छत्तीसगढ में जब विधानसभा का चुनाव हुआ था तब भाजपा ने 50 सीट जीतकर सत्ता में वापसी की थी। डॉ. रमन सिंह की बढ़ाई में कसीदे गढ़े गए और इसके बाद वैशालीनगर में हुए उपचुनाव में भाजपा को 50 से 49 में ला पटका। जिस चावल योजना से वह सत्ता में आने की बात कह रही थई वही योजना वैशालीनगर में फेल हो गया। चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग ने वैशालीनगर में भाजपा को उखाड़ फेंका। हालांकि इसके पीछे बिहारियों के खिलाफ किए गए विष वमन भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।
भाजपा के दो विधायकों के असमायिक निधन ने उन्हें 49 से 47 में ला पटका है। फिलहाल तो भटगांव में ही उपचुनाव है। कहने को तो भाजपा यहां से स्व. त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी को उतारकर सहानुभूति वोट लेने के फेर में हैं। जबकि कांग्रेस की राजनीति पहल और उनके विरोधियों के बीच जा टिकी है। भटगांव विधानसभा क्षेत्र कई मामले में वैशालीनगर की तरह समानता रखता है। भटगांव भी नई सीट है और यहां भी सरोज पाण्डेय की तरह स्व. त्रिपाठी जी लम्बे अंतराल से जीत दर्ज की थी। यहां भी कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति वैशालीनगर की तरह अस्त-व्यस्त रही और इसका फायदा मुख्य चुनाव में भाजपा को मिला।
वैशालीनगर की तरह यहां भी बिहारी वोटरों की संख्या महत्वपूर्ण है ऐसे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बयान की यहां चर्चा हुई तो भाजपा को बिहारी वोटरों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तो सरकार की चावल योजना का है। इस योजना से मध्यम वर्ग त्रस्त है। मध्यम वर्ग का मानना है कि इस योजना की वजह से मजदूरों के भाव बढ़ गए हैं। खेती किसानी से लेकर घरेलु काम में दिक्कतें आ रही हैं जबकि एक बड़ा वर्ग महंगाई की प्रमुख वजह चांवल योजना को मानता है। ऐसे में मध्यम वर्ग की नाराजगी का असर वैशालीनगर की तरह हुआ तो भाजपा यहां भी मुसीबत में फंस सकती है।
इसके अलावा सरकार की शराब नीति से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है। गांव-गांव में शराब ने आम लोगों की शांति भंग कर दी है। वैशालीनगर चुनाव ें यह मुद्दा कारगर रहा है और महिलाओं के बड़े वर्ग द्वारा भाजपा से नाराजगी की चर्चा है इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के दौरे के दौरान आदिवासियों की उपेक्षा भी भटगांव चुनाव में असर डाल सकती है। हालांकि भाजपा अपने 47 के अंक से आगे जाने की हरसंभव कोशिश में है क्योंकि यह अंक सरकार के लिए कभी भी मुसिबत खड़ी कर सकता है इसलिए स्व. त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी को टिकिट देकर वह सहानुभूति वोट तो अर्जित करना चाहती ही है बृजमोहन अग्रवाल जैसे दमदार मंत्री को प्रभारी बनाकर साम-दाम-दंड भेद की नीति भी अख्तियार करना चाहती है। ज्ञात हो कि बृजमोहन अग्रवाल की छवि पैसे फेंकने के अलावा जोड़-तोड़ में माहिर की है।
भटगांव चुनाव में सरकारी अंधेरगर्दी के किस्से तो अभी से सुनाई पड़ने लगे है। लोगों को बरगलाने सरकारी प्रयास की शुरुआत 6 सितम्बर से पहले भी दिखाई देने लगा था। पूरी सरकार झोंकी गई तो आम लोगों को क्या दिक्कतें होती है यह नीतिन गडकरी के दौरे में राजधानी के लोगों ने नजदीक से देखा है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
बुधवार, 15 सितंबर 2010
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
घर तो छोड़िये, भगवान को भी नहीं छोड़ा...
अपनी करनी छुपाने सरकारी विज्ञापन के मार्फत खजाना लुटाने की कोशिश में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राय में अखबार की बाढ़ आ गई है। बड़े प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबार बिरादरी की आमद ने पत्रकारों का भाव तो बढ़ाया ही है आम लोगों को परेशान कर दिया है। सुबह से शाम तक घूम रह सर्वे टीम ने घरों का चैन छिन लिया है। कभी अखबार की स्कीम समझाई जाती है तो कभी दरवाजों पर विज्ञापन बोर्ड लगाने पहुंच जाते हैं। अब अखबार वालों से पंगा कौन लें सो अखबार वाले मनमानी पर उतर आए है। धर नहीं हुआ अखबार का प्रचार तंत्र हो गया है। घरों में घर मालिक का बोर्ड लगा हो या न लगा हो अखबारों का विज्ञापन बोर्ड जरूर लग गया है। इसके एवज में मुफ्त में अखबार भी नहीं दिया जा रहा है। हालांकि कुछ कालोनी में विज्ञापन के एवज में अखबार मांगने की सुगबुगाहट हैं।
घरों को तो छोड़िए दैनिक भास्कर ने तो अपने प्रचार के लिए मंदिरों को भी नहीं बख्शा है। राजधानी रायपुर के तो प्राय: सभी मंदिरों में उनके विज्ञापन बोर्ड लगे है। दो-पांच सौ रुपए खर्च करने में ऐसा प्रचार कहां मिलेगा। वहीं कोई कंपनी बोर्ड लगा देती तो हिन्दुओं के कथित रक्षक पिल पड़ते लेकिन अखबार वालों के इस कारनामे पर किसी का मुंह नहीं खुलता। मंदिर वाले भी क्या करें। समझ सब रहे हैं लेकिन अखबारी दादागिरी के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसमे हैं।
पत्रिका का भास्कर पर प्रहार
अभी नेशनल लुक के वार से दैनिक भास्कर संभल भी नहीं पाया था कि पत्रिका ने हमला बोल दिया नेशनल लुक ने संपादकीय विभाग पर हमला किया था तो पत्रिका ने मैनेजमेंट की बजा दी। भास्कर में सरकारी विज्ञापन की देखरेख करने वाले प्रकाश सौरे पत्रिका में स्टेट हेड हो गए है जबकि सरकुलेशन संभालने वाले सुरेन्द्र मिश्रा और गोविन्द ठाकरे को भी पत्रिका ने तोड़ लिया है।
चंदू का इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रेम
स्मार्ट कहलाने वाले चंद्रप्रकाश जैन ने किन परिस्थितियों में नवभारत छोड़ नईदुनिया की राह पकड़ी थी यह तो वही जाने लेकिन लगता है उन्हें भी अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का ग्लैमर भाने लगा है तभी तो वे जी-24 वाईन कर गए। अब चर्चा तो कई तरह की है चर्चा का क्या कहें।
अजय सक्सेना पत्रिका में
कार्टून बनाते-बनाते कार्टून की हालत में पहुंच चुके अजय सक्सेना का अपने फिल्ड में कोई जवाब नहीं है। लेकिन वेतन जहां यादा होगा वहीं काम करेंगे के तर्ज पर अब वे पत्रिका पहुंच गए हैं।
राजेश सोनकर हरिभूमि में
फोटोग्राफी अच्छी है पर स्थापित होने की चाह में लगे राजेश सोनकर हरिभूमि पहुंच गए हैं। देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर
शशांक देशबंधु पहुंचे
युगबोध प्रकाशन की पत्रकारिता से हाइवे में संपादक बनने वाले शशांक शर्मा अब देशबंधु पहुंच गए हैं। यह अलग बात है कि उनके देशबंधु पहुंचने से कई लोगों को दिक्कतें शुरु हो गई है।
और अंत में...
नवभारत को ठेके पर लेने का दावा करने वाले रंगा-बिल्ला अब उस एडवरटाईजर्स को ढूंढ रहे हैं जिन्होंने ठेके पर लेने की खबर को लीक कर प्रचारित किया है। बेचारा स्वयं को बचाने सफाई देते घूम रहा है।
लेबल:
देशबंधु,
दैनिक भास्कर,
मीडिया पर मीडिया
सोमवार, 13 सितंबर 2010
जिसे वाजपेयी सरकार ने हटाया उस कानून को रमन ने सुझाया
व्यापारियों में आक्रोश, चेम्बर गिरवी ?

जिस आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 से संबंधित अपराध पर होने वाली सजा के दुरुपयोग पर व्यापारी समाज आक्रोशित था और व्यापारियों के आंदोलन में भाजपाईयों की हिस्सेदारी भांप पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में संशोधन किया था आज उसी भाजपा के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम 1955 से संबंधित अपराध को संज्ञेय व गैर जमानती करने का सुझाव दे आए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के द्वारा पिछले 8 सितम्बर को दिल्ली में दिए इस सुझाव को लेकर व्यापारियों में जबरदस्त आक्रोश है जबकि व्यापारियों की प्रतिनिधि संस्था छत्तीसगढ चेम्बर ऑफ कामर्स में खामोशी है। अब तो इस मामले में खामोशी को लेकर चेम्बर के अस्तित्व पर भी सवाल उठने लगे हैं अब तो कई लोग इसे भाजपा के द्वारा गिरवी रखने की बात की जा रही है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने 8 सितम्बर को दिल्ली में खाद्यान्न सुरक्षा और पीडीएस पर योजना आयोग द्वारा आयोजित बैठक में कहा कि जिस वाहन से आवश्यक वस्तु का अवैध परिवहन किया जाता है उसे राजसात किया जाना चाहिए। यही नहीं इसके तहत गिरफ्तार लोगों को संज्ञेय व गैर जमानती बनाया जाए। डा. रमन सिंह उसी भाजपा के मुख्यमंत्री हैं जिसने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत गिरफ्तारी को लेकर जमकर आंदोलन किया था। सालों चले व्यापारियों के इस आंदोलन में भाजपा ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। व्यापारियों का कहना था कि इस अधिनियम की आड़ में शासकीय सेवकों के द्वारा व्यापारियों को प्रताड़ित किया जाता है और इस कानून का न केवल दुरुपयोग किया जाता है बल्कि व्यापारियों से अवैध वसूली की जाती है। व्यापारियों के इस आंदोलन में तब भाजपा ने बढचढ़कर हिस्सा लेते हुए इसे काले कानून की संज्ञा तक दे डाली थी।
इसके बाद केन्द्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सत्तारुढ़ हुई तब भी भाजपा ने व्यापारियों के साध कंधे से कंधा मिलाकर इस कानून को खत्म करने आंदोलन किया और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सुझाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस कानून में महत्वपूर्ण संशोधन किए थे। आश्चर्य का विषय तो यह है कि जिस कानून को अटल सरकार ने खत्म किया है आज उसी के पार्टी के एक मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने पुन: उसी कानून को लागू करने का सुझाव ही नहीं दिया है बल्कि एक कदम आगे बढ़कर यह सुझाव भी दिया है कि यह संज्ञेय व गैरजमानती हो!
डा. रमन सिंह के इस सुझाव पर व्यापारियों में जबरदस्त आक्रोश है। रामसागर पारा स्थित अनाज व्यापारी जयकृष्ण अग्रवाल ने कहा कि यह तो भाजपा की वादा खिलाफी है। सत्ता में नहीं थे तब तक वे इसका विरोध करते रहे हैं और आज सत्ता पाते ही व्यापारियों का गला घोंटने तैयार है। इसी तरह की बात मुकेश, राजेश ने भी कही। व्यापारियों ने कहा कि इस मामले का जमकर विरोध किया जाएगा। वहीं कुछ व्यापारियों ने छत्तीसगढ़ चेम्बर की बैठक में इस मामले में निर्णय लेने की बात कही।
इधर चेम्बर के नेताओं से जब इस बारे में चर्चा करनी चाही तो उन्होंने इस तरह के कानून का विरोध करने की बात कहते हुए बात टाल दी कि इसके विरोध की रुपरेखा चेम्बर की बैठक में होगी। बहरहाल डा. रमन सिंह के इस सुझाव को लेकर व्यापारी समाज खासकर अनाज वालों में जबरदस्त आक्रोश है और वे चेम्बर पर इसके खिलाफ आंदोलन करने का दबाव बना सकते हैं। इस मामले में पार्टी के मंत्रियों से भी चर्चा चलने की खबर है।
रविवार, 12 सितंबर 2010
पहले सुविधा दो तब टैक्स लो...
छत्तीसगढ क़ी राजधानी रायपुर ही नहीं देश के विभिन्न क्षेत्रों में यह आम बात है कि नगर निगम के द्वारा जल कर मल टैक्स लिया जाता है। सफाई-बिजली टैक्स भी निगम द्वारा लिया जाता है। यह टैक्स उन तमाम लोगों से भी वसूला जाता है जिन्हें निगम पानी की सुविधा नहीं देती। यमूमन यह खबर तो आए दिन पढ़ने को मिल ही जाता है कि बजबजाती नालियों से लोग परेशान है। सफाई व्यवस्था का बुरा हाल है, पीने की पानी की सप्लाई ठीक से नहीं किया जा रहा है, स्ट्रीट लाईटें हफ्तों तो कहीं-कहीं महीनों नहीं जलती लेकिन नगर निगम या पालिका आम लोगों से बराबर टैक्स वसूलती है।
यह सरकार द्वारा बनाया नियम है कि शहर या कस्बों में रहने वालों को पानी-बिजली-सफाई का टैक्स देना ही होगा भले ही निगम उन्हें यह सुविधा दे या न दें? यह कौन सी व्यवस्था है? क्या निगम कर्मचारियों को वेतन समय पर मिले सिर्फ इसलिए वे लोग भी टैक्स दें जिन्हें इन सुविधाओं के अभाव में भोगना पड़ रहा है? आम आदमी कुछ नहीं कहता वह सरकार से लड़ भी नहीं सकता? उसे अपनी बातें कहने का हक तक नहीं है हमने स्वयं कितनी बार इस व्यवस्था के खिलाफ बहुत कुछ कहा है कि यह व्यवस्था नहीं अव्यवस्था है। बगैर सुविधा दिए टैक्स वसूलना सरकारी ्अत्याचार नहीं तो और क्या है?
ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ म्यूनिसिपल कार्पोरेशनों में हो रहा या सिर्फ छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लोगों के साथ ही अत्याचार हो रहा है। यह अमूमन पूरे देश में चल रहा है। कानून बनाने वाले नेताओं और सरकारी नुमाइंदों को अपनी सुविधा में कटौती बर्दाश्त नहीं है इसलिए वह इस तरह का कानून बनाती है जिससे कम सुविधा देकर अधिकाधिक टैक्स वसूल सकें। क्या इस मसले पर किसी सामाजिक संस्थाओं ने आवाज उठाया है? नहीं? वैसे भी अब सामाजिक संस्थाएं नाम की रह गई है। सरकारी ग्रांट के लिए जीभ लपलपाते सामाजिक संस्थाओं का काम थोड़ा कर यादा प्रचारित करने की छवि बन चुकी है। यादातर सामाजिक संस्थाएं साल में कुछ गरीब बच्चों को ड्रेस, कापी, किताब और बृक्षारोपण तक सिमट कर रह गए हैं।
सरकारी अत्याचार के प्रति किसी सामाजिक संस्था में आवाज उठाने की हिम्मत नहीं रह गई है और न ही जनप्रतिनिधि चुने गए पार्षद ही आवाज उठाने की हिम्मत करता है कि उसके वार्ड के वही लोग पानी का टैक्स देंगे जिन्हें सुविधा मिल रही है। पार्षद क्यों ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं करते कि उनके वार्ड में जिन्हें सुविधा दी जा रही है वे ही टैक्स देंगे? अब तो सांसद-विधायक के बाद पार्षदों को भी वेतन न सही भरपूर मानदेय मिल रहा है भट्ठी से लेकर सटोरियों और टेंकर से लेकर सफाई कर्मियों की हाजिरी लगाने में भी भरपूर पैसा मिलता है ठेकेदारी जम जाए तो सोने में सुहागा है। बगैर सुविधा दिए टैक्स वसूली के बाद भी अधिकांश म्यूनिसिपल कार्पोरेशन की हालत जर्जर है तो इसकी वजह अव्यवस्था के अलावा कुछ नहीं है। अपनी सुविधा के लिए हाय तौबा मचाने और भ्रष्टाचार में गले तक डूबने की वजह से निगमों की हालत खराब है। निगम की आय बढ़ाने के उपाय पर किसी का ध्यान नहीं है। कैसे स्वयं के लिए वसूली हो इसका ध्यान अधिक है। हमारी लड़ाई इस तरह की अव्यवस्था के खिलाफ जारी रहेगी।
यह सरकार द्वारा बनाया नियम है कि शहर या कस्बों में रहने वालों को पानी-बिजली-सफाई का टैक्स देना ही होगा भले ही निगम उन्हें यह सुविधा दे या न दें? यह कौन सी व्यवस्था है? क्या निगम कर्मचारियों को वेतन समय पर मिले सिर्फ इसलिए वे लोग भी टैक्स दें जिन्हें इन सुविधाओं के अभाव में भोगना पड़ रहा है? आम आदमी कुछ नहीं कहता वह सरकार से लड़ भी नहीं सकता? उसे अपनी बातें कहने का हक तक नहीं है हमने स्वयं कितनी बार इस व्यवस्था के खिलाफ बहुत कुछ कहा है कि यह व्यवस्था नहीं अव्यवस्था है। बगैर सुविधा दिए टैक्स वसूलना सरकारी ्अत्याचार नहीं तो और क्या है?
ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ म्यूनिसिपल कार्पोरेशनों में हो रहा या सिर्फ छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लोगों के साथ ही अत्याचार हो रहा है। यह अमूमन पूरे देश में चल रहा है। कानून बनाने वाले नेताओं और सरकारी नुमाइंदों को अपनी सुविधा में कटौती बर्दाश्त नहीं है इसलिए वह इस तरह का कानून बनाती है जिससे कम सुविधा देकर अधिकाधिक टैक्स वसूल सकें। क्या इस मसले पर किसी सामाजिक संस्थाओं ने आवाज उठाया है? नहीं? वैसे भी अब सामाजिक संस्थाएं नाम की रह गई है। सरकारी ग्रांट के लिए जीभ लपलपाते सामाजिक संस्थाओं का काम थोड़ा कर यादा प्रचारित करने की छवि बन चुकी है। यादातर सामाजिक संस्थाएं साल में कुछ गरीब बच्चों को ड्रेस, कापी, किताब और बृक्षारोपण तक सिमट कर रह गए हैं।
सरकारी अत्याचार के प्रति किसी सामाजिक संस्था में आवाज उठाने की हिम्मत नहीं रह गई है और न ही जनप्रतिनिधि चुने गए पार्षद ही आवाज उठाने की हिम्मत करता है कि उसके वार्ड के वही लोग पानी का टैक्स देंगे जिन्हें सुविधा मिल रही है। पार्षद क्यों ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं करते कि उनके वार्ड में जिन्हें सुविधा दी जा रही है वे ही टैक्स देंगे? अब तो सांसद-विधायक के बाद पार्षदों को भी वेतन न सही भरपूर मानदेय मिल रहा है भट्ठी से लेकर सटोरियों और टेंकर से लेकर सफाई कर्मियों की हाजिरी लगाने में भी भरपूर पैसा मिलता है ठेकेदारी जम जाए तो सोने में सुहागा है। बगैर सुविधा दिए टैक्स वसूली के बाद भी अधिकांश म्यूनिसिपल कार्पोरेशन की हालत जर्जर है तो इसकी वजह अव्यवस्था के अलावा कुछ नहीं है। अपनी सुविधा के लिए हाय तौबा मचाने और भ्रष्टाचार में गले तक डूबने की वजह से निगमों की हालत खराब है। निगम की आय बढ़ाने के उपाय पर किसी का ध्यान नहीं है। कैसे स्वयं के लिए वसूली हो इसका ध्यान अधिक है। हमारी लड़ाई इस तरह की अव्यवस्था के खिलाफ जारी रहेगी।
शनिवार, 11 सितंबर 2010
आदिवासियों को कौन पूछता है...
छत्तीसगढ़ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी कहने को तो प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम में आए थे और वे यहां रमन सिंह के चक्रव्यूह में उलझकर रह गए। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच से आदिवासी नेता विधायक सांसद तो छोड़ मंत्रियों तक को गायब कर दिया गया था।
नीतिन गडकरी के माना आगमन से लेकर उनकी रवानगी पर गौर करें तो आदिवासी नेताओं को कार्यक्रम से दूर रखा गया था। माना विमानतल में तो मंच पर आदिवासी नेताओं को बुलाया ही नहीं गया। भाजपा में आदिवासियों की पूछ परख की वकालत करने वाले सांसद नंदकुमार साय स्वयं अपमानित हुए। हालत यह रही कि यहां ननकीराम कंवर भी मौजूद थे। सभी सिर झुकाकर अपने अपमान को देख रहे थे। प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक पैकरा की स्थिति भी क्या थी किसी से छिपा नहीं रहा मंच पर बैठाकर अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। वह तो गनीमत है कि कार्यकर्ता सम्मेलन में बोलने का अवसर श्री पैकरा को मिल गया। एकात्म परिसर में तो जानबूझकर अपमान करने की रणनीति बनाने वैसी स्थिति रही। कई बार सांसद चुने जाने वाले रमेश बैस, नंदकुमार साय और विष्णुदेव साय नीचे बैठने मजबूर रहे और सरोज पाण्डे जैसे लोग मंचस्थ रहे। शायद यही वजह रही होगी कि बलिराम व जूदेव जैसे लोगों ने कार्यक्रम से दूरी बना ली। शायद रमन को आदिवासी एक्सप्रेस से डर है इसलिए भी नीतिन गडकरी से दूर रखा गया। ऐसे में जब भटगांव-बालोद में उपचुनाव है आदिवासी क्या सोंचेगे कहा नहीं जा सकता।
नीतिन गडकरी के माना आगमन से लेकर उनकी रवानगी पर गौर करें तो आदिवासी नेताओं को कार्यक्रम से दूर रखा गया था। माना विमानतल में तो मंच पर आदिवासी नेताओं को बुलाया ही नहीं गया। भाजपा में आदिवासियों की पूछ परख की वकालत करने वाले सांसद नंदकुमार साय स्वयं अपमानित हुए। हालत यह रही कि यहां ननकीराम कंवर भी मौजूद थे। सभी सिर झुकाकर अपने अपमान को देख रहे थे। प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक पैकरा की स्थिति भी क्या थी किसी से छिपा नहीं रहा मंच पर बैठाकर अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। वह तो गनीमत है कि कार्यकर्ता सम्मेलन में बोलने का अवसर श्री पैकरा को मिल गया। एकात्म परिसर में तो जानबूझकर अपमान करने की रणनीति बनाने वैसी स्थिति रही। कई बार सांसद चुने जाने वाले रमेश बैस, नंदकुमार साय और विष्णुदेव साय नीचे बैठने मजबूर रहे और सरोज पाण्डे जैसे लोग मंचस्थ रहे। शायद यही वजह रही होगी कि बलिराम व जूदेव जैसे लोगों ने कार्यक्रम से दूरी बना ली। शायद रमन को आदिवासी एक्सप्रेस से डर है इसलिए भी नीतिन गडकरी से दूर रखा गया। ऐसे में जब भटगांव-बालोद में उपचुनाव है आदिवासी क्या सोंचेगे कहा नहीं जा सकता।
गडकरी की रवानगी की खुशी
छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी की रवानगी पर बेहद खुश है। खुशी इसलिए नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष ने सरकार को ताज पहनाया। खुशी इस बात की ज्यादा रही कि इस बार सरकार की शिकायत करने वालों को किनारे किया गया। यह अलग बात है कि सरकार के कारनामों से नाराज लोगों ने यह सोचकर चुप्पी ओढ़ ली कि शिकायतों से कुछ होता तो है नहीं उल्टे उन्हें ही फटकार मिलती है।
नीतिन गडकरी का दो दिनी प्रवास से पूरी रमन सरकार मानसिक ही नहीं शारीरिक रुप से थक गई थी। स्वागत, जी हुजूरी, चापलूसी से लेकर नाराज लोगों को दूर रखने के तिकड़म के अलावा धक्का मुक्की गाली गलौज और मारपीट ने सरकार को पूरी तरह थका दिया था। आम कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष से दूर रखा था सो उन्हें भी खुश करना था। इसलिए सरकार की तरफ से किसी ने पांच सितारा संस्कृति के आर के मॉल को बुक कर दिया। लजीज खाना खाओ और फिल्म देखो। कार्यकर्ताओं को और क्या चाहिए सारे गिले शिकवे खाना और फिल्म ने निकाल दी। बचा खुचा गुस्सा रमन व उनके मंत्रियों के साथ बैठते ही फुर्र हो गया।
अब यह अलग बात है कि डॉ. रमन के पास पीपली लाईव पूरी देखने का समय नहीं रहा या बृजमोहन अग्रवाल को केवल औपचारिकता निभानी हो। बड़े लोग है कार्यकर्ताओं को आधा घंटा से ज्यादा समय कैसे दे सकते है। भले ही गडकरी के खुशामद में दो दिन गुजर जाए। बहरहाल थकान दूर करने के बहाने आम लोगों की नाराजगी दूर करने का यह फार्मूला कारगर है क्योंकि साथ खाना खाने व फिल्म देखने का मायाजाल काम कर गया।
नीतिन गडकरी का दो दिनी प्रवास से पूरी रमन सरकार मानसिक ही नहीं शारीरिक रुप से थक गई थी। स्वागत, जी हुजूरी, चापलूसी से लेकर नाराज लोगों को दूर रखने के तिकड़म के अलावा धक्का मुक्की गाली गलौज और मारपीट ने सरकार को पूरी तरह थका दिया था। आम कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष से दूर रखा था सो उन्हें भी खुश करना था। इसलिए सरकार की तरफ से किसी ने पांच सितारा संस्कृति के आर के मॉल को बुक कर दिया। लजीज खाना खाओ और फिल्म देखो। कार्यकर्ताओं को और क्या चाहिए सारे गिले शिकवे खाना और फिल्म ने निकाल दी। बचा खुचा गुस्सा रमन व उनके मंत्रियों के साथ बैठते ही फुर्र हो गया।
अब यह अलग बात है कि डॉ. रमन के पास पीपली लाईव पूरी देखने का समय नहीं रहा या बृजमोहन अग्रवाल को केवल औपचारिकता निभानी हो। बड़े लोग है कार्यकर्ताओं को आधा घंटा से ज्यादा समय कैसे दे सकते है। भले ही गडकरी के खुशामद में दो दिन गुजर जाए। बहरहाल थकान दूर करने के बहाने आम लोगों की नाराजगी दूर करने का यह फार्मूला कारगर है क्योंकि साथ खाना खाने व फिल्म देखने का मायाजाल काम कर गया।
राम सप्ताह का आयोजन
रायपुर। बीरगांव नगर पंचायत अध्यक्ष पतिराम साहू के मुख्य आतिथ्य में पिछले दिनों बंजारी नगर भाठागांव में राम सप्ताह का आयोजन हुआ। शिव मंदिर सोम कोल्ड के सामने हुए आयोजन में रावाभांठा सहित आसपास के लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। निर्मला वर्मा, उत्तरा ध्रुव, हेमलता वर्मा, शकुन्तला वर्मा के नेतृत्व में भक्तों का उत्साह देखते ही बनता था। कार्यक्रम में मुख्य रुप से दुर्गा वर्मा, सरस्वती वर्मा, जानकी वर्मा, लता वर्मा, लक्ष्मी लिलहरे, गीता जैन, दिनेश्वरी वर्मा, देवकुंवर साहू, परमिला वर्मा, रमौतिन विश्वकर्मा, रुखमणी विश्वकर्मा, शिवकुमारी निषाद, माया देवी मेश्राम, राहि निषाद, उषा ध्रुव, राजकुमारी वर्मा, देवकी वर्मा, राधा ध्रुव, विनिता वैष्णव, रत्ना वर्मा, कांति निषाद, इन्द्रा साहू, चन्द्रिका यादव, सुमिता देवांगन, उमा वर्मा, दीपा साहू, जगन्नाथ विश्वकर्मा आदि शामिल हुए।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

