कांग्रेसियों को जनता पे भरोसा...
छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा के दूसरे उपचुनाव को लेकर भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बृजमोहन अग्रवाल जैसे दमदार मंत्री को प्रभारी बनाकर भाजपा ने यह संकेत भी दिया है कि सत्ता और पैसे का उपयोग किस स्तर तक किया जाएगा दूसरी ओर कांग्रेसी भी भाजपा सरकार के कारनामों को जनता के समक्ष रखने कमर कस लिए है।
भटगांव में भाजपा विधायक रविशंकर त्रिपाठी के निधन की वजह से उपचुनाव हो रहा है। चुनाव आयोग ने तिथि की घोषणा भी कर दी है और यहां 1 अक्टूबर को मतदान होगा। सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने यहां से स्व. त्रिपाठी की धर्मपत्नी को चुनाव में उतारने का निश्चय कर सहानुभूति वोट बटोरने के चक्कर में है तो दूसरी ओर सत्ता और पैसों का प्रभाव दिखाने प्रदेश सरकार के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को यहां का प्रभारी बनाया गया है। कहा जाता है कि जोड़तोड़ में माहिर बृजमोहन अग्रवाल को प्रभारी बनाकर भाजपा ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि वह किसी भी तरह से यह चुनाव जीतना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक चुनाव में अभी समय है लेकिन पैसों की ताकत गांव-गांव में चर्चा का विषय है और लोगों को उम्मीद भी है कि इस बार प्रत्येक वोट पर लाल नोट मिलेंगे। इसके अलावा मुर्गा भात, शराब की भी रणनीति को लेकर यहां चर्चा चल रही है।
दूसरी तरफ कांग्रेस फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहती है। पैलेस समर्थक और विरोधियों में बंटी कांग्रेस को यहां जनता पर ही भरोसा है। कहा जाता है कि चावल योजना की वजह से मध्यम वर्ग यहां त्रस्त है। मजदूरों की दिक्कतों ने बड़े किसानों की हालत खराब कर दी है। वहीं घर में काम करने वालों का भाव भी बढ़ गया है। इसी तरह गांव-गांव में बिक रहे अवैध शराब और भाजपा नेताओं की दादागिरी भी यहां चुनावी मुद्दा बन सकता है। खासकर गांव-गांव में शराब बिकने से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है इन्हीं मुद्दों को लेकर कांग्रेस चुनाव मैदान में होगी।
वैसे रमन सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार और बेलगाम होते अधिकारियों से हो रही आम लोगों की परेशानी का मामला भी भाजपा पर भारी पड़ सकता है। बहरहाल अभी तो उपचुनाव की घोषणा बस हुई है और भाजपा ने जिस तेजी से बिसात बिछाई है उसे लेकर कई तरह की चर्चा है और पैसा कमाने की चाहत में गांव-गांव में रणनीति बन रही है ऐसे में चुनाव लडऩे वालों को पानी की तरह पैसा बहाना पड़ सकता है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
ऐसी है छग सरकार
शिक्षक दिवस का बहिष्कार
छत्तीसगढ़ में जिन लोगों पर भावी पीढ़ी के निर्माण की जिम्मेदारी है उन शिक्षकों ने शिक्षक दिवस का बहिष्कार कर दिया। प्रदेश के दमदार माने जाने वाले शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की इस मामले को लेकर न केवल थू-थू होने लगी है बल्कि इस सम्पूर्ण घटना को दुर्भाग्यजनक भी माना जा रहा है।
वैसे तो छत्तीसगढ़ में शिक्षक या गुरुजी को पहले ही सरकारी फरमानों की वजह से अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में शिक्षक दिवस पर सम्मान को लेकर शिक्षा मंत्री के वादा खिलाफी से शिक्षक बेहद नाराज है। एक तरफ जब पूरे देश में शिक्षकों के सम्मान को लेकर आयोजन हो रहे थे तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के शिक्षक शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल पर वादा खिलाफी का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठे थे। यह प्रदेश की विडम्बना ही है कि यहां शिक्षकों को शिक्षा कर्मी तो कहा है जाता है दिहाड़ी मजदूरों की स्थिति पर ला खड़ा किया गया है।
यह मामला कितना तूल पकड़ेगा अभी से कहना मुश्किल है लेकिन सरकारी नीतियों ने इस पवित्र कार्य को जिस तरह से बदनाम किया है वैसे उदाहरण अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। इधर भाजपा अध्यक्ष भाजपा शासितत राज्यों में सकल घरेलु उत्पाद के दस फीसदी राशि शिक्षा के विकास में खर्च करने की बात कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर उनके मंत्रियों के कारनामों से शिक्षकों को शिक्षक दिवस का बहिष्कार करना पड़ रहा है।
छत्तीसगढ़ में जिन लोगों पर भावी पीढ़ी के निर्माण की जिम्मेदारी है उन शिक्षकों ने शिक्षक दिवस का बहिष्कार कर दिया। प्रदेश के दमदार माने जाने वाले शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की इस मामले को लेकर न केवल थू-थू होने लगी है बल्कि इस सम्पूर्ण घटना को दुर्भाग्यजनक भी माना जा रहा है।
वैसे तो छत्तीसगढ़ में शिक्षक या गुरुजी को पहले ही सरकारी फरमानों की वजह से अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में शिक्षक दिवस पर सम्मान को लेकर शिक्षा मंत्री के वादा खिलाफी से शिक्षक बेहद नाराज है। एक तरफ जब पूरे देश में शिक्षकों के सम्मान को लेकर आयोजन हो रहे थे तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के शिक्षक शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल पर वादा खिलाफी का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठे थे। यह प्रदेश की विडम्बना ही है कि यहां शिक्षकों को शिक्षा कर्मी तो कहा है जाता है दिहाड़ी मजदूरों की स्थिति पर ला खड़ा किया गया है।
यह मामला कितना तूल पकड़ेगा अभी से कहना मुश्किल है लेकिन सरकारी नीतियों ने इस पवित्र कार्य को जिस तरह से बदनाम किया है वैसे उदाहरण अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। इधर भाजपा अध्यक्ष भाजपा शासितत राज्यों में सकल घरेलु उत्पाद के दस फीसदी राशि शिक्षा के विकास में खर्च करने की बात कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर उनके मंत्रियों के कारनामों से शिक्षकों को शिक्षक दिवस का बहिष्कार करना पड़ रहा है।
ये तो सरकारी अत्याचार है
हांड़ी पारा में रहता है रविशंकर श्रीवास्तव , १९८४ में उसने कृषि मण्डी में देवेभो के तहत नौकरी शुरू की लेकिन आज तक वह नियमित नहीं हुआ , जबकि उसके साथ के सभी नियमित हो गए, न्यायलय का फैसला भी उसके फेवर में आया .अब वह सत्याग्रह करने मजबूर है
सिंगापुर में हुआ ज्योतिष सम्मलेन
ज्योतिष सम्मलेन से लौटकर देवनारायण शर्मा ने बताया कि वंहा ज्योतिष का ज्यादा उपयोग बिजनेस के लिए करते है ,वहां की सरकार भवन निर्माण में वास्तु का ध्यान रखते है,सत्यविश्वास ने बताया रायपुर से २० ज्योतिष गए थे पुरे देश से १५० ज्योतिष गए थे
करे कोई... भरे कोई...
पिछले दिनों कश्मीर में वहां के नेता उमर अब्दुल्ला पर भीड़ में एक युवक ने जूता फेंक दिया। युवक तो पकड़ा ही गया साथ ही दो डीएसपी स्तर के अधिकारी भी निलंबित कर दिए गए। खबर इतनी ही नहीं है। इसके पहले भी देश-दुनिया में इस तरह की घटनाएं हुई है जब आम लोगों में से किसी ने इस तरह की हरकत की है। कानून कभी किसी को ईजाजत नहीं देता कि वह अपने साथ हो रहे अन्याय पर किसी जनप्रतिनिधि (वेतन भोगी) से इस तरह की हरकत करे। भारत में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था है और अब तो गांव-गांव से नेता पैदा हो रहे है। राजनैतिक दलदल में वे स्वयं के लिए जुगाड़ में लगे हैं और आम आदमी लगातार नारकीय जीवन जीने मजबूर है। इसके बाद भी कोई जूता फेंक कर मार दे तो भी वह अपराध ही है।
छत्तीसगढ़ के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आधे राज्य में शासन नहीं है। ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो यह स्थिति बढ़ ही सकती है। क्या सिर्फ दो रुपए किलो चावल या रोजगार गारंटी योजना से आम लोगों का भला हो सकता है? गांवों में शिक्षा नहीं है, स्वास्थ्य सुविधा नहीं है पीने और सिंचाई के पानी की सुविधा नहीं है और मुख्यमंत्री-मंत्री ही नहीं विधायक भी एयरकंडीशन में रह रहे हैं तब आम आदमी अपना गुस्सा कहां जाहिर करे।
हर बात में राजनीति ने आम लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बन है। आर्थिक रुप से पिछड़े इस राज्य के आम लोगों को मूलभूत सुविधा दिलाने की बजाय सरकार वल्र्ड रिकार्ड बनाने आमदा है कि उसकी राजधानी पूरी दुनिया में नए ढंग की सबसे खूबसूरत होगी? क्या इससे आम लोगों को मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी? बल्कि इन वेतनभोगी जनप्रतिनिधियों की एशगाह खूबसूरत हो जाएगी। किसानों को अपना गांव छोडऩा पड़ रहा है और वे नए सिरे से अपना जीवन शुरु करने मजबूर है। एक बसी-बसाई परिवार गांव को उजाडक़र कोई कैसे सुख से रह सकता है। इसकी कल्पना किसी ने की है।
गांधी के इस देश में सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा रही है। धर्म की रक्षा के लिए यहां राम-कृष्ण का जन्म हुआ है। प्रभु ईशु, पैगम्बर से लेकर गुरुनानक महावीर और शंकराचार्य को मानने वालों के अलावा पत्थर भी पूजे जाते हैं तब भला कोई अपने जनप्रतिनिधि पर जूता क्यों उछाल रहा है? सब तरफ अपनी सुविधा बढ़ाने में लगे नौकरशाह और राजनेताओं के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का जूता फेंकना उदाहरण हो सकता है? जब तमाम लोग अपनी पीड़ा को व्यक्त करने लगेंगे तो क्या होगा? क्या इसकी कल्पना की गई है? यह हमारे धर्म में ही कहा गया है कि राजा परीक्षित चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी सर्पदंश के श्राप से नहीं बच सके थे। ऐसे में क्या आम लोगों के खून-पसीने की कमाई से मिलने वाले टैक्सों का हम अपने नही आम लोगों के हितों में कार्य करें।
समय किसी के लिए नहीं रुकता? और न ही पैसों से सुख ही खरीदा जा सकता है? इस सच्चाई के बाद भी पैसों के प्रति बढ़ती भूख का कारण विस्मयकारी है। लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर यह जवाबदारी है कि वह आम लोगों के प्रति न्याय करें। लेकिन अपने हितों के लिए जिस तरह से नेता कभी एक हो जाते हैं या कभी लडऩे लगते है उससे तो आम लोगों का ही नुकसान होना है और ऐसे में आम लोग चुनाव तक इंतजार करने की बजाय पहले ही सडक़ पर आ गए तो आप नौकरशाहों को निलंबित करते रहो, लोगों को जेल में ढूंसते रहो क्या फर्क पड़ेगा? आखिर अंग्रेज भी राज्य करने यही रणनीति अपना रहे थे।
छत्तीसगढ़ के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आधे राज्य में शासन नहीं है। ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो यह स्थिति बढ़ ही सकती है। क्या सिर्फ दो रुपए किलो चावल या रोजगार गारंटी योजना से आम लोगों का भला हो सकता है? गांवों में शिक्षा नहीं है, स्वास्थ्य सुविधा नहीं है पीने और सिंचाई के पानी की सुविधा नहीं है और मुख्यमंत्री-मंत्री ही नहीं विधायक भी एयरकंडीशन में रह रहे हैं तब आम आदमी अपना गुस्सा कहां जाहिर करे।
हर बात में राजनीति ने आम लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बन है। आर्थिक रुप से पिछड़े इस राज्य के आम लोगों को मूलभूत सुविधा दिलाने की बजाय सरकार वल्र्ड रिकार्ड बनाने आमदा है कि उसकी राजधानी पूरी दुनिया में नए ढंग की सबसे खूबसूरत होगी? क्या इससे आम लोगों को मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी? बल्कि इन वेतनभोगी जनप्रतिनिधियों की एशगाह खूबसूरत हो जाएगी। किसानों को अपना गांव छोडऩा पड़ रहा है और वे नए सिरे से अपना जीवन शुरु करने मजबूर है। एक बसी-बसाई परिवार गांव को उजाडक़र कोई कैसे सुख से रह सकता है। इसकी कल्पना किसी ने की है।
गांधी के इस देश में सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा रही है। धर्म की रक्षा के लिए यहां राम-कृष्ण का जन्म हुआ है। प्रभु ईशु, पैगम्बर से लेकर गुरुनानक महावीर और शंकराचार्य को मानने वालों के अलावा पत्थर भी पूजे जाते हैं तब भला कोई अपने जनप्रतिनिधि पर जूता क्यों उछाल रहा है? सब तरफ अपनी सुविधा बढ़ाने में लगे नौकरशाह और राजनेताओं के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का जूता फेंकना उदाहरण हो सकता है? जब तमाम लोग अपनी पीड़ा को व्यक्त करने लगेंगे तो क्या होगा? क्या इसकी कल्पना की गई है? यह हमारे धर्म में ही कहा गया है कि राजा परीक्षित चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी सर्पदंश के श्राप से नहीं बच सके थे। ऐसे में क्या आम लोगों के खून-पसीने की कमाई से मिलने वाले टैक्सों का हम अपने नही आम लोगों के हितों में कार्य करें।
समय किसी के लिए नहीं रुकता? और न ही पैसों से सुख ही खरीदा जा सकता है? इस सच्चाई के बाद भी पैसों के प्रति बढ़ती भूख का कारण विस्मयकारी है। लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर यह जवाबदारी है कि वह आम लोगों के प्रति न्याय करें। लेकिन अपने हितों के लिए जिस तरह से नेता कभी एक हो जाते हैं या कभी लडऩे लगते है उससे तो आम लोगों का ही नुकसान होना है और ऐसे में आम लोग चुनाव तक इंतजार करने की बजाय पहले ही सडक़ पर आ गए तो आप नौकरशाहों को निलंबित करते रहो, लोगों को जेल में ढूंसते रहो क्या फर्क पड़ेगा? आखिर अंग्रेज भी राज्य करने यही रणनीति अपना रहे थे।
गुरुवार, 9 सितंबर 2010
क्यों ठंडा पड़ रहा युवाओं का खून...
इन दिनों पूरे देश में अजीब सा माहौल है। सांसद-विधायक अपना वेतन और सुविधा बढ़ाने में लगे हैं। भ्रष्ट होते नौकरशाह से आम आदमी त्रस्त है और सरकार उद्योगपतियों की जेब मे है उद्योगो के लिए जमीनें दी जा रही है अपनी सुविधा के लिए राजधानी बसाए जा रहे हैं और पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक हो गई है। शासकीय कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने में आमदा है और पूरी सरकार भ्रष्ट अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद संविदा पर रख रही है और देश का युवा पढ़ाई और कमाई में सब कुछ ऐसा होम कर देना चाहता है मानों पैसा ही सब कुछ है?
इस स्थिति के खिलाफ न कोई विवेकानंद है और न महात्मा गांधी, विनोबा भावे। जिन्हें जनता चुन रही है वे ही जब अपनी सुविधा में मर रहे हो तो युवा किसे आदर्श बनाएं। एक जमाना था जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ही नहीं देश के कई शहरों में छात्र नेताओं का बोलबाला था और उनके किसी भी बातों पर शासन-प्रशासन के होथ उड़ जाते थे। भ्रष्टाचारी अफसर हो या चरित्रहीन नेता सभी के मन में भय था कि गलत करने पर युवा छोड़ेंगे नहीं। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा पद्धति में जो बदलाव हुआ और युवाओं में एनएसयूआई, एबीवीपी या युवा ब्रिगेडरों ने पट्टा डालना शुरु किया तभी से इस देश में भ्रष्टाचार की एक नई ईबादत लिखी जा रही है। पहले पढ़ाई का बोझ और फिर पैसा कमाने की धुन ने समाज देश का सर्वाधिक अहित किया। शिक्षा के व्यवसायीकरण के चलते युवाओं की सोच भी व्यवसायिक हो गई।छत्तीसगढ़ में एक जमाना था जब महंगाई को लेकर छात्र नेता पिल पड़ते थे। गंदगी पर निगम अधिकारियों के मुंह पर कालिख से लेकर सांसद-विधायकों की धोती तक खोल दी जाती थी। अब यह सब कुछ नहीं दिखता। यह अच्छी बात भी है लेकिन इसका दुष्परिणाम सबके सामने है। भूमाफिया से लेकर भ्रष्ट नेता-अफसरों से आम आदमी त्रस्त है। राशन दुकान से लेकर शिक्षा तक में माफिया हावी है। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई का स्तर बदत्तर होता जा रहा है और शिक्षा मंत्री चंद रुपयों के लालच में विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठा रहे हैं। ऐसे में शिक्षा किस तरह की होगी समझा जा सकता है। जो लोग सरकारी नौकरी में है वे सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की मांग कर रहे है। 58 से 60 हो चुका अब 62-65 की मांग है और यह मांग भी पूरी हुई तो लोगों को फिर नौकरी के लिए इंतजार करना पड़ेगा। लेकिन वे लोग भी खुलकर विरोध नहीं कर रहे है जो लोग निर्धारित आयु सीमा के करीब है। सरकारी सेवानिवृत्त को संविदा पर संविदा दिए जा रही है तब भी लोग चुप है।
उद्योगों के कारण शहर का पर्यावरण बर्बाद हो रहा है। खेत बंजर हो रहे हैं पानी जहरीला हो रहा है और सरकार इसके खिलाफ कार्रवाई की बजाय उद्योग के लिए किसानी जमीन अधिग्रहित कर रही है। छत्तीसगढ़ में तो आम चर्चा है कि भ्रष्टाचार चरम पर है गरीबों का चावल तक खाया जा रहा है और नौकरशाह मनमर्जी कर रहे है आईएएस बाबूलाल अग्रवाल हो या मालिक मकबूजा कांड के दोषी आईएएस नारायण सिंह सभी को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है।
एचआर प्रकरण की फाईल गायब,बिरजू के राम, बड़े बलवान
दंतेवाड़ा जिला शिक्षा अधिकारी डा. एच.आर. शर्मा की संविलियन से लेकर दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी के सफर की सरकारी फाईल गायब हो गई है। शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के वरदहस्त प्राप्त प्रो. एच.आर. शर्मा न केवल दमदार बताए जाते हैं बल्कि उनकी नियुक्ति पर ही सवाल उठाये गए हैं।
भाटापारा में असिटेंट प्रोफेसर रहे डा. एच.आर. शर्मा की दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्ति को अवैधानिक बताया जा हा है। इस संबंध में विस्तार से खबर भी प्रकाशित हुई है लेकिन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही नहीं सीएम हाउस से भी जबरदस्त सेटिंग की वजह से इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। हमारे अत्यंत भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक हाईकोर्ट द्वारा डा. शर्मा के संविलियन को रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री हेमचंद यादव फिर बृजमोहन अग्रवाल की निजी रुप से रुचि लेने की वजह से वे अब भी दंतेवाड़ा में न केवल जिला शिक्षा अधिकारी बल्कि परियोजना समन्वयक के दोहरे पद पर पदस्थ हैं।
बताया जाता है कि कुछ आईएएस अधिकारियों की रूचि की वजह से उनकी नियुक्ति खाद्य निगम में भी की गई थी लेकिन जैसे ही इसकी जानकारी आईएएस एम.के. राउत को हुई थी उन्होंने डा. शर्मा की नियुक्ति लौटा दी थी। चूंकि डा. शर्मा कोई मूल विभाग में पदस्थ नहीं है। इसलिए उन्हें दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी बना दिया गया और इतना ही नहीं उन्हें राजीव गांधी शिक्षा मिशन में भी प्रभार दे दिया गया।
डा. शर्मा के प्रति भाजपा सरकार के मंत्रियों की क्या रूचि है यह तो वहीं जाने लेकिन जब डा. शर्मा के खिलाफ जाच की बात हुई तो फाईल ही गायब होने की चर्चा है। बताया जाता है कि डेढ़ सौ पृष्ठ के नोट शीट के अलावा पीएससी से लेकर हाईकोर्ट के प्रमाणिक दस्तावेज वाले इस फाईल को गायब करा दिया गया है। इधर हमारे सूत्रों ने बताया कि दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में जबरदस्त घपलेबाजी की जा रही है और एक बड़ा हिस्सा उच्च पदस्थ लोगों को पहुंचाया जाता है। इधर फाईल गायब होने को लेकर शिक्षा विभाग में जबरदस्त हडक़म्प है और इस मामले को दबाया जा रहा है।
भाटापारा में असिटेंट प्रोफेसर रहे डा. एच.आर. शर्मा की दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्ति को अवैधानिक बताया जा हा है। इस संबंध में विस्तार से खबर भी प्रकाशित हुई है लेकिन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही नहीं सीएम हाउस से भी जबरदस्त सेटिंग की वजह से इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। हमारे अत्यंत भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक हाईकोर्ट द्वारा डा. शर्मा के संविलियन को रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री हेमचंद यादव फिर बृजमोहन अग्रवाल की निजी रुप से रुचि लेने की वजह से वे अब भी दंतेवाड़ा में न केवल जिला शिक्षा अधिकारी बल्कि परियोजना समन्वयक के दोहरे पद पर पदस्थ हैं।
बताया जाता है कि कुछ आईएएस अधिकारियों की रूचि की वजह से उनकी नियुक्ति खाद्य निगम में भी की गई थी लेकिन जैसे ही इसकी जानकारी आईएएस एम.के. राउत को हुई थी उन्होंने डा. शर्मा की नियुक्ति लौटा दी थी। चूंकि डा. शर्मा कोई मूल विभाग में पदस्थ नहीं है। इसलिए उन्हें दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी बना दिया गया और इतना ही नहीं उन्हें राजीव गांधी शिक्षा मिशन में भी प्रभार दे दिया गया।
डा. शर्मा के प्रति भाजपा सरकार के मंत्रियों की क्या रूचि है यह तो वहीं जाने लेकिन जब डा. शर्मा के खिलाफ जाच की बात हुई तो फाईल ही गायब होने की चर्चा है। बताया जाता है कि डेढ़ सौ पृष्ठ के नोट शीट के अलावा पीएससी से लेकर हाईकोर्ट के प्रमाणिक दस्तावेज वाले इस फाईल को गायब करा दिया गया है। इधर हमारे सूत्रों ने बताया कि दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में जबरदस्त घपलेबाजी की जा रही है और एक बड़ा हिस्सा उच्च पदस्थ लोगों को पहुंचाया जाता है। इधर फाईल गायब होने को लेकर शिक्षा विभाग में जबरदस्त हडक़म्प है और इस मामले को दबाया जा रहा है।
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