तो बहुत दूर की बात है। मुख्यमंत्री का विभाग होने से कोई भी पूछताछ के बारे में सोच भी कैसे सकता है। ऐसी समिति के नाम पर किए गए फैसलो को क्यों मान्य किया जाना चाहिए जिनके सदस्यों को किसी बात पर सहमत और असहमत होने का अधिकार न हो तो। जनसंपर्क और संवाद के प्रभारी अधिकारियों ने बहुत अच्छी तरह से गांधीजी के इन बंदरों को इस्तेमाल किया है यही कारण है कि राय के बाहर के लोग यहां बिना सर्टिफिकेट के नौकरी कर रहे हैं। संवाद के संविदा के सबसे बड़े पद पर एक पश्चिम बंगाल का आदमी बैठा है जिसके पास संबंधित पद की अनिवार्य शैक्षिणक योग्यता नहीं है। उसने ऐसी पढ़ाई की है कि कहीं भी उसके प्रमाण पत्रों के आधार पर रोजगार पंजीयन नहीं हो सका। बर्थ डेट सर्टिफाई करने के लिए उसे 10 कक्षा का प्रवेश पत्र आवेदन के साथ संलग्न करना पड़ा है। अनुभव प्रमाण पत्र भी फर्जी है, जिस संस्था को खुद बने 3 साल हुए थे उसने अपने यहां काम करने का 5 साल का अनुभव प्रमाण पत्र दिया।
शनिवार, 12 जून 2010
सेटिंग और दलाली का मजा...
राज्य बनने के पहले भोपाल के पत्रकारों और पत्रकारिता की स्थिति को लेक रायपुर में अक्सर निंदा की जाती थी कि वहां किस तरह की पत्रकारिता होती है कैसे पत्रकार दो-पांच के लिए मंत्रियों और अधिकारियों से सेटिंग कर लेते हैं।
छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद एक-दो साल तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। मत्था बदल अखबार से लेकर मंत्रियों व अधिकारियों के दलाली करते पत्रकार नजर आने लगे हैं। पिछले दिनों एक अखबार में जब एक अधिकारी के खिलाफ लगातार खबरें छपने लगी तो साप्ताहिक निकालने वाले अखबार के कथित पत्रकार ने खबर रूकवाने सौदेबाजी की और सेटिंग के एवज में न केवल अधिकारी से पैसे लिए बल्कि पत्रकार से भी कमीशन ले लिया। सौदा भी बड़ा नहीं था लेकिन इसकी चर्चा काफी हाउस तक जा पहुंचा है।
छत्तीसगढ में चल रहे इस दलाली और सेटिंग के खेल में कुछ प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार भी शामिल है कुछ इश्योरेंस पालिसी बेच रहे हैं तो कुछ काम ले रहे हैं। इस पत्रकार के द्वारा तो एक मंत्री से भी सेटिंग कर खबर रुकवाने का काम करने की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पत्रकारिता के इस नए परिवादी से आम लोगों का कितना भला होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन नेताओं और अधिकारियों की डकैती जोर-शोर से चल पड़ी है।
और अंत में...
प्रतिष्ठित माने जाने वाले एक अखबार के पत्रकार को एक अधिकारी की खबर लग गई। पहले उसने उससे खबर पर चर्चा की और उठते हुए एक पॉलिसी थमा दी।
छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद एक-दो साल तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। मत्था बदल अखबार से लेकर मंत्रियों व अधिकारियों के दलाली करते पत्रकार नजर आने लगे हैं। पिछले दिनों एक अखबार में जब एक अधिकारी के खिलाफ लगातार खबरें छपने लगी तो साप्ताहिक निकालने वाले अखबार के कथित पत्रकार ने खबर रूकवाने सौदेबाजी की और सेटिंग के एवज में न केवल अधिकारी से पैसे लिए बल्कि पत्रकार से भी कमीशन ले लिया। सौदा भी बड़ा नहीं था लेकिन इसकी चर्चा काफी हाउस तक जा पहुंचा है।
छत्तीसगढ में चल रहे इस दलाली और सेटिंग के खेल में कुछ प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार भी शामिल है कुछ इश्योरेंस पालिसी बेच रहे हैं तो कुछ काम ले रहे हैं। इस पत्रकार के द्वारा तो एक मंत्री से भी सेटिंग कर खबर रुकवाने का काम करने की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पत्रकारिता के इस नए परिवादी से आम लोगों का कितना भला होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन नेताओं और अधिकारियों की डकैती जोर-शोर से चल पड़ी है।
और अंत में...
प्रतिष्ठित माने जाने वाले एक अखबार के पत्रकार को एक अधिकारी की खबर लग गई। पहले उसने उससे खबर पर चर्चा की और उठते हुए एक पॉलिसी थमा दी।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)