छत्तीसगढ rajya बनने के बाद अखबारों की बाढ़ सी आ गई है। कई पत्रकार नौकरी करने की बजाय अपना अखबार निकाल रहे हैं तो राय सरकार की विज्ञापन नीति से प्रभावित होकर बड़े ग्रुप भी कूद गए हैं। अखबार क्या अच्छा खासा मनोरंजन का साधन बन गया है। खबरों के नाम पर सूचना या फिर ओब्लाईजेशन का नजारा ही अधिक दिखाई देने लगा है। सारे बड़े अखबार पेज मेकर के हवाले हैं। खबरें कैसे बननी है इसकी बजाय अखबार कैसे सजाए जाएं इस पर यादा ध्यान हैं। विज्ञापन बटोरने के अलावा लोग बनाने की तमन्ना भी यादा दिखलाई पड़ रहा है। ऐसे में पत्रकार से अखबार मालिक बने लोगों की अपनी पीड़ा है अच्छी खबरों के बाद भी पढ़ने वालों की कमी से जूझ रहे अखबार भी अब साज-साा पर जोर देने लगे हैं।
पिछला सप्ताह यानी काला सप्ताह
पिछले सप्ताह पुलिस ने दो पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की। दामू आम्बेडारे तो दामू बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे लिए का गाना गाते घूम रहा है। बमुश्किल से जमानत मिलने के बाद प्रेस क्लब से निलंबित भी किए गए। 15 दिन के भीतर जवाब सही मिला तो ठीक वरना। दूसरा मामला धोखाधड़ी का है। हैलो रायपुर निकाल रहा मधुर को जमीन का कारोबार रास नहीं आया लोग दूसरा काम छोड़ अखबार निकाल रहे है और ये अखबार से दूसरे काम की ओर जा रहा है तो फंसना तो है ही।
छत्तीसगढ़ अब सुबह की ओर...
एक कहावत है कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो इसे भूला नहीं कहते। सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ निकाल रहे सुनील कुमार अब सुबह का अखबार निकालने की कोशिश में है। इसे देर आए दुरुस्त आए भी कहा जा सकता है। अखबार भी अच्छा निकालों और दो घंटे में पढ़ाओं। यह अकल तो पहले आनी चाहिए थी। पर हाइवे का भूत अब जाकर उतरा है।
भास्कर की छटपटाहट
मीडिया जगत के इस नए छत्रप की दिक्कते बढ ग़ई है। अपनी जमीन में बनी बिल्डिंग को तोड़कर 14 मंडिला बनाने की कवायद में किराए के भवन में जाना पड़ा तो नेशनल लुक भी वहीं पहुंच गया और अब पत्रिका दुश्मन बन गया है। ऐसे में विज्ञापन दर कम करने की मजबूरी के बाद भी सर्कुलेशन कम होने लगे तो छटपटाहट स्वाभाविक है।
प्रेस क्लब का चुनाव जनवरी में
प्रेस क्लब का चुनाव जनवरी के प्रथम सप्ताह में कराए जाने की सुगबुगाहट शुरु हो गई है। इसके पहले मतदाता सूची और आडिट रिपोर्ट का काम चल रहा है। दावेदार भी अभी से गुणा-भाग करने लगे हैं।
और अंत में...
राजधानी की चिंता के साथ छत्तीसगढ़ में कदम रखने वाले पत्रिका का तेवर कहां है? यह सवाल करने वाले अब इसे उसके दुश्मन भास्कर से ही तुलना करने लगे है ''अरे यह तो दूसरा भास्कर है।''
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 30 नवंबर 2010
सोमवार, 29 नवंबर 2010
जय बोलों बेईमान की...
सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार के वकील ने जिस बेहूदे ढंग से कहा कि किसी की नियुक्ति में ईमानदारी अंतिम योगय्ता है तो फिर नियुक्ति के लिए लोग नहीं मिलेंगे।
यह कथन उन लोगों के गाल पर तमाचा है जो लोग ईमानदारी को ही सर्वोपरि समझते हैं? और यदि सरकार को ही सर्वोपरि समझते हैं? और सरकार के वकील इस तरह की बात करें तो फिर यह अराजकता के सिवाय कुछ नहीं है। फिर काहे की सरकार, काहे की न्याय व्यवस्था और काहे का कानून?
केंद्र सरकार में जरा भी नैतिकता है तो उन्हें ऐसे वकीलों का लाइसेंस जब्त कर लेना चाहिए जो इस तरह की बात करता हो? सरकार और उसमें बैठे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह दुनिया तभी कायम है जब ईमानदारी जिन्दा है।
ईमानदारी आम लोगों में अधिक है। नेता और अधिकारी भ्रष्ट हो चुके हैं और पदों में बेईमानों को बिठाया जा रहा है तो इसके लिए ईमानदारी को गाली देना कहां तक उचित है। बेईमान इसलिए बढ़े हैं क्योंकि हमारी व्यस्वथा ही ऐसी है।
एक जमाना था जब नैतिकता लोगों के रग-रग में बसी थी। छोटी सी भी खबर से नौकरी तक चली जाती थी। अब नौकरी का डर नहीं है, क्यों? इसलिए क्योंकि जनता ने जिस पर भरोसा किया व भी वेतनभोगी हो गए! उन्हें भी जनसेवा की आड़ में वेतनभत्ता और राजसी एय्याशी चाहिए?
छत्तीसगढ़ में ही डा. रमन सिंह ने क्या कभी मंत्रालय में घूम कर देखा है कि दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कक्ष का द्वार को या भीतर के राजसी ढाढ को? ऐसे कैसे अनुमति दी जा सकती है?
क्या अखबारों में छप रहे भ्रष्टाचार की खबरों को सरकार ने संज्ञान में लेकर किसी तरह की कार्रवाई की। क्या किसी घोटाले में सचिव और मंत्रियों को जिम्मेदार ठहराया गया? बेशर्मी यहां है! और बेशर्मी तो तब बढ़ जाती है जब किसी मंत्री के गोंदिया में रहने वाले साले की संपत्ति 7 सालों में 70 गुणा बढ़ जाती है और इस पर भी कार्रवाई नहीं होती? बेशर्मा तब और बढ़ जाती है जब मंत्री बनते ही भाई संस्कृति विभाग में दलाली करने लगता है। अपने भाई को दलाल कहते सुनने के बाद भी शर्म नहीं आये तो इसे क्या कहा जा सकता है।
केंद्र सरकार के वकील को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों ने ईमानदारी नहीं बरती होती तो आज वे वकील नहीं होते? ईमानदारी आज भी जिन्दा है तो सरकारें जिंदा हैं।
ये अलग बात है कि वेतन भोगी लोगोंमें बेईमानी यादा है इसकी वजह व्यवस्था का दोष है। पकड़े जाने के बाद भी नौकरी पर आंच नहीं आने की जटिलता से बेईमानों के हौसले बुलंद है।
छत्तीसगढ़ में ही आईएएस बाबूलाल अग्रवाल का क्या हुआ? मालिक मकबूजा कांड में वेतनवृध्दि प्रमोशन रुकने के बाद नारायण सिंह का क्या हुआ? ऐसे लोगों को प्रमोशन देने की कोशिश पर सरकार की चुप्पी क्या बेईमानों के हौसले नहीं बढ़ाती है। परिवहन इंस्पेक्टर विनय कुमार अनंत हो या डॉ. आदिले? सरकार प्रमाणित होने के बाद भी नौकरी से क्यों नहीं निकाल देती। यदि बेईमानों में खौफ नहीं होगा तो कैसे ईमानदार लोग सामने आयेंगे?
ऐसा नहीं है कि ईमानदार लोग आगे नहीं आते। ऐसे कई मामलों में वेतनभोगियों में भी हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी ईमानदारी में गुजार दी। अब तो यह जुमला भी सुनने को मिल जाता है कि ईमानदार वही है जिन्हें मौका नहीं मिला। इन सबसे बावजूद अब भी ईमानदारी कायम है और दुनिया भी!
यह कथन उन लोगों के गाल पर तमाचा है जो लोग ईमानदारी को ही सर्वोपरि समझते हैं? और यदि सरकार को ही सर्वोपरि समझते हैं? और सरकार के वकील इस तरह की बात करें तो फिर यह अराजकता के सिवाय कुछ नहीं है। फिर काहे की सरकार, काहे की न्याय व्यवस्था और काहे का कानून?
केंद्र सरकार में जरा भी नैतिकता है तो उन्हें ऐसे वकीलों का लाइसेंस जब्त कर लेना चाहिए जो इस तरह की बात करता हो? सरकार और उसमें बैठे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह दुनिया तभी कायम है जब ईमानदारी जिन्दा है।
ईमानदारी आम लोगों में अधिक है। नेता और अधिकारी भ्रष्ट हो चुके हैं और पदों में बेईमानों को बिठाया जा रहा है तो इसके लिए ईमानदारी को गाली देना कहां तक उचित है। बेईमान इसलिए बढ़े हैं क्योंकि हमारी व्यस्वथा ही ऐसी है।
एक जमाना था जब नैतिकता लोगों के रग-रग में बसी थी। छोटी सी भी खबर से नौकरी तक चली जाती थी। अब नौकरी का डर नहीं है, क्यों? इसलिए क्योंकि जनता ने जिस पर भरोसा किया व भी वेतनभोगी हो गए! उन्हें भी जनसेवा की आड़ में वेतनभत्ता और राजसी एय्याशी चाहिए?
छत्तीसगढ़ में ही डा. रमन सिंह ने क्या कभी मंत्रालय में घूम कर देखा है कि दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कक्ष का द्वार को या भीतर के राजसी ढाढ को? ऐसे कैसे अनुमति दी जा सकती है?
क्या अखबारों में छप रहे भ्रष्टाचार की खबरों को सरकार ने संज्ञान में लेकर किसी तरह की कार्रवाई की। क्या किसी घोटाले में सचिव और मंत्रियों को जिम्मेदार ठहराया गया? बेशर्मी यहां है! और बेशर्मी तो तब बढ़ जाती है जब किसी मंत्री के गोंदिया में रहने वाले साले की संपत्ति 7 सालों में 70 गुणा बढ़ जाती है और इस पर भी कार्रवाई नहीं होती? बेशर्मा तब और बढ़ जाती है जब मंत्री बनते ही भाई संस्कृति विभाग में दलाली करने लगता है। अपने भाई को दलाल कहते सुनने के बाद भी शर्म नहीं आये तो इसे क्या कहा जा सकता है।
केंद्र सरकार के वकील को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों ने ईमानदारी नहीं बरती होती तो आज वे वकील नहीं होते? ईमानदारी आज भी जिन्दा है तो सरकारें जिंदा हैं।
ये अलग बात है कि वेतन भोगी लोगोंमें बेईमानी यादा है इसकी वजह व्यवस्था का दोष है। पकड़े जाने के बाद भी नौकरी पर आंच नहीं आने की जटिलता से बेईमानों के हौसले बुलंद है।
छत्तीसगढ़ में ही आईएएस बाबूलाल अग्रवाल का क्या हुआ? मालिक मकबूजा कांड में वेतनवृध्दि प्रमोशन रुकने के बाद नारायण सिंह का क्या हुआ? ऐसे लोगों को प्रमोशन देने की कोशिश पर सरकार की चुप्पी क्या बेईमानों के हौसले नहीं बढ़ाती है। परिवहन इंस्पेक्टर विनय कुमार अनंत हो या डॉ. आदिले? सरकार प्रमाणित होने के बाद भी नौकरी से क्यों नहीं निकाल देती। यदि बेईमानों में खौफ नहीं होगा तो कैसे ईमानदार लोग सामने आयेंगे?
ऐसा नहीं है कि ईमानदार लोग आगे नहीं आते। ऐसे कई मामलों में वेतनभोगियों में भी हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी ईमानदारी में गुजार दी। अब तो यह जुमला भी सुनने को मिल जाता है कि ईमानदार वही है जिन्हें मौका नहीं मिला। इन सबसे बावजूद अब भी ईमानदारी कायम है और दुनिया भी!
शनिवार, 27 नवंबर 2010
बिहार का चुनाव परिणाम भाजपाईयों को भी चेतावनी ....
बिहार के चुनाव परिणाम यदि लालू और कांग्रेस के गाल पर तमाचा है तो भाजपा के लिए भी स्पष्ट चेतावनी है कि लोग हर हाल में शांति से जीवन जीना चाहते हैं। दो जून की रोटी और सुकून की नींद ही हमारी नई आजादी की लड़ाई का उद्देश्य है। बिहार में नीतिश कुमार की जीत हमारी इसी नई आजादी की जीत है। जहां कानून व्यवस्था मजबूत हो, विकास के द्वार खुल रहे और आप लोगों को बेहतर जीवन मिले।
बिहार के चुनाव परिणाम आने वाली राजनीति की दिशा तय करेगी। अब जाति और धर्म को राजनीतिक रूप देने की किसी भी कोशिश को जनता समझने लगी है। क्योंकि ये झगड़े सिर्फ सत्ता पाने का माध्यम है और लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सरकार किसकी रहे वह तो बस अच्छी सरकार चाहती है। बिहार में न तो लालू का जाति वाला जादू चला और न ही कांग्रेस के राहुल का परिवारिक जादू ही काम आया। भाजपा के धर्म आधारित राजनीतिक को भी नीतिश कुमार ने पहले ही हाशिये में डाल रखा था। नरेन्द्र मोदी के कट्टर हिन्दुत्व के चेहरे को जिस बेबाकी से नीतिश कुमार ने नोचा था तभी से ही उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त हो गया था।
वे दिन अब लदने लगे हैं जब पारिवारिक पृष्ठभूमि मायने रखती थी। अब वे युवा पढ़-लिखकर नई सोच के साथ जीना पसंद करते हैं। हर जाति और हर धर्म के युवा एक छत के नीचे न केवल काम कर रहे हैं बल्कि अपनी जिन्दगी का सुख-दुख और यहां तक की पारिवारिक रिश्ते भी कायम कर रहे हैं। ऐसे में जाति और धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों की दुर्गत स्वाभाविक है।
नीतिश कुमार के पहले बिहारी शब्द से आम लोगों को चिढ़ होने लगी थी। बिहार में माफियाओं का राज था। दिन ढलते ही दहशत के साये में जीते लोगों ने जब हिम्मत करके नीतिश को गद्दी पर बिठाया तो उन्होंने जिम्मेदारी बखूबी निभाई। कानून-व्यवस्था की लचर स्थिति को तो मजबूत किया ही गया। विकास के नये आयाम स्थापित किया। आम लोगों में व्याप्त भय को दूर करने का विश्वास ही उन्हे पुन: सत्तासीन किया है।
लालू की हरकत नौटंकी बन गई और राहुल का क्रेज भी यहां खत्म हो गया तो इसके पीछे नीतिश की वह सोच है जिसमें भाजपा के नरेन्द्र मोदी जैसे चेहरे को भी वे बर्दाश्त नहीं करते। भाजपा भले ही इस जीत में अपना श्रेय ढूंढ़ रही हो लेकिन सच्चाई वह भी जानती है कि यदि नीतिश की राह पर वे नहीं चले होते तो वह भी आज लालू-पासवान और कांग्रेस के साथ खड़ी होती।
नई आजादी की लड़ाई ऐसे ही सरकार के लिए हैं जहां भय, भूख और भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है। सरकार भी ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। विकास की सारी सुविधाएं शहरों में ही देने की बजाय गांवों में भी पहुंचे। बिसलरी पीने वाले नेता-अधिकारी गांव वालों को तो कम से कम सहज रूप से पीने का पानी पहुंचाये। उद्योगों को पानी और बिजली की वकालत करने वाले खेतों को पानी पहुंचाने का काम करें। स्वास्थ्य सुविधा गांव-गांव तक पहुंचे और माफियाओं के खिलाफ कड़ा कानून बने।
गृह निर्माण मंडल का राविप्रा जैसी संस्थानों में एक व्यक्ति एक मकान के सिध्दांत को लागू करें। इसमें न केवल अपना मकान का सपना पूरा होगा बल्कि सस्ते दर में मकान उपलब्ध हो जायेंगे।
छत्तीसगढ़ सरकार के लिए भी बिहार चुनाव के परिणाम चुनौती है। वहां माफिया भाये तो यहां डेरा डालने लगे है। बिहार में नीतिश ने अपहरण फिरौती करने वालों को जेल में डाल दिया तो यहां वारदात बढ़ रही है। कृषि जमीन और सरकार जमीनों को विकास के नाम पर बंदरबांट करना बंद करना होगा और दमदार मंत्री, भ्रष्ट मंत्री और ऐसे ही अधिकारियों पर नकेल कसनी होगी।
बिहार के चुनाव परिणाम आने वाली राजनीति की दिशा तय करेगी। अब जाति और धर्म को राजनीतिक रूप देने की किसी भी कोशिश को जनता समझने लगी है। क्योंकि ये झगड़े सिर्फ सत्ता पाने का माध्यम है और लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सरकार किसकी रहे वह तो बस अच्छी सरकार चाहती है। बिहार में न तो लालू का जाति वाला जादू चला और न ही कांग्रेस के राहुल का परिवारिक जादू ही काम आया। भाजपा के धर्म आधारित राजनीतिक को भी नीतिश कुमार ने पहले ही हाशिये में डाल रखा था। नरेन्द्र मोदी के कट्टर हिन्दुत्व के चेहरे को जिस बेबाकी से नीतिश कुमार ने नोचा था तभी से ही उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त हो गया था।
वे दिन अब लदने लगे हैं जब पारिवारिक पृष्ठभूमि मायने रखती थी। अब वे युवा पढ़-लिखकर नई सोच के साथ जीना पसंद करते हैं। हर जाति और हर धर्म के युवा एक छत के नीचे न केवल काम कर रहे हैं बल्कि अपनी जिन्दगी का सुख-दुख और यहां तक की पारिवारिक रिश्ते भी कायम कर रहे हैं। ऐसे में जाति और धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों की दुर्गत स्वाभाविक है।
नीतिश कुमार के पहले बिहारी शब्द से आम लोगों को चिढ़ होने लगी थी। बिहार में माफियाओं का राज था। दिन ढलते ही दहशत के साये में जीते लोगों ने जब हिम्मत करके नीतिश को गद्दी पर बिठाया तो उन्होंने जिम्मेदारी बखूबी निभाई। कानून-व्यवस्था की लचर स्थिति को तो मजबूत किया ही गया। विकास के नये आयाम स्थापित किया। आम लोगों में व्याप्त भय को दूर करने का विश्वास ही उन्हे पुन: सत्तासीन किया है।
लालू की हरकत नौटंकी बन गई और राहुल का क्रेज भी यहां खत्म हो गया तो इसके पीछे नीतिश की वह सोच है जिसमें भाजपा के नरेन्द्र मोदी जैसे चेहरे को भी वे बर्दाश्त नहीं करते। भाजपा भले ही इस जीत में अपना श्रेय ढूंढ़ रही हो लेकिन सच्चाई वह भी जानती है कि यदि नीतिश की राह पर वे नहीं चले होते तो वह भी आज लालू-पासवान और कांग्रेस के साथ खड़ी होती।
नई आजादी की लड़ाई ऐसे ही सरकार के लिए हैं जहां भय, भूख और भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है। सरकार भी ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। विकास की सारी सुविधाएं शहरों में ही देने की बजाय गांवों में भी पहुंचे। बिसलरी पीने वाले नेता-अधिकारी गांव वालों को तो कम से कम सहज रूप से पीने का पानी पहुंचाये। उद्योगों को पानी और बिजली की वकालत करने वाले खेतों को पानी पहुंचाने का काम करें। स्वास्थ्य सुविधा गांव-गांव तक पहुंचे और माफियाओं के खिलाफ कड़ा कानून बने।
गृह निर्माण मंडल का राविप्रा जैसी संस्थानों में एक व्यक्ति एक मकान के सिध्दांत को लागू करें। इसमें न केवल अपना मकान का सपना पूरा होगा बल्कि सस्ते दर में मकान उपलब्ध हो जायेंगे।
छत्तीसगढ़ सरकार के लिए भी बिहार चुनाव के परिणाम चुनौती है। वहां माफिया भाये तो यहां डेरा डालने लगे है। बिहार में नीतिश ने अपहरण फिरौती करने वालों को जेल में डाल दिया तो यहां वारदात बढ़ रही है। कृषि जमीन और सरकार जमीनों को विकास के नाम पर बंदरबांट करना बंद करना होगा और दमदार मंत्री, भ्रष्ट मंत्री और ऐसे ही अधिकारियों पर नकेल कसनी होगी।
बुधवार, 24 नवंबर 2010
छत्तीसगढ़ में भी कई राजा
मंत्रियों-अधिकारियों व नेताओं की संपत्ति कई गुणा हुई
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में अंतत: केंद्रीय मंत्री राजा को इस्तीफा देना पड़ा लेकि छत्तीसगढ़ में भी कई मंत्री व अधिकारी हैं जिन्होंने रातों रात अपनी संपत्ति कई गुणा कर ली। पर्यटन में रोपवे घोटाले हो या पीडब्ल्यूडी में सड़क घोटाले, शिक्षा विभाग स्वास्थ्य, खनिज ऊर्जा में तो घोटाले की फेहरिस्त है लेकिन इस ओर न तो विपक्षी कांग्रेस का ही ध्यान है और न ही जांच एजेंसी की रूचि ही है।
छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद यदि भाजपा द्वारा अजीत जोगी सरकार के घोटाले की फेहरिस्त उजागर की गई और सत्ता में आते ही इन घोटालों पर से पर्दा नहीं उठाया गया तो इसके पीछे भाजपा सरकार में मंत्रियों व अधिकारियों की करतूतें हैं जिन्होंने 5-7 सालों में ही अपनी संपत्ति कई गुणा बढ़ा ली। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इन मामलों में कांग्रेस की भूमिका भी संदिग्ध होने लगी है। रमन सरकार के सर्वादिक चर्चित घोटाले में स्वास्थ्य विभाग का घोटाला है जिसके आरोपियों को सरकार संरक्षण दे रही है। करोड़ों रुपये के डाफ्टर खरीदी के अलावा पूर्व स्वास्थ्य सचिव बाबूलाल अग्रवाल के मामले में भी रमन सरकार कटघरे में है। आनन-फानन में बहाली की वजह सीए हाऊस पर लेन-देन का आरोप भी लग चुका है। यहां दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों मेंहुए घोटाले की कहानी को भी बेशर्मी से दबाई गई। बृजमोहन अग्रवाल जब गृहमंत्री थे तब तो उनके भाईयों पर कई गंभीर आरोप ही न लगे बल्कि आम चर्चा यह रही कि उनके भाईयों ने इस दौरान गृहमंत्री की भूमिका निभाते रहे हैं और शहर ही नहीं कई क्षेत्रों में विवादास्पद जमीनों की खरीदी भी की। कबाड़ कांड के हीरो रहे कैलाश अग्रवाल भी बृजमोहन के रिश्तेदार हैं और उन पर चोरी का लोहा और ट्रक गायब करने तक के आरोप लगे हैं। संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तो बृजमोहन अग्रवाल के लाड़ले भाई योगेश अग्रवाल पर न केवल कलाकारों को बुलाने एवज में दलाली लेने बल्कि मनमानी चलानेका भी आरोप लगता रहा है। बृजमोहन के एक अन्य विभाग पर्यटन में तो विवादास्पद अफसरों को खोज खोज के दूसरे विभाग से लाया गया। अजय श्रीवास्तव पर तो सिमगां कांड तक के आरोप रहे हैं और उसे बृजमोहन अग्रवाल ने दुग्ध संघ से पुलिस और फिर पर्यटन में लाया। पर्यटन में सिर्फ विवादास्पद अधिकारयिों की नियुक्ति का ही मामल नहीं है यहां अरपों रुपये के घोटाले की फाइलें जांच के अभाव में धूल खा रही हैं। स्टेशनरी घोटाला हो या मोटल निर्माण में घोटाले की बात हो। मोटलों के बाउण्ड्री से लेकर खास घोटाले यहां सुर्खियों में रहे हैं। तिरथगढ़ में रोप वे बनाने के लिए कानून बनाने के लिए बगैर नाम पते के किसी शुक्ला को 2 करोड़ दे दिया गया और इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
बृजमोहन अग्रवाल के एक अन्य विभाग शिक्षा विभाग में तो भर्ती से लेकर तबादले और पदोन्नति में भी जमकर कमीशन खोरी की चर्चा रही। यही चर्चा पीडब्ल्यूडी में भी यह भी बृजमोहन अग्रवाल का ही विभाग है। सड़क निर्माण की इस एजेंसी में घटिया सड़क के एवज में करोड़ों रुपये खाये गये यही नहीं डामर घोटाले के आरोपी को भी बचा लिया गया। बृजमोहन ही नहीं अजय चंद्राकर पर भी करोड़ों रुपये अर्जित करने के आरोप लगते रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश सरकार के कई मंत्री व अधिकारी है जिन पर खुलेआम डंके की चोट पर भ्रष्टाचार करने के आरोप हैं।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में अंतत: केंद्रीय मंत्री राजा को इस्तीफा देना पड़ा लेकि छत्तीसगढ़ में भी कई मंत्री व अधिकारी हैं जिन्होंने रातों रात अपनी संपत्ति कई गुणा कर ली। पर्यटन में रोपवे घोटाले हो या पीडब्ल्यूडी में सड़क घोटाले, शिक्षा विभाग स्वास्थ्य, खनिज ऊर्जा में तो घोटाले की फेहरिस्त है लेकिन इस ओर न तो विपक्षी कांग्रेस का ही ध्यान है और न ही जांच एजेंसी की रूचि ही है।
छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद यदि भाजपा द्वारा अजीत जोगी सरकार के घोटाले की फेहरिस्त उजागर की गई और सत्ता में आते ही इन घोटालों पर से पर्दा नहीं उठाया गया तो इसके पीछे भाजपा सरकार में मंत्रियों व अधिकारियों की करतूतें हैं जिन्होंने 5-7 सालों में ही अपनी संपत्ति कई गुणा बढ़ा ली। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इन मामलों में कांग्रेस की भूमिका भी संदिग्ध होने लगी है। रमन सरकार के सर्वादिक चर्चित घोटाले में स्वास्थ्य विभाग का घोटाला है जिसके आरोपियों को सरकार संरक्षण दे रही है। करोड़ों रुपये के डाफ्टर खरीदी के अलावा पूर्व स्वास्थ्य सचिव बाबूलाल अग्रवाल के मामले में भी रमन सरकार कटघरे में है। आनन-फानन में बहाली की वजह सीए हाऊस पर लेन-देन का आरोप भी लग चुका है। यहां दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों मेंहुए घोटाले की कहानी को भी बेशर्मी से दबाई गई। बृजमोहन अग्रवाल जब गृहमंत्री थे तब तो उनके भाईयों पर कई गंभीर आरोप ही न लगे बल्कि आम चर्चा यह रही कि उनके भाईयों ने इस दौरान गृहमंत्री की भूमिका निभाते रहे हैं और शहर ही नहीं कई क्षेत्रों में विवादास्पद जमीनों की खरीदी भी की। कबाड़ कांड के हीरो रहे कैलाश अग्रवाल भी बृजमोहन के रिश्तेदार हैं और उन पर चोरी का लोहा और ट्रक गायब करने तक के आरोप लगे हैं। संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तो बृजमोहन अग्रवाल के लाड़ले भाई योगेश अग्रवाल पर न केवल कलाकारों को बुलाने एवज में दलाली लेने बल्कि मनमानी चलानेका भी आरोप लगता रहा है। बृजमोहन के एक अन्य विभाग पर्यटन में तो विवादास्पद अफसरों को खोज खोज के दूसरे विभाग से लाया गया। अजय श्रीवास्तव पर तो सिमगां कांड तक के आरोप रहे हैं और उसे बृजमोहन अग्रवाल ने दुग्ध संघ से पुलिस और फिर पर्यटन में लाया। पर्यटन में सिर्फ विवादास्पद अधिकारयिों की नियुक्ति का ही मामल नहीं है यहां अरपों रुपये के घोटाले की फाइलें जांच के अभाव में धूल खा रही हैं। स्टेशनरी घोटाला हो या मोटल निर्माण में घोटाले की बात हो। मोटलों के बाउण्ड्री से लेकर खास घोटाले यहां सुर्खियों में रहे हैं। तिरथगढ़ में रोप वे बनाने के लिए कानून बनाने के लिए बगैर नाम पते के किसी शुक्ला को 2 करोड़ दे दिया गया और इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
बृजमोहन अग्रवाल के एक अन्य विभाग शिक्षा विभाग में तो भर्ती से लेकर तबादले और पदोन्नति में भी जमकर कमीशन खोरी की चर्चा रही। यही चर्चा पीडब्ल्यूडी में भी यह भी बृजमोहन अग्रवाल का ही विभाग है। सड़क निर्माण की इस एजेंसी में घटिया सड़क के एवज में करोड़ों रुपये खाये गये यही नहीं डामर घोटाले के आरोपी को भी बचा लिया गया। बृजमोहन ही नहीं अजय चंद्राकर पर भी करोड़ों रुपये अर्जित करने के आरोप लगते रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश सरकार के कई मंत्री व अधिकारी है जिन पर खुलेआम डंके की चोट पर भ्रष्टाचार करने के आरोप हैं।
मंगलवार, 23 नवंबर 2010
कोयले की कमाई ग्लोब में लुटाई
हीरा ग्रुप ने भारत का गलत नक्शा वाला ग्लोब बांटा
महंगे गिफ्ट लेने वालों का नाम सार्वजित हो, सरकार चुप
छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित उद्योग समूह माने जाने वाले हीरा ग्रुप पर कोल ब्लाक का दाग अभी पूरी तरह से छूट भी नहीं पाया है कि वह एक बार फिर छत्तीसगढ़ के अधिकारियों व नेताओं-मंत्रियों को भारत का गलत नक्शा वाला ग्लोब बांटने को लेकर विवाद में आ गया है। इस मामले में हीरा ग्रुप की गलती कितनी है यह जांच का विषय तो हो सकता है लेकिन यह बात खुलकर सामने गई है कि बड़े उद्योग किस तरह से अधिकारियों व नेताओं को रिझाने महंगे गिफ्ट देती है। गिफ्ट लेने वाले अफसरों का नाम भी सावर्जनिक होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के इस उद्योग समूह ने दीपावली में छत्तीसगढ़ के नेताओं-मंत्रियों और अधिकारियों को कार्पोरेट गिफ्ट बांटा. इस गिफ्ट में जो ग्लोब बांटे गए उसमें भारत के नक्शे से जम्मू-कश्मीर और अरूणाचल प्रदेश ही गायब हैं। इस मामले को नागरिक संघर्ष समिति के डा. राकेश गुप्ता, अमिताभ दीक्षित, हरचरण जुनेजा और विश्वजीत मित्रा ने उठाते हुए मांग की कि हीरा ग्रुप इस गलती के लिए न केवल सार्वजनिक रूप से माफी मांगे बल्कि गिफ्ट वापस मंगवाकर जयस्तंभ में इसे जला दें। उन्होंने आश्चर्य जताया कि इतने बड़े मामले पर जांच एजेंसी की नजर नहीं पड़ी जबकि निर्माण कंपनी और हीराग्रुप पर भी उन्होंने देश विरोधी इस कार्रवाई के लिए जुर्म दर्ज की मांग सरकार से की। सरकार ने अभी तक इस पर जुर्म दर्ज नहीं किया है।
दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि इस बेशकीमती गिफ्ट हजारों की संघ्या में छत्तीसगढ़ के उन विभागों के अफसरों को बांटी गई है जिनका उद्योग समूह को आये दिन वास्ता पड़ता है। जिनमें बिजली, कोयला, खनिज और उद्योग विभाग के अफसर प्रमुख है। इसके अलावा मंत्री, विधायक व नेताों को भी यह बेशकीमती गिफ्त दी गई है।
कोल ब्लाक मामले में दाग लग चुके इस उद्योग समूह के इस करतूत से यह बात भी स्पष्ट हो गई है कि किस तरह से अपने पक्ष में करने उद्योग समूहों द्वारा गिफ्ट बांटे जाते हैं। क्या इस पर आयकर विभाग भी नजर डालेगा। दूसरीतरफ ऐसे लोगों से गिफ्ट लेना किस तरह उचित है। आम लोगों में इसे लेकर काफी तीखी प्रतिक्रिया है। बहरहाल इस सम्पूर्ण मामले में हीरा ग्रुप को एक बार फिर विवाद में तो लिया ही है प्रदेश के मंत्री और अफसरों पर भी उंगली उठने लगी है।
महंगे गिफ्ट लेने वालों का नाम सार्वजित हो, सरकार चुप
छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित उद्योग समूह माने जाने वाले हीरा ग्रुप पर कोल ब्लाक का दाग अभी पूरी तरह से छूट भी नहीं पाया है कि वह एक बार फिर छत्तीसगढ़ के अधिकारियों व नेताओं-मंत्रियों को भारत का गलत नक्शा वाला ग्लोब बांटने को लेकर विवाद में आ गया है। इस मामले में हीरा ग्रुप की गलती कितनी है यह जांच का विषय तो हो सकता है लेकिन यह बात खुलकर सामने गई है कि बड़े उद्योग किस तरह से अधिकारियों व नेताओं को रिझाने महंगे गिफ्ट देती है। गिफ्ट लेने वाले अफसरों का नाम भी सावर्जनिक होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के इस उद्योग समूह ने दीपावली में छत्तीसगढ़ के नेताओं-मंत्रियों और अधिकारियों को कार्पोरेट गिफ्ट बांटा. इस गिफ्ट में जो ग्लोब बांटे गए उसमें भारत के नक्शे से जम्मू-कश्मीर और अरूणाचल प्रदेश ही गायब हैं। इस मामले को नागरिक संघर्ष समिति के डा. राकेश गुप्ता, अमिताभ दीक्षित, हरचरण जुनेजा और विश्वजीत मित्रा ने उठाते हुए मांग की कि हीरा ग्रुप इस गलती के लिए न केवल सार्वजनिक रूप से माफी मांगे बल्कि गिफ्ट वापस मंगवाकर जयस्तंभ में इसे जला दें। उन्होंने आश्चर्य जताया कि इतने बड़े मामले पर जांच एजेंसी की नजर नहीं पड़ी जबकि निर्माण कंपनी और हीराग्रुप पर भी उन्होंने देश विरोधी इस कार्रवाई के लिए जुर्म दर्ज की मांग सरकार से की। सरकार ने अभी तक इस पर जुर्म दर्ज नहीं किया है।
दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि इस बेशकीमती गिफ्ट हजारों की संघ्या में छत्तीसगढ़ के उन विभागों के अफसरों को बांटी गई है जिनका उद्योग समूह को आये दिन वास्ता पड़ता है। जिनमें बिजली, कोयला, खनिज और उद्योग विभाग के अफसर प्रमुख है। इसके अलावा मंत्री, विधायक व नेताों को भी यह बेशकीमती गिफ्त दी गई है।
कोल ब्लाक मामले में दाग लग चुके इस उद्योग समूह के इस करतूत से यह बात भी स्पष्ट हो गई है कि किस तरह से अपने पक्ष में करने उद्योग समूहों द्वारा गिफ्ट बांटे जाते हैं। क्या इस पर आयकर विभाग भी नजर डालेगा। दूसरीतरफ ऐसे लोगों से गिफ्ट लेना किस तरह उचित है। आम लोगों में इसे लेकर काफी तीखी प्रतिक्रिया है। बहरहाल इस सम्पूर्ण मामले में हीरा ग्रुप को एक बार फिर विवाद में तो लिया ही है प्रदेश के मंत्री और अफसरों पर भी उंगली उठने लगी है।
सोमवार, 22 नवंबर 2010
मंत्री भाई की रूचि से चेम्बर चुनाव में विवाद!
आगामी माह होने वाले प्रतिष्ठित व्यापारी संगठन छत्तीसगढ़ चेम्बर आफ कामर्ल एंड इंडस्ट्रीज के चुनाव में प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के लाड़ले भाई योगेश अग्रवाल की रूचि से विवाद बढ़ गया है। कहा जाता है कि इस बार चुनाव में सत्ता की ताकत को बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है जिसकी वजह से चेम्पर के पूर्व अध्यक्ष पूरनलाल अग्रवाल नाराज हैं और कई व्यापारियों ने चिंता जताई है।
छत्तीसगढ़ चेम्पर का चुनाव को लेकर व्यापारियों में जबरदस्त चर्चा है। वर्तमान अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी के द्वारा पुन: अध्यक्ष बनने में रूचि दिखाने को विरोधी गुट पचा नहीं पा रहे हैं जबकि पूर्व अध्यक्ष पूरनलाल अग्रवाल ने भी अध्यक्ष बनने की ईच्छा जता दीहै। इधर पिछली बार ही चुनाव भले ही शांतिपूर्ण निपट गया था लेकि कहा जाता है कि चेम्बर की राजनीति को लेकर योगेश अग्रवाल और पूरनलाल अग्रवाल में ठन गई थी। मामला चमकी धमकी और रायपुर में रहने देने तक पहुंच गया था और एक पक्ष ने माफी नामे के बाद ही मामला शांत हो पाया था।
इस बार भी चेमबर चुनाव में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई योगेश अग्रवाल ने न केवल रूचि दिखाई है बल्कि बैठकों में वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। कहा जाता है कि जरूरत पड़ने पर वे भी अध्यक्ष का चुनाव लड़ सकते हैं। योगेश की इस रूचि से व्यापारियों के एक बड़े वर्ग में नाराजगी बताई जा रही है। दरअसल योगेश पर जमीन मामले से लेकर पिटाई व धमकी-चमकी के आरोप भी लगे हैं ऐसे विवादित को अध्यक्ष बनाने को लेकर व्यापारियों का एक वर्ग नाराज है यही वजह है कि पूरनलाल अग्रवाल और श्रीचंद सुंदरानी पुन: अध्यक्ष बनने को इच्छुक है।
चेम्बर सूत्रों के मुताबिक व्यापारियों पर पूरनलाल अग्रवाल और श्रीचंद सुंदरानी का अच्छा खासा प्रभाव है जबकि योगेश को राईस मिल एसोसियेशन तक का ठीक ढंग से समर्थन नहीं मिलने की चर्चा है। इधर व्यापारियों की एकता को बनाये रखने पांच सदस्यीय समिति बनाई गई है। जिसमें रमेश रमोदी, भारामल, पोहूमल,हरचरण सिंह साहनी और सुशील अग्रवाल शामिल है जो व्यापारी एकता पैनल में सर्वसम्मत उम्मीदवार का चयन करेंगे।
इधर व्यापारी नेता आनंद चोपकर ने निगम द्वारा तोड़फोड़ के मामले में चेम्बर की भूमिका को लेकर सवाल उठा दिया है जिसकी वजह से भी चुनाव में इस बार गर्मी बढ़ गई है। जबकि जितेंद्र बरलोटा, राजेंद्र जग्गी, गुलवानी, संधु जैसे लोग भी चुनाव लड़ने इच्छुक हैं।
सर्वाधिक घमासान की स्थिति अध्यक्ष और महामंत्री के पद को लेकर है। और इन पदों के लिए जिस तरह से मंत्री भाई ने रूचि दिखाई है उससे इस बार हंगामा खड़ा होने की संभावना भी जताई जा रही है।
छत्तीसगढ़ चेम्पर का चुनाव को लेकर व्यापारियों में जबरदस्त चर्चा है। वर्तमान अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी के द्वारा पुन: अध्यक्ष बनने में रूचि दिखाने को विरोधी गुट पचा नहीं पा रहे हैं जबकि पूर्व अध्यक्ष पूरनलाल अग्रवाल ने भी अध्यक्ष बनने की ईच्छा जता दीहै। इधर पिछली बार ही चुनाव भले ही शांतिपूर्ण निपट गया था लेकि कहा जाता है कि चेम्बर की राजनीति को लेकर योगेश अग्रवाल और पूरनलाल अग्रवाल में ठन गई थी। मामला चमकी धमकी और रायपुर में रहने देने तक पहुंच गया था और एक पक्ष ने माफी नामे के बाद ही मामला शांत हो पाया था।
इस बार भी चेमबर चुनाव में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई योगेश अग्रवाल ने न केवल रूचि दिखाई है बल्कि बैठकों में वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। कहा जाता है कि जरूरत पड़ने पर वे भी अध्यक्ष का चुनाव लड़ सकते हैं। योगेश की इस रूचि से व्यापारियों के एक बड़े वर्ग में नाराजगी बताई जा रही है। दरअसल योगेश पर जमीन मामले से लेकर पिटाई व धमकी-चमकी के आरोप भी लगे हैं ऐसे विवादित को अध्यक्ष बनाने को लेकर व्यापारियों का एक वर्ग नाराज है यही वजह है कि पूरनलाल अग्रवाल और श्रीचंद सुंदरानी पुन: अध्यक्ष बनने को इच्छुक है।
चेम्बर सूत्रों के मुताबिक व्यापारियों पर पूरनलाल अग्रवाल और श्रीचंद सुंदरानी का अच्छा खासा प्रभाव है जबकि योगेश को राईस मिल एसोसियेशन तक का ठीक ढंग से समर्थन नहीं मिलने की चर्चा है। इधर व्यापारियों की एकता को बनाये रखने पांच सदस्यीय समिति बनाई गई है। जिसमें रमेश रमोदी, भारामल, पोहूमल,हरचरण सिंह साहनी और सुशील अग्रवाल शामिल है जो व्यापारी एकता पैनल में सर्वसम्मत उम्मीदवार का चयन करेंगे।
इधर व्यापारी नेता आनंद चोपकर ने निगम द्वारा तोड़फोड़ के मामले में चेम्बर की भूमिका को लेकर सवाल उठा दिया है जिसकी वजह से भी चुनाव में इस बार गर्मी बढ़ गई है। जबकि जितेंद्र बरलोटा, राजेंद्र जग्गी, गुलवानी, संधु जैसे लोग भी चुनाव लड़ने इच्छुक हैं।
सर्वाधिक घमासान की स्थिति अध्यक्ष और महामंत्री के पद को लेकर है। और इन पदों के लिए जिस तरह से मंत्री भाई ने रूचि दिखाई है उससे इस बार हंगामा खड़ा होने की संभावना भी जताई जा रही है।
रविवार, 21 नवंबर 2010
अनुपातहीन संपत्ति, फर्जी रजिस्ट्री, पत्नी को मारने के प्रयास के बाद भी नौकरी कायम!
पैसा और पहुंच -1
अनुपातहीन संपत्ति, फर्जी रजिस्ट्री, पत्नी को मारने के प्रयास के बाद भी नौकरी कायम!
छत्तीसगढ़ राय को बने 10 साल पूरे हो गये हैं किसी भी राय के विकास और कानून व्यवस्था कायम रखने दस बरस कम नहीं होते है। छत्तीसगढ़ के आम लोगों ने इन दस वर्षों में क्या पाया यह मायने नहीं रखता है। मायने यह रखता है कि हमने जो कुछ पाया वह किन शर्तों में पाया। क्या सरकार में बैठे लोगों ने नैतिकता का पालन किया। भ्रष्ट व चरित्रहीन सरकारी नौकरशाहों व जनप्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई हो पाई। या सिर्फ वोट बैंक और नोट कमाने का जरिया ही सर्वोपरि है। एक रिपोर्ट......
आज यहां हम सरकारी नौकरी यानि परिवहन विभाग के निरीक्षक विजय कुमार अनंत की बात कर रहे हैं। वैसे तो परिवनह यानी आरटीओ की सबसे कमाऊ विभाग में गिनती होती है। यहां कार्यरत आरटीओ इंस्पेक्टर विजय कुमार अनंत छत्तीसगढ़िया है और बिलासपुर क्षेत्र के निवासी है।
इनके खिलाफ जनवरी 2006 में जब आर्थिक अपराध ब्यूरो ने कार्रवाई की तब पता चला कि अनंत के पास एक करोड़ से ऊपर की अनुपातहीन संपत्ति मिली। तब प्रकरण क्रमांक 1-103 में अपराध पंजीबध्द किया गया। मीडिया से लेकर आम लोगों ने खूब हल्ला मचाया। लेकिन आर्थिक अपराध ब्यूरो ने चार साल बीत जाने के बाद भी चालान पेश नहीं किया। जनवरी 2011 में 5 साल पूरे हो जाएंगे। जाहिर है पैसे की ताकत के आगे ही ऐसा हुआ होगा। इस दौरान अनंत जगदलपुर में पदस्थ थे।
अनंत का मामला यहीं खत्म नहीं होता। इसके पहले उन पर ग्राम मुजगहन की जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कराने का भी आरोप लगा है। कहा जाता है कि 10-2-2004 को अशोक वर्मा ने अनंत को जो जमीन की रजिस्ट्री कराई। इस दौरान वह रजिस्ट्री आफिस में मौजूद ही नहीं था। इस दिन सरकारी रिकार्ड के मुताबिक वह लोदाम स्थित शंकर बेरियर में डयूटी पर न केवल तैनात था बल्कि इस दौरन उन्होंने चालानी कार्रवाई तक की। ऐसे में 10-2-2004 को उनके उपस्थिति की बात ही बेमानी थी। इसका सबूत तब मिला जब अनंत ने 5-5-2005 को इसी जमीन के बाजू स्थित जमीन की रजिस्ट्री के दौरान उपस्थित हुआ तब दोनों हस्ताक्षर भिन्न मिले।
मामली यही खत्म नहीं होता इस साल 2010 को उनकी पत्नी उर्मिला ने कोर्ट में शपथ पत्र दिया कि उसके पति विजय कुमार अनंत ने उन्हें जान से मारने की कोशिश की उन पर मिट्टी तेल डाला गया। इस दौरन अनिता नायक महिला ने भी द्वारा उन्हें मारने में सहयोग देने की बात कही गई। इस पर न्यायालय ने अनंत के खिलाफ धारा 307 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया। ये विजय कुमार अनंत पर लगे आरोप हैं। इन आरोपों के बाद भी उनकी नौकरी कायम है और सरकार में बैठे संबंधित विभाग के अधिकारी से लेकर मंत्री तक खामोश है।
इस संबंध में जब हमने संबंधित लोगों सेचर्चा करनाचाही तो सभी का रटा रटाया डायलाग था कि सिर्फ आरोप से कुछ नहीं होता जबकि अनंत से संपर्क नहीं हो पाया।
अनुपातहीन संपत्ति, फर्जी रजिस्ट्री, पत्नी को मारने के प्रयास के बाद भी नौकरी कायम!
छत्तीसगढ़ राय को बने 10 साल पूरे हो गये हैं किसी भी राय के विकास और कानून व्यवस्था कायम रखने दस बरस कम नहीं होते है। छत्तीसगढ़ के आम लोगों ने इन दस वर्षों में क्या पाया यह मायने नहीं रखता है। मायने यह रखता है कि हमने जो कुछ पाया वह किन शर्तों में पाया। क्या सरकार में बैठे लोगों ने नैतिकता का पालन किया। भ्रष्ट व चरित्रहीन सरकारी नौकरशाहों व जनप्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई हो पाई। या सिर्फ वोट बैंक और नोट कमाने का जरिया ही सर्वोपरि है। एक रिपोर्ट......
आज यहां हम सरकारी नौकरी यानि परिवहन विभाग के निरीक्षक विजय कुमार अनंत की बात कर रहे हैं। वैसे तो परिवनह यानी आरटीओ की सबसे कमाऊ विभाग में गिनती होती है। यहां कार्यरत आरटीओ इंस्पेक्टर विजय कुमार अनंत छत्तीसगढ़िया है और बिलासपुर क्षेत्र के निवासी है।
इनके खिलाफ जनवरी 2006 में जब आर्थिक अपराध ब्यूरो ने कार्रवाई की तब पता चला कि अनंत के पास एक करोड़ से ऊपर की अनुपातहीन संपत्ति मिली। तब प्रकरण क्रमांक 1-103 में अपराध पंजीबध्द किया गया। मीडिया से लेकर आम लोगों ने खूब हल्ला मचाया। लेकिन आर्थिक अपराध ब्यूरो ने चार साल बीत जाने के बाद भी चालान पेश नहीं किया। जनवरी 2011 में 5 साल पूरे हो जाएंगे। जाहिर है पैसे की ताकत के आगे ही ऐसा हुआ होगा। इस दौरान अनंत जगदलपुर में पदस्थ थे।
अनंत का मामला यहीं खत्म नहीं होता। इसके पहले उन पर ग्राम मुजगहन की जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कराने का भी आरोप लगा है। कहा जाता है कि 10-2-2004 को अशोक वर्मा ने अनंत को जो जमीन की रजिस्ट्री कराई। इस दौरान वह रजिस्ट्री आफिस में मौजूद ही नहीं था। इस दिन सरकारी रिकार्ड के मुताबिक वह लोदाम स्थित शंकर बेरियर में डयूटी पर न केवल तैनात था बल्कि इस दौरन उन्होंने चालानी कार्रवाई तक की। ऐसे में 10-2-2004 को उनके उपस्थिति की बात ही बेमानी थी। इसका सबूत तब मिला जब अनंत ने 5-5-2005 को इसी जमीन के बाजू स्थित जमीन की रजिस्ट्री के दौरान उपस्थित हुआ तब दोनों हस्ताक्षर भिन्न मिले।
मामली यही खत्म नहीं होता इस साल 2010 को उनकी पत्नी उर्मिला ने कोर्ट में शपथ पत्र दिया कि उसके पति विजय कुमार अनंत ने उन्हें जान से मारने की कोशिश की उन पर मिट्टी तेल डाला गया। इस दौरन अनिता नायक महिला ने भी द्वारा उन्हें मारने में सहयोग देने की बात कही गई। इस पर न्यायालय ने अनंत के खिलाफ धारा 307 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया। ये विजय कुमार अनंत पर लगे आरोप हैं। इन आरोपों के बाद भी उनकी नौकरी कायम है और सरकार में बैठे संबंधित विभाग के अधिकारी से लेकर मंत्री तक खामोश है।
इस संबंध में जब हमने संबंधित लोगों सेचर्चा करनाचाही तो सभी का रटा रटाया डायलाग था कि सिर्फ आरोप से कुछ नहीं होता जबकि अनंत से संपर्क नहीं हो पाया।
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