शंकर नगर के इस दलाल का संबंध राजा महाराजाओं के अलावा भाजपा के नगर मंत्री से है। कांग्रेस की बुराई में माहिर इस दलाल को बड़े नेता भी अपने बगल में बिठाते हैं ताकि काम चलता रहे।
ऐसे ही कई दलालों की चर्चा कांग्रेस में आम रुप से सुनी जा सकती है। टिकरापारा क्षेत्र के एक दलाल की सांसद व नगर मंत्री से सेटिंग की बात हो या ब्राम्हणपारा के कुछ कांग्रेसियों की नगर मंत्री से सेटिंग की बात आम है। समता कालोनी के पास के वीसी के करीबी रहे अब जोगी के करीबी एक नेता की भी भूमिका सभापति चुनाव में दलाली की रही है। जबकि सुंदरनगर के शराब खोर पदाधिकारी का तो नाम ही दलाल रख दिया गया है। जबकि इसके खास फाफाडीह वाले को तो दलाल का दलाल कहा जाता है।
राजधानी के बाहर के भी कई नेताओं को दलाल के नाम से संबोधित किया जाता है। जबकि कई विधायक की भाजपाईयों से सेटिंग की चर्चा आम है। ऐसे में कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष वीसी-जोगी जैसा दमदार नहीं होगा तो स्थिति विकराल हो सकती है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
पार्टी में दलाल, कांग्रेस हुई हलाल
भाजपा नेताओं से संबंध, गुटबाजी
चरम पर, पैसा कमाना उद्देश्य
कमजोर नेतृत्व गुटबाजी और पार्टी में दलालों की सक्रियता ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को बदतर स्थिति में ला खड़ा किया है। हालत यह है कि कांग्रेस के नेताओं को भाजपा नेताओं के हार में दो-पांच हजार के चक्कर में लाईन लगाते देखा जा सकता है। अनुशासन का डर खत्म हो चुका है और संगठन में भाजपा की दलाली करने वालों का बोलबाला है?
छत्तीसगढ़ में इन दिनों नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कवायद चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा, किस गुट का होगा इसे लेकर सवाल चर्चा में है। छत्तीसगढ़ में मुख्यत: विद्याचरण शुक्ल, अजीत जोगी और मोतीलाल वोरा जैसे लोग गुटबाजी को हवा देने में लगे है। जिसकी वजह से आम कार्यकर्ताओं में आक्रोश है और वे चौक चौराहों में इन नेताओं की बुराई करते देखे जा सकते हैं।
वास्तव में देखा जाए तो कार्यकर्ताओं की फौज और जमीनी ताकत सिर्फ विद्याचरण और अजीत जोगी के पास है जबकि मोतीलाल वोरा के साथ जुडऩे की वजह उनका हाईकमान के साथ सिर्फ संबंध होना है? और पार्टी का छत्तीसगढ़ में बदतर स्थिति के लिए इस गुट का ही सबसे बड़ा हाथ है। हाईकमान से संबंधों के चलते जानबूझकर ऐसे लोगों को प्रदेश का नेतृत्व दिया गया जिनकी औकात अपने विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र तक ही रही और इन अध्यक्षों ने अपनी कुर्सी बचाने भाजपा के साथ मिलकर दलाली ज्यादा की है।
दूसरी ओर अजीत जोगी और विद्याचरण शुक्ल के साथ भी ऐसे लोग जुड़ते चले गए हैं जिनका काम सिर्फ व्यापार करना है ऐसे लोगों ने अपने नेताओं को भाजपा के खिलाफ यह कहकर नहीं खड़ा होने दिया कि इससे वोरा गुट मजबूत होगा? लगातार सत्ता से दूर रहने की वजह से कांग्रेस में बेचैनी तो है लेकिन सत्ता से मिल रहे फायदे ने इन्हें संघर्ष करने से रोका। सर्वाधिक बुरी स्थिति राजधानी व आदिवासी क्षेत्रों की है। सरकार की मनमानी के खिलाफ उतना ही बोला गया जितने में पैसा मिल सके? इस स्थिति के चलते आम कार्यकर्ताओं में भी यह चर्चा होने लगी है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भाजपा से सेटिंग कर ली है जबकि विधायकों व संगठन के पदाधिकारियों पर बिक जाने का आरोप लगाया जा रहा है।
टिकिट वितरण से लेकर पद देने में जिस तरह से खरीदी बिक्री के आरोप लग रहे हैं उसकी वजह से भी कांग्रेस की स्थिति बदतर होते जा रही है। ऐसे में नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर जिस तरह से बड़े नेताओं में रूचि और आम कार्यकर्ताओं में बेरुखी देखी जा रही है इससे भी कांग्रेस की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। दरअसल जोगी वर्सेस ऑल की राजनीति ने कांग्रेस को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है और भाजपा की दलाली में भी जोगी विरोधी गुट के लोग ही अधिक नजर आते हैं। इस स्थिति में यदि प्रदेश अध्यक्ष किसी दमदार नेता को नहीं बनाया गया तो एक बार फिर कांग्रेस हाशिये में चली जाएगी। वैसे कांग्रेस के हित में विद्याचरण शुक्ल या अजीत जोगी को ही प्रदेशाध्यक्ष बना दिए जाने की मांग निष्ठावान कांग्रेसी कर रहे है लेकिन वोरा गुट कभी नहीं चाहेगा कि उसके लोगों की दलाली बंद हो और प्रदेश से उसकी जमीन खिसके।
बहरहाल कांग्रेस में सक्रिय दलालों ने कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ा है हालत यह है कि इन दलालों को लेकर आम लोगों में चर्चा है लेकिन बड़े नेताओं को भी ये दलाल ज्यादा पसंद आते हैं?
चरम पर, पैसा कमाना उद्देश्य
कमजोर नेतृत्व गुटबाजी और पार्टी में दलालों की सक्रियता ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को बदतर स्थिति में ला खड़ा किया है। हालत यह है कि कांग्रेस के नेताओं को भाजपा नेताओं के हार में दो-पांच हजार के चक्कर में लाईन लगाते देखा जा सकता है। अनुशासन का डर खत्म हो चुका है और संगठन में भाजपा की दलाली करने वालों का बोलबाला है?
छत्तीसगढ़ में इन दिनों नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कवायद चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा, किस गुट का होगा इसे लेकर सवाल चर्चा में है। छत्तीसगढ़ में मुख्यत: विद्याचरण शुक्ल, अजीत जोगी और मोतीलाल वोरा जैसे लोग गुटबाजी को हवा देने में लगे है। जिसकी वजह से आम कार्यकर्ताओं में आक्रोश है और वे चौक चौराहों में इन नेताओं की बुराई करते देखे जा सकते हैं।
वास्तव में देखा जाए तो कार्यकर्ताओं की फौज और जमीनी ताकत सिर्फ विद्याचरण और अजीत जोगी के पास है जबकि मोतीलाल वोरा के साथ जुडऩे की वजह उनका हाईकमान के साथ सिर्फ संबंध होना है? और पार्टी का छत्तीसगढ़ में बदतर स्थिति के लिए इस गुट का ही सबसे बड़ा हाथ है। हाईकमान से संबंधों के चलते जानबूझकर ऐसे लोगों को प्रदेश का नेतृत्व दिया गया जिनकी औकात अपने विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र तक ही रही और इन अध्यक्षों ने अपनी कुर्सी बचाने भाजपा के साथ मिलकर दलाली ज्यादा की है।
दूसरी ओर अजीत जोगी और विद्याचरण शुक्ल के साथ भी ऐसे लोग जुड़ते चले गए हैं जिनका काम सिर्फ व्यापार करना है ऐसे लोगों ने अपने नेताओं को भाजपा के खिलाफ यह कहकर नहीं खड़ा होने दिया कि इससे वोरा गुट मजबूत होगा? लगातार सत्ता से दूर रहने की वजह से कांग्रेस में बेचैनी तो है लेकिन सत्ता से मिल रहे फायदे ने इन्हें संघर्ष करने से रोका। सर्वाधिक बुरी स्थिति राजधानी व आदिवासी क्षेत्रों की है। सरकार की मनमानी के खिलाफ उतना ही बोला गया जितने में पैसा मिल सके? इस स्थिति के चलते आम कार्यकर्ताओं में भी यह चर्चा होने लगी है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भाजपा से सेटिंग कर ली है जबकि विधायकों व संगठन के पदाधिकारियों पर बिक जाने का आरोप लगाया जा रहा है।
टिकिट वितरण से लेकर पद देने में जिस तरह से खरीदी बिक्री के आरोप लग रहे हैं उसकी वजह से भी कांग्रेस की स्थिति बदतर होते जा रही है। ऐसे में नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर जिस तरह से बड़े नेताओं में रूचि और आम कार्यकर्ताओं में बेरुखी देखी जा रही है इससे भी कांग्रेस की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। दरअसल जोगी वर्सेस ऑल की राजनीति ने कांग्रेस को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है और भाजपा की दलाली में भी जोगी विरोधी गुट के लोग ही अधिक नजर आते हैं। इस स्थिति में यदि प्रदेश अध्यक्ष किसी दमदार नेता को नहीं बनाया गया तो एक बार फिर कांग्रेस हाशिये में चली जाएगी। वैसे कांग्रेस के हित में विद्याचरण शुक्ल या अजीत जोगी को ही प्रदेशाध्यक्ष बना दिए जाने की मांग निष्ठावान कांग्रेसी कर रहे है लेकिन वोरा गुट कभी नहीं चाहेगा कि उसके लोगों की दलाली बंद हो और प्रदेश से उसकी जमीन खिसके।
बहरहाल कांग्रेस में सक्रिय दलालों ने कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ा है हालत यह है कि इन दलालों को लेकर आम लोगों में चर्चा है लेकिन बड़े नेताओं को भी ये दलाल ज्यादा पसंद आते हैं?
लेबल:
अजीत जोगी,
कांग्रेस,
मोतीलाल वोरा,
विद्याचरण शुक्ल
रविवार, 17 अक्टूबर 2010
विवादास्पद सिंह साहब भी मोहन के बंगले में...
अजय को डुबाया अब...!
छत्तीसगढ़ के दमदार माने जाने वाले पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का विवादों से पुराना नाता है इन दिनों उनके बंगले में आर.एन. सिंह का दबदबा है और कभी इनका दबदबा अजय चंद्राकर के बंगले में रहा है। पीएसी में चयन को लेकर विवाद में रहे आर.एन. सिंह इन दिनों अपने दबदबे से सुर्खियों में हैं।
छत्तीसगढ़ में वैसे तो अफसरराज ही नहीं चल रहा है बल्कि दागी और विवादास्पद छवि के लोगों को सरकार द्वारा प्रश्रय भी दिया जा रहा है। दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग में सर्वाधिक दागी और विवादास्पद अधिकारियों का जमावड़ा है। दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी डा.एच. आर. शर्मा, श्रीमती आर.बाम्बरा, मैडम तवारिस, अजय श्रीवास्तव, एमजी श्रीवास्तव, सुब्रत साहू, एम.के. राउत के अलावा अब मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बंगले में पदस्थ आर.एन. सिंह का नाम भी विवादास्पद अधिकारियों में जुड़ गया है।
कहा जाता है कि जिन अधिकारियों को उनकी करतूतों के कारण बर्खास्त कर देना चाहिए उन लोगों को सरकार द्वारा प्रश्रय दिया जा रहा है। बताया जाता है कि पीएससी में चयन के दौरान आर.एन. सिंह भी सुर्खियों में रहे हैं। दरअसल सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी मिली है उसके तहत यह बात स्पष्ट होने लगा है कि आर.एन. शर्मा का चयन न केवल गलत ढंग से हुआ है बल्कि वे चयन के पात्र ही नहीं थे। सूत्रों के मुताबिक पीएससी चयन में लिे गए साक्षात्कार में आरएन शर्मा को आठवां स्थान मिला था और जब मेरिट बनी तो वे तीसरे नम्बर पर पहुंच गए। यह गोलमाल कहा और केसे हुआ यह जांच का विषय है। लेकिन कहा जाता है कि तब तत्कालीन मंत्री अजय चंद्राकर के बंगले में आर.एन. शर्मा को पदस्थ किया गया।
बताया जाता है कि अजय चंद्राकर को अपनी करतूत के कारण विधानसभा में हार का मुंह देखना पड़ा तब आर.एन. सिंह के लिए बृजमोहन अग्रवाल का दरबार सज गया। सूत्रों की माने तो श्री सिंह को बृजमोहन अग्रवाल के बंगले में पदस्थ करने में अजय चंद्राकर ने ही सिफारिश की थी। इधर आर.एन. सिंह के चयन को लेकर जब सवाल उठने लगे तो एक बार फिर मामले की लीपापोती की जा रही है। बताया जाता है कि इन दिनों मंत्री के बंगले में उनके व्यवहार को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी है और इसकी शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होने से मोहन समर्थक ही गड़े-मुर्दे उखाड़ने में लगे हैं। बहरहाल दागी और विवादास्पद अधिकारियों के जमावड़े ने एक बार फिर दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सुर्खियों में ला दिया है।
छत्तीसगढ़ के दमदार माने जाने वाले पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का विवादों से पुराना नाता है इन दिनों उनके बंगले में आर.एन. सिंह का दबदबा है और कभी इनका दबदबा अजय चंद्राकर के बंगले में रहा है। पीएसी में चयन को लेकर विवाद में रहे आर.एन. सिंह इन दिनों अपने दबदबे से सुर्खियों में हैं।
छत्तीसगढ़ में वैसे तो अफसरराज ही नहीं चल रहा है बल्कि दागी और विवादास्पद छवि के लोगों को सरकार द्वारा प्रश्रय भी दिया जा रहा है। दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग में सर्वाधिक दागी और विवादास्पद अधिकारियों का जमावड़ा है। दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी डा.एच. आर. शर्मा, श्रीमती आर.बाम्बरा, मैडम तवारिस, अजय श्रीवास्तव, एमजी श्रीवास्तव, सुब्रत साहू, एम.के. राउत के अलावा अब मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बंगले में पदस्थ आर.एन. सिंह का नाम भी विवादास्पद अधिकारियों में जुड़ गया है।
कहा जाता है कि जिन अधिकारियों को उनकी करतूतों के कारण बर्खास्त कर देना चाहिए उन लोगों को सरकार द्वारा प्रश्रय दिया जा रहा है। बताया जाता है कि पीएससी में चयन के दौरान आर.एन. सिंह भी सुर्खियों में रहे हैं। दरअसल सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी मिली है उसके तहत यह बात स्पष्ट होने लगा है कि आर.एन. शर्मा का चयन न केवल गलत ढंग से हुआ है बल्कि वे चयन के पात्र ही नहीं थे। सूत्रों के मुताबिक पीएससी चयन में लिे गए साक्षात्कार में आरएन शर्मा को आठवां स्थान मिला था और जब मेरिट बनी तो वे तीसरे नम्बर पर पहुंच गए। यह गोलमाल कहा और केसे हुआ यह जांच का विषय है। लेकिन कहा जाता है कि तब तत्कालीन मंत्री अजय चंद्राकर के बंगले में आर.एन. शर्मा को पदस्थ किया गया।
बताया जाता है कि अजय चंद्राकर को अपनी करतूत के कारण विधानसभा में हार का मुंह देखना पड़ा तब आर.एन. सिंह के लिए बृजमोहन अग्रवाल का दरबार सज गया। सूत्रों की माने तो श्री सिंह को बृजमोहन अग्रवाल के बंगले में पदस्थ करने में अजय चंद्राकर ने ही सिफारिश की थी। इधर आर.एन. सिंह के चयन को लेकर जब सवाल उठने लगे तो एक बार फिर मामले की लीपापोती की जा रही है। बताया जाता है कि इन दिनों मंत्री के बंगले में उनके व्यवहार को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी है और इसकी शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होने से मोहन समर्थक ही गड़े-मुर्दे उखाड़ने में लगे हैं। बहरहाल दागी और विवादास्पद अधिकारियों के जमावड़े ने एक बार फिर दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सुर्खियों में ला दिया है।
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
विवादास्पद आई पी एस विश्वरंजन
0 गृहमंत्री फूटी आंख नहीं भाते?
0 जातिवाद व क्षेत्रियता का आरोप?
0 नक्सली मामले में संदेहास्पद भूमिका?
0 साहित्यिक गतिविधियों पर अवैध वसूली?
छत्तीसगढ़ के डीजीपी यानी विश्वरंजन की विवादास्पद छवि के चलते न केवल सरकार की छवि खराब होने लगी है बल्कि पुलिस में गुटबाजी उभर कर सामने आई है। लगातार विवादों में रहना विश्वरंजन का शगल बन चुका है और अब तो उन्हें कारण बताओं नोटिस पर नोटिस जारी होने लगे हैं।
छत्तीसगढ क़े डीजीपी विश्वरंजन को गृहमंत्री ननकीराम कंवर फूटी आंख नहीं सुहाते खबर सिर्फ इतनी नहीं है। खबर इसके आगे की यह है कि डीजीपी विश्वरंजन पर अब गंभीर आरोप लगने लगे हैं और प्रदेश सरकार ने उन्हें दो मामलों में कारण बताओं नोटिस भी थमा दिया है। दरअसल डीजीपी विश्वरंजन की नियुक्ति के तरीके को लेकर शुरु हुआ विवाद ही प्रदेश सरकार खासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए गले की हड्डी बन चुका है। कभी बस्तर और रायगढ़ में पदस्थ रहे डीजीपी विश्वरंजन को केन्द्र सरकार से विशेष अनुरोध कर यहां लाया गया। यदि विश्वरंजन के आने के बाद अपराध के आंकड़े पर नजर डाले तो हर क्षेत्र में अपराधों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी नजर आएगी। खासकर नक्सली और शहरी क्षेत्रों में लूट की वारदातों ने तो सरकार की नींद उठा दी है।
सर्वाधिक विवाद तो उनके प्रमोद वर्मा स्मृति साहित्यिक गतिविधियों की रही है। कार्यक्रम के लिए दबावपूर्वक वसूली की शिकायतों से तो थानेदार तक परेशान है और राजनांदगांव जिले में विनोद शंकर चौबे की शहादत के दौरान उनकी भूमिका और गतिविधियों को लेकर जबरदस्त विवाद रहा है। प्रदेश सरकार ने इस मामले में बढ़ती शिकायतों पर कितनी गंभीरता दिखाई है यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इस मामले में नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब किया गया है।
सिर्फ यही एक मामला नहीं है इसके अलावा गृहमंत्री ननकीराम कंवर से उनका विवाद भी सुर्खियों में रहा है। गृहमंत्री ने डीजीपी को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी भी कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र कवर्धा में एसपी को निकम्मा व कलेक्टर को दलाल कहने वाले गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने विधानसभा तक में पुलिस की गतिविधियों का भर्त्सना कर चुके हैं। इतना ही नहीं डीजीपी विश्वरंजन पर नक्सली मामले में भूमिका पर भी आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि बस्तर पदस्थापना के दौरान उनके कार्य को लेकर आलोचना भी हुई थी जबकि मुखबिरी व गोपनीय सैनिकों को दी जाने वाली रकमों को लेकर डीजीपी पर कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
इधर पीएचक्यू में चल रहे गुटबाजी का असर भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर हुआ है। कहा जाता है बिहारी-यूपी की क्षेत्रियता वाली गुटबाजी के चलते पुलिस मुख्यालय में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस मामले में गृहमंत्री ननकीराम कंवर से शिकायत के बाद गृहमंत्री द्वारा जांच करवाने का फरमान जारी कर दिया गया है और श्री नवानी को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि डीजीपी विश्वरंजन की गतिविधियों को सरकार को मुंह चिढ़ाने वाला बताया जा रहा है लेकिन कार्रवाई सिर्फ नोटिस व जांच तक ही सिमट गया है। इस संबंध में डीजीपी से जब संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। बहरहाल डीजीपी को नोटिस व उनके खिलाफ जांच के फरमान को लेकर सरकार की चौतरफा किरकिरी हो रही है। जो आने वाले दिनों में विवाद और भी बढ़ने की संभावना है।
0 जातिवाद व क्षेत्रियता का आरोप?
0 नक्सली मामले में संदेहास्पद भूमिका?
0 साहित्यिक गतिविधियों पर अवैध वसूली?
छत्तीसगढ़ के डीजीपी यानी विश्वरंजन की विवादास्पद छवि के चलते न केवल सरकार की छवि खराब होने लगी है बल्कि पुलिस में गुटबाजी उभर कर सामने आई है। लगातार विवादों में रहना विश्वरंजन का शगल बन चुका है और अब तो उन्हें कारण बताओं नोटिस पर नोटिस जारी होने लगे हैं।
छत्तीसगढ क़े डीजीपी विश्वरंजन को गृहमंत्री ननकीराम कंवर फूटी आंख नहीं सुहाते खबर सिर्फ इतनी नहीं है। खबर इसके आगे की यह है कि डीजीपी विश्वरंजन पर अब गंभीर आरोप लगने लगे हैं और प्रदेश सरकार ने उन्हें दो मामलों में कारण बताओं नोटिस भी थमा दिया है। दरअसल डीजीपी विश्वरंजन की नियुक्ति के तरीके को लेकर शुरु हुआ विवाद ही प्रदेश सरकार खासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए गले की हड्डी बन चुका है। कभी बस्तर और रायगढ़ में पदस्थ रहे डीजीपी विश्वरंजन को केन्द्र सरकार से विशेष अनुरोध कर यहां लाया गया। यदि विश्वरंजन के आने के बाद अपराध के आंकड़े पर नजर डाले तो हर क्षेत्र में अपराधों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी नजर आएगी। खासकर नक्सली और शहरी क्षेत्रों में लूट की वारदातों ने तो सरकार की नींद उठा दी है।
सर्वाधिक विवाद तो उनके प्रमोद वर्मा स्मृति साहित्यिक गतिविधियों की रही है। कार्यक्रम के लिए दबावपूर्वक वसूली की शिकायतों से तो थानेदार तक परेशान है और राजनांदगांव जिले में विनोद शंकर चौबे की शहादत के दौरान उनकी भूमिका और गतिविधियों को लेकर जबरदस्त विवाद रहा है। प्रदेश सरकार ने इस मामले में बढ़ती शिकायतों पर कितनी गंभीरता दिखाई है यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इस मामले में नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब किया गया है।
सिर्फ यही एक मामला नहीं है इसके अलावा गृहमंत्री ननकीराम कंवर से उनका विवाद भी सुर्खियों में रहा है। गृहमंत्री ने डीजीपी को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी भी कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र कवर्धा में एसपी को निकम्मा व कलेक्टर को दलाल कहने वाले गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने विधानसभा तक में पुलिस की गतिविधियों का भर्त्सना कर चुके हैं। इतना ही नहीं डीजीपी विश्वरंजन पर नक्सली मामले में भूमिका पर भी आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि बस्तर पदस्थापना के दौरान उनके कार्य को लेकर आलोचना भी हुई थी जबकि मुखबिरी व गोपनीय सैनिकों को दी जाने वाली रकमों को लेकर डीजीपी पर कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
इधर पीएचक्यू में चल रहे गुटबाजी का असर भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर हुआ है। कहा जाता है बिहारी-यूपी की क्षेत्रियता वाली गुटबाजी के चलते पुलिस मुख्यालय में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस मामले में गृहमंत्री ननकीराम कंवर से शिकायत के बाद गृहमंत्री द्वारा जांच करवाने का फरमान जारी कर दिया गया है और श्री नवानी को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि डीजीपी विश्वरंजन की गतिविधियों को सरकार को मुंह चिढ़ाने वाला बताया जा रहा है लेकिन कार्रवाई सिर्फ नोटिस व जांच तक ही सिमट गया है। इस संबंध में डीजीपी से जब संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। बहरहाल डीजीपी को नोटिस व उनके खिलाफ जांच के फरमान को लेकर सरकार की चौतरफा किरकिरी हो रही है। जो आने वाले दिनों में विवाद और भी बढ़ने की संभावना है।
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
सरकारी जमीनों का बंदरबांट अब बंद करो...
जब से रमन सरकार सत्ता में आई है सरकारी जमीनों को बांटने में दस गुणा से यादा तेजी आई है। कभी उद्योगों के नाम पर तो कभी कस्बों या नई राजधानी के विस्तार के नाम पर सरकारी जमीनों को कौड़ियों के मोल हड़पा जा रहा है। यही स्थिति ही तो न चारागान के लिए जमीनें बचेंगी न ही खुली हवा में सांस लेने के लिए ही जमीन बचेंगी। कांक्रीट के जंगल ने पहले ही राजधानी रायपुर के लोगों को गर्मी में रहने मजबूर कर दिया है। ऐसे में सरकार शहर या उद्योगों की बजाय गांवों के विकास न कृषि के विकास पर सिर्फ इसलिए योजना नहीं बनाती क्योंकि इससे आम लोग ख्रुशहाल होंगे और फिर उनके भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति पर अंकुश लग जाएगी।
ताजा मामला राजधानी से लगे ग्राम अछोली का है। यहां श्मशान की जमीन एक उद्योगपति को आबंटित की जा रही है। लोग जब विरोध पर सड़कों तक आएं तब पता चला कि यहां की सरकारी जमीनों पर किस तरह से उद्योगपतियों ने अवैध कब्जा कर रखा है। अवैध कब्जों में निश्चित रुप से पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की सहमति होगी अन्यथा पटवारियों व तहसीलदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती।
अब तो गृह निर्माण मंडल ने भी कस्बों में अपनी योजना को विस्तार करना शुरु कर दिया है और कस्बों की सरकारी जमीनों पर कांक्रीट के जंगल खड़ा किया जाने लगा है। गृह निर्माण मंडल के पदाधिकारी से लेकर इंजीनियरों ने एक साजिश के तहत पैसा कमाने का खेल खेला है। चूंकि निर्माण में भ्रष्टाचार और कमीशन का लंबा चौड़ा खेल है इसलिए शहर से कस्बों तक सरकारी जमीनों को हड़पा जा रहा है। पूरी सरकार इस खेल में शामिल है और छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को साजिश के तहत हड़पा जा रहा है। भाजपा सरकार में ही नहीं कांग्रेस ने भी कमोबेश यही काम किया है। विद्याचरण शुक्ल को अपोलो अस्पताल के लिए दी गई जमीन का क्या हुआ। किसी में हिम्मत है कि पूछा जा सके? और जब विद्याचरण शुक्ल अस्पताल के नाम पर जमीन हड़पने लगे तो फिर भाजपाई क्यों पीछे रहे इसलिए भाजपा नेता गौरीशंकर अग्रवाल के रिश्तेदार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई देवेन्द्र अग्रवाल के साढू डॉ. सुनील खेमका को कौड़ी के मोल सरकारी जमीन देने का कोई कांग्रेसी कैसे विरोध कर सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल पर तो बंगले, प्रेस और पेट्रोल पम्प के नाम पर सरकारी जमीनों को लीज पर लेने का मामला सुर्खियों में रहा है।
अखबारों द्वारा सरकारी जमीनें जब हड़पी जाने लगी तो फिर चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर खेल को कौन रोक सकता है। लीज की जमीनें और उस पर अवैध निर्माण के खेल ने छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को तहस-नहस तो किया ही पर्यावरण को भी अच्छा नुकसान पहुंचाया है। खुली हवा में सांस लेने को दुर्लभ बनाते इन सरकारी योजनाओं पर आम आदमी केवल दुख जाहिर ही कर सकता है। हम सरकारी जमीन के ऐसे किसी भी बंदरबांट के विरोधी है यदि स्वयंसेवी संगठनों को भी ऐसे जमीनें दी जाती है तो वह भी गलत है और राजनैतिक पार्टियों को तो बिल्कुल भी सरकारी जमीनें नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि व्यवसाय का रुप ले चुकी राजनीति ने आम आदमी की बजाय अपने हितों को ही अधिक साधा है।
ताजा मामला राजधानी से लगे ग्राम अछोली का है। यहां श्मशान की जमीन एक उद्योगपति को आबंटित की जा रही है। लोग जब विरोध पर सड़कों तक आएं तब पता चला कि यहां की सरकारी जमीनों पर किस तरह से उद्योगपतियों ने अवैध कब्जा कर रखा है। अवैध कब्जों में निश्चित रुप से पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की सहमति होगी अन्यथा पटवारियों व तहसीलदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती।
अब तो गृह निर्माण मंडल ने भी कस्बों में अपनी योजना को विस्तार करना शुरु कर दिया है और कस्बों की सरकारी जमीनों पर कांक्रीट के जंगल खड़ा किया जाने लगा है। गृह निर्माण मंडल के पदाधिकारी से लेकर इंजीनियरों ने एक साजिश के तहत पैसा कमाने का खेल खेला है। चूंकि निर्माण में भ्रष्टाचार और कमीशन का लंबा चौड़ा खेल है इसलिए शहर से कस्बों तक सरकारी जमीनों को हड़पा जा रहा है। पूरी सरकार इस खेल में शामिल है और छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को साजिश के तहत हड़पा जा रहा है। भाजपा सरकार में ही नहीं कांग्रेस ने भी कमोबेश यही काम किया है। विद्याचरण शुक्ल को अपोलो अस्पताल के लिए दी गई जमीन का क्या हुआ। किसी में हिम्मत है कि पूछा जा सके? और जब विद्याचरण शुक्ल अस्पताल के नाम पर जमीन हड़पने लगे तो फिर भाजपाई क्यों पीछे रहे इसलिए भाजपा नेता गौरीशंकर अग्रवाल के रिश्तेदार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई देवेन्द्र अग्रवाल के साढू डॉ. सुनील खेमका को कौड़ी के मोल सरकारी जमीन देने का कोई कांग्रेसी कैसे विरोध कर सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल पर तो बंगले, प्रेस और पेट्रोल पम्प के नाम पर सरकारी जमीनों को लीज पर लेने का मामला सुर्खियों में रहा है।
अखबारों द्वारा सरकारी जमीनें जब हड़पी जाने लगी तो फिर चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर खेल को कौन रोक सकता है। लीज की जमीनें और उस पर अवैध निर्माण के खेल ने छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को तहस-नहस तो किया ही पर्यावरण को भी अच्छा नुकसान पहुंचाया है। खुली हवा में सांस लेने को दुर्लभ बनाते इन सरकारी योजनाओं पर आम आदमी केवल दुख जाहिर ही कर सकता है। हम सरकारी जमीन के ऐसे किसी भी बंदरबांट के विरोधी है यदि स्वयंसेवी संगठनों को भी ऐसे जमीनें दी जाती है तो वह भी गलत है और राजनैतिक पार्टियों को तो बिल्कुल भी सरकारी जमीनें नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि व्यवसाय का रुप ले चुकी राजनीति ने आम आदमी की बजाय अपने हितों को ही अधिक साधा है।
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
शिक्षा पर सवाल मोबाइल का कमाल
छत्तीसगढ़ में इन दिनों अपराध के ग्राफ में तेजी आई है। अनाप-शनाप पैसे कमाने की धुन ने जीवन स्तर को विवादित बना दिया है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है और शिक्षा के सफल उद्योग के रुप में विकसित होने लगा है जहां पढ़ाई के अलावा झूठे-फरेब-छल और मौज-मस्ती अधिक होने लगी है। सरकार भी इन शिक्षण संस्थाओं पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। सर्वाधिक दुखद स्थिति पेट काटकर अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाले पालकों की है। स्कूल फीस से लेकर बस और अन्य कार्यक्रमों में होने वाले खर्च ने पालकों की चिंता बढ़ा दी है और अभाव में अच्छी संस्थाओं में पढ़ने वाले मध्यम वर्ग के बच्चों में अपराध पनपते जा रहा है।
महंगी चाकलेट, मॉल और मोबाईल ने इस मध्यम वर्गीय बच्चों को एक नए अपराध में ढकेल दिया है जिसकी भयावकता की कल्पना से ही शरीर सिंहर जाता है। मेरे परिचित की एक बिटिया 11वीं कक्षा में एक नामी शिक्षा के लिए नामी संस्थान में भर्ती किया है। उसे मोबाइल भी दी गई ताकि आने जाने में कहीं दिक्कतें न हो। शुरु में तो सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगा लेकिन जब वह मोबाइल से कुछ अधिक ही बातें करने लगी तो मेरे परिचित ने इसे गंभीरता से लिया सिर्फ 300 से 500 रुपए में इतनी लम्बी बात पर वे विचलित हुए और जब पता लगाया तो उनके पैरों से जमीन खिसक गई पिछले 3-4 माह से उसके मोबाइल में ढाई-तीन हजार का रिचार्ज किया जा रहा था। उसने अपनी बिटिया से पूछा तो वह साफ मुकर गई। क्योंकि यह रिचार्ज उसके कथित फ्रेंड्स करवाते थे। यह स्थिति अमूमन शहर के अधिकांश छात्र-छात्राओं की है। अमीरजादों से दोस्ती और फिर आपस में लेन-देन ने शर्म-हया तक को बेच दिया है। मां-बाप अच्छी शिक्षा के फेर में महंगे संस्थानों में भर्ती कर मोबाइल देकर भूल जाते है और बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं।
इसके लिए शिक्षा पध्दति ही दोषी है मैं यह नहीं कहता कि मां-बाप दोषी नहीं है लेकिन बेहतर शिक्षा को लेकर सरकार के रवैये की अनदेखी बेमानी होगी। हम सिर्फ मां-बाप को दोष देकर इससे मुक्ति नहीं पा सकते। छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही मैं ऐसे दर्जनों छात्र-छात्राओं को जानता हूं जिनके एक से अधिक लोगों से अंतरंग संबंध है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वे अच्छी शिक्षा की व्यवस्था तो करें लेकिन महंगे शिक्षा पर प्रतिबंध लगाए। अन्यथा एक झूठ सौ झूठ बुलवाता है की कहावत की तरह एक अपराध किसी को भी अपराध के दलदल में ले जाने की कहावत तैयार हो जाएगी। मां-बाप भी अपने बच्चों पर नजर रखे। खासकर मोबाइल देने वाले मां-बाप समय-समय पर यह जरूर चेक करे कि रिचार्ज कितने का हो रहा है। क्योंकि झूठ सीखाने वाले इस मंत्र ने आदमी को संस्कार और नैतिकता से परे ढकेल रहा है और इसकी अनदेखी से गंभीर परिणाम आएंगे जो कलंक साबित हो सकते हैं।
महंगी चाकलेट, मॉल और मोबाईल ने इस मध्यम वर्गीय बच्चों को एक नए अपराध में ढकेल दिया है जिसकी भयावकता की कल्पना से ही शरीर सिंहर जाता है। मेरे परिचित की एक बिटिया 11वीं कक्षा में एक नामी शिक्षा के लिए नामी संस्थान में भर्ती किया है। उसे मोबाइल भी दी गई ताकि आने जाने में कहीं दिक्कतें न हो। शुरु में तो सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगा लेकिन जब वह मोबाइल से कुछ अधिक ही बातें करने लगी तो मेरे परिचित ने इसे गंभीरता से लिया सिर्फ 300 से 500 रुपए में इतनी लम्बी बात पर वे विचलित हुए और जब पता लगाया तो उनके पैरों से जमीन खिसक गई पिछले 3-4 माह से उसके मोबाइल में ढाई-तीन हजार का रिचार्ज किया जा रहा था। उसने अपनी बिटिया से पूछा तो वह साफ मुकर गई। क्योंकि यह रिचार्ज उसके कथित फ्रेंड्स करवाते थे। यह स्थिति अमूमन शहर के अधिकांश छात्र-छात्राओं की है। अमीरजादों से दोस्ती और फिर आपस में लेन-देन ने शर्म-हया तक को बेच दिया है। मां-बाप अच्छी शिक्षा के फेर में महंगे संस्थानों में भर्ती कर मोबाइल देकर भूल जाते है और बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं।
इसके लिए शिक्षा पध्दति ही दोषी है मैं यह नहीं कहता कि मां-बाप दोषी नहीं है लेकिन बेहतर शिक्षा को लेकर सरकार के रवैये की अनदेखी बेमानी होगी। हम सिर्फ मां-बाप को दोष देकर इससे मुक्ति नहीं पा सकते। छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही मैं ऐसे दर्जनों छात्र-छात्राओं को जानता हूं जिनके एक से अधिक लोगों से अंतरंग संबंध है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वे अच्छी शिक्षा की व्यवस्था तो करें लेकिन महंगे शिक्षा पर प्रतिबंध लगाए। अन्यथा एक झूठ सौ झूठ बुलवाता है की कहावत की तरह एक अपराध किसी को भी अपराध के दलदल में ले जाने की कहावत तैयार हो जाएगी। मां-बाप भी अपने बच्चों पर नजर रखे। खासकर मोबाइल देने वाले मां-बाप समय-समय पर यह जरूर चेक करे कि रिचार्ज कितने का हो रहा है। क्योंकि झूठ सीखाने वाले इस मंत्र ने आदमी को संस्कार और नैतिकता से परे ढकेल रहा है और इसकी अनदेखी से गंभीर परिणाम आएंगे जो कलंक साबित हो सकते हैं।
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