बुधवार, 4 अप्रैल 2012

हालात काबू से बाहर...


छत्तीसगढ़ सरकार में अनियमितता इस कदर बढ़ गई है कि पता ही नहीं चल रहा है कि यहां सरकार नाम की भी कोई चीज है। सीएजी की रिपोर्ट ने तो साबित ही कर दिया है कि इस सरकार की वजह से छत्तीसगढ़ को भारी घाटा हुआ है। अकेले मुख्यमंत्री के विभाग के कारनामों की वजह से छत्तीसगढ़ को हजार करोड़ से ऊपर का घाटा हो गया है। हालत यह है कि वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र में सरकार तो असफल रही है कानून व्यवस्था भी पूरी तरह चरमरा गई है। संवेदनहीनता चरम पर है और अफसरों ने चंडाल चौकड़ी खड़ी  कर रखी है। बेईमान महत्वपूर्ण पदों पर बैठ गए हैं और ईमानदार प्रताडि़त हो रहे है।
आईपीएस राहुल शर्मा की मौत की कालिख अभी सरकार  के माथे से छुटी भी नहीं है कि एक अन्य आईपीएस बीएस मरावी की मृत्यु ने सरकार के काम काज पर सवाल खड़ा किया है।
पहला सवाल तो यही है कि जिस व्यक्ति के सिर में गोली लगी हो और पिछले दो-तीन सालों से बीमार जैसी स्थिति में हो उसके प्रति संवेदनहीनता क्यों? दूसरा सवाल तो यह खड़ा होता है कि जब मरावी ने अपनी तबियत को लेकर बिलासपुर जाने से मना कर दिया था तब एक बीमार व्यक्ति को इतनी तनावग्रस्त इलाके में क्यों भेजा गया जहां जाकर अच्छा भला आदमी राहुल शर्मा को मौत को गले लगाना पड़ा।
क्या बिलासपुर संभाग पूरी तरह माफियाओं का गढ़ बन चुका है यहां सरकार माफियाओं को संरक्षण दे रही है जिसके चलते ईमानदार आदमी को काम करना मुश्किल हो गया है।
बिलासपुर से जिस तरह की खबरें आ रही है वैसा छत्तीसगढ़ में कभी नहीं हुआ कोल माफिया, लोहा माफिया शराब और जमीन माफिया का पूरी तरह पुलिस पर यहां कब्जा हो चुका है। वे जो चाहते हैं वहीं होता है। फिर सरकार कहां है। क्या उद्योगों को जमीन नहीं देने वाले शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को लाठी मारने और उन्हें जेल में ठूंस देने से कानून व्यवस्था सुधर जाती है। सरकार में बैठे एक-एक लोगों के संरक्षण ने बिलासपुर की हालत काबू से बाहर करने में कोई कसर बाकी नहीं रखा है।
ऐसी स्थिति में क्या वहां ऐसे अधिकारियों को भेज कर छूट देने की जरूरत नहीं है कि वे माफियाओं पर नकेल कसे। लेकिन जब माफियाओं के साथ मुखिया का नाम भी सामने हो तो हालात काबू में कैसे हो सकता है।
राजधानी में ही मंत्रियों व अधिकारियों को उन लोगों के साथ गलबहिंया करते देखा जा सकता है जिन पर हत्या या अपने  लठैतों से हत्या करवाने जैसे आरोप हैं। क्या मुख्यमंत्री को इन परिस्थितियों को नहीं समझना चाहिए की उनके गृहमंत्री शराब ठेकेदारों के हाथों थाने बिकने की बात क्यों कह रहे हैं। उनके गृहमंत्री कैसे कलेक्टर को दलाल और एसपी को निकम्मा कह रहे हैं क्या इस पर जांच नहीं होगी चाहिए। क्या गरीबों की आंखे फोडऩे वालों की सूचना तक नहीं देने वालों को बर्र्खाश्त नहीं कर देना चाहिए।
ये सारे सवाल बता रहे हैं कि हालात काबू से बाहर है और यही हाल रहा तो आज सिर्फ नाच देखकर रुपये लुटाये जा रहे हैं कल इस प्रदेश का भी वहीं हाल कर दिया जायेगा।

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

वाह रे स्वास्थ्य मंत्री..

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अभी बालोद नेत्र कांड के बाद अब दुर्ग जिला अस्पताल में भी सात मरीजों की आंख खराब हो गई। ऊपर से तुर्रा यह है कि स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल को इसकी जानकारी तक नहीं थी।
छत्तीसगढ़ में ये क्या हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह तो बेहद सीधे व सरल व्यक्ति हैं। उनमें ईमानदारी कूट-कूट कर भरी है और यही वजह है कि उन्हें ये हो रहे कुकर्मों की जानकारी ही नहीं मिल पाती। नंगा नाच करवा रहे हैं और सौदान सिंह हो या रामप्रताप सिंह उन्हें तो केवल सच्चे मुख्यमंत्री नजर आते हैं जिनके चेहरे सामने रख चुनाव जीता जा सकता है।
खेती की जमीन उद्योगों को देने की बात  हो चाहे कितने भी घोटाले हो, बेलगाम अफसरशाही से क्या फर्क पड़ता है चेहरा चुनाव जीतने के लिए है न हमारे पास। शायद इसी सोच के चलते मंत्रियों की विभागीय पकड़ कमजोर हो गई है। कायदे से इस खबर के बाद स्वास्थ मंत्री को तत्काल कड़े निर्णय लेने की हम जरूरत समझते हैं और जांच तो चलते रहती। एक तरफ जब नेत्र दान को लेकर चलाये जा रहे अभियान पर लाखों करोड़ों खर्च किये जा रहे हों तब दूसरी तरफ इस तरह की लापरवाही अक्षम्य है और तत्काल जिला अस्पताल के डाक्टरों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। कार्रवाई इस बात पर भी तत्काल हो सकती है कि इतनी बड़ी घटना की सूचना मंत्री को क्यों नहीं दी गई। सालों से जमें डाक्टरों की स्थिति तालाब के सड़ते पानी की तरह को भी सोचना होगा। स्वास्थ्य मंत्री यह कहकर बच नहीं सकते कि उन्हें जानकारी नहीं है। जब जानकारी मिली तब वे क्या कर रहे हैं। बालोद नेत्र कांड की जानकारी भी तो उन्हें मिली थी तब उन्होंने क्या किया। क्या दोषी डॉक्टरों को बचाने व पैसा खाने का उपक्रम नहीं हुआ है।
मुख्यमंत्री भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। जब किसी मंत्री के विभाग में एक के बाद एक घटना दुहराई जाये तो ऐसे मंत्रियों को क्यों उस विभाग की जिम्मेदारी दी जाए। बल्कि हम तो एक कदम आगे जाकर कहना चाहेंगे कि विभाग पर पकड़ नहीं रखने वाले मंत्रियों को हटा दिया जाना चाहिए।
बालोद नेत्र शिविर में 48 मरीजों की आंखे खराब होने के बाद दुर्ग जिला चिकित्सालय में 7 मरीजों की आंखे खराब हो गई। यह खबर किस तरह भयावह है इसे सोचकर रुह कांप जायें पर स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का कहना है कि जांच की जायेगी फिर दोषियों पर कार्रवाई होगी।
छत्तीसगढ़ में इन दिनों यहीं हो रहा है। अधिकारी से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, सबके विभाग में जांच चल रही है और परिणाम आने पर ही कार्रवाई होगी। तब तक सभी को खामोश रहने की जरूरत है। यदि सरकार चुन कर आई है तो उस पर इतना भरोसा तो किया ही जाना चाहिए कि जांच के बाद कार्रवाई जरूर होगी।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

फेल होती पीएससी परीक्षा...


 परीक्षा के दूसरे दिन ही पीएससी अध्यक्ष डॉ. जोशी के संघ मुख्यालय जाने को लेकर विवाद के बाद यूपीएससी के समाज शास्त्र का पूरा पर्चा हू ब हू छापे जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पहले ही विवादों में रहे पीएससी परीक्षा का यह विवाद दुर्भाग्यजनक है। संस्कारवान संघ के पीएससी अध्यक्ष डॉ. प्रदीप जोशी ही नहीं पूरी सरकार ही कटघरे में हैं कि आखिर यूपीएससी का पूरा का पूरा पर्चा दी गई। क्या इसके पीछे कुछ लोगों को पास करने की साजिश है।
पीएससी की परीक्षा में विवाद तो उसी दिन शुरू हो गया था जब इसके अध्यक्ष ने रविवार को परीक्षा होने के बाद मंगलवार की सुबह-सुबह लाव लश्कर के साथ संघ मुख्यालय पहुंच गए थे। तब यह चर्चा भले ही विधानसभा में यह कह कर समाप्त कर दी गई हो कि कोई भी कहीं भी आ जा सकता है लेकिन इस चर्चा का क्या कि पीएससी की सूची इस बार संघ कार्यालय से बनेगी?
अभी यह विवाद पूरी तरह समाप्त ही नहीं हुआ था कि यूपीएससी के हूबहू पर्चे से परीक्षा लेने की बात सामने आ गई। आखिर पीएससी के उपर इतनी बड़ी जिम्मेदारी है तब वह पेपर सेट कराने की जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण कैसे नहीं मानती। क्या इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि यह सब सोची समझी करतूत है। पूरा पर्चा लीक करने का आसान तरीका है। अपने लोगों को ज्यादा बताने की जरूरत नहीं सिर्फ यूपीएससी का पर्चा जुगाड़ लेने की बात कह दो, पर्चा लीक हो जायेगा और मतलब सध जायेगा। इसके अलावा मॉडल उत्तर में जिस तरह की गलतियां है उसके बाद सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह सीधे कार्रवाई करे। जांच होते रहेगी।
छत्तीसगढ़ पीएससी में घपलेबाजी नई नहीं है और इसकी वजह से न केवल परीक्षार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हुआ है बल्कि छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठा को भी धक्का लग चुका है इसी वजह से संघी डॉ. जोशी को अध्यक्ष बनाया गया था लेकिन उनके क्रियाकलाप ने तो एक कदम और आगे बढ़ा दिया है।
इस पूरे मामले में वे सभी लोग सीधे दोषी है जिनके उपर प्रश्न पत्र छपाने से लेकर परीक्षा आयोजन तक की जिम्मेदारी है यहीं नहीं जिन विशेषज्ञों से प्रश्न बनवाये गए हैं। उन्हें भी काली सूची में डालनी चाहिए। मॉडल उत्तरों में गलतियां अक्षम्य है और ऐसे विशेष विशेषज्ञों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। अन्यथा भ्रष्टाचार और घोटाले में पहले ही अपनी छवि खराब कर चुकी सरकार के माथे पर यह दाग भी दिखने लगेगा।

रविवार, 1 अप्रैल 2012

बेलगाम अफसर...


 बिलासपुर के विशेष न्यायालय ने कल छत्तीसगढ़ के 22 अफसरों पर जुर्म दर्ज करने का आदेश दिया है। जमीन घोटाले में लिप्त इन अफसरों के खिलाफ जर्म भी दर्ज हो जायेगा लेकिन इनके खिलाफ कैसे और क्या कार्रवाई होगी कोई नहीं बता सकता। नामी गिरामी ये अफसर आज भी ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं जहां मोटी कमाई की गुजांईश बरकरार है।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले से ही भूमि घोटाले की खबरें आते रही है लेकिन इन घोटालों में जब मंत्री या यूं कहे पूरी सरकार ही शामिल हो तो फिर अफसरों पर कार्रवाई की बात बेमानी होकर रह जाती है। छत्तीसगढ़ में जिस तरह से रोज एक नये भ्रष्टाचार का खुलासा हो रहा है वह शर्मनाक है।
इस बेलगाम होते अफसरों को नहीं रोकने में सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। इस सरकार ने दागी अफसरों को गोद में बिठाने की जो परम्परा की शुरूआत की है इसका दुष्परिणाम सामने आने लगा है। हर विभाग में भ्रष्टाचार चरम पर है। खासकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के उर्जा व खनिज विभाग में तो चून चून के दागी अफसरों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया है।
हमने कल ही इसी जगह पर बेलगाम जनप्रतिनिधियों की बात कहते हुए कहा था कि जब प्रदेश का मुखिया को ही विधानसभा में अपने द्वारा कहे गए अपशब्दों के लिए माफी मांगी पड़े तो फिर दूसरे जनप्रतिनिधियों से हम संयम की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। हो सकता है हमारी ये बाते नागवार गुजरे लेकिन भरी विधानसभा में गृहमंत्री ने थानेदारों के बारे में जो कुछ कहा था वह ठीक है। या जब रमन सरकार की अपनी भारतीय जनता पार्टी डौंडी लोहारा से विधानसभा की टिकिट ऐसे अफसरों को देने की कोशिश करे जिसे नौकरी में रहने का अधिकार ही न हो। या जब मंत्री या सत्ताधारी पार्टी के लोग ही जब अफसरों से गलत काम करवाये तब बेलगाम अफसरों को कैसे रोका जा सकता है।
छत्तीसगढ़ के लिए यह भयावह स्थिति है। विधानसभा में मनोज डे पर उंगली उठी लेकिन सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता, बाबूलाल अग्रवाल मामले में भी वे जिल्लत बर्दाश्त करने तैयार हैं और उनकी पार्टी जोगी शासन काल में जिन अफसरों को दलाल कहते नहीं चुकती थी उसे गोद में बिठा के रखना यह कौन सी राजनैतिक सुचिता है।
इस सबके बाद भी हम यह नहीं कह रहे हैं कि इस सरकार को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है बल्कि हम चाहते है कि दागी अफसरों को फिल्ड में नहीं भेजा जाये। सरकार ये बात समझ ले कि फिल्ड में एक भी दागी असफर रहे या एक भी दागियों को गोद में बिठाया गया तो दूसरे अफसर भी नहीं डरेंगे और छत्तीसगढ़ में लूट का सिलसिला नहीं रूक पायेगा...! तब इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ी को भोगना पड़ेगा।

शनिवार, 31 मार्च 2012

बेलगाम जन प्रतिनिधि...


छत्तीसगढ़ में विधानसभा हो या नगर निगम, जनप्रतिनिधियों ने अपनी मर्यादा भूला दिया है। लोकतंत्र के मंदिर माने जाने वाले विधानसभा में जब मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बैठे लोग संयमित नहीं होंगे तो फिर पार्षद व पंच-सरपंचों से किस तरह की उम्मीद की जा सकती है।
छत्तीसगढ़ के विधानसभा के इस बजट सत्र में जिस तरह से सरकार के मुखिया डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेसाध्यक्ष नंद कुमार पटेल पर टिप्पणी की वह बेहद गैर जिम्मेदाराना ही नहीं शर्मनाक भी है हालांकि कांग्रेसियों के विरोध के बाद उनकी टिप्पणी को विधानसभा से हटा दिया गया और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने क्षमा भी मांग लिया और मामला शांत हो गया लेकिन सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बैठे लोगों को इस तरह की हरकत करनी चाहिए। और जब सरकार चलाने वाले ही ऐसी भाषा का प्रयोग करेंगे तब विपक्ष से क्या उम्मीद की जानी चाहिए।
राजनीति में प्रतिद्वंदिता अलग बात है लेकिन इसे लेकर गाली-गलौच या दुश्मनी भुनाना गलत है। आने वाले दिनों में इसके परिणाम अच् छे नहीं होने वाले है। ऐसा नहीं है सत्ता पक्ष की इन हरकतों के लिए पहली बार क्षमा या शार्मिन्दगी जैसी बात हो। पहले भी सत्ता पक्ष के सदस्यों की वजह से भाजपा को जवाब देना मुश्किल हुआ है लेकिन इस बार यह सब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से हुआ है जिनसे प्रदेश की जनता को ऐसी अपेक्षा नहीं रही है।
आखिर यह स्थिति क्यों निर्मित हुई? क्या सचमुच रमन राज में अधिकारियों पर कंट्रोल नहीं रह गया है, भ्रष्टाचार का पैसा या सत्ता का दंभ तो इसकी वजह नहीं है। अमूमन डॉ. रमन सिंह शांत व सौम्य माने जाते है उनकी छवि जिस तरह से गढ़ी गई है उसके बाद उनकी जुबान से अपशब्द की कोई कल्पना ही नहीं कर सकता। लेकिन ऐसा हुआ तो यह ठीक नहीं है।
हालांकि कांग्रेस इसे अपनी सफलता मान रही है। कांग्रेसियों में यह चर्चा है कि जिस तरह से डॉ. रमन के मुंह से अपशब्द निकले है वह उनके बुरी तरह घिर जाने का बौखलाहट है। इधर नगर निगम में भी पार्षदों ने जिस तरह की हरकत की है वह निगम के लिए काला दिन साबित हो रहा है। अपनी बातें जोरदार ढंग से रखना अलग बात है लेकिन बात रखने के लिए धमाचौकड़ी व गुण्डई पर उतर जाना ठीक नहीं है। यह परम्परा यहीं खतम होनी चाहिए न केवल विधानसभा अध्यक्ष बल्कि निगम के सभापति को जनप्रतिनिधियों की क्लास लेनी चाहिए। अन्यथा दूसरे राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ भी पूरे देश के सामने शर्मसार होगा।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

सिर्फ पकड़े गये, सजा नहीं दिला पाये...


प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले दिनों आर्थिक अपराध ब्यूरो और एंटी करप्शन ब्यूरों की कार्रवाई की जो रिर्पोट विधानसभा में दी वह न केवल शर्मनाक है बल्कि सरकार के क्रियाकलापों की कलई खोलती है। मुख्यमंत्री ने जिस अंदाज में आर्थिक अपराध ब्यूरों द्वारा दर्ज 99 वें से 2 मामले ही निपटाने की बात कही इससे तो यही लगता है कि सरकार की रूचि भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने में हैं।
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार चरम पर है सरकार के मुखिया ही जब आर्थिक अपराध व एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई पर खामोश है तो इसका सीधा संदेश है कि सरकार ही नहीं चाहती कि ऐसे लोगों पर कार्रवाई हो जो जनता की सुविधा के लिए या राज्य के विकास पर डाका डालने में लगे हैं। यदि साल भर में प्रकरण निपटाने की गति 1-2 प्रतिशत है तो यहां तैनात लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए कि आखिर वे किसका इंतजार कर रहे हैं।
इस पूरे मामले को दुर्भाग्यजनक पहलू तो ये है कि इन दोनों संस्था ने जिन लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किये है उन्हें सरकार आज भी महत्वपूर्ण पदों पर बिठा रखी है। यह ठीक है कि प्रकरण दर्ज कर लेने मात्र से कोई अपराधी नहीं हो जाता लेकिन जब दोनों ही ब्यूरों सरकार की एजेंसी हैं तब सरकार को अपनी एजेंसी पर भरोसा कर भ्रष्ट लोगों को ऐसे काम में तो न लगाये जहां उनके गफलत करने की संभावना है।
मुुख्यमंत्री के अनुसार सर्वाधिक प्रकरण लोक निर्माण विभाग से संबंधित है। ऐसे में निर्माण कार्य में आरोपियों की पदस्थापना क्यों बंद नहीं होनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ का यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है उसे उतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। स्वयं मुख्यमंत्री के विभाग में ऐसे भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जिस तरह से सर्वाधिक राजस्व वाले खनिज, उर्जा जैसे विभाग को अपने पास रखा है वैसे ही इन विभागों में भी बड़े-बड़े मगरमच्छ जमें हुए हैं। विद्युत नियायक आयोग के अध्यक्ष मनोज डे पर लगे आरोप कितने गंभीर है यह किसी से छिपा नहीं है। ओपन एक्सेस घोटाले पर तो कोई कुछ कहना ही नहीं चाहता और खनिज को लेकर तो चौतरफा लूट मची है। उद्योगों को खदान देने व अवैध उत्खनन के बढ़ते मामले ने छत्तीसगढ़ जैसे शांत प्रदेश में माफिया गिरी को जन्म दे दिया है। राजधानी के आसपास गौण खनिजों की खुले आम डकैती हो रही है जबकि उद्योगों को तो अवैध उत्खनन का ठेका देने जैसी स्थिति बन गई है। अनिल लूनिया जैसे लोगों को सिर्फ रायल्टी वसूली की नोटिस दी जाती है और उद्योगों में रिश्तेदारों को नौकरी लगाये जा रहे हैं।
ये सब छत्तीसगढ़ के लिए ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जिस तरह से विधानसभा में ब्यूरों के आंकड़े दिये हैं उसके बाद तो ऐसा नहीं लगता कि सरकार की कार्रवाई में कोई रूचि हैं।

गुरुवार, 29 मार्च 2012