मंगलवार, 27 अगस्त 2013

भाजपा के दर्जन भर विधायक जोगी एक्सप्रेस में बैठने आतुर...


कांग्रेसी हलाकान
भाजपाई परेशान

विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारी के बीच जोगी एक्सप्रेस की बढ़ती रफ्तार ने यहां की राजनीति को गरमा दिया है। जोगी एक्सप्रेस की बढ़ती रफ्तार से जहां कांग्रेस हलाकान है तो भाजपा की परेशानी भी बढऩे लगी है। भाजपा अब खराब प्रदर्शन करने वाले विधायकों की टिकिट को लेकर दुविधा में है कि कहीं में लोग जोगी एक्सप्रेस में न बैठ जाए क्योंकि चर्चा है कि भाजपा के दर्जन भर से अधिक विधायक न केवल जोगी के संपर्क में हैं बल्कि उनके एक्सप्रेस में भी बैठने को आतुर है।
छत्तीसगढ़ में पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार राजनैतिक फिजा अलग ही दिखाई देने लगाह है। दस साल से सत्ता सीन भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत मुखिया डॉ. रमन सिं की छवि को लेकर है। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक आतंक के चलते कालिख पूते चेहरे का असर साफ दिखने लगा है। भले ही भाजपा हैट्रिक का दखा कर रही हो लेकिन इंदिरा बैंक घोटाले के नार्को टेस्ट की सीडी से लेकर दरभा घाटी में हुए कांग्रेसी नेताओं की हत्या को होने वाले दुस्प्रभाव को रोक पाना आसान नहीं है। उपर से भाजपा विधायकों की छवि और कुनबे करतूतों को लेकर पार्टी में जबरदस्त उहापोह की स्थिति बनी हुई है।
कहा जाता है कि भाजपा द्वारा कराये सर्वे में दो दर्जन से अधिक विधायकों की रिपोर्ट कार्ड बेहद खराब हे ऐसे में भाजपा के लिए हैट्रिक की राह आसान नहीं है। डॉ. रमन सिंह खुद कोयले की कालिख, इंदिरा बैक घोटाले से लेकर प्रशासनिक अक्षमत के आरोपों से उबर नहीं पाये हें तो उनके मंत्रीमंडल के कइई सदस्य भी गंभीर आरोपों से घिरे हुए है। यहां तक कि विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक तक आरोपों से बच नहीं पाये है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत अजा-जजा वर्ग के वोटों के अलावा पिछड़े वर्ग के वोटों को साधने की है। सतनामी समाज जहां आंख तरेर कर खड़ा है तो आदिवासी समाज भी कम आक्रोशित नहीं है। ऐसे में भाजपा की छोटी सी भूल बड़ी लापरवाही साबित हो सकती है।
दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौति गुटबाजी है। नये प्रदेशाध्यक्ष चरणदास महंत के नेतृत्वक्षमता को लेकर सपाल उठाये जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि वे अब भी रंगा-बिल्ला से नहीं उबर जाये है। कांग्रेस का एक बड़ा  जहां महंत से नाराज है तो वही पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने महंत के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ रखा है।
राजनैतिक विश£ेषकों का मानना है कि अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के जनाधार वाले सबसे बड़े नेता है ऐसे में उनको नजर अंदाज करना न केवल कांग्रेस बल्कि भाजपा को भी भारी पड़ सकता है।
इन दिनों स्व. मिनी माता के आदर्शो को लेकर जोगी एक्सप्रेस चला रहे इस कांग्रेसी नेता की सभा में जुटने वाली भीड़ से भले ही भाजपाई खुश दिख रहे हो पर सच तो यह है कि कहीं चुनाव में भी यह एक्सप्रेस चल निकला तो भाजपा को ही सर्वाधिक नुकसान होने वाला है।
सूत्रों की माने तो जोगी की ताकत को देखकर भाजपा के दर्जनभर से अधिक विधायक उनके संपर्क में है जबकि टिकिट करने की सूरत में कई भाजपा विधायक जोगी एक्सप्रेस में बैठ सकते हैं। बताया जाता है कि भाजपाई भले ही उपर से खुश दिखाई दे रहे हैं लेकिन जोगी एक्सप्रेस के संभावित रफ्तार से पार्टी के कई लोगों के माथे पर बल पडऩे लगे है।
बहर हाल जोगी एक्सप्रेस की बढ़ती रफ्तार ने छत्तीसगढ़ की राजनीति को चुनाव के 4 माह पहले ही गरमा दिया है और देखना है कि इस एक्सप्रेस में कौन-कौन सवार होता है।

सोमवार, 26 अगस्त 2013

नार्को सीडी की असलियत पर सरकार चुप क्यों?


* भूपेश की चुनौती से भाजपा में घबराहट!
* कांग्रेसी घोटालों को पैसा खाकर दबाया!
* संचेती बंधु और अदानी गु्रप पर मेहरबानी!
* जल जंगल जमीन सभी की चौतरफा लूट!
* सब कुछ मुफ्त बांटने से मध्यम वर्ग नाराज!
रायपुर। इंदिरा बैंक घोटाले के मामले में नार्को सीडी के खुलासे से जहां भाजपा की मुसिबत थमने का नाम नहीं ले रहा है वहीं मुख्यमंत्री और चारों मंत्रियों से हाईकमान की नाराजगी ने नया मोड़ ले लिया है। नार्को सीडी को फर्जी बताने वाली सरकार ने अब तक न तो असली सीडी ही जारी की है ओर न ही भूपेश बघेल की चुनौती को दी स्वीकार किया है इसे लेकर भाजपा को जवाब देना मुश्कि हो रहा है।
अपनी कथित साफ छवि और विकास को मुद्दा बनाने का दंभ भरने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कोल ब्लॉक आबंटन में संचती बंधुओं पर की गई मेहरबानी से ही किरकिरी शुरू हो गई थी। इस मेहरबानी के चलते न केवल छत्तीसगढ़ को हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ बल्कि भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नीतिन गडकरी भी कटघरे में खड़े हुए। इसके बाद कैग ने अदानी ग्रुप पर मेहरबानी का खुलासा कर रमन सरकार के कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया। अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि नक्सलियों के दरभा कांड में हुए कांग्रेसी दिग्ंगजों की हत्या
ने सरकार की नियत पर सवाल खड़ा कर दिया। इस मामले में कांग्रेस नेता भूपेश बघेल के द्वारा रमन सिंह के द्वारा ब्रम्हास्त्र चलाने की बात कहकर सनसनी फैला दी थी।
ताजा मामला इंदिरा बैक घोटाले में उमेश सिंह की नार्को सीडी का है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित उनके मंत्रियों पर घोटाले दबाने करोड़ों रूपये खाने का जो आरोप कांग्रेस ने लगाया हे उससे भाजपा में बेचैनी बड़ गई है। हालांकि उपरी तौर पर भाजपा इस सीडी से नुकसान नहीं होने का दावा कर रही है पर सच तो यह है कि कल तक कांग्रेस को गरियाने वाली भाजपा के पास नार्को सीडी मामले में कोई जवाब नहीं हे। अब तो आम आदमी भी कहने लगा है कि यदि सीडी नकली है तो सरकार असली सीडी सामने क्यों नहीं ला रही है।
इधर भाजपा ने भ्रष्टाचार, दरभा कांड और नार्को सीडी से हो रहे नुकसान से निपटने कई विधायकों की टिकिट काटने और गरीबों व युवाओं को सब कुछ मुक्त बांटने का निर्णय ले लिया है।
सूत्रों का कहना है कि हाल के वर्षो में विकास के नाम पर संसाधनों की चौतरफा लूट जिस पैमाने पर हुआ है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। स्तर हीन सड़क से लेकर भवन निर्माण और भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण को लेकर आम लोगों में सरकार की छवि पर प्रभाव पड़ा है।
इधर सरकार की मुफ्त बांटने की वोट बैक की राजनीति से मध्यम वर्ग में बेहद नाराजगी है। सूत्र बताते है कि सरकार की इस मुक्त बांटो योजना से नाराज मध्यम वर्ग ने यदि अपनी नाराजगी वोट के रूप में तब्दिल कर दी तो भाजपा को लेने के देने पड़ जायेंगे।
दूसरी तरफ चर्चा इस बात की भी है कि चुनावी साल में रमन सरकार के करतूतों के इस खुलासे से हाईकमान भी नाराज हे और भले ही बाहर से सब ठीक दिख रहा हो लेकिन भीतर से कुछ भी ठीक नहीं है।
बहरहाल नार्को सीडी का असर क्या होगा यह बाद में ही पता चलेगा।

सोमवार, 3 जून 2013

आतंक...आतंक... और आतंक...!

 छत्तीसगढ़ में इन दिनों चौतरफा आतंक मचा हुआ है। प्रशासनिक राजनैतिक आतंक के गठजोड़ के चलते जहां माफिया गिरी बढ़ी है वहीं औद्योगिक और नक्सली आतंक के चलते आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। भले ही रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने चावल, लैपटाप, साइकिल बांटकर अपनी राजनीति को मजबूत किया है लेकिन सच तो यह है कि माफिया गिरी के चलते जिस ढंग से छत्तीसगढ़ की खनिज संपदाओं, और जमीनों पर डकैती डाली गई है। उससे नहीं लगता कि सरकार नाम की भी चीज यहां है। अपराधों के आंकड़े बताते हैं कि रमन राज में अपराध कई गुणा बढ़े हैं और पुलिस की गुण्डागर्दी चरम पर है। राजधानी पर करोड़ों रूपया तो फूंका गया लेकिन स्कूल और अस्पतालों की अनदेखी की गई। विकास के नाम पर करोड़ों रूपये फूंकने के दावे तो किये गए लेकिन गांवों तक विकास पहुंचा ही नहीं। कैग की रिपोर्ट बताती है कि रमन सरकार ने आर्थिक अनियमिताओं के सारे रिकार्ड तोड़ डाले और संचेती से लेकर अदानी गु्रप को फायदा पहुंचाने छत्तीसगढ़ को करोड़ों अरखों का नुकसान पहुंचाने से पीछे नहीं हटी। बस्तर में सरकार नहीं होने और लाल आतंक का साया है तो भाजपाई आतंक का अदाहरण भी कम नहीं है। जिस प्रदेश का मुखिया देखलुंगा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता हो सवाल करने वाले या पार्टी में विरोध करने वालों पर पुलिसिया रौब दिखलाता हो वहां सरकार क्या और कैसी होगी सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
बस्तर में कांग्रेस नेताओं पर हुए नक्सली हमले ने सरकार को घेरे में आज लिया हो। लेकिन सच तो यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार नहीं होने की बात लोग पहले से ही कर रहे है।

शनिवार, 23 मार्च 2013

विकास और सुराज पर कर्मों की रपट भारी


सात मंत्रियों सहित तीन दर्जन विधायक निशाने पर
    अपनों का विकास, परिजनों व समर्थकों को नियम विरूद्ध उपकृत!
    अधिकारियों का सुराज- पर्सनल स्टाफॅ  से लेकर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण
    कई लोगों के आचरण खराब कोयले की कालिख, रोगदा बंाध का बिकना, सरकारी जमीनों पर अवैध         कब्जे और बंदर बांट
    भ्रष्ट और निकम्मों की संविदा नियुक्ति
    परिजनों, समर्थकों व पर्सनल स्टाफ की बढ़ती बदसलूकी
    आरक्षण कटोति- अनुसूचित जाति, आदिवासी व पिछड़े भी नाराज केन्द्रीय नेतृत्व सातों मंत्रियों को हटाने     का निर्देश भी दिया पर जनाधार के नाम पर प्रदेश नेतृत्व से जीवन दान ।
हैट्रिक की तैयारी में जुटी रमन सरकार भले ही अपने शासन काल में विकास और सुराज लाने का कितना भी आंकड़ा पेश कर ले सच तो यह है कि कर्मों की रिपोर्ट देखकर उनकी जमीन खिसक गई है। गुप्तचर एजेसियों से तैयार रिपोर्ट कार्ड का निष्कर्ष साफ है कि प्रदेश के सात मंत्रियों सहित करीब तीन दर्जन विधायकों को दो बारा टिकिट दी गई तो पार्टी का बेड़ा गर्क हो सकता है। रिपोर्ट कार्ड के बाद केन्द्रीय नेतृत्व जहां बेहद नाराज है वहीं प्रदेश के आला नेता भी सकते में हैं।
 सूत्रों की माने तो केन्द्रीय नेतृत्व ने इन सातों मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाने का सुझाव तक दे दिया है लेकिन प्रदेश नेतृत्व इस पर सहमत इसलिए नहीं हुए क्योंकि कोयले की कालिख कहीं बगावत का बिगुल न बजा दे इसलिए इन्हें जनाधार वाले नेता बताते हुए ब्रम्हास्त्र का हवाला दिया गया है।
हमारे बेहद भरोसे बंद सूत्रों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 8 माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व भी बेचैन है। और इसकी वजह यहां से पहुंचने वाले सांसदों की संख्या है। यही वजह है कि गुप्तचर एजेंसियों के माध्यम से रिपार्ट कराई गई है। रिपोर्ट में मंत्रियों के परफार्मेश पर फोकस करने का निर्देश था।
सूत्रों की माने तो रिपोर्ट कार्ड देखकर केन्द्रीय नेतृत्व भी हैरान है और यही वजह है कि सात मंत्रियों को हटाने की सलाह दी गइ्र । रिपोर्ट कार्ड में सात मंत्रियों की कार गुजारियों का विस्तार से लेखा जोखा दिया गया है। इन मंत्रियों के परिजनों व पसर्नल स्टाफ के बारे में गंभीर टिप्पणी की गई है जबकि एक मंत्री के महिला मित्र की वसूली का भी जिक्र है।
एक मंत्री के तो पर्सनल स्टाफ और परिजनों पर आरोप लगाये गये है कि इनका विभागों में भारी दबदबा हे ढेका और तबादलों में मनमानी चरम पर है। मंत्रियों के परिजनों का सरकारी जमीनों पर कब्जा और मनमाने ढंग से आबंटन पर भी तीखी टिप्पणी की गई है।
बस्तर के एक मंत्री के आचरण को लेकर जहां गंभीर सवाल उठाये गये है वहीं रायपुर के एक मंत्री व लालबत्ती वाले विधायक के व्यवहार और पर्सनल स्टाफ के दुव्र्यवहार पर भी टिप्पणी की गई है।
सूत्रों की माने तो कई अफसरों के करतूतों पर सरकार की खामोशी और संरक्षण पर भी गंभीर सवाल खड़े किये है।
बताया जाता है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने ऐसे अफसरों को दूर रखने की हिदायत दी है जबकि खराब रिपोर्ट वाले विधायकों की टिकिट हर हाल में काटने की सलाह दी है।
सूत्रों के मुताबिक संगठन को ऐसे विधायकों व मंत्रियों के स्थान पर नये विकल्प तैयार रखने कहा है। खासकर बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभाग में बड़े पैमाने पर बड़े पैमाने पर परिवर्तन के संकेत मिलने भी लगे है। इधर रायपुर-बिलासपुर के मंत्रियों को जनाधार वाला मान कर समझाईश देने की चर्चा है जबकि सूत्रों का दावा है कि केन्द्रीय नेतृत्व इनके बगावती रूख का भी पता लगाने में लगी है ताकि टिकिट करने की स्थिति पर विषय परिस्थिति पैदा न सके।
सूत्र बताते है कि विधानसभा के ठीक पहले राजनैतिक अस्थिरता से बचने मंत्रियों को हटाया नहीं जा रहा है लेकिनह केन्द्रीय नेतृत्व के द्वारा इन मंत्रियों को फटकार लगाते हुए चेतावनी जरूर दे दी गइ्र है कि यदि आचरण नहीं सुधारा गया तो टिकिट भी काटी जा सकती है। खासकर भ्रष्टाचार के मामले में मंत्रियों को सतर्क रहने की नसीहत दी गई है।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

गुस्से की आग पर आश्वासन की बौछार...


आरक्षण कटौति पर आक्रोशित पिछड़े वर्ग ने कांकेर से राजधानी तक का सफर जब पैदल पूरा कर लिया तब सरकार केवल आश्वासन ही दे पाई। आरक्षण को लेकर सतनामी समाज भी नाराज है और सतनामी समाज की नाराजगी के चलते कुतुब मीनार से ऊंचा बने जैतखम्भ का पिछले दो साल से उद्घाटन नहीं हो पा रहा है।
इन दोनों वर्गो की नाराजगी जायज है या नहीं यह सवाल कतई नहीं है। सवाल है कि आखिर लोगों में इतना गुस्सा क्यों है कि वे अपने द्वारा चुने सरकार के आश्वासन पर भी भरोसा नहीं कर रहे हैं। सवाल यह भी नहीं है कि क्या रमन सरकार ने अपनी विश्वसनियता खो दी है। सवाल आश्वासन पर टूटते भरोसे का है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले भी छला जाता रहा है और आज भी छला जा रहा है। सरकार में बैठे लोगों की संम्पति कई गुना बढ़ रही है तो दूसरी तरफ गरीबों की संख्या बढ़ रही है। 9 साल में रमन सिंह की सरकार भले ही विकास का कितना भी ढिढ़ोरा पिट ले लेकिन सच तो यह है कि वह अपने संकल्प तक को पूरा नहीं कर पाई है। हिन्दूत्व की दुहाई देने वाली भाजपा को संकल्प का मतलब समझाना पड़े तो लोगों को गुस्सा आना स्वाभाविक है।
आरक्षण की जटिलता को नजर अंदाज कर भी दे तो सरकार ने 9 सालों में क्या किया? उसने लोगों से किये वादे-संकल्प को पूरा क्यों नहीं किया। शिक्षा कर्मियों के संविलियन से लेकर दाल भात सेंटर चलाने के मामले में रमन सरकार फेल हो चुकी है।
राज्योत्सव और राजिम कुंभ पर अरबों रूपये खर्च करने का मतलब भी जनता जान चुकी है ग्राम सुराज हो या जनदर्शन सब नौटंकी साबित होने लगा है । विकास के नाम पर कोयले की कालिख और उद्योगों के लिए खेती की जमीनों की बरबादी के लिए छत्तीसगढ़ पूरे देश में कलंकित हुआ है तब भला लोग आश्वासन पर क्यों भरोसा करें।
हमारा भी मानना है कि चुनावी साल होने मांग रखने वालों का दबाव है लेकिन इन नौ सालों में सरकार के कामों की समीक्षा होनी चाहिए कि उसने जनता से वे वादे क्यों किये जो पूरे ही नहीं किये जा सकते थे।
राज्योत्सव, राजिम कुंभ, बायो डीजल से लेकर नई राजधानी के नाम पर फिजूल खर्ची सरकार की पहचान बन चुकी है। एक तरफ सरकार शिक्षा-स्वास्थ्य, सिचाई सुविधा को बढ़ाने जैसे खुद के कार्य से मुंह मोड़ रही है तो दूसरी तरफ निजी शिक्षण संस्थानों की लूट पर चुप्पी साध ली है। शाराब बंदी की बात तो वह करती है लेकिन जन विरोध को डंडे के जोर पर दबाने का प्रयास ही नहीं करती बल्कि शराब ठेकेदारों को गोद में बिठाती है।
मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी के इतने उदाहरण है कि उसे गिना पाना संभव नहीं है। हर आवेदन हर शिकायत पर आश्वासन से लोग हैरान है। स्कूल नहीं है खोल दो पर शिक्षक की व्यवस्था नहीं होगी तो ऐसे स्कूल खोलने का क्या मतलब है?
सरकार की बदलती प्राथमिकता की वजह से ही आज लोग गुस्से में है  और चुनावी साल में यह गुस्सा फुटने लगा है।  कहने को तो सरकारों का काम आम लोगों के हितों की ध्यान रखना है और आम लोगों के हित में रोड़ा बनते कानून को बदल देना है लेकिन यहां तो अफसरशाही हावी है, वही योजना बनाई जा रही है जिसमें स्व हित सधे। ऐसे में आखिर कब तक आश्वासन पर लोग भरोसा करें।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

अपनी ढपली, अपना राग...


जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आने लगा है अखबार मालिकों ने अपना खेल शुरू कर दिया है। प्रसार बढ़ाने कुर्सी बांटने वाले भास्कर अब भी अपने को नंबर वन बता रहा है तो नवभारत, हरिभूमि और पत्रिका भी अपने को नम्बर वन बताते नहीं थकते ऐसे में पाठक किसे नम्बर वन माने? अब तो प्रसार बढ़ाने की होड़ में हर अखबार इनामी योजना से लेकर कुर्मी टेबल, हाट-पॉट टिफीन बांट रहे है। इस दौड़ में नई दुनिया भी शामिल है। हालांकि नई दुनिया का मालिक से लेकर संपादक तक बदल चुका है। दूसरी तरफ पत्रकारों की स्थिति भी यही है। अब उनकी पहचान कलम की बजाय बैनर से होती है। और अधिकारी से लेकर नेता भी बड़े बैनर माने जाने वाले अखबार के पत्रकारों को ही ज्यादा पूछ परख करते हैं।
ऐसे में जब चुनाव नजदीक हो तो विज्ञापन और पेड न्यूज की मारा मारी के चलते बड़े बैनरों के इन पत्रकारों पर दबाव भी बहुत है। और अब तो पत्रकारों की किमत भी बढऩे लगी है। बैनर बदलने के एवज में वेतन भी बढ़ रहा है।  मुसिबत छोटे बैनर की बढ़ गई है क्योंकि छोटे बैनर के अच्छे पत्रकारों को बड़े बैनर वाले ज्यादा तनख्वाह देकर अपने यहां ले जाने लगे हैं।
इन सबके बीच छोटे बैनरों खासकर साप्ताहिक और मासिक पत्रिका निकाल रहे पत्रकारों की दिक्कतें भी इस चुनावी साल में बढऩे लगी है। क्योंकि बड़े बैनरों की अपनी सीमा हे और उन पर सरकार व जनसंपर्क विभाग का दबाव भी है जबकि इसके उलट छोटे बैनर वालों की पूछ तभी बढ़ती है जब वे दमदार खबर परोसते हैं।
हालांकि पत्रिका के आने के बाद बड़े अखबारों का तेवर भी बदला है लेकिन चुनाव तक यह तेवर बरकरार रहेगा इसे लेकर संशय जरूर कायम है। नंबर वन की दौड़ में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई का भौंडा प्रदर्शन माना जा रहा है।  अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन नंबर वन की दौड़
में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई  माना जा रहा है।
अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन इस बार एक मासिक पत्रिका से जुड़े अनिल श्रीवास्तव नायक पत्रकार ने जनसंपर्क के अधिकारी के खिलाफ सिटी कोतवाली में शिकायत की है। शिकायत किये एक माह हो गये लेकिन अभी तक जुर्म दर्ज भी नहीं हुआ है। यानी सरकारी दबाव जारी है।
और अंत में ...
मंत्रालय दूर होने से अफसरों को राहत तो मिली है लेकिन पत्रकारों की दिक्कत बड़ गई है। मंत्रालय के नाम पर समय व रूतबा झाडऩे वालों को अब अन्य सीटों पर मेहनत करनी पड़ रही है।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

बढ़ता असंतोष खिसकता जनाधार



रायपुर को अपना गढ़ मानने वाली भाजपा का जनाधार जिस तेजी से घटने लगा हे उसे नजर अंदाज किया गया तो आने वाले दिनों में राजधानी में परचम लहराना सपना बन कर रह जायेगा । दो-दो मंत्रियों के रहते भी राजधानी में भाजपा को लगातार क्यों मान मिल रही है ? ेयह हैट्रिक में जुटी भाजपा के लिए कितना विचारणीय है यह तो वही जाने लेकिन निष्ठावान भाजपाई बेचैन हैं ।
इन दिनों रमन सरकार हैट्रिक की तैयारी में लगी है । ऐसे में उसके सामने सबसे बड़ी समस्ेया अपने गढ़ की रक्षा करना है । भाजपा का सर्वाधिक गढ़ रायपुर को मान जाता है । और यहां से दो-मंत्री भी बनाये गए है और दोनों ही मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत को दमदार माना जाता है ।
भाजपा के इस अभेद माने जाने वाले गढ़ में सेंध तो पिछले चुनाव में ही लग गया था जब यहां की चार में से एक सीट पर कांग्रेस विधायक कुलदीप जुनेजा ने अपनी जीत का परचम लहराया था । लेकिन भाजपा ने इसे गंभीरमा से नहीं लिया और मामूली अंतर की जीत की भरपाई को लेकर मुगालते में रही ।
हालांकि दमदार मंत्री और मजबूत संगठन के बल पर भाजपा अब भी राजधानी में कांग्रेस के मुकाबलेे मजबूत दिख रही है लेकिन महापौर चुनाव में मिली करारी हार के बाद भी यदि भाजपाई या रमन सरकार मुगालते में है तो फिर इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ सकता है ।
राजधानी के चारों सीट के महापौर चुनाव में न केवल किरणमयी नायक की जीत हुई बल्कि भाजपा पार्षद तीस की संख्या पर सिमट गई है । इसके बाद भी मंत्रियों की मनमानी, संगठन की निरकुंशता और भाई भतीजा वाद के चलते भाजपा में जबरदस्त असंतोष दिखने लगा है । असंतोष लोगों के परचा कांड को नजर अंदाज करना सभापति चुनाव में भी भारी पड़ा है । और राज्य की सत्ता में होने के बाद भी भाजपाई पार्षदरों ने बगावत का जो खले खेला वह अनुशासन का दंभ भरने वाली पार्टी के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा ।
भले ही संगठन खेमा का सरकार में बैठे मंत्री अविश्वास प्रस्ताव के क्रॉस वोटिंग को सभापति के खिलाफ मान ले लेकिन सच तो यह है कि कोयले की कालिख और चेहरा देखकर लालबत्ती बांटने की सरकारी कारगुजारियों से निष्टावान भाजपाई न केवल नाराज हैं बल्कि मौका मिलने पर वे पार्टी के खिलाफ भी जा सकते हैं ।
बताया जाता है कि दमदार मंत्रियों की आपसी लड़ाई का असर भी संगठन में पड़ा है और यही वजह है कि संगठन में बिखराव स्पष्ट दिखने लगा है ।
बहरहाल भाजपा के इस गढ़ में बढ़ते असंतोष को नहीं रोका गया और अपने को पार्टी का सर्वेसर्वा मानने वालों पर लगाम नहीं कसा गया तो आने वाले दिनों में भाजपा को इसका जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा सकता है ।