शनिवार, 28 सितंबर 2013

उत्तर सीट में फोर-एस में उलझ गई भाजपा!


सुनील, श्रीचंद, संजय और सचिदानंद
के अपने दखे, दूसरी सीट भी प्रभावित होगी
रायपुर। पिछले विधानसभा चुनाव मे ंराजधानी के उत्तर विधानसभा सीट में करारी शिकस्त झेलने वाली भाजपा इस बार भी इस सीट में उलझ कर रह गई है। फोर-एस यानी सुनील सोनी, श्रीचंद सुंदरानी, सचिदानंद उपासने और संजय श्रीवास्तव में से किसी एक को भी टिकिट देने का मतलब दूसरों के द्वारा भीतरघात की आशंका ने भाजपा की बेचैनी बढ़ा दी है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में राजधानी को भाजपा का गढ़ माना जाता है। लेकन पिछले चुनाव में कांग्रेस ने यहां से पार्षद रहे कुलदीप जुनेजा को टिकिट दी थी। जिसका फायदा उन्हें मिला और इस भाजपाई गढ़ में कुलदीप जुनेजा ने संगठन के सचिदानंद उपासने को करारी शिकस्त दी ािी। तभी से भाजपाई गढ़ ढहने की चर्चा शुरू हुई और महापौर चुनाव में भी राजधानी में भाजपा बुरी तरह पराजित हुई ।
राजधानी के चार सीट में से भाजपा के लिए सर्वाधिक दिक्कत उत्तर विधानसभा की सीट को लेकर है। इसकी वजह यहां से दावेदारों की फेहरिश्त है। और मजेदार बात यह है कि चारों प्रमुख दावेदारों का नाम अंग्रेजी के एस से शुरू होता है। पिछले चुनाव में हार का घुंट पीने वाले सचिदानंद उपासने अभी भी दावेदारों में सबसे आगे है। हार के बाद ीाी उनकी उम्मीद कायम है जबकि राजधानी के महापौर जैसे पद पर रहे वर्तमान राविप्रा अध्यक्ष सुनील सोनी भी मतबूत दावेदार है। बृजमोहन खेमे के सुनील सोनी का दावा इस लिहाज से भी मजबूत है कि वे पार्षद से लेकर महापौर तक का चुनाव जीत चुके है जबकि सचिदानंद को जनता अस्वीकार चुकी है।
तीसरे दावेदार में श्रीचंद सुंदरानी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। चेम्बर में बृजमोहन अग्रवाल खेमें को तगड़ा पटखनी देने वाले श्रीचंद सुंदरानी का न केवल सिंधी समाज में बल्कि दूसरे समाज में तगड़ी पैठ है। सिंधी मतदाता वाले इस क्षेत्र में तो चर्चा इस बात की भी है कि यदि श्रीचंद सुंदरानी को टिकिट नहीं दी गई तो भाजपा के वोट बैंक माने जाने वाले इस समुदाय के द्वारा राजधानी ही नहीं प्रदेश में भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। नगर निगम में पार्षद रहे श्रीचंद सुंदरानी के व्यवहार को लेकर भी सकारात्मक बाते हैं।
वहीं एक अन्य दावेदार संजय श्रीवास्तव वर्तमान में नगर निगम रायपुर में सभापति है और भाज्युमों की राजनीति के चलते उनकी चुवाओं में जबरदस्त पैठ भ्ी है। कहा जाता है कि अपनी कार्यशैली की वजह से भी उन्होंने पार्टी का ध्यान अपनी ओर खींचा है लेकिन राजेश मूणत की तरह काफी हद तक अक्खड़पन से भी कई लोग उन्हें टिकिट का दावेदार मान रहे हैं।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक इस सीट के लिए पार्टी ने सर्वे भी करा लिया है और सर्वे का परिणाम पार्टी के लिए बेचैन करने वाला है। बताया जाता है कि चारों दावेदारों में बेहद खींचतान है और इनमें से किसी को भी टिकिट मिलने पर दूसरे के द्वारा भीतर घात भी किया जा सकताह ै। इसके अलावा इन दावेदारों ने राजधानी के दूसरे विधानसभा में मौजूद अपने समर्थकों के बल पर जिस तरह से पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाया हे वह भी हैरान करने वाला है।
बहरहाल भाजपा के लिए यह सीट हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

राजधानी की चारों सीट में उथल-पुथल मचाएगा स्वाभिमान मंच


(विशेष प्रतिनधि)
रायपुर। भाजपा की सत्ता सफर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राजधानी के चारों विधानसभा में इस बार भाजपा की राह आसान नहीं है, तो कांग्रेस के लिए भी जीत की राह कठिन होने लगी है। स्वाभिमान मंच के द्वारा चारों सीट पर दमदार प्रत्याशी उतारे जाने की चर्चा ने कांग्रेस ही नहीं भाजपा को भी भीतर तक हिला दिया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को वैसे तो भाजपा का गढ़ माना जाता है। वर्तमान में यहां भाजपा के पास तीन विधायक और कांग्रेस के पास एक विधायक है। भाजपा के तीन में से दो विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री भी है, लेकिन दोनों में चल रही खींच-तान का असर संगठन में साफ देखा जा सकता है।
राजधानी के दमदार माने जाने वाले विधायक बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत ने पिछला चुनाव लगभग 20 हजार से अधिक वोटों से जीता था। जबकि भाजपा के ही नंदकुमार साहू और कांग्रेस के कुलदीप जुनेजा ने दो-ढाई हजार से जीत हासिल की थी।
राजनैतिक सूत्रों की माने तो प्रदेश सरकार के ये दोनों मंत्री अग्रवाल और मूणत के बीच जबरदस्त होड़ मची है और दोनों के बीच लड़ाई भी खुलकर सामने आ चुकी है। ऐसे में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर एक-दूसरे के खिलाफ अंदरुनी रणनीति के चलते दोनों की जीत को लेकर कई तरह के सवाल अभी से उठने लगे हैं। जबकि इंदिरा बैंक घोटाले के नार्को सीडी में दोनों मंत्रियों द्वारा एक-एक करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का मामला भी चर्चा में है।
इधर कांग्रेस इस बार राजधानी के चारों सीटों पर कब्जा जमाने कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती है। इसलिए वह न केवल दोनों मंत्रियों को नार्को टेस्ट की सीडी बांट रहा है, बल्कि सरकार के भ्रष्टाचार और नाकामी को उजागर करने में लगा है।
सूत्रों की माने तो टिकट को लेकर उठा-पटक के बीच जहां कुलदीप जुनेja और ग्रामीण से सत्यनारायण शर्मा की टिकट फाइनल हो चुकी है, जबकि दक्षिण से संतोष दुबे और किरणमयी नायक तथा पश्चिम से मोतीलाल साहू, प्रमोद दुबे और सुभाष धुप्पड़ में तय होना है।
प्रदेश सरकार में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार और भाई-भतीजा वाद के चलते महापौर चुनाव में बाजी मारने में सफल कांग्रेस एक बार फिर अपनी जीत को लेकर उत्साहित है, तो वहीं पहली बार चुनाव मैदान में उतर रही स्वाभिमान मंच को दमदार प्रत्याशी की तलाश है।
सूत्रों की माने तो स्वाभिमान मंच ने प्रत्याशियों की तलाश कर ली है और कांग्रेस-भाजपा के दमदार बागियों को वह अपना प्रत्याशी बनाएगी। स्वाभिमान मंच के प्रवक्ता महेश देवांगन के मुताबिक उनका मंच इस बार राजधानी में खाता अवश्य खोलेगा और उनकी कई कांग्रेसी और भाजपाई  असंतुष्टों से चर्चा भी हो चुकी है।
राजनैतिक सूत्रों का कहना है कि स्वाभिमान मंच के इस निर्णय से भाजपा ही नहीं कांग्रेस में भी जबर्दस्त बेचैनी है और मंच की दमदारी ने दोनों ही प्रमुख दलों में उथल-पुथल मचा दी है।
बहरहाल विधानसभा चुनाव का परिणाम क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन दोनों ही दलों के बागियों के तेवर से उथल-पुथल मचना स्वाभाविक है।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

भाजपा के दर्जन भर विधायक जोगी एक्सप्रेस में बैठने आतुर...


कांग्रेसी हलाकान
भाजपाई परेशान

विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारी के बीच जोगी एक्सप्रेस की बढ़ती रफ्तार ने यहां की राजनीति को गरमा दिया है। जोगी एक्सप्रेस की बढ़ती रफ्तार से जहां कांग्रेस हलाकान है तो भाजपा की परेशानी भी बढऩे लगी है। भाजपा अब खराब प्रदर्शन करने वाले विधायकों की टिकिट को लेकर दुविधा में है कि कहीं में लोग जोगी एक्सप्रेस में न बैठ जाए क्योंकि चर्चा है कि भाजपा के दर्जन भर से अधिक विधायक न केवल जोगी के संपर्क में हैं बल्कि उनके एक्सप्रेस में भी बैठने को आतुर है।
छत्तीसगढ़ में पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार राजनैतिक फिजा अलग ही दिखाई देने लगाह है। दस साल से सत्ता सीन भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत मुखिया डॉ. रमन सिं की छवि को लेकर है। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक आतंक के चलते कालिख पूते चेहरे का असर साफ दिखने लगा है। भले ही भाजपा हैट्रिक का दखा कर रही हो लेकिन इंदिरा बैंक घोटाले के नार्को टेस्ट की सीडी से लेकर दरभा घाटी में हुए कांग्रेसी नेताओं की हत्या को होने वाले दुस्प्रभाव को रोक पाना आसान नहीं है। उपर से भाजपा विधायकों की छवि और कुनबे करतूतों को लेकर पार्टी में जबरदस्त उहापोह की स्थिति बनी हुई है।
कहा जाता है कि भाजपा द्वारा कराये सर्वे में दो दर्जन से अधिक विधायकों की रिपोर्ट कार्ड बेहद खराब हे ऐसे में भाजपा के लिए हैट्रिक की राह आसान नहीं है। डॉ. रमन सिंह खुद कोयले की कालिख, इंदिरा बैक घोटाले से लेकर प्रशासनिक अक्षमत के आरोपों से उबर नहीं पाये हें तो उनके मंत्रीमंडल के कइई सदस्य भी गंभीर आरोपों से घिरे हुए है। यहां तक कि विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक तक आरोपों से बच नहीं पाये है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत अजा-जजा वर्ग के वोटों के अलावा पिछड़े वर्ग के वोटों को साधने की है। सतनामी समाज जहां आंख तरेर कर खड़ा है तो आदिवासी समाज भी कम आक्रोशित नहीं है। ऐसे में भाजपा की छोटी सी भूल बड़ी लापरवाही साबित हो सकती है।
दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौति गुटबाजी है। नये प्रदेशाध्यक्ष चरणदास महंत के नेतृत्वक्षमता को लेकर सपाल उठाये जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि वे अब भी रंगा-बिल्ला से नहीं उबर जाये है। कांग्रेस का एक बड़ा  जहां महंत से नाराज है तो वही पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने महंत के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ रखा है।
राजनैतिक विश£ेषकों का मानना है कि अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के जनाधार वाले सबसे बड़े नेता है ऐसे में उनको नजर अंदाज करना न केवल कांग्रेस बल्कि भाजपा को भी भारी पड़ सकता है।
इन दिनों स्व. मिनी माता के आदर्शो को लेकर जोगी एक्सप्रेस चला रहे इस कांग्रेसी नेता की सभा में जुटने वाली भीड़ से भले ही भाजपाई खुश दिख रहे हो पर सच तो यह है कि कहीं चुनाव में भी यह एक्सप्रेस चल निकला तो भाजपा को ही सर्वाधिक नुकसान होने वाला है।
सूत्रों की माने तो जोगी की ताकत को देखकर भाजपा के दर्जनभर से अधिक विधायक उनके संपर्क में है जबकि टिकिट करने की सूरत में कई भाजपा विधायक जोगी एक्सप्रेस में बैठ सकते हैं। बताया जाता है कि भाजपाई भले ही उपर से खुश दिखाई दे रहे हैं लेकिन जोगी एक्सप्रेस के संभावित रफ्तार से पार्टी के कई लोगों के माथे पर बल पडऩे लगे है।
बहर हाल जोगी एक्सप्रेस की बढ़ती रफ्तार ने छत्तीसगढ़ की राजनीति को चुनाव के 4 माह पहले ही गरमा दिया है और देखना है कि इस एक्सप्रेस में कौन-कौन सवार होता है।

सोमवार, 26 अगस्त 2013

नार्को सीडी की असलियत पर सरकार चुप क्यों?


* भूपेश की चुनौती से भाजपा में घबराहट!
* कांग्रेसी घोटालों को पैसा खाकर दबाया!
* संचेती बंधु और अदानी गु्रप पर मेहरबानी!
* जल जंगल जमीन सभी की चौतरफा लूट!
* सब कुछ मुफ्त बांटने से मध्यम वर्ग नाराज!
रायपुर। इंदिरा बैंक घोटाले के मामले में नार्को सीडी के खुलासे से जहां भाजपा की मुसिबत थमने का नाम नहीं ले रहा है वहीं मुख्यमंत्री और चारों मंत्रियों से हाईकमान की नाराजगी ने नया मोड़ ले लिया है। नार्को सीडी को फर्जी बताने वाली सरकार ने अब तक न तो असली सीडी ही जारी की है ओर न ही भूपेश बघेल की चुनौती को दी स्वीकार किया है इसे लेकर भाजपा को जवाब देना मुश्कि हो रहा है।
अपनी कथित साफ छवि और विकास को मुद्दा बनाने का दंभ भरने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कोल ब्लॉक आबंटन में संचती बंधुओं पर की गई मेहरबानी से ही किरकिरी शुरू हो गई थी। इस मेहरबानी के चलते न केवल छत्तीसगढ़ को हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ बल्कि भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नीतिन गडकरी भी कटघरे में खड़े हुए। इसके बाद कैग ने अदानी ग्रुप पर मेहरबानी का खुलासा कर रमन सरकार के कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया। अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि नक्सलियों के दरभा कांड में हुए कांग्रेसी दिग्ंगजों की हत्या
ने सरकार की नियत पर सवाल खड़ा कर दिया। इस मामले में कांग्रेस नेता भूपेश बघेल के द्वारा रमन सिंह के द्वारा ब्रम्हास्त्र चलाने की बात कहकर सनसनी फैला दी थी।
ताजा मामला इंदिरा बैक घोटाले में उमेश सिंह की नार्को सीडी का है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित उनके मंत्रियों पर घोटाले दबाने करोड़ों रूपये खाने का जो आरोप कांग्रेस ने लगाया हे उससे भाजपा में बेचैनी बड़ गई है। हालांकि उपरी तौर पर भाजपा इस सीडी से नुकसान नहीं होने का दावा कर रही है पर सच तो यह है कि कल तक कांग्रेस को गरियाने वाली भाजपा के पास नार्को सीडी मामले में कोई जवाब नहीं हे। अब तो आम आदमी भी कहने लगा है कि यदि सीडी नकली है तो सरकार असली सीडी सामने क्यों नहीं ला रही है।
इधर भाजपा ने भ्रष्टाचार, दरभा कांड और नार्को सीडी से हो रहे नुकसान से निपटने कई विधायकों की टिकिट काटने और गरीबों व युवाओं को सब कुछ मुक्त बांटने का निर्णय ले लिया है।
सूत्रों का कहना है कि हाल के वर्षो में विकास के नाम पर संसाधनों की चौतरफा लूट जिस पैमाने पर हुआ है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। स्तर हीन सड़क से लेकर भवन निर्माण और भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण को लेकर आम लोगों में सरकार की छवि पर प्रभाव पड़ा है।
इधर सरकार की मुफ्त बांटने की वोट बैक की राजनीति से मध्यम वर्ग में बेहद नाराजगी है। सूत्र बताते है कि सरकार की इस मुक्त बांटो योजना से नाराज मध्यम वर्ग ने यदि अपनी नाराजगी वोट के रूप में तब्दिल कर दी तो भाजपा को लेने के देने पड़ जायेंगे।
दूसरी तरफ चर्चा इस बात की भी है कि चुनावी साल में रमन सरकार के करतूतों के इस खुलासे से हाईकमान भी नाराज हे और भले ही बाहर से सब ठीक दिख रहा हो लेकिन भीतर से कुछ भी ठीक नहीं है।
बहरहाल नार्को सीडी का असर क्या होगा यह बाद में ही पता चलेगा।

सोमवार, 3 जून 2013

आतंक...आतंक... और आतंक...!

 छत्तीसगढ़ में इन दिनों चौतरफा आतंक मचा हुआ है। प्रशासनिक राजनैतिक आतंक के गठजोड़ के चलते जहां माफिया गिरी बढ़ी है वहीं औद्योगिक और नक्सली आतंक के चलते आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। भले ही रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने चावल, लैपटाप, साइकिल बांटकर अपनी राजनीति को मजबूत किया है लेकिन सच तो यह है कि माफिया गिरी के चलते जिस ढंग से छत्तीसगढ़ की खनिज संपदाओं, और जमीनों पर डकैती डाली गई है। उससे नहीं लगता कि सरकार नाम की भी चीज यहां है। अपराधों के आंकड़े बताते हैं कि रमन राज में अपराध कई गुणा बढ़े हैं और पुलिस की गुण्डागर्दी चरम पर है। राजधानी पर करोड़ों रूपया तो फूंका गया लेकिन स्कूल और अस्पतालों की अनदेखी की गई। विकास के नाम पर करोड़ों रूपये फूंकने के दावे तो किये गए लेकिन गांवों तक विकास पहुंचा ही नहीं। कैग की रिपोर्ट बताती है कि रमन सरकार ने आर्थिक अनियमिताओं के सारे रिकार्ड तोड़ डाले और संचेती से लेकर अदानी गु्रप को फायदा पहुंचाने छत्तीसगढ़ को करोड़ों अरखों का नुकसान पहुंचाने से पीछे नहीं हटी। बस्तर में सरकार नहीं होने और लाल आतंक का साया है तो भाजपाई आतंक का अदाहरण भी कम नहीं है। जिस प्रदेश का मुखिया देखलुंगा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता हो सवाल करने वाले या पार्टी में विरोध करने वालों पर पुलिसिया रौब दिखलाता हो वहां सरकार क्या और कैसी होगी सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
बस्तर में कांग्रेस नेताओं पर हुए नक्सली हमले ने सरकार को घेरे में आज लिया हो। लेकिन सच तो यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार नहीं होने की बात लोग पहले से ही कर रहे है।

शनिवार, 23 मार्च 2013

विकास और सुराज पर कर्मों की रपट भारी


सात मंत्रियों सहित तीन दर्जन विधायक निशाने पर
    अपनों का विकास, परिजनों व समर्थकों को नियम विरूद्ध उपकृत!
    अधिकारियों का सुराज- पर्सनल स्टाफॅ  से लेकर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण
    कई लोगों के आचरण खराब कोयले की कालिख, रोगदा बंाध का बिकना, सरकारी जमीनों पर अवैध         कब्जे और बंदर बांट
    भ्रष्ट और निकम्मों की संविदा नियुक्ति
    परिजनों, समर्थकों व पर्सनल स्टाफ की बढ़ती बदसलूकी
    आरक्षण कटोति- अनुसूचित जाति, आदिवासी व पिछड़े भी नाराज केन्द्रीय नेतृत्व सातों मंत्रियों को हटाने     का निर्देश भी दिया पर जनाधार के नाम पर प्रदेश नेतृत्व से जीवन दान ।
हैट्रिक की तैयारी में जुटी रमन सरकार भले ही अपने शासन काल में विकास और सुराज लाने का कितना भी आंकड़ा पेश कर ले सच तो यह है कि कर्मों की रिपोर्ट देखकर उनकी जमीन खिसक गई है। गुप्तचर एजेसियों से तैयार रिपोर्ट कार्ड का निष्कर्ष साफ है कि प्रदेश के सात मंत्रियों सहित करीब तीन दर्जन विधायकों को दो बारा टिकिट दी गई तो पार्टी का बेड़ा गर्क हो सकता है। रिपोर्ट कार्ड के बाद केन्द्रीय नेतृत्व जहां बेहद नाराज है वहीं प्रदेश के आला नेता भी सकते में हैं।
 सूत्रों की माने तो केन्द्रीय नेतृत्व ने इन सातों मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाने का सुझाव तक दे दिया है लेकिन प्रदेश नेतृत्व इस पर सहमत इसलिए नहीं हुए क्योंकि कोयले की कालिख कहीं बगावत का बिगुल न बजा दे इसलिए इन्हें जनाधार वाले नेता बताते हुए ब्रम्हास्त्र का हवाला दिया गया है।
हमारे बेहद भरोसे बंद सूत्रों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 8 माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व भी बेचैन है। और इसकी वजह यहां से पहुंचने वाले सांसदों की संख्या है। यही वजह है कि गुप्तचर एजेंसियों के माध्यम से रिपार्ट कराई गई है। रिपोर्ट में मंत्रियों के परफार्मेश पर फोकस करने का निर्देश था।
सूत्रों की माने तो रिपोर्ट कार्ड देखकर केन्द्रीय नेतृत्व भी हैरान है और यही वजह है कि सात मंत्रियों को हटाने की सलाह दी गइ्र । रिपोर्ट कार्ड में सात मंत्रियों की कार गुजारियों का विस्तार से लेखा जोखा दिया गया है। इन मंत्रियों के परिजनों व पसर्नल स्टाफ के बारे में गंभीर टिप्पणी की गई है जबकि एक मंत्री के महिला मित्र की वसूली का भी जिक्र है।
एक मंत्री के तो पर्सनल स्टाफ और परिजनों पर आरोप लगाये गये है कि इनका विभागों में भारी दबदबा हे ढेका और तबादलों में मनमानी चरम पर है। मंत्रियों के परिजनों का सरकारी जमीनों पर कब्जा और मनमाने ढंग से आबंटन पर भी तीखी टिप्पणी की गई है।
बस्तर के एक मंत्री के आचरण को लेकर जहां गंभीर सवाल उठाये गये है वहीं रायपुर के एक मंत्री व लालबत्ती वाले विधायक के व्यवहार और पर्सनल स्टाफ के दुव्र्यवहार पर भी टिप्पणी की गई है।
सूत्रों की माने तो कई अफसरों के करतूतों पर सरकार की खामोशी और संरक्षण पर भी गंभीर सवाल खड़े किये है।
बताया जाता है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने ऐसे अफसरों को दूर रखने की हिदायत दी है जबकि खराब रिपोर्ट वाले विधायकों की टिकिट हर हाल में काटने की सलाह दी है।
सूत्रों के मुताबिक संगठन को ऐसे विधायकों व मंत्रियों के स्थान पर नये विकल्प तैयार रखने कहा है। खासकर बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभाग में बड़े पैमाने पर बड़े पैमाने पर परिवर्तन के संकेत मिलने भी लगे है। इधर रायपुर-बिलासपुर के मंत्रियों को जनाधार वाला मान कर समझाईश देने की चर्चा है जबकि सूत्रों का दावा है कि केन्द्रीय नेतृत्व इनके बगावती रूख का भी पता लगाने में लगी है ताकि टिकिट करने की स्थिति पर विषय परिस्थिति पैदा न सके।
सूत्र बताते है कि विधानसभा के ठीक पहले राजनैतिक अस्थिरता से बचने मंत्रियों को हटाया नहीं जा रहा है लेकिनह केन्द्रीय नेतृत्व के द्वारा इन मंत्रियों को फटकार लगाते हुए चेतावनी जरूर दे दी गइ्र है कि यदि आचरण नहीं सुधारा गया तो टिकिट भी काटी जा सकती है। खासकर भ्रष्टाचार के मामले में मंत्रियों को सतर्क रहने की नसीहत दी गई है।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

गुस्से की आग पर आश्वासन की बौछार...


आरक्षण कटौति पर आक्रोशित पिछड़े वर्ग ने कांकेर से राजधानी तक का सफर जब पैदल पूरा कर लिया तब सरकार केवल आश्वासन ही दे पाई। आरक्षण को लेकर सतनामी समाज भी नाराज है और सतनामी समाज की नाराजगी के चलते कुतुब मीनार से ऊंचा बने जैतखम्भ का पिछले दो साल से उद्घाटन नहीं हो पा रहा है।
इन दोनों वर्गो की नाराजगी जायज है या नहीं यह सवाल कतई नहीं है। सवाल है कि आखिर लोगों में इतना गुस्सा क्यों है कि वे अपने द्वारा चुने सरकार के आश्वासन पर भी भरोसा नहीं कर रहे हैं। सवाल यह भी नहीं है कि क्या रमन सरकार ने अपनी विश्वसनियता खो दी है। सवाल आश्वासन पर टूटते भरोसे का है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले भी छला जाता रहा है और आज भी छला जा रहा है। सरकार में बैठे लोगों की संम्पति कई गुना बढ़ रही है तो दूसरी तरफ गरीबों की संख्या बढ़ रही है। 9 साल में रमन सिंह की सरकार भले ही विकास का कितना भी ढिढ़ोरा पिट ले लेकिन सच तो यह है कि वह अपने संकल्प तक को पूरा नहीं कर पाई है। हिन्दूत्व की दुहाई देने वाली भाजपा को संकल्प का मतलब समझाना पड़े तो लोगों को गुस्सा आना स्वाभाविक है।
आरक्षण की जटिलता को नजर अंदाज कर भी दे तो सरकार ने 9 सालों में क्या किया? उसने लोगों से किये वादे-संकल्प को पूरा क्यों नहीं किया। शिक्षा कर्मियों के संविलियन से लेकर दाल भात सेंटर चलाने के मामले में रमन सरकार फेल हो चुकी है।
राज्योत्सव और राजिम कुंभ पर अरबों रूपये खर्च करने का मतलब भी जनता जान चुकी है ग्राम सुराज हो या जनदर्शन सब नौटंकी साबित होने लगा है । विकास के नाम पर कोयले की कालिख और उद्योगों के लिए खेती की जमीनों की बरबादी के लिए छत्तीसगढ़ पूरे देश में कलंकित हुआ है तब भला लोग आश्वासन पर क्यों भरोसा करें।
हमारा भी मानना है कि चुनावी साल होने मांग रखने वालों का दबाव है लेकिन इन नौ सालों में सरकार के कामों की समीक्षा होनी चाहिए कि उसने जनता से वे वादे क्यों किये जो पूरे ही नहीं किये जा सकते थे।
राज्योत्सव, राजिम कुंभ, बायो डीजल से लेकर नई राजधानी के नाम पर फिजूल खर्ची सरकार की पहचान बन चुकी है। एक तरफ सरकार शिक्षा-स्वास्थ्य, सिचाई सुविधा को बढ़ाने जैसे खुद के कार्य से मुंह मोड़ रही है तो दूसरी तरफ निजी शिक्षण संस्थानों की लूट पर चुप्पी साध ली है। शाराब बंदी की बात तो वह करती है लेकिन जन विरोध को डंडे के जोर पर दबाने का प्रयास ही नहीं करती बल्कि शराब ठेकेदारों को गोद में बिठाती है।
मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी के इतने उदाहरण है कि उसे गिना पाना संभव नहीं है। हर आवेदन हर शिकायत पर आश्वासन से लोग हैरान है। स्कूल नहीं है खोल दो पर शिक्षक की व्यवस्था नहीं होगी तो ऐसे स्कूल खोलने का क्या मतलब है?
सरकार की बदलती प्राथमिकता की वजह से ही आज लोग गुस्से में है  और चुनावी साल में यह गुस्सा फुटने लगा है।  कहने को तो सरकारों का काम आम लोगों के हितों की ध्यान रखना है और आम लोगों के हित में रोड़ा बनते कानून को बदल देना है लेकिन यहां तो अफसरशाही हावी है, वही योजना बनाई जा रही है जिसमें स्व हित सधे। ऐसे में आखिर कब तक आश्वासन पर लोग भरोसा करें।