शुक्रवार, 16 मार्च 2012

घटिया बायो गैस चूल्हा बांटने का औचित्य...


छत्तीसगढ़ सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी थमने का नाम ही नहीं ले जा रहा है। हालात यह है कि हर काम में अधिकारियों की जेब भरो नीति से रमन सिंह की छवि को आघात लग रहा है और मंत्री कमीशन खाकर ऐसे अधिकारियों का बचाव कर रहे हैं।
डॉ. रमन सिंह आम लोगों के हित की योजना बनाने कहते हैं और अधिकारी ऐसी योजना बनाते हैं जिससे उनकी जेब गरम हो। प्रदेश में आदिवासियों को बांटे जा रहे बायो गैस चूल्हा का भी यही हाल है। एनजीओ के माध्यम से बंटवाये गए इस चूल्हे से प्रदेश का करोड़ों रूपया अधिकारियों और एनजीओ के जेब में चला गया और आदिवासी इस खराब चूल्हे को लेकर सरकार को कोस रहे है।
प्रदेश सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना के तहत 44 हजार 702 आदिवासी परिवारों को एनजीओ के माध्यम से बायो गैस चूल्हा बांटा गया और जब इसके खराब निकलने की शिकायत पर जांच हुई तो यह सही पाया गया। लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कोरबा और कोण्डागांव में एनजीओ का भुगतान रोक दिया गया। जबकि बाकी जगह पर जांच के नाम पर मामले को लटका दिया गया।
करोड़ों रूपये की इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर जिस तरह से बंदरबांट हुई है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। इस मामले का सबसे रोचक पक्ष तो यह है कि कि बायो गैस चूल्हा बांटने का काम उन्हीं एनजीओ को सौंपा गया जिनमें अधिकारियों व नेताओं के रिश्तेदार हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्य जनक है कि आदिवासियों के नाम पर चल रही इस पूरी योजना को फ्लॉप करने वाले अधिकारी अभी तक कुर्सी पर जमें हुए हैं।
विकास की ओर बढ़ रहे छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है उसे रोक पाने में सरकार पूरी तरह विफल हो गई है। अधिकारियों की मनमानी चरम पर है। ईमानदारों को प्रताडि़त कर आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा है। उद्योगों को करोड़ों रूपये की छूट देकर आम आदमी के बिजली में बढ़ोत्तरी की जा रही है। मनोज डे से लेकर बाबूलाल अग्रवाल जैसे अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं और जांच के नाम पर बड़े से बड़ा मामला लटकाया जा रहा है। एंटी करप्शन ब्यूरों की कार्रवाई बताती है कि अनुपातहीन संपत्ति वाले अधिकारियों की संख्या कहां तक जा सकती है लेकिन ऐसे छापों के औचित्य पर सरकार में बैठे लोग सवालिया निशान लगाने में आमदा है और कोर्ट में चालान पेश करने की अनुुमति ही नहीं दी जाती। हालात यह है कि कई मीडिया कर्मी दलाल के रूप में चर्चित होने लगे हैं।
बायो गैस चूल्हा वितरण में जिस पैमाने पर गड़बड़ी हुई है उसके लिए कड़ी कार्रवाई नहीं की गई तो यह सिलसिला अंतहीन हो जायेगा...।
-कौशल तिवारी

बागड़े की बहादूरी मंत्री की लाचारी


यह तो जिसकी लाठी उसी भैस की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना नगर निवेशक संदीप बागड़े तीन-तीन विभागों की जिम्मेदारी नहीं संभाल रहे होते। उपर से तुर्रा यह है कि कभी फंसने की नौबत दिखी तो मामले से पल्ला झाडऩे उन्हें बखूबी आता है। भले ही ऐसे मामलों में विभाग को कितना भी नुकसान हो जाए। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस मामले में विभागीय मंत्री भी उसका कुछ नहीं करते हैं।
नगर निगम, टाउन एण्ड कंट्री और रायपुर विकास प्राधिकरण में अपना करतब दिखाने वाले संदीप बागड़े पर सरकार इतनी मेहरबान क्यूं है यह तो वहीं जाने लेकिन उनके कार्यकाल में हुए घपले की फेहरिश्त लोगों के जुबान चढ़कर बोलने लगी है।
ताजा मामला रजबंधा मैदान के ब्लॉक नंबर 9 के प्लांट नंबर 1 का है। वाणिज्यिक उपयोग के लिए दे दिया गया और जब इस मामले को लेकर हमर लंगवारी संस्था के इंदरजीत छाबड़ा, राकेश चौबे व संजय सोलंकी ने सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो अधिकारियों के होश गुम हो गये। चूंकि वाणिज्यिक उपयोग के पत्र मिलते ही यहां काम्प्लेक्स बनना शुरू हो गया है और वह पूरी तरह तैयार होने को है ऐसे में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में जब फंसने की नौबत आई तो नगर निवेशक संदीप बागड़े ने 8 फरवरी 2012 को जारी पत्र में कह दिया कि वाणिज्यिक उपयोग त्रुटिवश टंकित हो गया।
सूत्रों ने बताया कि इस जब पट्टा किसी और उपयोग के लिए दिया गया है तब इसका उपयोग किस आधार पर बदला गया। इसे लेकर लम्बे सौदेबाजी की चर्चा है। कहा जाता है इस मामले में स्वयं को बचाने के इंतजार में लगे संदीप बागड़े के इस करतूत पर कई सवाल खड़े होने लगे है कि यदि टंकन में त्रुटि हुई तो इसे पूरी बिल्डिंग खड़े होते तक क्यों नहीं सुधारा गया।  आज जब पूरा शहर इस भव्य बनते बिल्डिंग को देख रहे हैं। तब निगम ने अफसरों ने जांच क्यों नहीं की और जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तब ही टंकन त्रुटि का पता कैसे चला।
सबसे रोचक तथ्य तो यह है कि अब जब त्रुटि की जानकारी मिल गई है तब इसके वाणिज्यिक उपयोग पर रोक कैसे लगाया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि संदीप बागले के कार्यों को लेकर पहली बार उंगली उठी है बताया जाता है कि जब राजेश मूणत मंत्री थे तब उन्होंने पार्किंग को लेकर शहर के कई दुकानों व काम्प्लेक्सों को सील किया था तब चर्चा यह भी थी कि उन्होंने उनके सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ा था उल्टे बाद में राजेश मूणत को विभाग से जाना पड़ा लेकिन संदीप बागड़े का कुछ नहीं हुआ।
सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि जिन काम्प्लेक्सों व दुकानों में सील लगा था वहां लेनदेन दूर सील खोल दी गई थी जिनमें से विनित स्टेट व क्रिस्टल आर्केट के मामले में तो लंबी लेनदेन की खबर है।
बताया जाता है कि मजबूत पकड़ रखने व पैसों के बोलबाला के चलते ही संदीप बागड़े न केवल नगर निगम में निवेशक के पद पर बने हुए है बल्कि उनके पास राविप्रा व टाउन एंड कंट्री प्लानिंग का भी प्रभार है।

गुरुवार, 15 मार्च 2012

उद्योगों को बिजली की छूट आम आदमी की जेब से लूट



छत्तीसग सरकार ने एक तरफ आम उपभोक्ताओं से बिजली बिल की वसूली में केवल कड़ा रुख अख्तियार की है बल्कि विरोध के बावजूद बिजली दर में वृिद्ध करने आमदा हैं वहीं दूसरी तरफ 38 उद्योगों के बकाया 22 करोड़ रुपए का बिल माफ कर दिया। जिन उद्योगों के बिजली बिल माफ किये गये हैं उनमें से कई उद्योगों में भाजपा नेताओं के रिश्तेदार डायरेक्टर भी हैं।
छत्तीसगढ़ में चल रहे राम नाम की लूट थमने का नाम ही नहीं ले रहा है यही वजह है कि इस सरकार की कोई उद्योगपति की सरकार कह रहा है तो कोई व्यापारियों की सरकार कह रहा है। आम लोगों को सस्ते दर पर अनाज देकर जनता की हितैषी बनने वाली राज्य सरकार ने प्रदेश के 38 उद्योगों का 22 करोड़ से अधिक का बिजली बिल माफ कर दिया है।
उर्जा विभाग और राज्य विद्युत नियामक आयोग के आदेश पर उद्योगों को दी गई छूट को लेकर भ्रष्टाचार की बात जन चर्चा का विषय है। जिस विभाग के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह स्वयं हो वहां नियामक आयोग के विवादित अध्यक्ष  को बिठाये जाने से पहले ही मुख्यमंत्री की साफ छवि को धक्का लगा है।
बताया जाता है कि नियामक आयोग के अध्यक्ष मनोज डे पर ट्रांसफार्मर और मीटर खरीदी में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया है और अब चर्चा यह है कि मनोज डे के अध्यक्ष बनने के बाद ही उद्योगों को 22 करोड़ रुपये की छूट से एक क्या विवाद खड़ा हो गया है।
एक तरफ बिजली विभाग हजार करोड़ के आसपास के घाटे में चल रहा है और दूसरी तरफ घरेलु बिजली दर में वृद्धि की बात हो रही है तब 38 उद्योगों के 22 करोड़ के बिजली बिल को माफ करना अनेक संदेहों को जन्म देता है.
हमारे भरोसे मंद सूत्रों ने बताया कि जिन 38 उद्योगों का बिजली बिल माफ किया गया है उनमें से कई उद्योगों में भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों की भागीदारी है और यही वजह है कि घाटे में चलने के बावजूद बिजली बिल माफ किया गया है। चर्चा इस बात की भी है कि इन उद्योगों के बिल माफ करन ेके एवज में जमकर सौदेबाजी की गई और पैसा नहीं देने वाले 3 उद्योगों को तकनीकी आधार पर छूट नहीं दिया गया।
जिन उद्योगों को छूट दी गई हैं उनमें से हीरा फेरो, लहरी पावर, शारदा एनर्जी, अमरनाथ पावर, भवानी मोल्डर्स एव्ही स्टील किनकी है यह पूरा शहर जनता है। उद्योगों को दी गई इस छूट से आम लोगों में भारी नाराजगी है।
बताया जाता है कि विद्युत विभाग में बैठे कई अधिकारी मुख्यमंत्री को बदनाम करने न केवल जमकर  भ्रष्टाचार कर रहे हैं बल्कि उटपटांग काम भी कर रहे हैं।
जोगी शासन काल में फायदे में चलने वाला बिजली विभाग और तीन साल पहले तक इन्कम टैक्स पटाने वाला विभाग अचानक कैसे घाटे में चला गया यह आम लोगों के समझ के बाहर की बात है।
बहरहाल घरेलु बिजली के दर में वृद्धि करने की कवायद करने वाला विभाग यदि उद्योगों का बिजली बिल माफ कर रहा है तो इसका दुष्परिणाम भी सरकार को भुगतना पड़ सकता है।

असंतुलित विकास बन रहा विनाश...


छत्तीसगढ़ में संतुलित विकास कैसे हो इसे लेकर न तो सरकार के पास ही कोई योजना है और न ही प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस हही कुछ कर रही है। जिसका दुष्परिणाम जन आक्रोश के रूप में निकलता तो है लेकिन सरकार की ताकत इसे दबा देती है। लेकिन असंतुलित विकास की बेदी पर कब तक आम लोग अपने को रोक पायेंगे?
छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली समस्या के अलावा माफिया राज भी कायम होने लगा है। भ्रष्टाचार चरम पर है और अफसर राज के चलते ओपन एम्सेस से लेकर रोगदा बांध घोटालों में सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। हालत यह हो गई है जो जिनता बड़ा भ्रष्टाचारी है उसे उतने ही बड़े पद से नवाजा गया है। सरकार का काम बड़े लोगों को बचाने व छोटों को सताने का होने लगा है यहीं वजह है कि आर्थिक अपराध ब्यूरों व लोकायुक्त जैसी सस्थाएं सफेद हाथी साबित होने लगा है। सूचना के अधिकार कानून की जितनी धज्जियां यहां उड़ाई जा रही है वैसा कहीं देखने को नहीं मिलेगा।
इन सबके पीछे असंतुलित विकास प्रमुख है। आजादी के 6 दशक बाद भी यदि आम लोगों को लोकतंत्र के मायने नहीं समझाया गया तो  अपराधियों का राज स्वाभाविक है।
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण को हुए दशक भर से उपर हो गया है सरकार कभी भी संतुलित विकास की योजना बना सकती है हाल ही में सरकार ने करीब दर्जन भर जिले बनाकर इसकी शुरुआत जरूर की है लेकिन असली जरूरत पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।  छत्तीसगढ़ में संतुलित विकास के लिए सबसे पहले तो सभी विभागों के मुख्यालय को राजधानी में रखने की बजाय विभिन्न जिलों में उसकी ज्यादा उपयोगिता के साथ बनाया जाना चाहिए।
इसी तरह सभी बड़े निजी शिक्षण संस्थाओं को राजधानी में ही कालेज-स्कूल खोलने की अनुमति देने की बजाय अलग अलग जिले में अनुमति दी जानी चाहिए। यहीं स्थिति निजी बड़े अस्पताल खोलने जाने को लेकर सरकार की नीति होगी चाहिए।
यही नहीं राजधानी में बढ़ती आबादी को अन्य जिले में काम के अवसर बढ़ाकर रोका जा सकता है।
इसके अलावा भी संतुलित विकास के लिए सरकार को विशेषज्ञों की सलाह लेकर 10-20 साल का प्रोजेक्ट बनाकर काम करना चाहिए।

बुधवार, 14 मार्च 2012

आर्शीवाद भवन ही नहीं रंगमंदिर को भी छूट...


. ऐसा नहीं है कि निगम के लोगों ने पैसा खाकर सिर्फ आर्शीवाद भवन के लोगों के पैसा खाकर सिर्फ आर्शीवाद भवन को ही संपत्तिकर में छूट दिया है। राजधानी में ऐसे दर्जनों भवन है जहां से लाखों में वसूली किया जाना है। इनमें भातखंडे ललित कला द्वारा संचालित रंग मंदिर है जहां भी रंग मंदिर स्थित आडोटोरियम को न केवल किराये से दिया जाता है बल्कि व्यवसायिक उपयोग भी हो रहा है।
छत्तीसगढ़ में चल रहे इस तरह की लूट से भले ही आम आदमी अनभिज्ञ हो लेकिन अधिकारी से लेकर सरकार में बैठे लोगों को न केवल इसी जानकारी है बल्कि वे ऐसे मामलों में अपनी जेब भी गरम कर रहे हैं। यहीं वजह है कि पंखा चोर, नाका चोर, पंचर बनाने वाले और सटोरिया नेतागिरी कर रातों-रात करोड़पति बन रहे है और आम आदमी को दो वक्त के खाने का इंतजाम भारी पड़ रहा है।
कान्यकुब्ज शिक्षण संस्थान ने जिस तरह से छात्रावास का नक्शा पास करवाकर आर्शीवाद भवन का व्यवसायिक उपयोग कर रहा है और निगम के अधिकारी व प्रतिनिधि पैसा खाकर इन्हें संपत्ति कर में छूट दे रहे हैं ऐसा ही मामला भातखंडे शिक्षक संस्थान का है। रंग मंदिर में लगने वाला स्कूल सन् 2007 से अंयंत्र संचालित किया जा रहा है लेकिन अभी भी निगम इन्हें संपत्तिकर में छूट दे रहा है।
हमारेभरोसेमंद सूत्रों की माने तो संपत्तिकर के छूट के एवज में दोनों संस्थानों से हर साल हजारों रूपये अधिकारियों व पार्षदों की जेब में जा रहा है।
एक तरफ नगर निगम छोटे बकायादारों से दादागिरी के साथ उगाही करता है दूसरी तरफ व्यवसायिकक उपयोग करने वालों को केवल संस्था बना लेने से संपत्तिकर  में छूट दे रहा है। ऐसे में जहां-जहां रसूखदार बकायादारों से वसूली नहीं हो रही है वहां के नागरिक इनसे वसूली नहीं होने की शर्त पर संपत्तिकर नहीं पटाने की घोषणा कर दे तब निगम का क्या हाल होगा यह समझ से परे है।
इस संबंध में नागरिक मंच के इंदरजीत सिंह छाबड़ा, राकेश चौबे, संजय सोलंकी और डॉ. राकेश गुप्ता ने कहा कि बड़े बकायादारों की सूची सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई है। आखिर सरकार कब तक रसूखदारों को बचाते रहेगी और केवल गरीबों से वसूली की जाती रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मोर्हरिर से लेकर वार्ड पार्षद के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
इधर इस मामले को लेकर आम लोगों में जबरदस्त प्रतिक्रिया है। समीत शर्मा ने कहा कि नगर निगम के खाओ-पियो नीति के चलते ही अतिक्रमण व अवैध कब्जा बढ़ा है। ऐसे अर्कमण्य अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। इधर तुलसी पटेल ने प्रेस को विज्ञप्ति भेजकर कहा है कि वे शीघ्र ही आम लोगों में जागरूकता लायेंगे और निगम को रसूखदारों से वसूली के लिए मजबूर कर देंगे।
बहरहाल बिहिनिया संझा के इस अभियान से आम लोग उत्साहित है। ऐसे में ऐसे लोगों के नाम सार्वजनिक करना जरूरी है ताकि आम लोगों को यह पता चले कि उनके जनप्रतिनिधि व निगम के अधिकारी क्या गुल खिला रहे हैं।


सीबीआई जांच और सरकार...


छत्तीसगढ़ में जिस तरह से माफिया राज चलने लगा है उसके बाद तो पुलिस की भूमिका को लेकर अयनिगत सवाल आम लोगों के जेहन में उमड़ रहे हैं। ऐसे कितने मामले हैं जिनकी सीबीआई से जांच जरूरी है लेकिन जब सरकार और उनमें बैठे लोग ही अपराध करने में आमदा हो तो वह सीबीआई जांच कराने कैसे तैयार हो सकती है।
ये वहीं सरकार में बैठे लोग है जिन्होंने राम अवतार जग्गी हत्याकांड में सीबीआई जांच की मांग की थी और तब सत्ता में बैठी कांग्रेस सरकार ने इसे खारिज कर दिया था सत्ता में आते ही भाजपा सरकार ने मामला सीबीआई को सौंपा और रिजल्ट सामने है। अब कांग्रेसी सीबीआई की मांग कर रहे हैं लेकिन सत्ता में बैठी भाजपा इससे हिचक रही है। जिन मामलों की सीबीआई जांच होनी ही चाहिए उनमें आईपीएस राहुल शर्मा की मौत का मामला भी शामिल हो गया है। सरकार ने दबाव में सीबीआई जांच के लिए तैयार हो गई है।
राहुल शर्मा ने अपने सुसाइडल नोट में स्पष्ट किया है कि वे वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव ममें यह कदम उठा रहे हैं। सब मृतक ने ही यह कह दिया है तब भला कोई पुलिसिया इसकी जांच कैसे ईमानदारी से कर पाता। चूंकि राहुल ने किसी का नाम नहीं लिखा है इसलिए इस बात की संभावना भी है कि जिससे जांच कराया जाता क्या वहीं प्रातडि़त करने वाला है?
छत्तीसगढ़ में ऐसे कई मामले हैं जिसमें सीधे-सीधे सत्ता से जुड़े लोग और वरिष्ठ अधिकारी शामिल है। डाल्फिन स्कूल के संचालक राजेश शर्मा के संबंध  किस मंत्री से नहीं थे। वायदा कारोबार के झगड़े में लिप्त मन्नू नत्थानी का संबंध किससे है? क्या इन मामले की सीबीआई जांच जरूरी नहीं है वह भी तब जब पुलिस इन्हें खोज पाने में असफल हो गई है।
ओपन एम्सेस घोटाला हो या रोगदा बांध को बेचने जाने का मामला क्या सीबीआई को नहीं सौंपा जाना चाहिए। आईपीएस राहुल शर्मा की मौत ने सिस्टम पर तो सवाल उठाया ही है साथ ही सरकार कैसे चल रही है इस पर सवाल खड़ा किया है।
भले ही राहुल शर्मा ने वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव की बात कही हो लेकिन क्या यह यहीं हो सकता कि इस वरिष्ठ अधिकारी ने सरकार चलाने वाले मंंत्रियों के दबाव में राहुल शर्मा को प्रताडि़त किया हो?
ऐसे कितने ही सवाल है जो सरकार की तरफ उंगली उठा रही है और इसका खुलासा तभी होगा जब मामले की सीबीआई जांच होगी।
फेसबुक से लेकर कई सोशल वेबसाईट राहुल शर्मा की मौत की खबर  और सीबीआई जांच की मांग से भरा हुआ है। कब तक जग्गी हत्याकांड में सीबीआई की मांग करने वाले भाजपाई मुंह चुरा रहे हैं ये वहीं लोग है जो अन्ना व बाबा की सच और तप का बखान करते नहीं थकते लेकिन इस मामले में चुप हैं?

मंगलवार, 13 मार्च 2012

लूट सको तो लूट लो जब तक मर्जी छूट दो!

नगर निगम रायपुर के अधिकारी-कर्मचारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों के द्वारा हर साल नगर निगम के टैक्स में छूट की आड़ में निगम को करोड़ों रुपये का चूना तो लगा ही रहे हैं स्वयं की जेब भी भर रहे हैं। सरकारें बदली लेकिन किसी ने कार्रवाई की हिम्मत नहीं की। ताजा मामला आर्शीवाद भवन का है जिसका कामर्शियल उपयोग की खबर पूरे छत्तीसगढ़ को है लेकिन निगम के अधिकारियों को यह नहीं दिखता और टैक्स बचाने अपनी जेब गरम किया जा रहा है।
आम आदमी से टैक्स वसूलने निगम के अधिकारी कुर्सी तक करने से पीछे नहीं हटते लेकिन शहर के रसूखदारों से वसूली की बात तो दूर उन्हें टैक्स में छूट देकर अवैध वसूली में मशगुल निगम कर्मी व अधिकारियों की मिली भगत से हर साल निगम को करोड़ों रुपये के राजस्व की हानि उठानी पड़ रही है।
पूरे छत्तीसगढ़ में शादी ब्याह व पार्टी के लिए किराये से देने के लिए मशहूर बैरनबाजार स्थित आर्शीवाद भवन निगम कर्मियों की लूट का उदाहरण है। आर्शीर्वाद भवन का नक्शा 3-6-86 को छात्रावास के लिए पास किया गया इसके बाद 19-7-94 को पुन: केवल छात्रावास के लिए नक्शा पास किया गया। लेकिन यहां न केवल दुकानें बना दी गई बल्कि डॉ. भट्टर को भी किराये से दे दिया गया। इतना ही नहीं शादी ब्याह से लेकर दूसरे समारोह के लिए किराये से दिया जाने लगा लेकिन इसे धारा 136 (ई) के तहहत संपत्ति कर में छूट दे दी गई। यह सब कैसे हुआ किसी को नहीं मालूम।
सूत्रों ने बताया कि संपत्तिकर बजाने में लगे कान्य कुब्ज सभा शिक्षा मंडल के द्वारा खेले गए इस खेल के एवज में मोर्हरिर से लेकर अधिकारियों को पैसा बांटा गया। वरना क्या वजह है कि जो बात पूरे प्रदेश को मालूम है वह रायपुर नगर निगम में बैठे जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को मालूम नहीं है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि नगर निगम आर्शीवाद भवन को नोटिस जरूर दिया है लेकिन संपत्तिकर में ही कई घपलेबाजी की बजाय पार्किंग के लिए दी गई। जब पार्किंग समस्या सामने आई तब भी निगम का संपत्तिकर के प्रति लापरवाह गंभीर अपराध है।
सूत्रों के मुताबिक शहर में ऐसे रसूखदारों की संख्या कम नहीं है जो संपत्तिकर में किसी न किसी बहाने छूट लेकर अपनी संपत्ति का कार्मशियल उपयोग कर रहे है। रामसागरपारा में खंडेलवाल हो या भारखंडे का मामला हो।
कहा जाता है कि मोर्हरिर के माध्यम से हर साल लाखों करोड़ों वसूलकर निगम को चूना लगाया जा रहा है। तेज तर्रार मंत्री भी ऐसे मामले में अपने को पीछे कर लेते हैं अब देखना यह है कि शहर के रसूखदार क्या करते हैं।
इधर बिहिनिया संझा ने नगर निगम के राजस्व में की जा रही खपलेबाजी को उजागर करने का निर्णय लिया है और ऐसे रखूसदारों का नाम उजागर करेगा जो छल प्रंपच कर संपत्तिकर से निगम को चूना लगा रहे हैं।