मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मत्स्य में भी चम्पू की चौधराहट


हाईकोर्ट द्वारा खारिज करने के बाद भी पदोन्नति दी जा रही
यह सरकार की मनमानी है या विभागीय मंत्री चन्द्रशेखर साहू का दंभ यह तो आम लोग ही जाने लेकिन कलेक्टर से लेकर संचालक तक ने जिन्हें अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया और हाईकोर्ट ने संविलियन की याचिका खारिज कर दी इन लोगों को न केवल परमानेंट नौकरी दी जा रही है बल्कि उन्हें प्रमोशन देने की तैयारी भी की जा रही है।
मामला मछली पालन विभाग का है। इस विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार की कहानी तो अलग ही है लेकिन जिस तरह से उच्च स्तर पर यहां मनमानी चल रही है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आश्चर्य का विषय तो यह है कि यहां चल रहे मनमानी को कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू का समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है। बताया जाता है कि यहां एजेंसी के कर्मचारियों को जिस तरह से संविलियन किया गया वहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।
सूत्रों के मुताबिक बी.के. शुक्ला और एम.डी. त्रिपाठी एजेंसी में मत्स्य पालन प्रसार कर्मचारी के रूप में पहले पदस्थ थे। इसके बाद जब एजेंसी बंद हुई तो इन्हें विभाग में संविदा कर्मी के रूप में रख लिया गया। इसके बाद इनका संविलियन का प्रयास हुआ और उच्च स्तर पर लेन-देन कर संविलियन कर दिया गया।
बताया जाता है कि लोकसेवा आयोग के द्वारा चयन के समय जब इन दोनों कर्मचारियों के नाम सामने आये तो कलेक्टर ने अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया चूंकि तब एजेंसी का चेयरमेन कलेक्टर होता है इसलिए अनुभव प्रमाण पत्र के अभाव में इनका चयन नहीं होना था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक शुक्ला-त्रिपाठी की जोड़ी ने तब तत्कालीन संचालक एस.एन. चटर्जी से सांठ-गांठ कर अनुभव प्रमाण पत्र हासिल कर लिया और इस मामले में बड़ी रकम के लेन-देन की चर्चा है।
चूंकि एजेंसी के कर्मचारी मत्स्य विभाग का कर्मचारी नहीं हो सकता इसलिए संविलियन का मामला हाईकोर्ट चला गया और हाईकोर्ट ने 2242005 के द्वारा शुक्ला त्रिपाठी के संविलियन संबंधी मामला खारिज कर दिया। लेकिन इस मामले को छिपा दिया गया और इन्हें जानबूझकर शासन के कर्मचारियों को मिलने वाला समस्त लाभ दिया गया। इधर इतने लफड़े के बाद भी इन दोनों को पदोन्नति देने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है कि इस मामले में कृषि मंत्री की रूचि से रायपुर ही नहीं राजनांदगांव में भी जबरदस्त चर्चा है।
हमारे राजनांदगांव संवाददाता के मुताबिक एजेंसी के कर्मचारियों की संविलियन और पदोन्नति के मामले को लेकर यहां जबरदस्त चर्चा है और बताया जाता है कि कृषि मंत्री ने इन दोनों कर्मचारियों की शिकायत पर खामोशी ओढ़ ली है। बहरहाल मछली पालन विभाग में चल रहे इस घपले बाजी में मंत्री चन्द्रशेखर साहू का नाम सामने आने से जबरदस्त हड़कम्प है और आने वाले विधानसभा में भी यह मामला रंग ला सकता है।

सोमवार, 26 जुलाई 2010

आदमखोर की राह

राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी वास्तव में महात्मा थे। तभी तो उनकी कही बात आज भी प्रासंगिक है। गांधी की जय जयकर अब भी होती है और होती रहेगी लेकिन उन्हें मानने वाले भी उनकी बातों पर एक फीसदी भी नहीं चलते ।
देश के लिए लंगोट में निकलकर उन्होंने भारतीयता की पहचान विश्व स्तर पर बनाई थी उनके कार्यो का लोहा आज भी उनके विरोधी मानते है। गांधी के देश में गांधी अनुयायी इस तरह हो जायेंगे किसी ने कल्पना नहीं की थी। जनता की गाढ़ी कमाई को मिल बैठकर खाने की रणनीति की शुरूआत तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब देश सेवा का दावा करने वाले सांसद-विधायकों ने अपने लिए वेतन-भत्तों के लिए कानून बना लिया।
पता नहीं इन्हें वेतन देने की सोच के पीछे कौन लोग थे लेकिन मेरा दावा है कि इसके पीछे वेतन भोगी कर्मचारी-अधिकारी जरूर रहे होंगे जिन्हें डर था कि यदि शेर को मानव खून नहीं मिलेगा तो वह आदम खोर नहीं बन सकेगा और जब नेता को वेतन की बीमारी लग जायेगी तो वह पैसों के पीछे भागेगा और नौकरशाह की राह आसान हो जायेगी। यही वजह है कि अब भी लोग अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की तारीफ करते नहीं थकते।
सबसे पहले तो नेताओं और अधिकारियों को जो वेतन दिया जाता है उसे समझना जरूरी है। दरअसल शासन के पास पैसा आने के मोटे तौर पर दो ही साधन है। पहला साधन संपदा से और दूसरा साधन है आम लोगों पर लगाया जाने वाला टैक्स। इन्ही राशि से वेतन दिये जाते हैं।
एक गरीब से गरीब आदमी भी टैक्स देता है और इसे किस तरह से हमारे रक्षक दुरूपयोग कर रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। नेताओं को जनप्रतिनिधि कहना ही बेमानी है क्योंकि वह चुनाव जरूर जीतता है लेकिन उसे उसके काम के बदले वेतन दी जाती है और वेतन लेने वाला मालिक नहीं नौकर होता है और लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि वेतन लेने वाला नौकर तय करता है कि मालिक किस तरह से जिन्दगी जिए। यह तो आ बैल मुझे मार वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है। आम आदमी यह सोचकर विधायक-सांसद बनाते है कि ये लोग उनका स्तर सुधारेंगे लेकिन आजादी के 60 साल बाद भी लोगों को न पीने का पानी उपलब्ध है न चिकित्सा या शिक्षा सुविधा ही उपलब्ध है।
वेतन भोगी नेताओं-अधिकारियों का रहन-सहन आम आदमी से ऊचा होता जा रहा है और जो लोग अपना पेट काटकर इन्हें काम पर रखा है वे लोग नारकीय जीवन जीने मजबूर हैं। क्या यह हमारे सांसदों-विधायकों का दायित्व है कि संसद में बैठकर वे चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर केवल अपने हितों का कानून बनाये और जनता को प्रताड़ित करें।
हमारी लड़ाई इस व्यवस्था को बदलने की है हम चाहते हैं कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले वेतन व पेंशन से परहेज करें और जिस दिन जनप्रतिनिधि ऐसा कर पायेंगे वे भ्रष्टाचार को रोक लेंगे तब अकेले वेतन पाने वालों से वे काम ले सकेंगे अन्यथा मिल बांटकर खाने की रणनीति में आदमखोर होती व्यवस्था में रोज नए आदमखोर शेर पैदा होंगे जो अपनी भूख ही मिटाएगा। जनता जाये भाड़ में।

रविवार, 25 जुलाई 2010

लो खुद ही देख लो। रोम का जलना और नीरों का बांसुरी बजाना...

यह किस्सा बहुतों ने कईयों बार सुना होगा कि जब रोम जल रहा था तब नीरों जी चैन की बांसुरी बजा रहे थे। यह किस्सा फिर दोहराई जा रही है और छत्तीसगढ़ की राजधानी में यही सब हो रहा है। सफाई नहीं पानी नहीं बिजली नहीं और उपर से अधिकारियों के थोक में तबादले और एक तरफा कार्यभार छोड़ने के आदेश देकर बांसुरी बजाने मुरख विदेश चला गया। इन्होंने टिकरापारा से लेकर अवैध कालोनी में भी आग लगाई दवा बाजार भी इसकी आग से झुलस रहा है।
क्या मुरख को बांसुरी बजाने विदेश जाना जरूरी था जबकि बिरजू की बांसुरी का बेसुरा राग क्या कम पड़ गया था। बिरजू की बांसुरी के सुर में तो वैसे भी कांग्रेसी नाच रहे हैं। वे इस राग से इतने मतहोश है कि इस राग की कर्कशता इन्हें सुनाई नहीं पड़ रही है। वैसे भी बिरजू को बांसुरी बजाने में महारत हासिल है। भाव मंगिमा ऐसी कि कोई भी तारीफ कर ले और जब बांसुरी से नगदी भी निकले तो कान में कर्कशता कहां सुनाई पड़ने वाली है।
महापौर किरणमयी नायक खुश थी कि मुरख-बिरजू की बांसुरी के प्रभावशाली तान के बाद भी वह चुनाव जीत गई लेकिन पंद्रह दिन में ही उन्हें पता चल गया कि बिरजू की बांसुरी का प्रभाव कांग्रेसियों पर किस कदर हावी है। अभी सभापति के हार से महापौर उबर भी नहीं पाई थी कि सामान्य सभा की बैठक, निगम अधिकारियों की ड्रामेबाजी से वे दुखी हो गई। आदमी जब कुछ अच्छा करना चाहे और उस पर बेवजह अंड़गा हो तो दुखी होना स्वाभाविक है।
एक तो निगम के पास वैसे ही फंड की कमी है तभी तो तात्यापारा से लेकर शारदा चौक के चौड़ीकरण का काम रुका हुआ है। ऐसे में सरकार पर जब कांग्रेसी महापौर वाले निगमों के लिए फंड नहीं देने के आरोपोें के साथ अधिकारियों के सहयोग नहीं करने का आरोप हो तो मामला गंभीर हो जाता है। राजधानीवासियों को पहले ही कौन सा सुख दे दिया है सरकार ने जो अब नए ड्रामेबाजी व राजनीति की जा रही है। गंदगी और बजबजाती नालियों से वैसे ही त्रस्त है लोग। पीने का पानी तक ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। निगम के कांक्रीट बिछाने वाली नीति ने यहां के पर्यावरण को पहले ही प्रदूषित कर दिया है अप्रैल में 45 का ताप भुगतना पड़ रहा है। बरसात में सड़कों-गलियों तक पानी भर जा रहा है। उल्टी दस्त जैसे मौसमी बीमारियां भुगतनी पड़ती है। क्या इसे शहर का जलना नहीं कहा जा सकता और ऐसे में जिम्मेदार लोग घुमने फिरने निकल जाए और अपना राग अलापे तो सम्राट नीरो की यादें ही ताज होगी।
भाजपा कांग्रेस बेशक राजनीति करें लेकिन अंधेरगर्दी न मचाये। शांत जनता को न कुरेदे। क्योंकि अब वो जमाना नहीं है कि नीरों चैन से बंशी बजा ले क्योंकि अब जनता भी पहले जैसी नहीं है वह बांसुरी बजाने वाले की बांसुरी तोड़ने की बजाय बजाने वाले को ही बजा देगी।

ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद

धमतरी। कुरुद तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत सेमरा के आश्रित ग्राम खपरी (सिलौटी) के ग्राम कोटवार खोरबहरा राम कोसरे का हुक्का-पानी ग्राम के उपसरपंच नारद साहू के निर्देशन में बंद करा दिया गया है। ग्राम कोटवार का कसूर केवल इतना है वह सतनामी समाज से तालुक्कात रखता है। सतनामी समाज ग्राम खपरी के समस्त समाज के व्यक्तियों के द्वारा अपने आरध्य देव श्री गुरुघासीदास जी का प्रतीक चिन्ह जैतखम्भ का निर्माण आपसी सहमति से किया गया है।
किन्तु द्वेषवश ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद करना स्वतंत्र भारत में न्याय संगत नहीं है। वर्तमान में गांव के उपसरपंच नारद साहू के निर्देशन में अवैध वसूली कर अतिक्रमण कराया जा रहा है। उपसरपंच ने ग्रामवासियों से निम्न रकम की मांग की है। चंद्रहास से 31 सौ रुपए, पिताम्बर से 35 सौ, रेणु से 18 सौ, भगवानी से 18 सौ, उत्तर से 32 सौ, गौतम से 28 सौ, मनोहर से 18 सौ, पुनीत से 21 सौ, इंद्रकुमार से 26 सौ, रामू से 21 सौ, चैतराम से 43 सौ, अनुज से 41 सौ तथा नारायण से 4 सौ एवं ग्राम के कोटवार खोरबहरा राम कोसरे से 52 सौ रुपए की मांग की गई थी जिस पर ग्राम कोटवार ने ऐतराज करते हुए अपने मंत्रालय 13 वर्ष पूर्व बने तोड़ने से असमर्थता जाहिर कर दिया। जिसके कारण शासकीय सेवा से बर्खास्त करने का डर दिखा कर उनके मूत्रालय को तुड़वाना पड़ेगा अन्यथा तुम्हारी नौकरी नहीं रहेगी। ग्राम कोटवार के द्वारा ऐसे प्रकरणों पर समानतापूर्वक विचार करने की बात कहने पर उनको नौकरी से निकालने की धमकी बार-बार दिया जा रहा है। इसी बीच सतनामी समाज ग्राम खपरी के द्वारा अपने ईष्टदेव का प्रतीक चिन्ह जैतखम्भ निर्माण किया गया। निर्माणाधीन रहते हुए इस पर किसी ने भी विरोध प्रकट नहीं किया किन्तु जबपूर्णत: निर्माण पूरा हो जाने एवं उस पर झंडा चढ़ जाने के उपरांत वहां के उपसरपंच द्वारा ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया। इस स्वतंत्र भारत में जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। जहां सभी धर्म के अनुइयों का आपने धर्म को मानने एवं पूजने का अधिकार दिया जाता है। इस प्रकार का कृत्य इस देश की धर्मनिरपेक्षता सामाजिक सौहाद्रता को बिगाड़ता है। उपसरपंच का यह कारनामा भेदभाव, छुआछूत, आप्रश्यिता की भावनाओं को जन्म देता है। सतनामी समाज उस गांव में आजादी के पूर्व से कई पीढियों से निवासरत है वहां के ग्रामीणों के दुख-सुख में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देता आया है। किन्तु उपसरपंच नारद साहू के द्वारा विद्वेषवश अपने स्वार्थ सिध्दी के लिए किया गया कार्य अपनी पंचायत बाड़ी में एक छतर राज का सिक्का जमाने की पहल माना जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य पर सरपंच एवं पंचोगण ने अपनी अनिभिज्ञता जाहिर की है। जहां पर जैतखम्भ का निर्माण किया गया है। वह जगह 5 फीट-5 फीट का जगह है। वह पर ना किसी प्रकार का सरकारी योजना के तहत ना ही भवन निर्माण प्रस्तावित नहीं है ऐसे समाजद्रोही उपसरपंच नारद साहू पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाए। अन्यथा सतनामी समाज महासंघ एवं अखिल भारतीय सतनामी कल्याण समिति के द्वारा उग्र आंदोलन की जाएगी। जिसकी जवाबदारी शासन की होगी इसी परिपेक्ष्य में सतनामी समाज महासंघ पाटन ब्लॉक के सचिव दिनेश कोसरे एवं अखिल भारतीय सतनामी कल्याण महासभा जिला धमतरी के सचिव लादूराम कुर्रे के संयुक्त बयान से जारी किया गया है।
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धनेन्द्र साहू पर बेबुनियाद आरोप
अभनपुर। जनपद सदस्य शशिप्रकाश साहू ने बताया कि उस दिन वस्तुस्थिति की जगह खुद उपस्थित था ऐसी कोई बात नहीं हुआ है। जिसमें धनेन्द्र साहू ने किसी प्रकार गांव वालों को धमकी दिया है। जबकि गांव के दो-चार महिलाओं के साथ मंत्रीजी के परिवारवाले मानिकचौरी प्रवेशद्वार पर नहर पुल के पास गाड़ी के सामने धरने पर बैठ गए और उसे अंदर जाने नहीं दे रहे थे। पुलिस के उच्चाधिकारी के समझाइश के बाद धनेन्द्र साहू के साथ केवल पांच व्यक्तियों को मिलने दिया गया। धनेन्द्र साहू केवल यही मांग कर रहे थे कि मृतक परिवारवालों से मिलकर उसे केवल सांत्वना देना चाहते थे। क्योंकि मृतक परिवार कांग्रेस से जुड़े हुए थे। जबकि वस्तुस्थिति में भाजपा के आसपास के सैकड़ों कार्यकर्ता पहुंच गए और धनेन्द्र साहू वापस जाओ के नारे लगाने लगे और उसके सभी कार्यकर्ता वहीं हंगामा करने लगे। चूंकि छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का संगठन चुनाव नजदीक है और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अभनपुर विधानसभा में अधिक से अधिक कांग्रेस से जुड़े हुए प्रतिनिधि चुनकर आए हैं। तो काग्रेस एवं धनेन्द्र साहू की साफ छवि में बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर उसके ऊपर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं। भूपेश बघेल जी को गांव के अंदर प्रवेश करने ही नहीं दिया गया जिससे भूपेश बघेल मृतक परिवार से मिलने से पहले ही वहां से चले गए है।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

किरण के कारनामों पर स्वास्थ्य खराब

बाबूलाल थे तब स्वास्थ्य सचिव
भले ही छत्तीसगढ़ सरकार ने आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के कथित पोल खोल की धमकी से उनकी बहाली कर दी हो पर उस समय सीएमओ रहे डा. किरण मल्होत्रा के कारनामों ने पूरे महकमें को हिला दिया है। ऊपर से स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की चुप्पी से आम लोगों के जीवन से जुड़े इस विभाग के जानलेवा कारनामों ने सरकार के लिए कलंक साबित होने लगा है।
स्वास्थ्य विभाग में घपले की कहानी नई नहीं है लम्बे चौड़े बजट वाले विभाग में सचिव से लेकर मंत्री तक पैसा पहुंचाने की खबरों के अलावा काम लोगों के जीवन से खिलवाड़ ने छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग को पूरे देश में चर्चा में ला दिया है। खासकर स्वास्थ्य सचिव रहे बाबूलाल अग्रवाल के यहां पड़े आयकर के छापे और उसके बाद उनकी तत्काल बहाली से सरकार भी कटघरे में खड़ी है। वैसे तो घोटाले की कहानी यहां नई नहीं है। कहा जाता है कि जब बाबूलाल अग्रवाल इस विभाग के सचिव थे तब भी इस विभाग में संलग्नीकरण, अनुकम्पा नियुक्ति, पल्स पोलियों में फर्जी बील, बिना कार्य के वेतन, बर्खास्त कर्मियों को वेतन तथा फार्मेसिस्ट में नियुक्ति में धांधली सहित मच्छरदानी से लेकर डाफ्टरलर घोटाले भी हुए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस दौरान सीएमओ रही डॉ. किरण मलहोत्रा के कारनामें अब सामने आने लगे है। नए स्वास्थ्य सचिव विकास शील की इसमें कितनी रूचि है यह तो पता नहीं लेकिन कहा जाता है कि विधानसभा तक को यहां से गलत जानकारियां दी जाती है। सूत्रों की माने तो यहां 15 से 20 हजार रुपए लेकर 120 कर्मचारियों व अधिकारियों को मूल स्थापना की जगह से जिले के आसपास संलग्न कर दिया गया और संचालक आदेश पर आदेश निकालते गए लेकिन कार्यमुक्त नहीं किया गया।
इसी तरह 30 ऐसे कर्मचारी को ड्रेसर, वार्ड बॉय, कूक वाटर मेन के पद पर 15-15 हजार रुपए लेकर संलग्न करने की कहानी की ही जांच की जाए तो कई जेल की सलाखों के पीछे होंगे। बहरहाल स्वास्थ्य विभाग के काले कारनामों पर मंत्री की खामोशी को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
बाक्स......
डेढ़ लाख में गलत
ढंग से अनुकम्पा नियुक्ति
स्वास्थ्य विभाग में घपलेबाजी से पेट नहीं भरने वाले अधिकारियों की करतूत पर स्वास्थ्य सचिव की चुप्पी आश्चर्यजनक है। सरकार ने नियम बनाए हैं कि यदि पति-पत्नी दोनों सरकारी नौकरी पर हो तो किसी एक ही मृत्यु पर परिवार वाले को अनुकम्पा नहीं दी जाएगी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग में ऐसा नहीं चलता। मामला मयंक सेन को अनुकम्पा नियुक्ति देने का है। सेवकराम सेन छुरा में लेखापाल के पद पर थे तथा उनकी पत्नी कंचन सेन महासमुंद न्यायालय में रीडर के पद है बावजूद सेवकराम की मृत्यु उपरांत मयंक सेन को अनुकम्पा नियुक्ति दे दी गई। इसके पीछे डेढ़ लाख रुपए का लेन देन की चर्चा है।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

गार्डन की जमीन को हड़प लेना चाहता है मंत्री का भाई


कॉलोनीवासी भयभीत, कुछ कोर्ट गए
प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री का भाई की करतूत थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। हालत यह है कि उनकी इस करतूत की शिकायत मुख्यमंत्री से भी की गई। पहले ही विवादस्पद जमीन कौड़ी के मोल खरीदने के बाद भाई की पहुंच का फायदा उठाकर जमीन खाली कराने में माहिर इस मंत्री भाई की नजर इस बार गीताजंलि नगर के गार्डन के लिए छोड़ी जमीन पर है।
छत्तीसगढ़ में वैसे तो राम नाम की लूट नई नहीं है लेकिन मंत्रियों के रिश्तेदारों में जिस तरह से सत्ता का दुरुपयोग कर अनाप-शनाप काम किए जा रहे हैं किसी से छीपा नहीं है। बताया जाता है कि जब बृजमोहन अग्रवाल गृहमंत्री थे तब उनके परिवार वालों के कारनामों की वजह से ही उन्हें गृहविभाग छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उनके रिश्तेदारों द्वारा चोरी का लोहा ट्रक के ट्रक गायब करके हजम करने को लेकर सरकार की मुसिबत बढ ग़ई थी। कैलाश अग्रवाल व उसके दामाद दिनेश अग्रवाल पर सरकार को मजबूरी में शिकंजा कसना पड़ा था।
इधर दमदार मंत्री के भाई की नाच नचैया के साथ-साथ जमीनी कारोबार में दिलचस्पी ने नया विवाद खड़ा किया है। इस मंत्री भाई पर दादागिरी और पहुंच के बल पर समता कॉलोनी में मोहबिया वकील की जमीन कब्जा करवाने के अलावा दिल्ली के किसी डॉ. मल्होत्रा की जमीन पर कब्जा करने का आरोप भी लग चुका है। ताजा मामला गीतांजलि नगर में गार्डन के लिए छोटी गई जमीन के कब्जे को लेकर है। कहा जाता है कि इस जमीन पर बकायदा गार्डन के लिए सुरक्षित बोर्ड लगाए गए थे और पिछले हफ्ते अचानक किसी ने यह बोर्ड हटाकर इस जमीन पर कब्जे की कोशिश की। बताया जाता है कि जब कॉलोनीवासियों ने इसका विरोध किया तो उन्हें इसी दमदार मंत्री के भाई के नाम पर डराया-धमकाया गया।
इस संबंध में जब हमने डॉ. कबीर से संपर्क करना चाहा तो वे उपलब्ध नहीं हुए लेकिन कॉलोनीवासियों ने इस दमदार मंत्री के भाई की करतूत पर तीव्र नाराजगी जाहिर की दूसरी तरफ जब इस मामले में गीताजंलि सोसायटी के प्रकाश दावड़ा से संपर्क किया तब पता चला कि कब्जे को रोकने न्यायालय से स्थगनादेश लाने की तैयारी की गई है। बहरहाल दमदार मंत्री के भाई की जमीनी मामले में गुण्डागर्दी थमने का नाम नहीं ले रहा है और ऐसा ही चलता रहा तो किसी दिन सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।

शाबास! मंत्री-विधायक

मोवा के लोग ही नहीं इस रोड से गुजरने वाले भी पिछले सालभर से त्रस्त हैं। रेलवे की अपनी जिद है और प्रदेश सरकार का पीडब्ल्यूडी विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुकर रहा है। यहां के लोग सबका चक्कर लगा चुके है। छत्तीसगढ़ की मीडिया इस मार्ग से गुजरने वालों की परेशानियां लगातार छाप रही है और सरकार तथा उसके पीडब्ल्यडी मंत्री को इससे कोई सरोकार नहीं है।
मोवा के लोग आंदोलित हैं लेकिन वे कोई ऐसा आंदोलन नहीं चाहते जिससे आम लोगों की तकलीफ बढ ज़ाए। इसके बाद भी सरकार की खामोशी को कोई क्या कहेगा। मोवा में रेलवे ओवर ब्रिज का काम चल रहा है। सालभर से चल रहे इस काम की वजह से घंटो यातायात जाम रहता है और सड़कों पर उभर आए गङ्ढों से गंभीर दुर्घटनाएं तक हो चुकी है। लोगों ने जब चीख-पुकार मचाई तो छत्तीसगढ़ सरकार ने सर्विस रोड को दुरुस्त किया। लेकिन साल भी पूरा नहीं हुआ और सड़के उखड़ गई लोग फिर अनजानी दुर्घटना के शिकार होने लगे। सर्विस रोड कितने की बनी इसके एवज में किस-किस को कमीशन मिला यह अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। तभी तो सड़के सालभर भी नहीं चली।
लेकिन वाह रे जनता। जय हो। उसने उखड़ती सड़कों को नजर अंदाज कर पीडब्ल्यूडी मंत्री को धन्यवाद ज्ञापित कर आए। मोवा आंदोलनकारी कहते हैं कि हम पॉजेटिव्ह सोचते हैं। इसलिए हम किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहते और इसलिए वे आंदोलन को गांधीवाद तरीके से ही चलाना चाहते हैं।
इन दिनों वे लोगों को सांसद-विधायकों के नाम पोस्ट कार्ड लिखवाते घूम रहे हैं। साथ ही मांग भी कर रहे हैं कि इस प्रदेश के विधायक व मंत्री यदि विधानसभा जाते हैं तो वे वीआईपी रोड से जाने की बजाय मोवा मार्ग से जाएं। वह भी बिना वीआईपी व्यवस्था के। पता नहीं मोवा वासियों की मांग सरकार में बैठे मंत्री व विधायक मानते हैं या नहीं लेकिन पीडब्ल्यूडी विभाग के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को इस मार्ग से जरूर गुजरना चाहिए। ताकि उन्हें पता चल सके इस मार्ग में पीडब्ल्यूडी ने कितना खर्च किया है। हम किसी दूसरे की तकलीफ को किसी अन्य को महसूस करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। लेकिन इस बहाने सड़क निर्माण में लगे एजेंसियों की करतूत को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं।
बृजमोहन अग्रवाल जिस दमदारी के लिए जाने जाते हैं। क्या पूरे प्रदेश में पीडब्ल्यूडी में चल रहे कमीशनखोरी को वे रोक पाए हैं। यदि ओवरब्रिज के निर्माण में देर है तो क्या प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे सर्विस रोड को अच्छा बना दे ताकि जनता परेशान न हो। यदि सर्विस रोड से सालभर के भीतर उखड़ गई तो जिम्मेदारी क्या इसलिए तय नहीं की जा रही है क्योंकि कमीशन मंत्रियों तक पहुंचाई जाती है। मोवावासियों का वहां से गुजरने वालों की हाय क्या सरकार को नहीं लगेगी। सालभर से किसी मार्ग से गुजरने वालों की परेशानी नहीं सुनना क्या अंधेरगर्दी नहीं है। मैं तो मोवा के आंदोलनकारियों की हिम्मत की दाद देता हूं कि वे इस अंधेरगर्दी के आलम में भी मंत्री से लेकर सभी को धन्यवाद दे गए। लेकिन अब बारी सरकार और विधायकों की है कि वे धन्यवाद के बदले विधानसभा का पूरा सत्र इस रास्ते से होकर अटेंड करें।