मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

छत्तीसगढ़ में दागी व विवादास्पद आईएएस अफसरों का जमावड़ा...

छत्तीसगढ़ में दागी व विवादास्पद आईएएस अफसरों का जमावड़ा...

 छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांश आईएएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन अधिकारियों की विवादास्पद छवि के चलते जनता के करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं। पदों का दुरुपयोग खुलेआम किया जा रहा है और डॉ. रमन सरकार इन बेकाबू होते अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें संरक्षण देने में आमदा है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट-खसोट मची है वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के दामन में एक बदनुमा दाग बनकर सामने आने लगा है और एक बारगी तो सीधे सरकार से गठजोड़ दिखाई देने लगा है। हालत यह है कि बेहिसाब संपत्ति के मालिक इन अफसरों पर अंकुश लगाने में सरकार पूरी तरह विफल है। सर्वाधिक चर्चित अफसरों में इन दिनों बाबूलाल अग्रवाल का नाम सबसे ऊपर है। उनके साथ तो सीधे सीएम हाउस से गठजोड़ की खबर है जबकि अन्य अफसरों में विवेक ढांड का नाम भी सामने आया है। कहा जाता है कि रायपुर के इस अफसर ने अपने पद का दुरुपयोग इतनी चालाकी से किया है कि अ'छे-अ'छे नटवर लाल भी फेल हो जाए ताजा मामला तो उनके स्वयं के दुकान सजाने व गृहनिर्माण मंडल के बंगले को रेस्ट हाउस के लिए किराए से देने का है।
मालिक मकबूजा कांड में फंसे नारायण सिंह को किस तरह से पदोन्नति दी जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है जबकि सुब्रत साहू पर तो धमतरी कांड के अलावा भी कई आरोप है। दूसरे चर्चित अफसरों में सी.के. खेतान का नाम तो आम लोगों की जुबान पर चढ गय़ा है। बारदाना से लेकर मालिक मकबूजा के आरोपों से घिरे खेतान साहब पर सरकार की मेहरबानी के चर्चे आम होने लगे हैं।
ताजा मामला जे. मिंज का है माध्यमिक शिक्षा मंडल के एमडी श्री मिंज पर रायपुर में अपर कलेक्टर रहते हुए जमीन प्रकरणों में अनियमितता बरतने का आरोप है। सरकारी जमीन को बड़े लोगों से सांठ-गांठ कर गड़बड़ी करने के मामले में उन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। एम.के. राउत पर तो न जाने कितने आरोप हैं जबकि अब तक ईमानदार बने डी.एस. मिश्रा पर भी आरोपों की झड़ी लगने लगी है। अजय सिंह, बैजेन्द्र कुमार, सुनील कुजूर तो आरोपों से घिरे ही है। आरपी मंडल के खिलाफ तो स्वयं भाजपाई मोर्चा खोल चुके हैं लेकिन वे भी महत्वपूर्ण पदों पर जमें हुए हैं। जबकि अनिल टूटेजा पर तो हिस्ट्रीशिटरों के साथ पार्टनरशिप के आरोप लग रहे हैं। कहा जाता है कि देवेन्द्र नगर वाले इस शासकीय सेवा से जुड़े अपराधी को हर बार बचाने में अनिल टुटेजा की भूमिका रहती है।

अधिकांश आईएएस की करतूतों का क'चा चि_ा सरकार के पास है आश्चर्य का विषय तो यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब इनमें से अधिकांश अधिकारियों की करतूत पर मोर्चा खोल चुकी है लेकिन सत्ता में आते ही इनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। बताया जाता है कि आईएएस और मंत्रियों के गठजोड़ की वजह से करोड़ों रुपए इनके जेब में जा रहा है। यहां तक कि जांच रिपोर्टों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में बदनाम आईएएस अफसरों का जमावड़ा होता जा रहा है और सरकार भी इनकी करतूत पर आंखे मूंदे है।

रविवार, 16 दिसंबर 2012

उद्योगों की गुण्डागर्दी पर सरकारी चुप्पी !


ऐसा नहीं है कि वंदना समूह की मनमानी की कहानी समाप्त हो गई है वह बेधड़क जारी है लेकिन ताजा मामला दुर्ग जिले के अहिवारा के समीप स्थापित हो रहे जे के लक्ष्मी सीमेंट की गुण्डागर्दी का है । एक तरफ सरकार इनवेस्टर मीट के नाम पर करोड़ों खर्च कर उद्योगों को भरपूर सुविधा देने की घोषणा करती है दूसरी तरफ यहां आकर उद्योग गुण्डागर्दी कर रहे है क्या ऐसे में उद्योग यहां आने चाहिए ?
विशेष प्रतिनिधि
ऐसा नहीं है कि वंदना समूह की मनमानी की कहानी समाप्त हो गई है वह बेधड़क जारी है लेकिन ताजा मामला दुर्ग जिले के अहिवारा के समीप स्थापित हो रहे जे के लक्ष्मी सीमेंट की गुण्डागर्दी का है । एक तरफ सरकार इनवेस्टर मीट के नाम पर करोड़ों खर्च कर उद्योगों को भरपूर सुविधा देने की घोषणा करती है दूसरी तरफ यहां आकर उद्योग गुण्डागर्दी कर रहे है क्या ऐसे में उद्योग यहां आने चाहिए ?
पिछले चार अंको में हमने वन्दना समूह के करतूतों पर विस्तार से प्रकाश डाला था इस बार एक और उद्योग के कारनामें बताये जा रहे है । इस उद्योग को जमीन दिलाने शासन प्रशास
न ने न केवल फर्जी जनसुनवाई की बल्कि विरोध करने वाले ग्रामीणों की पिटाई व गिरफ्तारी भी हुई । हालत यह हे कि गांव वाले आन्दोलित हे लेकिन विपक्षी कांग्रेस के नेता नदारत है । स्वाभिमान मंच ने जरूर यहां किसानों व गांव वालों का साथ दिया लेकिन सरकार तो हर हाल में उद्योग के साथ खड़ा दिख रहा है ।
छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों के चलते जल जंगल जमीन और दवा तक में उद्योगों का हक होने लगा है । अहिवारा विधानसभा क्षेत्र खासाडीह अहिवारा, गिरहोला,भलपुरी खुई, सेमरिया के किसान इन दिनों आन्दोलित है उनका न केवल जेके लक्ष्मी सीमेंट प्रबंधक पर गलत तरीके से जमीन हासिल करने का आरोप है बल्कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा का भी आरोप है । आश्चर्य का विषय तो यह हे कि यह संयंत्र लगभग पूरी तरह कृषि भूमि पर स्थापित हे । लगभग दो हजार एकड़ जमीन कौडिय़ों के मोल खरीदने में सरकार की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता सूत्रों की माने तो लघु उद्योग लगाने के नाम पर किसानों से जमीन ट्रकड़े-ट्रकड़े में ली गई और गांव की सरकारी जमीनों पर बेतहाशा कब्जा किये जाने का आरोप किसान लगा रहे हें । यहां तक कि बगीचे, चरागन और श्मशान घाट तक उद्योग में शामिल कर लिये गए और जब गांव वालों ने इसका विरोध किया तो उनके खिलाफ ही कार्रवाई की जा रही हे ।
सूत्रों की माने तो संयंत्र प्रबंधन ने किसानों को उद्योंगों में नौकरी देने का झांसा देकर कौडिय़ों के मोल जमीन हथियायी और अब नौकरी देने से मना किया जा रहा है । यहां तक कि कंपनी के लेटर पैड पर नौकरी का आश्वासन देने की चर्चा है और ऐसी शिकायतों पर पुलिस कार्रवाई करने से साफ मुकर रही है । इधर अपने को ठगा महसूस कर किसान जब आन्दोलन करने लगे तो उन्हें सुरक्षा गार्डो से पिटवाया गया और जब वे थाने पहुंचे तो वहां भी उनकी सुनवाई नहीं हुई ।
इधर किसानों के मुताबिक संयंत्र स्थापना से पहले होने वाली जनसुनवाई भी नहीं हुई और पर्यावारण मंडल मे उद्योग स्थापना की अनुमति भी दे दी । यही नहीं जनसुनवाई का विज्ञापन जानबहुझकर दिल्ली और रायपुर से प्रकाशित होने वाले ऐसे अखबार में कराया गया जिन्हें अहिवारा क्षेत्र के लोग ठीक से जानते ही नहीं है । सूत्रों की माने तो उद्योग से ही विकास की रणनीति की अवधारणा पर चल रही भाजपा की रमन सरकार को ग्रामीणों की तकलीफ से कोइ्र सरोकार नहीं है जबकि उद्योगों को बिजली पानी जमीन की सुविधाएं दी जा रही है ।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

कप्तान पर भारी पड़ते थानेदार...

कप्तान पर भारी पड़ते थानेदार...
राÓय के नये डीजीपी राम निवास यादव ने आते ही अपनी ताकत पीएचक्यू यानी पुलिस मुख्यालय में दिखा दी । इस यादवी फेरबदल का असर क्या होगा यह तो वही जाने लेकिन मुख्यालय की चर्चा सड़कों तक पहुचने लगी है । सरकार नहीं चाहती थी कि इस चुनावी साल में कोई भ्रष्ट अफसरों को लेकर कोई बखेड़ा खड़ा हो इसलिए डीएस अवस्थी को छापामारी से हटा दिया ।
अब सरकार के लिए इतना तो करना ही था आखिर सिनियर संत कुमार पासवान को नजर अंदाज कर रामनिवास यादव पर जो भरोसा किया गया है । यह सरकार तो वैसे भी भ्रष्टाचारियों की संरक्षक मानी जाती है ऐसे में चुनावी साल बहाना ही है और जब प्रदेश के लोकतंात्रिक मुखिया पर ही कोयले की कालिख पूती हो तो फिर उनसे इससे Óयादा उम्मीद बेमानी है ।
हाथ-पांव तोडऩे के लिए चर्चित आई जी मुकेश गुप्ता तो स्वयं हटना चाहते थे और फिर सरकार भी नहीं चाहती थी कि मुकेश गुप्ता को लेकर कार्यकर्ताओं के मन में उठने वाले सवालों का सामना करें इसलिए उन्हें भी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया लेकिन ये क्या जिसे बिठाया गया उस पर कम आरोप नहीं है । जी पी सिंग को आईजी बनाते समय शायद यह नहीं सोचा गया कि उन पर तो सीधे आई पी एस राहूल शर्मा की मौत को लेकर गंभीर आरोप है । और राजधानी के आई जी पर जब ऐसे आरोप हो तो सवाल उठने से रोक पाना आसान नहीं है । हालांकि पुलिस वालों को ऐसे आरोप से फर्क नहीं पड़ता लेकिन सरकार को फर्क पड़ सकता है । राजधानी के दिग्गज मंत्रियों की सलाह से यदि जीपी सिंग को आई जी बनाया गया है तो फिर सांसद रमेश बैस या नंदकुमार साय कितना भी पुलिस को नियंत्रण करने की बात करें कोई मतलब नहीं है ।
वैसे भी बैस जी कब मुंह खोले और कब पलटी मार दे कोई ठीकाना नहीं है । भतीजे को पड़ी तो बोल दिये । बाद में ऐसा नहीं कहा करने में कितनी देर लगेगी । यानी पुलिस को क्लीन चिट मिलना तय है । नहीं तो गृहमंत्री यदि किसी पुलिस कप्तान को निकम्मा कहे और उसके बाद भी कप्तानी रहे यह ल"ााजनक बात नहीं मानी जाती ।
राजधानी में चार साल से जमें पुलिस कप्तान दीपांशु काबरा भले ही खुशबू के अपहरकर्ताओं को पकडऩे के लिए अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन सच तो यह है कि जिले के कई थानेदार उनकी नहीं सुनते ।
अब मोवा थाने का ही मामला ले । यहां पदस्थ श्रीमती संध्या द्विवेदी की रोज शिकायत हो रही है । यहां लूट की घटना को चोरी बता दिया जाता है । अवैध शराब से लेकर जुआरियों और सटांरिये तक से महिने वसुलने की शिकायतें है । बिल्डरों के पक्ष में पीढि़तों को चमकाने की शिकायत है । अपराधियों से गठजोड़ की तो शिकायतों का अंबार है लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई ही नहीं होती है ।
अब तो दहेज प्रताडि़त एक महिला Óाया शर्मा ने मोवा थाने पर रिपोर्ट नहीं लिखने की शिकायत कर दी है लेकिन कप्तान को इससे मतलब ही नहीं है । अब लोग कहते रहे हैं कि थानेदार के आगे कप्तान की नहीं चलती । न तो सरकार को फर्क पड़ता है और न ही मुख्यालय में बैठे अफसरों को ही इससे फर्क पड़ता है । आखिर पुलिस की छवि ऐसी बनी रहेगी तभी तो खर्चा चलेगा ।
खर्चा चलेगा तभी तो सेहत बनेगी । तभी तो फरार होने वाले कैदियों को पकडऩे में ताकत लगेगी । अब कांकेर में बस स्टैण्ड से तीन जवानों को चकमा देकर कैदी भाग गया तो इसमें पुलिस वालों की गलती कैसे ? लेकिन लोगों का ध्यान रखना है इसलिए तीनों निलंबित कर दिये गये । लोगों की याददाश्त Óयादा होती नहीं इसलिए कुछ दिन में बहाल कर दिये जायेगे । आखिर बल की कमी है और बल की कमी न भी हो तब भी बैठा के वेतन देना ठीक नहीं है । तभी तो थाने में हुई हत्याओं के दोषी पुलिस कर्मी मजे से दूसरी जगह डूयूटी बजा रहे हैं मरने वाले का क्या । वह लौट के तो आयेगा नहीं लेकिन जो दोषी जिन्दा है उन्हें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए ।

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

नियंत्रण नहीं पर लाभ चाहिए...

नियंत्रण नहीं पर लाभ चाहिए...
कोलगेट कांड को दबाने के लिए जी न्यूज और जिंदल समुह में सौदे की खबर से मीडिया शर्मसार हुआ है। और यह सवाल जोर पकडऩे लगा है कि यह मीडिया पर सरकार का नियंत्रण जरूरी हो गया है! इस घटना में न तो जिंदल समूह के भ्रष्टाचार कम आंके जा सकते है और न ही जी न्यूज की इस खेल को ही नजर अंदाज किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ राÓय बनने से पहले यहां की पत्रकारिता को जो सम्मान मिलता रहा है ह उसमें कमी आई है। राÓय बनने के बाद मीडिया मैनेजमेंट का नया खेल शुरू हुआ है जिसमें बड़े-बड़े मीडिया समूह भी शामिल हो गये है। वे या तो खबरों के एवज में सीधे रकम ले रहे हैं या फिर विज्ञापन को माध्यम बता रहे है। पेड-चूज का यह आलम है कि सभी नेता व कार्पोरेट घराने इस खेल में शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ में बड़े अखबार समूहो ने सरकार से फायदे के सीधे रास्ते के अलावा अप्रत्यक्ष फायदे का खेल शुरू कर दिया अखबार के अलावा दूसरे धंधो में सरकार से फायदा लेने का तिकइम जनता के सामने है। अखबार चलाने के नाम पर कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीने ली गई और उस पर कामर्शियल काम्प्लेक्स तक ताने गये। सरकारी जमीनों के इस बेचा इस्तेमाल पर कार्रवाई करने की हिम्मत न तो किसी अधिकारी में है और न ही राजनेताओं में। इन जमीनों के लीज रेट को लेकर भी खेल चला। अखबार को सरकार से सारी सुविधाएं चाहिए। जनसंपर्क से विज्ञापन पर दबाव, वाहनों के लिए दबाव यहां तक कि घूमने फिरने तक के लिए दबाव बनाये जाते हैं।
विदेश तक घूम आये...
छत्तीसगढ़ के मीडिया बिरादरी को खुश करने सरकार विदेश तक ले जा चुकी है बैकांक- पटाया जा चुके पत्रकारों के नाम पर खूब खर्च हुए। जनता की गाढ़ी कमाई पर अपव्यय को लेकर छापने वाले पत्रकार न संपादक को यह विदेश यात्रा कभी अपव्यय नहीं लगा। और न ही उन्हें सरकारी सुविधाएं लेने में कभी हिचक हुई।

और अंत में...
पत्रकार अब सरकारी खर्चे पर किताब लिखने लगे है। सरकार से पैसा एंठने में इस नये खेल में ईमानदारी का ढि़ंढोरा पिटने वाले कई शामिल है।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

लोहा-कोयला से छग में
10 साल में 50 हजार
करोड़ की लूट
छत्तीसगढ़ में पिछले 10 सालों में लौह अयस्क व कोयला के अवैध उत्खनन में 50 हजार करोड़ रूपये से अधिक राशि की सरकारी तिजोरी को चूना लगाया गया है । अवैध उत्खनन से सरकारी तिजोरी को करो व अन्य शुल्क से पहुंचे नुकसान की राशि इससे अधिक हो सकती है । रमन सरकार के कार्यकाल के दौरान इन खनिजों के अवैध उत्खनन में हुई बेतहाशा वृद्धि का आलम यह है कि इससे अधिकारियों से लेकर सत्ता में बैठे मंत्रियों तक को फायदा पहुंचाया गया है । यह मंत्रालय डॉ. रमन सिंह के पास है

इस मामले से जुड़े खनिज विभाग के अफसरों का कहना है कि चूंकि प्रदेश में खनिज मंत्रालय सीधे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास है इसलिए अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई और जिस किसी अफसर ने कार्रवाई की जरूरत की उसे खामियाजा तक भुगतान पड़ा ।
खनिज मामलों के विशेषज्ञों का मानना हे कि यदि व में अनिल लुनिया के मामले में कार्रवाई हुई होती तो लूट इस कदर नहीं बढ़ती । ज्ञात हो कि भैंसा कद्दार में अवैध खनन को लेकर विधानसभा में भी हंगामा मचा था जबकि पुष्य स्टील का मामला अभी-भी गरम है और इस मामले में कांग्रेस के वरिष्ट नेता मोतीलाल वोरा पर भी आरोप लगे हैं ।
खनिज मामले के विशेषज्ञों का दावा है कि पूरे छत्तीसगढ़ में हुई उद्योगों ने करोड़ों टन लौह अयस्क व कोयला का अवैध खनन किया है और कई मामले में तो इन अयस्कों को प्रदेश के बाहर भेजने की भी खबर है । सूत्रों की माने तो अवैध उत्खनन के चलते रमन राज में सरकारी तिजोरी को हर साल करीब 7 से 8 हजार करोड़ रूपये का नुकसान केवल लोहा और कोयला से हुआ हे ।
सूत्रों का दावा है कि वन विकास शुल्क, वैट, एस टी व रायल्टी का पूरा आकलन किया जाये तो यह राशि 50 हजार करोड़ रूपये से अधिक की होगी । यही नहीं इस खेल में न केवल खनन माफिया, उद्योगपति बल्कि सत्ता में बैठे मंत्रियों व अधिकारियों के अलावा विपक्ष के कई विधायकों को भी बड़ी राशि मिली है ।
विशेषज्ञ सूत्रों का कहना है कि यदि लिज होल्डरों पर नजर रखी जाती तो यह स्थिति नहीं बनती जबकि अवैध उत्खनन की शिकायतों को भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और अप्रत्यक्ष रूप से इस लूट का हिस्सा बन गए ।
इधर हमारे सूत्रों का कहना है कि कोयला खदान व लौह अयस्क के अवैध खनन और बिकी के आकंड़ों में भी कभी बताई गई । कहा जाता है कि कोयला खदान में भारी पैमाने पर अवैध खनन किया गया और इस मामले में विभाग की भूमिका भी संदिग्ध रही ।
सूत्रों का कहना है कि इस खेल में तत्कालीन खनिज सचिव का रोल जबरदस्त था और इसी वजह से उनके रिटायर्ड होने के बाद भी सरकार ने उन्हें संविदा नियुक्ति दी । 
 

बुधवार, 13 जून 2012

फाईलो में विकास...


छत्तीसगढ़ में इन दिनों विकास की ईबादत फाईलों में लिखी जा रही है। लगातार हर क्षेत्र में पुरस्कार पाते विभागों की असली कहानी मैदान में आते ही दम तोड़ जाती है। दशक भर पहले के हालात आज भी वैसे है यह कोई नहीं कह सकता लेकिन जिस मापदंडो को विकास का आधार बनाया गया है वह फाईलों तक सिमट कर रह गया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही दर्जनों झुग्गी बस्तियों में आज भी लोगों को दो वक्त की रोटी के लिए न केवल जद्दो जहद करनी पड़ रही है। बल्कि पीने का पानी तक ठीक से उपलब्ध नहीं है। बजबजाती नालियों के उपर निस्तार कर रहे लोग नारकीय जीवन जीने मजबूर है। ग्रामीण क्षेत्रों का हाल तो और भी बुरा है पानी, शिक्षा व चिकित्सा सुविधा के अभाव में कितनी ही जिंदगी काल के गाल में समा रही है। सबसे दुखद स्थिति तो नक्सली प्र्रभावित क्षेत्रों का है जहां कुपोषण का कहर आज भी जारी है। कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत ने शहरी जीवन को ही नहीं ग्रामीण जीवन को भी अपनी चपेट में ले रखा है। लूट-डकैती चोरी, बलात्कार और यहां तक की हत्या के वारदातों पर भी ईजाफा हुआ है।
राज्य बनने के बाद जिस तरह से यहां माफिया राज हावी हुआ है उसके चलते विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ है खासकर खनिज संपदा, को जिस तरह से लूटा जा रहा है और जंगलों की बैधड़क कटाई हो रही है वह आने वाले दिनों में गंभीर खते का संकेत है।
आज 21वीं सदी में भी हम गांवो में चिकित्सा सुविधा नहीं दे पा रहे है जिससे असमय काल के गाल में पहुंचने वालों की संख्या बढ़ी है। मोतियाबिंद के ईलाज के नाम पर जिस तरह की लापरवाही हुई और उसके बाद डॉक्टरों को बचाने का जो खेल हुआ वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। शिक्षा की आड़ में निजी स्कूलों को बढ़ावा देकर जिस तरह से आम लोगों की जेब काटी जा रही है। वह भी दुर्भाग्य पूर्ण है। सरकार स्कूलों को जानबुझकर कमजोर करने की वजह से यह स्थिति बनी है और हम विकास की ईबादत लिख रहे हैं?
 

सोमवार, 11 जून 2012

भाजपा में दबाव की राजनीति...


एक पुरानी कहावत है कि यदि हाथी कुंए में गिर जाता है तो उसे मेढ़क भी लात मारते हैं। कमोवेश भाजपा में यही स्थिति बन गई है। कमजोर नेतृत्व ने महत्वकांक्षियों को सिर उठाने का जो मौका दिया है वह न तो थमने का नाम ले रहा है और न ही उसे कोई रोक ही पा रहा है। इस वजह से भाजपा की न केवल थू-थू होने लगी है कार्यकर्ताओं में भी निराशा घर करने लगी है।
केन्द्र की सरकार जिस तरह से भ्रष्टाचार और मंहगाई के मुद्दे पर घिरी है उसकेे बाद इसे भुनाने का भाजपा के पास अच्छा मौका था लेकिन वह अपने ही जाल में उलझ कर रह गई है। घीरे हुए अध्यक्ष के नकारापन ने जहां महत्वकांशी नेताओं को सिर उठाने का मौका दिया है वह सत्ता के दम पर पैसा कमाने वालों ने लोकतंत्र की खाल से जूते बनाने का खेल शुरू कर दिया है।
जिस असहाय स्थिति से आज भाजपा गुजर रही है वैसा तो दो सीट में सिमटने के दौरान भी नहीं हुआ। पैसों की ताकत से नेतृत्व को गरियाने का जो खेल भाजपा में शुरु हुआ है वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। यदिरप्पा, वसुंधरा के बाद नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से नेतृत्व को अपने जूतों तले रौंदा है वह आने वाले दिनों में दूसरे नेताओं के लिए सबक बन जाये तो आश्चर्य नहीं है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ.रमन सिंह भी अपनी चला रहा है। कार्यकर्ता नाराज है। भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबी सरकार के खिलाफ बोलने वालों को आंख दिखाने का खेल बंद नहीं किया गया तो सत्ता और पैसे की ताकत पाटी पर भारी पड़ सकती है।
छत्तीसगढ़ में तो डॉ. रमन सिंह पर ही कोयले की कालिख लगी है और हाल ही में उसके करीबी प्रदीप गांधी, कमलेश्वर अग्रवाल से लेकर न जाने कितने लोगों के कारनामों की चर्चा आम लोगों की जुबान पर चढऩे लगा है ऐसे में नेतृत्व की एक अनदेखी पाटी पर भारी पड़ सकती है।