मंगलवार, 12 मार्च 2013

गुस्से की आग पर आश्वासन की बौछार...


आरक्षण कटौति पर आक्रोशित पिछड़े वर्ग ने कांकेर से राजधानी तक का सफर जब पैदल पूरा कर लिया तब सरकार केवल आश्वासन ही दे पाई। आरक्षण को लेकर सतनामी समाज भी नाराज है और सतनामी समाज की नाराजगी के चलते कुतुब मीनार से ऊंचा बने जैतखम्भ का पिछले दो साल से उद्घाटन नहीं हो पा रहा है।
इन दोनों वर्गो की नाराजगी जायज है या नहीं यह सवाल कतई नहीं है। सवाल है कि आखिर लोगों में इतना गुस्सा क्यों है कि वे अपने द्वारा चुने सरकार के आश्वासन पर भी भरोसा नहीं कर रहे हैं। सवाल यह भी नहीं है कि क्या रमन सरकार ने अपनी विश्वसनियता खो दी है। सवाल आश्वासन पर टूटते भरोसे का है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले भी छला जाता रहा है और आज भी छला जा रहा है। सरकार में बैठे लोगों की संम्पति कई गुना बढ़ रही है तो दूसरी तरफ गरीबों की संख्या बढ़ रही है। 9 साल में रमन सिंह की सरकार भले ही विकास का कितना भी ढिढ़ोरा पिट ले लेकिन सच तो यह है कि वह अपने संकल्प तक को पूरा नहीं कर पाई है। हिन्दूत्व की दुहाई देने वाली भाजपा को संकल्प का मतलब समझाना पड़े तो लोगों को गुस्सा आना स्वाभाविक है।
आरक्षण की जटिलता को नजर अंदाज कर भी दे तो सरकार ने 9 सालों में क्या किया? उसने लोगों से किये वादे-संकल्प को पूरा क्यों नहीं किया। शिक्षा कर्मियों के संविलियन से लेकर दाल भात सेंटर चलाने के मामले में रमन सरकार फेल हो चुकी है।
राज्योत्सव और राजिम कुंभ पर अरबों रूपये खर्च करने का मतलब भी जनता जान चुकी है ग्राम सुराज हो या जनदर्शन सब नौटंकी साबित होने लगा है । विकास के नाम पर कोयले की कालिख और उद्योगों के लिए खेती की जमीनों की बरबादी के लिए छत्तीसगढ़ पूरे देश में कलंकित हुआ है तब भला लोग आश्वासन पर क्यों भरोसा करें।
हमारा भी मानना है कि चुनावी साल होने मांग रखने वालों का दबाव है लेकिन इन नौ सालों में सरकार के कामों की समीक्षा होनी चाहिए कि उसने जनता से वे वादे क्यों किये जो पूरे ही नहीं किये जा सकते थे।
राज्योत्सव, राजिम कुंभ, बायो डीजल से लेकर नई राजधानी के नाम पर फिजूल खर्ची सरकार की पहचान बन चुकी है। एक तरफ सरकार शिक्षा-स्वास्थ्य, सिचाई सुविधा को बढ़ाने जैसे खुद के कार्य से मुंह मोड़ रही है तो दूसरी तरफ निजी शिक्षण संस्थानों की लूट पर चुप्पी साध ली है। शाराब बंदी की बात तो वह करती है लेकिन जन विरोध को डंडे के जोर पर दबाने का प्रयास ही नहीं करती बल्कि शराब ठेकेदारों को गोद में बिठाती है।
मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी के इतने उदाहरण है कि उसे गिना पाना संभव नहीं है। हर आवेदन हर शिकायत पर आश्वासन से लोग हैरान है। स्कूल नहीं है खोल दो पर शिक्षक की व्यवस्था नहीं होगी तो ऐसे स्कूल खोलने का क्या मतलब है?
सरकार की बदलती प्राथमिकता की वजह से ही आज लोग गुस्से में है  और चुनावी साल में यह गुस्सा फुटने लगा है।  कहने को तो सरकारों का काम आम लोगों के हितों की ध्यान रखना है और आम लोगों के हित में रोड़ा बनते कानून को बदल देना है लेकिन यहां तो अफसरशाही हावी है, वही योजना बनाई जा रही है जिसमें स्व हित सधे। ऐसे में आखिर कब तक आश्वासन पर लोग भरोसा करें।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

अपनी ढपली, अपना राग...


जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आने लगा है अखबार मालिकों ने अपना खेल शुरू कर दिया है। प्रसार बढ़ाने कुर्सी बांटने वाले भास्कर अब भी अपने को नंबर वन बता रहा है तो नवभारत, हरिभूमि और पत्रिका भी अपने को नम्बर वन बताते नहीं थकते ऐसे में पाठक किसे नम्बर वन माने? अब तो प्रसार बढ़ाने की होड़ में हर अखबार इनामी योजना से लेकर कुर्मी टेबल, हाट-पॉट टिफीन बांट रहे है। इस दौड़ में नई दुनिया भी शामिल है। हालांकि नई दुनिया का मालिक से लेकर संपादक तक बदल चुका है। दूसरी तरफ पत्रकारों की स्थिति भी यही है। अब उनकी पहचान कलम की बजाय बैनर से होती है। और अधिकारी से लेकर नेता भी बड़े बैनर माने जाने वाले अखबार के पत्रकारों को ही ज्यादा पूछ परख करते हैं।
ऐसे में जब चुनाव नजदीक हो तो विज्ञापन और पेड न्यूज की मारा मारी के चलते बड़े बैनरों के इन पत्रकारों पर दबाव भी बहुत है। और अब तो पत्रकारों की किमत भी बढऩे लगी है। बैनर बदलने के एवज में वेतन भी बढ़ रहा है।  मुसिबत छोटे बैनर की बढ़ गई है क्योंकि छोटे बैनर के अच्छे पत्रकारों को बड़े बैनर वाले ज्यादा तनख्वाह देकर अपने यहां ले जाने लगे हैं।
इन सबके बीच छोटे बैनरों खासकर साप्ताहिक और मासिक पत्रिका निकाल रहे पत्रकारों की दिक्कतें भी इस चुनावी साल में बढऩे लगी है। क्योंकि बड़े बैनरों की अपनी सीमा हे और उन पर सरकार व जनसंपर्क विभाग का दबाव भी है जबकि इसके उलट छोटे बैनर वालों की पूछ तभी बढ़ती है जब वे दमदार खबर परोसते हैं।
हालांकि पत्रिका के आने के बाद बड़े अखबारों का तेवर भी बदला है लेकिन चुनाव तक यह तेवर बरकरार रहेगा इसे लेकर संशय जरूर कायम है। नंबर वन की दौड़ में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई का भौंडा प्रदर्शन माना जा रहा है।  अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन नंबर वन की दौड़
में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई  माना जा रहा है।
अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन इस बार एक मासिक पत्रिका से जुड़े अनिल श्रीवास्तव नायक पत्रकार ने जनसंपर्क के अधिकारी के खिलाफ सिटी कोतवाली में शिकायत की है। शिकायत किये एक माह हो गये लेकिन अभी तक जुर्म दर्ज भी नहीं हुआ है। यानी सरकारी दबाव जारी है।
और अंत में ...
मंत्रालय दूर होने से अफसरों को राहत तो मिली है लेकिन पत्रकारों की दिक्कत बड़ गई है। मंत्रालय के नाम पर समय व रूतबा झाडऩे वालों को अब अन्य सीटों पर मेहनत करनी पड़ रही है।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

बढ़ता असंतोष खिसकता जनाधार



रायपुर को अपना गढ़ मानने वाली भाजपा का जनाधार जिस तेजी से घटने लगा हे उसे नजर अंदाज किया गया तो आने वाले दिनों में राजधानी में परचम लहराना सपना बन कर रह जायेगा । दो-दो मंत्रियों के रहते भी राजधानी में भाजपा को लगातार क्यों मान मिल रही है ? ेयह हैट्रिक में जुटी भाजपा के लिए कितना विचारणीय है यह तो वही जाने लेकिन निष्ठावान भाजपाई बेचैन हैं ।
इन दिनों रमन सरकार हैट्रिक की तैयारी में लगी है । ऐसे में उसके सामने सबसे बड़ी समस्ेया अपने गढ़ की रक्षा करना है । भाजपा का सर्वाधिक गढ़ रायपुर को मान जाता है । और यहां से दो-मंत्री भी बनाये गए है और दोनों ही मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत को दमदार माना जाता है ।
भाजपा के इस अभेद माने जाने वाले गढ़ में सेंध तो पिछले चुनाव में ही लग गया था जब यहां की चार में से एक सीट पर कांग्रेस विधायक कुलदीप जुनेजा ने अपनी जीत का परचम लहराया था । लेकिन भाजपा ने इसे गंभीरमा से नहीं लिया और मामूली अंतर की जीत की भरपाई को लेकर मुगालते में रही ।
हालांकि दमदार मंत्री और मजबूत संगठन के बल पर भाजपा अब भी राजधानी में कांग्रेस के मुकाबलेे मजबूत दिख रही है लेकिन महापौर चुनाव में मिली करारी हार के बाद भी यदि भाजपाई या रमन सरकार मुगालते में है तो फिर इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ सकता है ।
राजधानी के चारों सीट के महापौर चुनाव में न केवल किरणमयी नायक की जीत हुई बल्कि भाजपा पार्षद तीस की संख्या पर सिमट गई है । इसके बाद भी मंत्रियों की मनमानी, संगठन की निरकुंशता और भाई भतीजा वाद के चलते भाजपा में जबरदस्त असंतोष दिखने लगा है । असंतोष लोगों के परचा कांड को नजर अंदाज करना सभापति चुनाव में भी भारी पड़ा है । और राज्य की सत्ता में होने के बाद भी भाजपाई पार्षदरों ने बगावत का जो खले खेला वह अनुशासन का दंभ भरने वाली पार्टी के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा ।
भले ही संगठन खेमा का सरकार में बैठे मंत्री अविश्वास प्रस्ताव के क्रॉस वोटिंग को सभापति के खिलाफ मान ले लेकिन सच तो यह है कि कोयले की कालिख और चेहरा देखकर लालबत्ती बांटने की सरकारी कारगुजारियों से निष्टावान भाजपाई न केवल नाराज हैं बल्कि मौका मिलने पर वे पार्टी के खिलाफ भी जा सकते हैं ।
बताया जाता है कि दमदार मंत्रियों की आपसी लड़ाई का असर भी संगठन में पड़ा है और यही वजह है कि संगठन में बिखराव स्पष्ट दिखने लगा है ।
बहरहाल भाजपा के इस गढ़ में बढ़ते असंतोष को नहीं रोका गया और अपने को पार्टी का सर्वेसर्वा मानने वालों पर लगाम नहीं कसा गया तो आने वाले दिनों में भाजपा को इसका जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा सकता है ।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

लाफार्ज ने मचाई लूट रमन ने दी पूरी छूट



 भाजपा ने 2003 के चुनाव में जोगी शासन काल के 35 घोटाले को लेकर  खूब हल्ला मचाया था, भाजपा ने जोगी शासनकाल के जिन 35 घोटालो का सत्ता में आते ही नेस्तनाबूत करने की बात कही थी लाफार्ज के घोटाले को आठवां स्थान दिया था। 7-8 साल के शासन काल में रमन सिंह ने इन्हें क्यों उजागर नहीं किया इसके पीछे सीधा सा गणित मिल बांट कर लूटो के अलावा कुछ नहीं है। हालत यह है कि 2003 के किए वादे से सरकार पीछे हट रही है और अपने आप को ईमानदार बता रही है। लाफार्ज के घोटाले को उजागर करने की बात तो दूर वह उसे संरक्षण दे रही है। ऐसे में देशी का ढोंग भी इसलिए उजागर होता है क्योंकि लाफार्ज विदेशी कंपनी है जिसका मुख्यालय फ्रांस के पेरिस में है।
भारतीय जनता पार्टी की सरकार और उसके मुखिया डॉ रमन सिंह ने जनता से किए वादे को पूरा नहीं कर सीधे-सीधे आम लोगों से धोखाधड़ी की है। लाफार्ज एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है जिसका छत्तीसगढ़ में सोनाडीह और आरसमेटा में सीमेंट संयंत्र है उसने यह संयंत्र टाटा और रेमंट सीमेंट से खरीदा है। इस खरीदी के रजिस्ट्री में ही उसने लगभग 160 करोड़ का घपला किया और इस मामले को लेकर जब भाजपा विपक्ष में थी तो खूब हंगामा मचाया लाफार्ज के इस घोटाले को लेकर जोगी सरकार पर संगीन आरोप भी लगाए गए यहां तक कि भाजपा ने विधानसभा ठप्प करने तक का निर्णय लिया लेकिन सत्ता में आते ही क्या वजह थी कि उसने लाफार्ज के खिलाफ कार्रवाई नहीं की और तो और उसके द्वारा सीमेंट के मूल्य वृद्धि पर भी कोई कार्रवाई नहीं की यहां तक कि लाफार्ज के अवैध उत्खनन और रायल्टी चोरी को भी रमन सरकार ने संरक्षण दिया।
देशी की राजनीति में माहिर भाजपा से यह उम्मीद थी कि वह छत्तीसगढ़ में लूट मचाने वाली इस लाफार्ज के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगी लेकिन वह तो लूूट खसोट में दो कदम आगे हो गई और कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति में ही संलग्न रही।
लाफार्ज के द्वारा छत्तीसगढ़ को सर्वाधिक नुकसान इसी रमन सरकार के कार्र्यकाल में लगाया गया। कहां तो 2003 के घोषणा पत्र में लाफार्ज के घोटाले को उजागर कर दोषियों को सजा दिलाने का वादा था लेकिन यहां तो उल्टा ही हुआ लाफार्ज ने सेलटेक्स में चोरी के लिए नया रास्ता खोजकर छत्तीसगढ़ से करोड़ो रूपए का चूना लगाया।
बताया जाता है कि लाफार्र्ज द्वारा अरबों का क्लिंकर हर माह दूसरे राज्य में भेजकर अरबों रूपए का नुकसान पहुंचया जा रहा है लेकिन लाफार्ज घोटाले पर कार्रवाई करने का दावा करने वाली रमन सरकार सत्ता में आते ही उल्टे छत्तीसगढ़ को नुकसान के एवज में लाफार्ज के घोटाले पर चुप्पी साध ली।
यदि भाजपा सरकार को लाफार्ज के घोटाले पर कार्रवाई नहीं करनी थी तब उसने विपक्ष में रहते हुए विधानसभा का समय क्यों खराब किया। घोषणा पत्र में लाफार्ज के घोटाले को उजाकर कर दोषियों पर कार्रवाई की बात क्यों की और क्या कार्रवाई के लिए 7-8 साल का समय कम है। ये ऐसे सवाल जिसका जवाब डॉ.रमन सिंह को देना ही होगा।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

बेईमानों को गले लगाओं ईमानदारों को दूर भगाओं

शशिमोहन के बाद सौमित्र प्रताडि़त
घपलेबाजों के दबाव में हुुआ चौबे का तबादला
छत्तीसगढ़ में रमन सरकार के सुराज की कलई खुलने लगी है । चौतरफा भ्रष्टाचार और प्रशासनिक आतंक का यह आलम है कि ईमानदार माने जाने वाले अधिकारियें को प्रताडि़त किया जा रहा है तो बेईमान व भ्रष्ट अधिकारियों को रिटार्यटमेंट के बाद भी संविदा देकर गले लगाया जा रहा है । हालत यह है कि आर्थिक अपराध ब्यूरों की कार्रवाई के बाद भी अफसर अपने पदों पर बैठे हुए है और ईमानदार माने जाने वाले लोग उपेक्षा का शिकार हो रहे है ।
एक तरफ तो रमन सरकार हैट्रिक की तैयारी में लगी है और वह कोयले की कालिख पूते चेहरों के साथ हैट्रिक का सफर कैसे तय करेगी । यह भी अब सामने आने लगा है । एक तरफ तो तहसीलदार पुलक भट्टाचार्य जैसे अधिकारी को तबादले के चार माह के भीतर ही वापस राजधानी ले आती है तो दूसरी तरफ सौमित्र चौबे जैसे अधिकारी का तबादला सिर्फ इसलिए किया जाता है क्योंकि वह बड़े-बड़े घपलेबाजों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं ।
ज्ञात हो कि सौमित्र चौबे ने हाल ही में राजधानी में मंत्रियों के नजदीक माने जाने वाले कई बड़े घपलेबाजों के खिलाफ कार्रवाई की थी । इसमें से फर्जी गैस सिलेन्डर मामले में हुई कार्रवाई से एक मंत्री की खूब किरकिरी हो रही है । बताया जाता है फरार तापडिय़ा का एक मंत्री और एक निगम के अध्यक्ष से नजदीकी संबंध रहे हैं और इस तापडिय़ा द्वारा इनके चुनाव से लेकर दूसरे कार्यक्रमों के लिए चंदे के रूप में मोटी रकम भी दिया जाता था । बताया जाता है कि तभी से सौमित्र चौबे को हटाने की कोशिश हुई थी लेकिन हल्ला मचने के डर से कार्रवाई नहीं हुई ।
इसके बाद सौमित्र चौबे ने निको द्वारा पेट्रोल पम्प से घपले बाजी कर डीजल भरवाने के मामले का खुलासा किया तो औघोगिक क्षेत्र में हड़कम्प मच गया ।
बताया जाता है कि कई उद्योग डीजल के खेल में लिप्त हैं और दूसरी सूचना चौबे तक पहुंचने लगी थी । चौबे के इस कार्रवाई से उद्योगों में हड़कम्प मच गया और चौबे को हटाने दबाव बढऩे लगा था लेकिन सरकार भी कोई हंगामा नहीं चाहती थी इसलिए चौबे का तबादला जानबुझकर तबादला सूची में शामिलल कर किया गया ताकि हंगामा न मचे ।
ऐसा नहीं है कि घपले बाजों के दबाव में सरकार या उसके मंत्रियों की यह पहली करतूत है इससे पहले भी दर्जन भर ऐसे मामले सामने आये है जब रमन सरकार ने सुराज के नाम पर घपलेबाजों के दबाव में ईमानदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है । जिसमें आई एएस पी सुन्दरराज के अलावा रायपुर सीएसपी शशिमोहन सिंह शामिल हैं ।
शशिमोहन सिंह का मामला तो राजधानी में आज तक चर्चा में है । शशिमोहन सिंह को सिर्फ इसलिए प्रताडि़त खोर बद्री के खिलाफ कार्रवाई की थी । ये बद्री भाजपा में न केवल दमदार माना जाता है बल्कि इसके इशारे पर मंत्री भी नाचते हैं ।
बताया जाता है कि सरकार के सूराज के इस नये परिभाषा की राजधानी दी नहीं पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय है । और कोई आश्चर्य नहीं कि इस बार के चुनाव में भ्रष्टाचार कोयले की कालिख, मंत्रियों की करतूतों के अलावा ईमानदार अफसरों की प्रताडऩा भी मुद्दा बने । बाहरहाल शशिमोहन सिंह के बाद सौमित्र चौबे को प्रताडि़त करने का मामला राजधानी में चर्चा का विषय है जिसका खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ सकता है । 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

पुलक से पल्लवित होगा मूणत का खेल



सीतापुर तबादले में जाने के चार माह में ही वापसी
 एक तरफ जब पुरी भाजपा केन्द्र की कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार पर हल्ला मचा रही है तो वहीं दूसरी तरफ प्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं । वैसे तो मुख्यमंत्री सहित सारे मंत्रियों पर भ्रष्ट अफसरों को बचाने का आरोप है लेकिन प्रदेश सरकार के मंत्री राजेश मूणत ने जिस तरह से चार महिने में ही पुलक भट्टाचार्य को वापस अपने विभाग में बुला लिया उससे सरकार की किरकिरी ही हो रही है ।
बेलगाम अफसर या प्रशासनिक आतंक की कहानी थमने का नाम ही नहीं ले रहा हैं । यही वजह है कि मंत्रियों की करतूत से जहां आम आदमी का बुरा हाल है वही भ्रष्ट अफसरों के मजे हैं । खासकर राजधानी में जमीन से जुड़े मामलों में मंत्रियों की रूचि देखते ही बन रही है । चौतरफा अंधेरगर्दी का आलाम यह है कि चहेते अफसरों के लिए नियम कानून तक ताक पर रखे जा रहे हे । यही वजह है कि चार महिने पहले नगर निगम रायपुर से सीतापुर भेजे गए तहसीलदार पुलक भट्टाचार्य की न केवल वापसी कर ली गई बल्कि कमल विहार जेसे महत्वपूर्ण योजना में बिठा दिया गया । कहां जाता है कि यह सारा खेल प्रदेश सरकार के मंत्री राजेश मूणत का है और उन्ही की रूचि के चलते पुल्लक भट्टाचार्य जैसे अफसर की चार महिने में ही वापसी हो गई ।
सूत्रों का कहना है कि पुलक भट्टाचार्य की वापसी के पीछे सिर्फ कमल विहार प्रोजेक्ट ही नहीं है बल्कि जमीन के दूसरे मामले भी है । दरअसल पुलक भट्टाचार्य पर यह भी आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान राजधानी व इसके आस पास की जमीनों का जबर दस्त खेल हुआ है । सरकारी जमीनों की बंदर बांट से लेकर कब्जे की कहानी में पुलक भट्टाचार्य का नाम है और पुलक की वापसी की वजह भी जमीन ही है । सूत्रों की माने तो पुलक के पास नामी-बेनामी जमीनों की भरपूर जानकारी है और मंत्रियों को खुश रखने में माहिर मूणत को चार माह पहले दबाव में जब सीतापुर तबादला किया गया था तभी से उनकी वापसी की चर्चा रही है । कहा जाता हे कि तबादले के बाद भी राजेश मूणत से उनकी नजदीकी की चर्चा होते रही है ।
बंगाली मूल के इस अफसर की करतूतों की वैसे तो कई तरह की चर्चा है और कहां जाता है कि मंत्रियों के शह पर उन पर बेहिसाब संपत्ति अर्जित करने का भी आरोप है । कहा जाता है कि पुलक भट्टाचार्य की करतूतों से पार्टी के कई कार्यकर्ता नाराज है और यही वजह है कि संगठन खेमें ने भी उनकी वापसी का विरोध किया था लेकिन राजेश मूणत के जिद के आगे किसी की नहीं चली । इधर पुलक भट्टाचार्य की वापसी को लेकर कई ऐसे बिल्डर भी खुश है जो अवैध कब्जे में माहिर है जबकि रायपुर विकास प्राधिकरण में इसका भारी विरोध है ।
बहरहाल पुलक की वापसी से राजेश मूणत का कितना भला होगा यह तो वही जाने लेकिन सरकार के इस रूख से भाजपा को जरूर नुकसान हो सकता है ।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

सत्ता से समृद्धि...


कभी राजनीति समाज सेवा का सबसे सशक्त माध्यम हुआ करता था । सादा जीवन उच्च विचार के मूलमंत्र से अभिभूत राजनीति में आने वाले की सेवा भाव देखते ही बनती थी । कांग्रेस हो या भाजपा, समाजवादी हो या कम्यूनिष्ट सबके लिए समाज सेवा प्रथम लक्ष्य रहा । ऐसे कितने ही उदाहरण रहे जब इस देश में नेताओं ने राजनैतिक सुचिता के लिए सत्ता की कुरसी को लात मारने से भी परहेज नहीं किया । खुद छत्तीसगढ़ में बैठी रमन सरकार की पार्टी में ही अटल-आडवानी से लेकर कई नाम लोगों को जुबानी याद हैं जिन्होंने राजनैतिक सुचिता के लिए अपना सब कुछ होम कर दिया । लेकिन क्या अब इसी पार्टी में ऐसा हो रहा है । भाजपा ही क्यों किसी भी पार्टी में ऐसा नहीं हो रहा है । अपराधियों को संरक्षण से लेकर खुद भ्रष्टाचार में डुबे लोग सत्ता का केन्द्र बने हुए है और ऐसे लोग बड़ी बेशर्मी से राजनैतिक सुचिता, ईमानदारी की बात करते नहीं थकते । http://naiaaaadee.blogspot.in/