गुरुवार, 5 अगस्त 2010

देवेन्द्र वर्मा की दादागिरी से दागदार होता सचिवालय

लोकतंत्र का मंदिर माने जाने वाले विधानसभा के सचिवालय में ही जब अनियमितता व भ्रष्टाचार जमकर हो रहा हो तो सरकार से किसी और तरह के न्याय की उम्मीद ही बेमानी हो जाती है। यह हाल है छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिवालय की जहां सिर्फ और सिर्फ देवेन्द्र वर्मा की चलती है। नियुक्ति से लेकर पदोन्नति और निर्माण से लेकर तोड़फोड़ में हुए घपलेबाजी चिख-चिख कर न्याय मांग रही है लेकिन न सरकार को सुनाई दे रहा है और न ही विधानसभा अध्यक्ष ही कुछ कर पा रहे हैं। छत्तीसगढ़ राय के गठन के दौरान किसी ने सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि विधानसभा के सचिव और सचिवालय ही भ्रष्टाचार का अड्डा बन जायेगा। विधानसभा सचिवालय ही जब भ्रष्टाचार की जननी हो तो बाकी विभागों के बारे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता हैं।
हमारे भरोसे मंद सूत्रों का कहना है कि विधानसभा सचिवालय में भ्रष्टाचार व अनियमितता की कहानी तो तभी शुरू हो गई थी जब अनुसंधान अधिकारी के पद पर रहे देवेन्द्र वर्मा को मध्यप्रदेश आबंटित होने के बाद छत्तीसगढ़ में ही इस दलील के साथ रोक लिया गया कि नये नवेले छत्तीसगढ़ को अनुभव वाले व्यक्ति की जरूरत है लेकिन किसे पता था कि देवेन्द्र वर्मा अपने अनुभव का इस तरह से इस्तेमाल करेंगे कि लोकतंत्र का यह मंदिर भी कलंकित होने से नहीं बच पायेगा?
इतना ही नहीं देवेन्द्र वर्मा पर सरकार की जबरदस्त मेहरबानी रही और उन्हें कुछ ही सालों में न केवल सचिव बना दिया गया बल्कि चार-चार बार तदर्थ पदोन्नति दी गई। जबकि देवेन्द्र वर्मा मध्यप्रदेश सचिवालय के अधीन कर्मचारी है और उन्हें पदोन्नति भी मध्यप्रदेश से दी जानी थी लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उन्हें पदोन्नति छत्तीसगढ सरकार द्वारा दी गई।
देवेन्द्र वर्मा पर इतनी मेहरबानी की वजह तो सरकार की बता पायेंगे लेकिन हमारे सूत्रों का दावा है कि कई सचिव से लेकर विधायकों तक ने देवेन्द्र वर्मा की शिकायत सरकार से की है लेकिन सारी शिकायतों को अनसुना कर वही किया गया जो देवेन्द्र वर्मा चाहते हैं। आश्चर्य का विषय तो यह है कि देवेन्द्र वर्मा को चार बार दी गई तदर्थ पदोन्नति के दौरान सचिवालय सेवा अधिनियम को ताक पर रखा गया और लोगों का दावा है कि जिस तरह से इस मामले में सरकार की मेहरबानी रही वह ग्रिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल करने लायक है।
देवेन्द्र वर्मा की पहली तदर्थ पदोन्नति 6 जुलाई 2001 को उपसचिव के रूप में की गई इसके बाद 13 अप्रैल 2002 को संचालक बना दिया और इसके बाद 21 जनवरी 2003 को फिर पदोन्नति देते हुए उन्हें अवर सचिव और 9 जुलाई 2004 को विधानसभा का सचिव बना दिया गया 3 साल 3 दिन में 4-4 पदोन्नति दी गई और सभी आदेश में तदर्थ पदोन्नति व अस्थाई रूप से पदभार ग्रहण बताया गया।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि मध्यप्रदेश राजपत्र (असाधारण) जो यह दर्शाता है कि देवेन्द्र वर्मा मध्यप्रदेश में 1-11-2000 की स्थिति में पदस्थ थे और उनका वरिष्ठता क्रमांक 30 था। यही नहीं छत्तीसगढ में देवेन्द्र वर्मा को जब सचिव बनाने की तैयारी कर ली गई थी उसके दो माह पहले 11 मई 2004 को मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय की अंतिम आबंटन सूची में देवेन्द्र वर्मा को अनुसंधान अधिकारी ही बताया गया जबकि वे इस आबंटन सूची के दौरान छत्तीसगढ़ में अपर सचिव बनाये जा चुके थे।
देवेन्द्र वर्मा की कहानी यहीं खत्म नहीं होती इस सरकारी मेहरबानी का इन पर बेजा इस्तेमाल करने, नौकरी में गड़बड़ी से लेकर विधानसभा में छोटे-मोटे निर्माण कार्यो पर घपले बाजी के आरोप भी है। बहरहाल देवेन्द्र वर्मा पर लगते आरोप ने सरकार की नियत पर तो सवाल उठाया ही है लोकतंत्र के इस पवित्र मंदिर पर दाग लगाने की कोशिश की है।

बुधवार, 4 अगस्त 2010

बोया पेड़ बबूल का तो आम ...

इस देश को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिला लेकिन आम लोगों को आजादी का सुख आज तक नहीं मिला। फिर स्वतंत्रता दिवस आ रहा है। स्कूलों में झंडे फहराये जायेंगे और हमारे देश के नेता वहीं भाषण पढ़ेंगे जो अफसरों द्वारा लिख कर दी जायेगी और फिर सब लोग आजादी के मायने भूल जायेंगे।
सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से निजात को असली आजादी मान लेने की भयंकर भूल आज गांव-गांव में दिख रहा है। क्या सरकार के पास ऐसे आंकड़े है जिससे पता चले कि कितने गांवों में शिक्षा, चिकित्सा सुविधा और पीने के लिए स्वच्छ जल वहां उपलब्ध करा पाई है। शायद नहीं। इसलिए वह इस मामले में सरकारी भाषा का उपयोग कर प्रतिशत में सब कुछ बताती है। लेकिन कितने गांवों में सड़क और बिजली नहीं पहुंची है ये आंकड़े उसके पास है।
दरअसल विकास के मायने बदल गये हैं। विकास को सड़क और बिजली से तौला गया और लोग शिक्षा, चिकित्सा सुविधा और पानी से वंचित होते चले गये। जबकि भारत की भौगौलिक संरचना चीख-चीख कर कह रही है कि पानी के बगैर गांव और उसके लोग मर जायेंगे। शिक्षा और चिकित्सा सुविधा के अभाव में पीड़ियां बरबाद हो जायेगी लेकिन इसकी चिंता न तो वेतन भोगी नेताओं को है और न ही अधिकारियों को ही है के तो सड़के बनाना चाहते हैं ताकि उनका विकास हो वे बिजली लगवाना चाहते है ताकि कूलर-एसी की सुविधा उन्हें मिलती रहे।
आजादी के 60 सालों में निर्माण के नाम पर अरबों-खरबों का भ्रष्टाचार हुआ और यदि कोई पकडाया भी तो उसे बचाने की कोशिश हुई। विधानसभा से लेकर लोकसभा में प्रश्न करने और नहीं करने के नाम पर पैसे खाये गए। कार्रवाई भी हुई पर क्या प्रदीप गांधी से लेकर कुशवाहा तक के पेंशन बंद हुए। नहीं। क्यों? क्योंकि वेतन लेते-लेते आदमखोर बन चुके जमात ने ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि इससे उनका अहित न हो आम जनता मरती है तो मर जाए।
सब को याद होगा जब छत्तीसगढ़ को अलग राय बनाने की बात हुई तो अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने कहा था कि अमीर धरती के गरीब लोगों के हितों के लिए पेड़ के नीचे विधानसभा लगा लेंगे लेकिन हुआ क्या? कुछ ही दिन में राजधानी निर्माण की योजना चल पड़ी। भाजपाई भी चिखते रहे नई राजधानी की जरूरत नहीं है। पैसे की बरबादी है। पर जैसे ही सत्ता भाजपा के हाथ लगी उसने भी राजधानी बनाने का काम शुरू कर दिया? क्या कोई बता पायेगा कि नई राजधानी सिर्फ नेताओं और अधिकारियों के लिए नहीं बन रही है तो किसके लिए बन रही है। क्या किसानों की खेती जमीन जबरिया नहीं अधिग्रहित की जा रही है? क्या वहां के बाजार दर पर मुआवजा दिया जा रहा है? यह ऐसे सवाल है जो साबित करते हैं कि आम आदमी आज भी वास्तविक आजादी से कितनी दूर है। नेता और अधिकारी किस तरह से मिल बांटकर आजादी का हर महिने के पहली तारीख को जश्न मान रहे हैं। नेता-अधिकारी बेशक पहली तारीख को जश्न मनाये लेकिन आम लोगों को भी इसमें शामिल करें उन्हें बुनियादी सुविधाएं तो पहले दो फिर दूसरों की सुविधाओं का ध्यान रखो। लेकिन आजादी मिलते ही अपने लिए सब कुछ पा लेने की रणनीति ने आम आदमी के लिए सिर्फ और सिर्फ बबूल बोने का काम किया है।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया...

सरकारी अंधेरगर्दी के सफर ने अर्धशतक पूरा कर लिया है। लेकिन अंधेरगर्दी थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अपनी मजबूरी है नौकरशाह बेलगाम है। गृहमंत्री ननकीराम कंवर को गुस्सा आ जाये तो कलेक्टर को दलाल और एसपी को निकम्मा कह देते हैं। बृजमोहन अग्रवाल हो या राजेश मूणत वे अपने में मस्त हैं। अन्य मंत्री तो अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं और कांग्रेसियों को क्या कहें वे तो सुप्रीम कोर्ट के आधे राय में शासन नहीं है कहने के बाद भी इसलिए चुप है कि उन्हें क्या करना है। मुख्यसचिव का हाल किसी से छिपा नहीं है और डीजीपी तो अपने प्रदेश के लोगों को मलाईदार विभाग में बिठाने में ही पूरी कसरत कर लेते है कुल मिलाकर सरकारी तंत्र गुडगाड है और जनता बेचारी तमाशाबीन है।
छत्तीसगढ़ राय ऐसा ही चल रहा है। अपनों को उपकृत करने की सरकारी कोशिश और कमाई का जरिया ढूंढता विपक्ष के बीच छत्तीसगढ़ बरबादी के कगार पर है। खनिजें बेच दी गई। पानी तक बेची जा रही है। उद्योगपतियों की दादागिरी से सरकार नतमस्तक है। न बालकों के अवैध कब्जे हटाये जाते है न जिंदल के ऐसे में रायखेड़ा में पावर प्लांट वाले बगैर अनुमति के कार्य शुरू करे तो किसकी हिम्मत है कि अपराध दर्ज कर लिया जाए और अपराध दर्ज करने से होगा भी क्या जब गिरफ्तारी ही न की जाए।
सरकार की योजना भी वोट बैंक को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। दो रूपये किलों चावल योजना का फर्जी वाड़ा किसी से छिपा नहीं है। मध्यम वर्ग इस त्रासदी को झेल रहा है और सरकार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल से लेकर डॉ. सुनील खेमका को सरकारी जमीन कौड़ियों के मोल दे रही है।
शराब नीति तो सरकार की लाजवाब है। जनता मर जाए राजस्व की चिंता जरूरी है। क्योंकि राजस्व से अधिक कमाई अवैध शराब के जरिये सीधे अधिकारियों और नेताओं तक पहुंचती है। अवैध शराब के खिलाफ आन्दोलन करने वाले खरीद लिये जाते हैं या पुलिसिया कानून उन्हें निराश कर घर में बैठने मजबूर कर देता है। तब सरकार के पास जन-जागरण से शराब बंदी का राम बाण है जो सारी जिम्मेदारी जनता पर डालने के लिए काफी है।
इतनी अंधेरगर्दी के बाद जनता खामोश है। उन्हें खामोश रहना भी चाहिए क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है। नक्सली तो अपने ऐशो आराम के लिए मार काट मचा रहे हैं। उन्हें आदिवासियों की तकलीफों से क्या लेना देना। कुल मिलाकर सरकारी अंधेरगर्दी का सफर मजे से चल रहा है। कोई समझे तो ठीक न समझे तो ठीक। हम तो इसी आशा में अर्धशतक लगा चुके कि जनता जागेगी और अपना हक मांगेगी।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, आफत में अस्तित्व

छत्तीसगढ़ में अखबारी आंकड़े राय बनने के बाद जिस तेजी से बड़ा है उससे अखबारों में संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है। पत्रिका सहित कुछ और अखबारों के आगमन की आहट से पुराने जमें अखबारों के सामने अस्तित्व बचाने की कवायद शुरु हो गई है। सर्वाधिक दुविधापूर्ण स्थिति नवभारत, भास्कर की है ये दोनों अपने को सर्वश्रेष्ठ बनाने जूझते रहे हैं। ऐसे में नए अखबार के आगाज ही इनके होश उड़ाने वाले होते है। अब नवभारत की बात ही दूसरी है। उसकी विश्वसनियता का एक जमाने में जबरदस्त जलवा रहा है लेकिन कहते हैं जब से सेटीमीटर कालम में खबरें छपने लगी उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे है। शायद यही वजह है कि भोपाल में नवभारत की दुर्गति हुई है और कहते है कि यहां भी रंगा-बिल्ला की जोड़ी ने वही हरकतें शुरु कर दी है।
'हकीकत' कौन लिखता है
प्रेस जगत में अब एक नया सवाल उठने लगा है कि जिसे हिन्दी बोलने तक नहीं आती वह हकीकत कैसे लिख सकता है। चर्चा है जगदलपुर से लेख मंगाकर अपने नाम में छपाया जा रहा है।
पार्षद पति भी पांच-पांच
सौ बांटने लगे
...
लगता है सलीम अशरफी ने पांच-पांच सौ रुपए बांटकर नया रास्ता शुरु कर दिया है तभी आश्रम के पास धरने का आयोजन करने वाले पार्षद पति धर्मेन्द्र तिवारी ने भी पत्रकारों और फोटो ग्राफरों को पांच-पांच सौ रुपए दे डाले। दुविधा यही है कि जिन्हें नहीं मिला वे अब भी उनसे संपर्क की कोशिश में है।
'परमार ने पाया'
भास्कर के लिए जी जान देने वाले रामकुमार परमार को भास्कर ने ही अपना नहीं समझा और दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका। इसमें बेचारा परमार कोशिश करते रहा कि अपने नमक हलाली का सबूत दे लेकिन अब जाकर जनसत्ता ने यह मौका दिया है। वेतन कितना पता नहीं।
हरिभूमि की बैंडपार्टी
स्कूल छोड़ने के बाद किसी की ईच्छा नहीं होती ड्रेस पहनने की लेकिन हरिभूमि में नौकरी करनी है तो हर शनिवार को हरिभूमि का ड्रेस पहन प्रचार करना ही होगा। अब तो इसे बैंड पार्टी कहा जाने लगा है। बेचारे क्या करें। नौकरी करनी है तो कलम भले न चलावें ड्रेस तो पहननी ही होगी।
पत्रिका आकर्षण...
पत्रिका में जाने मीडिया कर्मियों में होड़ मची है। कहा जाता है कि सर्वाधिक लोग नई दुनिया से गए हैं। नई दुनिया से पत्रिका जाने वालों में अनुपम सक्सेना, राहुल जैन, संजीत कुमार (सिटी चीफ), पराग मिश्रा तथा यहां के दो फोटोग्राफर विनय घाटगे और त्रिलोचन मानिकपुरी शामिल है। इसी तरह नवभारत के अखिलेश तिवारी हरिभूमि से राव और भास्कर से राजेश जॉनपाल, गोविन्द ठाकरे, मोहम्मद अजगल, सुदीप त्रिपाठी व निश्चय खरे ने पत्रिका की ओर कूच कर दिया है। इनमें से कुछ तो अपने संपादकों से बेहद प्रताड़ित थे। खासकर नई दुनिया वाले तो संपादक की प्रताड़ना से त्रस्त थे।
किसी ने आईएएस का
एप्रोच लिया तो...
पत्रकारों का आईएएस से मधुर संबंधों की बात नई नहीं है। अब राजकुमार सोनी को ही ले लिजिए। जनसत्ता से हरिभूमि आए इस मिलाईछाप पत्रकार के लिए सी.के. खेतान लगे हैं कि वे पत्रिका पहुंच जाए। अब खेतान साहब कैसे हैं किसी से छिपा है क्या। इसी तरह नई दुनिया के संपादक रवि भोई भी पत्रिका के बिलासपुर क्षेत्र को संभालने उत्सुक है। चर्चा है कि श्री भोई ने इसके लिए भोपाली मित्र विनोद पुरोहित के मार्फत एप्रोच किया है। इसी तरह नवभारत के हीरो नईदुनिया में जीरों नहीं बनना चाहते इसलिए चन्द्रप्रकाश जैन ने भी पत्रिका को आवेदन दे दिया है।
और अंत में....
संवाद में हुए घपलेबाजी पर लीपापोती होते देख जनसंपर्क में एक अफसर ने मुख्यमंत्री के नाम बिना नाम वाले पाती भिजवा दी। यह पाती का क्या होगा यह तो पता नहीं लेकिन जनसंपर्क के प्रभारी बैजेन्द्र कुमार के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है उसकी यहां जबरदस्त चर्चा है।

Jeevan Dor Tumhi Sang Bandhi-Sati Savitri-Lata Mangeshkar

रविवार, 1 अगस्त 2010

शाबास,नारी शक्ति की जय हो













एक बार फिर नारी शक्ति ने साबित कर दिया कि उनका कोई मुकाबला नहीं.टिकरापारा कि महिलाओ ने शराब ठेकेदारों को भागने मजबूर कर दिया .आज इसी तरह कि कार्रवाई कि जरुरत है .

भाजपाई गुण्डागर्दी से त्रस्त हैं कई लोग...

भाजपा के ब्लाक महामंत्री प्रीतम सिंहा पर पाण्डुका सब डिवीजन जल संसाधन विभाग के जल उपभोक्ता समिति के लोगों ने डरा धमका कर पैसे वसूलने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है।
प्रेस क्लब रायपुर में आयोजित पत्रकार वार्ता में दिलीप साहू, हरिशचंद्र शर्मा, पोखन साहू, महेन्द्र साहू, पुष्कर तिवारी, शिवकुमार साहू और पवन साहू ने जिस तरह से भाजपा नेता के खिलाफ आरोप लगाए है वह भाजपा पदाधिकारियों के सत्ता मद में चूर होने का उदाहरण है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर सत्ता के दम पर भाजपा के नेता गुण्डागर्दी पर उतारू है और पार्टी भी ऐसे लोगों के खिलाफ शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करती है। इस संबंध में जब प्रीतम सिंहा से संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। इधर पीड़ित दिलीप साहू व अन्य लोगों ने लिखित में बताया कि हम पाण्डुका का सबडिवीजन जल संसाधन विभाग के जल उपभोक्ता समिति में है। भाजपा के ब्लॉक महामंत्री (छुरा), प्रीतम सिन्हा के कारनामों से काफी परेशानी है। वह साइड में आकर पैसे की मांग करता है और इसके अलावा सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाकर हम लोगों को ब्लैक मेलिंग करता है। तौरेंगा जल उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष दिलीप साहू को धमका-चमका कर 19 अप्रैल को 10 हजार रुपए ले लिया उसके बाद ही 20 हजार रुपए की मांग और करने लगा है। इसी तरह हरीशचंद्र नामक टाईम कीपर से 10 हजार रुपए धमकाकर ले लिया कि तुम्हारा ट्रांसफर लिस्ट में नाम है। इसी तरह वह कई जगहों पर सूचना के अधिकार लगाकर धमकी चमकी देकर पैसा की उगाही कर रहा है। जिसकी शिकायत सांसद चन्दूलाल साहू, भाजपा नेता संतोष उपाध्याय संगठन के रामप्रताप सिंह एवं स्थानीय पत्रकारों से भी की गई है। ऐसे नेता के कारण काम करने में हम लोग असमर्थ है इस नेता की वजह से 15 करोड़ रुपए की राशि शासन की वापिस चली गई है।