सोमवार, 19 जुलाई 2010

सरकार की करतूत पर कांग्रेसियों की खामोशी से उठते सवाल


कांग्रेसियों की सेटिंग या बी टीम?
यह तो अब मारा तो मारा अब मारा के देख की कहावत है या चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत है यह तो जनता ही जाने लेकिन छत्तीसगढ़ में लगातार हार के बाद भी कांग्रेसियों ने जिस तरह से भाजपा के खिलाफ खामोशी ओढ़ ली है उससे आम लोगों में कई तरह की चर्चा है। खासकर आधे छत्तीसगढ़ में शासन नहीं वाली सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद भी कांग्रेसियों की खामोशी को लेकर कोई सेटिंग बता रहा है तो कोई इसे भाजपा की बी टीम बताने से नहीं चूक रहा है।
छत्तीसगढ़ में लगातार चुनाव हारने से पस्त हो चुके छत्तीसगढ़ कांग्रेस की भूमिका को लेकर सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि कांग्रेसी आंदोलन से बच रहे है। छसपा नेता अनिल दुबे तो साफ कहते हैं कि प्रदेश कांग्रेस भाजपा की बी टीम बनकर काम कर रही है। जबकि बिजली से लेकर धर्म के अनादर की बात हो। दलई से लेकर बाबूलाल अग्रवाल का मामला हो या फिर सुप्रीम कोर्ट की सरकार पर की गई टिप्पणी हो। कांग्रेसी कुछ भी बोलने से बचते रहे।
एक भाजपा नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि यदि स्टेट में कांग्रेस की सरकार होती और ऐसी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने किया होता तो वे गांव-गांव में सरकार का जुलूस निकाल देते और नाक में दम करत देते। लेकिन कांग्रेसी क्यों चुप हैं जनता समझ रही है।
इस संबंध में जब हमने प्रदेशाध्यक्ष धनेन्द्र साहू से बात की तो उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार को एक भी दिन बने रहने का अधिकार नहीं है लेकिन आंदोलन के सवाल पर वे बात टाल गए। अन्य नेता तो इस मामले में किसी भी तरह की टिप्पणी से बचते रहे और बड़े नेताओं पर मामला टाल दिया। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद कांग्रेसियों की खामोशी को लेकर आम लोगों में ही नहीं कांग्रेस के छोटे कार्यकर्ता भी बेहद नाराज हैं और इसकी शिकायत सोनिया गांधी से भी की जा रही है।

स्टेट प्लेन से बृजमोहन ने की पारिवारिक यात्रा


प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के द्वारा राय सरकार की हवाई जहाज से की गई पारिवारिक यात्रा पर विवाद खड़ा होने लगा है। हालांकि कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने फिलहाल इसमें कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है लेकिन इस मामले को विधानसभा में उठाए जाने की चर्चा है।
वैसे तो पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का विवादों से पुराना नाता है और इस बार वे पारिवारिक यात्रा में स्टेट प्लेन का उपयोग कर विवाद में आ गए है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पीडब्ल्यूडी मंत्री ने गुरुवार को दोपहर करीब साढ़े 12 बजे स्टेट प्लेन लेकर परिवार सहित महाराष्ट्र गए थे जहां से वे शुक्रवार को दोपहर लगभग 2.30 बजे लौटे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी, पुत्र के अलावा भतीजे व बहनोई के साथ उनके पीए श्री साहू भी थे। हालांकि वे किस कार्यक्रम में और कहां गए थे यह पता नहीं चला है क्योंकि उनका ससुराल गोंदिया है जबकि उनके अकोला जाने की चर्चा है।
उल्लेखनीय है कि स्टेट प्लेन के दुरुपयोग की चर्चा काफी अरसे से रही है और अक्सर कोई न कोई सरकारी कार्यक्रम तय कर इस तरह की हवाई यात्रा की जाती है। इस संबंध में हमने संबंधित पक्षों से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे। बहरहाल स्टेट प्लेन से पारिवारिक यात्रा को लेकर यहां कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार को लेकर सरकार बुरी तरह घिर चुकी है ऐसे में मंत्रियों की करतूतों से पार्टी की छवि पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

रविवार, 18 जुलाई 2010

जनसंपर्क आयुक्त का मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला!


बड़ों को बांटा-छोटों को डांटा
सरकार के इशारे पर हो रही कार्रवाई!
वैसे तो कोई भी सरकार अखबारों के खिलाफ मौका तलाशने से परहेज नहीं करती लेकिन भाजपा सरकार इस मामले में कुछ यादा ही बदनाम है। ताजा मामला जनसंपर्क आयुक्त एन. बैजेन्द्र कुमार का नवभारत में छपा वह बयान है जिसमें उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार संख्या की जांच करने कलेक्टरों से कहते हुए विज्ञापन नहीं देने की बात कही है जबकि बड़े अखबारों को विज्ञापन की एवज में एडवांश राशि दी जा रही है। इतने बड़े निर्णय क्या सरकार के इशारे पर हुए हैं या अपनी करतूत छापने वाले अखबारों को सबक सीखने किया गया है। यह जांच का विषय है।
वैसे मीडिया जगत में इस बात की चर्चा शुरु से रही है कि जब से एन. बैजेन्द्र कुमार ने आयुक्त जनसंपर्क का पद संभाला है तभी से वे सरकार के खिलाफ छपने वाली खबरों को लेकर मीडिया के खिलाफ तीखी टिप्पणी करना शुरु कर दिया था। हालांकि तब से किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया था। बताया जाता है कि उनके आने के बाद जनसंपर्क व संवाद में घपलेबाजी बढ़ने लगी और इसे दबाने नवभारत, भास्कर, नईदुनिया जैसे बड़े अखबारों को एडवांश में राशि दी जाने लगी और छोटे अखबार खासकर वे अखबार जो जनसंपर्क व संवाद की करतूत छाप रहे थे उन पर नकेल कसना शुरु कर दिया। उन्हीं छोटे अखबारों को विज्ञापन दिए जाने लगे जो चापलूसी करते थे और उनमें भी यादा चापलूसी करने वालों को अधिक विज्ञापन दिया जाने लगा।
बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ सरकार की रूचि शुरु से ही स्थानीय अखबारों व पत्रकारों को प्रताड़ित करने की मानी जाती है। यही वजह है कि भोपाल या प्रदेश के बाहर से प्रकाशित होने वाले अखबारों को मनमाने तरीके से अनाप-शनाप कीमतों का विज्ञापन दिया जाने लगा और छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाले अखबारों को प्रताड़ित किया गया।
यहीं नहीं पिछले दिनों तो जनसंपर्क आयुक्त एन. बैजेन्द्र कुमार ने अति कर दी जब वे आरएनआई द्वारा डी ब्लाक किए जाने के मौके का फायदा उठाते हुए यह कह दिया कि इन अखबारों के प्रसार की कलेक्टरों द्वारा जांच कराई जाएगी और इन्हें विज्ञापन भी नहीं दिए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि एडवांश राशि का भरपूर विज्ञापन पाने वाले अखबार तो सरकार की चापलूसी करते हैं जबकि छोटे अखबार वाले सरकार के खिलाफ जमकर छापते हैं। यही वजह है कि सरकार ऐसे अखबारों पर शिकंजा कसने की कोशिश करती है। इस संबंध में श्रमजीवी पत्रकार संघ ने ऐसे अखबार वालों की बैठक बुलाते हुए कहा है कि सरकार के इशारे पर आयुक्त ने जो बात कही है उसके लिए वे माफी मांगे अन्यथा पत्रकार संघ सड़क की लड़ाई लड़ेगी।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

अंतत: उमेश अग्रवाल को हटाना पड़ा


भंडार गृह निगम के प्रबंध संचालक उमेश अग्रवाल को अंतत: सरकार को हटाना ही पड़ा। अपनी करतूतों से सदैव सुर्खियों में रहे उमेश अग्रवाल की वजह से खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले और सचिव विवेक ढांड को विदेश यात्रा से आने के बाद मुख्यमंत्री के गुस्से का सामना करना पड़ा था।
ज्ञात हो कि भंडार गृह निगम के प्रबंध संचालक उमेश अग्रवाल के कारनामों की खबर विस्तार से प्रकाशित की थी। उनके रवैये से भंडार गृह के कर्मचारी न केवल नाराज थे बल्कि उनके खिलाफ भ्रष्ट अधिकारियों को पनाह देने व मंत्री के नाम से पैसा खाने का आरोप भी लगते रहा है।
बताया जाता है कि स्वयं को मंत्री का रिश्तेदार और ताकतवार बताने वाले उमेश अग्रवाल ने हद तो तब कर दी थी जब मुख्यमंत्री द्वारा विदेश यात्रा में प्रतिबंध लगाने के बाद वे मंत्री श्री मोहिले और सचिव विवेक ढांड के साथ निगम के खर्चे से विदेश चले गए थे। इस खबर के बाद मुख्यमंत्री ने विवेक ढांड को न केवल जमकर लताड़ा बल्कि श्री मोहिले की भी खबर ली थी। तब उमेश अग्रवाल अपने को साफ बचाने में लगे थे। लेकिन बुलंद छत्तीसगढ़ ने भंडार गृह निगम की खबरों से आम लोगों को लगातार अवगत कराया और अंतत: सरकार को उमेश अग्रवाल को हटाना ही पड़ा। बहरहाल उमेश अग्रवाल के जाने से यहां कर्मचारियों में खुशी की लहर है।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

नेताओं और अधिकारियों का जोड़ जनता कैसे निकालेगी इसका तोड़!

बढ़ती मंहगाई को लेकर बंद का असर और इसका नुकसान तो सामने आ ही गया। इसका फायदा किसे मिलेगा। अभी कहना मुश्किल है। सुषमा स्वराज ने तो बंद के औचित्य पर पूछे गए सवाल पर साफ कह दिया कि वे तो विपक्षी धर्म की भूमिका अदा कर रहे हैं। आज देश में मंहगाई की मार से आम आदमी त्रस्त है। मंहगाई बढ़ने की मूल वजह पर न तो सरकार को मतलब है और न ही विपक्ष को ही इससे कोई सरोकार है। सब राजनीति कर रहे हैं और जनता तमाशाबीन बनी हुई है। क्योंकि जनता को विपक्ष भी इतना ही समझा रही है कि मनमोहन सिंह की नीतियों की वजह से मंहगाई बढ़ रही है क्योंकि विपक्ष भी इससे राजनैतिक फायदे लेना चाहती है इसलिए वह आम लोगों को कमी नहीं बताएगी कि महंगाई बढ़ने की असली वजह क्या है? क्योंकि विपक्ष भी जानती है कि जिस दिन जनता असली वजह समझ जाएगी उस दिन उसकी भी राजनीति खत्म हो जाएगी।
क्या वास्तव में मंहगाई बढ़ने की वजह पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में ईजाफा करना और सरकार की उदारीकरण व्यवस्था है। नहीं। कतई ये कारण नहीं है मंहगाई बढ़ने के। मंहगाई बढ़ने की असली वजह है अधिकारियों और नेताओं का गठजोड़। क्योंकि दूसरों से यादा इन्हें अपनी चिंता है। इसलिए सुषमा स्वराज ने बड़ी बेशर्मी से कह दिया कि अब सांसदों का वेतन भत्ता बढ़ना चाहिए? आखिर सांसदों का वेतन भत्ता क्यों बढ़ना चाहिए? ये लोग कौन सा आम लोगों के हितों पर काम कर रहे हैं। आजादी के 60 सालों से इस देश में विकास हुआ है तो किसके लिए? जरा सुषमा स्वराज और उनकी पूरी पार्टी बताएगी कि उन्हें वेतन क्यों चाहिए? जब वे स्वयं को समाजसेवी, जेन सेवी और न जाने क्या क्या कहते हैं तब वेतन भत्ता क्यों?
आजादी के 60 सालों में इस देश की आधी आबादी आज भी पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मूल अधिकारों से वंचित है तब इन्हें वेतन-पेंशन लेने का हक किस तरह से जाता है। क्या बेशर्मी की सारी हदें ये पार कर चुके हैं क्या इनमें नैतिकता नहीं है या मुफ्तखोरी की आदत ने इन्हें सिर्फ अपनी तकलीफें दिखती हैं। क्या किसी सरकार के पास इस बात का जवाब है कि वे जनता से टैक्स के रूप में मिले पैसों में से आधी राशि अपनी सुविधाओं पर खर्च क्यों करते हैं जबकि जनता को वे साफ पानी तक नहीं पिला पा रहे हैं।
दरअसल मंहगाई की असली वजह नेताओं और अधिकारियों को दी जा रही है सुविधाओं में हो रही लगातार बढ़ोत्तरी ही बढ़ती मंहगाई की असली वजह है। कोई राजनैतिक दल क्यों घोषणा नहीं करता कि जब तक सभी लोगों के लिए स्वास्थ्य शिक्षा और पानी का इंतजाम नहीं हो जाता तब तक उनके दल के लोग सरकार से वेतन-भत्ता पेंशन नहीं लेंगे। स्वास्थ्य, पानी, शिक्षा की बात तो छोड़ दो, विधायकों-सांसदों में इतना साहस नहीं है कि वे शराब दुकानों को नियमानुसार खुलवा सके। अपने-अपने क्षेत्र में बिक रहे अवैध दारू बंद करवा सके।
इसलिए ये सांसद और विधायक तथा राजनैतिक दल मंहगाई की असली वजह जनता को नहीं बतलाते। लेकिन जनता अब जागने लगी है। अब तक तो सिर्फ जूते चप्पल फेंके जाते रहे हैं। यदि राजनैतिक दलों ने अब भी जनता के पैसों से अपनी सुविधा बढ़ाने की होड़ से पीछे नहीं हटे तो... कदम आगे भी बढ़ेगा।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

रामकृष्ण मठ का यह कैसा खेल सत्ताधीशों से बढ़ाओ मेल


पद की चापलूसी या पैसे का लालच
यह राजनीति की गंदी तस्वीर है या मठाधीशों का कुत्सित चेहरा। यह तो जनता ही तय करेगी। लेकिन अब तक निर्विवाद रहे रामकृष्ण मठ के नागपुर मठ ने ऐसा कुछ कर दिया है जिससे मठ के क्रियाकलापों पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है और इसे लेकर मठ के प्रति श्रध्दा व उनके कार्यों पर नमन करने वालों के दिलों पर ठेंस पहुंची है। दरअसल मठ ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के माता-पिता की तस्वीर 'विवेकानंद राष्ट्र को आह्वान' नामक किताब पर छाप दी है।
धर्मग्रंथों के अपमान और हिन्दूत्व की रक्षा के नाम पर इस देश में जिस तरह का बवाल मचा है। वह अंयंत्र कहीं नहीं है। हिन्दूत्व की परिभाषा सब अपने-अपने ढंग से देने लगे हैं और धर्म का दुरूपयोग भी अपने स्वार्थ के लिए करने लगे हैं। इस देश में हिन्दुत्व की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी हो या शिवसेना सभी ने धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश की है।
'समरथ को नहीं दोष गोसाई' की तर्ज पर चाहे वह किसी भी धर्म के हो पैसे व पद वालों ने धर्म का सबसे यादा अपमान किया है। यहां तक कि विभिन्न सरकारों ने भी अपने हिसाब से इसका दुरूपयोग किया। इस सबके बावजूद इस देश में अभी भी ऐसा संस्थाएं है जो राष्ट्र निर्माण की दिशा में धर्म क्षेत्र में काम कर रही हैं उनमें से एक है रामकृष्ण मठ या रामकृष्ण मिशन। शुध्द रुप से राष्ट्रीय निर्माण में लगे इस संस्था के खिलाफ आज तक किसी ने भी उंगली उठाने की हिम्मत इसलिए नहीं कि क्योंकि इस मठ या मिशन ने नि:स्वार्थ रूप से राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
लेकिन लगता है पैसे व राजनीति ने इस संस्था को भी उसी राह पर खड़ा कर दिया है जो सिर्फ धर्म की आड़ में नाम पैसा सबकुछ बना लेना चाहता है। ऐसा ही मामला सामने आया है जो रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा माई और विवेकानंद के आदर्शों को चाक-चाक करने वाला है। रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित विवेकानंद राष्ट्र को आह्वान शीर्षक वाली इस किताब के जैसे ही पन्ने पलटे जाएंगे स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह और आखरी पृष्ठ पर स्व. श्रीमती सुधा देवी सिंह की तस्वीर छापी गई है। 12 रुपए कीमत वाली इस किताब को बकायदा बेची भी जा रही है।
रामकृष्ण मठ नागपुर द्वारा किस तरह की पुस्तक बेची जानी है यह तो मठ को तय करना है और वह इसके लिए स्वतंत्र भी है। लेकिन सवाल यह है कि मठ के द्वारा सिर्फ इसी तस्वीर वाली किताबें क्यों बेची जा रही है? इसके पीछे उनका उद्देश्य क्या है? सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि जो तस्वीरें छपी हैं वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के माता-पिता की है। ऐसे में मठ पर यह आरोप लगना स्वाभाविक है कि मठ के द्वारा अनाप-शनाप पैसा लेकर लोगों के दिलों में बैठे मठ के प्रति विश्वास को भुनाना है या सत्ता प्रमुख को खुश करना है।
इस संबंध में जब हमने रायपुर स्थित विवेकानंद आश्रम से संपर्क किया तो वे कुछ भी कहने से बचते रहे वहीें नागपुर मठ के पदाधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका। बहरहाल रामकृष्ण मठ नागपुर के इस कारनामें का असली मकसद तो पदाधिकारी ही जाने लेकिन उनके इस कृत्य ने रामकृष्ण संस्थान पर श्रध्दा रखने वालों के दिलों में न केवल ठेस पहुंचाई है बल्कि यह सवाल भी खड़े किए है कि यहां बैठे पदाधिकारी क्या करने वाले हैं जिसका जवाब देर सबेर उन्हें देना ही होगा।
इसी किताब का अंश
जिसकी अवहेलना हुई
'ऊंचे पद वालों यया धानिकों पर भरोसा न करना। उनमें जीवनी शक्ति नहीं है वे तो जीते हुए मुर्दे के समान है। भरोसा तुम लोगों पर है, गरीब, पद मर्यादा रहित किन्तु विश्वासी तुम्ही लोगों पर। ईश्वर पर भरोसा रखो। किसी चालबाजी की आवश्यकता नहीं, उससे कुछ भी नहीं होता.... अपना सारा जीवन इस तीस करोड़ लोगों के उध्दार के लिए अर्पण कर देने का व्रत लो जो दिनों दिन डूबते जा रहे हैं। पेज नं.-52 (पन्ना 1, 83-84)।'
0 इस समय हम पशुओं की अपेक्षा कोई अधिक नीति परायण नहीं है। केवल समाज के अनुशासन के भय से हम कुछ गड़बड़ नहीं करते। यह समाज आज कह दे कि चोरी करने से दण्ड नहीं मिलेगा, तो हम इसी समय दूसरे की सम्पत्ति लूटने को टूट पड़ेंगे। पुलिस हमें सच्चरित्र बनाती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लोप की आशंका ही हमें नीति परायण बनाती है और वस्तुस्थिति तो यह है कि हम पशुओं से कुछ अधिक ही उन्नत हैं। (पृष्ठ-42 (ज्ञा.यो. 275)
0 दुष्कर्म द्वारा हम केवल अपना ही नहीं वरन् दूसरों का भी अहित करते हैं और सत्कर्म द्वारा हम अपना तथा दूसरो का भी भला करते हैं.....। (पृष्ठ- 47 (क.यो.88)
0 इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जाएगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड़ नहीं है.....। (पृष्ठ 53 (पन्ना 1, 177-178)

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

बिहारी बाबूओं की तिकड़ी का कमाल

छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद सभी क्षेत्रों में दूसरे प्रदेश के लोग तेजी से आए हैं। इससे पत्रकारिता का क्षेत्र भी अछूता नहीं रह गया है। सब अपने-अपने हिसाब से पत्रकारिता कर रहे हैं। नवभारत, जनसत्ता और हरिभूमि में प्रमुख पदों पर बैठे तीनों बिहारी बाबूओं की तिकड़ी इन दिनों सुर्खियों में है।
अखबारों के बीच चल रहे प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भी इन तीनों की दोस्ती कमाल की है और कहा जाता है कि इससे अखबारों का क्या भला हो रहा है यह तो अखबार मालिक जाने लेकिन इन तीनों का जबरदस्त भला हो रहा है। भला होने के इस खेल में पुलिस के मुखिया का भी बड़ा रोल है चूंकि वे भी सरनेम नहीं लिखते और बिहारी ही कहलाना पसंद करते हैं। साहित्य प्रेमी इस अधिकारी की मदद पाकर बगैर सरनेम वाले नवभारत और जनसत्ता वाले बहुत खुश है लेकिन हरिभूमि वाले थोड़े घाटे में हैं और दिल्ली चले गए।
अखबारों की बढ़ी रूचि
छत्तीसगढ़ में इन दिनों कई अखबारों के आगमन की चर्चा मीडिया जगत में है। पत्रकार खुश हैं कि चलों एक बार फिर सबकी तनख्वाह बढ़ेगी। राजस्थान पत्रिका ने तो सर्वे भी शुरु कर दिया है। पीपुल्स और राज एक्सप्रेस भी आने की जुगाड़ में लगे हैं। इसके अलावा कुछ और अखबारों के आने की बीच चर्चा इस बात की भी है कि भ्रष्ट जनसंपर्क के अधिकारी यहां अखबारों को आने का निमंत्रण देते यह भी कहते हैं कि सरकार भ्रष्ट है। विज्ञापन भरपूर है।
शेख ईस्माइल समवेत शिखर की ओर
युगधर्म से पत्रकारिता की शुरुआत करते हुए सांध्य दैनिक अग्रदूत के संपादक बन बैठे शेख ईस्माईल की तकदीर बुलंद है या नहीं यहतो तब पता चलेगा जब वे समवेत शिखर के संपादक बन जाएंगे।
पुसदकर फिर नौकरी पर
युगधर्म से ही पत्रकारिता शुरु करने वाले अनिल पुसदकर को वैसे तो नौकरी रास नहीं आती। वे स्वयं यह कहते नहीं थकते कि वे तभी तक नौकरी करते हैं जब तक मालिक जैसा रहते है। इन दिनों वे नेशनल लुक पहुंच गए हैं और पुलिस परिक्रमा लिख रहे हैं। भास्कर और लुक में फर्क तो रहेगा ही।
इस्पात टाईम्स की छटपटाहट
रायगढ़ से राजधानी तक धोखा खा चुके ईस्पात टाईम्स एक बार फिर रायपुर से कुछ करने की जुगत जमा रहा है। हालांकि मशीन रायपुर से उखड़ गई है इसलिए ब्यूरो से ही काम चलाने की मंशा है। इसलिए आदमी तलाशा जा रहा है।
संतोष साहू को दोहरा लाभ
प्रेस फोटोग्राफर संतोष साहू को दैनिक भास्कर से आफर मिला और वे हरिभूमि छोड़ दिया। तनख्वाह भी डबल और बैनर भी डबल।
और अंत में....
राजस्थान पत्रिका के आने की हलचल ने पत्रकारों में भगदड़ तो मचाई ही है। हरिभूमि से भास्कर पहुंचे दो लोगों के आवेदन भी लग गए है। इधर इससे निपटने कुछ अखबारों ने कुर्सी बाल्टी बेचने की तैयारी शुरु कर दी है।