शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कर्णधारों के मायने और महापर्व की आगाज...


लोकतंत्र कर सबसे बड़े महापर्व का आगाज हो गया। 16 मई तक राजनैतिक दलों की सांसे सांसत में रहेगी। 81.4 करोड़ मतदाता अपने 543 कर्णधारों को चुनेंगे।  जो जीतने के पहले अपने पक्ष में मतदान कराने घर घर घुमेंगे।
चुनाव आयोग के घोषणा के साथ ही शुरु हो रही इस खंदक की लड़ाई पर जीत का सेहरा बांधने की होड़ मची है। और हर बार की तरह इस बार भी जनता ने मोटे तौर पर तय कर लिया है कि सरकार किसकी बननी है। कांग्रेस जहां राहुल गांधी के नेतृत्व में हम जोड़ते हैं वे तोड़ते हैं के नाटों के साथ मैदान में है तो भाजपा पीएमएन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में देश की आखंडता और महंगाई का मुद्दा बनाने में लगे हैं। पर सच तो यह है कि वर्तमान परिस्थिति में दोनों ही दलों के लिए स्वयं के बूते न तो सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा 272 को छुने की क्षमता है और न ही इन्हें छू पाने का विश्वास है।
कल तक कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी से गठबंधन करने वाली भाजपा आज भी गठबंधन के रास्ते ही सत्ता तक पहुंचने इस कदर आतुर है कि उसके लिए रामविलास पासवान हो या कोई अन्य दल अछुत नहीं है। उसे पार्टी गुर्राने वाले येदियप्पा से लेकर कल्याण सिंह और शिवसेना से लेकर आरपीआई सभी का समर्थन चाहिए।
पिछले दो दशक से जारी गठबंधन की राजनीति से देश को होने वाले नुकसान की चिंता न तो कांग्रेस को हैं और न ही भाजपा को ही रह गई है। वाजपेयी सरकार के समय में बात हो या यूपीए की हर बार अपनी अक्षमता पर गठबंधन की राजनीति की मजबूरी बताने वाले दल इस बार भी इसी राह पर है तब भला जनता क्या करें।
तीसरे मोर्च ने भी एक गठबंधन तैयार किया है लेकिन इनमें भी वहीं दल है जो देर सबरे कांग्रेस या भाजपा का हिस्सा रह चुके हैं और चुनाव परिणाम के बाद जिधर बम उधर हम के फार्मूले पर भरोसा करते हैं।
इस बार चुनाव रोमांचक और कटु होने की इसलिए भी अधिक संभावना है क्योंकि गठबंधन की राजनीति से परे आन्दोलन की राह चलते दिल्ली की सत्ता हासिल करने वाले आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से राजनीति शुरु की है उससे परम्परागत ढंग से जनता को बेवकुफ बनाने वाले राजनैतिक दलों की नींद उड़ गई है। हालांकि आम आदमी पार्टी का असर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है लेकिन जिस तरह से आप के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के बीच दलाली का मुद्दा उठाकर भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त जनता के बीच एक नई राजनीति की शुरूआत की है उससे भाजपा की राह कठिन होने लगी है।
कार्पोरेट घरानों के साथ कांग्रेसी और भाजपाई ताल्लुकात को मुद्दा बनाते हुए रातों रात देश में लोकप्रिय होने वाले अरविन्द केजरीवाल की पार्टी भी अपने बूते सरकार नहीं बना सकती लेकिन उसकी जीत तो तभी तय मानी जा रही थी जब उनकी पार्टी की वजह से कई राजनैतिक पार्टियों के मंत्रियों के काफिले की गाडिय़ा कस हो गई। सुरक्षा बल कम हो गये और निराश हो चुके लोगों की आंखो में उम्मीद दिखने लगी।
अब तक सिर्फ सत्ता के लिए जोड़-तोड़ और जीतने वाले प्रत्याशी को ही टिकिट का मापदंड बताने वाले दलों के लिए आप की चुनौती कितनी होगी यह तो पता नहीं लेकिन यह महापर्व अब राहुल बनाम मोदी था यूपीए बनाम एनडीए या कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गया है अब इसमें आम आमदी की भागीदारी भी जुड़ गई है जो कर्णधारों के मायने क्या हो यह लकीर खीचीं जा चुकी है।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

कौन जिम्मेदार?


सत्ता = अनैतिक गठबंधन+ धन बल + बाहुबल + झूठे वादे+ जाति-धर्म का दुरूपयोग + बेहिसाब चुनावी खर्च + गलत आरोप-प्रत्यारोप + शराब खोरी + मुफ्त खोरी+ वोट खरीद
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव का बिगुल बज गया है। सत्ता हासिल करने की लड़ाई का आगाज जिस तरह से पिछले दो-तीन दशकों से चल रहा है वह न केवल शर्मनाक स्थिति में पहुंच गया है बल्कि कौन किसके साथ है कहना मुश्किल है। हर हाल में सत्ता के लिए सिद्यांतो से समझौते के खेल से न गांधीवादी बचे है न हितुत्व वादी ऐसे में चुनाव आयोग के साथ-साथ आम जनता की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। कार्पोरेट जगत की बढ़ती ताकत के बीच कमर तोड़ती महंगाई और बढ़ते भ्रष्टाचार से आज देश त्रस्त है तब इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए।
लोकतंत्र का चुनाव 9 चरणों हो रहा है। देश की जनता इन 9 चरणों में अपना प्रतिनिधि चुनेगी। सिद्दांतत: ये प्रतिनिधि ही हमारे हीतों को देखेंगे पर क्याा यह सचमुच हो रहा है। राजनैतिक दलों का सिद्यांत हर हाल में सत्ता तकर पहुंचना रह गया है। प्रत्याशी स्वयं चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते कहीं जाति-धर्म का सहारा ले रहे हैं तो झूठा शपथ पत्र दे रहे हैं धन की बारिश, शराब की नदिया और मुर्गाभात की दावतें उड़ाई जा रही है। राजनैतिक दल जीतने वाले प्रत्याशी के नाम पर बाहुबली और भ्रष्ट लोगों को टिकिट दे रही है जिसका परिणाम सबके सामने हैं। संसद का नजारा शर्मनाक हो चुका है हमारे प्रतिनिधि दुर्योधन और दुशासन की तरह लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे हैं और अच्छे लोग भीष्म की भूमिका में तमाशा देख रहे हैं। सत्ता की चाह में डुबे ये कथित लोग पार्टी फोरम में भी इसका विरोध नहीं कर रहे हैं और आम आदमी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है।
क्या यह सही वक्त नहीं है कि सारे अच्छे लोग जाति धर्म से परे उठ कर अच्छे लोगों को ही चुनाव जीताये चाहे वह किसी भी दल का हो? तभी हम लोकतंत्र को बचा पायेंगे। चुनाव सुधार की प्रक्रिया में तेजी के अलावा आम नागरिक अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभाये?
आज जब सभी दलों का ध्येय सिर्फ सत्ता पाना हो। सत्ता के लिए सिद्यांतो को भूल क्षेत्रिय दलो से हाथ मिला रहे हो न कांग्रेस ही  कांग्रेस रह गई है और न भाजपा ही भाजपा है तब भला इनके सिद्धांतो पर वोट डालने का औचित्य क्या रह गया है।
आज कांग्रेस के साथ कल भाजपा के साथ रह कर जिधर बम उधर हम के सिद्धांत पर चलने वालों की कमी नहीं है और न ही सत्ता के लिए राष्ट्रीय दलों को भी किसी से भी हाथ मिलाने से गुरेज ही रह गया है। ऐसे में आम जनता के सामने स्वत: ही विकल्प खुल गया है कि वह सिंद्धातों की राजनीति की दुहाई देने वाले दलों की बजाय अच्छे प्रतिनिधि का चयन करें।
जनता की जिम्मेदारी तब और भी बढ़ जाती है जब उनके राजनैतिक दल ऐसे लोगों को टिकिट देने से गुरेज नहीं करते जो लोकतंत्र के दुश्मन है और जिनका अपराध से नाता है।
संसद के हर सत्र में तमाशा बन रहे जनप्रतिनिधियों की अपने स्वार्थ के लिए एका भी आश्चर्यजनक है पार्टी नेतृत्व की अक्षमता की वजह से गलत लोग प्रभावशील होने लगे है। नेतृत्वकर्ता कितना भी काबिल हो यदि उसमें कड़ी कार्रवाई करने की क्षमता न हो तो अनैतिक काम करने वालों का ही हौसला बढ़ता है। पिछले दो तीन दशकों में यह बात खुलकर सामने आ चुका है कि ईमानदारी का मतलब चुप्पी नहीं है। लोग तो आज भी कहते हैं कि मनमोहन सिंह अच्छे व्यक्ति है पर मंत्रीमंडल की करतूत पर खामोशी का इस अच्छाई से क्या मतलब है।
लोकतंत्र में सभी की जिम्मेदारी तय है लेकिन हमने देख लिया है कि किसी भी तबके ने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से नहीं निभाई है अब जनता की बारी है कि वह सिद्धांत विहिन राजनैतिक दलों के वोट कमाऊ राजनीति का हिस्सा बनने की बजाय झूठे घोषणापत्र जारी कर सिद्धांत बघारने वाले दलों की बजाय अच्छे जनप्रतिनिधि को चुने भले ही उसकी सरकार न बने पर लोकतंत्र को बचाने का हथियार जरूर बनेगा।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

सत्ता ही ध्येय...


देश भर की तमाम राजनैतिक पार्टियां इन दिनों व्यस्त है। एक तरफ वे जनता पर विश्वास की कवायद में लगी है तो दूसरी ओर घोड़ा मंडी की तर्ज पर मोर्चा बंदी कर रही हैं। केन्द्र में बैठी यूपीए के खिलाफ भाजपा ने जिस अंदाज में हमला किया है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पीएम इन वेटिंग के रूप में प्रोजेक्ट किया है इसका फायदा निश्चित रूप से भाजपा को मिला है लेकिन कांग्रेस के मुकाबले भाजपा में आज भी वह दम नहीं हैं कि वह अकेले अपने बूते सरकार बना लें। यही वजह है कि वह गठबंधन की राजनीति करते हुए सत्ता हासिल करना चाहती है। इस खेल में वह इस कदर लग गई है कि उसे दूसरी पार्टियों के करतूतों पर भी ध्यान नहीं है सिर्फ सत्ता हासिल करने किसी भी दल से तालमेल और किसी को भी टिकिट देने की परम्परा से राजनैतिक दल भले ही अपने मकसद में कामयाब हो जाए पर जनता का इसमें हित नहीं होने वाला है।
पिछले दो दशकों की राजनीति ने साफ कर दिया है कि जीत सकने वालों को टिकिट और सत्ता के जादुई आंकड़े तक पहुंचाने वाले दलों से तालमेल के मायने क्या है। कैसे छोटे-छोटे दलों ने अपने को तुर्रम खां माने जाने वाली पार्टियों को घुटने तक झुका दिया है।
इस बार भाजपा और कांग्रेस ने इसी गठबंधन की राजनीति के सहारे सत्ता हासिल करने भ्रष्ट-बेईमानों को गले लगाना शुरु कर दिया है। येदिरप्पा की वापसी या लालू से घालमेल पासवान से दोस्ती से लेकर मुसलमानों से माफी की राजनीति का मकसद हर हाल में सत्ता हासिल करना नहीं तो और क्या हैं।
कांग्रेस और भाजपा में अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया है ऐसे में तीसरे मोर्चे की कवायद केवल चुनाव तक सिमट कर रह गई है। अब तक नए ढंग से राजनीति में आए अरविन्द केजरीवाल ने किसी तरह के गठबंधन से अपने को दूर रखा है। इस नये नवेले पार्टी ने दिल्ली विधानसभा में अप्रत्याशित परिणाम लाकर एक नई राजनीति की शुरुआत जरूर की है लेकिन मुद्दों को पूरा करने की जल्दबाजी से अपरिपक्वता के चलते अराजकता की हालात लाने का पैतरा कहां और कैसे सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचेगा कहना कठिन है। दिल्ली की तर्ज पर देश भर में चुनाव लडऩे की घोषणा में कई दलों की नींद जरूर उड़ गई है।
यही वजह है कि राजनीति की नई शुरुआत होने लगी थी परन्तु लोकसभा चुनाव आते आते सभी पार्टियां घुड़ दौड़ में शामिल दिखाई पड़ती है ऐसे में केजरीवाल का अकेले चुनाव लडऩे का फैसला और गठबंधन की राजनीति को दलाली साबित करने की कोशिश कैसे सफल होगी अभी से कहना कठिन है।
तमाम सिंद्धातों और मुद्दों से भटक चुकी राजनैतिक पार्टियों के लिए आम आदमी पार्टी की जीत एक सबक होने लगा था लेकिन सत्ता की दौड़ से निकलते धुल ने आंखों के सामने जो धुंध उत्पन्न किया है वह अनैतिक और नैतिक गठबंधन के बीच की लकीर को मिटा दिया है कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
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गुरुवार, 6 मार्च 2014

विश्वविद्यालय फकत नाम के खुल रहे...


कई भवन विहिन तो उधार की फैकल्टी, स्टॉफ की भी कमी

रायपुर। छत्तीसगढ़ में हर साल खुल रहे विश्वविद्यालय में बुनियादी सुविधाओं और फैकल्टी का अभाव है। सच तो यह है कि राज्य बनने के बाद सरकार ने विश्वविद्यालय खोलने की घोषनाएं तो की लेकिन इसके बाद वह इन्हें भूल गई। बगैर संसाधन व सुविधाओं के विश्वविद्यालय कैसे संचालित हो रहीहै यह आसानी से समझा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के पहले चार विश्वविद्यालय थे जो अब बढ़कर 14 हो गये हैं। राज्य गठन के पहले से स्थापित विश्वविद्यालयों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। स्टॉफ की कमी और उधार की फैकल्टी से चल रहे विश्वविद्यालय में संसाधन व सुविधाएं बढ़ाने की बजाय जिस पैमाने पर विश्वविद्यालय बनाए गए उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सूत्रों की माने तो विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर छत्तीसगढ़ चर्चा में है यहां विश्वविद्यालयों की खस्ता हाल से बदनामी अलग हो रही है। प्रदेश में हर साल विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा का सच यह है कि कई विश्वविद्यालयों के पास अपने खुद का भवन तक नहीं है। तो कई विश्वविद्यालय स्टॉफ की कमी से बेहाल है। अधिकतर विश्वविद्यालय के पास गिनी चुनी फैकल्टी वह भी उधार की है इनकी हालत सुधारने की बजाय सरकार का रवैया यह है कि वह नये-नये विश्वविद्यालय खोलते चले जा रही है। हालत यह है कि कई विश्वविद्यालय तो उधार या किराये के चंद कमरे वाले भवनों पर चल रहा है।
सूत्रों की माने तो कई विश्वविद्यालयों में स्टॉफ की इतनी कमी है कि 80 से 85 फीसदी पद रिक्त है न शिक्षकों का पता है और न ही लिपिकों का पता है कुछ स्टॉफ जो काम भी कर रहे है वे या तो संविदा के है या प्रतिनियुक्ति से आये हैं।
बताया जाता है कि प्राध्यापकों की कमी को लेकर राज्यपाल द्वारा लगातार नाराजगी जताई जा रही है लेकिन इस पर पहल ही नहंीं हो रही है। शिक्षा के स्तर को लेकर पहले ही बदनाम छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों की इस हाल की चर्चा बाहर के राज्यों तक जा पहुंची है और अब तो डिग्री को लेकर भी गंभीर सवाल उठाये जा रहे हैं।
ज्ञात हो कि सौ से उपर निजी विश्वविद्यालय को लेकर चर्चा में आये छत्तसीसगढ़ में सरकारी विश्वविद्यालयों की जिस पैमाने में घोषणा की गई है वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है।
सरकारी विश्वविद्यालयों का हाल
राज्य के गठन के पहले
विश्वविद्यालय    वर्तमान स्थिति    स्थापना वर्ष
पं. रविवि रायपुर    अधिकतर पद खाली    1 मई 1964
इंदिरा कला एवं संगीत विवि
गुरु घासीदास विवि बिलासपुर        60 फीसदी पद खाली    16 जून 1983
इंदिरा गांधी कृषि विवि रायपुर    50 फीसदी पद खाली    20 जून 1987
राज्य निर्माण के बाद
हिदायतुल्ला विधि विवि रायपुर    40 फीसदी पद खाली    जून 2003
पं. सुंदरलाल शर्मा मुफ्त विवि बिलासपुर    85 फीसदी पद खाली    29 मार्च 2005
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि रायपुर    50 फीसदी पद खाली    16 अप्रैल 2005
विवेकानंद तकनीकि विवि भिलाई    95 फीसदी पद खाली    16 अप्रैल 2005
बस्तर विवि जगदलपुर    85 फीसदी पद खाली    2 सित. 2008
सरगुजा विवि अंबिकापुर    85 फीसदी पद खाली    4 अक्टू. 2008
आयुष विवि रायपुर    95 फीसदी पद खाली    अक्टू. 2008
बिलासपुर विवि बिलासपुर    95 फीसदी पद खाली    12 फरवरी 2012
कामधेनु विवि दुर्ग        30 फीसदी पद खाली    11 अप्रैल 2012
खेल विश्व विद्यालय    -,,-    -,,-
खैरागढ़    पचास फीसदी पद खाली    14 अक्टू. 1956

सोमवार, 3 मार्च 2014

कोयला बना काल


जीवनदायनी हसदेव नदी राख से पट रही
कोरबा देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में
हर साल मर रहे सैकड़ों लोग, हर साल बर्बाद हो रही खेती
छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में बिजलीघरों ने आफत खड़ा कर दिया है। बिजलीघरों के प्रदूषण से स्थिति बेहद गंभीर होती जा रही है। इसके चलते असामयिक मौत के आंकड़े तो बढ़े ही है अस्थमा, श्वसन रोग और ह्दय रोग के मामलों में असाधारण ईजाफा हुआ है। कोयला भंडार की बदौलत खड़े किये जा रहे ताप बिजलीघरों से निकलने वाली राख से खेती तो बरबाद हो ही रही है यहां रहने वालों पर भी शामत आई है।
कोयला भंडारों के दोहन और इससे स्थापित बिजली घरों को लेकर ग्रीनपीस नामक सर्वे कंपनियों की रिपोर्ट न केवल चौंकाने वाली है बल्कि विकास के नाम पर किये जा रहे अंधानुकरण की कलई खोलने के लिए काफी है। छत्तीसगढ़ का पॉवर हब माने जाने वाले कोरबा ने बिजली उत्पादन के क्षेत्र में किस कीमत पर गौरव हासिल कर रहा है यह कम चौकाने वाला नहीं है। देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में कोरबा का नाम चौथे-पांचवे नम्बर पर आ चुका है। यहां सात पॉवर प्लांट से 6 हजार मेगावाट से अधिक विद्युत उत्पादन होता है और प्रतिदिन यहां से 45 हजार मिट्रीक टन से अधिक राख उत्सर्जित होती है। राख का भंडारण राखड़ बांध में किया जा रहा है जिसकी वजह से इसके आसपास की जमीन तो बंजर हो ही रही है इसके चिमनियों से निकलने वाले धुंए की वजह से वायु प्रदूषण भी चरम पर है। यही नहीं कोरबा की जीवनदायिनी मानी जाने वाली हसदेव बागो नदी भी राख से पटने लगी है। जबकि छत्तीसगढ़ सरकार ने कोयला उत्पादन के क्षेत्र में अभी तीन दर्जन से अधिक कंपनियों से अनुबंध कर रखे हैं जिनमें उत्पादन होना बाकी है। ग्रीन पीस सहित अन्य सर्वे कंपनियों की रिपोर्ट पर नजर डालें तो ताप बिजली घरों की वजह से आम लोगों सिर्फ गंभीर बीमारियों के शिकार बस नहीं हो रहे हैं बल्कि यह तबाही मौतो के बढ़ते आंकड़े तक जा पहुंचा है। सर्वे के मुताबिक छत्तीसगढ़ के बिजली घरों के कोयले से निकलने वाली राख में अति सूक्ष्म कणों की साईज 4 से 5 माइक्रोन है जिसकी वजह से यह अधिकाधिक क्षेत्र में तेजी से फैलती है। यही नहीं कोयले की राख से पीएस-10 जैसे खतरनाक तत्वों के अलावा सल्फर डाई आक्साईड नाइट्रोजन आक्साईड और पारे की मात्रा भी अधिक रूप से घुली होती है। यही वजह है कि इसके चलते गंभीर बीमारियों के मामले तो बढ़ ही रहे है मौत के आंकड़े भी बढ़े है। सर्वे के अनुमान के मुताबिक बिजलीघरों के कोयले की राख से हर साल दस हजार से अधिक लोग असामयिक मौत मर रहे है जबकि गंभीर बीमारियों के आंकड़े इससे कहीं बहुत अधिक है। हालांकि सरकारी महकमा का दावा है कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के समुचित उपाय किये गए हैं एक भी बिजलीघर बगैर अनापत्ति प्रमाणपत्र के नहीं चलाए जा रहे हैं और उत्सर्जन की सीमा तय है।
बहरहाल ताप बिजलीघरों के प्रदूषण से आम लोगों के लिए काल साबित होते पॉवर प्लाटों को नियंत्रित नहीं किया गया और प्रदूषण रोकने के समुचित इंतजाम नहीं किये गए तो आने वाले दिनों में यह समस्या गंभीर बन जायेगी।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

राजनेताओं के खेल प्रेम पर राहुल का प्रहार...


खेलों की दुर्दशा को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। खेल संघो पर राजनेताओं की बढ़ती दखलदांजी से लोग नाराज भी है लेकिन ठुकुरसुहाती के फेर में खिलाड़ी भी इसका खुलकर विरोध नहीं कर पाते।
वैसे तो राजनीति ने हर क्षेत्र को दुर्दशा तक पहुंचा दिया है। राजनेताओं के लोभ ने खेलों को भी नहीं छोड़ा। छत्तीसगढ़ में भी प्रत्येक खेल संघो पर नेताओं का कब्जा है। हम यहां यह नहीं कह रहे हैं कि सभी राजनीतिज्ञ एक ही रास्ते से चलने वाले है। यहां भी कई खेल संघ ऐसे है और कई नेता ऐसे है जो पूरी ईमानदारी से खेलों को बढ़ावा दे रहे हैं लेकिन बहुत से नेता अपनी राजनैतिक फायदे के लिए खेल संघों का दुरूपयोग कर रहे हैं। खेलों के गिरते स्तर को लेकर हमेशा से ही चिंता की जाती है और राजनीति के बढ़ते हस्ताक्षेप पर विवाद होता रहा है।
राज्य बनने के बाद ओलंपिक और क्रिकेट एसोसिएसन का विवाद किसी से छिपा नहीं है। जिसकी सत्ता उसका खेल संघो पर कब्जा नया नहीं है। कभी छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी खेल संघो पर कांग्रेसियों का कब्जा था और अब एक दो खेल संघों को छोड़ सभी पर भाजपाई बैठे हुए हैं।
खेलों को बढ़ावा देने के नाम पर अपनी राजनैतिक दुकान चलाने के अलावा आयोजनों में भ्रष्टाचार और खिलाडिय़ों के चयन में पक्षपात की खबरें लगातार आते रही है। अब तो मामला दैहिक शोषण तक जा पहुंच हैंं।
खेलों में राजनीति और राजनेताओं के हस्तक्षेप टोकने की मागं हर व्यक्ति की है लेकिन इसकी परवाह कभी किसी राजनैतिक दलों को नहीं रही। सावर्जनिक रूप से खेलों में राजनीति का विरोध करने वाले लोग भी मौका पाते ही खेल संघो में बैठने से गुरेज नहीं करते। ऐसे में राहुल गांधी का खेल से राजनेताओं को दूर रखने की सोच को एक  अच्छी खबर के रूप में देखा जा रहा है। यह पहली बार हुआ है जब खेल को लेकर किसी पार्टी के बड़े नेता ने ऐसी बात कही ंहै।
अपनी तरह की अलग सोच रखकर नई ईबादत की कोशिश में जुटे राहुल की यह सोच यदि उनकी पार्टी भी फरमान जारी कर पूरी करे तभी इसका मतलब है अन्यथा यह राजनैतिक ढकोसला ही माना जायेगा।
युवाओं को अधिकाधिक अधिकार देकर देश की दिशा बदलने की सोच को लेकर आगे बढ़ रहे राहुल गांधी के इस सोच पर कांग्रेस ही खरा उतर जाने तो खेल का भविष्य अलग होगा।
छत्तीसगढ़ में खेल संघो पर जिस तरह से राजनेताओं की माफियागिरी ने कब्जा कर रखा है वह किसी से छिपा नहीं है। नेताओं के अलावा जमीन, शराब और खनिज माफिया तक खेल संघो पर जमें हुए हैं। कई संघो पर तो आपराधिक रिकार्ड वाले भी बैठे हैं ऐसे में खिलाडिय़ों को भी ठुकुरसुहाती छोड़ अपने खेलों की प्रगति के लिए खुलकर आना होगा।
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गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

हाथियों के आंतक से मुक्ति के लिए अभ्यारण्य क्यों नहीं !



हाथियों की वजह से सौ से उपर जाने गई

तीन हजार से अधिक घर टूटे
हजारों एकड़ फसलों का नुकसान
सरगुजा-जशपुर और कोरबा क्षेत्र में उत्पात बिलासपुर और सरगुजा संभाग में आए दिन हथियों के आतंक के बावजूद हाथी अभ्यारण्य को मंजूरी नहीं देने का मामला तूल पकडऩे लगा है। इन संभागो के सरगुजा जशपुर और कोरबा क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में न केवल हाथियों का आतंक बढ़ा है बल्कि जान के अलावा घरों और फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचा है। हर साल प्रदेश सरकार को नुकसान के एवज में लाखों रूपये मुआवजा देना पड़ता है।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा-जशपुर और कोरबा क्षेत्र में हाथियों का आतंक नया नहीं है। यहां हर साल हाथियों के द्वारा घरों और फसलों को तो नुकसान पहुंचाया ही जाता है लोगों की जान भी जाती है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक वर्ष 2009-10 में हाथियों के आतंक के चलते 19 जाने गई थी और 804 घर तथा 8152 सड़क फसल को नुकसान पहुंचा था इनमें सरगुजा में 12, जशपुर में 6 और कोरबा में 1 व्यक्ति की मौत हुई थी। जबकि वर्ष 2010-11 में 16 मौते और 9183 एकड़ फसल और 736 घर बरबाद हुए वर्ष 2011-12 में यह आंकड़ा और बढ़ गया तथा 24 लोग कात कल्वित हुए वर्ष 2012-13 मेें 11 जाने गई और 11 हजार एकड़ से अधिक फसल को नुकसान पहुंचा।बताया जाता है कि हाथियों के आतंक से मुक्ति के लिए स्थानीय ग्रामीण और वन विभाग द्वारा हर साल इंतजाम किये जाते है लेकिन हाथियों के आतंक के आगे से इंतजाम धरे के धरे रह जाते हैं। यही वजह है कि प्रदेश सरकार ने हाथी अभ्यारण्य बनाने का प्रस्ताव तैयार किया है। बताया जाता है कि हाथी अभ्यारण्य का मामला राजनीति का शिकार हो गया है जिसकी वजह से यह प्रस्ताव खटाई में चला गया है। हालांकि हाथी अभ्यारण्य के लिए जगह भी प्रस्तावित कर दिया गया है लेकिन इस स्थान पर कोयले की खदाने होने की वजह से भी मामला उलझ गया है।
प्रस्तावित जगह में कोयला खदान चालू करने जिस तरह से खेल चल रहा है वह भी चर्चा की विषय है।
बहरहाल हाथियो से हो रहे नुकसान को नजर अंदाज करना कहीं भारी भूल साबित न हो जाए।