सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

पेट्रोल महंगा हुआ तो क्या हुआ...

 

पेट्रोल की कीमत कुछ शहरों में सौ रुपये पार हो गया। लेकिन सब तरफ सन्नाटा है। विरोध के स्वर नेतृत्व के अभाव में नक्कारखाने की तूती हो गई है। महसूस सभी कर रहे हैं कि कुछ तो गड़बड़ है लेकिन कोई नहीं बोल रहा है। क्योंकि जो भी पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत पर सवाल उठायेगा वह राष्ट्रद्रोही कहलायेगा?

यह सच को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि मोदी सत्ता के आने के कारण ही देश बचा है, हिन्दूत्व बचा है वरना 2014 में यदि मोदी सरकार नहीं आती तो यह देश बचने वाला नहीं था और न ही हिन्दूत्व?

पिछले 6 सालों के इस कथित सच ने देश में महंगाई बेरोजगारी तो बढ़ाई ही है देश को आर्थिक रुप से कमजोर कर दिया है लेकिन जब संघ ने यह कह दिया कि उनके कारण ही हिन्दू बचे हैं तो फिर वर्तमान दौर में इसे नहीं मानने का मतलब क्या है?

वैसे भी जब कांग्रेस ने गांधी के सिद्धांतों से परे जाकर सत्ता के अहंकार को जिया है तब वर्तमान सत्ता को इसके लिए किस हद तक दोष दिया जा सकता है?

अंग्रेजों की रीति नीति क्या वर्तमान में दिखाई नहीं दे रही है? फूट डालो राज करो! इसे सभी ने पढ़ा है लेकिन जब सपने अच्छे दिन के हो तो यह नीति कैसे कोई देख सकता है। हमने पहले भी कहा है कि यदि सत्ता का ध्येय अपने एजेंडों को लागू करना है तो फिर जन सरोकार का कोई अर्थ नहीं रह जाता इसलिए पेट्रोल की बढती कीमत से परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमने उन्हें चूना है जिनका एजेंडा पहले से साफ था और जब एजेंडा चाहिए तो महंगाई-बेरोजगारी के दंश को सहना ही होगा?

जो लोग मोदी सत्ता से सवाल करते हैं उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि 70 साल के सफर में संघ ने क्या क्या नहीं किया। उसने लोगों के दिलों में यह जगा ही दिया कि हिन्दूत्व यदि इस देश में बचा है तो वह सिर्फ संघ के कारण बचा है? और जो लोग संघ के इस  सोच को स्वीकार नहीं कर सकते वे पाकिस्तान चले जाए? देश छोड़ दे।

हम यह नहीं कहते कि मोदी सत्ता के आने के बाद इस देश में जिन साढ़े 6 लाख लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ी है वे देशद्रोही थे लेकिन ये सच है कि भारत की नागरिकता छोडऩे वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है? वजह आप तलाश करते रहें क्योंकि सत्ता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग रहे या न रहे?

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

जब ध्येय एजेंडा हो...

 

सिर्फ पढऩे आने से मतलब ज्ञानी हो जाना नहीं होता। इसी तरह सत्ता हासिल करने का मतलब भी जन सरोकार से वास्ता कैसेे हो सकता है और फिर सत्ता हासिल करने का ध्येय ही सिर्फ एजेंडा लागू करना हो तो जन भावना और जन सरोकार का क्या मतलब है।

पिछले 6 सालों में मोदी सत्ता के आंकलन को लेकर अर्थशाी, शिक्षा शाी से लेकर तमाम तरह के शाी निराश है, किसान, मजदूर, मध्यम श्रेणी हलाकान, परेशान है। लेकिन सत्ता का अपना कार्य है, उन्हें न किसानों से मतलब है न बढ़ती महंगाई से त्रस्त लोगों से ही कोई सरोकार है।

ऐसे मे आप कोई भी सवाल करें, उसका कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेवक संघ अपने एजेंडा को पूरा को पूरा करने में लगा है, भले ही देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां एक-एक कर बिक जाए, रेल बस हवाई जहाज का निजीकरण होता रहे, बेरोजगारी महंगाई बढ़ती रहे। एजेंडा ही ध्येय का है और रहेगा।

आप हैरान हो सकते है कि मोदी सत्ता के आने के बाद अब तक इस देश के 6 लाख 50 हजार से अधिक लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी है जिनमें हम मेहुल चौकसी या विजय माल्या जैसे भगोड़ों की बात नहीं कर रहे हैं।

आखिर भारत की नागरिकता छोडऩे वाले कौन है? क्या वे हिन्दू नहीं है, वे हिन्दू ही है लेकिन कुंठित हिन्दूओं की नजर में वे न तो हिन्दू है और न ही देश भक्त हैं। वे चूंकि मानवतावादी हैं और अच्छा जीवन मिलजुलकर जीना चाहते है लेकिन ये उन्हें पसंद नहीं। 

भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य सभा में गुलाम नबी आजाद को लेकर रो पड़े हो लेकिन सच तो यह है कि संघ का अपना ध्येय है और सत्ता हासिल करने के लिए नफरत ही औजार बन चुका है, ऐसे में आप कलाम या आजाद को लेकर भले ही क्षणिक भावुक हो जाये लेकिन चुनावी मंच में नफरत ही औजार होगा? और जब औजार नफरत हो तो फिर जनसरोकार कहीं दूर अंधेरे में ढकेल दिया जाता है। और जनसरोकार के मुद्दे उठाने वाले परजीवी हो जाते हैं। परजीवी भले ही शब्दों में आम लोगों को न समझ आये लेकिन है तो यह गाली ही है। संसदीय गाली। जो प्रधानमंत्री दो संसद जैसी जगह में देने से गुरेज नहीं है।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

जब पवित्र मान लिया...

 

हमने पहले ही कहा है कि सिर्फ जबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलने वाला है। सत्ता को जन सरोकार से मतलब होना चाहिए लेकिन जब से मोदी सत्ता आई है भाजपाईयों के तेवर जनआंदोलन के खिलाफ हैरान कर देने वाला है। आंदोलनकारियों को देशद्रोह, दुश्मन और पता नहीं किस किस तरह की गालियों से नवाजा जाता है। जिसे हम यहां लिखने में भी शर्म महसूस करते हैं।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस किसान आंदोलन को पवित्र कहा है उसके बाद  यह सवाल उठना चाहिए कि आखिर आंदोलन जब पवित्र है तो उनकी मांगे मानने में सरकार को दिक्कत क्या है? आंदोलन पवित्र है तो फिर बार्डर पर दुश्मनों जैसा व्यवहार करते हुए किले, खाई, क्यों खोदी गई, पानी-बिजली की सप्लाई क्यों रोकी गई। और इन सबसे भी बड़ा सवाल है कि भाजपा के पदाधिकारी से लेकर कई कार्यकर्ता उन्हें देशद्रोह आतंकवादी नक्सली किस बिना पर बोल गये? खुद प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी-परजीवी जैसी भाषा कैसे बोल गये?

क्या यह सच नहीं है कि प्रधानमंत्री के परजीवी वाली भाषण की जब चौतरफा प्रतिक्रिया हुई तो वे आंदोलन को पवित्र कह गये! दरअसल यह तीनों कानून ही किसानों की बजाय पूंजीपतियों का संरक्षण अधिक करता है। असीमित भंडारण से तो आम आदमी का बुरा  हाल होगा ही खुद मोदी सत्ता ने कालाबाजारी और जमाखोरी को संरक्षण दे दिया है। 

ऐसे में सवाल कई है लेकिन सरकार सवालों की जवाबदेह से बचकर दूसरी ही बात कह रही है तब किसानों के पास आंदोलन को विस्तार देने के अलावा क्या रास्ता रह जाता है। और आंदोलन से कोई सत्ता कब तक बची रह सकती है।

आंदोलन पवित्र था है और रहेगा।

अंत में-

पवित्रता...

हल चलाने से

लेकर बीज डालने

रोपा से लेकर

निदोई करने

में लगा किसान

प्रेम और करुणआ

का सागर होता है

रोज वह फसल

के लिए दुआ

मांगता है

अपने ईश्वर से

बिल्कुल निर्भाव

पवित्र

फिर उस फसल

की कीमत

उस खेत को बचाने

की लडाई

कैसे गलत हो गया

वह भी पवित्र है पवित्र!

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

धन्यवाद! अब गिरवी रखना ही होगा...


राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि सुधार की वकालत करते हुए जब कहा कि आर्थिक सुधार के लिए यही एक रास्ता है तो इसका मतलब साफ था कि अब सब कुछ निजी हाथों में गिरवी रखा जाना जरूरी हो गया है क्योंकि सरकार चलाने के लिए टेक्स यही निजी कंपी देती है और पार्टी चलाने के लिए भी चंदा जब यही कंपनी देती है तो फिर सरकार एमएसपी में फसल खरीदकर गोदाम में रख रखाव का झंझट क्यों पाले। और किसानों को जनधन या सम्मान निधि से लॉलीपाप या खैरात दी जाती रहेगी।

हैरानी की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री ने किसानों को ईमानदार कहा जबकि दो दिन पहले ही वे इन्हें आंदोलनजीवी परजीवी बता चुके थे और इससे भी बड़ी हैरानी की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री ने आर्थिक और सामाजिक सुधार को एक तराजू पर तौल दिया।

क्या सचमुच देश को निजी हाथों में गिरवी रखने की शुरुआत की जा चुकी है? ये सवाल हम यहां इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि इस सरकार ने जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र  की 23 कंपनियों को बेचा है और लालकिले को भी रखरखाव के लिए निजी कंपनी को सौंपा है उसके बाद तीनों कृषि कानून के जो नियम है वह साफ कहता है कि इन तीनों कृषि कानून में सरकार ने निजी क्षेत्रों के हितों की रक्षा और उनके संरक्षण के उपाय किये है। लगातार किसानों की खुदकुशी के बढ़ते मामले से इतर सरकार जिस तरह से इन तीनों कानून को लेकर अपना रुख साफ किया है उससे एक बात तो तय है कि निजी क्षेत्रों के पूंजी से आगे सरकार नममस्तक हो चुकी है।

असीमित भंडारण का अधिकार देना क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करता कि सरकार एफसीआई को खत्म कर देना चाहती है और जब एफसीआई खत्म हो जायेगी तो फिर सरकार एमएसपी पर खरीदी किस तरह खरीदेगी। वैसे भी सरकार जब 6 फीसदी उपज ही एमएसपी पर खरीदती है तब इसका क्या मतलब है।

मतलब साफ है कि नेताओं को चंदा पूंजीपति देते हैं इसलिए पूंजीपतियों के हित में फैसला हो। किसानों को खैरात दे दो बस!

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

हजारों तरह के आंसू...

 

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

मन की बात...


क्या हम सचमुच उस दौर में जी रहे हैं जहां नेता को कोई काम करना आता हो या न आता हो बोलना आना चाहिए और जो अपनी बातों से मोह ले वही राज करेगा? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि संसद में किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह की बातें हुई उसके बाद तो इस बात का कोई मतलब ही नहीं रह जाता कि किसान आखिर आंदोलन क्यों कर रहे हैं और न ही इस बात का मतलब ही रह गया है कि राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद से इतर भी इस देश के लोगों की अपनी जरूरतें हैं।

पूरी दुनिया का आप आकलन कर ले ऐसा आंदोलन कहीं नहीं मिलेगा जहां दो दर्जन से अधिक आंदोलनकारी किसानों ने खुदकुशी की हो और आंदोलन के दौरान करीब दो सौ किसानों की जान चली गई हो लेकिन जब सत्ता यह कहे कि इस आंदोलन का कोई मतलब नहीं है और प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि किसान सिर्फ आंदोलन करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं तो इसका क्या मतलब है?

क्या इस बात को नजरअंदाज कर देनी चाहिए कि सभी राज्यों में किसानों की उपज की खरीदी किस तरह से न्यूनतम दर पर हो रही है। या हम प्रधानमंत्री की बात को मान ले कि एमएसपी बंद नहींं होगी?

ऐसे में क्या इस बात का आकलन नहीं होना चाहिए कि क्या किसानों की उपज की कितनी फसल एमएसपी पर खरीदी जा रही है और कितने व्यापारी एमएसपी पर खरीदी कर रहे हैं लेकिन जब पूरे देश को राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद की लाठी से हांका जा सकता है तब इस बात से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता कि गैस बिजली पेट्रोल की कीमत कितनी बढ़ रही है और न ही इस बात का ही फर्क पड़ता है कि राशन की कीमत कितनी बढ़ रही है!

ऐसे में फिर सवाल यह उठता है कि क्या जो महंगाई या अपनी दूसरी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं उनके लिए नया रास्ता क्या है क्योंकि किसानों की बढ़ती मौत के आंकड़े भी जब सत्ता को न डिगा सके तो दूसरा उपाय क्या होना चाहिए?

सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि किसानों के आंदोलन को लेकर विपक्षी दलों की भूमिका भी स्पष्ट नहीं है और कार्पोरेट जगत से मिलने वाले चंदा की लालच में वे उन बातों का न ठीक से विरोध कर पा रहे हैं और न ही किसानों का ठीक से समर्थन करते हुए साथ खड़े हैं।

ऐसे में 26 जनवरी के बाद अब तक हुए पंचायतों की भीड़ को देखना होगा कि वे आंदोलन के माध्यम से राजनीति की दिशा को कैसे बदलेंगे!

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

जिम्मेदारी कहां है...

 

यह दौर अजीब है, खुद की जिम्मेदारी से भागती मोदी सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी से बचने दोषारोपण का सहारा लेने लगी है और इस खेल में ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिवर्सिटी की भूमिका किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार कर सकती है!

और जब सत्ता जिम्मेदारी से बचने लगे तो फिर इसका साफ मतलब है कि नियत ठीक नहीं है और जब नियत ही ठीक न हो तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है।

इन दिनों संसद से लेकर सड़क तक बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी किसानों का मुद्दा छाया हुआ है। ऐसे में सत्ता की जिम्मेदारी है कि वह किसानों से बातचीत करके कोई रास्ता निकाले या फिर तीनों कृषि कानून ही रद्द कर दे लेकिन सत्ता अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय आंदोलन तोडऩे में पूरी ताकत लगा रही है। पहले तो उन्हें आतंकवादी, नक्सली देशद्रोह कहा जाने लगा फिर दीवारें खड़ी की गई। सड़कों पर छड़ो की कीलें लगाई गी, रसद-पानी-बिजली इंटरनेट तक बंद किया गया। किसानों के खिलाफ इस तरह से विषवमन किया गया मानों वे आंदोलन करके दुश्मन हो गये है। और जब पूरी दुनिया का ध्यान इस मानवाधिकार हनन पर होने लगा तो इसे एक बार फिर भारत को बदनाम करने की साजिश बताई जा रही है जबकि हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में अभी भी ऐसे लोग हैं जो मानवाधिकार के उल्लंघन पर तीखी प्रतिक्रिया देकर किसी भी देश की सत्ता को बेचैन कर देते है।

इस मोदी सत्ता की दुविधा यही है कि वह मीठा गप्प गप्प तो करती है लेकिन कड़वा के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहराती है, संसद  न चले तो विपक्ष जिम्मेदार, जीएसटी में तकलीफ हो तो कांग्रेस ला रही थी, किसान आंदोलन हुआ तो यह बिल कांग्रेस ली रही थी। इसका क्या मतलब है। क्या तब भाजपा विरोध में नहीं खड़ी थी और जब वह विरोध में खड़ी थी तो आज यह सब क्यों कर रही है।

लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वह हर असहमति के स्वर को देशद्रोही का नाम देती है जबकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुछ और ही कहता है।

संसद में संजय सिंह ने पूछा भी कि यदि जीएसटी कांग्रेस, किसान कानून कांग्रेस लाने वाली थी इसलिए भाजपा ले आई तो फिर पार्टी का नाम ही कांग्रेस, बी कांग्रेस ही कर देना चाहिए। सवाल कई है जिसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर स्टॉक सीमा में छूट देने का अर्थ क्या है, क्या यह महंगाई, कालाबाजारी को बढ़ावा देना नहीं है लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछेगा? क्योंकि अति राष्ट्रवाद और धर्मान्धता किसी कोढ़ से कम नहीं है। यह बात हरिशंकर परसाई जी ने जब कही थी तब कितनों को इस पर यकीन रहा होगा ! लेकिन आज की परिस्थितियां यह चिख चिख कर कह रही है कि अति सर्वेत्र वर्जते ! अति का अंत होता ही है और किसान आंदोलन ने जिस शांतिपूर्ण ढंग से अपने को विस्तार दिया है वह किसी भी सत्ता के लिए बेचैन कर देने वाला है।