मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कांग्रेस-भाजपा में सांठ-गांठ

परमाणु दायित्व विधेयक को लेकर कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ को लेकर लालू-मुलायम और वाम दलों ने खूब हंगामा किया। इस सांठ-गांठ के चलते गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बचाने का भी आरोप है? क्या सचमुच कांग्रेस और भाजपा में इस तरह की सांठ-गांठ हो रही है। हालांकि यह सत्य है कि राजनीति में न तो स्थाई दोस्त होते हैं और न ही दुश्मन। खासकर अपने हितों के लिए सांसद और विधायक कितने नीचे गिर सकते हैं यह इस देश के आम लोगों ने बहुत नजदीक से देखा है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस किस स्तर तक सांठगांठ कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये वही रमन सिंह है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी सरकार के घोटाले की जुलूस निकाला था। तब रमन सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के अन्याय के खिलाफ संकल्प पत्र जारी किया था। अजीत जोगी को खलनायक बताने वाले संकल्प पत्र की कितनी बातें पूरी की गई? यह सवाल अब भी लोगों की जुबान पर है। आज रमन सरकार को 6 साल से उपर हो गए है और उसने अभी तक जोगी सरकार के किसी भी घोटाले पर कार्रवाई नहीं की। क्या यह सांठ-गांठ नहीं है। सांठ-गांठ का आलम यह है कि अपनी तनख्वाह बढ़ाने यही लालू-मुलायम या वामदल एक हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है। प्रदेश सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां घोटाले, अनियमितता की खबरें नहीं आ रही है। लेकिन क्या कभी किसी कांग्रेसी ने कार्रवाई होते तक आंदोलन किया। हालत तो इतनी खराब है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं के खिलाफ बोलने में कांग्रेसियों के पसीने छूट जाते हैं? क्या पीडब्ल्यूडी की करतूत किसी कांग्रेसी से छिपी है। कमीशन 15 से बढक़र 20 हो गया। तबादला उद्योग चलाया गया। पर्यटन में एमजी श्रीवास्तव हो या अजय श्रीवास्तव की दादागिरी पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। उल्टे नियम विरुद्ध यहां नियमितिकरण किया जा रहा है। संविलियन किया जा रहा है। नाते-रिश्तेदारों को नौकरी दी जा रही है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। शिक्षा विभाग में तो फर्नीचर घोटाला हो या विज्ञान उपकरणों की खरीदी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। विवादास्पद तवारिस, बाम्बरा जैसे लोगों के मजे है और कांग्रेसी अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
ऐसा नहीं कि सांठ-गांठ सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल के मामले में है। चंद्रशेखर साहू हो या राजेश मूणत। खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विभाग में घोटाले की फेहरिश्त है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। मुख्यमंत्री धर्म का अपमान करते हैं और कांग्रेसी यह कहकर खामोशी ओढ़ लेते हैं कि यह व्यक्तिगत है। भाजपा का कमल दीप में महंगाई डायन पर भी कांग्रेसी दो-चार घंटे चिल्लाकर चुप हो जाते हैं। सांठ-गांठ इतनी की कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के आम कार्यकर्ता हैरान है और आम लोगों का पैसा बेदर्दी से लूटा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में राजस्व की कमी नहीं है लेकिन उस स्तर पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं जब एक ही सडक़ साल में दो-चार बार बनानी हो तो विकास के दूसरे कार्य कैसे होंगे। लालू-मुलायम या वामदलों को कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ अब दिखाई दे रहा है। वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी में यह सांठगांठ नहीं दिखता। भ्रष्टाचारियों को बचाने में सांठगांठ नहीं दिखता और न ही अपराधियों को संरक्षण में ही सांठगांठ दिखता है।

लोग मरते हैं तो मर जाएं सांसद-विधायकों को पैसा चाहिए

 आजादी के 63 साल बाद भी आम आदमी को पीने का पानी तक नहीं मिल रहा है, शिक्षा और चिकित्सा सुविधा का भगवान ही मालिक है। लोग दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं और इस देश के सांसदों और विधायकों को 16 हजार रुपए महिना भी कम पड़ रहा है। इस शर्मनाक स्थिति को रोका नहीं गया तो न नेताओं को कोई पिटने से बचा पाएगा और न ही लोगों को सडक़ों पर उतरने से कोई सरकार रोक पाएगी।
जनप्रतिनिधि कहलाने वाले इस देश के सांसदों व विधायकों ने अपनी सुविधा बढ़ाने आम लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया है। रोजमर्रा की चीजे सिर्फ महंगी इसलिए हुई है क्योंकि इस पर भारी भरकम टैक्स लागू है और इस टैक्स में से बड़ी राशि सांसदों-विधायकों के वेतन भत्ते और पेंशन में चले जाते हैं। जिस देश के आम आदमी को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है उस देश के सांसद और विधायक अपनी सुविधाओं में कटौती कराने की बजाए सुविधाएं बढ़ाने लड़ रहे हो इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी?
क्या किसी सरकार ने कभी सोचा है कि उसके राज में हर व्यक्ति को शिक्षा, चिकित्सा और पानी की सुविधाएं उपलब्ध है। भोजन तो दूर की बात है। इस देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं होगा जहां ये तीन मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को पूरी तरह मिल रही हो। जब आजादी के 63 साल बाद भी ये तीन चीजें आम लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकी है तो फिर इन्हें वेतन किस बात का? सिर्फ एय्याशी या लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा करने का?
सवाल यह नहीं है कि सांसदों-विधायकों का वेतन क्यों नहीं बढ़े? बल्कि अब आम आदमी यह सवाल करने लगा है कि इन्हें आखिर वेतन ही क्यों दिया जाए? जब सवाल करने पैसे ये लेते हैं? सवाल नहीं करने के पैसे ये लेते हैंं? उद्योगों के हित में नीति बनाते समय पैसे ये खाते है? कब किसका टैक्स बढ़ाना है घटाना है के एवज में पैसे का लेनदेन होता है और संसद या विधानसभा की कार्रवाई के दौरान इन्हें जब भत्ते दिए जाते है तब वेतन क्यों।
क्या आम आदमी इस बात से अनभिज्ञ है कि पांच सौ पैतालीस सांसदों में से तीन सौ से ज्यादा सांसद करोड़पति है? इन्हें वेतन की जरूरत क्यों और किसलिए दी जानी चाहिए? आम लोगों के खून पसीने की कमाई पर अपना हित साधने की कोशिश अब बंद करनी ही होगी वरना इसका दुखद परिणाम भुगतने के लिए देश को तैयार होना होगा। इस देश का प्रति व्यक्ति की आय कितना है और नेताओं को कितना वेतन भत्ता सुविधा दिया जा रहा है? सकारी आंकड़े सच्चाई से कोसो दूर होता है और औसत के फेर में गरीब कैसे मरता है इसका उदाहरण है भारत का प्रति व्यक्ति आय। सरकारी आकड़े के मुताबिक भारत के प्रति व्यक्ति की आय लगभग 40 हजार रुपए वार्षिक है यानी महिने में तीन साढ़े तीन हजार रुपए। ऐसे में सांसदों-विधायकों को इससे ज्यादा वेतन की बात ही बेमानी है।
अब तो लोग आक्रोशित है और आने वाले दिनों में राजनैतिक दलों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। यदि बगैर वेतन के काम करने वाले लोग चुनाव लड़ेंगे तो उन्हें ही जनता अपना वोट देगी और यह स्थिति बनने भी लगी है।
00मालामाल सांसद
0 पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति है।
0 देश के प्रधानमंत्री भी विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा।
0 तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनों अआय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
0 गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती लोगों के पास कितना पैसा यह किसी से छुपा नहीं।

00 मंत्री बनने के बाद यह मिलता है सांसदों को
0 टाइप 8 बंगला, राज्यमंत्रियों को टाइप 7 बंगला।
0 कोई किराया नहीं, बिजली के बिल पर कोई लगाम नहीं।
0 मूल वेतन 16 हजार रुपए, भत्ता 1 हजार रुपए
0 संसदीय क्षेत्र भत्ता 20 हजार रुपए।
0 टेलीफोन : दो फोन और एक लाख 75 हजार फ्री कॉल।
0 हर साल ढाई हजार रुपए मोबाइल भत्ता।
0 मोबाइल हैंडसेट फ्री।
0 नि:शुल्क एयर टिकट।
0 परिवार के लिए साल में 48 यात्राएं।
0 जितना चाहें उतनी एसी कोच में यात्रा परिवार के साथ
स्टाफ : पर्सनल स्टाफ में इन लोगों की नियुक्ति किया जा सकता है।
एक प्राइवेट सेक्रेटरी, एक एडिशनल पर्सनल सेक्रेटरी, दो पर्सनल असिस्टेंट, एक हिन्दी स्टेनो, एक ड्राइवर, एक क्लर्क एक जमादार या चपरासी।
( यह केवल मंत्री का स्टाफ है मंत्रालय से अलग से स्टाफ मिलता है।)

रविवार, 22 अगस्त 2010

क्या सांसदों -विधायकों को वेतन लेना चाहिए?

दो दिन से मै सो नहीं सका , लोग क्यों नहीं निकल रहें है विरोध करने ,क्या राजनीती सिर्फ पैसे कमाने का जरिया बन गया है, गाँधी के इस देश में ये क्या हो रहा है,कंहा है समाज सेवी लोग , मै ठेका ले रहा हूँ , जब तक इन लोगो का वेतन बंद नहीं होगा या जब तक ऐसे लोगो को जो वेतन न ले संसद में नहीं पहुचेंगे चैन से नहीं बैठूँगा ,
आइये मेरा साथ दीजिये ,मैंने राष्टपति को भी पत्र लिखा है ,

शनिवार, 21 अगस्त 2010

पता नहीं बेटा...

पता नहीं बेटा...
बेटा- संगठन चुनाव में मोती लाल वोरा ने बाकी कांग्रेसियों को चारोखाने चित कर दिया।
पिताजी- हां बेटा। वोरा जी के सामने बाकी कोई लगते कहां है। सालों से उन्हीं का कब्जा है
बेटा- तो क्या छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दुर्दशा के लिए वोरा जी ही जिम्मेदार हैं।
पिताजी- पता नहीं बेटा।
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बेटा-भाजपा के प्रदेश प्रभारी नड्डा ने असंतुष्टों की खूब खबर ली। भ्रष्टाचारियों को लताड़ा।
पिताजी- हां बेटा। रमेश बैस पर उनका सीधा निशाना था।
बेटा- लोग कहते हैं नया मुल्ला यादा प्याज खाता है।
पिताजी- पता नहीं बेटा।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

मौते हुई तो सरकार की झूठ पकड़ी गई ...

वाह भाई! सरकार हो तो ऐसी हो! छत्तीसगढ़ की सरकार ने विधानसभा तक में कह दिया कि छत्तीसगढ़ से कोई पलायन नहीं होता। सरकार के इस दावे के पीछे तर्क था कि वह यहां के लोगों को न केवल दो रूपये किलो चावल दे रही है बल्कि रोजगार के पूरे साधन उपलब्ध करा रही है। सरकार के इस दावे पर स्वयं शासकीय अधिकारी भी गुण गान करते नहीं थकते थे। यहां तक कि रमन राज पर प्रशंसा के कसीदे पढ़ने वालों की भी कमी नहीं है जबकि आखबार सरकार की विफलता के उसके करतूतों के इतने खबरें छाप रहे हैं कि हर दिन एक ... सौ पृष्ठों की किताबें लिखी जा सकती है। वैसे इस सरकार के लोगों के पास अपनी बातें कहने या अफवाह फैलाने का अदम्य साहस है और झूठ को सच कहने के इस साहस का मैं शुरू से प्रशंसक रहा हूं।
गणेश भगवान को दूध पिलाने की बात हो या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बात हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने का दावा हो या अल्पसंख्यक के दुश्मन के रूप में प्रस्तुति की बात हो 50 साल बनाम 5 साल के इनके नारो से आम लोगों को अपनी ओर खीचने की ताकत शायद इसी पार्टी में है। तभी तो लोग चिल्लाते रहे कि दो रूपया किलों चावल .... लोगों में बंट रहा है। गरीबी के सरकारी आंकड़े झूठे हैं लेकिन सरकार अपनी बातों पर तब तक अडिग रही जब तक फर्जी राशन कार्ड के मामले पकड़े नहीं गये अब जब कालाबाजारियों ने करोड़ों कमा लिये तब सरकार जाग रही है।
यही हाल पलायन के मुद्दे पर है। सरकार का दावा है कि वह गांव गांव में काम दे रही है पलायन का सवाल ही नहीं है। लेकिन यह सत्य पता नहीं सरकार को कैसे नहीं मालूम है कि पंचायत सचिव और संबंधित विभाग किस तरह से मजदूरों के नाम पर पैसा हड़प रहे हैं। कागजों में बनते सड़क और सरकारी भवनों की तरफ से इसलिए आंखे मूंदली जाती है कि ठेका लेने वाले उनके लोग सरपंच सचिव उनकी पार्टी के प्रतिनिष्ठा रखते हैं।
लेकिन कहा जाता है कि झूठ और अफवाह यादा दिन नहीं टिकते और अब राममंदिर के प्रति कथित निष्ठा की तरह सब कुछ सामने है। लेह में आई तबाही ने छत्तीसगढ़ सरकार के पलायन को लेकर किये गए दावे की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।
अब भी समय है सरकार अखबारों की खबरों को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करना शुरू कर दे तो आम जनता का राज आ जायेगा। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उसके किस मंत्री की क्या रूचि है। देखते ही देखते 2-5 हजार करोड क़ा ... बनने वालों को सरकार छोड़ सकती है और कहने को वह बचा भी सकती है लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि उपर वाले से कोई नहीं बच सका है और बद्दूआंए काम करती ही है।

छत्तीसगढ़ में कौन सी भाजपा का शासन है...

 क्वीन बेटन को लेकर पूरे छत्तीसगढ़ में जो उत्साह का वातावरण बना वह यहां के लोगों के खेल भावना का घोतक है लेकिन पूरे देश में क्वीन बेटन का विरोध करने वाली भाजपा का छत्तीसगढ़ में बढ़चकर हिस्सा लेने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा में हाईकमान और पार्टी निर्देश छत्तीसगढ़ में बेमानी है या फिर यहां किसी और भाजपा का शासन है।
क्वीन बेटन दरअसल राष्ट्रमंडल खेल का वह मशाल है जो हर आयोजन के पहले राष्ट्रमंडलीय देशों में भ्रमण करता है। दिल्ली में इस बार इसका आयोजन है और क्वीन बेटन के उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए इसे पूरे देश में घुमाया जा रहा है।
देश का प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी इस मशाल को गुलामी का प्रतीक बताते हुए इसके भ्रमण की तीखी आलोचना की है। दिल्ली से लेकर झारखंड हो या बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश हर जगह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इसके विरोध में खड़े हो गए है और अपना आक्रोश प्रकट भी कर रहे है।
छत्तीसगढ़ में इसके आगमन की बात हुई तो लगा कि यहां भी भाजपा इसका विरोध करेगी और सरकार होने की वजह से क्वीन बेटन के रास्ते या तो बदल दिये जायेंगे या फिर छत्तीसगढ से ये चुपचाप गुजर जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्वीन बेटन पर न केवल भाजपाई बल्कि डॉ. रमन सिंह सरकार ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
भाजपा की इस दोगली नीति को लेकर भाजपा के ही कई कार्यकर्ता नाराज है। भाजपा के एक नेता ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि मंदिर मुद्दे की दोगलाई ने हमें केन्द्र से ढकेल दिया इसके बाद भी हम नहीं सुधर पाये हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि हाईकमान के विरोध के बावजूद जिस तरह से पूरी सरकार यहां क्वीन बेटन के स्वागत में पलक ....बिछाई रही वह आश्चर्य जनक है।
इसी तरह आर एस एस से जुड़े एक नेता ने कहा कि यह विडंम्बना है कि किसी मुद्दे पर हम एक नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वजह से भाजपा की छिछालेदर हो रही है। अब तो यह सवाल उठने लगा है कि जहां-जहां भाजपा की सत्ता है क्या वहां वहां भाजपा के नेता अपने हिसाब से काम करेंगे।
बहरहाल इस मामले को लेकर आम लोगों में भी भाजपा की इस राजनीति की काफी तीखी प्रतिक्रिया है कुछ तो हाईकमान तक से सरकार की शिकायत करने का मन बना चुके है और गडकरी के सामने भी बात लाई जेयेगी।

बुधवार, 18 अगस्त 2010

स्वतंत्रता किसके लिए...

क्या कभी किसी भी सरकार ने किसी भी प्रदेश की सरकार ने यह सोचा कि विधायक सांसद या अधिकारी बनते ही लोग एकाएक कैसे धनी बन गए। कल तक गांव में सामान्य जीवन जीने वाले लोग पैसे वाले कैसे हो गए। क्या कभी किसी भी सरकार ने एक भी नाम धारी व्यक्ति की बारिकी से जांच कराई कि लालू क्या थे, डॉ. रमन क्या थे, गुलाम नबी आजाद क्या थे, कल्याण सिंह, मुलायम सिंह, विद्याचरण-श्यामाचरम शुक्ल क्या थे या बाबूलाल अग्रवाल, सुनील कुजूर, सुब्रत साहू या इसी तरह के नाम धारी लोग पदों में आने के पहले क्या थे और फिर क्या हो गए। बेतहाशा कमाई का क्या एक बड़ा हिस्सा आम लोगों के हिस्से का नहीं है। क्या आजादी के शुरवीरों ने ऐसे ही भारत का सपना देखा था कि पद पाते ही डकैत बन जाओ? लुटेरे बन जाओ आर आम आदमी को पानी स्वास्थ्य और शिक्षा भी न दो?


15 अगस्त 1947 को जब अंग्रजों ने भारत छोड़ा। तब पूरा देश खुशियों से लबरेज था। हर आदमी एक दूसरे को स्वतंत्रता के मायने समझाता बधाईयां दे रहा था। लेकिन आजादी के 63 साल हो रहे हैं। इन 63 सालों में गरीब से गरीब आदमी ने भी सरकार को टेक्स दिया ताकि हमारे सांसद विधायक और सरकारी अधिकारी कर्मचारी भूखे न रहे और ईमानदारी से आम लोगों के हित और देश के हित के लिए काम करें। पर क्या ऐसा हो पाया। आम आदमी से कहां चूक हुई और व्यवस्था को किस तरह से अव्यवस्थित किया गया। रिपोर्ट।
छत्तीसगढ में तोrajya बनते ही आजादी के मायने बदल गए है। वैसे तो नौकर शाह और राजनेताओं के लिए ही लोकतंत्र में असली आजादी है। और आम आदमी के लिए नियम कानून की बात की जाती है। हमने भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों की .... और आजादी को लेकर समय समय पर पाठकों को जानकारी उपलब्ध कराया है।
आजादी के मायने
प्रदेश के मुखिया के अलावा डॉ. साहब के पास उर्जा, खनिज जनसंपर्क जैसे विभाग है और इनमें से कोई विभाग नहीं है जहां घपलों की दास्तान न हो। उर्जा विभाग में आजादी का यह आलम है कि ओपन एक्सेस से लेकर ट्रासफार्मर, मीटर खरीदी में खुले आम घोटाले किये गए। खनिज में तो pusya स्टील को आज ही रजिस्टे्रशन आज ही लीज देकर रमन सरकार ने नया इतिहास रचा है। माइनिंग शर्तो का खुले आम उल्लंघन हो रहा है और इस विभाग के अधिकारी तक खुले आम पैसा खा रहे है। खनिज को लेकर तो लूट मची है।
जनसंपर्क विभाग का तो भगवान ही मालिक है। सचिव पर तो आरोप लगा ही संवाद में तो 40 करोड़ के घपले उजागर होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं है। आजादी का असली मतलब तो इस विभाग के अफसर खूब जानते है और सरकार के खिलाफ खबर देने से परहेज नहीं करते।
ननकी राम कंवर
बस्तर से लेकर सरगुजा तक आदिवासी भेड़ बकरी की तरह काटे जा रह है। राजधानी में अपराध चरम पर है और छत्तीसगढ़ के दूसरे शहरों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। पुलिस के मुखिया विश्वरंजन की अपनी स्वतंत्रता है और ननकी राम कंवर से स्वतंत्र तो कोई है ही नहीं। कलेक्टर को दलाल और पुलिस कप्तान को निकम्मा कहने वाले इस गृह मंत्री ने विधान सभा में स्वीकार किया है कि थाने वाले शराब ठेकेदारों के इशारे पर काम करते हैं।
मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल बृजमोहन अग्रवाल को खुश करने सर्वाधिक विभाग दिया गया है यह अलग बात है कि उनसे कोई भी विभाग नहीं संभल रहा है। स्वतंत्रता इतनी की नेता प्रतिपक्ष बनने मारपीट करवाने तक का आरोप लगा है और पीडब्ल्यू डी में बढ़ते कमीशन खोरी उखड़ती सड़के पयर्टन में बगैर नाम पर के करोड़ों का आबंटन motal  निर्माण से लेकर स्टेशनरी- प्रचार प्रसार में घोटाले की बाढ़, संस्कृति में आई राज के चलते बाहरी कलाकारों के नाम पर करोड़ों का आबंटन, शिक्षा में तो तवारिस बाम्बरा एच आर शर्मा एसएन सिंह गेंदाराम जैसे विवादास्पद व्यक्तियों के जिम्में जिला व कार्यालय सौंपा गया है और फर्नीचर से लेकर विज्ञान उपकरणों की खरीदी तक में घोटाले।
राजेश मूणत स्वतंत्रता तो इनके मुंह में बसी है और कार्यकर्ताओं के मुंह से सुनी जा सकती है। पहले दबाव बनाओं फिर खूब kamao की रणनीति ने इन्हें सर्किट हाउस के घोटाले का आरोपी तक बना दिया था लेकिन जब सरकार हमारी हो तो किसी का क्या बिगड़ना है। भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान में रूचि तो दिखाई लेकिन बसंत सेठिया जैसे लोगों को फायदा भी मिला। कमल विहार में छांट-छांट कर अच्छी प्लाटें किसे दी जा रही है किसी से छिपी नहीं है। पार्किंग वाली दूकाने कैसे सील हो रही है और जाहिद अली जैसे लोगों की फाइलें कहां दबी है। दबा बजार से लेकर क्रिस्टल टावर के चर्चे ही तो आम आदमी कर सकता है।
चन्द्रशेखर साहू कहने को तो साहू जी किसान नेता है लेकिन मंत्री बनते ही 270 रूपये वाला बोनस भूल गये। अब 270 रूपये की जरूरत ही क्या है जब नकली खाद से लेकर बीज तक का सफर हो। क्षेत्र में बिकते अवैध शराब की चर्चा क्या कम है जो किसानों के हित में निर्णय होंगे। यह केवल सरकार के आधा दर्जन मंत्रियों का उदाहण मात्र है कि सरकार किस तरह से स्वतंत्र कार्य कर रही है। वरना खेल मंत्री लता उसेण्डी हो या स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे हो या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द्र साहू सब की अपनी स्वतंत्रता है ऐसे में छत्तीसगढ़ में आम आदमी के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हो सकते है आसानी से समझ जा सकता है।
आप हल्ला करते रहे कि जिन्दल पावर लिमिटेड और बाल्को सैकड़ों एकट जमीन दबा रहे हैं। सरकार कार्रवाई करना तो दूर सुनेगी ही नहीं। आप चिल्लाते रहे कि कोल ब्लाक के आबंटन में गड़बड़ी हो रही है या अवैध निर्माण से काम्प्लेक्स खड़े किये जा रहे हैं। कोई नहीं सुनेगा। बल्कि अब तो न्यायालय के फैसले तक से लोग सहमत नजर नहीं आते। गैस त्रासदी या बाल्को का जमीनी कब्जा इसका उदाहरण है कि लोग इन फैसलों से सहमत नहीं है।
आम आदमी के लिए कहां है स्वतंत्रता
वोट हमारा- राज तुम्हारा- जो लोग अपना सांसद विधायक चुनते हैं इसके लिए सरकार क्या करती है यह तो सभी जानते है लेकिन जितने वाले सांसद विधायकों को न केवल हर माह एक मोटी रकम मिलती है और भत्ता भी। यही नहीं सीट से हटने के बाद जीवन भर पेंशन भी मिलता है। नौकर शाहों का भी यही आलम है जीवन भर नौकरी करो, भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाओ और रिटायर्ड होने के बाद सेंटिंग कर संविदा नौकरी व पेंशन पाओ।
आम आदमी के लिए सरकार की नीति यह है कि आप के घर पीने का पानी पहुंचे या न पहुंचे, टैक्स तो देना ही होगा।
जमीन आपकी है और किसी उद्योगपति को उद्योग लगाना है तो कीमत सरकार तय करेगी। जबकि वही उद्योगपति अपने उत्पादन की कीमत स्वयं तय करता है। यदि राजधानी या उद्योगों के लिए जमीन नहीं दी जायेगी तो सरकार सिर्फ एक लाईन में छिन (अधिग्रहण) लेगी और उद्योगपतियों को दे देगी।
आप विरोध करते रहो शराब ठेकेदार नियम विरूद्ब दुकानें खोल ही देगा और पुलिस भी उसकी सुरक्षा में खड़ी हो जायेगी।आप एक इंच जमीन जरूरत पड़ने पर भी कब्जा नहीं कर सकते उद्योगों को अवैध कब्जे की छूट है।
विकास के नाम पर उद्योगपतियों को जमीन दी जायेगी आम आदमी से छिन ली जायेगी।
आम आदमी के लिए पीने का साफ पानी नही लेकिन नेता अधिकारी बिसलरी पियेंगे वह भी सरकारी पैसे से
आम आदमी के लिए स्वास्थ्य सुविधा हो या न हो नेता अधिकारियों के लिए बड़े अस्पताल में मुफ्त ईलाज होगा
आम आदमी के लिए सरकारी स्कूल हो या न हो नेता अधिकारी के बच्चे नामचीन स्कूलों में पढ़ेगे अब तो एयरकंडीशन की सुविधा तक ढूंढी जाती है।
सरकारी स्कूलों में भवन या शिक्षक हो या न हो लेकिन प्राईवेट स्कूलों को grant .देंगे।
किसानों को पानी मिले या न मिले उद्योगके लिए नदिया बेच दी जायेगी।
और यह होता है आम आदमी द्वारा दी गई टैक्स की राशि से। इन्कम टैक्स देने वाले ...या लोग जितना टैक्स देते हैं वे कितने है और आम आदमी जो टैक्स देता है वह कितना है आकंलन करे तो पता चलेगा कि आम आदमी जीवन उपयोगी समान खरीकर यादा टैक्स देता है। इसके बाद भी सुविधा आम की बजाय खास लोगों को दी जाती है। योजनाएं आम की बजाए खास लोगों के लिए बनती है क्या यही है स्वतंत्रता।