गुरुवार, 18 जुलाई 2024

भूपेश को चौतरफा घेरने में लगी भाजपा...

 भूपेश को चौतरफा घेरने में लगी भाजपा...


छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश वघेल को घेरने में लगी भाजपा ने अब नया दांव खेला है, क्या इस नये दांव में भूपेश बघेल भाजपा के घेरे में आ जायेंगे या फिर भूपेश बघेल को बदनाम कर यह राजनीति साधने का सिर्फ जरिया मात्र बनकर रह जायेगा।

राजनीति के जानकारों का अपना अपना दावा है, लेकिन भूपेश सरकार के दौरान हुए घपले-घोटालों को लेकर विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी-शाह  के जो तेवर थे, वह कुंद पड़   गया  है कहा जाय तब भी ग़लत नहीं होगा।

करोड़ो रूपये के कोयला और शराब घोटाले में कार्रवाई तो जरूर हुई है लेकिन इस कार्रवाई को लेकर कई तरह के सवाल भी उठने लगे है। भाजपा लगातार दावा करती रही कि भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जायेगा। गृह मंत्री अमित शाह तो एक कदम आगे बढ़‌कर भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाकर सीधा कर देने का दावा करते रहे लेकिन इन दोनों मामलों में कार्रवाई पर नजर डाले तो गिरफ्‌तारी से आईपीएस अफसरों और बड़े नेताओ को छोड़ दिया गया है। यहां तक की कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल को भी  अभी तक ढूंढा नहीं जा सका है जबकि पूर्व मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल से तार जुड़े होने का दावा मी धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है।

कहा जाता है कि यही स्थिति महादेव एप के मामले में भी बन गई । इस मामले में भी अब तक केवल छोटी मछ‌लियों पर ही कार्रवाई  की गई है। कहने को तो महादेव एप से जुड़े तीन सौ लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है. कुछ लोगों को तो नौकरी से बखस्ति तक कर दिया गया है। लेकिन इस मामले में भी अब तक जिन्हें बड़ा खिलाड़ी बताया जा रहा था   उनकी गिरफ्तारी तो दूर एफ़आईआर में नाम तक नहीं है।

कहा जाता है कि इस मामले में भी आईपीएस अधिकारियों को बख्श दिया गया।

तब सीजी पीएससी घोटाले की जांच जब सीबीआई ने शुरू कर ही है तो क्या अब बड़े राजनेताओं पर गिरफ्तारी का फन्दा कसेगा ।

सीबीआई सूत्रों की माने तो पीएससी घोटाले को लेकर दर्ज एफ आई आर में भी किसी नेता का नाम नही है। हालांकि सीबीआई ने जाँच कल ही शुरू की है और उसने शुरुआती कार्रवाई में पीएससी  के पूर्व अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी, सचिव जीवन  किशोर ध्रुव और परीक्षा नियंत्रन वासनिक के घर और दफ्तर में कागजात जब्त किये है।

ऐसे में सबसे बड़ा‌ सवाल यह है कि क्या इस पूरे खेल में कोई राजनैतिक ध्येय छिपा है और आईपीएस और नेताओ को छोड़ा गया है।

इधर सूत्रों का दावा है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को घेरे में लेने की कोशिश अब अंतिम चरण में है और इसके बाद क्या होगा यह देखना होगा।

बुधवार, 17 जुलाई 2024

विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 उद्योग पति और शासन-प्रशासन का गठ‌जोड़ छतीसगढ़ में भी


विकास के नाम पर सत्ता कैसे-कैसें खेल खेलती है, यह सिर्फ तूतीकोरिन में उद्योगपति के इशारे पर मारे गये  पुलिस द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों से समझ पाना मुश्किल है। इस तरह का खेल इन दिनों सत्ता के लिए सहज और आम हो गई है। क्योंकि इस तरह की घटना के बाद जाँच और न्यायालयीन प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि न्याय का कोई मतलब ही नहीं रहता।


स्टरलाइट कंपनी के इशारे पर पुलिम द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने के मामले में मद्रास हाइकोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी  पर बात


करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़

को लेकर उठते सवाल क्यों महत्वपूर्ण हो चले है। विकास किस शर्त पर होना चाहिए और सत्ता की पैसों की भूख की सीमा क्या है? इस दौर में यह सवाल इसलिए बेमानी है क्योंकि राजनेताओं का संगठित गिरोह ने लूट का नया तरीका अख़्तियार किया है। जिसने अब सीधे सीधे लोगों की जान से खिलवाह करना शुरू कर दिया है।

सवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र प्रेम का नहीं है, और न ही सवाल इलेक्ट्राल बाण्ड लेने के चलते उन दवा कंपनियों की जांच रोक देने का है जो जहर परोसने आमादा थे। सवाल तो यही है कि क्या अब सत्ता में बैठे लोगों ने यह तय कर लिया है जब तक वे हैं, मौज कर ले, मरने के बाद किसने देखा है कि दुनिया का क्या होगा?

और इसी ख़तरनाक सोच ने आम आदमी का जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।


छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड सत्ता और कार्पोरेट का विभत्स चेहरा नहीं था? या फिर दुर्ग जिले के बेरला स्थित स्पेशल ब्लास्ट  फैक्टरी में हुए मौत का तांडव !

 घटना के बाद खूब हो हल्ला हुआ लेकिन क्या इस कंपनी के सभी संचालक गिरफ्तार हुए। कार्रवाई के पर किस तरह की खाना-पूर्ति की गई। उस पर क्या कांग्रेस भी सवाल उठायेगी?

छत्तीसगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार को लेकर तिल्दा और रायगढ़ में जनसुनवाई हो रही है। किसानों के जनसुनवाई स्थगित करने के एलान के बाद भी शासन - प्रशासन मुस्तैद है। और यदि सत्ता चाह ले तो किसानो से जमीन छिने जाने से कौन रोक सकता ।


क्या हर तरह के विरोध के बाद हसदेव अरण्य की कटाई को रोका गया, विरोध करने वालों को हिरासत में लेकर जिस तरह से वृक्षों  की कटाई की गई उसके आगे पर्यावरण को लेकर बनी तमाम संस्थाएं किस तरह मौन है? आख़िर यह परियोजना भी तो मित्र-प्रेम की इबादत है।

तब मद्रास हाईकोर्ट में चल रहे स्टरलाईट कंपनी से जुड़े इस मामले पर न्याय होगा !

कहना कठिन इस लिए भी है क्योंकि 2014 के बाद से सुनवाई के दौरान न्यायालय का ग़ुस्सा और फ़ैसले में एका दिखाई ही नहीं देता।

 स्टरलाईट के विस्तार के विरोध में ही प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने की इस घटना की सुनवाई के दौरान मद्रास हाइकोर्ट के जजों ने जिस तरह से सीबीआई की जाँच पर नाराजगी जाहिर करते हुए इस मौत को नियोजित बताया है क्या फ़ैसले में यह दिखाई देगा?

घटना 2018 की है, २२ और 23 मई 2018 की यह घटना स्टालाईट् के विस्तार को लेकर जनसुनवाई के दौरान हुई। जनसुनवाई के विरोध में आसपास के क्षेत्रों के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। और जब पुलिस ने कार्रवाई शुरु की तो प्रदर्शनकारी भागने लगे और इन्हीं भागते प्रदर्शनरियों को यानी उनकी पीठ पर गोली मारी गई। 13 लोगों की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण स्टरलाईंट् के कापर स्मेलटर इकाई को बंद करने की माँग कर रहे थे।

छत्तीसगढ़ के तिल्दा और रायगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार का विरोध हो या हसदेव अरण्य की कटाई का विरोध प्रदूषन संबंधी चिंता ही प्रमुख वजह है।

तब सवाल यही खड़ा होता है कि क्या हसदेव की कटाई नहीं रोक देनी चाहिए। हालांकि इस मामले में कांग्रेस ने विरोध जरूर किया है लेकिन क्या यह विरोध सिर्फ बयानबाजी तक रहेगा या कटाई के दौरान कांग्रेसी हसदेव को बचाने वहां जायेंगे?

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...

 खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...


यह तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को ही चरितार्थ करता अन्यथा छत्तीसगढ़ में बदहाल होती कानून व्यवस्था को लेकर वे लोग आग बबूला नहीं होते जिन पर अपराधियाँ को ही संरक्षण देने का आरोप है या अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए गलत काम करने वालों को प्रश्रय देने का आरोप है।

दरअसल डबल इंजन की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ में कानून व्यवस्था की स्थिति दिनों दिन बदतर होते जा रही है, अपराधियों के हौसले बुलंद है, सरे आम चाकू बाजी और धमकी चमकी की ही खबर बस नही है, नशे का कारोबार तो फल-फूल रहा ही है, राजनैतिक संरक्षण के चलते कोल माफिया रेत माफिया, भू-माफिया सहित कई तरह के माफियाओं ने अपना खेल बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है, ऐसे में कांग्रेस ने भी सरकार को घेरने की रणनीति के तहत विधानसभा घेराव का निर्णय ले लिया है।

कांग्रेस के बढ़ते दबाव और आक्रामक रवैये के चलते सत्ता में बेचैनी बढ़ गई है । और इसी के तहत पिछले दिनों मंगलवार को गृहमंत्री विजय शर्मा ने रायपुर जिले के जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई थी। यह जनप्रतिनिधियो की बैठक थी या केवल भाजपाई विधायक और सांसद को ही बुलाया गया था, यह कहना पर मुश्किल है। लेकिन बैठक में पहुंचे जनप्रतिनिधियो से कानून व्यवथा सुधारने के लिए सुझाव मांगे गये।

कहा जाता है कि इस टेबल टॉक के दौरानअन्य विधायकों ने सुझाव भी दिये किसी ने नाईट गश्त बढ़ाने की बात कही तो किसी ने  नशे के बढ़ते कारोबार पर चिंता जताई।

लेकिन कहा जाता है कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो अपने को किनारे लगाने की भड़ास ही निकाल ली, मंत्री पद से मजबूरी में इस्तीफ़ा देने वाले मोहन सेठ ने तो यहां तक कह दिया कि कानून व्यवस्था की ऐसी बदतर स्थिति मैंने आज तक नहीं देखी।तो रायपुर पश्चिम के विधायक ने भी जमकर भड़ास निकाला ।

कहा जाता है कि दोनों ही नेताओका ग़ुस्से की असली वजह क़ानून व्यवस्था  के बहाने स्वयं की उपेक्षा को लेकर अधिक था। जबकि अन्य जनप्रतिनिधि सामान्य लहजे में सुझाव दे रहे थे। सूत्रों का कहना है कि मोहन सेठ और मूणत सेठ के इस तेवर से न केवल गृहमंत्री हतप्रभ रह गये बल्कि इसे लेकर पार्टी में भी कई तरह की चर्चा है।

हालांकि अंत भला तो सब भला की तर्ज पर मीडिया में वहीं खबरें छपी जो दोनों को कानून व्यवस्था का चिंतक साबित करें।

सिर्फ एक पेड़ माँ के नाम पूरा हसदेव माई-बाप के नाम...

 सिर्फ एक पेड़  माँ के नाम 

पूरा हसदेव माई-बाप के नाम...


प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने जब मन की बात कार्यक्रम में एक पेड़ माँ के नाम अभियान की शुरुआत की, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इस अभियान को शुरु करने का ध्येय क्या है!


वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर मास्टर स्ट्रोक का असल मकसद कुछ और होता है। नोट बंदी का असल मकसद भी विपक्ष को कमजोर  करना था तो इलेक्ट्रॉल बांड का मकसद चंदा-चकारी, जीएस टी का मतलब कापेरिट के कर्जे माफ करना था तो पी एम केयर फण्ड का मकसद वसूली ।

ऐसे में एक पेड़ माँ के नाम का मकसद क्या जंगलों को उद्योगों को सौंप देना है?



यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि  प्रधानमंत्री के आव्हान के बाद छत्तीसगढ़ के डबल इंजन की सरकार मे भी एक पेड़ मां के नाम पर एक तरफ महाअभियान छेड़ दिया तो दूसरी तरफ हसदेव अरण्य का 91 हेक्टेयर भूमि  मे पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी।

मध्यमारत का फेफड़ा कहलाने वाले हसदेव की कटाई को लेकर पर्यावरणविद् से लेकर आप आदमी विरोध जता चुके हैं लेकिन मोदी के सबसे खास मित्र गोतम अदानी की कंपनी के आगे डबल इंजन  की सरकार इस कदर नतमस्तक है कि उन्हें न तो जन विरोध की परवाह है और न ही भविष्य में होने वाले भयावह दुष्परिणाम की ही चिंता है।

इस पूरे खेल में छत्तीसगढ़ को क्या मिलेगा यह एक बड़ा सवाल है लेकिन हसदेव के 91 हेक्टेयर जमीन के नीचे दबे कोयले से जो बिजली बनेगी उससे राजस्थान को रोशनी मिलेगी, अग्रणी राजस्थान के सपने को पूरा करने राजस्थान की डबल इंजन की सरकार का कहा मानकर छत्तीसगढ़  की डबल इंजन की सरखार ने छत्तीसगढ़ का नुकसान पहुँचाने की क्या   शुरु‌कात कर दी है? या फिर यह सब कुछ मित्र-प्रेम का खेल है।


ऐसे में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का यह कहना क्या मायने रखता   है कि  'कोयला हमारे छत्तीसगढ़ का है, प्रदू‌षण भी हम ही झेलते हैं, ट्रांसपोर्ट ट्रक की सड़‌क दुर्घटना भी हम झेलें, दूसरे राज्यों को बिजली भी हम दें और हम स्वयं बिना बिजली के रहें और हमारा बिजली बिल भी हमको लूटे, यह तो अन्याय है।

लेकिन इस अन्याय से सत्ता को कब मतलब रहा है। और शायद यही वजह है कि एक तरफ़ उस पेड़ को  लगाने की नौटंकी की जा रही है जिनके बचने की कोई गारंटी नहीं है तो दूसरी ताफ मित्र-प्रेम में समू‌चे जंगल को सौंप देने की बद‌नियत…?

सोमवार, 15 जुलाई 2024

बच्चों की मौत को मौसमी बीमारी के नाम पर ढाँक रही साय सरकार

 बच्चों की मौत को मौसमी बीमारी के नाम पर ढाँक रही साय सरकार 

मलेरिया - डायरिया से बच्चों की मौत से राजनीति गर्म


छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब गरमाने लगा है लेकिन राज्य में बैठी विष्णुदेव साय की डबल इंजन की सरकार इन मौतों को मौसमी बिमारी के नाम पर अपनी लापरवाही और उदा‌सिनता से पल्ला झाड़ रही है।

सूत्रों की माने तो पिहले दो सप्ताह के भीतर मलेरिया और डायरिया से मरने वाले बच्चों की संख्या आधा दर्जन से पार हो गई है लेकिन सरकार यह मानने को तैयार ही नहीं है कि  इन मौतों के लिए सत्ता की उदासिनता जिम्मेदार है, जबकि इससे पहले बारिश शुरु होने के साथ ही स्वास्थ्य अमले को हर साल सक्रिय कर दिया जाता था लेकिन विष्णुदेव सरकार ने इस ओर ध्यान देने की बजाय मंत्रिमंडल के विस्तार और निगम मंडल में नियुक्ति के लिए दिल्ली का चक्कर लगाने के नाम पर माथापच्ची में ही लगी रही।

सूत्रों की माने तो बस्तर के संगमपल्ली पोटा केबिन में ही मलेरिया से दो बच्चों की मौत हो गई है तीस घंटे के भीतर दो बच्चों की मौत से प्रशासन में हड़‌कम्प मचा हुआ है, तो दूसरी तरफ़ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गृह मंत्री विजय शर्मा के जिले में बैगा आदिवासी की डायरिया से मौत के मामले को लेकर डबल इंजन की सरकार पर हमला करते हुए सोशल मीडिया एक्स पर कहा है कि भाजपा सरकार के आते ही डायरिया और मलेरिया से मौतें हो रही है। हमारी सरकार ने बस्तर को मलेरिया मुम्त करने का अभियान चलाया था। ये विशुद्ध रूप से भाजपा सरकार की नाकामी है।

इस पर बीजेपी प्रवक्ता शिवरतन शर्मा ने लापरवाही मानने से इंकार करते हुए इसे मौसमी बीमारी बता दिया और राजनीति नहीं करने की चेतावनी दे डाली। 

अभी भाजपा प्रवक्ता मौसमी बीमारी बता ही रहे थे कि उसी दौरान मैनपुर से खबर आ गई कि यहां के दर्रीपारा में कमार छात्र की मौत मलेरिया से हो गई।

सत्ता की इस तरह की मौतों से पल्ला झाड़ने की यह पहली कोशिश नहीं है, पहले भी ऐसी कोशिश होते रही है । लेकिन मलेरिया और डायरिया से हुई मौत को मौसमी बीमारी के नाम से पल्ला झाड़ने की कोशिय सत्ता की संवेदनहीनता को ही उजागर करता है।

ये सच है कि बारिश के दिनों में डायरिया का प्रकोप बढ़ जाता है लेकिन इसे मौसमी बीमारी बताकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता और मलेरिया से मौत तो सत्ता की लापरवाही का नमूना है।

रविवार, 14 जुलाई 2024

अब जेल जाने से कौन बचायेगा...

 बाबा रामदेव फिर फँस गये 

अब जेल जाने से कौन बचायेगा...

 क्या सुप्रीम कोर्ट से बड़े हो गये बाबा...


मोदी सत्ता के  आते ही अपने व्यापार को कई गुणा बड़ाने वाले व्यापारियों में से एक व्यापारी बाबा रामदेव का अब जेल जाना तय माना जा रहा है। हालांकि रामदेव के सिर पर किसका हाथ है यह किती से छिपा नहीं है और वे इसी ताकतवर हाथ के चलते जेल जाने से बचते रहे है।

ज्ञात हो कि पन्तजलि समूह की करतूत को लेकर चल रहे एक मामले में बाबा रामदेव ने किस तरह से हेठी दिखाई थी वह किसी से छिपा नहीं है। भ्रामक प्रचार के इस मामले में बाबा रामदेव ने किस तरह से सुप्रीम कोर्ट को बेवकूफ बनाने की कोशिश की यह बताने की जरूरत नहीं है कि बाबा रामदेव और  बालकृष्ण ने पहले माफी माँगने का नाटक किया, फिर सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ तो विज्ञापन छोटा सा छपवाया, फिर सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ तो बड़ा विज्ञापन छपवावर माफी मांगी।

इसने बाद सरकार ने बाबा रामदेव के पंतजलि समूह की 14  दवाईयों को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन जिस ततह की खबरे आ रही है इससे साफ़ हो गया है कि इन दवाओं की न केवल धड़ल्ले से निर्माण हो रहा है बल्कि पंतजलि के स्टोर में धड़ल्ले से बिक रहा है।

लेकिन इस माम‌ले की सुनवाई के के दौरान एक बार फिर बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट से झूठ  बोला कि न तो इन 14 प्रतिबंधित दवाओ का प्रचार प्रसार किया जा रहा है और न ही इसकी बिकी ही हो रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बाबा रामदेव को शपब पत्र देने कहा है।


लेकिन दूसरी तरफ़ इस मामले को लेकर हिन्दूस्तान टाईम्स ने स्ट्रीग़ आपरेशन करके बाबा रामदेव के झूठ का पर्दाफ़ाश कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (9 जुलाई) को पतंजलि आयुर्वेद को यह सबूत देने का निर्देश दिया था कि उसने अप्रैल में उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग विभाग द्वारा प्रतिबंधित उसके 14 प्रॉडक्ट्स की बिक्री और विज्ञापन बंद कर दिए हैं। इस दौरान कंपनी ने दावा किया कि उसने सभी स्टोर मालिकों, विज्ञापन आउटलेटों को उन उत्‍पादों की ब‍िक्री रोकने संबंधी सर्कुलर दे द‍िया था और मीड‍िया के जर‍िए भी इसे प्रचार‍ित कर द‍िया था। लेक‍िन, एनडीटीवी और हिंदुस्तान टाइम्स के स्टिंग ऑपरेशन में दावा किया गया है कि बैन किए गए प्रॉडक्‍ट्स अभी भी स्टोर्स में खुलेआम बिक रहे हैं।

खुलेआम बिक रहे बैन प्रॉडक्ट्स

एनडीटीवी का दावा है क‍ि उसके स्टिंग ऑपरेशन में पता चला है कि जिन 14 प्रॉडक्‍ट्स की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया है उनमें से अधिकांश दिल्ली-एनसीआर और कई अन्य राज्यों में पतंजल‍ि के फ्रेंचाइजी स्टोर्स पर ग्राहकों के लिए उपलब्ध हैं।


वहीं,हिंदुस्तान टाइम्स में भी दावा है क‍ि चार शहरों- दिल्ली, लखनऊ, पटना और देहरादून में पतंजलि स्टोर्स में जाने पर उसे वे अधिकांश उत्पाद ब‍िकते म‍िले, ज‍िन्‍हें बैन करने का आदेश है।

इस दौरान स्वासारि वटी, दृष्टि आई ड्रॉप्स, बीपी ग्रिट, मधुग्रिट, लिवामृत एडवांस, लिवोग्रिट सहित कई उत्पाद दुकानों में पाए गए। जब पूछताछ की गई तो दुकानदार ने कहा कि उसे ये प्रॉडक्‍ट्स बेचना बंद करने के लिए नहीं कहा गया है।

14 पतंजलि प्रोडक्ट्स पर लगा था बैन

दरअसल, अप्रैल में उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसने 14 पतंजलि आयुर्वेद, दिव्य फार्मेसी उत्पादों पर तत्काल प्रभाव से बैन लगा दिया है और 15 अप्रैल को उसी संबंध में आदेश जारी किया है। नियमों का बार-बार उल्लंघन करने पर औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 के नियम 159(1) के तहत यह कार्रवाई की गई है।

शीर्ष अदालत का मंगलवार का आदेश उत्तराखंड सरकार के हलफनामे के बावजूद पारित किया गया, जिसमें अदालत को सूचित किया गया था कि 15 अप्रैल को लगाया गया प्रतिबंध राज्य के एक अन्य विभाग द्वारा प्रक्रियात्मक आधार पर रद्द कर दिया गया था। जिसके बाद 8 जुलाई को पतंजलि को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। हालांकि, पतंजलि के वकील ने कहा कि कंपनी को अभी तक प्रतिबंध हटाने के संबंध में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है और कंपनी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से बंधी हुई है।


बाबा रामदेव-बालकृष्ण को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी- देश सेवा का बहाना मत बनाओ, आप चाहें कितने ऊंचे हों, कानून की महिमा सबसे ऊपर, आपने सारी सीमाएं लांघ दींपतंजलि को दाखिल करना होगा 

पतंजलि आयुर्वेद ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने उन 14 उत्पादों की बिक्री बंद कर दी है जिनके लाइसेंस अप्रैल में उत्तराखंड में एक राज्य प्राधिकरण द्वारा निलंबित कर दिए गए थे।

योग गुरु बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा स्थापित कंपनी ने जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को बताया कि उसने 5,606 फ्रेंचाइजी स्टोरों से वो 14 प्रॉडक्‍ट्स वापस लेने को कहा है। साथ ही पतंजलि आयुर्वेद ने यह भी कहा कि उसने सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स से इन उत्पादों के विज्ञापन वापस लेने के लिए कहा है।

अदालत ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को एक हलफनामा दाखिल कर यह बताने का आदेश दिया कि बैन किए गए 14 उत्‍पादों की ब‍िक्री रोक दी गई है। पतंजलि के वकीलों ने हलफनामा दाखिल करने के निर्देश को स्वीकार कर लिया है। यह हलफनामा दो सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाना है। मामले में अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।

गौरतलब है कि अदालत एलोपैथी के खिलाफ बोलने वाले वाले और कुछ बीमारियों के इलाज के दावे करने वाले पतंजलि के विज्ञापनों के खिलाफ आईएमए द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है।

मोदी सरकार का ‘मेडिकल राष्ट्रवाद’, पतंजलि को समर्थन देकर ऐसे साधी गई सियासतइन पतंजलि प्रॉडक्‍ट्स को किया गया है बैन

1. स्वसारि गोल्ड (Swasari Gold)

2. स्वसारि वटी (Swasari Vati)

3. ब्रोंकोम (Bronchom)

4. स्वसारि प्रवाही (Swasari Pravahi)

5. स्वासारी अवलेह (Swasari Avaleh)

6. मुक्तावटी एक्स्ट्रा पावर (MuktaVati Extra Power)

7. लिपिडोम (Lipidom)

8. बीपी ग्रिट (Bp Grit)

9. मधुग्रिट (Madhugrit)

10. मधुनाशिनीवटी एक्स्ट्रा पावर (MadhunashiniVati Extra Power)

11. लिवामृत एडवांस (Livamrit Advance)

12. लीवोग्रिट (Livogrit)

13. आईग्रिट गोल्ड (Eyegrit Gold)

14. पतंजलि दृष्टि आई ड्रॉप (Patanjali Drishti Eye Drop)


पतंजलि फूड्स को राहत

वहीं, दूसरी ओर पतंजलि फूड्स को राहत देते हुए, बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते कंपनी के कच्चे पाम तेल के आयात पर लगाए गए 62 लाख रुपये के बढ़े हुए सीमा शुल्क के आदेश को रद्द कर दिया। जस्टिस केआर श्रीराम और जस्टिस जितेंद्र जैन की खंडपीठ ने पाया कि तेल पर जो कस्टम ड्यूटी जो 13 मई, 2021 को रात 8.20 बजे से 9 बजे के बीच लगाई गयी थी उसे उसी दिन लगभग 9.24 बजे जारी एक टैरिफ अधिसूचना के आधार पर और बढ़ा दिया गया था। कोर्ट ने माना कि बढ़ी हुई ड्यूटी लगाना कानून के खिलाफ है। हौरतलब है कि पतंजलि आयुर्वेद समूह समूह का हिस्सा, पतंजलि फूड्स मुख्य रूप से खाद्य तेल व्यवसाय में शामिल है।

रेत माफियाओं का बढ़‌ता कहर

 रेत माफियाओ का बढ़‌ता कहर


छत्तीसगढ़ में रेत माफियाओं का कहर अब सर चढ़‌कर बोलने लगा है। हालांकि अभी मामला सिर्फ झड्प और धमकी चमकी तक ही सीमित है लेकिन यही स्थिति रही तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

प्रदेश में बारिश के मौसम में रेत उत्खनन का कार्य पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है लेकिन कई जिलों से जो खबरें आ रही है वह हैरान कर देने वाली इसलिए भी है क्योंकि खनिज विभाग मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास है और प्रतिबंध के बाद भी यदि रेत का कार्य धड़ल्ले से चल रहा है तो इसकी दो ही वजह है, या तो रेत माफियाओं को उत्खनन की छूट दे दी गई है या फिर मुख्यमंत्री से यह विभाग संभल नहीं रहा है।

हालांकि खनिज विभाग ने इस दौरान कुछ कार्रवाई की है लेकिन कहा जा रहा कि इस दौरान जितनी भी कार्रवाई की गई है वह लोगों के दबाव में की गई है और कारवाई के  नाम पर खानापूर्ति की गई है।

बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ में रेत माफियाकों की सक्रियता राज्य बनने के बाद से ही शुरू हो चुका था , इन माफियाओं को बक़ायदा राजौतिक संरक्षण भी मिलता रहा है, यही नहीं इस खेल में कहें विधायकों के रिश्तेदारो की सक्रिय भूमिका भी पाई गई है। जोगी- राज में तो तिवारी -जैन की जोड़ी ने जिस धड़ल्ले से काम किया था, उसे लोग आज भी नहीं नहीं भूल पाये हैं।

इसके बाद भी रमन राज हो या भूपेश राज रेत माफियाकों ने जमकर उत्पात मचाया । 

ऐसे में अब जब प्रतिबंधित समय में बड़े पैमाने पर खुले आम रेत का उत्खनन हो रहा है तब क्या इन्हें साय सरकार का सरक्षण है। और इस संरक्षण की वजह से ही रेत माफियाओं के पक्ष में विरोध करने वालों को डराने-धमकाने में राजस्व विभाग के अधिकारी भी खुलकर आ गये हैं।

ऐसा ही एक मामले का आडियो वायरल हो रहा है जिसमें धमतरी क्षेत्र के नायब तहसीलदार ज्योति सिंह के द्वारा जिला पंचायत सदस्य खूबलात ध्रुव के बीच बहस हैरान करने वाला है, और इससे भी ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि अभी तक ज्योति सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होना।

इधर जिला पंचायत के उपाध्यक्ष नीलू चंद्राकर के एक रेत से भरे हाइवे की चपेट  में आने से बच जाने की घटना से बवाल मच गया है हालांकि इस मामले को शांत करने की कोशिश भी हुई लेकिन जिस तरह से एनजीटी के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है वह साय सरकार के क्रिया कलापों पर सवाल उठाते हैं।