सरकारी अंधेरगर्दी के सफर ने अर्धशतक पूरा कर लिया है। लेकिन अंधेरगर्दी थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अपनी मजबूरी है नौकरशाह बेलगाम है। गृहमंत्री ननकीराम कंवर को गुस्सा आ जाये तो कलेक्टर को दलाल और एसपी को निकम्मा कह देते हैं। बृजमोहन अग्रवाल हो या राजेश मूणत वे अपने में मस्त हैं। अन्य मंत्री तो अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं और कांग्रेसियों को क्या कहें वे तो सुप्रीम कोर्ट के आधे राय में शासन नहीं है कहने के बाद भी इसलिए चुप है कि उन्हें क्या करना है। मुख्यसचिव का हाल किसी से छिपा नहीं है और डीजीपी तो अपने प्रदेश के लोगों को मलाईदार विभाग में बिठाने में ही पूरी कसरत कर लेते है कुल मिलाकर सरकारी तंत्र गुडगाड है और जनता बेचारी तमाशाबीन है।
छत्तीसगढ़ राय ऐसा ही चल रहा है। अपनों को उपकृत करने की सरकारी कोशिश और कमाई का जरिया ढूंढता विपक्ष के बीच छत्तीसगढ़ बरबादी के कगार पर है। खनिजें बेच दी गई। पानी तक बेची जा रही है। उद्योगपतियों की दादागिरी से सरकार नतमस्तक है। न बालकों के अवैध कब्जे हटाये जाते है न जिंदल के ऐसे में रायखेड़ा में पावर प्लांट वाले बगैर अनुमति के कार्य शुरू करे तो किसकी हिम्मत है कि अपराध दर्ज कर लिया जाए और अपराध दर्ज करने से होगा भी क्या जब गिरफ्तारी ही न की जाए।
सरकार की योजना भी वोट बैंक को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। दो रूपये किलों चावल योजना का फर्जी वाड़ा किसी से छिपा नहीं है। मध्यम वर्ग इस त्रासदी को झेल रहा है और सरकार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल से लेकर डॉ. सुनील खेमका को सरकारी जमीन कौड़ियों के मोल दे रही है।
शराब नीति तो सरकार की लाजवाब है। जनता मर जाए राजस्व की चिंता जरूरी है। क्योंकि राजस्व से अधिक कमाई अवैध शराब के जरिये सीधे अधिकारियों और नेताओं तक पहुंचती है। अवैध शराब के खिलाफ आन्दोलन करने वाले खरीद लिये जाते हैं या पुलिसिया कानून उन्हें निराश कर घर में बैठने मजबूर कर देता है। तब सरकार के पास जन-जागरण से शराब बंदी का राम बाण है जो सारी जिम्मेदारी जनता पर डालने के लिए काफी है।
इतनी अंधेरगर्दी के बाद जनता खामोश है। उन्हें खामोश रहना भी चाहिए क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है। नक्सली तो अपने ऐशो आराम के लिए मार काट मचा रहे हैं। उन्हें आदिवासियों की तकलीफों से क्या लेना देना। कुल मिलाकर सरकारी अंधेरगर्दी का सफर मजे से चल रहा है। कोई समझे तो ठीक न समझे तो ठीक। हम तो इसी आशा में अर्धशतक लगा चुके कि जनता जागेगी और अपना हक मांगेगी।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
सोमवार, 2 अगस्त 2010
प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, आफत में अस्तित्व
छत्तीसगढ़ में अखबारी आंकड़े राय बनने के बाद जिस तेजी से बड़ा है उससे अखबारों में संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है। पत्रिका सहित कुछ और अखबारों के आगमन की आहट से पुराने जमें अखबारों के सामने अस्तित्व बचाने की कवायद शुरु हो गई है। सर्वाधिक दुविधापूर्ण स्थिति नवभारत, भास्कर की है ये दोनों अपने को सर्वश्रेष्ठ बनाने जूझते रहे हैं। ऐसे में नए अखबार के आगाज ही इनके होश उड़ाने वाले होते है। अब नवभारत की बात ही दूसरी है। उसकी विश्वसनियता का एक जमाने में जबरदस्त जलवा रहा है लेकिन कहते हैं जब से सेटीमीटर कालम में खबरें छपने लगी उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे है। शायद यही वजह है कि भोपाल में नवभारत की दुर्गति हुई है और कहते है कि यहां भी रंगा-बिल्ला की जोड़ी ने वही हरकतें शुरु कर दी है।
'हकीकत' कौन लिखता है
प्रेस जगत में अब एक नया सवाल उठने लगा है कि जिसे हिन्दी बोलने तक नहीं आती वह हकीकत कैसे लिख सकता है। चर्चा है जगदलपुर से लेख मंगाकर अपने नाम में छपाया जा रहा है।
पार्षद पति भी पांच-पांच
सौ बांटने लगे...
लगता है सलीम अशरफी ने पांच-पांच सौ रुपए बांटकर नया रास्ता शुरु कर दिया है तभी आश्रम के पास धरने का आयोजन करने वाले पार्षद पति धर्मेन्द्र तिवारी ने भी पत्रकारों और फोटो ग्राफरों को पांच-पांच सौ रुपए दे डाले। दुविधा यही है कि जिन्हें नहीं मिला वे अब भी उनसे संपर्क की कोशिश में है।
'परमार ने पाया'
भास्कर के लिए जी जान देने वाले रामकुमार परमार को भास्कर ने ही अपना नहीं समझा और दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका। इसमें बेचारा परमार कोशिश करते रहा कि अपने नमक हलाली का सबूत दे लेकिन अब जाकर जनसत्ता ने यह मौका दिया है। वेतन कितना पता नहीं।
हरिभूमि की बैंडपार्टी
स्कूल छोड़ने के बाद किसी की ईच्छा नहीं होती ड्रेस पहनने की लेकिन हरिभूमि में नौकरी करनी है तो हर शनिवार को हरिभूमि का ड्रेस पहन प्रचार करना ही होगा। अब तो इसे बैंड पार्टी कहा जाने लगा है। बेचारे क्या करें। नौकरी करनी है तो कलम भले न चलावें ड्रेस तो पहननी ही होगी।
पत्रिका आकर्षण...
पत्रिका में जाने मीडिया कर्मियों में होड़ मची है। कहा जाता है कि सर्वाधिक लोग नई दुनिया से गए हैं। नई दुनिया से पत्रिका जाने वालों में अनुपम सक्सेना, राहुल जैन, संजीत कुमार (सिटी चीफ), पराग मिश्रा तथा यहां के दो फोटोग्राफर विनय घाटगे और त्रिलोचन मानिकपुरी शामिल है। इसी तरह नवभारत के अखिलेश तिवारी हरिभूमि से राव और भास्कर से राजेश जॉनपाल, गोविन्द ठाकरे, मोहम्मद अजगल, सुदीप त्रिपाठी व निश्चय खरे ने पत्रिका की ओर कूच कर दिया है। इनमें से कुछ तो अपने संपादकों से बेहद प्रताड़ित थे। खासकर नई दुनिया वाले तो संपादक की प्रताड़ना से त्रस्त थे।
किसी ने आईएएस का
एप्रोच लिया तो...
पत्रकारों का आईएएस से मधुर संबंधों की बात नई नहीं है। अब राजकुमार सोनी को ही ले लिजिए। जनसत्ता से हरिभूमि आए इस मिलाईछाप पत्रकार के लिए सी.के. खेतान लगे हैं कि वे पत्रिका पहुंच जाए। अब खेतान साहब कैसे हैं किसी से छिपा है क्या। इसी तरह नई दुनिया के संपादक रवि भोई भी पत्रिका के बिलासपुर क्षेत्र को संभालने उत्सुक है। चर्चा है कि श्री भोई ने इसके लिए भोपाली मित्र विनोद पुरोहित के मार्फत एप्रोच किया है। इसी तरह नवभारत के हीरो नईदुनिया में जीरों नहीं बनना चाहते इसलिए चन्द्रप्रकाश जैन ने भी पत्रिका को आवेदन दे दिया है।
और अंत में....
संवाद में हुए घपलेबाजी पर लीपापोती होते देख जनसंपर्क में एक अफसर ने मुख्यमंत्री के नाम बिना नाम वाले पाती भिजवा दी। यह पाती का क्या होगा यह तो पता नहीं लेकिन जनसंपर्क के प्रभारी बैजेन्द्र कुमार के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है उसकी यहां जबरदस्त चर्चा है।
'हकीकत' कौन लिखता है
प्रेस जगत में अब एक नया सवाल उठने लगा है कि जिसे हिन्दी बोलने तक नहीं आती वह हकीकत कैसे लिख सकता है। चर्चा है जगदलपुर से लेख मंगाकर अपने नाम में छपाया जा रहा है।
पार्षद पति भी पांच-पांच
सौ बांटने लगे...
लगता है सलीम अशरफी ने पांच-पांच सौ रुपए बांटकर नया रास्ता शुरु कर दिया है तभी आश्रम के पास धरने का आयोजन करने वाले पार्षद पति धर्मेन्द्र तिवारी ने भी पत्रकारों और फोटो ग्राफरों को पांच-पांच सौ रुपए दे डाले। दुविधा यही है कि जिन्हें नहीं मिला वे अब भी उनसे संपर्क की कोशिश में है।
'परमार ने पाया'
भास्कर के लिए जी जान देने वाले रामकुमार परमार को भास्कर ने ही अपना नहीं समझा और दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका। इसमें बेचारा परमार कोशिश करते रहा कि अपने नमक हलाली का सबूत दे लेकिन अब जाकर जनसत्ता ने यह मौका दिया है। वेतन कितना पता नहीं।
हरिभूमि की बैंडपार्टी
स्कूल छोड़ने के बाद किसी की ईच्छा नहीं होती ड्रेस पहनने की लेकिन हरिभूमि में नौकरी करनी है तो हर शनिवार को हरिभूमि का ड्रेस पहन प्रचार करना ही होगा। अब तो इसे बैंड पार्टी कहा जाने लगा है। बेचारे क्या करें। नौकरी करनी है तो कलम भले न चलावें ड्रेस तो पहननी ही होगी।
पत्रिका आकर्षण...
पत्रिका में जाने मीडिया कर्मियों में होड़ मची है। कहा जाता है कि सर्वाधिक लोग नई दुनिया से गए हैं। नई दुनिया से पत्रिका जाने वालों में अनुपम सक्सेना, राहुल जैन, संजीत कुमार (सिटी चीफ), पराग मिश्रा तथा यहां के दो फोटोग्राफर विनय घाटगे और त्रिलोचन मानिकपुरी शामिल है। इसी तरह नवभारत के अखिलेश तिवारी हरिभूमि से राव और भास्कर से राजेश जॉनपाल, गोविन्द ठाकरे, मोहम्मद अजगल, सुदीप त्रिपाठी व निश्चय खरे ने पत्रिका की ओर कूच कर दिया है। इनमें से कुछ तो अपने संपादकों से बेहद प्रताड़ित थे। खासकर नई दुनिया वाले तो संपादक की प्रताड़ना से त्रस्त थे।
किसी ने आईएएस का
एप्रोच लिया तो...
पत्रकारों का आईएएस से मधुर संबंधों की बात नई नहीं है। अब राजकुमार सोनी को ही ले लिजिए। जनसत्ता से हरिभूमि आए इस मिलाईछाप पत्रकार के लिए सी.के. खेतान लगे हैं कि वे पत्रिका पहुंच जाए। अब खेतान साहब कैसे हैं किसी से छिपा है क्या। इसी तरह नई दुनिया के संपादक रवि भोई भी पत्रिका के बिलासपुर क्षेत्र को संभालने उत्सुक है। चर्चा है कि श्री भोई ने इसके लिए भोपाली मित्र विनोद पुरोहित के मार्फत एप्रोच किया है। इसी तरह नवभारत के हीरो नईदुनिया में जीरों नहीं बनना चाहते इसलिए चन्द्रप्रकाश जैन ने भी पत्रिका को आवेदन दे दिया है।
और अंत में....
संवाद में हुए घपलेबाजी पर लीपापोती होते देख जनसंपर्क में एक अफसर ने मुख्यमंत्री के नाम बिना नाम वाले पाती भिजवा दी। यह पाती का क्या होगा यह तो पता नहीं लेकिन जनसंपर्क के प्रभारी बैजेन्द्र कुमार के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है उसकी यहां जबरदस्त चर्चा है।
रविवार, 1 अगस्त 2010
शाबास,नारी शक्ति की जय हो
भाजपाई गुण्डागर्दी से त्रस्त हैं कई लोग...
भाजपा के ब्लाक महामंत्री प्रीतम सिंहा पर पाण्डुका सब डिवीजन जल संसाधन विभाग के जल उपभोक्ता समिति के लोगों ने डरा धमका कर पैसे वसूलने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है।
प्रेस क्लब रायपुर में आयोजित पत्रकार वार्ता में दिलीप साहू, हरिशचंद्र शर्मा, पोखन साहू, महेन्द्र साहू, पुष्कर तिवारी, शिवकुमार साहू और पवन साहू ने जिस तरह से भाजपा नेता के खिलाफ आरोप लगाए है वह भाजपा पदाधिकारियों के सत्ता मद में चूर होने का उदाहरण है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर सत्ता के दम पर भाजपा के नेता गुण्डागर्दी पर उतारू है और पार्टी भी ऐसे लोगों के खिलाफ शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करती है। इस संबंध में जब प्रीतम सिंहा से संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। इधर पीड़ित दिलीप साहू व अन्य लोगों ने लिखित में बताया कि हम पाण्डुका का सबडिवीजन जल संसाधन विभाग के जल उपभोक्ता समिति में है। भाजपा के ब्लॉक महामंत्री (छुरा), प्रीतम सिन्हा के कारनामों से काफी परेशानी है। वह साइड में आकर पैसे की मांग करता है और इसके अलावा सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाकर हम लोगों को ब्लैक मेलिंग करता है। तौरेंगा जल उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष दिलीप साहू को धमका-चमका कर 19 अप्रैल को 10 हजार रुपए ले लिया उसके बाद ही 20 हजार रुपए की मांग और करने लगा है। इसी तरह हरीशचंद्र नामक टाईम कीपर से 10 हजार रुपए धमकाकर ले लिया कि तुम्हारा ट्रांसफर लिस्ट में नाम है। इसी तरह वह कई जगहों पर सूचना के अधिकार लगाकर धमकी चमकी देकर पैसा की उगाही कर रहा है। जिसकी शिकायत सांसद चन्दूलाल साहू, भाजपा नेता संतोष उपाध्याय संगठन के रामप्रताप सिंह एवं स्थानीय पत्रकारों से भी की गई है। ऐसे नेता के कारण काम करने में हम लोग असमर्थ है इस नेता की वजह से 15 करोड़ रुपए की राशि शासन की वापिस चली गई है।
प्रेस क्लब रायपुर में आयोजित पत्रकार वार्ता में दिलीप साहू, हरिशचंद्र शर्मा, पोखन साहू, महेन्द्र साहू, पुष्कर तिवारी, शिवकुमार साहू और पवन साहू ने जिस तरह से भाजपा नेता के खिलाफ आरोप लगाए है वह भाजपा पदाधिकारियों के सत्ता मद में चूर होने का उदाहरण है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर सत्ता के दम पर भाजपा के नेता गुण्डागर्दी पर उतारू है और पार्टी भी ऐसे लोगों के खिलाफ शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करती है। इस संबंध में जब प्रीतम सिंहा से संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। इधर पीड़ित दिलीप साहू व अन्य लोगों ने लिखित में बताया कि हम पाण्डुका का सबडिवीजन जल संसाधन विभाग के जल उपभोक्ता समिति में है। भाजपा के ब्लॉक महामंत्री (छुरा), प्रीतम सिन्हा के कारनामों से काफी परेशानी है। वह साइड में आकर पैसे की मांग करता है और इसके अलावा सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाकर हम लोगों को ब्लैक मेलिंग करता है। तौरेंगा जल उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष दिलीप साहू को धमका-चमका कर 19 अप्रैल को 10 हजार रुपए ले लिया उसके बाद ही 20 हजार रुपए की मांग और करने लगा है। इसी तरह हरीशचंद्र नामक टाईम कीपर से 10 हजार रुपए धमकाकर ले लिया कि तुम्हारा ट्रांसफर लिस्ट में नाम है। इसी तरह वह कई जगहों पर सूचना के अधिकार लगाकर धमकी चमकी देकर पैसा की उगाही कर रहा है। जिसकी शिकायत सांसद चन्दूलाल साहू, भाजपा नेता संतोष उपाध्याय संगठन के रामप्रताप सिंह एवं स्थानीय पत्रकारों से भी की गई है। ऐसे नेता के कारण काम करने में हम लोग असमर्थ है इस नेता की वजह से 15 करोड़ रुपए की राशि शासन की वापिस चली गई है।
पूर्व विधानसभाध्यक्ष की बिटिया ही प्रताड़ित है सरकार से

सचिव देवेन्द्र वर्मा पर कई आरोप
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल ने ये भी कभी नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति को वे छत्तीसगढ़ के हित लिए रोक रहे है वहीं उनकी बिटिया की उन्नति के मार्ग में बाधक बनेंगे। मामला विनिता बाजपेयी का है जो विधानसभा अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री तक के चक्कर लगा चुकी है और इस मामले में कांग्रेसियों की चुप्पी भी आश्चर्यजनक है।
प्रदेश की सर्वोच्च संस्था विधानसभा के सचिवालय में जो कुछ चल रहा है वह सरकार की मंशा को दर्शाने के लिए काफी है। वैसे भी इस प्रदेश में बैठी सरकार की करतूतें कम नहीं है जिन अधिकारियों को जेल या फिर प्रदेश से बाहर होना चाहिए उन्हें क्रीम व कमाऊ पद पर बैठा दिया गया है। जबकि ये तीनों मध्यप्रदेश कैडेर के अधिकारी है।
विधानसभा सचिवालय में भी यही सब हो रहा है। कानून को खुंटे में टांगकर जिस तरह से मनमानी की जा रही है उससे कई तरह के सवाल ही नहीं उठ रहे है बल्कि इसकी गरिमा को भी ठेस पहुंची है। देवेन्द्र वर्मा किस तरह से छत्तीसगढ़ में जमें हुए हैं इसकी एक अलग ही कहानी है लेकिन विधानसभा सचिवालय की मनमानी से प्रताड़ित विनिता बाजपेयी इन दिनों अपने साथ हुए अन्याय के लिए सरकार से लेकर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं तक का चक्कर लगा चुकी है।
यह विनिता बाजपेयी सिर्फ विधानसभा सचिवालय की अधिकारी होती तब भी कांग्रेसियों की चुप्पी जायज नहीं थी लेकिन वह विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की बिटिया है जिन्होंने कांग्रेस के लिए अपना जीवन होम कर दिया ऐसे स्वर्गवासी श्री शुक्ल की बिटिया के साथ किए जा रहे अन्याय पर भी कांग्रेसियों की खामोशी आश्चर्यजनक है।
दरअसल विवाद सचिवालय द्वारा जारी पदोन्नति सूची से शुरु हुआ। श्रीमती विनिता वाजपेयी 2001 में अनुसंधान अधिकारी एवं उसके समकक्ष अवर सचिव के पद पर कार्यरत थी और जब पदोन्नति आदेश निकला तो उनका नाम तो आदेश में था लेकिन न तो पद में और न ही वेतन में ही ईजाफा किया गया। इतिहास का यह पहला मामला होगा जब प्रमोशन तो दिया गया लेकिन पद और वेतनमान जस का तस रहा। जबकि छत्तीसगढ़ विधानसभा सचिवालय सेवा भर्ती एवं सेवा शतर्ें अधिनियम 1981 के नियम 4 (3) में स्पष्ट उल्लेख है कि उपसचिव के पद पर पदोन्नति अवर सचिव कैडर या अनुसंधान अधिकारी कैडर से दिए जाएंगे।
यहीं नहीं सचिवालय की मनमानी और भर्राशाही का यह नमूना है कि देवेन्द्र वर्मा जब अनुसंधान अधिकारी से पदोन्नति किए गए तो उन्हें उपसचिव बनाया गया जबकि विनिता वाजपेयी के साथ ऐसा नहीं हुआ। यही नहीं सरकार की इससे बड़ी प्रताड़ना और क्या होगी कि श्रीमती बाजपेयी को अपने से कनिष्ठ आर.के. अग्रवाल और दिनेश शर्मा से नीचे काम करना पड़ रहा है। जबकि दिनेश शर्मा को अवर सचिव पद पर बने हुए पांच साल भी नहीं हुए है। फिर भी इनका प्रमोशन कर दिया गया।
ऐसा भी नहीं है कि विधानसभा में चल रहे इस भर्राशाही और मनमानी की जानकारी प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को नहीं है लेकिन आश्चर्यजनक रुप से कांग्रेसियों ने चुप्पी ओढ़ ली है ऐसे में मामला श्रीमती सोनिया गांधी तक पहुंची तो नेता प्रतिपक्ष सहित कांग्रेसियों की क्या स्थिति होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। बहरहाल विधानसभा सचिवालय में चल रहे इस खेल पर सरकार की खामोशी उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। कयोंकि आम लोगों में चर्चा का विषय बन रहे सचिवालय की करतूत से सरकार की छवि पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल ने ये भी कभी नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति को वे छत्तीसगढ़ के हित लिए रोक रहे है वहीं उनकी बिटिया की उन्नति के मार्ग में बाधक बनेंगे। मामला विनिता बाजपेयी का है जो विधानसभा अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री तक के चक्कर लगा चुकी है और इस मामले में कांग्रेसियों की चुप्पी भी आश्चर्यजनक है।
प्रदेश की सर्वोच्च संस्था विधानसभा के सचिवालय में जो कुछ चल रहा है वह सरकार की मंशा को दर्शाने के लिए काफी है। वैसे भी इस प्रदेश में बैठी सरकार की करतूतें कम नहीं है जिन अधिकारियों को जेल या फिर प्रदेश से बाहर होना चाहिए उन्हें क्रीम व कमाऊ पद पर बैठा दिया गया है। जबकि ये तीनों मध्यप्रदेश कैडेर के अधिकारी है।
विधानसभा सचिवालय में भी यही सब हो रहा है। कानून को खुंटे में टांगकर जिस तरह से मनमानी की जा रही है उससे कई तरह के सवाल ही नहीं उठ रहे है बल्कि इसकी गरिमा को भी ठेस पहुंची है। देवेन्द्र वर्मा किस तरह से छत्तीसगढ़ में जमें हुए हैं इसकी एक अलग ही कहानी है लेकिन विधानसभा सचिवालय की मनमानी से प्रताड़ित विनिता बाजपेयी इन दिनों अपने साथ हुए अन्याय के लिए सरकार से लेकर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं तक का चक्कर लगा चुकी है।
यह विनिता बाजपेयी सिर्फ विधानसभा सचिवालय की अधिकारी होती तब भी कांग्रेसियों की चुप्पी जायज नहीं थी लेकिन वह विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की बिटिया है जिन्होंने कांग्रेस के लिए अपना जीवन होम कर दिया ऐसे स्वर्गवासी श्री शुक्ल की बिटिया के साथ किए जा रहे अन्याय पर भी कांग्रेसियों की खामोशी आश्चर्यजनक है।
दरअसल विवाद सचिवालय द्वारा जारी पदोन्नति सूची से शुरु हुआ। श्रीमती विनिता वाजपेयी 2001 में अनुसंधान अधिकारी एवं उसके समकक्ष अवर सचिव के पद पर कार्यरत थी और जब पदोन्नति आदेश निकला तो उनका नाम तो आदेश में था लेकिन न तो पद में और न ही वेतन में ही ईजाफा किया गया। इतिहास का यह पहला मामला होगा जब प्रमोशन तो दिया गया लेकिन पद और वेतनमान जस का तस रहा। जबकि छत्तीसगढ़ विधानसभा सचिवालय सेवा भर्ती एवं सेवा शतर्ें अधिनियम 1981 के नियम 4 (3) में स्पष्ट उल्लेख है कि उपसचिव के पद पर पदोन्नति अवर सचिव कैडर या अनुसंधान अधिकारी कैडर से दिए जाएंगे।
यहीं नहीं सचिवालय की मनमानी और भर्राशाही का यह नमूना है कि देवेन्द्र वर्मा जब अनुसंधान अधिकारी से पदोन्नति किए गए तो उन्हें उपसचिव बनाया गया जबकि विनिता वाजपेयी के साथ ऐसा नहीं हुआ। यही नहीं सरकार की इससे बड़ी प्रताड़ना और क्या होगी कि श्रीमती बाजपेयी को अपने से कनिष्ठ आर.के. अग्रवाल और दिनेश शर्मा से नीचे काम करना पड़ रहा है। जबकि दिनेश शर्मा को अवर सचिव पद पर बने हुए पांच साल भी नहीं हुए है। फिर भी इनका प्रमोशन कर दिया गया।
ऐसा भी नहीं है कि विधानसभा में चल रहे इस भर्राशाही और मनमानी की जानकारी प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को नहीं है लेकिन आश्चर्यजनक रुप से कांग्रेसियों ने चुप्पी ओढ़ ली है ऐसे में मामला श्रीमती सोनिया गांधी तक पहुंची तो नेता प्रतिपक्ष सहित कांग्रेसियों की क्या स्थिति होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। बहरहाल विधानसभा सचिवालय में चल रहे इस खेल पर सरकार की खामोशी उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। कयोंकि आम लोगों में चर्चा का विषय बन रहे सचिवालय की करतूत से सरकार की छवि पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
शनिवार, 31 जुलाई 2010
हकीकत के पीछे का सच
इन दिनों शहर के प्रतिष्ठित अखबारों के कर्मचारियों में कालम राईटर बनने की होड़ मची हुई है। ऐसा ही एक कर्मचारी इन दिनों कालम लिखने लगे हैं। सूर्या का वॉट लगाकर हकीकत का चोला पहनने वाले की हकीकत अब राजधानी में भी चर्चा का सबब बनने लगी है। गबन तो नाम के अनुरूप ही सब कर रहे थे लेकिन धमकाकर पैसा वसूलने और विज्ञापन छपवाने मजबूर करने की कहानी को अब तक इसके मालिकों ने क्यों नहीं सुनी। यह तो वही जाने। लेकिन यह चर्चा जोरों पर है कि दूध देने वाली गाय की लात भी अच्छी लगती है। इस बीच इसके द्वारा रायपुर संस्करण को ठेका में लिए जाने का दावा है हकीकत तो मालिक ही जाने।
फिर रिपोर्टर फायदे में फोटोग्राफरों में असंतोष
सलीम अशरफी ने वक्फ बोर्ड का चेयरमेन बनाते ही ख़ुशी मनाई और कवरेज के लिए पहुंचे मिडिया कर्मियों को पांच-पांच सौ दिए फोटोग्राफर खुश थे किचलो कोई तो है जो दोनों को सामान समझता है लेकिन प्रेस जाते ही उनकी हवा निकल गई क्योकि रिपोर्टरों को विज्ञापन भी दिया गया था जिसका कमीशन ही हजारो बनता है लेकिन बेचारे कर क्या सकते है .
पत्रिका के गिलास का
जवाब क्राकरी से
राजस्थान पत्रिका के आने की चर्चा से नवभारत की बाल्टी तो सभी जानते हैं लेकिन नेशनल लुक भी अपने अस्तित्व को बचाने छटपटाना शुरु कर दिया है। दरअसल पत्रिका के द्वारा कांच का गिलास गिफ्ट करना कई को अपने अस्तित्व पर हमला नजर आने लगा है। नेशनल लुक भी अपना प्रसार बढ़ाने बाल्टी के अलावा क्रॉकरी सेट का लालच देने लगा है।
प्रदीप की वापसी तो
कई हुई इधर-उधर
फोटोग्राफी में नाम कमा चुके प्रदीप डडसेना की लम्बे समय बाद हरिभूमि में वापसी हो गई है इतने दिनों तक प्रदीप जी क्या कर रहे थे उन्हीं से लोग पूछ ले तो बेहतर होगा। इधर पत्रिका की आमद से पत्रकारों का भाव बढ़ गया है और भाव तभी बढ़ेगा जब वे इधर से उधर जाएंगे। ऐसे ही वरुण झा हरिभूमि से भास्कर चले गए तो सोनू पाण्डे ने इसे बैलेंस कर दिया। तो शशांक खरे को भास्कर रास आने लगा है।
और अंत में....
रजबंधा मैदान में सरकारी जमीन पर बनाए भवन में समवेत शिखर शिफ्ट हो रहा है मशीन भी लग गई है अब वे उस इंजीनियर को कोस रहे हैं जिन्होंने मशीन रुम तो बना दिया लेकिन कागज का रोल मशीन तक पहुंचाने में दिक्कत हो रही है और जब तक रोल नहीं पहुंचेगा अखबार कैसे छपेगा।
फिर रिपोर्टर फायदे में फोटोग्राफरों में असंतोष
सलीम अशरफी ने वक्फ बोर्ड का चेयरमेन बनाते ही ख़ुशी मनाई और कवरेज के लिए पहुंचे मिडिया कर्मियों को पांच-पांच सौ दिए फोटोग्राफर खुश थे किचलो कोई तो है जो दोनों को सामान समझता है लेकिन प्रेस जाते ही उनकी हवा निकल गई क्योकि रिपोर्टरों को विज्ञापन भी दिया गया था जिसका कमीशन ही हजारो बनता है लेकिन बेचारे कर क्या सकते है .
पत्रिका के गिलास का
जवाब क्राकरी से
राजस्थान पत्रिका के आने की चर्चा से नवभारत की बाल्टी तो सभी जानते हैं लेकिन नेशनल लुक भी अपने अस्तित्व को बचाने छटपटाना शुरु कर दिया है। दरअसल पत्रिका के द्वारा कांच का गिलास गिफ्ट करना कई को अपने अस्तित्व पर हमला नजर आने लगा है। नेशनल लुक भी अपना प्रसार बढ़ाने बाल्टी के अलावा क्रॉकरी सेट का लालच देने लगा है।
प्रदीप की वापसी तो
कई हुई इधर-उधर
फोटोग्राफी में नाम कमा चुके प्रदीप डडसेना की लम्बे समय बाद हरिभूमि में वापसी हो गई है इतने दिनों तक प्रदीप जी क्या कर रहे थे उन्हीं से लोग पूछ ले तो बेहतर होगा। इधर पत्रिका की आमद से पत्रकारों का भाव बढ़ गया है और भाव तभी बढ़ेगा जब वे इधर से उधर जाएंगे। ऐसे ही वरुण झा हरिभूमि से भास्कर चले गए तो सोनू पाण्डे ने इसे बैलेंस कर दिया। तो शशांक खरे को भास्कर रास आने लगा है।
और अंत में....
रजबंधा मैदान में सरकारी जमीन पर बनाए भवन में समवेत शिखर शिफ्ट हो रहा है मशीन भी लग गई है अब वे उस इंजीनियर को कोस रहे हैं जिन्होंने मशीन रुम तो बना दिया लेकिन कागज का रोल मशीन तक पहुंचाने में दिक्कत हो रही है और जब तक रोल नहीं पहुंचेगा अखबार कैसे छपेगा।
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