कुल मिलाकर सांसदों ने अपनी तनख्वाह तीन-चार गुणा बढ़ा ही ली, अब कई राज्यों के विधायक भी अपनी तनख्वाह बढ़ाने की कवायद में लग गये हैं। मिलबांटकर अपने लिए सब कुछ पा लेने की रणनीति से आम आदमी के बारे में सोचने के लिए किसी के पास समय नहीं है।आम आदमी इस मामले को लेकर गुस्से से लाल-पीला हो रहा है। पिछले दिनों मुझे समारू मिल गया, देखते ही फट पड़ा! क्या तिवारी जी!कुछ लिखते क्यों नहीं! ये मनमानी नहीं तो और क्या है। यहां दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं और हमारे नेता लाख रूपये महिने का जुगाड़ कर चुके हैं?
मैनें कहा समारू इस गुस्से को पीना नहीं। ऐसे ही जगह-जगह जाहिर करते रहना और यदि तुम्हारे गांव में सांसद-विधायक आ जाए तो उससे पूछने के लिए खड़े हो जाना। हिचकना नहीं। समारू और गुस्सा गया। वह कहने लगा। हमने अपना जनप्रतिनिधि चुना है। नौकर नहीं। और जो काम के बदले पैसा ले वह नौकर कहलाता है जनप्रतिनिधि नहीं। इन सा.. को तो गोली से उड़ा देना चाहिए।
तभी पान ठेले वाला भड़क गया। वह भी इस वेतन बढ़ोत्तरी पर आक्रोषित था। वह कह उठा। आप लोगों का तो मजा है? लेकिन क्या आप को लगता है कि तनख्वाह बढ़ा देने से ये लोग चोरी करना बंदकर देंगे?
मैने कहा इन लोगों का तो यही ·हना है कि वेतन बढ़ेगा तो भ्रष्टाचार कम होगा?
कुछ कम नहीं होगा तभी पीछे से आवाज आई मैं पलट कर देखा तो विजय खड़ा था। वह बोले जा रहा था। इन सा.... को तो पैसों की भूख है जितना भी दे दो कम पड़ेगा?
मैंने कहा अगली बार मत चुनना इन्हें ऐसे लोग तलाश लो जो वेतन-पेंशन न लें?
क्या भैया आप भी ऐसी बात करते हैं? गांधी के देश में क्या कोई नहीं बचा जो वेतन-पेंशन नहीं लेने की घोषणा करें?
कुल जमा यह है कि एक भी व्यक्ति मुझे नहीं मिला जो सांसदो-विधायको के वेतन-पेंशन को लेकर खुश हो? लोग गुस्से में है लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे अपना गुस्सा कहां जाहिर करें।
इस देश में नेताओं की छवि को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं। वेतन बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है कि पेट भरा रहेगा तो अच्छे से काम कर सकेंगे ? पर यह सच नहीं है? आधा सच भी नहीं है। सिर्फ भत्तों पर जिन्दा रखो तो ये लोग कार्वेंट में अपने बच्चे नहीं पढ़ा सकेगे तब सरकारी स्कुल से इन के बच्चे निकलेंगे और जो बच्चा सरकारी या म्यूनिस्पल से पढ़कर नि·लेगा उसमें ही देश-प्रेम का जज्बा होगा, उसमें ही मानवता होगी और वे ही आम लोगों के हित में निर्णय लेगा।
विकास का निर्णय लेने वाले, बेहतर शहर की बसाहट का नक्शा बनाने वाले आम लोगों को पीने का पानी नहीं अपने लिए बिसलरी का इंतजाम करते हैं।
शिक्षा के विकास के लिए सरकारी स्कूलों के स्तर बढ़ाने की बजाए नई-नई कार्वेंट शिक्षा पद्धति लाते हैं जो नागरिक नहीं मशीन का निर्माण करते हैं।
समारू हो या विजय ये सिर्फ गुस्सा कर सकते हैं। इनमें हिम्मत भी नहीं है कि वे अपने गुस्से का इजहार कर सके। और शायद ये बात कार्वेंट वाले जानते है और हमारे राजनैतिक दल भी...।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
बुधवार, 1 सितंबर 2010
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
यह अखबार की दादागिरी है या प्रशासन की नपुंसकता...
अग्रिम आधिपत्य पर ही बिल्डिंग खड़ी हो गई...
छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत ने अग्रिम आधिपत्य मिलते ही बिल्डिंग तान दी और शासन प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। यहां तक कि लोग बोलते रहे लेकिन अवैध निर्माण पर कोई कुछ नहीं बोला। इस बीच शहर में कितनी ही अवैध निर्माण उजाड़ दिया गया लेकिन इस बिल्डिंग का बाल बांका भी नहीं हुआ।राजधानी में चल रहे इस गोरखधंधे पर किसी का लगाम नहीं है। अखबारी जमीनों का व्यवसायिक उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है और शासन-प्रशासन तमाशबीन बने हुए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश शासन राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग मंत्रालय का पत्र क्रमांक 4-117/साल-1/06 रायपुर दिनांक 25.7.2008 के अनुसार नवभारत प्रेस रायपुर को रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक नं. 9 प्लाट नं. 1 में से रकबा 60750 वर्गफीट भूमि को प्रेस स्थापना हेतु स्थाई पट्टे पर प्रावधानों के अनुरूप प्रब्याजि एवं भूभाटक लेकर आबंटन की स्वीकृति प्रदान की गई है।
उक्त आदेश के परिलब्धन के अनुसार 24.8.2008 के अनुसार 4 करोड़ 47 लाख 12 हजार का प्रब्याजि तथा 33 लाख 53 हजार 400 रूपये वार्षिक भू-भाटक जमा करने नवभारत को सूचित किया गया लेकिन 6 माह बीत जाने के बाद भी नवभारत ने उक्त राशि जमा नहीं कराई। उल्टा शासन को रूपये कम करने के लिए आवेदन दे दिया।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि नियमानुसार राशि जमा नहीं करने पर पट्टा नहीं दिया जा सकता और स्थाई पट्टा प्राप्त किये बिना भवन निर्माण नहीं किया जा सकता लेकिन पूरा शहर गवाह है कि राज्य बनने के पहले ही नवभारत ने बिल्डिंग तान दी और बिल्डिंग के एक हिस्से को एक सरकारी विभाग को किराये पर भी दे दिया। इतना सब कुछ होने के बाद भी शासन-प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की । ये वहीं प्रशासन-शासन है जो अवैध निर्माण करने वालों के खिलाफ कितनी बार ही बुलडोजर चला चुका है। लेकिन नवभारत के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाये। जबकि ये वहीं निगम प्रशासन है जो तरूण छत्तीसगढ़ जब बन रहा था और अग्रिम आधिपत्य पर बिल्डिंग बना रहा था तो बुलडोजर चला चुका है। बताया जाता है कि ऐसा भी नहीं है कि नवभारत के खिलाफ कार्रवाई की कोशिश नहीं हुई है लेकिन चर्चा है कि ऐसी सोच रखने वाले अधिकारी ही दूसरे दिन हकाल दिये गये। ट्रांसफर कर दिया गया।
स्वच्छ शासन का दावा करने वाले डॉ.रमन सिंह को भी नवभारत के कारनामों की शिकायत की गई है लेकिन कहा जाता है कि ऐसी शिकायतें रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।
बहरहाल नवभारत की बिल्डिंग अवैध निर्माण के लिए आम लोगों को चिढ़ा रही है तो एप्रोच वालों का हौसला अफजाई कर रही है देखना है कि शासन कबतक इस ओर से आंख मूंदे रहेगा।
सोमवार, 30 अगस्त 2010
सालों बाद निमोरा में दिखा जागरूकता...
राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ग्रहण लगने लगा था। मालिको के सरकारी विज्ञापन के प्रति जीभ लपलपाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने छत्तीसगढ़ की पहचान पर ही सवाल उठाये थे। बाल्को कांड हो या मंत्रियों की घपलेबाजी, आईएएस अफसरों की काली करतूतें हो या डीजी का साहित्य प्रेम सब कुछ सरकारी विज्ञापन की बलि चढ़ रही थी। ऐसे में धरसींवा के पास निमोरा में हुई तीन मासूमों की हत्या केबाद छत्तीसगढ़ के मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की वह यहां के पुराने तेवर को ताजा कर दिया। हर मामले को कुरेदकर सरकार को कार्रवाई के लिए मजबूर करने वाला तेवर ही छत्तीसगढ़ के मीडिया की पहचान है। बहुत संभव है अब यह तेवर फिर से दिखने लगेगा हम यही आशा कर सकते हैं...!
सनत फिर भास्कर में
अपनी सीधे साधे छवि के लिए जाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार सनत चतुर्वेदी ने फिर दैनिक भास्कर ज्वाईन कर लिया है। जनसत्ता से वे भास्कर क्यों गये यह पता नहीं चला है पर तीसरी बार वे भास्कर को सेवा दे रहे हैं। कितने दिन देंगे? सवाल कायम है?सुरेन्द्र का भ्रम टूटा
देशबंधु को अपना सब कुछ मानकर सुबह से रात तक सेवा बजाने वाले सुरेन्द्र शुक्ला ने पत्रिका की ओर रूख किया तो कई लोग अचरज में रह गये कि आखिर देशबंधु में यह सब क्या हो रहा है। अब तो दामादों का खौफ भी नहीं है। इसी तरह बेर ने नई दुनिया ज्वाईन कर लिया है।पी. बुद्धदेव की वापसी
दैनिक समवेत शिखर से भास्कर रायपुर फिर रायपुर में सब कुछ बेच-बाच कर इंदौर गए भरत पी. बुद्धदेव को इंदौर रास नहीं आया और एक बार फिर वे दैनिक भास्कर आ गए हैं। उनका मकान खरीदना इन दिनों चर्चा में है।डीबी का हंगामा
वैसे तो भास्कर हमेशा कुछ न कुछ नया कर सुर्खियों में बना रहना चाहता है। पत्रिका के आने की हड़बड़ाहट भी भास्कर में झलकने लगी है पहले ही नेशनल लुक और नई दुनिया से झटका खा चुके भास्कर समूह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता इसलिए डीबी स्टार शुरु कर दिया है। अब स्टोरी इसमें क्या जा रही है अभी मत पूछना? कैसे भी हो हंगामा खड़ा होना चाहिए।पैसा कम दो दस्तखत अधिक में कराओ
कांग्रेस के प्रतिष्ठित परिवार द्वारा निकाले जा रहे अखबार में इन दिनों यही सब कुछ हो रहा अब कर्मचारी तो कर्मचारी, पत्रकार भी मजबूर है नौकरी जो आसानी से नहीं मिलती। दरअसल ऐसे दस्तखत करने वाले पत्रकार ही कब थे।मालिक को खुश रखो नौकरी दो जगह करो
कई पत्रकारों के लिए यह जुमला कारगर हुआ है कि ऐड़ा बनकर पेड़ा खाओ। प्रेस लाईन में दत्तक पुत्र के रूप में मशहूर पाटन छाप पत्रकार ने अब दो जगह नौकरी बजाना शुरू कर दिया है। उन्हें ‘अ’ रास आ गया है पहले भी खाने पीने के नाम से बदनाम इस युवा पत्रकार के सीधाई का लोहा सभी मानते हैं।लुक ही नहीं दिख रहा...
भास्कर को हलाकान करने वाले नेशनल लुक अब मैनेजमेंट की वजह से गायब होते जा रहा है खबरें अब भी अच्छी है लेकिन जब बांट ही नहीं पाओंगे तो पढ़ेगा कौन ? सरकारी विज्ञापन लेते रहो।तरूण की पीड़ा
पहले ही निगम की तोडफ़ोड़ से पीडि़त सांध्य दैनिक तरूण छत्तीसगढ़ इन दिनों पार्किंग की वजह से परेशान है। नियमानुसार बिल्डिंग बनी है या नहीं यह तो निगम और तरूण छत्तीसगढ़ वाले जाने लेकिन जिस तरह से नवभारत ने टूटने वाले बिल्डिंगों की सूची में तरूण छत्तीसगढ़ का नाम छापा है उससे तरूण छत्तीसगढ़ बेहद खफा है लेकिन छोटा आदमी बड़ों का कर क्या सकता है?और अंत में ...
पत्रकारों की जमीन पर अपनी बिल्डिंग तानने वाले एक सांध्य दैनिक के मालिक ने हाईरईश कमेटी से दस मंजिल का परमिशन क्या लिया अच्छे अच्छों की नींद उड़ गई। दूसरा सांध्य दैनिक अब जुगाड़ में है कि परमिशन कैसे लिया जाए।
रविवार, 29 अगस्त 2010
भाजपा में अय्याश व दागी मंत्रियों का जमावड़ा
सत्ता पाते ही सिद्धांत भूले भाजपाई
मप्र-छत्तीसगढ़ के प्रभारी नाराज
सत्ता पाते ही राम को धोखा देने वाले भाजपाईयों की लूटखसोट को लेकर अब पार्टी के सत्ता वाले प्रदेशों में चल रहे गफलत को लेकर पार्टी हाईकमान न केवल चिंतित है बल्कि कड़ाई बरतने का संकेत दिया है।
बताया जाता है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में इन दिनों मंत्रियों कि करतूतों को लेकर उच्च स्तर पर जबरदस्त बवाल मचा है और इन दोनों राज्यों में मंत्रियों की लूटखसोट व अय्याशी की पुख्ता सबूत के साथ शिकायत भी की गई है।
मध्यप्रदेश के प्रभारी और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार ने तो मध्यप्रदेश में मंत्रियों की करतुत पर इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने सीधे प्रेस से ही कह दिया कि मध्यप्रदेश के दागी मंत्रियों को सत्ता से जल्दी बाहर किया जाना चाहिए यही नहीं 25 अगस्त को तो वे यहां तक कह गए कि मध्यप्रदेश के कई मंत्री अय्याशी में डुबे हैं और इन्हें तत्काल हटाया जाना चाहिए।
बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ के प्रभारी मंत्री श्री नड्डा भी छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों की करतूत से बेहद खफा है और उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी हाई·मान को सौंप दी है। बताया जाता है कि श्री नड्डा को यहांके कई मंत्रियों खास·र बृजमोहन अग्रवाल, चन्द्रशेखर साहू, राजेश मूणत और मुख्यमंत्री त· ·ी शि·ायतें पुख्ता सबूत और अखबार में छपी खबरों के साथ सौंपी गई है।
बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों पर रातो रात करोड़पति व अरबपति बनने के अलावा कार्यकर्ताओं के साथ आए दिन होने वाले दुव्र्यवहार की भी शिकायत छत्तीसगढ़ के प्रभारी श्री नड्डा से की गई है।
बताया जाता है कि मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के कुछ विधायको ने न केवल प्रदेश प्रभारियों से बल्कि हाईकमान से मिलकर स्थिति से अवगत करा दिया है।
भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक हाईकमान नीतिन गडकरी जी इन दोनों राज्यों में पार्टी की स्थिति को लेकर चिंतित है और आने वाले दिनों में वे कड़ा रूख अख्तियार कर सकते है।
वैसे भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी सितम्बर के पहले हफ्ते में छत्तीसगढ़ के दौरे पर आ रहे है और कहा जा रहा है तब वे विधायको से अलग-अलग मिलकर पार्टी की स्थिति का न केवल जायजा लेंगे बल्की कुछ मंत्रियों को उनकी करतूत पर चेतावनी दे सकते हैं। हालांकइ पार्टी हाईकमान को खुश करने छत्तीसगढ़ सरकार हर संभव को शिश में लगा है।
बहरहाल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार को लेकर उच्च स्तर पर जबरदस्त हलचल है और कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसका असर भी दिखेगा।
शनिवार, 28 अगस्त 2010
सतनाम धर्मसभा ने रावण जलाने से मना किया तो धर्मसेना भडक़ी
सतनाम धर्मसेना ने इस साल रावण नहीं जलाने का आह्वान करते हुए पर्चे बांटना शुरु किया है और इसके विरोध में कवर्धा के धर्मसेना खड़ी हो गई है।
सतनाम धर्म सभा के अध्यक्ष केवल प्रकाश सतनामी के द्वारा वितरित पर्चे में कहा गया है कि रावण ने मनुवादी व्यवस्था को तोडऩे का कार्य किया है इसलिए रावण को पूजा जाना चाहिए। उन्होंने सतनामी समाज सहित आम लोगों से अपील की है कि इस बार दशहरे में रावण का वध न करो और न ही रावण का पुतला दहन करो।
हमारे कवर्धा संवाददाता के मुताबिक इस पर्चे का धर्मसेना ने सख्त विरोध किया है और ऐसे पर्चे बांटे जाने वाले के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
सतनाम धर्म सभा के अध्यक्ष केवल प्रकाश सतनामी के द्वारा वितरित पर्चे में कहा गया है कि रावण ने मनुवादी व्यवस्था को तोडऩे का कार्य किया है इसलिए रावण को पूजा जाना चाहिए। उन्होंने सतनामी समाज सहित आम लोगों से अपील की है कि इस बार दशहरे में रावण का वध न करो और न ही रावण का पुतला दहन करो।
हमारे कवर्धा संवाददाता के मुताबिक इस पर्चे का धर्मसेना ने सख्त विरोध किया है और ऐसे पर्चे बांटे जाने वाले के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
बृजमोहन ने दी छूट और हरे राम ने की लूट
दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में लूट
यह प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी नहीं तो और क्या है कि जिस व्यक्ति का किसी भी सरकारी विभाग में सेवा नहीं है और जिसके संविलियन को हाईकोर्ट तक ने अवैध करार दिया और पीएससी ने तीन बार टर्न कर दिया ऐसे व्यक्ति को न केवल दंतेवाड़ा जिला का शिक्षा अधिकारी बनाया गया है बल्कि शिक्षा मिशन का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। बात इतनी ही नहीं है यहां चल रहे लूट-खसोट का यह आलम है कि नक्सली भी शरमा जाए।
कहा जाता है कि शिक्षा विभाग देश का भावी पीढ़ी तैयार करता है और जब इस विभाग को ही जब भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया जाए तो भावी पीढ़ी कैसे होगी इसकी कल्पना से ही होश उड़ जाते है। वैसे इस विभाग में शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से दमदारी दिखा रहे हैं और तमाम भ्रष्ट और विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है वह आने वाले समय के लिए घातक माना जा रहा है। तवारिस और बाम्बरा जैसे लोगों को तवज्जों दिए जाने के बाद सिंह जैसों को अपने बंगले में बिठाने के लिए चर्चित शिक्षा विभाग इन दिनों दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी एचआर शर्मा की कारगुजारियों और मंत्री के संरक्षण के कारण चर्चा में है।
एचआर शर्मा को दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी के साथ-साथ शिक्षा मिशन में जिला परियोजना समन्वयक का प्रभार भी दिया गया है। वक्त पढऩे पर राजनैतिक निष्ठा बदलने के आरोपित एचआर शर्मा कभी कवर्धा में असिसेंट प्राध्यापक रहे हैं। बताया जाता है कि तब इनकी निष्ठा कांग्रेस के प्रति थी और इसी के चलते इनके संविलियन का प्रयास कांग्रेस विधायक ने की थी लेकिन यह हो नहीं पाया और सत्ता बदलते ही इनके संविलियन का प्रयास भाजपा की महिला पूर्व सांसद ने की और इस तात्कालिन सांसद के चुनाव के लिए फंड भी दिया गया। इस प्रयास के चलते ही शिक्षा विभाग के आवेदन पर पीएससी ने 3 सामान्य पद में से एक पद विलोपित कर दिया था। कहा जाता है कि खेल यही से शुरु हुआ और जब एचआर शर्मा यानी हरेराम शर्मा की फाईल पहुंची तो पता चला कि उनका संविलियन ही अवैध है और भर्ती नियम 1982 की कंडिका 4 की अनदेखी की गई है और संविलियन किया गया है।
बताया जाता है कि मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने संविलियन रद्द कर दिया। इस सबके बाद भी वे दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी बनाए गए। नागरिक आपूर्ति निगम से हकाले जाने की अपनी कहानी है। दंतेवाड़ा में जिस पैमाने पर घपलेबाजी हो रहे हैं उसे सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए हैं जिसमें स्कूल भवन ढहाने से लेकर केश पेमेंट की लंबी दस्तान है। बताया जाता है कि इस सबकी शिकायत शिक्षा मंत्री से लेकर राज्यपाल तक की जाती रही है लेकिन नामालूम कारणों से कार्रवाई टलते रही है। बहरहाल दंतेवाड़ा शिक्षा और शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल इन मामलों में चर्चा में है देखना है मुख्यमंत्री इस मामले में क्या करते हैं?
यह प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी नहीं तो और क्या है कि जिस व्यक्ति का किसी भी सरकारी विभाग में सेवा नहीं है और जिसके संविलियन को हाईकोर्ट तक ने अवैध करार दिया और पीएससी ने तीन बार टर्न कर दिया ऐसे व्यक्ति को न केवल दंतेवाड़ा जिला का शिक्षा अधिकारी बनाया गया है बल्कि शिक्षा मिशन का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। बात इतनी ही नहीं है यहां चल रहे लूट-खसोट का यह आलम है कि नक्सली भी शरमा जाए।
कहा जाता है कि शिक्षा विभाग देश का भावी पीढ़ी तैयार करता है और जब इस विभाग को ही जब भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया जाए तो भावी पीढ़ी कैसे होगी इसकी कल्पना से ही होश उड़ जाते है। वैसे इस विभाग में शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से दमदारी दिखा रहे हैं और तमाम भ्रष्ट और विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है वह आने वाले समय के लिए घातक माना जा रहा है। तवारिस और बाम्बरा जैसे लोगों को तवज्जों दिए जाने के बाद सिंह जैसों को अपने बंगले में बिठाने के लिए चर्चित शिक्षा विभाग इन दिनों दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी एचआर शर्मा की कारगुजारियों और मंत्री के संरक्षण के कारण चर्चा में है।
एचआर शर्मा को दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी के साथ-साथ शिक्षा मिशन में जिला परियोजना समन्वयक का प्रभार भी दिया गया है। वक्त पढऩे पर राजनैतिक निष्ठा बदलने के आरोपित एचआर शर्मा कभी कवर्धा में असिसेंट प्राध्यापक रहे हैं। बताया जाता है कि तब इनकी निष्ठा कांग्रेस के प्रति थी और इसी के चलते इनके संविलियन का प्रयास कांग्रेस विधायक ने की थी लेकिन यह हो नहीं पाया और सत्ता बदलते ही इनके संविलियन का प्रयास भाजपा की महिला पूर्व सांसद ने की और इस तात्कालिन सांसद के चुनाव के लिए फंड भी दिया गया। इस प्रयास के चलते ही शिक्षा विभाग के आवेदन पर पीएससी ने 3 सामान्य पद में से एक पद विलोपित कर दिया था। कहा जाता है कि खेल यही से शुरु हुआ और जब एचआर शर्मा यानी हरेराम शर्मा की फाईल पहुंची तो पता चला कि उनका संविलियन ही अवैध है और भर्ती नियम 1982 की कंडिका 4 की अनदेखी की गई है और संविलियन किया गया है।
बताया जाता है कि मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने संविलियन रद्द कर दिया। इस सबके बाद भी वे दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी बनाए गए। नागरिक आपूर्ति निगम से हकाले जाने की अपनी कहानी है। दंतेवाड़ा में जिस पैमाने पर घपलेबाजी हो रहे हैं उसे सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए हैं जिसमें स्कूल भवन ढहाने से लेकर केश पेमेंट की लंबी दस्तान है। बताया जाता है कि इस सबकी शिकायत शिक्षा मंत्री से लेकर राज्यपाल तक की जाती रही है लेकिन नामालूम कारणों से कार्रवाई टलते रही है। बहरहाल दंतेवाड़ा शिक्षा और शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल इन मामलों में चर्चा में है देखना है मुख्यमंत्री इस मामले में क्या करते हैं?
गुरुवार, 26 अगस्त 2010
नवभारत का कारनामा, किसमें है दम
पैसा पटाया नहीं बिल्डिंग बना दी
लगता है छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज नहीं है और यदि कही सरकार है भी तो वह केवल बड़े लोगों के मुठ्ठी में कैद है। अपने को तुरम खां कहने वाले मंत्री और छोटे-छोटे लोगों के कब्जों पर बुलडोजर चलाने वाले भी बड़े लोगों की जेबों में समा गए है। तभी तो सरकार को नियम कानून की सीख देने वाला नवभारत स्वयं ही नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रजबंधा मैदान में अपनी बिल्डिंग खड़ा कर लेता है और पूरा शासन-प्रशासन नपुसंक की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठा है। तब न तो उन्हें नियम कानून ही नजर आता है और न ही इसमें कोई अपराध ही नजर आता है।
महिनेभर पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार पर टिप्पणी की थी कि आधे राज्य में शासन ही नहीं है तब कांग्रेसी भी चुप रह गए थे लेकिन अब इसकी जमीनी सच्चाई सामने आने लगी है कि सरकार किनके द्वारा चुनी जाती है और वह किसके हित के लिए काम करती है। मीडिया भी सरकार के गलत नीतियों की आलोचना करने से क्यों परहेज करती है।
दरअसल बेशकीमती जमीनों के बंदरबाट में जिस तरह से मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया भागीदार बनते जा रही है उससे सरकार को मनमानी करने की छूट मिली हुई है। रायपुर में भी दो-पांच सौ छपने वाले अखबारों को भी जिस तरह से कौड़ी के मोल जमीन दी गई है और इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है वह सरकार और उसके पूरे कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है कि किस तरह से गलत लोगों को सरकार संरक्षण दे रही है। यहां हम छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत को आबंटित जमीन और उस पर किए गए अवैधानिक निर्माण की चर्चा कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने दैनिक नवभारत को 1985-86 में रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक नम्बर 9, प्लांट नंबर 1 में से रकबा 60750 वर्ग फीट जमीन प्रेस स्थापना के लिए स्वीकृत की थी। इस घोषणा के साथ ही नवभारत को अग्रिम आधिपत्य मिल गया था और शासन ने निर्देश दिया था कि निर्धारित राशि पटाए जाने पर ही पट्टा निष्पादन किया जाए लेकिन नवभारत ने राज्य बनने के बाद तक न तो पैसा पटाया और न ही उसे पट्टा ही दिया गया। बावजूद नवभारत की बिल्डिंग बन गई। अब सवाल यह उठता है कि आखिर नवभारत को किस नियम के तहत बिल्डिंग बनाने की अनुमति दी गई। क्या बिल्डिंग का नक्शा पास कराया गया और नक्शा किस नियम के तहत पास किया गया। किस अधिकारी ने पास किया। इस समय इस निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई। ऐसे कितने ही सवाल है जो आम आदमी के जेहन में उठ रहे हैं। क्या नवभारत का इतना प्रभाव है कि किसी सरकार ने नियम विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ कार्रवाई नहीं की या सरकार सिर्फ बड़े लोगों का संरक्षक बनकर रह गई है।
ऐसे कई मामले हैं जो सरकार और नवभारत के सांठगांठ की कहानी को उजागर करता है। सब कुछ गलत फिर भी सरकार की तरफ से एडवांश? भू-उपयोग भी गलत होता रहा सरकार खामोश रही। एमजी रोड से लेकर मालवीय रोड, जीई रोड में कितने बार अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला तब किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई। क्या सरकार अब भी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली रहेगी जो अपने प्रभाव और पैसों से गलत करे रहेगें।
लगता है छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज नहीं है और यदि कही सरकार है भी तो वह केवल बड़े लोगों के मुठ्ठी में कैद है। अपने को तुरम खां कहने वाले मंत्री और छोटे-छोटे लोगों के कब्जों पर बुलडोजर चलाने वाले भी बड़े लोगों की जेबों में समा गए है। तभी तो सरकार को नियम कानून की सीख देने वाला नवभारत स्वयं ही नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रजबंधा मैदान में अपनी बिल्डिंग खड़ा कर लेता है और पूरा शासन-प्रशासन नपुसंक की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठा है। तब न तो उन्हें नियम कानून ही नजर आता है और न ही इसमें कोई अपराध ही नजर आता है।
महिनेभर पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार पर टिप्पणी की थी कि आधे राज्य में शासन ही नहीं है तब कांग्रेसी भी चुप रह गए थे लेकिन अब इसकी जमीनी सच्चाई सामने आने लगी है कि सरकार किनके द्वारा चुनी जाती है और वह किसके हित के लिए काम करती है। मीडिया भी सरकार के गलत नीतियों की आलोचना करने से क्यों परहेज करती है।
दरअसल बेशकीमती जमीनों के बंदरबाट में जिस तरह से मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया भागीदार बनते जा रही है उससे सरकार को मनमानी करने की छूट मिली हुई है। रायपुर में भी दो-पांच सौ छपने वाले अखबारों को भी जिस तरह से कौड़ी के मोल जमीन दी गई है और इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है वह सरकार और उसके पूरे कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है कि किस तरह से गलत लोगों को सरकार संरक्षण दे रही है। यहां हम छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत को आबंटित जमीन और उस पर किए गए अवैधानिक निर्माण की चर्चा कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने दैनिक नवभारत को 1985-86 में रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक नम्बर 9, प्लांट नंबर 1 में से रकबा 60750 वर्ग फीट जमीन प्रेस स्थापना के लिए स्वीकृत की थी। इस घोषणा के साथ ही नवभारत को अग्रिम आधिपत्य मिल गया था और शासन ने निर्देश दिया था कि निर्धारित राशि पटाए जाने पर ही पट्टा निष्पादन किया जाए लेकिन नवभारत ने राज्य बनने के बाद तक न तो पैसा पटाया और न ही उसे पट्टा ही दिया गया। बावजूद नवभारत की बिल्डिंग बन गई। अब सवाल यह उठता है कि आखिर नवभारत को किस नियम के तहत बिल्डिंग बनाने की अनुमति दी गई। क्या बिल्डिंग का नक्शा पास कराया गया और नक्शा किस नियम के तहत पास किया गया। किस अधिकारी ने पास किया। इस समय इस निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई। ऐसे कितने ही सवाल है जो आम आदमी के जेहन में उठ रहे हैं। क्या नवभारत का इतना प्रभाव है कि किसी सरकार ने नियम विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ कार्रवाई नहीं की या सरकार सिर्फ बड़े लोगों का संरक्षक बनकर रह गई है।
ऐसे कई मामले हैं जो सरकार और नवभारत के सांठगांठ की कहानी को उजागर करता है। सब कुछ गलत फिर भी सरकार की तरफ से एडवांश? भू-उपयोग भी गलत होता रहा सरकार खामोश रही। एमजी रोड से लेकर मालवीय रोड, जीई रोड में कितने बार अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला तब किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई। क्या सरकार अब भी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली रहेगी जो अपने प्रभाव और पैसों से गलत करे रहेगें।
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