शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नव-वर्ष की शुभकामनाए

  आज संकल्प लेना ही होगा की हम चुप नहीं रहेंगे चाहे इसके लिए हमें कोई सी भी क़ुरबानी देनी पड़े क्योकि हमारी ख़ामोशी से गलत प्रोत्साहित होता है और सही हतोत्साहित होता है . हमारी चुप्पी तोड़ने का मतलब हमारी और हमरी आने वाली पीडी को सुख दिलाना है जरा सोचिये यदि हमारे सेनानी चुप होते तो?

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

बैकुंठ पुर के सी एम् ओ के ७ ठिकानो पर छापा

इ ओ डब्ल्यू ने आज बैकुंठपुर के सी ऍम ओ डॉ गंभीर सिंह ठाकुर के सात ठिकानो पर छापे की कारवाई में ४ करोड़ से अधिक की अनुपातहीन संम्पत्ति का खुलासा हुआ है.

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान

स्थापना दिवस पर कांग्रसियों ने स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान किया






स्वदेशी मेला

रायपुर के शंकर नगर स्थित बी टी आई मैदान में स्वदेशी मेला चल रहा है यह ३१ दिसम्बर तक चलेगा  

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

आजीवन कारावास

रायपुर   कोर्ट   नेनारायण  सान्याल  , विनायक  सेन  व्  पियूष  गुहा  को  नक्सालियों   के  साथ  सम्दंध  रखने  के  आरोप   में  देशद्रोह  करार  देते  हुए  आजीवन  कारावास  की  सजा  सुनाई  है   






बुधवार, 22 दिसंबर 2010

बाजारवाद से मंडी बनता मीडिया

क  2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह से मीडिया जगत पर कालिख पुती है वह मालिकों के लिए नया सबक हो लेकिन पत्रकारों के लिए किसी शर्मिन्दगी से कम नहीं है। विज्ञापन के नाम पर खबरें बेचे जाने की सोच ने इस चौथे स्तंभ पर बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव को खतरनाक स्थिति पर लाने लगा है। खासकर अब तक अछूते रहे प्रिंट मीडिया पर जिस तरह से बाजारवाद हावी होने लगा है वह पत्रकारिता गरिमा को खंडित करने वाला है। कभी अखबार निकालना एक मिशन हुआ करता था लेकिन मालिकों के पैसे की भूख ने मीडिया को मंडी और रंडी तक कहने मजबूर कर दिया है। क्या मीडिया सिर्फ अपने ग्राहकों के लिए है जो मोटी रकम दी जाती है।
इस सवाल को यदि नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में उनकी गिनती भी नेता और अधिकारियों के साथ होने लगेगी। यह सच है कि इस अर्थ युग में हर संस्थानों का क्षरण हुआ है लेकिन आज भी लोगों का विश्वास अखबार जगत के प्रति बना हुआ है। आज भी लोग व्यवस्था बनाए रखने में अखबार की भूमिका पर विश्वास करते हैं लोग नेता अधिकारियों के निरंकुशता के खिलाफ अखबार को ही प्रमुख हथियार मान कर अपनी बात कहने में संकोच नहीं करते हैं। लेकिन जिस तरह से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भास्कर ग्रुप का नाम सामने आया है वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं शर्मनाक भी है। इसे यहीं रोक देना चाहिए अन्यथा पत्रकारों के पास कुछ भी नहीं बचेगा। सिर्फ नौकरी और जीवन चलाने की मंशा रखने वालों के लिए किसी को कुछ नहीं कहना है लेकिन जो लोग सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इस मिशन से जुड़े हैं वे जरुर सोचे कि वे किस तरह से किनके लिए काम कर रहे हैं।
भटनागर की माया
वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद आए दिन नए-नए अखबारों का प्रकाशन होने लगा है कभी अजीत जोगी के खास रहे अशोक भटनागर ने भी लोकमाया के नाम से दैनिक अखबार शुरु कर दिया है। कभी मीडियेटर के रुप में ख्याति प्राप्त अशोक भटनागर को पत्रकार नहीं मिल रहा है तो इसकी वजह उनकी अपनी ईमेज ही है।
रोजी रोटी जरूरी है...
इन दिनों राजधानी के ख्यातिनाम पत्रकार से लेकर फोटोग्राफर एक मंत्री की सेवा बजा रहे हैं। इस दौड़ में सबसे अच्छी बात यह है कि खबरों को लेकर मन मारना नहीं पड़ेगा और वेतन तो अच्छा खासा है ही साथ ही मंत्री जी के साथ रहने से खाने पीने की भी दिक्कत नहीं होगी।
रे की छुट्टी
अंग्रेजी पत्रिका सम-अप से पत्रकारिता करने की सोचने वाले आईएएस अधिकारी बी.के.एस. रे की छुट्टी हो गई है। कहा जाता है कि मंत्रालय में बैठे अफसरों के पंगे से त्रस्त कटारिया को यह फैसला करना पड़ा।
और अंत में...
आज की जनधारा के बिकने की खबर इतनी बार उड़ चुकी है कि अब इस खबर पर कोई ध्यान नहीं देता।

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

जिनसे उम्मीद खी बनाए मजार मेरा,वही मेरे कब्र के पत्थर चुराकर ले गए!

पता नहीं शायर ने यह किस परिपेक्ष्य में कही थी लेकिन छत्तीसगढ़ का वन अमला इन दिनों इसी तरह के दौर से गुजर रहा है। दर्जनों अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के मामले लंबित पड़े हैं और सरकार भी इन्हें प्रमुख पदों पर बिठा रखी है यह अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। सरकार किसी की भी रहे इन अफसरों ने अपनी निजी संपत्तियों में ईजाफा कर भ्रष्टाचार का रिकार्ड बनाया है।
प्रदेश के जिन दर्जनों वन अफसरों पर लोग आयोग की जांच चल रही है उनमें से बालमुकुंद मायरिया, पीएम तिवारी, एससी रहतगांवकर, जेएससीएस राव, एनएस डुंगरियाल, जे.के. उपाध्याय, हेमंत कुमार पाण्डेय, एमडी बडग़ैय्या, अमरनाथ प्रसाद, श्रीनिवास राव, सुधीर अग्रवाल, वी.रामाराव, एस.पी. रजक, सीएस अग्रवाल, तपेश कुमार झा और गोविन्द राव ऐसे अफसर है जो लोक आयोग की जांच के घेरे में होने के बावजूद ऐसे पदों पर बैठे हैं जो प्रमुख पद माने जाते हैं। सरकार कह तो रही है कि वे ईमानदारी से काम कर रही है लेकिन भ्रष्ट अफसरों के भरोसे किस तरह से काम हो रहा होगा आसानी से समझा जा सकता है।
प्रदेश में अफसरशाही किस कदर हावी है यह वन अमलों के कारनामों से समझा जा सकता है। निरकुंश और भ्रष्टाचार में डुबे अफसरों के चलते वन विभाग में माफिया राज चल रहा है। इनकी पहुंच का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिन अफसरों ने मुख्यमंत्री और वन मंत्री के क्षेत्र में भी घपलेबाजी की है वे तक न केवल नौकरी में बने हुए हैं बल्कि प्रमुख पदों पर आसीन है। क्या हम यह मान लें कि इस मामले में मुख्यमंत्री की नहीं चलती और इससे भी कोई ऊपर है जो ऐसे भ्रष्ट अफसरों को बिठाकर रखे हैं इससे सरकार की छवि बने या बिगड़े इन्हें कोई मतलब नहीं है या फिर मुख्यमंत्री व वन सचिव की इस भ्रष्टाचार में सहमति है।
छत्तीसगढ़ राज्य को बने 10 साल हो चुके हैं और इन दस सालों में अफसरशाही इस कदर हावी है कि इन लोगों ने सरकार को अपनी मुट्ठी में कर रखा है क्या यह लोकतंत्र की अंधेरगर्दी नहीं है। वन विभाग छत्तीसगढ़ राज्य की रीड़ है आधा क्षेत्र इसी विभाग के पास है जहां वन माफिया सालों से वनों की बर्बादी में लगे हैं यहां रहने वाले लोगों का जीवन स्तर सुधारने अनेक सरकारी योजनाएं भी बनी लेकिन प्राय: सभी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। करोड़ों अरबों रुपए खर्च किए गए लेकिन इनमें से अधिकांश रुपए अफसरों के जेबों में चला गया। आम लोगों ने इस बीच कई सरकार बदली और विधायक भी बदले गए लेकिन जिसने भी कुर्सी पाई उन्हीं लोगों ने चंद सिक्कों के लालच में ऐसे भ्रष्ट अफसरों को पनाह देने का काम किया क्या यब सब किसी अंधेरगर्दी से कम है।