वाह भाई! सरकार हो तो ऐसी हो! छत्तीसगढ़ की सरकार ने विधानसभा तक में कह दिया कि छत्तीसगढ़ से कोई पलायन नहीं होता। सरकार के इस दावे के पीछे तर्क था कि वह यहां के लोगों को न केवल दो रूपये किलो चावल दे रही है बल्कि रोजगार के पूरे साधन उपलब्ध करा रही है। सरकार के इस दावे पर स्वयं शासकीय अधिकारी भी गुण गान करते नहीं थकते थे। यहां तक कि रमन राज पर प्रशंसा के कसीदे पढ़ने वालों की भी कमी नहीं है जबकि आखबार सरकार की विफलता के उसके करतूतों के इतने खबरें छाप रहे हैं कि हर दिन एक ... सौ पृष्ठों की किताबें लिखी जा सकती है। वैसे इस सरकार के लोगों के पास अपनी बातें कहने या अफवाह फैलाने का अदम्य साहस है और झूठ को सच कहने के इस साहस का मैं शुरू से प्रशंसक रहा हूं।
गणेश भगवान को दूध पिलाने की बात हो या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बात हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने का दावा हो या अल्पसंख्यक के दुश्मन के रूप में प्रस्तुति की बात हो 50 साल बनाम 5 साल के इनके नारो से आम लोगों को अपनी ओर खीचने की ताकत शायद इसी पार्टी में है। तभी तो लोग चिल्लाते रहे कि दो रूपया किलों चावल .... लोगों में बंट रहा है। गरीबी के सरकारी आंकड़े झूठे हैं लेकिन सरकार अपनी बातों पर तब तक अडिग रही जब तक फर्जी राशन कार्ड के मामले पकड़े नहीं गये अब जब कालाबाजारियों ने करोड़ों कमा लिये तब सरकार जाग रही है।
यही हाल पलायन के मुद्दे पर है। सरकार का दावा है कि वह गांव गांव में काम दे रही है पलायन का सवाल ही नहीं है। लेकिन यह सत्य पता नहीं सरकार को कैसे नहीं मालूम है कि पंचायत सचिव और संबंधित विभाग किस तरह से मजदूरों के नाम पर पैसा हड़प रहे हैं। कागजों में बनते सड़क और सरकारी भवनों की तरफ से इसलिए आंखे मूंदली जाती है कि ठेका लेने वाले उनके लोग सरपंच सचिव उनकी पार्टी के प्रतिनिष्ठा रखते हैं।
लेकिन कहा जाता है कि झूठ और अफवाह यादा दिन नहीं टिकते और अब राममंदिर के प्रति कथित निष्ठा की तरह सब कुछ सामने है। लेह में आई तबाही ने छत्तीसगढ़ सरकार के पलायन को लेकर किये गए दावे की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।
अब भी समय है सरकार अखबारों की खबरों को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करना शुरू कर दे तो आम जनता का राज आ जायेगा। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उसके किस मंत्री की क्या रूचि है। देखते ही देखते 2-5 हजार करोड क़ा ... बनने वालों को सरकार छोड़ सकती है और कहने को वह बचा भी सकती है लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि उपर वाले से कोई नहीं बच सका है और बद्दूआंए काम करती ही है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
छत्तीसगढ़ में कौन सी भाजपा का शासन है...
क्वीन बेटन को लेकर पूरे छत्तीसगढ़ में जो उत्साह का वातावरण बना वह यहां के लोगों के खेल भावना का घोतक है लेकिन पूरे देश में क्वीन बेटन का विरोध करने वाली भाजपा का छत्तीसगढ़ में बढ़चकर हिस्सा लेने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा में हाईकमान और पार्टी निर्देश छत्तीसगढ़ में बेमानी है या फिर यहां किसी और भाजपा का शासन है।
क्वीन बेटन दरअसल राष्ट्रमंडल खेल का वह मशाल है जो हर आयोजन के पहले राष्ट्रमंडलीय देशों में भ्रमण करता है। दिल्ली में इस बार इसका आयोजन है और क्वीन बेटन के उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए इसे पूरे देश में घुमाया जा रहा है।
देश का प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी इस मशाल को गुलामी का प्रतीक बताते हुए इसके भ्रमण की तीखी आलोचना की है। दिल्ली से लेकर झारखंड हो या बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश हर जगह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इसके विरोध में खड़े हो गए है और अपना आक्रोश प्रकट भी कर रहे है।
छत्तीसगढ़ में इसके आगमन की बात हुई तो लगा कि यहां भी भाजपा इसका विरोध करेगी और सरकार होने की वजह से क्वीन बेटन के रास्ते या तो बदल दिये जायेंगे या फिर छत्तीसगढ से ये चुपचाप गुजर जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्वीन बेटन पर न केवल भाजपाई बल्कि डॉ. रमन सिंह सरकार ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
भाजपा की इस दोगली नीति को लेकर भाजपा के ही कई कार्यकर्ता नाराज है। भाजपा के एक नेता ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि मंदिर मुद्दे की दोगलाई ने हमें केन्द्र से ढकेल दिया इसके बाद भी हम नहीं सुधर पाये हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि हाईकमान के विरोध के बावजूद जिस तरह से पूरी सरकार यहां क्वीन बेटन के स्वागत में पलक ....बिछाई रही वह आश्चर्य जनक है।
इसी तरह आर एस एस से जुड़े एक नेता ने कहा कि यह विडंम्बना है कि किसी मुद्दे पर हम एक नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वजह से भाजपा की छिछालेदर हो रही है। अब तो यह सवाल उठने लगा है कि जहां-जहां भाजपा की सत्ता है क्या वहां वहां भाजपा के नेता अपने हिसाब से काम करेंगे।
बहरहाल इस मामले को लेकर आम लोगों में भी भाजपा की इस राजनीति की काफी तीखी प्रतिक्रिया है कुछ तो हाईकमान तक से सरकार की शिकायत करने का मन बना चुके है और गडकरी के सामने भी बात लाई जेयेगी।
क्वीन बेटन दरअसल राष्ट्रमंडल खेल का वह मशाल है जो हर आयोजन के पहले राष्ट्रमंडलीय देशों में भ्रमण करता है। दिल्ली में इस बार इसका आयोजन है और क्वीन बेटन के उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए इसे पूरे देश में घुमाया जा रहा है।
देश का प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी इस मशाल को गुलामी का प्रतीक बताते हुए इसके भ्रमण की तीखी आलोचना की है। दिल्ली से लेकर झारखंड हो या बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश हर जगह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इसके विरोध में खड़े हो गए है और अपना आक्रोश प्रकट भी कर रहे है।
छत्तीसगढ़ में इसके आगमन की बात हुई तो लगा कि यहां भी भाजपा इसका विरोध करेगी और सरकार होने की वजह से क्वीन बेटन के रास्ते या तो बदल दिये जायेंगे या फिर छत्तीसगढ से ये चुपचाप गुजर जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्वीन बेटन पर न केवल भाजपाई बल्कि डॉ. रमन सिंह सरकार ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
भाजपा की इस दोगली नीति को लेकर भाजपा के ही कई कार्यकर्ता नाराज है। भाजपा के एक नेता ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि मंदिर मुद्दे की दोगलाई ने हमें केन्द्र से ढकेल दिया इसके बाद भी हम नहीं सुधर पाये हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि हाईकमान के विरोध के बावजूद जिस तरह से पूरी सरकार यहां क्वीन बेटन के स्वागत में पलक ....बिछाई रही वह आश्चर्य जनक है।
इसी तरह आर एस एस से जुड़े एक नेता ने कहा कि यह विडंम्बना है कि किसी मुद्दे पर हम एक नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वजह से भाजपा की छिछालेदर हो रही है। अब तो यह सवाल उठने लगा है कि जहां-जहां भाजपा की सत्ता है क्या वहां वहां भाजपा के नेता अपने हिसाब से काम करेंगे।
बहरहाल इस मामले को लेकर आम लोगों में भी भाजपा की इस राजनीति की काफी तीखी प्रतिक्रिया है कुछ तो हाईकमान तक से सरकार की शिकायत करने का मन बना चुके है और गडकरी के सामने भी बात लाई जेयेगी।
बुधवार, 18 अगस्त 2010
स्वतंत्रता किसके लिए...
क्या कभी किसी भी सरकार ने किसी भी प्रदेश की सरकार ने यह सोचा कि विधायक सांसद या अधिकारी बनते ही लोग एकाएक कैसे धनी बन गए। कल तक गांव में सामान्य जीवन जीने वाले लोग पैसे वाले कैसे हो गए। क्या कभी किसी भी सरकार ने एक भी नाम धारी व्यक्ति की बारिकी से जांच कराई कि लालू क्या थे, डॉ. रमन क्या थे, गुलाम नबी आजाद क्या थे, कल्याण सिंह, मुलायम सिंह, विद्याचरण-श्यामाचरम शुक्ल क्या थे या बाबूलाल अग्रवाल, सुनील कुजूर, सुब्रत साहू या इसी तरह के नाम धारी लोग पदों में आने के पहले क्या थे और फिर क्या हो गए। बेतहाशा कमाई का क्या एक बड़ा हिस्सा आम लोगों के हिस्से का नहीं है। क्या आजादी के शुरवीरों ने ऐसे ही भारत का सपना देखा था कि पद पाते ही डकैत बन जाओ? लुटेरे बन जाओ आर आम आदमी को पानी स्वास्थ्य और शिक्षा भी न दो?
15 अगस्त 1947 को जब अंग्रजों ने भारत छोड़ा। तब पूरा देश खुशियों से लबरेज था। हर आदमी एक दूसरे को स्वतंत्रता के मायने समझाता बधाईयां दे रहा था। लेकिन आजादी के 63 साल हो रहे हैं। इन 63 सालों में गरीब से गरीब आदमी ने भी सरकार को टेक्स दिया ताकि हमारे सांसद विधायक और सरकारी अधिकारी कर्मचारी भूखे न रहे और ईमानदारी से आम लोगों के हित और देश के हित के लिए काम करें। पर क्या ऐसा हो पाया। आम आदमी से कहां चूक हुई और व्यवस्था को किस तरह से अव्यवस्थित किया गया। रिपोर्ट।
छत्तीसगढ में तोrajya बनते ही आजादी के मायने बदल गए है। वैसे तो नौकर शाह और राजनेताओं के लिए ही लोकतंत्र में असली आजादी है। और आम आदमी के लिए नियम कानून की बात की जाती है। हमने भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों की .... और आजादी को लेकर समय समय पर पाठकों को जानकारी उपलब्ध कराया है।
आजादी के मायने
प्रदेश के मुखिया के अलावा डॉ. साहब के पास उर्जा, खनिज जनसंपर्क जैसे विभाग है और इनमें से कोई विभाग नहीं है जहां घपलों की दास्तान न हो। उर्जा विभाग में आजादी का यह आलम है कि ओपन एक्सेस से लेकर ट्रासफार्मर, मीटर खरीदी में खुले आम घोटाले किये गए। खनिज में तो pusya स्टील को आज ही रजिस्टे्रशन आज ही लीज देकर रमन सरकार ने नया इतिहास रचा है। माइनिंग शर्तो का खुले आम उल्लंघन हो रहा है और इस विभाग के अधिकारी तक खुले आम पैसा खा रहे है। खनिज को लेकर तो लूट मची है।
जनसंपर्क विभाग का तो भगवान ही मालिक है। सचिव पर तो आरोप लगा ही संवाद में तो 40 करोड़ के घपले उजागर होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं है। आजादी का असली मतलब तो इस विभाग के अफसर खूब जानते है और सरकार के खिलाफ खबर देने से परहेज नहीं करते।
ननकी राम कंवर
बस्तर से लेकर सरगुजा तक आदिवासी भेड़ बकरी की तरह काटे जा रह है। राजधानी में अपराध चरम पर है और छत्तीसगढ़ के दूसरे शहरों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। पुलिस के मुखिया विश्वरंजन की अपनी स्वतंत्रता है और ननकी राम कंवर से स्वतंत्र तो कोई है ही नहीं। कलेक्टर को दलाल और पुलिस कप्तान को निकम्मा कहने वाले इस गृह मंत्री ने विधान सभा में स्वीकार किया है कि थाने वाले शराब ठेकेदारों के इशारे पर काम करते हैं।
मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल बृजमोहन अग्रवाल को खुश करने सर्वाधिक विभाग दिया गया है यह अलग बात है कि उनसे कोई भी विभाग नहीं संभल रहा है। स्वतंत्रता इतनी की नेता प्रतिपक्ष बनने मारपीट करवाने तक का आरोप लगा है और पीडब्ल्यू डी में बढ़ते कमीशन खोरी उखड़ती सड़के पयर्टन में बगैर नाम पर के करोड़ों का आबंटन motal निर्माण से लेकर स्टेशनरी- प्रचार प्रसार में घोटाले की बाढ़, संस्कृति में आई राज के चलते बाहरी कलाकारों के नाम पर करोड़ों का आबंटन, शिक्षा में तो तवारिस बाम्बरा एच आर शर्मा एसएन सिंह गेंदाराम जैसे विवादास्पद व्यक्तियों के जिम्में जिला व कार्यालय सौंपा गया है और फर्नीचर से लेकर विज्ञान उपकरणों की खरीदी तक में घोटाले।
राजेश मूणत स्वतंत्रता तो इनके मुंह में बसी है और कार्यकर्ताओं के मुंह से सुनी जा सकती है। पहले दबाव बनाओं फिर खूब kamao की रणनीति ने इन्हें सर्किट हाउस के घोटाले का आरोपी तक बना दिया था लेकिन जब सरकार हमारी हो तो किसी का क्या बिगड़ना है। भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान में रूचि तो दिखाई लेकिन बसंत सेठिया जैसे लोगों को फायदा भी मिला। कमल विहार में छांट-छांट कर अच्छी प्लाटें किसे दी जा रही है किसी से छिपी नहीं है। पार्किंग वाली दूकाने कैसे सील हो रही है और जाहिद अली जैसे लोगों की फाइलें कहां दबी है। दबा बजार से लेकर क्रिस्टल टावर के चर्चे ही तो आम आदमी कर सकता है।
चन्द्रशेखर साहू कहने को तो साहू जी किसान नेता है लेकिन मंत्री बनते ही 270 रूपये वाला बोनस भूल गये। अब 270 रूपये की जरूरत ही क्या है जब नकली खाद से लेकर बीज तक का सफर हो। क्षेत्र में बिकते अवैध शराब की चर्चा क्या कम है जो किसानों के हित में निर्णय होंगे। यह केवल सरकार के आधा दर्जन मंत्रियों का उदाहण मात्र है कि सरकार किस तरह से स्वतंत्र कार्य कर रही है। वरना खेल मंत्री लता उसेण्डी हो या स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे हो या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द्र साहू सब की अपनी स्वतंत्रता है ऐसे में छत्तीसगढ़ में आम आदमी के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हो सकते है आसानी से समझ जा सकता है।
आप हल्ला करते रहे कि जिन्दल पावर लिमिटेड और बाल्को सैकड़ों एकट जमीन दबा रहे हैं। सरकार कार्रवाई करना तो दूर सुनेगी ही नहीं। आप चिल्लाते रहे कि कोल ब्लाक के आबंटन में गड़बड़ी हो रही है या अवैध निर्माण से काम्प्लेक्स खड़े किये जा रहे हैं। कोई नहीं सुनेगा। बल्कि अब तो न्यायालय के फैसले तक से लोग सहमत नजर नहीं आते। गैस त्रासदी या बाल्को का जमीनी कब्जा इसका उदाहरण है कि लोग इन फैसलों से सहमत नहीं है।
आम आदमी के लिए कहां है स्वतंत्रता
वोट हमारा- राज तुम्हारा- जो लोग अपना सांसद विधायक चुनते हैं इसके लिए सरकार क्या करती है यह तो सभी जानते है लेकिन जितने वाले सांसद विधायकों को न केवल हर माह एक मोटी रकम मिलती है और भत्ता भी। यही नहीं सीट से हटने के बाद जीवन भर पेंशन भी मिलता है। नौकर शाहों का भी यही आलम है जीवन भर नौकरी करो, भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाओ और रिटायर्ड होने के बाद सेंटिंग कर संविदा नौकरी व पेंशन पाओ।
आम आदमी के लिए सरकार की नीति यह है कि आप के घर पीने का पानी पहुंचे या न पहुंचे, टैक्स तो देना ही होगा।
जमीन आपकी है और किसी उद्योगपति को उद्योग लगाना है तो कीमत सरकार तय करेगी। जबकि वही उद्योगपति अपने उत्पादन की कीमत स्वयं तय करता है। यदि राजधानी या उद्योगों के लिए जमीन नहीं दी जायेगी तो सरकार सिर्फ एक लाईन में छिन (अधिग्रहण) लेगी और उद्योगपतियों को दे देगी।
आप विरोध करते रहो शराब ठेकेदार नियम विरूद्ब दुकानें खोल ही देगा और पुलिस भी उसकी सुरक्षा में खड़ी हो जायेगी।आप एक इंच जमीन जरूरत पड़ने पर भी कब्जा नहीं कर सकते उद्योगों को अवैध कब्जे की छूट है।
विकास के नाम पर उद्योगपतियों को जमीन दी जायेगी आम आदमी से छिन ली जायेगी।
आम आदमी के लिए पीने का साफ पानी नही लेकिन नेता अधिकारी बिसलरी पियेंगे वह भी सरकारी पैसे से
आम आदमी के लिए स्वास्थ्य सुविधा हो या न हो नेता अधिकारियों के लिए बड़े अस्पताल में मुफ्त ईलाज होगा
आम आदमी के लिए सरकारी स्कूल हो या न हो नेता अधिकारी के बच्चे नामचीन स्कूलों में पढ़ेगे अब तो एयरकंडीशन की सुविधा तक ढूंढी जाती है।
सरकारी स्कूलों में भवन या शिक्षक हो या न हो लेकिन प्राईवेट स्कूलों को grant .देंगे।
किसानों को पानी मिले या न मिले उद्योगके लिए नदिया बेच दी जायेगी।
और यह होता है आम आदमी द्वारा दी गई टैक्स की राशि से। इन्कम टैक्स देने वाले ...या लोग जितना टैक्स देते हैं वे कितने है और आम आदमी जो टैक्स देता है वह कितना है आकंलन करे तो पता चलेगा कि आम आदमी जीवन उपयोगी समान खरीकर यादा टैक्स देता है। इसके बाद भी सुविधा आम की बजाय खास लोगों को दी जाती है। योजनाएं आम की बजाए खास लोगों के लिए बनती है क्या यही है स्वतंत्रता।
15 अगस्त 1947 को जब अंग्रजों ने भारत छोड़ा। तब पूरा देश खुशियों से लबरेज था। हर आदमी एक दूसरे को स्वतंत्रता के मायने समझाता बधाईयां दे रहा था। लेकिन आजादी के 63 साल हो रहे हैं। इन 63 सालों में गरीब से गरीब आदमी ने भी सरकार को टेक्स दिया ताकि हमारे सांसद विधायक और सरकारी अधिकारी कर्मचारी भूखे न रहे और ईमानदारी से आम लोगों के हित और देश के हित के लिए काम करें। पर क्या ऐसा हो पाया। आम आदमी से कहां चूक हुई और व्यवस्था को किस तरह से अव्यवस्थित किया गया। रिपोर्ट।
छत्तीसगढ में तोrajya बनते ही आजादी के मायने बदल गए है। वैसे तो नौकर शाह और राजनेताओं के लिए ही लोकतंत्र में असली आजादी है। और आम आदमी के लिए नियम कानून की बात की जाती है। हमने भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों की .... और आजादी को लेकर समय समय पर पाठकों को जानकारी उपलब्ध कराया है।
आजादी के मायने
प्रदेश के मुखिया के अलावा डॉ. साहब के पास उर्जा, खनिज जनसंपर्क जैसे विभाग है और इनमें से कोई विभाग नहीं है जहां घपलों की दास्तान न हो। उर्जा विभाग में आजादी का यह आलम है कि ओपन एक्सेस से लेकर ट्रासफार्मर, मीटर खरीदी में खुले आम घोटाले किये गए। खनिज में तो pusya स्टील को आज ही रजिस्टे्रशन आज ही लीज देकर रमन सरकार ने नया इतिहास रचा है। माइनिंग शर्तो का खुले आम उल्लंघन हो रहा है और इस विभाग के अधिकारी तक खुले आम पैसा खा रहे है। खनिज को लेकर तो लूट मची है।
जनसंपर्क विभाग का तो भगवान ही मालिक है। सचिव पर तो आरोप लगा ही संवाद में तो 40 करोड़ के घपले उजागर होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं है। आजादी का असली मतलब तो इस विभाग के अफसर खूब जानते है और सरकार के खिलाफ खबर देने से परहेज नहीं करते।
ननकी राम कंवर
बस्तर से लेकर सरगुजा तक आदिवासी भेड़ बकरी की तरह काटे जा रह है। राजधानी में अपराध चरम पर है और छत्तीसगढ़ के दूसरे शहरों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। पुलिस के मुखिया विश्वरंजन की अपनी स्वतंत्रता है और ननकी राम कंवर से स्वतंत्र तो कोई है ही नहीं। कलेक्टर को दलाल और पुलिस कप्तान को निकम्मा कहने वाले इस गृह मंत्री ने विधान सभा में स्वीकार किया है कि थाने वाले शराब ठेकेदारों के इशारे पर काम करते हैं।
मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल बृजमोहन अग्रवाल को खुश करने सर्वाधिक विभाग दिया गया है यह अलग बात है कि उनसे कोई भी विभाग नहीं संभल रहा है। स्वतंत्रता इतनी की नेता प्रतिपक्ष बनने मारपीट करवाने तक का आरोप लगा है और पीडब्ल्यू डी में बढ़ते कमीशन खोरी उखड़ती सड़के पयर्टन में बगैर नाम पर के करोड़ों का आबंटन motal निर्माण से लेकर स्टेशनरी- प्रचार प्रसार में घोटाले की बाढ़, संस्कृति में आई राज के चलते बाहरी कलाकारों के नाम पर करोड़ों का आबंटन, शिक्षा में तो तवारिस बाम्बरा एच आर शर्मा एसएन सिंह गेंदाराम जैसे विवादास्पद व्यक्तियों के जिम्में जिला व कार्यालय सौंपा गया है और फर्नीचर से लेकर विज्ञान उपकरणों की खरीदी तक में घोटाले।
राजेश मूणत स्वतंत्रता तो इनके मुंह में बसी है और कार्यकर्ताओं के मुंह से सुनी जा सकती है। पहले दबाव बनाओं फिर खूब kamao की रणनीति ने इन्हें सर्किट हाउस के घोटाले का आरोपी तक बना दिया था लेकिन जब सरकार हमारी हो तो किसी का क्या बिगड़ना है। भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान में रूचि तो दिखाई लेकिन बसंत सेठिया जैसे लोगों को फायदा भी मिला। कमल विहार में छांट-छांट कर अच्छी प्लाटें किसे दी जा रही है किसी से छिपी नहीं है। पार्किंग वाली दूकाने कैसे सील हो रही है और जाहिद अली जैसे लोगों की फाइलें कहां दबी है। दबा बजार से लेकर क्रिस्टल टावर के चर्चे ही तो आम आदमी कर सकता है।
चन्द्रशेखर साहू कहने को तो साहू जी किसान नेता है लेकिन मंत्री बनते ही 270 रूपये वाला बोनस भूल गये। अब 270 रूपये की जरूरत ही क्या है जब नकली खाद से लेकर बीज तक का सफर हो। क्षेत्र में बिकते अवैध शराब की चर्चा क्या कम है जो किसानों के हित में निर्णय होंगे। यह केवल सरकार के आधा दर्जन मंत्रियों का उदाहण मात्र है कि सरकार किस तरह से स्वतंत्र कार्य कर रही है। वरना खेल मंत्री लता उसेण्डी हो या स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे हो या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द्र साहू सब की अपनी स्वतंत्रता है ऐसे में छत्तीसगढ़ में आम आदमी के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हो सकते है आसानी से समझ जा सकता है।
आप हल्ला करते रहे कि जिन्दल पावर लिमिटेड और बाल्को सैकड़ों एकट जमीन दबा रहे हैं। सरकार कार्रवाई करना तो दूर सुनेगी ही नहीं। आप चिल्लाते रहे कि कोल ब्लाक के आबंटन में गड़बड़ी हो रही है या अवैध निर्माण से काम्प्लेक्स खड़े किये जा रहे हैं। कोई नहीं सुनेगा। बल्कि अब तो न्यायालय के फैसले तक से लोग सहमत नजर नहीं आते। गैस त्रासदी या बाल्को का जमीनी कब्जा इसका उदाहरण है कि लोग इन फैसलों से सहमत नहीं है।
आम आदमी के लिए कहां है स्वतंत्रता
वोट हमारा- राज तुम्हारा- जो लोग अपना सांसद विधायक चुनते हैं इसके लिए सरकार क्या करती है यह तो सभी जानते है लेकिन जितने वाले सांसद विधायकों को न केवल हर माह एक मोटी रकम मिलती है और भत्ता भी। यही नहीं सीट से हटने के बाद जीवन भर पेंशन भी मिलता है। नौकर शाहों का भी यही आलम है जीवन भर नौकरी करो, भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाओ और रिटायर्ड होने के बाद सेंटिंग कर संविदा नौकरी व पेंशन पाओ।
आम आदमी के लिए सरकार की नीति यह है कि आप के घर पीने का पानी पहुंचे या न पहुंचे, टैक्स तो देना ही होगा।
जमीन आपकी है और किसी उद्योगपति को उद्योग लगाना है तो कीमत सरकार तय करेगी। जबकि वही उद्योगपति अपने उत्पादन की कीमत स्वयं तय करता है। यदि राजधानी या उद्योगों के लिए जमीन नहीं दी जायेगी तो सरकार सिर्फ एक लाईन में छिन (अधिग्रहण) लेगी और उद्योगपतियों को दे देगी।
आप विरोध करते रहो शराब ठेकेदार नियम विरूद्ब दुकानें खोल ही देगा और पुलिस भी उसकी सुरक्षा में खड़ी हो जायेगी।आप एक इंच जमीन जरूरत पड़ने पर भी कब्जा नहीं कर सकते उद्योगों को अवैध कब्जे की छूट है।
विकास के नाम पर उद्योगपतियों को जमीन दी जायेगी आम आदमी से छिन ली जायेगी।
आम आदमी के लिए पीने का साफ पानी नही लेकिन नेता अधिकारी बिसलरी पियेंगे वह भी सरकारी पैसे से
आम आदमी के लिए स्वास्थ्य सुविधा हो या न हो नेता अधिकारियों के लिए बड़े अस्पताल में मुफ्त ईलाज होगा
आम आदमी के लिए सरकारी स्कूल हो या न हो नेता अधिकारी के बच्चे नामचीन स्कूलों में पढ़ेगे अब तो एयरकंडीशन की सुविधा तक ढूंढी जाती है।
सरकारी स्कूलों में भवन या शिक्षक हो या न हो लेकिन प्राईवेट स्कूलों को grant .देंगे।
किसानों को पानी मिले या न मिले उद्योगके लिए नदिया बेच दी जायेगी।
और यह होता है आम आदमी द्वारा दी गई टैक्स की राशि से। इन्कम टैक्स देने वाले ...या लोग जितना टैक्स देते हैं वे कितने है और आम आदमी जो टैक्स देता है वह कितना है आकंलन करे तो पता चलेगा कि आम आदमी जीवन उपयोगी समान खरीकर यादा टैक्स देता है। इसके बाद भी सुविधा आम की बजाय खास लोगों को दी जाती है। योजनाएं आम की बजाए खास लोगों के लिए बनती है क्या यही है स्वतंत्रता।
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
जितना पैसा, उतना काम पत्रकारिता का काम तमाम
छत्तीसगढ़ में अखबारों का जितना व्यवसायीकरण हुआ है उससे यादा पत्रकारिता और पत्रकारों का व्यवसायीकरण हुआ है खबरें इंच सेमी में बेचने में तो प्रतिष्ठत माने जाने वाले अखबार भी पीछे नहीं है। चुनाव लड़ने वाले राजनैतिक दल के प्रत्याशियों से पैकेज लेने की तो जैसे परम्परा ही चल पड़ी है। ऐसे में पत्रकारिता करने वाले भी कहां पीछे हटते। रोज छपने वाले अखबारों के पत्रकार तो जितना पैसा उतना काम की रणनीति ही नहीं अख्तियार किये हैं बल्कि अलग अलग बीटों में बंट गये है। हालत यह है कि अपनी बीट को छोड़ दूसरे के बीट की तरफ कोई देखता भी नहीं है चाहे कितनी भी बड़ी खबर हो। पिछले दिनों पंडरी के एक दंपत्ति अपने पुत्र की हत्या की आशंका जताते हुए प्रेस क्लब पहुंचे यहां नवभारत भास्कर सहित कई अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद थे। ये सब प्रेस कांफ्रेस अटेंड करने आये थे। प्राय सभी का यही जवाब था। पुलिस दूसरा देखता है। प्रेस आ जाना। यानी इस दंपत्ति की बात सुननी तो दूर विज्ञप्ति तक कोई लेने तैयार नहीं था।
यह पत्रकारिता की भयंकर भूल हो सकती है आरै भटकते लोगों के साथ ये अन्याय नहीं तो और क्या है जबकि आज भी आम लोगों की पत्रकारिता से बेहद उम्मीद है।
देहाड़ी मजदूरी भी शुरू
वैसे तो भास्कर के नित नये प्रयोग किसी से छिपे नहीं है। प्रयोगवादी इस अखबार ने अपने को स्थापित करने आये दिन कुछ नया करने रहता है। इस बार उसने अपने स्टार में देहाड़ी मजदूर की परम्परा शुरू की है। महिने का तनख्वाह वाला सिस्टम खतम। सप्ताह का झंझट भी कौन पाले। इसलिए रोज जाओ काम करो पैसा पाओ। अब काम करने वाला ज्ञान हो या ...क्या फर्क पड़ता है।
डर का भूत
पिछले दिनों संजय पाठक की भास्कर में वापसी हुई। इससे पहले वह भास्कर छोड़कर हरिभूमि गया था। कहते हैं भास्कर छोड़ते की वजह नवीन थे और नवीन हरिभूमि पहुंचा तो वह हरिभूमि छोड़ दिया। प्रेस क्लब में इसकी बेहद चर्चा है और नवभारत के पत्रकारों के मुताबिक नवीन तो अब राव की भूमिका में हैं।
हड़ताल नहीं करने का फल भुगतो
अखबार लाईन में एक कहावत है तनख्वाह बढानी हो तो अखबार जल्दी बदलों। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि हड़ताल में शामिल नहीं होने पर नौकरी से निकाल दे और हड़ताल करने वालों की नौकरी बरकरार रहे। यह सब हुआ है हिन्दूस्तान में यही सब हुआ। पिछले माह हड़ताल हुई तो कुछ लोग काम करते रहे और जब मामला सुलझा हड़ताल खतम हुआ तो उसके सप्ताह भर बाद हड़ताल नहीं करने वाले चैनल से भगा दिये गए। यानी नौकरी तो गई ही साथियों के साथ गद्दारी का तोहमत अलग लगा।
और ..में ....
पूरे प्रेस को व्यवसायिकता के रंग में रगने वाले एक अखबार मालिक को अब कांग्रेस की राजनीति भारी पड़ सकती है। कभी इस अखबार मालिक की जी हुजुरी करने वाले संवाद के अधिकारी अब प्रेस के अवैध निर्माण को तुड़वाने ऐसे बंदे की तलाश कर रहे हैं जो कोर्ट में याचिका दायर कर सके और सेट भी न हो।
यह पत्रकारिता की भयंकर भूल हो सकती है आरै भटकते लोगों के साथ ये अन्याय नहीं तो और क्या है जबकि आज भी आम लोगों की पत्रकारिता से बेहद उम्मीद है।
देहाड़ी मजदूरी भी शुरू
वैसे तो भास्कर के नित नये प्रयोग किसी से छिपे नहीं है। प्रयोगवादी इस अखबार ने अपने को स्थापित करने आये दिन कुछ नया करने रहता है। इस बार उसने अपने स्टार में देहाड़ी मजदूर की परम्परा शुरू की है। महिने का तनख्वाह वाला सिस्टम खतम। सप्ताह का झंझट भी कौन पाले। इसलिए रोज जाओ काम करो पैसा पाओ। अब काम करने वाला ज्ञान हो या ...क्या फर्क पड़ता है।
डर का भूत
पिछले दिनों संजय पाठक की भास्कर में वापसी हुई। इससे पहले वह भास्कर छोड़कर हरिभूमि गया था। कहते हैं भास्कर छोड़ते की वजह नवीन थे और नवीन हरिभूमि पहुंचा तो वह हरिभूमि छोड़ दिया। प्रेस क्लब में इसकी बेहद चर्चा है और नवभारत के पत्रकारों के मुताबिक नवीन तो अब राव की भूमिका में हैं।
हड़ताल नहीं करने का फल भुगतो
अखबार लाईन में एक कहावत है तनख्वाह बढानी हो तो अखबार जल्दी बदलों। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि हड़ताल में शामिल नहीं होने पर नौकरी से निकाल दे और हड़ताल करने वालों की नौकरी बरकरार रहे। यह सब हुआ है हिन्दूस्तान में यही सब हुआ। पिछले माह हड़ताल हुई तो कुछ लोग काम करते रहे और जब मामला सुलझा हड़ताल खतम हुआ तो उसके सप्ताह भर बाद हड़ताल नहीं करने वाले चैनल से भगा दिये गए। यानी नौकरी तो गई ही साथियों के साथ गद्दारी का तोहमत अलग लगा।
और ..में ....
पूरे प्रेस को व्यवसायिकता के रंग में रगने वाले एक अखबार मालिक को अब कांग्रेस की राजनीति भारी पड़ सकती है। कभी इस अखबार मालिक की जी हुजुरी करने वाले संवाद के अधिकारी अब प्रेस के अवैध निर्माण को तुड़वाने ऐसे बंदे की तलाश कर रहे हैं जो कोर्ट में याचिका दायर कर सके और सेट भी न हो।
सोमवार, 16 अगस्त 2010
डीएस कंपनी के आगे शासन की नहीं चलती...
रिंग रोड नंबर 1 में फोर लेन का निर्माण करने वाली कंपनी डी.एस. वायकान कंस्ट्रक्शन की दादागिरी के आगे शासन भी बेबस है। यहीं नहीं निगम की चेतावनी के बाद भी वह शहर के मध्य टैक्स वसूली नाका निर्माण कर ही है जिससे आने वाले दिनों में अप्रिय स्थिति निर्मित हो सकती है।
बताया जाता है कि कंपनी के कार्यप्रणाली से संतोषी नगर से लेकर रिंग रोड के किनारे निवासरत लोग वैसे भी परेशान रहे है। हालत यह है कि उसकी दादागिरी के आगे मंत्री तक बेबस हैं। इधर कंपनी ने शहर के मध्य टोल प्लाजा का निर्माण कर रही है इसका पता चलते ही निगम ने कंपनी को शहर के मध्य से टोल प्लाजा हटाने कहा है लेकिन टोल प्लाजा का निर्माण बंद नहीं हुआ है। कंपनी की इससे बड़ी उद्ंदता और क्या होगी कि उच्च न्यायालय भी टोल टैक्स की स्थापना को लेकर निर्देश जारी कर चुका है कि वसूली नाका शहर के मध्य न हो। इधर मामले को लेकर शहर कांग्रेस कमेटी ने भी मोर्चा खोल दिया है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल और महामंत्री डॉ. निरंजन हरितवाल ने आंदोलन की चेतावनी देते हुए रायपाल को ज्ञापन भी सौंपा है।
शहर कांग्रेस कमेटी ने ज्ञापन में कहा है कि डी.एस. वायकान कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा शहर के मध्य रिंग रोड नंबर 1 पर दीनदयाल उपाध्याय, रोहणीपुरम एवं माधवराव सप्रे वार्ड, टाटीबंध, हीरापुर, सरोना आदि में रहने वाले 1 लाख से अधिक आवासीय नागरिकों को प्रतिदिन रोजमर्रे के लिए आने-जाने में हर बार टोल टैक्स देना पड़ेगा जिससे लोगों को अनावश्यक रुप से परेशानी होगी एवं उनकी जेब पर भारी बोझ पड़ेगा। इतना ही नहीं माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी टोल टैक्स के संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किया है कि टोल टैक्स नाके शहर के अंदर कदापि न बनावे जावें एवं उन्हें शहर के बाहर ही स्थापित किए जावें परंतु डी.एस. वायकान कंस्ट्रक्शन कंपनी जिन्हें फोरलेन बनाने का ठेका दिया गया है उनके द्वारा शहर के अंदर निर्माण किया जा रहा है जो नियम विरुध्द एवं जनता को भारी परेशानी होगी एवं अनावश्यक आर्थिक बोझ भी पड़ेगा। अब आपसे अनुरोध है कि शहर व मध्य निर्माणाधीन टोल टैक्स नाके पर रोक लगाई जावें एवं उसे शहर के बाहर बनाने का आदेश देने की कृपा करें। इस संबंध में नगर निगम रायपुर द्वारा भी नोटिस जारी कर शहर के अंदर न बनाने कहा गया है परंतु उसके बावजूद भी उक्त कंपनी ने निर्माण बंद नहीं किया है।
बताया जाता है कि कंपनी के कार्यप्रणाली से संतोषी नगर से लेकर रिंग रोड के किनारे निवासरत लोग वैसे भी परेशान रहे है। हालत यह है कि उसकी दादागिरी के आगे मंत्री तक बेबस हैं। इधर कंपनी ने शहर के मध्य टोल प्लाजा का निर्माण कर रही है इसका पता चलते ही निगम ने कंपनी को शहर के मध्य से टोल प्लाजा हटाने कहा है लेकिन टोल प्लाजा का निर्माण बंद नहीं हुआ है। कंपनी की इससे बड़ी उद्ंदता और क्या होगी कि उच्च न्यायालय भी टोल टैक्स की स्थापना को लेकर निर्देश जारी कर चुका है कि वसूली नाका शहर के मध्य न हो। इधर मामले को लेकर शहर कांग्रेस कमेटी ने भी मोर्चा खोल दिया है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल और महामंत्री डॉ. निरंजन हरितवाल ने आंदोलन की चेतावनी देते हुए रायपाल को ज्ञापन भी सौंपा है।
शहर कांग्रेस कमेटी ने ज्ञापन में कहा है कि डी.एस. वायकान कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा शहर के मध्य रिंग रोड नंबर 1 पर दीनदयाल उपाध्याय, रोहणीपुरम एवं माधवराव सप्रे वार्ड, टाटीबंध, हीरापुर, सरोना आदि में रहने वाले 1 लाख से अधिक आवासीय नागरिकों को प्रतिदिन रोजमर्रे के लिए आने-जाने में हर बार टोल टैक्स देना पड़ेगा जिससे लोगों को अनावश्यक रुप से परेशानी होगी एवं उनकी जेब पर भारी बोझ पड़ेगा। इतना ही नहीं माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी टोल टैक्स के संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किया है कि टोल टैक्स नाके शहर के अंदर कदापि न बनावे जावें एवं उन्हें शहर के बाहर ही स्थापित किए जावें परंतु डी.एस. वायकान कंस्ट्रक्शन कंपनी जिन्हें फोरलेन बनाने का ठेका दिया गया है उनके द्वारा शहर के अंदर निर्माण किया जा रहा है जो नियम विरुध्द एवं जनता को भारी परेशानी होगी एवं अनावश्यक आर्थिक बोझ भी पड़ेगा। अब आपसे अनुरोध है कि शहर व मध्य निर्माणाधीन टोल टैक्स नाके पर रोक लगाई जावें एवं उसे शहर के बाहर बनाने का आदेश देने की कृपा करें। इस संबंध में नगर निगम रायपुर द्वारा भी नोटिस जारी कर शहर के अंदर न बनाने कहा गया है परंतु उसके बावजूद भी उक्त कंपनी ने निर्माण बंद नहीं किया है।
मंत्री के दबाव में रिवाल्वर तानने वाले पर जुर्म दर्ज नहीं!
रामसागर पारा के राजू महराज ने गंज पुलिस द्वारा एफआईआर नहीं लिखने पर लिखित में आवेदन दिया है कि मनीष अग्रवाल द्वारा उन पर रिवाल्वर तान कर धमकाया गया। पुलिस आरोपी गिरफ्तार करने की बात तो दूर जुर्म दर्ज तक नहीं कर पाई है। प्रार्थी दहशत में है।
बताया जाता है कि किसी बात को लेकर राजू महराज और मनीष के बीच विवाद हुआ और इसी विवाद में मनीष ने रिवाल्वर तान कर जान से मारने की धमकी दी। बताया जाता है कि राजू महराज जब तक थाने पहुंचते उससे पहले दमदार मंत्री का फोन वहां आ गया और एफआईआर की बजाय लिखित में आवेदन मांग लिया गया। चूंकि राजू भी भाजपा से जुड़ा हा इसलिए इसे राजैतिक वजह भी माना जा रहा है दूसरी तरफ मनीष को पूर्व पार्षद के भाई का संरक्षण के अलावा मंत्री का भी संरक्षण प्राप्त है।
बताया जाता है कि किसी बात को लेकर राजू महराज और मनीष के बीच विवाद हुआ और इसी विवाद में मनीष ने रिवाल्वर तान कर जान से मारने की धमकी दी। बताया जाता है कि राजू महराज जब तक थाने पहुंचते उससे पहले दमदार मंत्री का फोन वहां आ गया और एफआईआर की बजाय लिखित में आवेदन मांग लिया गया। चूंकि राजू भी भाजपा से जुड़ा हा इसलिए इसे राजैतिक वजह भी माना जा रहा है दूसरी तरफ मनीष को पूर्व पार्षद के भाई का संरक्षण के अलावा मंत्री का भी संरक्षण प्राप्त है।
शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
30-32 करोड़ का माल 5 लाख में...
लोकतंत्र की जय हो, लोकतंत्र अमर रहे। हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को यह नारा जोर-शोर से लगाया जाता है। इस बार भी यह नारा लगेगा और झक सफेद कपड़े में मुख्यमंत्री से लेकर जनप्रतिनिधि शपथ भी लेंगे और इसके चंद मिनट बाद कई लोग उद्योगपतियों के साथ नजर आएंगे किसानों को कंगाल करने के फैसले होंगे। विकास के नाम पर आम लोगों की उपजाऊ जमीन छीन ली जाएगी और मुआवजे के नाम पर कुत्तों की तरह रोटी डाल दी जाएगी।
छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से भरपूर राय है और यहां विकास के नाम पर सरकार जिस तरह से जमीनें अधिग्रहित कर रही है उससे आने वाले दिनों में विकास की गंगा बहनी तय है? नई राजधानी के नाम पर सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन पर कांक्रीट का जंगल बनाया जा रहा है। कितने लोग बेघर हो गए और उन्हें मुआवजे के नाम पर जबरिया हटा दिया गया। उद्योगों को जमीन बेचने सरकारी एजेंट घूम रहे हैं। यहां भी उपजाऊ जमीन बर्बाद किया जा रहा है। उद्योगों को लोहे की खदानें दी गई जंगल काटे जा रहे हैं। पानी तक बेची जा रही है जबकि किसानों के लिए सरकार के पास पानी नहीं है।
सबसे दुखद पहलू तो मनमाने ढंग से कोल ब्लॉक का बंदरबांट है। सरकारी के अलावा निजी जमीनों के नीचे भी कोल ब्लाक हैं और इन जमीनों को 4-5 लाख रुपए एकड़ में उद्योगपतियों को बेचने सरकारी षडयंत्र रचा जा रहा है। पूरी सरकार इन निजी जमीनों को उद्योगपतियों को दिलाने गांव वालों पर दबाव डाल रहे हैं और उद्योगपति कोयलेवाली निजी जमीन 4-5 लाख रुपए में खरीदने लाखों खर्च कर रही है। इसकी वजह न क्षेत्र का विकास है और न ही आम लोगों को फायदा देना है बल्कि इसकी वजह एक एकड़ जमीन के नीचे मौजूद 30-32 करोड़ का कोयला है। क्या दुनिया में इससे सस्ता सौदा हो सकता है कि 30-32 करोड़ के कोयले के बदले सिर्फ किसानों को 4-5 लाख रुपए दिए जाए। लेकिन उद्योगपतियों की इस करतूत को सरकार भी समझने तैयार नहीं है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर कोल ब्लाक दिए गए हैं उससे उद्योगपतियों को जो हर साल कमाई होनी है वह छत्तीसगढ़ सरकार के कुल बजट 22 हजार करोड़ रुपए से अधिक है। यह कैसे आम लोगों की सरकार है जो कोयले वाली जमीन 4-5 लाख रुपए में देने उद्योगपतियों के लिए बिचौलिये-दलाल की तरह काम कर रही है। क्या इन किसानों की स्थिति बस्तर के उस लूट के बराबर नहीं है जो आदिवासियों से चिरौजी के बदले नामक देते थे। क्या सरकार को नहीं मालूम है कि जिस कोयले वाली जमीन को 4-5 लाख रुपए एकड़ में जिंदल या दूसरे लोग ले रहे हैं उसके नीचे 30-32 करोड़ रुपए का कोयला है। प्रकाश इंडस्ट्रीज को कोल ब्लॉक गलत दी गई यह अजीत जोगी भी कह रहे है और वे इसे भूल मानते हुए रमन सरकार से सुधारने की बात कह रहे है लेकिन गलत आबंटन का विरोध करने वाली रमन सरकार भूल सुधारने तैयार नहीं है। लगातार उद्योग को लेकर विधानसभा में रमन सिंह कहते हैं कि जब सब लोग कह रहे हैं तो नए ईएमयू नहीं करेंगे। लेकिन जो लोग उद्योग लगा रहे हैं उनके अत्याचार, अवैध कब्जों पर सरकार खामोश है। इतनी सरकारी अंधेरगर्दी पर जनता खामोश है तो इसकी वजह सरकारी हठधर्मिता ही है। लेकिन सरकार को भी सोचना होगा कि कोई पैसे लेकर नहीं जाता है। यही छोड़ना है। आम लोगों की आह का असर होगा। यह ध्यान रहे।
छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से भरपूर राय है और यहां विकास के नाम पर सरकार जिस तरह से जमीनें अधिग्रहित कर रही है उससे आने वाले दिनों में विकास की गंगा बहनी तय है? नई राजधानी के नाम पर सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन पर कांक्रीट का जंगल बनाया जा रहा है। कितने लोग बेघर हो गए और उन्हें मुआवजे के नाम पर जबरिया हटा दिया गया। उद्योगों को जमीन बेचने सरकारी एजेंट घूम रहे हैं। यहां भी उपजाऊ जमीन बर्बाद किया जा रहा है। उद्योगों को लोहे की खदानें दी गई जंगल काटे जा रहे हैं। पानी तक बेची जा रही है जबकि किसानों के लिए सरकार के पास पानी नहीं है।
सबसे दुखद पहलू तो मनमाने ढंग से कोल ब्लॉक का बंदरबांट है। सरकारी के अलावा निजी जमीनों के नीचे भी कोल ब्लाक हैं और इन जमीनों को 4-5 लाख रुपए एकड़ में उद्योगपतियों को बेचने सरकारी षडयंत्र रचा जा रहा है। पूरी सरकार इन निजी जमीनों को उद्योगपतियों को दिलाने गांव वालों पर दबाव डाल रहे हैं और उद्योगपति कोयलेवाली निजी जमीन 4-5 लाख रुपए में खरीदने लाखों खर्च कर रही है। इसकी वजह न क्षेत्र का विकास है और न ही आम लोगों को फायदा देना है बल्कि इसकी वजह एक एकड़ जमीन के नीचे मौजूद 30-32 करोड़ का कोयला है। क्या दुनिया में इससे सस्ता सौदा हो सकता है कि 30-32 करोड़ के कोयले के बदले सिर्फ किसानों को 4-5 लाख रुपए दिए जाए। लेकिन उद्योगपतियों की इस करतूत को सरकार भी समझने तैयार नहीं है।
छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर कोल ब्लाक दिए गए हैं उससे उद्योगपतियों को जो हर साल कमाई होनी है वह छत्तीसगढ़ सरकार के कुल बजट 22 हजार करोड़ रुपए से अधिक है। यह कैसे आम लोगों की सरकार है जो कोयले वाली जमीन 4-5 लाख रुपए में देने उद्योगपतियों के लिए बिचौलिये-दलाल की तरह काम कर रही है। क्या इन किसानों की स्थिति बस्तर के उस लूट के बराबर नहीं है जो आदिवासियों से चिरौजी के बदले नामक देते थे। क्या सरकार को नहीं मालूम है कि जिस कोयले वाली जमीन को 4-5 लाख रुपए एकड़ में जिंदल या दूसरे लोग ले रहे हैं उसके नीचे 30-32 करोड़ रुपए का कोयला है। प्रकाश इंडस्ट्रीज को कोल ब्लॉक गलत दी गई यह अजीत जोगी भी कह रहे है और वे इसे भूल मानते हुए रमन सरकार से सुधारने की बात कह रहे है लेकिन गलत आबंटन का विरोध करने वाली रमन सरकार भूल सुधारने तैयार नहीं है। लगातार उद्योग को लेकर विधानसभा में रमन सिंह कहते हैं कि जब सब लोग कह रहे हैं तो नए ईएमयू नहीं करेंगे। लेकिन जो लोग उद्योग लगा रहे हैं उनके अत्याचार, अवैध कब्जों पर सरकार खामोश है। इतनी सरकारी अंधेरगर्दी पर जनता खामोश है तो इसकी वजह सरकारी हठधर्मिता ही है। लेकिन सरकार को भी सोचना होगा कि कोई पैसे लेकर नहीं जाता है। यही छोड़ना है। आम लोगों की आह का असर होगा। यह ध्यान रहे।
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