छत्तीसगढ़ में अफसरों का राज है, छत्तीसगढ़ में उद्योगपतियों का राज है, छत्तीसगढ़ में व्यापारियों का राज है, छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का राज है, छत्तीसगढ़ में माफियाओं का राज है और छत्तीसगढ़ में भाजपा का राज हैं। मीडिया और जनता के बीच इस तय शुदा राज मेें आम आदमी अपने को ठगा महसुस करने लगा हैं। राजा को इससे मतलब नहीं है कि किसका राज हैं। उन्हें मालूम है वे अपनी चला ही लेंगे, उनके सुख सुविधा में कोई कमी नहीं होगी। वे जब चाहे जैसा चाहे कर सकते है इसलिए उन्हें कोई फर्र्क नहीं पड़ता कि राज किसका हैं। छत्तीसगढ़ की इस स्थिति को लेकर राज का सपना देखने वाले हैरान हैं कि आखिर छत्तीसगढ़ में ये सब हो क्या रहा हैं। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगे रखने वालों का दमन किया जाता है और कानून को ताक पर रखने वालों की सब मांगे पूरी कर दी जाती हैं। जब आई बी से लेकर तमाम गुप्तचर संस्थानो ने नक्सलियों की संभावित करतुत पर सरकार को सचेत रहने कह दिया गया था। तब सरकार ने बगैर सुरक्षा व्यवस्था के सुराज दल को किसके सहारे भेज दिया था। राजा से आज ये सवाल पूछने चाहिए कि वे तो जेड श्रेणी की सुुरक्षा के बीच उडऩखटोला से जहां नहीं वहां पहुंच जाते हैं। वे सुरक्षित है तो क्या जनता भी सुरक्षित हैं। उन्होंने आईबी की रिपोर्ट की अनदेखी क्यों की। क्या उनकी जिद इसी तरह से चलते रहेगी और लोग मारे जा रहे हैं उनका क्या कसुर हैं। अरे भई नक्सली तो निर्दयी हैं,उनका काम ही हत्या करना है ,आम लोगों मेंंं भय पैदा करना है, लेकिन सरकार तो ऐसी नहीं होती, अपनी जिद पूरी करने के लिए क्या किसी के जान को दांव पर लगाना उचित हैं। बचपन से सुनते आ रहें है कि लोकतंत्र में हम जी रहें हैं लेकिन कहां है लोकतंत्र और कहां है लोकतांत्रिक सरकार। स्वयं के फायदे और राज कायम रखने सिर्फ हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा हैं। वरना विरोध को कुचलने की तमाम कोशिश हो रही हैं। उद्योगों की जमीन देने की जनसुनवाई का मामला हो या फिर खदानें देने का मामला हो। राजा की मर्जी का विरोध करने वालों की खैर नहीं हैं। विधानसभा में सचिव जैसे पदों पर किसी को भी बिठा दिया जाता है और विरोध करने वालों को नौकरी से निकालने का फरमान जारी हो जाता हैं। आम आदमी को भीख दी जाती है ताकि वे इसी के भुलावे में रहे और पानी, बिजली, स्वास्थ्य से वंचित रखा जाता है। ताकि उन्हें विकास से कोसो दूर रखा जा सके। सड़के इस लिए बनाई जा रही है कि ताकि लूटेरे आसानी से गांव तक पहुंच चुके। स्कूल भवन बनवा दो, गुरूजी मत रखो, अस्पताल खुलवा दो लेकिन डॉक्टर न रखो ये सोच क्या लोकतांत्रिक है? सुुकमा के कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया है अब इसे निदंनिय, कायरता बताते रहे। नक्सलियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब उन्हें गांव वालों को कत्ले आम मचाते समय फर्क नहीं पड़ता तब उनके लिए अपहरण से क्या फर्क पड़ेगा। आखिर सरकार इससे अलग क्या कर रही है। जरा भाजपा के लोग सोचे की क्या इस तरह के राज्य की कल्पना की गई थी। सोचना कांग्रेस ही नहीं आम लोगों को भी है। कि ऐसी सरकारों को आखिर किस तरह से कितने दिन बर्दास्त किया जाना चाहिए। डॉ रमन सिंह के हिम्मत की दाद दी जानी चाहिए कि नक्सलियों के कत्लेआम के बाद भी वे इस बात पर अडिग है कि ग्राम सुराज की नौटंकी जारी रहेगी।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
रविवार, 22 अप्रैल 2012
किस किस को गरियायें...
छत्तीसगढ़ में अफसरों का राज है, छत्तीसगढ़ में उद्योगपतियों का राज है, छत्तीसगढ़ में व्यापारियों का राज है, छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का राज है, छत्तीसगढ़ में माफियाओं का राज है और छत्तीसगढ़ में भाजपा का राज हैं। मीडिया और जनता के बीच इस तय शुदा राज मेें आम आदमी अपने को ठगा महसुस करने लगा हैं। राजा को इससे मतलब नहीं है कि किसका राज हैं। उन्हें मालूम है वे अपनी चला ही लेंगे, उनके सुख सुविधा में कोई कमी नहीं होगी। वे जब चाहे जैसा चाहे कर सकते है इसलिए उन्हें कोई फर्र्क नहीं पड़ता कि राज किसका हैं। छत्तीसगढ़ की इस स्थिति को लेकर राज का सपना देखने वाले हैरान हैं कि आखिर छत्तीसगढ़ में ये सब हो क्या रहा हैं। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगे रखने वालों का दमन किया जाता है और कानून को ताक पर रखने वालों की सब मांगे पूरी कर दी जाती हैं। जब आई बी से लेकर तमाम गुप्तचर संस्थानो ने नक्सलियों की संभावित करतुत पर सरकार को सचेत रहने कह दिया गया था। तब सरकार ने बगैर सुरक्षा व्यवस्था के सुराज दल को किसके सहारे भेज दिया था। राजा से आज ये सवाल पूछने चाहिए कि वे तो जेड श्रेणी की सुुरक्षा के बीच उडऩखटोला से जहां नहीं वहां पहुंच जाते हैं। वे सुरक्षित है तो क्या जनता भी सुरक्षित हैं। उन्होंने आईबी की रिपोर्ट की अनदेखी क्यों की। क्या उनकी जिद इसी तरह से चलते रहेगी और लोग मारे जा रहे हैं उनका क्या कसुर हैं। अरे भई नक्सली तो निर्दयी हैं,उनका काम ही हत्या करना है ,आम लोगों मेंंं भय पैदा करना है, लेकिन सरकार तो ऐसी नहीं होती, अपनी जिद पूरी करने के लिए क्या किसी के जान को दांव पर लगाना उचित हैं। बचपन से सुनते आ रहें है कि लोकतंत्र में हम जी रहें हैं लेकिन कहां है लोकतंत्र और कहां है लोकतांत्रिक सरकार। स्वयं के फायदे और राज कायम रखने सिर्फ हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा हैं। वरना विरोध को कुचलने की तमाम कोशिश हो रही हैं। उद्योगों की जमीन देने की जनसुनवाई का मामला हो या फिर खदानें देने का मामला हो। राजा की मर्जी का विरोध करने वालों की खैर नहीं हैं। विधानसभा में सचिव जैसे पदों पर किसी को भी बिठा दिया जाता है और विरोध करने वालों को नौकरी से निकालने का फरमान जारी हो जाता हैं। आम आदमी को भीख दी जाती है ताकि वे इसी के भुलावे में रहे और पानी, बिजली, स्वास्थ्य से वंचित रखा जाता है। ताकि उन्हें विकास से कोसो दूर रखा जा सके। सड़के इस लिए बनाई जा रही है कि ताकि लूटेरे आसानी से गांव तक पहुंच चुके। स्कूल भवन बनवा दो, गुरूजी मत रखो, अस्पताल खुलवा दो लेकिन डॉक्टर न रखो ये सोच क्या लोकतांत्रिक है? सुुकमा के कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया है अब इसे निदंनिय, कायरता बताते रहे। नक्सलियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब उन्हें गांव वालों को कत्ले आम मचाते समय फर्क नहीं पड़ता तब उनके लिए अपहरण से क्या फर्क पड़ेगा। आखिर सरकार इससे अलग क्या कर रही है। जरा भाजपा के लोग सोचे की क्या इस तरह के राज्य की कल्पना की गई थी। सोचना कांग्रेस ही नहीं आम लोगों को भी है। कि ऐसी सरकारों को आखिर किस तरह से कितने दिन बर्दास्त किया जाना चाहिए। डॉ रमन सिंह के हिम्मत की दाद दी जानी चाहिए कि नक्सलियों के कत्लेआम के बाद भी वे इस बात पर अडिग है कि ग्राम सुराज की नौटंकी जारी रहेगी।
शनिवार, 21 अप्रैल 2012
सुकमा कलेक्टर का अपहरण, सुराज दल के अब तक पांच मरे
हवा से जमीन नापना भारी चेतावनी के आगे जिद हावी
तमाम तरह की गुप्तचर संस्थाओं की चेतावनी के बावजूद ग्राम सुराज चलाना सरकार को भारी पडऩे लगा है। जेड प्लस सुरक्षा और उडऩखटोला से सुरक्षित राजा की सोच के चलते ग्राम सुराज दल के लोगो में दहशत व्याप्त है लेकिन नौकरी की मजबूरी उनकी जान पर बन आई है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक ग्राम सुराज शुरू होने के पहले ही प्रदेश के विभिन्न गुप्तचर संस्थाओं ने अपनी रिपोर्ट में नक्सली क्षेत्रों में ग्राम सुराज चलाने को गंभीर खतरा बताते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतने का निर्देश दिया था। कुछ संस्थाओं के द्वारा तो इसे रद्द करने तक कहा गया था। लेकिन राजा की जिद ने जहां कल बीजापुर के पास तीन जाने ले ली वहीं आज दो जाने गई व सुकमा कलेक्टर एलेक्सपाल मेनन का अपहरण हो गया। इससे पहले विक्रम उसेंडी के पहुंचने से पहले विस्फोट किया गया और कल तो महेश गागड़ा व कलेक्टर बीजापुर बाल-बाल बच गए थे। वैसे छत्तीससगढ़ में जिस तरह से नक्सलियों ने अपने पैर पसारे है उसे रोकने में सरकार पूरी तरह असफल रही है। ग्राम सुुराज को लेकर भले ही नक्सलियों ने किसी तरह की चेतावनी नहीं दी थी लेकिन गुप्तचर रिपोर्ट से स्पष्ट था कि सरकार अपने जिद पर अड़े रही तो मामला बिगड़ सकता है। ग्राम सुराज को लेकर गुप्तचर रिपोर्टो को नजर अंदाज करने राजा रमन सिंह ने बस्तर से ही अभियान की शुरूआत कर यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार किसी से डरती नहीं है और मुख्यमंत्री को जब कुछ नहीं हो सकता तो बाकि किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन इस सोच के चलते राजा सााहब ये भूल गए कि वे जेड प्लस सुरक्षा और उडऩखटोला से यात्रा करते हैं और इस हवाई दौरे ने नक्सलियों के जमीनों पर कब्जे की हकीकत को अंतत: उजागर कर ही दिया और उडऩखटोला की बजाय जमीन पर चलने वाले संकट में आ ही गए। हवा में रहकर जमीन की हकीकत को नजर अंदाज करना राजा की आदत हो सकती है लेकिन गुप्तचर संस्थाओं की चेतावनी की अनदेखी के पीछे की जिद के चलते आज सुरक्षा दल के आगे अपनी जान बचाने के लाले पड़ गए है। यह सर्वविदित है कि नक्सलियों की करतूत घोर निंदनीय है। उनका हमलावर नीति कायरना है और इसका सब तरह निंदा भी हो रहा है। लेकिन सरकार को हवा से उतर कर जमीन की हकीकत को समझना होगा। वैसे तो ग्राम सुराज को लेकर जिस तरह से प्रचार के नाम पर करोड़ों रूपए फूंके जा रहे है इसके औचित्य पर ही सवाल उठ रहे है और यह नौटंकी बनकर रह गया है। वैसे भी जब राजा को यह एन्जॉय का साधन लगे तो इससे बदतर व्यवस्था क्या हो सकती है।
बहरहाल कलेक्टर के अपहरण ने सरकार के दावों की न केवल कलई खोल दी है बल्कि हवा से जमीन नापने की हकीकत को भी सामने ला दिया है कि आखिर गुप्तचर संस्थाओं की रिपोर्ट को नजरअंदाज केवल जिद पूरी करने क्यों की गई।
कालाधन और कोयला...
अखबारों की सुर्खिया रही कि रामदेव बाबा विदेशों में जमा कालाधन वापस लाने छत्तीसगढ़ से आन्दोलन करेंगे तो दूसरी खबर कानून को ताक में रखकर कोयला खदाने चलानी की हैं। एक दूसरे के पूरक इन खबरों को लेकर बेचैनी बढऩी स्वभाविक हैं। पहले ही कोयले की कालिख पूती सरकार के लिए ये दोनों खबरे क्या मायने रखती हैं। ये हमें नही मालूम लेकिन जिस तरह से यहां होने वाले चुनाव को लेकर राजनैतिक दलों की तैयारियां चल रही हैं उस लिहाज से कालाधन और कोयला महत्वपूर्ण मुद्दा बनने जा रहा हैं।
रामदेव बाबा लाख कहे कि उनका भाजपा से कोई लगाव नहीं हैं लेकिन यह साबित हो चुका है कि आर एस एस उनके पीछे हैं। बाबा के लिए कालाधन मुद्दा हो सकता है और कंाग्रेस के लिए कोयला मुद्दा बन सकता हैं। लेकिन आम आदमी के लिए आज भी रोटी कपड़ा और मकान ही मुद्दा है जिसे देने में सरकार असफल रही हैं। कालाधन हो या कोयला दोनों का मतलब ही भ्रष्टाचार से हैं। ऐसे में बाबा के लिए छत्तीसगढ़ में आन्दोलन तब और भी मुसिकल हो जाता हैं जब यहंा की सरकार कोयले की कालिख को पोछ नहीं पाई हैं। हजार करोड़ से ऊपर के इस घपलेबाजी में जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी से लेकर मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के शामिल होने का अंदेशा हो तब छत्तीसगढ़ के लिए कालाधन से महत्वपूर्ण कोयला इसलिए भी है क्योंकि यहां विकास अब भी गावों से कोसों दूर हैं। उद्योगपतियों की सरकार के आरोपों से घिरे छत्तीसगढ़ सरकार पर बाबा का क्या रूख होगा?क्या वे इतने ही बेबाकी से कोयले पर बोल पायेंगे जितनी बेबाकी वे काला धन पर बोल पाते हैं। अन्ना हजारे के आन्दोलन के बाद जब सारी राजनितिक पार्टियों का सुर एक हो, एक जैसे दिख रहे हो तब बाबा के लिए छत्तीसगढ़ में आन्दोलन आसान नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार चरम पर है डॉ. रमन सिंह के राज में ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां के भष्टाचार के किस्से आम लोगों की जुबान पर नहीं चढ़े हो। खेती की जमीनों की बरबादी से लेकर सरकारी जमीनों को बंदरबार का मामला हों या खदान बेचने से लेकर जंगल काटने तक में सरकार घिरी हुई हैं। निजी अस्पतालों और निजी स्कूलों को फायदा पहुंचाने सरकारी अस्पताल व सरकारी स्कूलों की दशा किसी से छिपी नहीं हैं। बिजली-पानी के लिए तरसते लोगों की बात हो या उनके दूसरे मौलिक अधिकारों की हनन की बात हो सरकार चौतरफा घेरे में हैं। ऐसे में बाबा सिर्फ काला धन पर बोलकर सरकार को खुश रख सकती है आम आदमी पर उनकी छवि क्या होगा यह कहना कठिन हैं।
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012
रोम का जलना...
कहते हैं कि जब रोम जल रहा था। तब वहां का सम्राट चैन से बंशी बजा रहा था। यह किस्सा एक दूसरे परिवेश में छत्तीसगढ़ में चल रहा हैं। गांव वालों की हालात खराब हैं। आम आदमी को उनकी मूलभत सुविधा नहीं मिल पा रही हैं। गरीबी और विकास से कोसो दूर आम लोग अपनी तकलीफ पर ठीक से रो भी नहीं पा रहे हैं। और प्रदेश का राजा डॉ. रमन सिंह को यह सब एन्जॉयमेंट का साधन नजर आ रहा हैं। वे खूब एन्जॉय कर रहे हैं। और उन्हें नयी-नयी मांगे भी सुनने को मिल रही हैं।
सात-आठ साल के शासन में राजा साहब को कभी इस तरह की मांगे नहीं सुनाई पड़ी। इसलिए उन्हें यह सब मजा आ रहा हैं। और यह सच भी है कि राजा को तभी मजा आयेगा जब लोग उससे कुछ मांगेंगे। उनकी तारीफ में कसीदे गढ़े जायेंगे। पहले जमाने में भी यही होता रहा हैं। राजा अपने महल में अपने कुुनबे के साथ मदमस्त होते थे। और एन्जॉयमेंट के लिए जब निकलते थे तब गरीबों को देखकर मजा आता था। वे इनमें अपना मनोरंजन ढूंढते थे और कभी कुछ कोई मांगते तभी देते थे।
मैने ग्राम सुराज की मांगो,शिकायतों व आवेदनों को देखा हैं। मुझे अपनी बुध्दि पर तरस आता हैं कि इनमें से कोइ भी मांगे मुुझे नई क्यों नहीं लगी। सड़क, बिजली, पानी, स्कुल, अस्पताल व पुल-पुलिया यही सब तो मांग रहे हैं। और नौकरशाहों की करतूूतोंं व जनप्रतिनिधियों की दादागिरी में नयापन कुछ भी नहीं हैं। लेकिन राजा ने कहा है तो उनके लिए नया ही होगा?
ग्राम सुराज के दो दिन में राजा को सब कुछ अच्छा लगा। गरीबी और अभाव में जीते लोगों को देखना और इस दौरे को अच्छा बताना राजा के लिए ही संभव हैं। क्योकि यदि लोग अभाव व गरीबी में नहीं होंगे तो राजा से क्यों मांगेंगे।
छत्तीसगढ़ का यह दुर्भाग्य है कि अलग राज बनने के बाद भी यहां के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। चिकित्सा के अभाव में लोग मर रहे हैं। पानी-बिजली शिक्षा जैसी जरूरी चीजे उन्हें मिल नहीं रही हैं। और सरकार में बैठे लोग पैैसों की लालच में आँखे बंद किये बैठे हैं। हालत बदतर होते जा रहीं हैं। खेती की जमीनों का उद्योगों को बंदरबार किया जा रहा हैं। खनिज संपदा का भरपूर दोहन हो रहा हैं। जंगल बेतहाशा काटे जा रहे हैं। कानुन व्यवस्था की हालत चिंताजनक हैं। लेकिन राजा को एन्जॉय करना हैं। इसलिए वह ग्राम सुराज चला रहे हैं।
पहले के जमाने में भी यही सब होता था राजपाट से छुट्टी के लिए आखेट मेें निकल जाता था। तंबूओं में रहते थे। लेकिन सभी सुविधाओं के बाद कुछ भी नहीं बदला है तो सिर्फ तरीका। राजाओं का राजा की तरह ही होगा।
गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
निजी डॉक्टरों को फायदा पहुंचाने सरकारी योजनाओं की अनदेखी
करोड़ो रूपए अनुपयुक्त पड़े रहे
वैसे तो इस सरकार पर उद्योगपतियों का तमगा नया नहीं है। लेकिन निजी डॉक्टरों व नर्सिंग होमों को फायदा उठाने के लिए जिस तरह से अपने ही अस्पताल को सुविधा से वंचित रखने का खेल डॉक्टर होते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के नेतृत्व में खेला जा रहा है। वह शर्मनाक ही नहीं दुर्भाग्यपूर्ण है।
चावल से लेकर सायकल बांटकर नाम कमाने में विश्वास रखने वाली भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह भले खुद डॉक्टर है लेकिन इनकी रूचि आम लोगों की चिकित्सा सुविधा ठीक से देने की नहीं है। यहां तक केन्द्र की राशि का भी ये ठीक से उपयोग नहीं कर पा रहे है और इसकी वजह से आम आदमी निजी नर्सिंग होम के चक्कर में अपना सब कुछ लूटा रही है। डॉ रमन लाख दावा करे की उनकी सरकार गरीबों की हितचिंतक है। लेकिन सीएजी की रिपोर्ट ने यह चौकाने वाला खुलासा किया। बकौल सीएजी इससे स्पष्ट था कि भारत सरकार से वित्तिय सहायता प्राप्त करने होने के बाद भी केन्द्रीय योजना के धीमी गति से क्रियान्वयन के कारण राज्य की जनता योजना में प्रावधानित विशिष्ट आयुष चिकित्सा सेवाओं से वंजित रही। सीएजी की इस टिप्पणी को भले ही रमन सरकार और पूरी भाजपा काल्पनिक बता रही हो लेकिन इस टिप्पणी से यह बात तय हो गया है कि सरकार की मंंशा गांव वालों के लिए क्या है। निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के षडय़ंत्र के चलते सरकार ने जानबूझ कर पैसा रहते हुए सरकारी चिकित्सा सुविधाओं को पंगु बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखा है। सरकारी अस्पताल को लेकर सीएजी ने अपनी जांच के बाद स्पष्ट किया है कि सरकार ने जिला एलोपैथिक चिकित्सालयों में आयुष प्रकोष्ठ की स्थापना नहीं की और जहां कहीं इसकी स्थापना की भी तो वह अत्यंत काम चलाऊ रहा। इसी तरह सरकार ने सामुदायिक स्वस्थ्य केन्द्रों में विशेषीकृत चिकित्सा केन्द्रों की स्थापना में भी ठीक से रूचि नहीं दिखाई है। 22 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से 20 में यह योजना ही लागू नहीं की गई। यहां तक की केन्द्र सरकार से प्राप्त इस योजना की 3 करोड़ रूपए अनुपयुक्त पड़ी रही। जबकि बचे 2 में से केवल बलौद में ही स्थिति ठीक ठाक थी। यहीं नहीं सरकार ने इस योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए कर्मचारियों की जरूरतों को भी नजर अंदाज किया। ज्ञात हो कि प्रदेश के निजी नर्सिंग होमों की लूटपाट से आम आदमी त्रस्त है। हालत यह है कि निजी चिकित्सालयों में ईलाज कराने वाले स्वयं को ठगा महसूस कर रहे है। लेकिन सरकार को इससे कोई लेना-देना नहीं है। नर्सिंग होम के मनमाने फीस व लूटखसोट को सरकार द्वारा छूट दिया गया है कहा जाए तो अतिशंयोक्ति नहीं होगा। सूत्रों का कहना है कि सीएजी रिपोर्ट ने जिस तरह से पर्याप्त केन्द्रीय फंड के उपयोग नहीं करने का खुलासा किया है उसके बाद तो इन सबके पीछे षडय़ंत्र की बू आने लगी है कि सरकार जानबूझ कर आम लोगों को सुविधा देने की बजाय स्लाटर हाऊस बन चुके नर्सिंग होम में ढकेल रही है। जहां ईलाज के नाम पर आम आदमी को लूटने का गोरख धंधा चल रहा है।
बहरहाल सीएजी की रिपोर्ट में इस खुलासे के बाद सरकार का रूख क्या होगा यह देखना है।
पानी और बिजली...
गर्मी शुरू होते ही छत्तीसगढ़ में पानी की समस्या शुरू हो जाती हैं हर साल का यह रोना हैं। सरकार किसी की भी रही हो इन समस्याओं का हल नहीं हुआ और जिस तरह से सरकार काम कर रही है आने वाले दस -बीस सालों में यह समस्या सुुलझने वालीं नहीं हैं।
सरकार का मतलब अब भष्टाचार हो गया हैं और सत्ता जन सेवा की बजाय अपनी पीढिय़ों के लिए व्यवस्था करने का साधन बन चूका हैं। दो दशक से रायपुर में ही पानी और बिजली को लेकर गर्मी शुरू होते ही हंगामा देख रहा हँू। और इसके उपाय के लिए कोई दीर्घकालिन योजना बनाने में सरकार पूरी तरह असफल रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों का तो और भी बुरा हाल हैं। लेकिन सरकार है कि विकास के दावे करते नहीं थकती।
जब आम आदमी को पानी-बिजली जैसे जरूरी चीज ही उपलब्ध नहीं हो रहा है तब विकास के दावे किस मुंह से की जाती हैं। यह समझ से परे हैं।
कल ही राजधानी में पानी और बिजली को लेकर जोरदार हंगामा हुआ। नगर निगम में भाजपाईयों ने हंगामा किया तो खमतराई में लोगों ने पत्थर बाजी की। इन घटनाओं से सबक लेने की जरूरत इसलिए भी है क्योकि अभी गर्मी शुरू ही हुई है। पूरा दो माह गर्मी बचा है ऐसे में हालात को ठीक ढंग से नही समझा गया तो आने वाले दिनों में कोई अनहोनी से नहीं रोका जा सकेगा।
राजा और इसकी सेना अभी ग्राम सुुराज में लगी हैंं। गांवों में बिजली और पानी की सर्वाधिक समस्या हैं। यदि सुराज दल के पहुंचने के दौरान बिजली चली गई तो विषम स्थिति बन सकती हैं। पहले ही दिन जिस तरह से संसदीय सचिव के भाजपा गांव में सुराज दल को बंधक बनाया गया वह एक चेतावनी हैं।
हमें लगता है कि इस नौटंकी को यहीं समाप्त कर नये सिरे से विकास के लिए सोचना चाहिए। सरकार यह मान ले कि आजादी के सात दशक बाद भी गांवों में रहने वालों को उनका अधिकार नहीं मिला हैं और विकास की अब तक की बातें केवल कल्पना है या बकवास हैं। वक्त रहते इसे नहीं समझा गया तो आने वाले दिनो में जनता का रूख समझना मुस्किल होगा हालांकि पुलिसियां डंडे की जोर पर और सत्ता के दम पर अब तक जन आन्दोलन को सरकार कुचलते रहीं हैं। लेकिन यह स्थिति आगे भी रहेगी कहना कठिन हैं।
संतुलित विकास के लिए नये सिरे से इबादत लिखनी होगी। आखिर गांव वालों को उनके अधिकार से कब तक वंचित रखा जा सकता हैं।
क्या उच्च शिक्षा, सर्वोच्च चिकित्सा व फिटकरी से छने पानी पीने का अधिकार सिर्फ शहर वालों को हैं। यह सोच सरकार को बदलनी होगी और शहर को सरकार की तरफ से दी जाने वाली सुविधा गांव वालों को भी दी जानी चाहिए। केवल मुफ्त में चावल-नमक या दूसरी चीजे देकर लंबे अरसे तक किसी को बहलाया नहीं जा सकता।
बुधवार, 18 अप्रैल 2012
गांवों में राज ...
गांवों में राज ...
छत्तीसगढ़ के गांवों की दशा बदतर हैं। सरकार हर साल की तरह इस साल भी 'ग्राम सुराजÓ में निकल पड़ी हैं। बकौल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह 'खामियों से मिलता हैं बेहतर रास्ताÓ ही ग्राम सुराज अभियान की वजह हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ में इस अभियान के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। विज्ञापन के रुप में करोड़ो खर्र्च करने के बाद क्या गांवों की दशा सुधर जायेगी। दरअसल सरकार की सोच छत्तीसगढ़ के विकास की है ही नहीं हैं। वरना पिछले सात साल के शासन में एक तो ऐसी योजना होती जिससे गांव में सुराज दिखता। हद तो यह है कि सरकार गांव वालों को लोकतंत्र के मायने ही नहीं समझा पाई हैं। शिकायतों के पुलिन्दों को विभागो में भेज देना और इसे निराकरण बताकर राजनैतिक लाभ लेना ही ग्राम सुराज का एकमात्र उद्देश्य रह गया हैं।
वास्तव में सरकारे चाहती है कि छत्तीसगढ़ का विकास हो तो उसे गांववालों के विकास के लिए एक ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे हर व्यक्ति को स्वास्थ्य शिक्षा और पानी उपलब्ध हो जाये। आजादी के 7 दशक बाद जब ये तीन चीजे ही गांव वालों को मयस्सर नहीं हो पाया हैं। तब भला गांव में सुराज कैसे आ पायेगा।
हम बार-बार कह चूके है कि ग्राम सुराज हमें सरकारी नौटंकी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता। हो सकता है हमारी इस बात से बहुत से लोग इत्तेफाक नहीं रखते हो लेकिन ग्राम सुराज का खेल सालों से चल रहा है सरकार कितने गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा पाई हैं। वास्तव में सरकार इस अभियान के जरिये पटवारियों व पुलिस वालों पर नकेल कसने की ढिंढोरा भर पिटती हैं। ताकि गांव वाले पानी-चिकित्सा और शिक्षा की तरफ ध्यान ही न दें। ग्राम सुराज में आने वाले आवेदनों को देख के लगता है कि लोगों को ग्राम सुराज का मतलब भी सड़क स्कुल और पटवारी-पुलिस की शिकायत ही समझाया गया हैं।
वास्तव में ग्राम सुराज का मतलब छोटे कर्मचारियों को बदनाम करना या प्रताडि़त ही रह गया हैं जबकी इतने सालों के ग्राम सुराज के बाद सरकार को ऐसी योजना बनानी चाहिए थी कि हर ब्लाक मुख्यालय में सर्वसुविधायुक्त अस्पताल हो जाए, उच्च शिक्षा के पर्याप्त साधन हो और गांव-गांव में पीने का साफ पानी उपलब्ध हो जाए।
सरकार किसी की भी हो किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि आखिर गांव वालों को शहर की तरह सुविधा कैसे दी जाए। न ही गांव वालों के प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों ने ही इस ओर सोचा। जीतते ही राजधानी में घर पा लेने के बाद चुनाव जीतना ही उद्देश्य रह गया है। ग्राम सुराज को लेकर मुख्यमंत्री की इस बेहतर रास्ते सिर्फ डायलॉक न बने बल्कि गांव वालों को बेहतर सुविधा मिले। तभी गांव में सुराज आयेगी।
छत्तीसगढ़ के गांवों की दशा बदतर हैं। सरकार हर साल की तरह इस साल भी 'ग्राम सुराजÓ में निकल पड़ी हैं। बकौल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह 'खामियों से मिलता हैं बेहतर रास्ताÓ ही ग्राम सुराज अभियान की वजह हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ में इस अभियान के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। विज्ञापन के रुप में करोड़ो खर्र्च करने के बाद क्या गांवों की दशा सुधर जायेगी। दरअसल सरकार की सोच छत्तीसगढ़ के विकास की है ही नहीं हैं। वरना पिछले सात साल के शासन में एक तो ऐसी योजना होती जिससे गांव में सुराज दिखता। हद तो यह है कि सरकार गांव वालों को लोकतंत्र के मायने ही नहीं समझा पाई हैं। शिकायतों के पुलिन्दों को विभागो में भेज देना और इसे निराकरण बताकर राजनैतिक लाभ लेना ही ग्राम सुराज का एकमात्र उद्देश्य रह गया हैं।
वास्तव में सरकारे चाहती है कि छत्तीसगढ़ का विकास हो तो उसे गांववालों के विकास के लिए एक ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे हर व्यक्ति को स्वास्थ्य शिक्षा और पानी उपलब्ध हो जाये। आजादी के 7 दशक बाद जब ये तीन चीजे ही गांव वालों को मयस्सर नहीं हो पाया हैं। तब भला गांव में सुराज कैसे आ पायेगा।
हम बार-बार कह चूके है कि ग्राम सुराज हमें सरकारी नौटंकी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता। हो सकता है हमारी इस बात से बहुत से लोग इत्तेफाक नहीं रखते हो लेकिन ग्राम सुराज का खेल सालों से चल रहा है सरकार कितने गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा पाई हैं। वास्तव में सरकार इस अभियान के जरिये पटवारियों व पुलिस वालों पर नकेल कसने की ढिंढोरा भर पिटती हैं। ताकि गांव वाले पानी-चिकित्सा और शिक्षा की तरफ ध्यान ही न दें। ग्राम सुराज में आने वाले आवेदनों को देख के लगता है कि लोगों को ग्राम सुराज का मतलब भी सड़क स्कुल और पटवारी-पुलिस की शिकायत ही समझाया गया हैं।
वास्तव में ग्राम सुराज का मतलब छोटे कर्मचारियों को बदनाम करना या प्रताडि़त ही रह गया हैं जबकी इतने सालों के ग्राम सुराज के बाद सरकार को ऐसी योजना बनानी चाहिए थी कि हर ब्लाक मुख्यालय में सर्वसुविधायुक्त अस्पताल हो जाए, उच्च शिक्षा के पर्याप्त साधन हो और गांव-गांव में पीने का साफ पानी उपलब्ध हो जाए।
सरकार किसी की भी हो किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि आखिर गांव वालों को शहर की तरह सुविधा कैसे दी जाए। न ही गांव वालों के प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों ने ही इस ओर सोचा। जीतते ही राजधानी में घर पा लेने के बाद चुनाव जीतना ही उद्देश्य रह गया है। ग्राम सुराज को लेकर मुख्यमंत्री की इस बेहतर रास्ते सिर्फ डायलॉक न बने बल्कि गांव वालों को बेहतर सुविधा मिले। तभी गांव में सुराज आयेगी।
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