रविवार, 5 सितंबर 2010

बाबूलाल के बाद नारायण सिंह की बारी...

चोर-चोर मौसेरे भाई...
 आईएएस अधिकारी बाबूलाल अग्रवाल की बहाली की सुर्खियां अभी शांत भी नहीं हो पाई है कि मालिक मकबूजा कांड के आरोपी नारायण सिंह को पदोन्नति देने पूरा रमन सरकार आमदा है। क्या छत्तीसगढ़ भ्रष्ट अधिकारियों की शरण स्थली है?
छत्तीसगढ़ में अफसरों का शासन है या डॉ. रमन सिंह का। यह सवाल अब गली मोहल्ले में गूंजने लगा है। आयकर विभाग के छापे के बाद जिस आनन फानन में बाबूलाल अग्रवाल को सरकार ने बहाल किया था। उसके चर्चे अभी थमें ही नहीं है कि इन दिनों एक और आईएएस अफसर नारायण सिंह चर्चा में है।
इस बार चर्चा की वजह नारायण सिंह को पदोन्नति देने की है। यह वही नारायण सिंह है जिन पर बस्तर में कलेक्टर-कमिश्नर रहते गरीब आदिवासियों की कीमती लकडिय़ों को माफियाओं के साथ सांठ-गांठ करने का आरोप पाया गया था। तब इस चर्चित वन कटाई में नारायण सिंह की संलिप्तता के चलते उनके खिलाफ कार्रवाई भी हुई थी। 93-94 की इस चॢचत मालिक-मकबूजा कांड में नारायण सिंह पर तब सिर्फ तीन वेतनवृद्धि रोकने की कार्रवाई हुई थी।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि जून 2010 के बाद से रमन सरकार की ओर से नारायण सिंह को पदोन्नति देने लगातार पत्र व्यवहार किया जाने लगा और पिछले दिनों मुख्य सचिव पी.जाय ओम्मेन की विभागीय पदोन्नति समिति ने नारायण सिंह को पदोन्नति भी दे दी।
अब मामला मंत्रिमंडल के पास है और जिस तरह से सरकार अधिकारियों के हाथों खेल रही है उससे आश्चर्य नहीं कि रमन मंत्रिमंडल भी नारायण सिंह को प्रमुख सचिव के पद पर पदोन्नति को हरी झंडी दे दे।
बहरहाल बाबूलाल अग्रवाल के बाद नारायण सिंह इन दिनों चर्चा में है और आम लोगों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया है। ऐसे में सरकार को इस पर फैसला लेना भारी पड़ सकता है।

मंत्री ही नहीं मुख्यमंत्री के पीए से भी सेटिंग...

दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी का कारनामा...
 मूल सेवा कही नहीं हो तब भी कोई व्यक्ति जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कैसे बना रह सकता है यह डॉ. एच.आर. शर्मा से सीखा जा सकता है? कहा जाता है कि सेटिंग में माहिर डॉ.शर्मा की विभागीय मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही नहीं विक्रम सिसोदिया से भी जबरदस्त सेटिंग है और इसी वजह से वह पद पर बना हुआ है।
दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों में जिस दमदारी से भ्रष्टाचार हो रहा है और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण मिल रहा है वह दांतों तले ऊंगली दबाने जैसा है। पीडब्ल्यूडी से लेकर पर्यटन और शिक्षा विभाग में भी जिस तरह से दागदार और विवादास्पद व्यक्तियों को प्रमुख पदों पर बिठाया गया है वह शासन की मंशा को भी स्पष्ट करता है।
कवर्धा में मामूली असिस्टेंट प्रोफेसर रहे डॉ. हरे राम शर्मा ने जिस षडय़ंत्र के तहत दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी के साथ साथ जिला समन्वयक परियोजना अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार लिया है वह अच्छे अच्छों का होश उड़ाने के लिए काफी है। बताया जाता है कि हाईकोर्ट द्वारा डॉ. शर्मा का संविलियन रद्द करने के बाद वे किसी भी विभाग में मूल सेवा में नहीं है लेकिन शासन स्तर पर उन्हें संविदा नियुक्ति दी गई। संविदा नियुक्ति किस आधार पर और जिस तरह से आनन-फानन में दी गई उसकी अलग ही कहानी है और कहा जाता है कि उच्च स्तर पर हुई सेटिंग से ही यह संभव हुआ है।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक संविलियन के लिए डॉ. शर्मा ने कवर्धा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक के अलावा भाजपा की महिला सांसद का भी सहारा लिया था लेकिन मामला हाईकोर्ट जा पहुंचा और हाईकोर्ट ने उनके संविलियन को रद्द कर दिया। ऐसे में उन्होंने नौकरी से पृथक करने की बजाय उन्हें संविदा नियुक्ति देकर जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर किस उद्देश्य से बिठाया गया यह आसानी से समझा जा सकता है।
हालांकि शिक्षा विभाग में विवादास्पद लोगों को महत्वपूर्ण पद पर बिठाना नया नहीं है। बृजमोहन अग्रवाल के शिक्षामंत्री बनते ही तवारिस मैडम की बहाली हुई तो मैडल आर. बाम्बरा को जिला शिक्षा अधिकारी से नवाजा गया। लेकिन ये दोनों शिक्षा विभाग की सेवा में हैं लेकिन डॉ. एच.आर. शर्मा तो शिक्षा विभाग की सेवा में ही नहीं है और ऐसे में उन्हें दंतेवाड़ा की जिम्मेदारी देने की जांच हुई तो सीएम हाऊस पर भी विवाद के छींटे उड़ेंगे।
बहरहाल डॉ. एच.आर.शर्मा के क्रियाकलापों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं कहा जाता हैकि नक्सलियों की आड़ लेकर यहां बड़े पैमाने पर खपलेबाजी हो रही है खासकर परियोजना समन्वयक में तो भ्रष्टाचार के जबरदस्त चर्चे हैं।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

शराबखोरी की कीमत

 धरसींवा विकासखंड के गांव निमोरा में तीन मासूमों के कत्ल की गुत्थी पुलिस ने सुलझाने का दावा करते हुए किशोर युवकों को गिरफ्तार कर लिया लेकिन जिस तरह से किशोर युवकों ने नृशंस ढंग से मासूमों का कत्ल किया? उससे यह सवाल उठने लगा है कि छत्तीसगढ़ को हम किस दिशा में ले जा रहे हैं? सरकार क्या चाहती है? सिर्फ शराब से मिलने वाले राजस्व के लिए पूरी पीढ़ी को दांव पर लगाया जा सकता है?
यह सब ऐसे सवाल है जो निमोरा हत्याकांड के बाद आम लोगों को बेचैन करने के लिए काफी है। सिर्फ शराब पीने के लिए पैसों के लिए हत्या नई नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि सरकार को शराब की वजह से हो रही अशांति की खबर नहीं है लेकिन जब शराब माफियाओं के साथ अधिकारियों और नेताओं का सांठ-गांठ हो तो गांवों में शांति कैसे हो सकती है।
छत्तीसगढ़ का ऐसा कोई गांव नहीं है जहां वैध-अवैध शराब का कारोबार नहीं फल-फूल रहा है। क्षेत्रीय विधायकों से लेकर सरपंचों तक को ऐसे शराब ठिकानों से आए दिन पैसे भी मिलते रहते है इसलिए आम लोगों को हो रही दिक्कतों पर सरकार ध्यान नहीं देती। पुलिस थानों का रिकार्ड खंगालने की जरूरत नहीं है स्वयं प्रदेश के गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने विधानसभा में यह बात स्वीकार किया है कि शराब माफियाओं के इशारे पर थानेदार चलते हैं। ऐसे गांव-गांव में परोसी जा रही जहर से युवा पीढ़ी हत्या नहीं क्या पढ़ाई-लिखाई करेंगे?
कितनी खबरें रोज छप रही है कि शराब दुकानों का विरोध हो रहा है लेकिन आम लोगों के विरोध का कहां असर होता है। राजधानी में ही आधा दर्जन से अधिक शराब दुकानों के सामने पंडाल ताने गए लेकिन सरकार ने कितनी दुकाने बंद की। लोग चिख रहे हैं खासकर महिलाएं सरकार की शराब नीति से त्रस्त हैं लोगों के घर उजड़ रहे हैं लेकिन सरकार को शराब से मिलने वाले राजस्व की चिंता है और राजस्व की चिंता से ज्यादा उस राशि की चिंता है जो शराब माफिया महीने में नेताओं और अधिकारियों को पहुंचाते है।
एक जमाना था जब छत्तीसगढ़ शांत प्रदेश कहलाता था। यहां दूसरे प्रदेश के लोग रहना बसना चाहते थे लेकिन अब शराब ने यहां की शांति भंग कर दी है। कभी गांवों के चौपालों पर दुनिया भर की चर्चा होती थी लेकिन सरकार की शराब नीति ने गांवों को अशांत कर दिया है और अब न चौपाल लगती है और न ही देश-दुनिया की चर्चा ही होती है। शराबी युवकों की टोली से आये दिन मारपीट की घटना जरूर हो रही है। कब शराब पीने के लिए किसका गला काट दिया जाएगा कोई नहीं जानता।
अब तो गांव-गांव में इसी तरह के नारे की धूम है -
कृष्ण राज में दूध मिले, राम राज में घी,
रमन राज में दारू मिले, चांउर बेच के पी।
या फिर -
तीन रूपया किलो चावल, नमक 25 पैसे
दारू गांव-गांव में बिकथे, मुड नहीं बनही कैसे
जब प्रदेश के गांवों में इस तरह के नारे लोगों के मनोमस्तिष्क पर बैठ रहा हो तो सरकार को भी राजस्व की चिंता किये बिना शराब नीति में कड़ाई बरतना चाहिए?
आश्चर्य का विषय तो यह है कि राजधानी जैसे जगह में जब शराब दुकान खोलने में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है तब भला ग्रामीण क्षेत्रों में शराब माफिया किस हद तक हावी होंगे अंदाजा लगाना मुश्किल है। लाखे नगर हो या आश्रम, फूल चौक हो या शास्त्री बाजार कहां नियम कानून है? ऐसे में सिर्फ निमोरा का मामला सुलझ जाने की बात कहना नये खतरे को जन्म देने वाला ही होगा।

तहसीलदार ही लगा है जमीन बिकवाने में ....

मुख्यमंत्री से 8 बार मिल चुका दिनेश
 भूमाफियाओं से शासन का कितना जबरदस्त गठजोड़ है यह भाठापारा में चल रहे भूमाफियाओं के खेल से अंदाजा लगाया जा सकता है? अपनी जमीन दिनेश बेचना नहीं चाहता लेकिन कालोनी बनाने वाला नरेन्द्र भोजवानी बेचने दबाव डाल रहा है। तहसीलदार शांडिल्य भी दिनेश को मजबूर कर रहा है और मुख्यमंत्री से 8 बार मिलने के बाद भी दिनेश परेशान है।
दिनेश कुमार जायसवाल पिता लतेल जायसवाल निवासी नेहरू वार्ड भाटापारा, जिला रायपुर (छ.ग.)ने बताया कि मेरे साथ भूमाफिया, प्रशासन, पुलिस, राजस्व विभाग के अधिकारीगण अन्यायपूर्वक दबाव डालकर मेरी पैतृक जमीन पर नरेन्द्र पिता ईश्वरदास भोजवानी द्वारा अवैध रूप से कब्जा जमाकर कालोनी विकसित कर रहा है।
दिनेश की भू स्वामी हक की जमीन रकबा 0.081 हैक्टेयर खसरा नंबर 145/13 राजस्व रिकार्ड भाटापारा तहसील भाटापारा, जिला रायपुर (छ.ग.) में स्थित है, इस जमीन के सारे दस्तावेज है।
दिनेश ने बताया कि आज की तारीख में उक्त जमीन की कीमत लगभग बीस लाख रूपयों से अधिक है, मैं इस जमीन को बेचना नहीं चाहता हूं परंतु नरेन्द्र पिता ईश्वरदास भोजवानी षडय़ंत्रपूर्वक राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर येन-केन प्रकारेण जमीन विक्रय करने के लिए विवश कर रहा है। नरेन्द्र पिता ईश्वरदास भोजवानी द्वारा 10-11 असामाजिक तत्वों को साथ लेकर मुझसे सीमांकन आवेदन में दस्तखत करवाया, जिसकी शिकायत लेकर जब मैं भाटापारा थाना गया तो मेरी शिकायत नहीं लिखी गई। मुझे जमीन बेचने के लिए दबाव डाला गया, नरेन्द्र भोजवानी के अलावा देवेन्द्र पिता किशन सचदेव निवासी महासती रोड भाटापारा भी मेरे भाई को जिसे मैंने रहने के लिए भूखंड में घर दिया था, को बरगलाकर पूरी जमीन में कब्जा करके कालोनी बनाने के लिये प्रयासरत है। आर.आई. द्वारा इस जमीन का बार-बार सीमांकन किया जा चुका है। जिसमें रिपोर्ट अलग-अलग दी गई है।
दिनेश को राजस्व विभाग, पुलिस और प्रशासन से न्याय नहीं मिल रहा है, आवेदक का पूरा परिवार आतंक के साये में जी रहा है। भू-माफिया के लोग कभी भी आवेदक या उसके परिवार पर प्राणघातक हमला कर सकते हैं। आवेदक पर दबाव बनाने के लिये प्राणघातक हमला 24.4.2009 को किया गया था। जिसकी रिपोर्ट जब आवेदक थाने में लिखाने के लिये गया तो थोन में उक्त आशय की रिपोर्ट नहीं लिखी गई।
आवेदक को उल्टे ही 151 की धारा लगाकर जेल भेज दिया गया। निराशा और बदहाल की स्थिति में तहसीलदार से कई बार अवैध कब्जा हटाने के लिए कहा पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। अत्यधिक अवसाद के स्थिति में मैंने उक्त भूमि को किसी और को विक्रय करने के लिए नकल की मांग की तो तहसीलदार ने नकल देने के लिए मना कर दिया, जो कि नरेन्द्र भोजवानी एवं देवेन्द्र सचदेव के दबाव का ही परिणाम है।
आवेदक मुख्यमंत्री से आठ बार जनदर्शन कार्यक्रम में भी शिकायत किया मुख्यमंत्री ने आदेशित भी किया। दिनांक 10.9.2009, टोकन नं. 500509003212, दिनांक 01.10.09 टोकन नं. 500709310196, दिनांक 29.4.2010 टोकन नं. 500510000047, दिनांक 27.5.2010 टोकन नं. 500510000217, दिनांक 10.06.2010 टोकन नं. 500510000268, दिनांक 24.06.2010 टोकन नं. 500510000326, दिनांक 05.8.2010 टोकन नं. 500510000448 को मुख्यमंत्री को आवेदन दिया। कोई कार्यवाही नहीं हुई। शहर थाना भाटापार, तहसीलदार भाटापारा मुझे सहयोग ना करके भूमाफिया का मदद कर रहे है। भूमाफिया नरेन्द्र भोजवानी, ठेकेदार देवेन्द्र सचदेव दूसरों के जरिये जमीन को बेचने के लिए दबाव बना रहे हैं। तहसीलदार से मांग करने पर भी बिक्री नकल देने से मना किया जा रहा है। इससे जाहिर है कि राजस्व अमला आवेदक के साथ न्याय नहीं कर रहा है। मुझे प्रशासन से न्याय चाहिए।

विस उपचुनाव को लेकर भाजपा में बवाल, रमन पर सवाल



चावल योजना से मध्यम वर्ग त्रस्त
शराब से महिलाएं त्रस्त
मंत्रियों पर लूट-खसोट का आरोप
अधिकारी किसी की नहीं सुनते
चौतरफा अपराध से आम लोग त्रस्त
गरीबों का चावल अमीरों की दुकान पर
किसानों को वादा कर 270 रूपये बोनस नहीं दिया
 छत्तीसगढ़ में हुए पहले उपचुनाव वैशाली नगर के बाद महापौर चुनाव में झटका खा चुकी भाजपा ने इसके बाद भी सबक नहीं लिया तो संजरी-बालोद और भटगांव में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव में उसे मुंह की खानी पड़ सकती है। बेलगाम होते अधिकारी और मंत्रियों पर लगातार लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा किसानों को 270 रू. बोनस देने का चुनावी वादा भी भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है ऐसे में चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग और शराब नीति से नाराज महिलाओं ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया तो डॉ. रमन सिंह की कुर्सी पर ही संकट के बादल घिर सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में दलीय स्थिति में भाजपा-कांग्रेस में ज्यादा अंकों का फर्क नहीं है। दूसरी पारी के शुरूआत में ही डॉ. रमन सिंह की टीम को वैशालीनगर के उपचुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त पटकनी देकर भाजपा की सीट छिनने में कामयाब रही है। इसके बाद निगम-पंचायत के चुनाव में भी कांग्रेसने भाजपाई गढ़ माने जाने वाले राजधानी रायपुर, न्यायधानी बिलासपुर और संस्कारधानी राजनांदगांव में भी भाजपा को जमीन दिखा दी है एक और बड़ा निगम दुर्ग में भाजपा किस तरह से जीत हासिल की है, यह किसी से छिपा नहीं है ऐसे में प्रदेश के भटगांव और बालोद विधानसभा में होने वाले उपचुनाव में क्या होगा इसे सोचकर ही भाजपाईयों के हाथ-पांव फुलने लगे हैं।
बृजमोहन प्रभारी
भटगांव विधानसभा में उपचुनाव के लिए भाजपा ने जिस आनन फानन में दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को प्रभारी बनाया है उसे लेकर अभी से सवाल उठने लगे हैं स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सहानुभूति लहर की संभावना जताते हुए यहां से स्व. रविशंकर त्रिपाठी की पत्नी को प्रत्याशी बनाये जाने की बात कहकर भाजपा के एक वर्ग को नाराज कर दिया है। वहीं बृजमोहन अग्रवाल को प्रभारी बनाकर यह संकेत देने की कोशिश की गई है कि भाजपा हर हाल में चुनाव जीतना चाहता है चाहे इसके लिए पैसों की गंगा बहानी पड़े। उल्लेखनीय है कि बृजमोहन अग्रवाल प्रदेश के न केवल दमदार मंत्री माने जाते है बल्कि उनके विभागों पीडब्ल्यूडी, पयर्टन, संस्कृति और शिक्षा विभाग में दमदारी से घोटाले हुए है। दागदार और विवादास्पद लोगों को इन विभागों के कई प्रमुख पदों पर बिठाने के अलावा भी अग्रवाल पर राजधानी के निगम सभापति चुनाव में भी खरीद फरोख्त के आरोप लगे हैं।
बालोद का प्रभारी शीघ्र
जिस दिन भटगांव का प्रभारी बृजमोहन अग्रवाल को नियुक्त किया जा रहा था उसी दिन ही बालोद के विधायक मदन साहू का निधन हुआ इसलिए भाजपा ने अभी तक यहां प्रभारी नियुक्त नहीं किया है।
कांग्रेस की रणनीति
दोनों ही विधानसभा में होने वाले उपचुनाव को लेकर कांग्रेस ने भीतर ही भीतर रणनीति बना ली है। चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों सीटें जीतकर वह रमन सरकार के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है और अपनी गरिमा भी वापस ला सकती है।
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक रमन सरकार के कारनामों का प्रचार प्रसार कर चुनाव जीतने की रणनीति है जिसके तहत उद्योगपतियों और व्यापारी वर्ग को रमन सरकार द्वारा बढ़ावा देने, किसानों से वादाखिलाफी करने, किसानों की जमीन जबरिया अधिग्रहण करने के अलावा रमन सरकार की शराब नीति से त्रस्त होती जनता और गांवों की शांति छीनने का प्रचार प्रसार भी जोर शोर से किया जा सकता है।
यहीं नहीं बढ़ते नक्सली आतंक और चावल योजना से त्रस्त होते मध्यम वर्ग भी भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है।
बहरहाल दोनों सीटों पर एक साथ होने वाले इस उपचुनाव में भले ही भाजपा की सत्ता न छिने लेकिन डॉ. रमन सिंह की कुर्सी पर दांव जरूर लग सकता है।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

गुस्सा तो बहुत है पर जाहिर कैसे हो...

कुल मिलाकर सांसदों ने अपनी तनख्वाह तीन-चार गुणा बढ़ा ही ली, अब कई राज्यों के विधायक  भी अपनी तनख्वाह बढ़ाने की  कवायद में लग गये हैं। मिलबांटकर अपने लिए सब कुछ पा लेने की रणनीति से आम आदमी के बारे में सोचने के लिए किसी  के पास समय नहीं है।आम आदमी इस मामले को  लेकर गुस्से से लाल-पीला हो रहा है। पिछले दिनों मुझे समारू मिल गया, देखते ही फट पड़ा! क्या तिवारी जी!कुछ लिखते क्यों नहीं! ये मनमानी नहीं तो और क्या है। यहां दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं और हमारे नेता लाख रूपये महिने का  जुगाड़ कर चुके हैं?
मैनें कहा समारू इस गुस्से को  पीना नहीं। ऐसे ही जगह-जगह जाहिर करते रहना और यदि तुम्हारे गांव में सांसद-विधायक  आ जाए तो उससे पूछने के लिए खड़े हो जाना। हिचकना नहीं। समारू और गुस्सा गया। वह कहने लगा। हमने अपना जनप्रतिनिधि चुना है। नौकर नहीं। और जो काम के बदले पैसा ले वह नौकर कहलाता है जनप्रतिनिधि नहीं। इन सा.. को  तो गोली से उड़ा देना चाहिए।
तभी पान ठेले वाला भड़क  गया। वह भी इस वेतन बढ़ोत्तरी पर आक्रोषित  था। वह कह उठा। आप लोगों का  तो मजा है? लेकिन  क्या आप को  लगता है कि तनख्वाह बढ़ा देने से ये लोग चोरी करना बंदकर देंगे?
मैने कहा इन लोगों का  तो यही ·हना है कि वेतन बढ़ेगा तो भ्रष्टाचार कम होगा?
कुछ कम नहीं होगा तभी पीछे से आवाज आई मैं पलट कर देखा तो विजय खड़ा था। वह बोले जा रहा था। इन सा.... को  तो पैसों की  भूख है जितना भी दे दो कम पड़ेगा?
मैंने कहा अगली बार मत चुनना इन्हें ऐसे लोग तलाश लो जो वेतन-पेंशन न लें?
क्या भैया आप भी ऐसी बात करते हैं? गांधी के देश में क्या कोई नहीं बचा जो वेतन-पेंशन नहीं लेने की घोषणा करें?
कुल जमा यह है कि एक  भी व्यक्ति मुझे नहीं मिला जो सांसदो-विधायको के वेतन-पेंशन को लेकर खुश हो? लोग गुस्से में है लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे अपना गुस्सा कहां जाहिर करें।
इस देश में नेताओं की छवि को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं। वेतन बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है कि पेट भरा रहेगा तो अच्छे से काम कर सकेंगे ? पर यह सच नहीं है? आधा सच भी नहीं है। सिर्फ भत्तों पर जिन्दा रखो तो ये लोग कार्वेंट में अपने बच्चे नहीं पढ़ा सकेगे तब सरकारी स्कुल  से इन के बच्चे निकलेंगे और जो बच्चा सरकारी या म्यूनिस्पल से पढ़कर नि·लेगा उसमें ही देश-प्रेम का जज्बा होगा, उसमें ही मानवता होगी और वे ही आम लोगों के हित में निर्णय लेगा।
विकास का निर्णय लेने वाले, बेहतर शहर की बसाहट का नक्शा बनाने वाले आम लोगों को पीने का पानी नहीं अपने लिए बिसलरी का इंतजाम करते हैं।
शिक्षा के विकास के लिए सरकारी स्कूलों  के स्तर बढ़ाने की बजाए नई-नई कार्वेंट शिक्षा पद्धति लाते हैं जो नागरिक  नहीं मशीन का निर्माण करते हैं।
समारू हो या विजय ये सिर्फ गुस्सा कर सकते हैं। इनमें हिम्मत भी नहीं है कि वे अपने गुस्से का इजहार कर सके। और शायद ये बात कार्वेंट वाले जानते है और हमारे राजनैतिक  दल भी...।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

यह अखबार की दादागिरी है या प्रशासन की नपुंसकता...

अग्रिम आधिपत्य पर ही बिल्डिंग खड़ी हो गई... 
छत्तीसगढ़ के  प्रतिष्ठित कहे जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत ने अग्रिम आधिपत्य मिलते ही बिल्डिंग तान दी और शासन प्रशासन मूकदर्शक  बना रहा। यहां तक  कि लोग बोलते रहे लेकिन अवैध निर्माण पर कोई कुछ नहीं बोला। इस बीच शहर में कितनी ही अवैध निर्माण उजाड़ दिया गया लेकिन इस  बिल्डिंग का  बाल बांका भी नहीं हुआ।
 राजधानी में चल रहे इस गोरखधंधे पर किसी का लगाम नहीं है। अखबारी जमीनों का व्यवसायिक  उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है और शासन-प्रशासन तमाशबीन बने हुए हैं।
प्राप्त जानकारी के  अनुसार प्रदेश शासन राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग मंत्रालय का पत्र क्रमांक 4-117/साल-1/06 रायपुर दिनांक  25.7.2008 के  अनुसार नवभारत प्रेस रायपुर को रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक  नं. 9 प्लाट नं. 1 में से रकबा 60750 वर्गफीट भूमि को  प्रेस स्थापना हेतु स्थाई पट्टे पर प्रावधानों के  अनुरूप प्रब्याजि एवं भूभाटक  लेकर आबंटन की स्वीकृति  प्रदान की  गई है।
उक्त आदेश के  परिलब्धन के  अनुसार 24.8.2008 के  अनुसार 4 करोड़ 47 लाख 12 हजार का प्रब्याजि तथा 33 लाख 53 हजार 400 रूपये वार्षिक  भू-भाटक  जमा करने नवभारत को  सूचित किया  गया लेकिन  6 माह बीत जाने के  बाद भी नवभारत ने उक्त राशि जमा नहीं कराई। उल्टा शासन को  रूपये कम करने के  लिए आवेदन दे दिया।
आश्चर्य का  विषय तो यह है कि नियमानुसार राशि जमा नहीं करने पर पट्टा नहीं दिया जा सकता और स्थाई पट्टा प्राप्त किये  बिना भवन निर्माण नहीं किया जा सकता लेकिन  पूरा शहर गवाह है कि राज्य बनने के  पहले ही नवभारत ने बिल्डिंग तान दी और बिल्डिंग के  एक  हिस्से को  एक  सरकारी विभाग को  किराये पर भी दे दिया। इतना सब कुछ होने के  बाद भी शासन-प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की । ये वहीं प्रशासन-शासन है जो अवैध निर्माण करने वालों के  खिलाफ कितनी  बार ही बुलडोजर चला चुका  है। लेकिन नवभारत के  खिलाफ कार्रवाई की  हिम्मत नहीं जुटा पाये। जबकि  ये वहीं निगम प्रशासन है जो तरूण छत्तीसगढ़ जब बन रहा था और अग्रिम आधिपत्य पर बिल्डिंग बना रहा था तो बुलडोजर चला चुका है। बताया जाता है कि ऐसा भी नहीं है कि नवभारत के  खिलाफ कार्रवाई की  कोशिश नहीं हुई है लेकिन चर्चा है कि ऐसी सोच रखने वाले अधिकारी ही दूसरे दिन हकाल दिये गये। ट्रांसफर कर दिया गया।
स्वच्छ शासन का दावा करने वाले डॉ.रमन सिंह को  भी नवभारत के कारनामों की  शिकायत की  गई है लेकिन कहा जाता है कि ऐसी शिकायतें रद्दी की  टोकरी में डाल दिया गया।
बहरहाल नवभारत की  बिल्डिंग अवैध निर्माण के  लिए आम लोगों को  चिढ़ा रही है तो एप्रोच वालों का  हौसला अफजाई कर रही है देखना है कि शासन कबतक  इस ओर से आंख मूंदे रहेगा।