मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आपदा में अवसर...

 

जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी वे लोग ताली बजा रहे थे, जो हिन्दू कुंठा से ग्रस्त थे, उन्हें तो मोदी की हर बात अच्गछी लगती है चाहे वह कितना भी अधार्मिक हो या अनैतिक हो। ये वे लोग है जो ईवीएम के विरोध को भाजपा का विरोध मानते हैं और भाजपा के विरोध को देश का।

खैर बात यहां महामारी में आपदा में अवसर की बात पर ही चर्चा होनी चाहिए क्योंकि ये बात प्रधानमंत्री ने कहा थी और उसका परिणाम कालाबाजारी से लेकर निजी अस्पतालो में दिखाई देने लगा है। बहुत पहले शायद स्कूल के दिनों में कहीं सुना था कि आपदा में अवसर नहीं सेवा ही धर्म होना चाहिए और कोई भी लोकतांत्रिक और सेवाभावी जनसेवक महामारी में आपदा में अवसर की बात नहीं कर सकता लेकिन तब मेरे इस बात को लेकर भक्तों ने मुझसे लड़ाई भी कर ली थी और कुछ तो आज भी बात नहीं करते।

तब यह भी कहा गया कि महामारी जैसे आपदा में अवसर की प्रतिज्ञा गिद्ध, सियार और लकड़बग्घे करते हैं, उनके लिए महामारी से प्रभावित लाशें शानदार दावतें होती है और ये उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। जिस देश में एक व्यक्ति के सुख और दुख में पूरा गांव का गांव, या मोहल्ला का मोहल्ला शामिल होता है वहां महामारी के आपदा में उत्सव की बात कोई सोच भी कैसे सकता है लेकिन अंधेर नगरी, अंधेर राजा की कहानी भी याद न हो तो फिर पढऩे-लिखने का मतलब ही क्या है?

आपदा में अवसर की तलाश ज्यादातर वे लोग करते हैं जिनके खून में व्यापार है। और यह बात जब कोई स्वयं स्वीकार कर ले तो याद कीजिए 1965 और 1971 का वह युद्ध जब कुछ व्यापारी कालाबाजारी कर आपदा में अवसर का लाभ ले रहे थे। लेकिन तब सत्ता ने सेवा को धर्म बताकर कितने ही व्यापारियों के हृदय परिवर्तन किये थे लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही आपदा में अवसर जैसे शब्दों का प्रयोग करेगा तो उसका परिणाम क्या होगा?

लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही कालाबाजारी और अब निजी अस्पतालों की लूट से आम जनमानस में भय व्याप्त है। भयमुक्त शासन का कहीं पता नहीं है। लेकिन हमारा आज भी मानना है कि आपदा में अवसर की तलाश करने की बजाय आपदा में सेवा धर्म किया जाए!

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सातवां बेड़ा...

 

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में विदेशी  हस्तक्षेप को लेकर बाइडन ने साफ कह दिया था कि इसकी प्रतिक्रिया मिलेगी ! तब किसने सोचा था कि अमेरिका का निशाना सिर्फ रूस नहीं भारत भी होगा।

भारत के मामले में बिना चुनौती के इस तरह से सातवें बेड़े के भारतीय ईईंजेड में प्रवेश क्या अबकी बार ट्रम्प सरकार की प्रतिक्रिया है। अपने जहाज को भारत की सीमा में प्रवेश कराकर जिस तरह से प्रेस नोट जारी किया गया है वह पूरी दुनिया को जानकारी देना ही नहीं भारत की फजीहत करना भी है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ये बता रही है कि ऐसा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिखा है कि यूएन कन्वेशन के तहत कोई भी देश, किसी दूसरे देश की ईईजेड में देश की अनुमति के बिना हथियार और साजो समान से लदे फ्लीट के साथ प्रवेश नहीं कर सकता। यदि जहाज में व्यापारिक वस्तएं है तो अनुमति की जरूरत नहीं।

हालांकि अमेरिका इसे अधिकार और आजादी का इस्तेमाल करने का दावा कर रही है और इसे फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन बता रही है और यह भी कहा है कि भारत के समुन्दर को लेकर किये जा रहे दावे को वह नहीं मानते और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।

यह एक तरह से भारतीय संप्रभुता को खुलकर चुनौती है लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी हैरान कर देने वाला है। सांतवा बेड़ा नाम सुनकर 1971 जेहन में आने लगता है। तब पाकिस्तान पर हमला करने पर अमेरिका के द्वारा धमकी दी जा रही थी वो सातवां बेड़ा भेजेंगे। और अमेरिका ने हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा उतार भी दिया लेकिन तब इस देश की लौह महिला ने अमेरिका को आंख दिखाकर न केवल सांतवा बेड़ा को लौटने मजबूर कर दिया था बल्कि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे।

अमेरिका द्वारा किये गये इस सार्वजनिक फजिहत से पहले पाठकों को यह जान लेना चाहिए कि इंदिरा गांधी उसी जवाहर लाल नेहरु की बेटी और राहुल गांधी की दादी है जिन पर परिवारवाद का आरोप जड़ा जाता है और 70 साल में कुछ नहीं किया का दावा किया जाता है। हैरानी तो यह है कि 70 साल में कुछ नहीं करने का दावा वे लोग भी समर्थन करते हैं जो सायकल से कार में पहुंच गए?

खैर राजनीति में झूठ नफरत और अफवाह ही जिनकी सोच हो उनके बारे में ज्यादा क्या कहा जाए? जिस तरह से झूठ और नफरत की दीवार खड़ी हुई है उसी तरह से ये गिर भी जायेगी? लेकिन तब देर न हो जाए।

ऐसे में यदि चीन के बाद दूर बैठे अमेरिका भी यदि भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने लगे तो इसका करार जवाब दिया जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका हर चुप्पी को कमजोरी समझता है तब अमेरिका यह भी जान ले कि कमजोर देश नहीं सत्ता  हो सकता है!

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण...


कोविड-19 अब 21 साबित होने लगा है, हर तरफ हाहाकार है, छोटे शहरों की हालत ज्यादा खराब है, अस्पतालों में बेड की कमी, और लापरवाही ने कितने ही घरों की रोशनी छिन ली, और यह आगे कब तक चलेगा कहना मुश्किल है।

कई शहरों में ताला लगने लगा है जिसे लॉकडाउन कहा जा रहा है, शासन-प्रशासन की बेबसी साफ दिखाई देने लगा है, दो गज की दूरी, मास्क जरूरी ही इस संक्रमण से बचने का एक मात्र उपाय है। लेकिन नेताओं को राजनीति करने से फुर्सत नहीं है वे इस आपदा को भी अवसर में बदलकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को गई की तर्ज पर सत्ता और विपक्ष अपने में मस्त हैं, हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बेबाकी से स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना बढऩे की कई वजहों में से एक वजह रोड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट भी हो सकता है लेकिन असली वजह विदर्भ से होली त्यौहार के लिए आवाजाही है। आज के इस दौर में यह स्वीकारोक्ति भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने की चाह में निर्णय की देरी की बात को आज तक केन्द्र की सत्ता मानने को तैयार नहीं है।

यह सभी जानते हैं कि राहुल गांधई सहित विपक्ष के कई नेता जनवरी-फरवरी से ही मोदी सत्ता को इसकी भयावकता पर चिंता जता रहे थे लेकिन निर्णय में देरी की वजह से न केवल कोरोना से मौतों के आकड़े बढ़े बल्कि 186 मौते गरीब मजदूरों की सड़कों पर हो गई। मध्यम वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई। बढ़ते संक्रमण ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर दिया। ऐसे में याद कीजिए सत्ता ने अपनी गलती छुपाने किस तरह से नफरत फैलाकर अपने को पाक बताया था। तब्लिकी जमात और मौलाना साद तो कईयों को आज भी याद होगा लेकिन शायद वे नहीं जानते होंगे कि इस मामले में न्यायालय ने फैसले क्या दिये, सभी पर लगे आरोप निराधार पाये गए। विदेशी नागरिक अपने देश में लौट गए और मौलाना साद के रुप में जो नफरत फैलाई गई वह उन लोगों के दिलों में घर बना लिया जो अच्छे खासे पढ़े लिखे, डिग्रीधारी हैं।

ज्ञान पर नफरत का यह ध्वजारोहण नया नहीं है, हां तरीका नया है क्योंकि एक ही तरीका अपनाया गया तो लोग बेवकूफ नहीं बनेंगे। इसलिए हर बार पूरे सच में से आधे में अपना झूठ और नफरत की चाशनी लपेटी जाती है और इसे परोसा जाता है कि यही पूरी सचा लगे।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण नया नहीं है, धर्म और राष्ट्रवाद के चश्में ने अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे नौजवानों को अपनी चपेट में लिया है। ताजा उदाहरण  बंगाल का है, जिसमें ममता बैनर्जी सिर्फ इसलिए बानों बना दी गई क्योंकि वे अल्पसंख्यकों की पीड़ा के साथ खड़ी नजर आती है। सच तो यह है कि उन्होंने जिस सादगी के साथ मुख्यमंत्री को जिया है वैसा देखने को ही नहीं मिलेगा। विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के सफर में वह आज भी अपनी लिखी किताब की रायल्टी और पेटिंग बेचकर ही पैसा रखती है। न विधायक-सांसद का पेंशन न वेतन।

बकौल ज्योति बसु, 'ममता ही असली कामरेड है लेकिन गलत पार्टी में हैÓ। को नजरअंदाज कर भी दें तो जब आज अपने को सजने संवारने में गरीब से गरीब घर की लड़कियां भी हजारों रुपए खर्च करती है खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को गरीब घर का बताते हुए लाखों रुपए चश्में, घड़ी व पहनावे फैशन पर करते हो तब ममता की सादगी से मुकाबला उसे बानों बनाकर ही किया जा सकता है। तब इस नफरती ध्वाजारोहण में शामिल कितने पढ़े लिखे हैं जो ममता को बानों कहने का विरोध करते हैं? क्या यह उन पढे-लिखे लोगों के क्षणिक स्वार्थ से यह ध्वजारोहण उचित है। मंडल कमीशन के बाद से जिस तरह से पढ़े-लिखे लोगों पर धर्म का कंबल डाला गया है, उसका दुष्परिणाम यह है कि अब मध्यम वर्ग बेबस है असहाय है और कुछ लोग शर्मसार तो हैं लेकिन खामोश कहना ठीक नहीं, भीतर ही भीतर घुस रहे हैं।

(जारी...)

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

शाबास प्रधानमंत्री जी...

 

क्या बात है... देश में फिर कोरोना हाहाकार मचाने लगा है। रोज हजारों लोग मरने लगे हैं, देश की जनता तो सीधी-साधी है और सबसे भोले हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी। और उनसे भी लाख गुना सीधे है हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी। दुनिया में आग लग जाए इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर पहुंच जायेंगे बंगाल और जुटा लेंगे लाखों की भीड़।

मुझे एक बात प्रधानमंत्री से सीधी पूछनी है कि क्या आपकी रैलियों में जो भीड़ जुट रही है उससे कोरोना नहीं फैलता क्या? चंद रुपयों की खातिर रैली में आने वालों के लिए तो भूख पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है लेकिन देश में जिस तरह से कोरोना के कहर से लाशों में लोग तब्दिल हो रहे हैं क्या वह भई दिखाई नहीं दे रहा है या चुनावी जीत के लिए लोगों की जान को दांव में लगा देना उचित है?

शाबास की हेडलाईन इसलिए लगाया ताकि भाजपा के वे लोग भी पढ़े और एक बार चिंतन करें कि चुनावी जीत क्या इतना जरूरी है। प्रधानमंत्री जी आप देश के मुखिया हैं और मुखिया का व्यवहार और कर्तव्य सब लोगों के हित के लिए होना चाहिए। हम मानते हैं कि चुनाव में जीत महत्वपूर्ण है लेकिन एक दो राज्य गंवा देने से क्या फर्क पड़ जायेगा, पहले भी तो छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली गंवा ही चुके हो।

एक तरफ देश में कोरोना ने हाहाकार मचा दिया है, नाईट कफ्र्यू, लॉकडाउन ने आम आदमी को प्रताडि़त किया है तो दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी सभा लेने में व्यस्त है, दिनभर चुनावी सभा और शाम को दो गज की दूरी और मास्क जरूरी की बात क्या बेमानी नहीं है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में कोरोना के लिए हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता की भूख ही जिम्मेदार है, और इस बार फिर कहते हैं कि चुनावी सभा में जुटाये जा रहे भीड़ इस देश को नरक बना देने वाला है। सत्ता और राजनेताओं की बेशर्मी के कितने ही किस्से हैं लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही चुनावी जीत के लिए जनता की जान को ही दांव पर लगा दे तो इसका मतलब साफ है कि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनते तक का इंतजार भी क्या ऐसा ही कुछ नहीं था।

हैरानी तो इस बात की है कि करोड़ों लोगों की जान दांव में लगते देख भी राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट ने आंखे बंद कर रखी है बाजार में भीड़ पर हल्ला मचाने वाली मीडिया को भी चुनावी रैली में भीड़ जुटाने वालों के तलवे चाटना पसंद है। जब देश की तमाम संवैधानिक संस्था, समाजसेवी कलाकार सब चुप हो तो जनता क्या करें।

वैसे भी इस देश ने गरीबी और भूखमरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, चंद पैसों के लिए जो लोग अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं उनका ही दोष गिनाया जायेगा, कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि प्रधानमंत्री की चुनावी सभा से कोरोना की स्थिति आने वाले दिनों में भयावह होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री जी अब तो फैसला लिजिए, लोगों को बख्श दीजिए, बंगाल तो आते-जाते रहेगा लेकिन जब लोग ही नहीं रहेंगे तब...!

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

मेरा नाम जोकर...

 

इतिहास अपने आप को दोहराता है, जान लिजिए कि, राजकपूर ने एक फिल्म बनाई थई- मेरा नाम जोकर! अपना सब कुछ दांव पर लगाकर बनाई यह फिल्म अपनी पहली रीलिज में बुरी तरह पीठ गई, राज कपूर का सब कुछ लूट गया, यहां तक कि उनकी स्टूडियों तक के बिकने की नौबत आ गई लेकिन वे अकेले थे, संभल गए। यदि नहीं संभलते तब भी उनका परिवार सड़क पर आता फिर पता नहीं क्या होता!

खैर यह इतिहास की बातें हैं, लेकिन मेरा नाम जोकर का इतिहास इस बार पूरे देश में दोहराया गया, राजनीति में बन रही यह फिल्म पूरा हुआ है या नहीं कहना कठिन है, लेकिन इस फिल्म में कई जोकर हैं, और अब भी कई जोकर की भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। सालों से बन रही इस फिल्म के निर्माता पर्दे के पीछे से नये-नये जोकर ढूंढते हैं, जो सत्ता के बाहर रहते कुछ कहते हैं लेकिन सत्ता में आते ही अपनी ही जुबान से पलट जाते हैं, लेकिन जोकर की भूमिका मिलने और फिल्म पूरी करने की चाह में या पूरी फिल्म देखने की चाह में लोग किसी का नहीं सुन रहे हैं।

नफरत, अफवाह झूठ के मसाले रोज डाले जा रहे हैं और जोकर की अदाकारी पर ताली बजाने वालों की कमी नहीं हैं। यह फिल्म अभी पूरी भी नहीं हुई है तब कितने ही लोग बर्बाद होने लगे हैं और जब फिल्म पूरी होगी तो पता नहीं क्या होगा। हैरानी की बात तो यह है कि फिल्म पूरी होने की ईच्छा रखने वाले भी अब सड़कों पर आने लगे हैं लेकिन दूसरों को बर्बाद करने का शौक में कहां देखता है कि वह खुद और उसका घर बर्बाद हो रहा है।

मतलब साफ है, समझदार के लिए ईशारा काफी है। जीएसटी से लेकर राजनीति में अपराधियों की खिलाफत करने वाले आज खुद ही अपराधग्रस्त होने लगे हैं। नोटबंदी, लॉकडाउन, जीएसटी, निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की व्यथा पर इनके पुराने भाषण सुन लीजिए। इसके बाद भी आंखे न खुले तो जोकर बनने तैयार हो जाईये।

वैसे राजनीति का खेल कौन समझता है? इसलिए आश्वासन पर हर बार वोट पढ़ते जाते हैं। सत्ता की रईसी बरकरार रखने के उपक्रम भी कौन देखता है, क्योंकि जब गले में दुरंगा पट्टा बंधा हो तो हरकत भी दुरंगा ही होगा। कोरोना महामारी के खतरे पर ही राजनीति हैरान करने वाली है, ताली थाली, दीपक जलाने के तमाम उपक्रम के बीच यदि फिल्म पूरी होते देखने की चाह बनी हुई है तो इसका मतलब साफ है कि दोरंगे पट्टे ने आपके गले को इस कदर बांध रखा है कि मस्तिक और दिल को जोडऩे वाला नस अलग हो चुका है अब सिर्फ वही होगा जो जोकर दिखायेगा। फिल्में पूरी हो या ना हो ट्रेलर को हिट किया जायेगा, गानों से कमाई होगी और फिल्म पूरी होते देखने की चाह में जोर बनते लोग यही सोचते रहेंगे कि देशद्रोही फिल्म ही नहीं बनने देना चाहते!

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कानून से उपर सत्ता और बेबसी...

 

नक्सली हमले के बाद देश के गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़ दौरा इन दिनों सुर्खियों में है तो उसकी वजह बगैर मास्क की वे तमाम तस्वीरें है जो साबित करती है कि सत्ता के आगे जनता कितनी बेबस है।

अब जब न्यायालय में कार में अकेले सफर करने वाले को मास्क लगाने को उचित बता रहा है तब सोचिये देश के गृहमंत्री की इन तस्वीरों का मतलब क्या है। कहते हैं कि हर अपराधी की शुरुआत झूठ बोलने की आदत से शुरु होती है और यह सफर रंगा-बिल्ला या कुख्यात तक पहुंच जाता है, इसी तरह सार्वजनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व है। यही छोटी बात आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है।

ये सच है कि हर व्यक्ति का अपने जीवन में बहुत कुछ निजी होता है लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीते है उनकी छोटी सी छोटी बात भी जनमानस को प्रभावित करता है। ऐसे में गृहमंत्री का मास्क नहीं लगाना चुनावी रैलियों में भीड़ और कुंभ या सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ का क्या प्रभाव पड़ता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

देश केवल कोरोना की महामारी से त्रस्त नहीं है बल्कि झूठ, नफरत और अफवाह के उस जंजाल में भी फंस चुका है जिसके चलते हालात बदतर होते जा रहे हैं। हमारा दावा है कि कोरोना जैसी महामारी नहीं भी आती तब भी देश के हालात इसी तरह केे होते क्योंकि सत्ता पाने के लिए जो बीज बोया गया है उसका परिणाम तो दुखद होना ही था।

कानून को सत्ता के दम पर ठेंगा दिखाने की परम्परा चल पड़ी है, कितने ही उदाहरण है जब सत्ता ने अपनी मनमानी से जनता को बेबस कर दिया है, और अब तो झूठ, नफरत और अफवाह की चाशनी में सत्ता ने जनमानस के दिमाग में नस्लवाद का ऐसा जहर भर दिया है जिसका असर आसानी से जाने वाला इसलिए भी नहीं है क्योंकि सत्ता पाने की राह में सभी जहर बो रहे हैं। याद कीजिए सीएए के विरोध में बैठे लोगों को किस हद तक जलील किया गया वह याद नहीं है तो किसान आंदोलन को ही याद कर लीजिए, अफवाहबाजों ने क्या कुछ नहीं किया। इसके बाद भी यदि किसी को स्यिूमर स्पीड सोसायटी पर भरोसा है तो इसका मतलब साफ है कि विरोध का हर स्वर मुल्ला मुलायम या ममता बेगम के तमके के लिए तैयार रहे।

क्या इस देश में कोई बहुसंख्यक समाज का व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक के लिए खड़ा नहीं हो सकता! पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें नई नहीं है और सत्ता के लिए राजनैतिक दल ये दावा करने से नहीं चुकते कि अल्पसंख्यक उनका हक छिन रहे हैं और पहले ही अव्यवस्था से दुखी व्यक्ति आसानी से ऐसे लोगों की बातों में आ जाते हैं।

ऐसे में यदि अमित शाह के मास्क नहीं पहनने पर उनकी पार्टी के लोग खामोश हो या दूसरे का पाप गिनाने लगे तो समझ लिजिए पट्टा ने दिल और दिमाग दोनों को अलग कर इस हद तक जकड़ लिया है कि मस्तिष्क कुंद हो गया है। और जनता बेचारी तो बेबस है।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

लॉकडाउन का अर्थ...

 

क्या कोरोना से निपटने का लॉकडाउन ही एकमात्र उपाय है? पिछला अनुभव बेहद कटु है? लॉकडाउन से देश में हाहाकार मच गया था, भूखे-बिलखते बच्चे, पटरी में मरते परिवार और प्लेटफार्म में मृत मां के साथ बच्चे, पुलिसिया अत्याचार से लेकर संवेदनहीन सरकारों के चेहरे सामने आ जाते हैं, लॉकडाउन समस्या का हल होता तो देश में लॉकडाउन के बाद कोरोना का विस्तार नहीं होता!

तब क्या उपाय है? इस सवाल को उठाये जाने की जरूरत है! एक लॉकडाउन के तुगलगी फरमान को जनता ने भुगता है, मर मर के जीते लोग और सिसक-सिसक के मरते लोगों की पीड़ा को पूरे देश ने महसूस किया है। असल में यह देश उस ढंग का बना ही नहीं है कि लॉकडाउन किया जा सके, न हमारी जीवनशैली वैसी है। तब एक ही उपाय है, जागरुकता और सख्ती! उससे न व्यापारियों को दिक्कत होगी न आम लोगों को। इस भीषण गर्मी में यदि सुबह 6 बजे से शाम पांच बजे तक ही कारोबार की छूट हो तो घर से वहीं निकलेंगे जिन्हें जरूरी है।

लेकिन शर्मनाक तो यह है कि कोरोना को राजनीति ने भी अपनी जुगाड़ बना लिया है, आपदा को अवसर में बदलने की राजनैतिक महत्वांकाक्षा आसमान पर है। पांच राज्यों के चुनाव से लेकर कुंभ तक राजनीति अपने चश्में से देख रहा है। तब लॉकडाउन का अर्थ केवल लोगों को परेशान करना नहीं तो और क्या है?

ये सच है कि कोरोना का यह दौर बेहद डरावना और भयावह है, और केन्द्र सरकार की तुगलगी फरमान ने इसे और भयावह बना दिया है। लोगों की नौकरी जाने लगी और गरीबी, भूखमरी बढऩे लगी। लेकिन यकीन मानिये यदि कोरोना नहीं आता तब भी केन्द्र की नीति से यह सब होना तय था।

जो देश आरबीआई के रिजर्व फंड और अपने संसाधनों को बेचता चला जाता है वहां आम आदमी की खुशहाली पर ग्रहण लगता ही है। ऐसे में कोरोना का आना दुबले पर दो आषाढ़ है, पहला आषाढ़ तो हमने चुना है लेकिन दूसरा आषाढ़ से बचा जा सकता है, शाम से सरकारी सख्ती और दिन में जरूरी हो तभी घर से निकलने के नियम का पालन!