कहा कार्रवाई उनका संगठन करेगा...
व्यक्तित्व निर्माण और संस्कारवान बनाने का दावा करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ छत्तीसगढ़ प्रांत के संघचालक बिसराराम यादव की बोलती तब बंद हो गई जब पत्रकारों ने भाजपा नेताओं के करतूतों पर सवाल किया। जोर देने पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि भाजपा संगठन उन पर कार्रवाई करेगा।
संघचालक बिसराराम यादव यहां प्रेस क्लब में हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार के खिलाफ आयोजित धरने की जानकारी दे रहे थे। संघ की कार्यशैली की तारीफ में कसीदा गढ़ रहे संघ चालक श्री यादव ने यह स्वीकार तो किया कि भाजपा भी उनका अनुवांशिक संगठन है लेकिन वे इस बारे में कोई जवाब नहीं दे पाए कि भाजपा नेताओं का संस्कार कैसे बिगड़ गया है।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा के पुत्र का बार में लड़ाई झगड़े सहित छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों के भ्रष्टाचार व करतूतों पर जब सवाल होने लगे तो संघ के नेता बगले झांकने लगे थे। जब सवाल पर सवाल होने लगे तो नगर प्रभारी गोपाल अग्रवाल ने यह कहकर बात टाल दी कि उनका संगठन है वह कार्रवाई करेगा। वहीं शराब को लेकर पूछे सवाल पर वे जनजागरण की बात तो करते रहे लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि उनकी पार्टी की सरकार ही शराब बेच रही है उस पर रोक क्यों नहीं लगवाते?
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शनिवार, 13 नवंबर 2010
आज की खबर
| आज राजधानी में श्री जलाराम उत्सव मनाया गया |
आज राजधानी में श्री जलाराम उत्सव मनाया गया |
आज राजधानी में श्री जलाराम उत्सव मनाया गया |
| कल १४ नवम्बर को दैबितिस डे पर उषा फौन्डेसन के द्वारा फ्री कैंप लगाया जा रहा है |
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के लिए अंधे-बहरे की तलाश...
पहले ही भाजपा के आगे अपनी गत पिटवा चुकी छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस को ऐसे अध्यक्ष की तलाश है जो यश बास की भूमिका बखूबी निभाता हो। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस बार भी अध्यक्ष चयन में मोतीलाल वोरा की चलेगी और उन्हें अंधे-बहरे अध्यक्ष ही चाहिए।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है। कायदे से यहां वीसी शुक्ल और अजीत जोगी को ही दमदार नेता माना जाता है लेकिन इन दोनों से सर्वाधिक खतरा कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा को है इसलिए वे ऐसे अध्यक्ष चाहते हैं जो न केवल उनकी बात सुने बल्कि उनके राजनैतिक महत्वाकांक्षा पर प्रहार न करें। यही वजह है कि कांग्रेस की हालत छत्तीसगढ़ में दयनीय हो गई है। नेता प्रतिपक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष के मनोनयन में अब तक जो मनमानी हुई है और वीसी-जोगी की उपेक्षा की गई है उसका परिणाम है कि कांग्रेस के भाजपा के हाथों बिक जाने की चर्चा है। संगठन में वे लोग अब तक हावी रहे हैं जिनका न तो कोई जनाधार है और न ही जिनमें भाजपा के खिलाफ आक्रमण करने की औकात ही रही है।
इधर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर एक बार फिर कवायद शुरु हो गई है। कहा जा रहा है कि वोरा गुट जहां वर्तमान अध्यक्ष धनेन्द्र साहू को ही अध्यक्ष बनाने के फेर में है वहीं वीसी ने अपने को किनारा कर दिया है। इधर आम कांग्रेसियों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कोई दमदारी से चला सकता है तो उनमें वीसी शुक्ल और अजीत जोगी ही है यदि इन दोनों से परहेज हो तो अन्य नामों में पवन दीवान, सत्यनारायण शर्मा और मोहम्मद अकबर के नाम है जिनके आगे भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। लेकिन इन सभी नामों के साथ सर्वाधिक दिक्कत मोतीलाल वोरा को है जो केन्द्र में मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं।
इधर कांग्रेस में चल रहे अध्यक्ष चयन को लेकर यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रदेश के बड़े नेता नहीं चाहते कि उनके अलावा किसी दमदार को नेतृत्व सौंपा जाए इसलिए ऐसे नाम की खोज हो रही है जो अंधे-बहरे या लाचार की श्रेणी में गिने जाते हो या नाम का अध्यक्ष रहे। पिछले सालों से जिस तरह से कांग्रेस की राजनीति रही है वह शर्मनाक मानी जा रही है। भाजपा सरकार से सेटिंग और दलाली तक के आरोप लगे हैं ऐसे में नया अध्यक्ष का चयन ही कांग्रेस की दिशा तय करेगा अन्यथा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति सुधरने की उम्मीद कम ही है।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है। कायदे से यहां वीसी शुक्ल और अजीत जोगी को ही दमदार नेता माना जाता है लेकिन इन दोनों से सर्वाधिक खतरा कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा को है इसलिए वे ऐसे अध्यक्ष चाहते हैं जो न केवल उनकी बात सुने बल्कि उनके राजनैतिक महत्वाकांक्षा पर प्रहार न करें। यही वजह है कि कांग्रेस की हालत छत्तीसगढ़ में दयनीय हो गई है। नेता प्रतिपक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष के मनोनयन में अब तक जो मनमानी हुई है और वीसी-जोगी की उपेक्षा की गई है उसका परिणाम है कि कांग्रेस के भाजपा के हाथों बिक जाने की चर्चा है। संगठन में वे लोग अब तक हावी रहे हैं जिनका न तो कोई जनाधार है और न ही जिनमें भाजपा के खिलाफ आक्रमण करने की औकात ही रही है।
इधर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर एक बार फिर कवायद शुरु हो गई है। कहा जा रहा है कि वोरा गुट जहां वर्तमान अध्यक्ष धनेन्द्र साहू को ही अध्यक्ष बनाने के फेर में है वहीं वीसी ने अपने को किनारा कर दिया है। इधर आम कांग्रेसियों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कोई दमदारी से चला सकता है तो उनमें वीसी शुक्ल और अजीत जोगी ही है यदि इन दोनों से परहेज हो तो अन्य नामों में पवन दीवान, सत्यनारायण शर्मा और मोहम्मद अकबर के नाम है जिनके आगे भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। लेकिन इन सभी नामों के साथ सर्वाधिक दिक्कत मोतीलाल वोरा को है जो केन्द्र में मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं।
इधर कांग्रेस में चल रहे अध्यक्ष चयन को लेकर यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रदेश के बड़े नेता नहीं चाहते कि उनके अलावा किसी दमदार को नेतृत्व सौंपा जाए इसलिए ऐसे नाम की खोज हो रही है जो अंधे-बहरे या लाचार की श्रेणी में गिने जाते हो या नाम का अध्यक्ष रहे। पिछले सालों से जिस तरह से कांग्रेस की राजनीति रही है वह शर्मनाक मानी जा रही है। भाजपा सरकार से सेटिंग और दलाली तक के आरोप लगे हैं ऐसे में नया अध्यक्ष का चयन ही कांग्रेस की दिशा तय करेगा अन्यथा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति सुधरने की उम्मीद कम ही है।
आज की खबर
आज की खबर
सुदर्शन का युवक कांग्रेसियों ने पुतला फूंका
बिर्गावं के कांग्रेसियों ने ओम प्रकाश देवांगन को टिकिट देने की मांग की मोटर साइकल रैली निकाली .
देश भर के वैदिक वैज्ञानिक २०-२१ नवम्बर को राजधानी आयेंगे , प्रेस कांफ्रेंस में घोषणा , कार्यक्रम रविवि में.
सुदर्शन का युवक कांग्रेसियों ने पुतला फूंका
बिर्गावं के कांग्रेसियों ने ओम प्रकाश देवांगन को टिकिट देने की मांग की मोटर साइकल रैली निकाली .
देश भर के वैदिक वैज्ञानिक २०-२१ नवम्बर को राजधानी आयेंगे , प्रेस कांफ्रेंस में घोषणा , कार्यक्रम रविवि में.
तमसो मा योर्तिगमय!
अंधेर से उजाले की ओर चलो। इस वाक्य का साफ शब्दों में यही अर्थ है। पर आम आदमी के लिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कैसे अंधेर से उजाले की ओर चला जा सकता है। अंधेरा घना है और सब तरफ अपराध बड़े हैं। आम आदमी भी स्वार्थी हो गया है। मुंह देखी बात करने वालों की जमात बढ़ने लगी है इसलिए अपराध बढ़े हैं। अंधेरगर्दी बढ़ा है और भगवान के घर देर है अंधेर नहीं का जुमला भी थोथा साबित होने लगा है।
छत्तीसगढ राय की कल्पना या सपना देखने वालों ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि राय बनते ही लुटेरों की जमात सामने आ जाएगी और पूरे देश में अपनी करतूतों का ऐसा डंका बजाएंगे कि छत्तीसगढ़ महतारी को भी शर्म आ जाए। सरकारी अंधेरगर्दी की असली वजह उन लोगों की चुप्पी है जो अपने लिए जी रहे हैं। या उन लोगों की वजह से अंधेरगर्दी बढ़ी है जो समाज का हित तो चाहते हुए गरीबों को खाना, दवाई, कपड़ा देते नहीं थकते लेकिन गलत बातों का विरोध करने से डरते हैं।
जब किसी चीज का विरोध ही नहीं होगा तो कोई गलत काम करने से कैसे रुख सकता है। छत्तीसगढ़ में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका समाज में अपनी पहचान है और लोग जिनकी बातों को गंभीरता से लेते भी हैं लेकिन ये लोग भी वृक्षारोपण और दान-धर्म पर यादा भरोसा करते है। विरोध करने से डरते हैं और यही से अंधेरा अंधेरगर्दी का शक्ल अख्तियार करता है। क्या सरकारी जमीनों को बंदरबांट वह भी अपने लोगों में यह अंधेरगर्दी नहीं है फिर इसका विरोध कोई क्यों नहीं करता क्योंकि जिन भाजपा के दिग्गजों को ये जमीन दी गई है वे नाराज हो जाएंगे। नदियों का पानी बेच देना क्या अंधेरगर्दी नहीं है या फिर एक ही सड़क को हर साल बार-बार बनाना अंधेरगर्दी नहीं है।
सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां मंत्रियों और अधिकारियों की हरामखोरी नहीं हो रही है। फिर भी लोग खामोश है। दीपावली का मतलब सिर्फ दीप या रोशनी करके अंधेरे को दूर करना नहीं है। यह तो प्रतीक है राम के अयोध्या लौटने पर संभावित राम राय की कल्पना का। वास्तव में आम आदमी अपनी पेट के खातिर मरा जा रहा है। लेकिन सरकारी अंधेरगर्दी उसे ठीक से जीने नहीं दे रही है। क्या कोई सोच सकता है कि इस शहर ने पंचर वाले, नाका चोर, पंखा चोर को कहां से कहां बढ़ते देखा है या फिर अपनी शादी के लिए फर्जी एजेंसी का सहारा लेने वाले कहां पहुंच गए। सिर्फ मेहनत से तो दो-चार सौ करोड़ रुपए नहीं कमाए जा सकते। कम से कम इन लोगों ने कैसे कमाया है कोई भी बता देगा। दलाली से लेकर चोरी तक में डूबे इन लोगों के अचानक करोड़पति बनने की कहानी जितनी विभत्स है उससे कहीं अधिक विभत्स उन लोगों की करतूतें हैं जो गलत कार्यों पर प्रहार नहीं करते क्योंकि विष बेल को नहीं रोका गया तो वह आने वाली पीढ़ी को डस लेगा जिसके जिम्मेदार आप हम सब होंगे।
अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब सिर्फ दीप जलाना नहीं है। अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब न तो गरीबों को दवा, खाना या उपहार देना है। अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब सिर्फ और सिर्फ अंधेरे पर प्रहार करना है और इसके लिए हमें स्वयं रोशनी बननी होगी।
छत्तीसगढ राय की कल्पना या सपना देखने वालों ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि राय बनते ही लुटेरों की जमात सामने आ जाएगी और पूरे देश में अपनी करतूतों का ऐसा डंका बजाएंगे कि छत्तीसगढ़ महतारी को भी शर्म आ जाए। सरकारी अंधेरगर्दी की असली वजह उन लोगों की चुप्पी है जो अपने लिए जी रहे हैं। या उन लोगों की वजह से अंधेरगर्दी बढ़ी है जो समाज का हित तो चाहते हुए गरीबों को खाना, दवाई, कपड़ा देते नहीं थकते लेकिन गलत बातों का विरोध करने से डरते हैं।
जब किसी चीज का विरोध ही नहीं होगा तो कोई गलत काम करने से कैसे रुख सकता है। छत्तीसगढ़ में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका समाज में अपनी पहचान है और लोग जिनकी बातों को गंभीरता से लेते भी हैं लेकिन ये लोग भी वृक्षारोपण और दान-धर्म पर यादा भरोसा करते है। विरोध करने से डरते हैं और यही से अंधेरा अंधेरगर्दी का शक्ल अख्तियार करता है। क्या सरकारी जमीनों को बंदरबांट वह भी अपने लोगों में यह अंधेरगर्दी नहीं है फिर इसका विरोध कोई क्यों नहीं करता क्योंकि जिन भाजपा के दिग्गजों को ये जमीन दी गई है वे नाराज हो जाएंगे। नदियों का पानी बेच देना क्या अंधेरगर्दी नहीं है या फिर एक ही सड़क को हर साल बार-बार बनाना अंधेरगर्दी नहीं है।
सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां मंत्रियों और अधिकारियों की हरामखोरी नहीं हो रही है। फिर भी लोग खामोश है। दीपावली का मतलब सिर्फ दीप या रोशनी करके अंधेरे को दूर करना नहीं है। यह तो प्रतीक है राम के अयोध्या लौटने पर संभावित राम राय की कल्पना का। वास्तव में आम आदमी अपनी पेट के खातिर मरा जा रहा है। लेकिन सरकारी अंधेरगर्दी उसे ठीक से जीने नहीं दे रही है। क्या कोई सोच सकता है कि इस शहर ने पंचर वाले, नाका चोर, पंखा चोर को कहां से कहां बढ़ते देखा है या फिर अपनी शादी के लिए फर्जी एजेंसी का सहारा लेने वाले कहां पहुंच गए। सिर्फ मेहनत से तो दो-चार सौ करोड़ रुपए नहीं कमाए जा सकते। कम से कम इन लोगों ने कैसे कमाया है कोई भी बता देगा। दलाली से लेकर चोरी तक में डूबे इन लोगों के अचानक करोड़पति बनने की कहानी जितनी विभत्स है उससे कहीं अधिक विभत्स उन लोगों की करतूतें हैं जो गलत कार्यों पर प्रहार नहीं करते क्योंकि विष बेल को नहीं रोका गया तो वह आने वाली पीढ़ी को डस लेगा जिसके जिम्मेदार आप हम सब होंगे।
अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब सिर्फ दीप जलाना नहीं है। अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब न तो गरीबों को दवा, खाना या उपहार देना है। अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब सिर्फ और सिर्फ अंधेरे पर प्रहार करना है और इसके लिए हमें स्वयं रोशनी बननी होगी।
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
केबिनेट की लड़ाई आखिर सड़क तक पहुंची कैसे ?
जाँच होगी, बृजमोहन पर संदेह ?
रायपुर विकास प्राधिकरण की कमल विहार योजना को लेकर केबिनेट की बैठक में मंत्रियों की लड़ाई आखिर मिडिया तक कैसे पहुंची , इसे लेकर मुख्यमंत्री रमण सिंह न केवल नाराज है बल्कि भीतर ही भीतर पता किया जा रहा है,वैसे चर्चा इस बात की है की लड़ाई की खबर बृजमोहन अग्रवाल ने लिक की है? क्योंकि इससे फायदा उन्ही का हुआ है.
ज्ञात हो कि केबिनेट की बैठक में कमल विहार योजना के विरोध में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल न केवल खुलकर सामने आ गए थे बल्कि उनकी मंत्री राजेश मूणत से तीखी बहस भी हुई , दोनों मंत्रियों के बिच झड़प इतनी जबरदस्त रही कि राजेश मूणत को बैठक बिच में छोड़कर जाना पड़ा ,जबकि मुख्यमंत्री रमण सिंह ने योजना को रोक कर विसंगति दूर करने कि बात कही , लेकिन इसे ऐसा प्रचारित किया गया मानो इसे रद्द कर दिया गया हो.
इधर केबिनेट की बैठक में किस मंत्री ने क्या कहा सारी बातें अखबारों में चाप गई जो सरकार के लिए हैरानी वाली बात है,
हमारे भरोसे मंद सूत्रों का दावा है कि इस समूचे मामले को राजनैतिक फायदे और राजनैतिक दुश्मनी भुनाने लिक किया गया गया है चूँकि इससे बृजमोहन अग्रवाल को फायदा हुआ है इसलिए उन पर शक किया जा रहा है . सूत्रों का दावा है कि इस मामले को मुख्यमंत्री रमण सिंह ने गंभीरता से लाया है और इसका प्रभाव भी जल्द द्ल्खाने कि संभावना जताई जा रही है,जबकि बृजमोहन अग्रवाल के लिए यह सब नुकसान दायक हो सकता है.
रायपुर विकास प्राधिकरण की कमल विहार योजना को लेकर केबिनेट की बैठक में मंत्रियों की लड़ाई आखिर मिडिया तक कैसे पहुंची , इसे लेकर मुख्यमंत्री रमण सिंह न केवल नाराज है बल्कि भीतर ही भीतर पता किया जा रहा है,वैसे चर्चा इस बात की है की लड़ाई की खबर बृजमोहन अग्रवाल ने लिक की है? क्योंकि इससे फायदा उन्ही का हुआ है.
ज्ञात हो कि केबिनेट की बैठक में कमल विहार योजना के विरोध में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल न केवल खुलकर सामने आ गए थे बल्कि उनकी मंत्री राजेश मूणत से तीखी बहस भी हुई , दोनों मंत्रियों के बिच झड़प इतनी जबरदस्त रही कि राजेश मूणत को बैठक बिच में छोड़कर जाना पड़ा ,जबकि मुख्यमंत्री रमण सिंह ने योजना को रोक कर विसंगति दूर करने कि बात कही , लेकिन इसे ऐसा प्रचारित किया गया मानो इसे रद्द कर दिया गया हो.
इधर केबिनेट की बैठक में किस मंत्री ने क्या कहा सारी बातें अखबारों में चाप गई जो सरकार के लिए हैरानी वाली बात है,
बुधवार, 10 नवंबर 2010
अंधा पीसे, कुत्ता खाय...
यह तो अंधा पीसे कत्ता खाय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना स्वयं को स्थापित और बड़ा अखबार बनने की जिद में पत्रकारिता की दिनाें दिन यह दुर्गति नहीं होती। पिछले कुछ सालों से राजधानी के पत्रकारों में ही नहीं पत्रकारिता में भी बदलाव की बयार चली है। खरबों को तोड़ मरोड़ कर सनसनी फैलाने की नई परम्परा के साथ-साथ संबंधों को यादा अहमियत दी गई। अखबारों से पाठकों के साथ संबंधाें को अहमियत दी जाती है तो सवाल कभी नहीं उठते लेकिन अहमियत दी गई अफसरों और नेताओं से संबंध स्थापित करने की। इसके चलते पत्रकारों की सोच में तो अदलाव आया ही पत्रकारिता की दुर्गति भी हुई। खासकर एम्सवन्लूजिव्ह और खोजी पत्रकारिता को तो बड़ा झटका लगा है। खबरों की तह तक जाने की परम्परा का भी अनादर हुआ। इससे अखबार मालिक और पत्रकार दोनों खुश है लेकिन पाठकों का एक वर्ग जो व्यवस्था की चोर से पीड़ित है उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब तो अखबारों में सामाजिक और सरकारी खबरें ही यादा दिखाई देती है। अपराधिक खबरों में भी वही खबर छपती है जो पुलिस बना देती है। मेरा दावा है कि राजधानी के अखबारों में काम करने वाले क्राईम रिपोर्टरों में आधे रिपोर्टर ऐसे होंगे जो राजधानी के 23 थानों और चौकियों को महिनों से नहीं देखे होंगे। ऐसे में उन थानों या चौकियों में हो रही अच्छी या बुरी कार्रवाई की खबरें कैसे छपती होगी अंदाज लगाया जा सकता है। संपादकों का क्या? अब तो रोज संपादकीय लिखना भी जरूरी नहीं है। ग्रुप के अखबारों में काम करने वाले संपादकों को कलम चलाने की बंदिशे भी कम नहीं होती। उनकों जवाबदारी तो प्रतिध्दंदी अखबाराें से तुलना करने और छुटी खबरों के बारें में पूछताछ में ही गुजर जाती है। इस सबके बाद यदि समय बचा तो अधिकारियों और नेताओं से अखबार हित में संबंध बनाने में चला जाता है। पत्रकारिता के इस स्तर तक पहुंचने में अखबार मालिकों का खैया तो जिम्मेदार रहा ही है। स्वयं पत्रकारों का खैया भी कम जिम्मेदार नहीं है। कुछ साल पहले की बात है शहर के एक नामी गिरामी अखबार के एक रिपोर्टर ने जब आलीशान बंगला तैयार किया तो अन्य रिपोर्टर उन्हें खुब गाली देते थे लेकिन अब न तो पत्रकारिता की ऊचाई की बात होती है और न ही किसी का बंगले पर ही चर्चा होती है। जब तनख्वाह कम थी तब पत्रकारों में दुनिया बदलने का हौसला होता था लेकिन अब जब सुविधाएं बड़ गई है तो सुविधाएं बढ़ाने की जिद भी बढ़ी है। सुविधाएं छिन जाने का डर उन्हें बेहतर पत्रकारिता या खबरों से दूर रखता है। वे सोचते हैं खबरें छपने पर क्या होगा। अल्टा वे दुश्मन बन जायेंगे और इससे मिलने वाली सुविधाएं से वंचित होंगे। और फिर इस खबर के नहीं छपने से क्या होगा? बस इसी सोच के चलते ही हौज में दूध नहीं भर पाया था सभी शिष्यों ने अंधेरे का फायदा उठाकर गुरू के निर्देश की अवहेलना कर हौज को दूध की जगह पानी से भर दिया था। पत्रकारिता में भी सुविधाएं छिनने का डर कलम पर जंजीरे कसने लगी है।
और अंत में
अवैध प्लाटिंग की लगातार छप रही खबरों से दुखी एक बिल्डर ने सरकार के इस खैये का जब विरोध किया तो एक अखबार सारा संसार के रिपोर्टर ने उसे सलाह दी इस विरोध का कोई मतलब नहीं है विरोध करना है तो अखबारों के अवैध और मंत्री को दमदारी दिखाने ज्ञापन सौंपो तो कुछ हल निकल आयेगा।
और अंत में
अवैध प्लाटिंग की लगातार छप रही खबरों से दुखी एक बिल्डर ने सरकार के इस खैये का जब विरोध किया तो एक अखबार सारा संसार के रिपोर्टर ने उसे सलाह दी इस विरोध का कोई मतलब नहीं है विरोध करना है तो अखबारों के अवैध और मंत्री को दमदारी दिखाने ज्ञापन सौंपो तो कुछ हल निकल आयेगा।
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