रविवार, 25 अप्रैल 2021

जन की बात-9

 

सुना था सत्ता का नशा, प्रेम और मदिरा के नशे से भी ज्यादा शक्तिशाली होता है, वह विवेक शून्य तो हो ही जाता है, संवेदना शून्य हो जाता है, उसकी जिव्हा ही अनाप-शनाप नहीं बोलता बल्कि मर्यादा भी भूल जाता है। वह सत्ता मद में इस कदर चूर हो जाता है कि वह अपनी ओर उठने वाली हर उंगलियों को काट देना चाहता है। असहमति के स्वर उसे देशद्रोह लगता है और जनता की पीड़ा से खुशी! उसे जनसरोकार से कोई  मतलब नहीं होता, वह तो सत्ता में बने रहने के षडय़ंत्र में व्यस्त रहता है।

कोरोना के बढ़ते प्रकोप से हर कोई चिंतित था, शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसके बांधव या परिचितों को कोरोना ने अपना ग्रास नहीं बनाया हो। लेकिन, सत्ता चिंतित होने का आंडबर ही कर रही थी क्योंकि उसे चिंता होती तो सालभर में चिकित्सा व्यवस्था कहां से कहां पहुंच जाता, आक्सीजन के अभाव में त्राहिमाम नहीं मचता। न ही कुंभ का आयोजन होता न ही चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने का उपक्रम होता। क्या लंबे अरसे के षडय़ंत्र के बाद मिली सत्ता का मोह इस तरह हावी है कि वह मनुष्यों को कीड़े मकोड़े की तरह मारने का उपक्रम कर रही है।

जब सब तरफ आलोचना होने लगी, सभी दल लोगों के निशाने पर आने लगे तब राहुल गांधी ने चुनावी रैली से दूर रहने की घोषणा कर दी। वास्तव में यह महत्वपूर्ण निर्णय था लेकिन जो लोग मध्यप्रदेश के मोह में पहली लहर को भयावह बनाने में कोई कमी नहीं रखी थी वे अब बंगाल में सत्ता के लिए निर्णय शून्य थे।

कांग्रेस के इस निर्णय से बेशर्मी की चादर हटने की उम्मीद थी लेकिन बड़ी मुश्किल से सत्तर साल में मिली सत्ता को बनाये रखने का मोह उनसे छोड़ देने की कल्पना ही बेमानी है जो झूठ-षडय़ंत्र, अफवाह और नफरत पर विश्वास रखते हैं। हालांकि इस परिस्थिति के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है क्योंकि उनसे रूढि़वादी और नफरती लोगों के आक्षेप से स्वयं को कमजोर और डरपोक बना लिया। सबसे पहले राजीव गांधी उस आक्षेप से डर गये कि उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए शहबानों के फैसले को बदल दिया, यही से वे लोग हावी होने लगे जो इस देश के सामाजिक सौहार्द के दुश्मन थे, जो अंग्रेजों के फूट डालो राज करों की नीति के प्रशंसक थे, जिसके लिए हिटलर की तरह श्रेष्ठता ही जीवन का पैमाना था।

मुस्लिम तुष्टिकरण के आक्षेप से कांग्रेस इस कदर डर गई कि वह जनेऊ धारण करने लगी, पूजा पाठ के प्रदर्शन में उतर आई। लेकिन यजि कांग्रेस ही आक्षेपों से डर गई तो फिर गांधी, नेहरु, पटेल, विवेकानंद, सुभाष, टैगोर की इस देवभूमि को लंका बनने से कौन रोक सकता है। आरोपों से बचने के लिए कांग्रेस के नेताओं में होड़ ही कुंठित धर्मालंबियों के खादपानी का काम करता है। किसी के आक्षेप से यदि जन नेता अपने मूल कर्म से भटक जाए तो इस देश के दलित, अल्पसंख्यक गरीबों का क्या होगा? न्याय, सत्य का क्या होगा।

लेकिन कांग्रेसी गांधी के राह से भटक गये, और गांधी की राह से भटकने का सीधा सीधा अर्थ था सच से दूर होना। स्वयं को विलासी बनाना, संवेदना शून्य होना। कमजोर और डरपोक होना।

कोरोना का कहर अब भी उफान पर था, लेकिन भाजपा के मंत्री तो अब भी बंगाल फतह के लिए मरे जा रहे थे, इसलिए वे ममता बेनर्जी के एक साथ चुनाव और राहुल गांधी के रैली से असहमति पर बेशर्मी से कह रहे थे कि यह तो कप्तान के जहाज को डूबते समझ का निर्णय है। क्या सत्ता इतनी बेशर्म होता है? हां होती है जब सत्ता झूठ की बुनियाद पर टिकी हो, नफरत के बीज तो फलीभूत हुआ हो। याद कीजिए 2014 का वह दिन जब कहा गया कि पहली बार कोई हिन्दू प्रधानमंत्री? याद कीजिए संसद की सीढिय़ों पर माधा टेकना? लेकिन इससे पहले तिरंगा को अशुभ बताने, संविधान को गलत बताने, आरक्षण की आलोचना को याद कर लेना।

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

जन की बात-8

 

समस्या जड़ में हो, और हम ईलाज पत्तों में, तनों में ढूंढने की कोशिश करते रहेंगे तो क्या होगा? क्या इस देश में आपदा पहली बार आई है? इससे पहले भी आपदा आई है लेकिन इतना जन आक्रोश इससे पहले कभी नहीं था, न ही इतने बिलखते लोग न लाशों से पटती श्मशान, कब्रिस्तान?

जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी रही, लोगों की नौकरी जा रही थी, लोग मर रहे थे तब भी इस आपदा को इस देश ने मिल बांटकर अपने भीतर घुसने नहीं दिया था, दरअसल नेतृत्व की सूझबूझ हम सबकों एक किये हुए था और एकता की ताकत के आगे कोई विपदा टिक नहीं सकती। लेकिन पिछले वर्षों में नेतृत्व ने क्या किया, इस देश के भाईचारे की ताकत को सत्ता के लालच में सबसे पहले तोड़ा, वे भूल गये कि हम आजाद भी इसलिए हुए क्योंकि हिन्दू मुस्लिम सभी ने एक साथ आंदोलन किया था, अपना बलिदान दिया था, वरना हमारे राजाओं ने तो पहले ही मुगलों को सत्ता सौंप दी थी।

कोरोना के इस विपदा के लिए नमस्ते ट्रम्प, मध्यप्रदेश की सत्ता का मोह और अब कुंभ और बंगाल-असम चुनाव की सत्ता के मोह को दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। बिलखते लोग, टपकती लाशों पर ठहाका की बात भी बेमानी होने लगा है क्योंकि जिन्हें धर्म देश समाज से प्यारा सत्ता हो गया उनसे कितनी भी तरह की उम्मीद ही बेमानी है। लोकतंत्र को वे समझते है या जीते हैं परिवार चलाने के चिंतन को समझते हैं या परिवार को जीते हैं। क्योकि लोकतंत्र की पहली इकाई परिवार है। प्रभु राम जब दंडकारण्य पहुंचे और कई ग्रामों को राक्षसों की गुलामी से मुक्त करने लगे तो उनके समक्ष भी यह सवाल आया कि आखिर कोई समाज सामूहिकता से कैसे रह सकता है। तब प्रभु राम ने लोगों को परिवार बुद्धि से चलने का मार्ग बताया था। उन्होंने कहा था कि एक परिवार में माता-पिता आजीविका उपार्जित करते हैं, या केवल पिता धनार्जन करता है, किन्तु सबसे अधिक व्यय बच्चों पर किया जाता है। यदि एक व्यक्ति रुगण हो जाये तो उसके हिस्से का कार्य भी कर देते हैं। पिता समर्थ है तो बाहर का काम कर अजीविका अर्जित करता है, घर में जो कठिन कार्य है, जिसे पत्नी व बच्चे नहीं कर सकते, वह भी करता है और यथा आवश्यकता अपने परिवार की रक्षा भी करता है। क्योंकि वह समर्थ है और अपने को परिवार का अंग मानता है। यदि किसी दुर्घटनावश पति बीमार या पंगु हो जाये तो पत्नी बाहर का काम कर धर्नाजन भी करती है, पति की सेवा भी करती है, बच्चों को भी देखती है और घर का काम, खाना-पकाना भी करती है। यही नहीं कमजोर बच्चों को विशेष संरक्षण व ज्यादा दुलार भी मिलता है। 

यही स्थिति देश और समाज की है। जिस तरह से परिवार में एक व्यक्ति का स्वार्थ परिवार को बिखेर देता है उसी तरह से देश व समाज में भी ऐसे स्वार्थी लोगों से मुसिबत आ जाती है। प्रभु राम ने इसका उपाय भी बताया है कि ऐसे लोगों का बहिष्कार किया जाना चाहिए क्योंकि फिर उसकी प्रवृत्ति राक्षसी होने लगी है। जरा देर रुक कर सोचिए? क्या यह सब नहीं हो रहा है? परिवार का दर्द, बच्चों का जो दर्द जानता है वही जनता का दर्द समझ सकता है।

इस देश में भी सभी जाति और धर्म के लोग बसे हुए है। प्रभु राम ने उनमें कोई विभेद नहीं किया, सबको सत्य और न्याय के एक तराजू में तौला लेकिन जो लोग राम के नाम पर सत्ता हासिल कर रहे है वे क्या कर रहे हैं। अपने धर्म को श्रेष्ठ बताते तो है लेकिन धर्म के मार्ग पर क्या कोई चल पा रहा है। धर्म ग्रन्थ में  ऐसे कितने ही उदाहरण है जब विपदा का प्रतिकार में सबका एका रहा। आज भी इस देश में कोरोना से लडऩे की जो कहानी आ रही है, क्या वह उन कुंठित धर्मावंलियों को उनकी कुंठा से बाहर निकलने का मार्ग नहीं दिखाता। मंदिर-मस्जिद सहित कितने ही जगह कोरेन्टाईन सेंटर खुल गये, सिख समाज, जैन समाज लंगर चला रहा, मुस्लिम युवक जान बचाने अपनी जान दांव पर लगाा रहे, एक मुस्लिम युवक ने तो अपनी बाईस लाख की कार तक बेच दी। सब तरफ सब मिलजुलकर कर कार्य कर रहे हैं। लेकिन सत्ता अब भी अपनी गलती मानने तैयार नहीं है, वह तो मीटिंग के प्रसारण से भी इसलिए डर रही है ताकि उनकी पोल न खुल जाये।

कैसे लोकतंत्र और कैसी सत्ता के साये में हम जी रहे है। जब जनहित की मीटिंग है तो इसके प्रसारण से क्या आपत्ति होनी चाहिए। क्या इस तरह की हर मीटिंग का  प्रसारण नहीं होना चाहिए ताकि जनता यह जो जान सके कि उसके जनसेवक उनके लिए ईमानदारी से काम कर रहे हैं? इससे सत्ता का भ्रम दूर होगा लेकिन जब सत्ता बेईमान हो तो वह ऐसे किसी प्रसारण के लिए कैसे तैयार होगी?

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

जन की बात-7


पहले भी कई बार इस देश के लोगों ने इस सत्ता की नासमझी, नालायकी से त्रस्त हुए हैं, इस बार कोरोना को लेकर सत्ता ने जिस तरह से लापरवाही की, उसका परिणाम सबके सामने है, मुफ्त ईलाज और घर पहुंच सेवा करने की बजाय वह अब भी राज्यों में सत्ता हासिल करने और बहुसंख्य हिन्दु को खुश करने कुंभ के आयोजन को प्रश्रय देने में लगी रही।

यह सत्ता का खेल था, उनकी इच्छा थी, उनकी आवश्यकता थी या एक तरह का रोग था, कहना कठिन है लेकिन नोटबंदी, पूर्व सूचना के लॉकडाउन, निजीकरण, किसान बिल, सीएए सहित अनेक उदाहरण है। कल के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद अब तो आम लोग भी बोलने लगे हैं कि इस सत्ता के शिष्ट अथवा संस्कृत व्यवहार की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। वह लोगों को अकारण परेशान कर सकते है सकारण भी।

ऐसे में क्या पीड़ा और अपमान को चुपचाप पी जायें? क्या इस लोकतांत्रिक देश में काएई अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकता? ऐसे लोगों को देशद्रोही कहने का अधिकार सत्ता को किसने दिया है? बलात्कारियों का, हत्यारों का सिर्फ हिन्दू होने पर संरक्षण का कैसा अधिकार चल रहा है। क्या इस देश के लोग टैक्स नहीं देते तब उन्हें इस आपदा में भी मुफ्त ईलाज कोई सरकार न दे तो इसका क्या मतलब है। क्या लोगों को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार नहीं है, जब सब मनुष्य समान है तो फिर धर्म के आधार पर भेद क्यों? जब राज्य चलाने बराबर टैक्स भरत हैं तब इस आपदा में भी मुफ्त ईलाज क्यों नहीं।

दुख तो इस बात का है कि सत्ता के पास इस कोरोना के त्राहिमाम् का कोई समाधान नहीं है, और वह एक नये तरह का खेल दिखाकर (संदेश) चला जाता है। ये ठीक है कि इन दिनों देश को बदलने की कोशिश की गई? अपने हिसाब से सत्ता ने देश को हांका है लेकिन लोगों को पीड़ा पहुंचाकर, या पीडि़त को उसके हाल पर छोड़कर सत्ता चालने की परम्परा क्या उचित है। ऐसा नहीं है कि पूर्व के सरकारों ने लोगों को सर आंखों पर बिठा रखा था लेकिन इस सत्ता ने तो एक के बाद एक ऐसे निर्णय लिये  है या लापरवाही की है जिससे आप लोग ही ज्यादा प्रताडि़त हुए हैं।

डब्ल्यूएचओ की दिसम्बर से ही चेतावनी देने के बाद भी निर्णय लेने में मार्च बिता देना, फिर दूसरी लहर की चेतावनी के बाद भी लापरवाह रहना क्या सत्ता के लिए उचित था? क्या इस घोर लापरवाही की सजा आम जन नहीं भुगत रहे हैं, भुगत ही नहीं रहे अब तो लाशें गिरनी लगी हैं। ये ठीक है कि यह देश मर्यादा पुरुषोत्तम राम का देश है लेकिन यदि जनता अमर्यादित हो गई तब क्या होगा? किसान आंदोलन से गुस्साएं लोगों ने किस तरह से भाजपा विधायक को पिटा यह संकेत नहीं है कि मर्यादा की भी अपनी सीमा है, पीडि़त जन जब सड़कों पर उतरते हैं तो  फिर क्या होता है?

अब तो पूरी देवभूमि भगवान के भरोसे हो चली है, सत्ता अब भी राजनैतिक स्पर्धा में मस्त है, विपक्ष के सुझाव भी उन्हें देशद्रोह लगता है, हालात का चित्रण भी उन्हें बर्दाश्त नहीं है। वे  अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि आजादी के सत्तर साल के कठिन परिश्रम ने देश को उन्नति के नए शिखर तक पहुंचाया है, ये ठीक है कि इस दौरान सत्ता कहीं कहीं निर्दयी हुई है लेकिन इस परिश्रम को सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ के लिए सिरे से नकार देना, कौन सी प्रवृत्ति है।

देश के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौत के प्रति क्या सत्ता की कोई जवाबदेही नहीं बनती, क्या केन्द्र सरकार इतनी संवेदनाशून्य है कि वह अपनेे नागिरकों को मुफ्त में ईलाज तो छोड़ वैक्सीन तक नहीं लगा सकती। संघ तो अपने को संस्कारी और सेवाभावी कहकर अपनी पीठ ठोकता रहा है तब उसका डिग्रीधारी की निष्ठुरता, संवेदनहीनता, अमर्यादित बोल से संघ के कथित संस्कार पर उंगली नहीं उठना चाहिए। सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था, खुली आंखों से महामारी के प्रकोप का तांडव सबके सामने है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लापरवाही स्पष्ट थी, बगैर मास्क की रैलियां, कुंभ स्नान मौत को आमंत्रित करने जैसा था। लेकिन, संघ के संस्कार, झूठ और नफरत की राजनीति से उन पढ़े लिखे लोगों का विवेक भी चला गया है जो इस देश की प्रगति में आगे रह सकते हैं, सत्ता के अन्याय का खिलाफत कर सकते है। पता नहीं हिन्दू-मुस्लिम के बीज ने उन्हें क्या बना दिया है कि वे सच को जानते हुए भी सत्य का समर्थन नहीं कर पा रहे हैं। क्या वे हिन्दुत्व के उस खतरे से डरे हुए हैं कायर हो गये हैं जो कभी संभव ही नहीं है। जिन्हें लगता है कि वह मर रहा है, मुझे क्या? मैं सुरक्षित हूं, तो वे जान ले जाति-धर्म देखकर आपदा प्रहार नहीं करता। यदि आप यह सोचते हैं कि अस्पताल में सिर्फ वे ही जायेंगे तो यह भी भूल है। और हां एक बात और समझ लो जिन लोग इसे नियति मान कर जी रहे हैं या खामोश है वे जान लें कि नियति मानकर अपने अधिकार के लिए नहीं लडऩा सत्ता की राक्षसी प्रवृत्ति को ही बढ़ावा देना है, नियति उन लोगों का गढ़ा शब्द है जो अपनी सत्ता की दुर्बलता को छुपाना चाहते हैं।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

जन की बात-6

 

विभिन्न प्रदेशों में रिकार्ड मौतें, देश में कोरोना ने नया रिकार्ड बनाया और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन में देश को लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बताना क्या यह संकेत नहीं है कि बंगाल का चुनाव तो निपट जाने दो।

जब भी इस देश को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया है अजीब सा सन्नाटा पसरा है, इस बार तो मरघट सी शांति रही। ये ठीक है कि कुछ लोगों को केवल धार्मिक स्थल और श्मशान में ही शांति मिलती है लेकिन उनका क्या जो घर परिवार में, समाज में, सुख-शांति से रहते हैं। हमने इसी जगह पर कितनी बार लिखा है कि चुनाव में मुद्दा नागरिकों के मूल-भूत सुविधा होनी चाहिए, जाति-धर्म से उपर उठकर व्यवस्था पर वोट डालना होगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार पर वोट हो लेकिन न किसी सत्ता ने इसे स्वीकार किया न ही किसी धार्मिक और जाति से बंधे कुंठित लोगों ने ही माना।

तब, जब आज महामारी की इस भीषण त्रासदी से लोग प्रभावित हो रहे है तो भी सत्ता उन्हें धर्म और जाति में ही उलझाने में लगी है। हमने बार-बार कहा है कि सत्ता का एक ही चरित्र हो गया है वह अपनी रईसी और सत्ता बरकरार रखने के लिए फूट डालो राज करो की नीति का ही इस्तेमाल करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस संबोधन से रही-सही उम्मीद भी न टूटी हो तो शायद कोविड के ट्रिपल म्यूटेंट की प्रतीक्षा का इंतजार कर लें। क्योंकि सत्ता कभी भी अपना दोष नहीं देखती, वह निर्दोष होती है? दोष तो बेबस जनता की आखों में है जो खुद तो कुछ करती नहीं सारा दोष सत्ता पर मढ़ देती है?

सोशल मीडिया में मोदी विरोधी अपना भड़ास निकाल कर जनता को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्हें तो मंदिर चाहिए था, वे अस्पताल या स्कूल की मांग कब की थी, सत्ता से लेकर पूरी मीडिया भी इस दूसरी लहर के लिए जनता को ही दोषी ठहरा रही है। जिस देश में आज भी लोग स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में, दो जून की रोटी की आपाधापी और परिवार पालने के संकट से मर रहे हो वहां सत्ता और मीडिया का कहना कि जनता लापरवाह है वह घर में बैठे तो फिर उनकी बुद्धि पर सवाल उठना ही चाहिए?

क्या सत्ता की ताकत है कि वह अपने देश के लोगों को इस महामारी में भी बिठा के खिला सके, और मुफ्त में ईलाज कर सके? जब यह ताकत ही नहीं है, और वे खुद देश के संस्थानों को एक-एक कर बेच खा रहे है तो फिर जनता कैसे घर में बैठकर जी सकती है? यह सवाल क्या मीडिया को नहीं उठाना चाहिए? यह देश का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें सत्ता सौंपी है जो यह भी नहीं कह पा रहा है कि जनता घर में रहे, हम भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था मुफ्त कर रहे है? कोरोना से बचने के लिए घर में ही रहने की वकालत करने वाली सत्ता में है इतनी हिम्मत कि अपने देशवासियों या प्रदेशवासियों को यह दे सके। नहीं है, उसे तो अपनी रईसी बरकरार रखी है, वे सुविधा को लेकर जो भी फैसले लेंगे अपने लिए लेंग।

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

जन की बात-5

 

कोरोना, कोरोना, कोरोना... सब तरफ एक ही दृश्य, त्राहिमाम् त्राहिमाम्! इस देश के लोग बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के है इसलिए इसे ईश्वर का प्रकोप भी माना गया। धार्मिक हम भी है इसलिए जब चारों ओर करुण क्रुदन और लाशें दिखने लगी तो मन में यह सवाल भी आया कि ईश्वर आखिर हमें यह क्यों दिखाना चाहता है, ऐसा क्या पाप हुआ है जो ये दिन देखने पड़ रहे हैं, अपनों की पीड़ा में भी हम कुछ खास सहायता के लिए प्रस्तुत नहीं हो पा रहे हैं, अपनों के चेहरे तक नहीं देख पा रहे हैं?

और हमारी ही बनाई हुई सत्ता बड़े ही निर्लजता से कुंभ की अनुमति दे रहा है, चुनौवी रैली में भीड़ के सामने खुशी महसूस कर रहा है, क्या यह इस सत्ता को चयन करने का पाप भोग रहे हैं, नहीं नहीं इस रोग से तो पूरी धरती पी़ि़त है, शहर व कस्बों के जीव जंतु भी इस कहर से कहां बच सकें है, वो तो भला हो ईश्वर का कि अभी तक मनुष्यों ने जीव-जन्तु को बगैर धर्म से जोड़े सेवा कर रहे हैं, आवारा मवेशियों, स्वान और चिडिय़ों को भोजन दे रहे हैं।

वरना कुंठित धर्मालंबियों ने गाय-बकरा पता नहीं किस किस पर अपनी राजनीति साधने की कोशिश नहीं की है, गनीमत है गौ पालन का अधिकार छिनने का फरमान नहीं सुनाया गया। पिछले कुछ सालों में इस देश के लोगों ने क्या कम सत्रांश झेला है, नोटबंदी, जीएसटी जैसे मनमानी को छोड़ भी दे तो छिनता रोजगार, बढ़ती महंगाई से मध्यम वर्ग क्या गरीब नहीं होता जा रहा। उपर से बैंकों का कहर क्या मध्यम वर्ग को चूस नहीं ले रहा है, स्टेट बैक जब कहता है कि उसने मिनिमम बैलेंस से तीन सौ करोड़ से अधिक कमाये हैं तो क्या ये पैसे मध्यम वर्ग के नहीं है, या गरीबों के नहीं है, पेट्रोल-डीजल पर टैक्स क्या खून की आखरी बूंदे निचोड़ लेने का उपक्रम नहीं है। लेकिन हमारी धार्मिक आस्था ने सरकार की झूठ, नफरती किया कलाप और मनमानी को यह सोचकर नजर अंदाज नहीं किया कि हिन्दू राष्ट्र जरूरी है और इस देश के अल्पसंख्यकों और आरक्षित वर्गों के द्वारा हमारे अधिकार छिने जा रहे हैं, जबकि अल्पसंख्यकों और आरक्षित वर्गों को संरक्षण देना सरकार का काम है। 

ये ठीक है कि कांग्रेस ने भी बहुसंख्यक समाज की अनदेखी की, लेकिन इस देश की सामाजिक एकता को कभी खंडित नहीं किया, अपने शासनकाल में कई अभूतपूर्व निर्णय लिये, विकास के नये आयाम खोले, प्रेम के फूल भी खिलाये ये अलग बात है कि इस फूल में कीड़े लगने को नहीं रोक पाये। इसके लिए मैं आज भी कांग्रेस को दोषी मानता हूं कि फूल में लगने वाले कीड़ों का समुचित उपचार किया होता तो देश में प्रेम और सुगंध को ग्रहण नहीं लगता।

कोरोना भीषण महामारी के रुप में आया है, मित्र हो या सत्ता, उसकी असली परीक्षा तो आपदा काल में ही होती है और आपदा काल में सत्ता में दायित्वबोध न हो, जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले और केवल, सत्ता बचाने या उसे हासिल करने का ही उपक्रम करे तो इसका मतलब क्या है? यह उपक्रम तो वे लोग लगभग सौ सालों से कर रहे थे, तब कहीं जाकर सत्ता मिली है लेकिन अब भी इस देश के तीस फीसदी तो छोडिय़े बीस फीसदी भी हिन्दू यदि उनके साथ नहीं है तो इसकी वजह इस देश के अराध्य राम-कृष्ण है, इस देश के दर्शन में विवेकानंद, नानक कबीर है इस देश के हवा पानी में टैगोर, सुभाष, भगत सिंह आजाद हैं इस देश के जड़ में गांधी, नेहरु, पटेल हैं। 

इसलिए वे जड़ को काट देना चाहते हैं, इसलिए े राम-कृष्ण भगत-आजाद, विवेकानंद का सहारा लेना चाहते हैं, ताकि लोगों को भ्रमित कर सके। लेकिन ईश्वर जानते हैं कि जीवन क्या है, समाज में न्याय, सत्य का क्या महत्व है वे सिर्फ न्याय नहीं करते परीक्षा भी लेते हैं। तब अहिल्या प्रसंग में विश्वामित्र की स्वीकारोक्ति को याद करना चाहिए कि बड़ी मुश्किल से, बड़े छल-प्रपंच से जब सत्ता मिलती है तो उसका मोह भयावह होता है, सत्ता अन्यायी और झूठ परोसती है जनता को दिग्भ्रमित किया जाता है और यही राक्षसी प्रवृत्ति है।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

जन की बात -4

 

 अब भी कई थे लेकिन जवाब कहीं से नहीं आ रहा था, एक तरफ सत्ता इस महामारी से लडऩे का अंडबर कर रही थी तो दूसरी तरफ वही सत्ता चुनावी रैली में भीड़ देखकर खुशी मचा रहा था, संवेदनहीन सत्ता को देवभूमि में गिरती लाशें क्या दिखाई नहीं दे रहा था या फिर सत्ता की महत्वाकांक्षा ने उसे संवेदनशून्य कर दिया था।

परीक्षा में कठिन सवाल पहले हल करने की बात पर बहस होने लगा था, यह बात वही व्यक्ति कर सकता है जो यह तो मूर्ख हो या धूर्त! क्योंकि वह अपनी धूर्तता से बातों में लोगों का उलझा देना चाहता है ताकि मूलभूत जरूरतों की ओर से लोगों का ध्यान हट जाए और लोग फिजूल की बातों में लग जाए। पिछले सालों से इस देश में क्या यही नहीं चल रहा है?

तब कोरोना की भयावक स्थिति को निपटने और लोगों की जान माल की सुरक्षा करने का दायित्व क्या सरकार का नहीं है? यदि है तो इसका एकमात्र उपाय है जो सत्ता नहीं कर रही है, वह उपाय है सभी का मुफ्त में ईलाज, घर पहुंच सेवा और सभी तरह के उन आयोजनों की बंदिश जिसमें भीड़ जुटती है।

लेकिन हैरानी तो इस बात की है कि जो लोग मरकज में जुटे भीड़ पर विषवमन करते है वे कुंभ या चुनावी रैली की भीड़ पर बोलने से कायर डरपोक हो जाते हैं।

तब जब सब तरफ उदासी, सन्नाटा व रोशनी की उम्मीद खत्म होने लगी हो, कितने ही परिवार पर कहर टूट पड़ा हो तब सत्ता की बेरुखी से लोकतंत्र के प्रति अविश्वास क्या कम नहीं होगा? जबकि सत्ता को मानव समाज के हित के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए?

और एक बात...

तुम ही राम हो...

क्या तुमने लाशें देखी है

नहीं, तुमने तो कोरोना के

कहर से तड़पते लोग भी

नहीं देखे हैं।

मैं जानता हूं कि

परिस्थितियां विपरीत है

दूर से अंधेरा आता

दिख रहा है

लेकिन कब तुमने

रोशनी की व्यवस्था की?

गिरती लाशें, बिखरता परिवार

और आंसुओं के सैलाब

पर भी जब हिन्दुत्व

भारी हो जाए तो 

व्यक्ति रावण हो जाता है,

दरअसल रावण व्यक्ति नहीं 

रावण प्रवृत्ति है।

रावण का मतलब

शिव भक्त होना नहीं है,

और न ही रामेश्वरम् बना देना,

रावण का मतलब है अन्याय,

तब स्वयं को, हर एक को

राम बनना होगा

सत्ता के इस अत्याचार पर

बोलना होगा

बेधड़क, निडर!

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

जन की बात-3

 

राम इस देश की मिट्टी, हवा, पानी कण-कण में बसे हैं, इससे किसे इंकार है लेकिन हम राम को मानने का ढकोसला करते हैं, आडंबर करते हैं, चिख-चिख कर जय श्री राम का नारा लगाते हैं लेकिन राम के मार्ग पर चलने से हिचकते हैं, दूर भागते है, राम के नाम पर लूट का जो परिदृश्य इस देश ने देखा है वैसा शायद किसी भी देश ने अपने देवता, गॉड या अल्लाह के नाम पर लूट नहीं देखा होगा।

इस कोरोना काल में भी सत्ता का चरित्र हिंसक है, संवेदना शून्य है। ऐसे में जो लोग प्रभु राम को पढ़े हैं उन्हें याद दिला दूं कि जब ताड़का वध के लिए गुरु विश्वामित्र ने राम को मांगा तो राजा दशरथ की स्थिति खराब हो गई वे वचन भंग करने तक तैयार हो गये लेकिन राजपुरोहित वशिष्ट ने विश्वामित्र को राम सौंप दिया। राम के साथ लक्ष्मण भी चले आए थे राह में गुरु विश्वामित्र ने दशरथ की स्थिति को वर्णित करते हुए और राक्षसी प्रवृत्ति के विस्तार को लेकर कहा कि जब कभी बुद्धि विलासी हो जाती है तो सत्ताधीस, डरपोक, कायर और कमजोर हो जाता है तब वह अपना पाप छुपाने का उपक्रम करता है, जनकल्याण से दूर हो जाता है, और वे ऐसे फैसले लेने लगते है जिससे आम आदमी की तकलीफे बढ़ जाए।

क्या राम के नाम पर ढकोसला करने वाली सत्ता ने इसे नहीं पढ़ा? या उसके लिए राम सिर्फ सत्ता प्राप्त करने का साधन मात्र है? प्रधानमंत्री वह होता है जिसके लिए प्रजा की ईच्छा सर्वोपरि हो लेकिन क्या ऐसा हो रहा है। वह तो अपने लिए सुख, विलास, सम्पन्नता और अधिकार को ही महत्वपूर्ण समझता है। तब अन्याय को बल मिलता है। क्या यह समय इसी तरह का नहीं हो चला है। पहले मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने का मोह और अब बंगाल, असम में सत्ता हासिल करने का मोह क्या कोरोना से गिरती लाशों के लिए जिम्मेदार नहीं है? हर विरोध को देशद्रोह, या हिन्दू विरोधी कहकर हम किस तरह का देश बनाना चाहते हैं?

इतिहास इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि हम अच्छी बातें सीखें और बुरी बातों से सबक लें। जिन लोगों ने भी मानवीय समानता और सबके प्रति न्याय की अनदेखी कर अपनी जाति और धर्म को श्रेष्ठ माना उसने इस संसार को, अपने देश को मुसिबत में डाला है। बीते सालों में इस देश को क्या मिला? हमने इतिहास से सबक लेने की बजाय इतिहास को कुरेदकर गलत व्याख्या की। जो काम अंग्रेजी सत्ता ने अपने राज्य लंबे समय तक चलाने के उपक्रम में फूट डालो राज करो का खेल खेला, आजादी के आंदोलन के प्रभाव को रोकने हिन्दू-मुस्लिम का आयोजन किया, क्या यह सत्ता के लिए अब भी जारी नहीं है।

याद कीजिए ताड़कावन में राक्षसों के प्रभाव को लेकर जब आर्य राजाओं ने चुप्पी साध ली तब विश्वामित्र ही ऐसे थे जो भविष्य को लेकर चिंतित थे, तब प्रभु राम ने गुरु विश्वामित्र से पूछा था कि आर्य राजाओं ने ताड़कावन क्षेत्र में राक्षसों का अधिकार स्वीकार कैसी कर लिया। राम के इस प्रश्न पर लक्ष्मण ने बड़े ही भोलेपन से कहा था जैसे रघुकुल पर कैकेयी का अधिकार सम्राट दशरथ ने स्वीकार कर लिया है न, गुरुवर?

लेकिन लक्ष्मण की कटुता पर हंसते हुए गुरु विश्वामित्र ने कहा था कि आर्य राजाओं ने न केवल राक्षसों का अधिकार स्वीकार कर लिया था बल्कि राजाओं ने यह कहकर भी समर्थन किया कि अत्यंत प्राचीन काल में पहले भी यहां राक्षसों की बस्ती थी। गुरु कहते जा रहे थे- यदि प्राचीन इतिहास के आधार पर ही राज्यों की सत्ता का निर्णय होगा, तो एक समय रावण ने अनरण्य की हत्या कर अयोध्या भी जीत ली थी तो क्या दशरथ अयोध्या भी रावण को दे देंगे?

क्या यह उन लोगों के लिए सबक लेने की बात नहीं है जो इतिहास के आधार पर सत्ता का निर्णय चाहते हैं, तब क्या हम वापस उसी राह पर चले जायें जहां जंगल राज था, सभ्यता नहीं था, यह देश सैकड़ों राज में खंडो में बंटा था। जो लोग अंग्रेजों के फूट डालो राज करो के परिणामस्वरुप पाकिस्तान बनने के परिदृश्य को भी नहीं देख पा रहे हैं वे कोरोना के लिए मोदी सत्ता की जिम्मेदारी कैसे तय कर पायेंगे? (जारी...)