बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

हजारों तरह के आंसू...

 

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

मन की बात...


क्या हम सचमुच उस दौर में जी रहे हैं जहां नेता को कोई काम करना आता हो या न आता हो बोलना आना चाहिए और जो अपनी बातों से मोह ले वही राज करेगा? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि संसद में किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह की बातें हुई उसके बाद तो इस बात का कोई मतलब ही नहीं रह जाता कि किसान आखिर आंदोलन क्यों कर रहे हैं और न ही इस बात का मतलब ही रह गया है कि राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद से इतर भी इस देश के लोगों की अपनी जरूरतें हैं।

पूरी दुनिया का आप आकलन कर ले ऐसा आंदोलन कहीं नहीं मिलेगा जहां दो दर्जन से अधिक आंदोलनकारी किसानों ने खुदकुशी की हो और आंदोलन के दौरान करीब दो सौ किसानों की जान चली गई हो लेकिन जब सत्ता यह कहे कि इस आंदोलन का कोई मतलब नहीं है और प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि किसान सिर्फ आंदोलन करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं तो इसका क्या मतलब है?

क्या इस बात को नजरअंदाज कर देनी चाहिए कि सभी राज्यों में किसानों की उपज की खरीदी किस तरह से न्यूनतम दर पर हो रही है। या हम प्रधानमंत्री की बात को मान ले कि एमएसपी बंद नहींं होगी?

ऐसे में क्या इस बात का आकलन नहीं होना चाहिए कि क्या किसानों की उपज की कितनी फसल एमएसपी पर खरीदी जा रही है और कितने व्यापारी एमएसपी पर खरीदी कर रहे हैं लेकिन जब पूरे देश को राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद की लाठी से हांका जा सकता है तब इस बात से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता कि गैस बिजली पेट्रोल की कीमत कितनी बढ़ रही है और न ही इस बात का ही फर्क पड़ता है कि राशन की कीमत कितनी बढ़ रही है!

ऐसे में फिर सवाल यह उठता है कि क्या जो महंगाई या अपनी दूसरी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं उनके लिए नया रास्ता क्या है क्योंकि किसानों की बढ़ती मौत के आंकड़े भी जब सत्ता को न डिगा सके तो दूसरा उपाय क्या होना चाहिए?

सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि किसानों के आंदोलन को लेकर विपक्षी दलों की भूमिका भी स्पष्ट नहीं है और कार्पोरेट जगत से मिलने वाले चंदा की लालच में वे उन बातों का न ठीक से विरोध कर पा रहे हैं और न ही किसानों का ठीक से समर्थन करते हुए साथ खड़े हैं।

ऐसे में 26 जनवरी के बाद अब तक हुए पंचायतों की भीड़ को देखना होगा कि वे आंदोलन के माध्यम से राजनीति की दिशा को कैसे बदलेंगे!

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

जिम्मेदारी कहां है...

 

यह दौर अजीब है, खुद की जिम्मेदारी से भागती मोदी सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी से बचने दोषारोपण का सहारा लेने लगी है और इस खेल में ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिवर्सिटी की भूमिका किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार कर सकती है!

और जब सत्ता जिम्मेदारी से बचने लगे तो फिर इसका साफ मतलब है कि नियत ठीक नहीं है और जब नियत ही ठीक न हो तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है।

इन दिनों संसद से लेकर सड़क तक बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी किसानों का मुद्दा छाया हुआ है। ऐसे में सत्ता की जिम्मेदारी है कि वह किसानों से बातचीत करके कोई रास्ता निकाले या फिर तीनों कृषि कानून ही रद्द कर दे लेकिन सत्ता अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय आंदोलन तोडऩे में पूरी ताकत लगा रही है। पहले तो उन्हें आतंकवादी, नक्सली देशद्रोह कहा जाने लगा फिर दीवारें खड़ी की गई। सड़कों पर छड़ो की कीलें लगाई गी, रसद-पानी-बिजली इंटरनेट तक बंद किया गया। किसानों के खिलाफ इस तरह से विषवमन किया गया मानों वे आंदोलन करके दुश्मन हो गये है। और जब पूरी दुनिया का ध्यान इस मानवाधिकार हनन पर होने लगा तो इसे एक बार फिर भारत को बदनाम करने की साजिश बताई जा रही है जबकि हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में अभी भी ऐसे लोग हैं जो मानवाधिकार के उल्लंघन पर तीखी प्रतिक्रिया देकर किसी भी देश की सत्ता को बेचैन कर देते है।

इस मोदी सत्ता की दुविधा यही है कि वह मीठा गप्प गप्प तो करती है लेकिन कड़वा के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहराती है, संसद  न चले तो विपक्ष जिम्मेदार, जीएसटी में तकलीफ हो तो कांग्रेस ला रही थी, किसान आंदोलन हुआ तो यह बिल कांग्रेस ली रही थी। इसका क्या मतलब है। क्या तब भाजपा विरोध में नहीं खड़ी थी और जब वह विरोध में खड़ी थी तो आज यह सब क्यों कर रही है।

लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वह हर असहमति के स्वर को देशद्रोही का नाम देती है जबकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुछ और ही कहता है।

संसद में संजय सिंह ने पूछा भी कि यदि जीएसटी कांग्रेस, किसान कानून कांग्रेस लाने वाली थी इसलिए भाजपा ले आई तो फिर पार्टी का नाम ही कांग्रेस, बी कांग्रेस ही कर देना चाहिए। सवाल कई है जिसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर स्टॉक सीमा में छूट देने का अर्थ क्या है, क्या यह महंगाई, कालाबाजारी को बढ़ावा देना नहीं है लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछेगा? क्योंकि अति राष्ट्रवाद और धर्मान्धता किसी कोढ़ से कम नहीं है। यह बात हरिशंकर परसाई जी ने जब कही थी तब कितनों को इस पर यकीन रहा होगा ! लेकिन आज की परिस्थितियां यह चिख चिख कर कह रही है कि अति सर्वेत्र वर्जते ! अति का अंत होता ही है और किसान आंदोलन ने जिस शांतिपूर्ण ढंग से अपने को विस्तार दिया है वह किसी भी सत्ता के लिए बेचैन कर देने वाला है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

कानून नहीं नियत...

 

तुमने आंदोलन को कुचलने सड़कों पर किलें ठोंक दी लेकिन किसानों ने उन किलों के समनान्तर मिट्टी में फूल रोप दिये। तुमने चक्काजाम के खिलाफ पुलिस के जवान खड़ा कर दिये लेकिन किसानों ने रफ्तार रोक दी। तुमने संसद में जब कहा कि कानून में काला क्या है तब किसी ने चुपके से कह दिया कि नियत ही काला है!

बस यही चुपके से कही बात हवा में तैरने लगा। खुशबू की तरह फैलने लगा। और इसके साथ ही तुम्हारे हर फैसले के पीछे की नियत परत-दर-परत खुलने लगी। क्योंकि फैसला कितना भी अच्छा हो यदि उसे लागू करने की नियत खराब हो तो लोकतंत्र उसे स्वीकार कदापि नहीं करेगा।

तुम्हारे हर फैसले में तुम्हारी खराब नियत खुलने लगी। और अब तो किसानों ने जिस तरह से इस नियत का खुलासा शुरु कर दिया है उससे राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व कुंठा भी सामने आने लगा है। तभी तो संघ के भीतर से भी आवाज आने लगी है कि सत्ता का अहंकार सर चढ़कर बोलने लगा है हालांकि संघ के कार्यकर्ता रघुनंदन शर्मा से हम इत्तेफाक नहीं रखते क्योंकि जिसकी राजनैतिक पृष्ठभूमि में ही नफरत विभाजन झूठ और अफवाह ही सब कुछ है वहां इन बातों का कोई औचित्य नहीं रह जाता कि लोकतंत्र का क्या महत्व है। 

हमने पहले ही कहा है कि जो लोग आंदोलनरत किसानों के खिलाफ विषवक्य कर रहे हैं उन्हें शायद यह नहीं पता है कि किसानों को केवल 80 हजार करोड़ सब्सिडी दी जाती है जबकि उद्योगों व व्यापार को जो हर साल छूट दी जाती है वह 6 लाख करोड़ से भी अधिक है।

हर दिन मरते किसानों का दर्द देखने की बजाय यह दावा करना कि हमारे हाथ खून से नहीं रंगे है हैरान कर देता है। सत्ता की नियत क्या है यह किसी से छिपा नहीं है। उसे अपनी रईसी बरकरार रखनी है और इसके लिए चंदा किसान नहीं कार्पोरेट ही देता है। ऐसे में यदि किसान तीनों कानून के खिलाफ कमर कस चुका है तो यकीन मानिये सत्ता को इसे वापस लेना ही होगा।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

पूंजी और अपराध की सत्ता...!

 

क्या वर्तमान में केन्द्र की मोदी सरकार पूरी तरह पूंजी और अपराध पर निर्भर हो चली है? आज हम यह सवाल इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह से दिल्ली के बार्डर पर सरकारी इंतजाम किये गये हैं वैसा इंतजाम तो कोई भी देश अपने नागरिकों के लिए नहीं करता !

इससे पहले यह सच जान लेना जरूरी है कि संसद के दोनों सदनों में खासकर सत्ताधारी दल के कितने सांसद करोड़पति है और कितने सांसदों पर अपराध दर्ज हैं? इस सच को जानने के लिए एडीआर की रिपोर्ट ही काफी है। सत्ताधारी दल के 80 फीसदी से अधिक संसद करोड़पति हैं और इसी तरह से सत्ताधारी दल के जिन 303 सांसद है उनमें से पचास फीसदी से अधिक सांसदों पर अपराधिक प्रकरण दर्ज है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या सांसद बनने के लिए पूंजी और अपराध का गठजोड़ जरूरी हो चला है। सवाल यह भी उठना चाहिए कि जब पूंजी और अपराध का गठजोड़ स्पष्ट दिखाई देने लगा है तो क्या आंदोलन को कुचलने के लिए यही सोच काम कर रहा है।

किसान आंदोलन को लेकर ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिर्वसिटी से इतर भी नफरत का जो बीड़ा बोया जा रहा है। बात-बात पर असहमति के स्वर को देशद्रोही करार देने वालों की सोच ने ही किसान आंदोलन को उग्र रुप दिया है कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

ऐसे में किसानों ने दिल्ली की बजाय पंचायतों तक का सफर करना शुरु कर दिया है तो इसका मतलब क्या है? किसानों ने साफ कर दिया है कि अब वे दिल्ली के अलावा पंचायतों तक अपना आंदोलन को विस्तार देंगे और पूंजी-अपराध का पर्दाफाश करेंगे।

भारतीय राजनीति का यह नया रुप देखने को मिलेगा क्योंकि जो सत्ता अब तक पंूजी और अपराध के गठजोड़ के आसरे अपनी रईसी बरकरार रखना चाहते है उनके लिए गरीब किसान नई तरह की चुनौती पैदा करने में लगे है।

अब तो किसान आंदोलन पर दुनिया के दूसरे देशों की निगाह भी पडऩे लगी, भले ही इसे अपना मामला कहकर टालने की कोशिश हो रही है लेकिन अमेरिका की घटना हो या पाकिस्तान में टमाटर के बढ़ती कीमत पर प्रतिक्रिया देने वाला या मजा लेने वालों की नींद तो उड़ ही चुकी है। ऐसे में यदि मीडिया की नजर में भी किसानों के साथ हो रहे अत्याचार दिखने लगेगा तब क्या होगा?

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

किसानों का सच !

 

किसान आंदोलन से बेचैन मोदी सत्ता ने जिस तरह से किसानों को रोकने की कोशिश में अपनी पूरी ताकत लगा दी है, वह हैरान करने वाली तो है ही लोकतंत्र में विश्वास के नए संकट को जन्म दिया है। ऐसे में ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूर्निवसिटी की भूमिका से देश में नफरत, झूठ और अफवाह को बल मिला है और इसे नहीं रोका गया तो हालत बदतर हो जायेंगे।

दरअसल किसानों ने जिस तरह से तीनों कानून के खिलाफ आक्रामक रूख अख्तियार किया है वह किसी भी सत्ता के लिए सहज नहीं है और ऐसे में किसानों के खिलाफ हो रहे झूठे विषवमन से एक नए तरह का तनाव पैदा हो गया है।

किसानों को लेकर जिस तरह की सब्सिडी देने की बात कही जाती है उसे समझना होगा। इस देश को आत्मनिर्भर बनाने में किसानों ने जो योगदान दिया है वह अनुकरणीय है ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि किसानों को पूरी दुनिया की सरकारें सब्सिडी देती है और भारत की तुलना में अमेरिका-चीन सहित चार दर्जन से अधिक देश आठ गुणा से लेकर 15 गुणा अधिक सब्सिडी देती है।

इसी तरह इंकम टैक्स में छूट को लेकर जो भ्रांतियां फैलाई जा रही है उसका भी सच यह है कि इस छूट का केवल वह किसान फायदा लेता है जो बड़े किसान है और ज्यादातर बड़े किसान या तो राजनीति से जुड़ा है या व्यापार से। आम किसान यानी 95 फीसदी किसान तो आज भी इंकम टैक्स की फाईल ही नहीं भरता।

इसी तरह जीएसटी भी किसान देता है। हर खरीदी में जीएसटी इस देश के हर नागरिक को देना पड़ता है इससे फिर किसान कहां छूट सकता है। और यह सभी के लिए बराबर है।

किसान आंदोलन कमजोर करने और किसानों के खिलाफ नफरत की बीज बोने की कोशिशों का दुष्परिणाम भयावह होगा। किसानों की मांगों को लेकर सरकार जिस तरह का रवैया अख्तियार किया है वह देश के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

एक तरफ मोदी सरकार स्वयं को किसानों का हितैषी बताती है तो दूसरी तरफ बजट केवल बाजार के लिए या पूंजीपतियों के लिए बनाती है। इस बजट में जिस तरह से 50 लाख के 6 साल पुराने मामलों को बंद करने का ऐलान किया गया है वह भी हैरान करने वाला है।

बजट में कहा गया है कि 6 साल पुराने इस मामले को इंकम टैक्स के द्वारा बंद कर दिया जायेगा। जबकि इसके दायरे में आने वालों की संख्या गिनती के है। 

बजट को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है और उसका सच बाहर निकल रहा है वह संकेत है कि निजीकरण के इस दौर में मोदी सत्ता अपनी जिम्मेदारी से दूर भागना चाहती है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

अत्याचार...

 

रसद रोक दो, बिजली काट दो, नुकीले कीलें गाड़ दो और भी चाहे कितने ही उपाय कर लो पूरी दुनिया में इन सरकारी कोशिश से न तो  कभी आंदोलन रुकी है और न ही रुक सकेगी।

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को तोडऩे की तमाम सरकारी षडय़ंत्र नेस्तनाबूत हो चुकी है और अब सरकार जिस तरह से किसानों को रोकने का उपाय कर रही है उसका क्या मतलब है। क्या मोदी सत्ता किसानों के आंदोलन से भयभीत हो चली है, नहीं तो 26 जनवरी की आड़ में किसानों को रोकने के लिए जो रास्ता अख्तियार कर रही है, वैसा कभी नहीं करती।

दिल्ली बार्डर में किसानों को रोकने के लिए जिस तरह की व्यवस्था की जा रही है, वैसी व्यवस्था तो सत्ता केवल दुश्मनों के लिए करती है। इंटरनेट ठप्प कर दी गई है, बिजली पानी काट दी गई है और जिस तरह से नुकीलें कीलें, बारह लेयर की बाड़ और कंटीली तार लगाकर किसानों को रोकने की कोशिश की जा रही है वह हैरान कर देने वाली है।

लेकिन सरकारें शायद नहीं जानती कि आंदोलन रसद-पानी से नहीं हिम्मत से चलता है और आंदोलन की ताकत को दुनिया में कोई सत्ता नहीं रोक पायी है। इसलिए अब मोदी सत्ता के सामने तीनों कानून वापस लेने के अलावा भी कोई चारा होगा, कहना कठिन है।

दिल्ली के हालत 26 जनवरी के बाद जिस तरह से बदले और आंदोलन की गूंज देश के गांवों तक पहुंचने लगी है वैसा इससे पहले कब हुआ है याद नहीं पड़ता और यह भी याद नहीं पड़ता कि आंदोलन को रोकने कभी किसी सरकार ने रसद-पानी बिजली काटी हो।

ऐसे में किसानों के आंदोलन को लेकर आम लोग भी अब अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। जात-धर्म से दूर किसान जिस तरह से एकजुट होकर आंदोलन में हिस्सा लेने लगे हैं वह क्या इस देश में नए राजनैतिक समीकरण की ओर संकेत नहीं कर रहे है? क्या अगला चुनाव अब विकास के मुद्दे की बजाय किसानों के चुनाव लडऩे को लेकर होगा।

यकीन जानिये ऐसा हो सकता है? क्योंकि किसान अब समझने लगे हैं कि उनका हित किसमें है और यदि गांव-गांव से किसान आंदोलन की गूंज सुनाई दे रही है तो यह मोदी सत्ता ही नहीं दूसरे राजनैतिक दलों के लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि धर्म और जाति से परे किसानों का ेक जुट होना आंदोलन की सफलता की कहानी लिखने जा रहा है।