रविवार, 21 जुलाई 2024

गुजरात लॉबी का यह कैसा करतूत

 फिर जुड़‌ने लगा पीएमओ से तार…

गुजरात लॉबी का यह कैसा करतूत


इन दस सालों में का देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित्र शाह ने जो चक्रव्यूह रचा था, क्या उस चक्रव्यूह का खेल खत्म होने लगा है। पूंजी निवेश से लेकर बैंको के कर्जे ‌लेकर भागने का मामला हो या फिर भ्रष्टाचार के बड़े मामले, नीट पेपर लीक घोटाला हो या यूपीएससी का खेल ! आखिर सारे तार पीएमओ से क्यों जुड़ जाते है?

नीट पेपर लीक मामले में जिस तरह से गुजरात का गोधरा चर्चा में है। गोधरा के इस पेपर लीक मामले को लेकर हो रहे रोज खुलासे के बाद अब ट्रेनी आईएएस पूजा खेड्‌कर का मामला सामने आने के बाद एक बार फिर गुजरात लॉबी ही नहीं पीएमओ पर भी उंगली उठने लगी है। और इस विवाद के बीच जिस ताह से यूपीएससी के अध्यक्ष मनोज सोनी का इस्तीफ़ा सामने आया है वह हैरान करने वाला तो है ही बल्कि मोदी सत्ता के उस निर्णय की नीयत पर उंगली उठाता है जिसके तहत दर्जनौ लोगों को प्रोफेशनल नियुप्ति के नाम पर कहीं सचिव बना दिया गया तो कहीं अध्यक्ष या डायरेक्टर ।

यश बॉस के इस दौर में यह जान लेना ज़रूरी है कि आखिर मनोज सोनी के इस्तीफ़े को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,गृह मंत्री अमित शाह क्यों निशाने पर है।

क्या मनोज सोनी का इस्तीफ़ा फर्जी प्रमाणपत्र, सत्ता और विशेषाधिकार का कथित दुरुपयोग के बाद जिस तरह से कई आईपीएस और आईएएस के चयन पर उठ रही उंगली है। लेकिन पहले ये जान ले कि मोदी-शाह क्यों निशाने पर है। गुजरात के रहने वाले मनोज सोनी का अभी पांच साल का कार्यकाल बाकी था। सोनी ने अपने इस्तीफे में व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया है। सोनी का कार्यकाल 2029 में पूरा होना था। मनोज सोनी आयोग में 2017 में बतौर सदस्य नियुक्त हुए थे। उन्होंने 16 मई, 2023 को अध्यक्ष के रूप में शपथ ली। ऐसे में उन्होंने बतौर अध्यक्ष सिर्फ करीब 13 महीने काम किया। मनोज सोनी गुजरात के आणंद जिले से ताल्लुक रखते हैं। उनका परिवार मुंबई से गुजरात शिफ्ट हुआ था। उन्होंने बचपन के दिनों में अगरबत्तियां तक बेंची।

द हिंदू' ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उन्होंने लगभग एक महीने पहले इस्तीफा दे दिया था। सूत्रों के अनुसार वह गुजरात के शक्तिशाली स्वामीनारायण संप्रदाय की एक शाखा अनुपम मिशन को अधिक समय देना चाहते हैं। वह 2020 में दीक्षा प्राप्त करने के बाद मिशन में एक साधु या निष्काम कर्मयोगी बन गए थे। सोनी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है, जिन्होंने उन्हें 2005 में वडोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय (MSU) के कुलपति के रूप में चुना था। तब वह 40 वर्ष के थे। जिससे वह देश के सबसे कम उम्र के कुलपति बन गए थे। जून 2017 में यूपीएससी में नियुक्ति से पहले सोनी ने बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (बीएओयू) के 1 अगस्त 2009 से 31 जुलाई 2015 तक कुलपति रहे थे। इसके बाद वह अप्रैल 2005 से अप्रैल 2008 तक वडोदरा में स्थित महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा के कुलपति रहे थे। 

 सोनी गुजरात विधानमंडल के एक अधिनियम द्वारा गठित एक अर्ध-न्यायिक निकाय के सदस्य भी रह चुके हैं। मनोज सोनी की गिनती उन लोगों में होती है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र माने जाते हैं। पीएम मोदी ने मनोज सोनी के संघर्ष को देखते हुए ही मुख्यमंत्री रहते हुए एमएसयू के वीसी की जिम्मेदारी सौंपी थी। एमएसयू में मनोज सोनी के वीसी रहते हुए कई आंदोलन हुए थे, लेकिन उन्होंने नो कंप्राेमाइज का फॉर्मूला अपनाया था। आर्ट्स फैकल्टी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों से जुड़े विवाद में वह काफी सुर्खियों में रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि इस विवाद के चलते उन्हें एमएसयू में दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया था, हालांकि मनोज सोनी को बाद में बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (बीएओयू) का वीसी बनाया गया था।

तब सवाल यही है कि क्या प्रोफ़ेशनलों की नियुक्ति की वजह क्या है…?


शनिवार, 20 जुलाई 2024

नेम प्लेट- मुसलमानों के बहाने दलित-पिछड़ा निशाने पर

 नेम प्लेटः इस नफरत से उजड़ जायेंगे दलित-पिछड़े...


उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दू वोटरों के ध्रुवीकरण को लेकर कांवड़ यात्रा के मार्ग में दुकानदारों को नाम पट्टिका लगाने की अनिवार्यता थोपी है उससे मुसलमान कितने प्रभावित होंगे कहना मुश्किल है लेकिन इस आदेश से दलित और पिछ‌‌ड़े वर्ग के दुकामदार जरूर उज‌ड़ जायेंगे, क्योंकि हुए देश में सवर्ण समाज की मानसिकता अब भी नहीं बदली है और आज भी इसी भेदभाव के चलते दलितों की हत्या तक कर दी जाती है।

लोकसभा के बाद विधानसभा के उपचुनाव में हार से बौखलाए भाजपा को यदि हिंदू वोटो के ध्रुवीकारण की तलाश है तो उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी दस सीटों पर होने भाले उपचुनाव में स्वयं की कुर्सी बचा लेने का ख़तरा बढ़ गया है। और इसी खतरे को भांपते हुए ही कांवड़ यात्रा मार्ग को लेकर नाम पट्टिका वाला फरमान जारी किया गया है।

लेकिन इस फ़रमान के विरोध में खड़े लोगों को हिन्दू विरोधी तमगा देने से भी हिन्दूवादी संगठन पीछे नहीं है लेकिन क्या नफ़रत से जल रहे हिन्दुवादी इस देश के सच को देखना ही नहीं चाहते।

देश का सच भयावह है, कि आज भी सवर्ण समाज का एक बड़ा तपका दलितों और वंचितों के साथ बैठना तक नहीं चाहता । सिर्फ दलित या अति पिछड़‌ा वर्ग होने के नाम पर प्रताड़ना का दौर  कम होने का नाम ही नहीं ले रहा।गुजरात हो या राजस्थान, मध्यप्रदेश हो या उत्तरप्रदेश, आप किसी भी राज्य का नाम ले लें। सुदूर दक्षिण से लेकर उत्तर तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक अब भी वंचित या पिछड़े वर्ग के दूल्हे के घोड़ी में बैठने मात्र से हत्या की घटना सुनाई पड़ जाती है।

ऐसी परिस्थिति में यदि नाम पट्टिका की अनिवार्यता क्या इन दलित और पिछ‌ड़े वर्ग के लोगों को प्रभावित नहीं करेंगी।

भले ही हिन्दू‌वादी संगठन योगी आदित्यनाथ के इस फैसले में मुसलमानों की पराजय देख रहे हो लेकिन सच तो यह है कि इससे  सर्वाधिक प्रभावित दलित और पिछड़े वर्ग के लोग ही होंगे।

क्या इन वर्गो के द्वारा बेचे जा रहे पूजन सामग्री ख़रीदेगा,  जब बाजू में ही ब्राम्हण बनिया ठाकुर की दुकान होगी। क्या इनके खाने पीने की सामग्री भी कोई खरीदेगा यदि बगल में ही सवर्गो की दूकान होगी।

सच तो यही है कि योगी आदित्यनाथ ने जिस राजनैतिक उद्देश्य से यह फैसला लिया है उससे मुसलमान कम दलित व पिछ‌ड़े ही अधिक प्रभावित होंगे।

मॉब लिचिंग मामले में दबाव में आ गई डबल इंजन...

 मॉब लिचिंग मामले में दबाव में आ गई डबल इंजन...


आरंग क्षेत्र के महानदी पुल पर गौरक्षकों के द्वारा मॉब लिचिंग के मामले में पुलिस ने न्यायालय में दाखिल आटोप पत्र में ही तीन लोगों की मौत को पुल से कुदने की वजह बताई है। तो कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि डबल इजन की साय सरकार आरोपियों को बचा रही है इस मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग की है।

छत्तीसगढ़ को शर्मसार कर देने वाली इस घटना को लेकर जिस तरह की राजनीति की गई वह हैरान कर देने वाला है। मॉब लिचिंग की इस घटना को लेकर पहले ही दिन से सरकार की भूमिका पर सवाल उठते रहे है और जब इस मामले को लेकर कांग्रेस के नेता विकास उपाध्याय आरंग जा पहुंचे और मुस्लिम संगठनों ने प्रदर्शन किया तब कहीं जाकर हिन्दु संगठन से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

लेकिन गिरफ्तारी होते ही विश्वहिन्दू परिषद, बजरंगदल सहित गौरक्षकों ने भी प्रदर्शन कर दिया। राजधानी के कोतवाली थाने का घेराव कर वे घंटो बैठ गये और उपमुख्यमंत्री अरुण साव को धरना स्थल पर आश्वासन देना पड़ा। यहीं नहीं रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने भी इसी बहाने अपनी ही सरकार पर भड़ास निकाली।

इसके बाद से ही जनचर्चा थी कि मॉब लिचिंग के आरोपियों को बचा लिया जायेगा।

 न्यायालय में  आठ जुलाई को रायपुर की अदालत में पेश किए गए आरोप पत्र में दावा किया गया है कि ट्रक में मवेशी ले जा रहे तीनों लोगों का पांच आरोपियों ने करीब 53 किलोमीटर तक पीछा किया और इसके बाद ट्रक सवारों ने नदी में छलांग लगा दी। पुलिस ने पहले बताया था कि मवेशियों को ले जा रहे गुड्डू खान (35) और चांद मियां खान (23) की सात जून की सुबह जिले के आरंग थाना क्षेत्र में भीड़ द्वारा कथित तौर पर पीछा किए जाने के

बाद संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उनका एक अन्य साथी सद्दाम कुरैशी भी इसी घटना में गंभीर रूप से घायल पाया गया था, जिसकी 18 जून को यहां एक अस्पताल में मौत हो गई थी। उत्तर प्रदेश के रहने वाले तीनों लोग आरंग क्षेत्र में महानदी पर बने पुल के नीचे पाए गए थे, जबकि भैंसों से लदा उनका ट्रक पुल पर खड़ा मिला था। आरंग पुलिस ने तब मामले के संबंध में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 304 (गैर इरादतन हत्या), 307 (हत्या का प्रयास) और 34 (साझा इरादा) के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। कुरैशी की मौत के बाद पुलिस ने कहा था कि उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मारपीट के कारण प्राणघातक चोट लगने का जिक्र नहीं है, जिसके बाद हत्या के प्रयास का आरोप हटा दिया गया।

पुलिस ने तब मामले की जांच के लिए रायपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) कीर्तन राठौर के नेतृत्व में 14 सदस्यीय विशेष दल का गठन किया था । बाद में पुलिस ने अलग-अलग जगहों से पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 304 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि आरोपपत्र में कहा गया है, पांचों आरोपियों को संभवतः मवेशियों को ले जा रहे एक वाहन के बारे में जानकारी मिली थी। तीन कार में सवार आरोपियों ने. ट्रक का पीछा किया और लोहे की कीलें लगी लकड़ी और कांच के टुकड़े फेंक कर वाहन को रोकने की कोशिश की। ट्रक चालक ने भागने के लिए करीब 14 किलोमीटर तक गलत दिशा में गाड़ी चलाई, लेकिन आरोपियों ने उनका पीछा करना जारी रखा। जब आरोपियों द्वारा फेंकी गईं लोहे की कीलों और पत्थरों के कारण ट्रक का एक टायर क्षतिग्रस्त हो गया तो ट्रक महानदी नदी पर बने पुल पर रुका। आरोप पत्र में कहा गया है कि ट्रक में सवार तीनों लोग डर के कारण वाहन से उतर गए और अपनी जान बचाने के लिए पुल से नदी में कूद गए। इसमें कहा गया है कि पूरी घटना में आरोपियों ने करीब 53 किलोमीटर तक तेज गति से ट्रक का पीछा किया और उसे अवैधं रूप से रोकने की कोशिश की, जिससे पता चलता है कि आरोपियों को पता था कि उनके कृत्य से ट्रक में सवार लोगों की मौत हो सकती है या उन्हें ऐसी शारीरिक चोट लग सकती है, जिससे उनकी मौत हो सकती है। आरोप पत्र के मुताबिक, आरोपियों के कृत्य से भयभीत होकर तीनों व्यक्ति ट्रक से उतर गए और पुल से नदी में कूद गए, जिससे तीनों में से एक चांद मियां की मौके पर ही मौत हो गई और गुड्डू खान ने अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया। इसमें कहा गया कि सद्दाम ने करीब 12 दिनों के इलाज के बाद दम तोड़ दिया। आरोप पत्र में कहा गया है कि पुल से कूदने के बाद उसे लगी गंभीर चोटों के कारण उसकी मौत हो गई। इसमें कहा गया है कि आरोपियों का कृत्य भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304 में उल्लेखित आपराधिक कृत्य के अंतर्गत आता है। जांच के बाद आईपीसी की धारा 304 और 34 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया।

इधर आरंग पुलिस ने इस मामले गिरफ्तार किया था जिसमें हर्ष मिश्रा, राजा अग्रवाल, नवीन सिंह ठाकुर और मयंक शर्मा शामिल है जबकिकहा जा रहा है कि अन्य लोगों की गिरफतारी सत्ता के दबाव में रोक दी गई। 

इधर पुलिए के आरोप पत्र को लेकर कांग्रेस ने डबल इंजन की साय सरकार पर गंभीर आरोप लगाये है। कांग्रेस प्रवक्ता सुशीत आनंद शुक्ला ने  न्यायिक जांच कराने की मांग उठाई है। अपराधियों को बचाने आरोप पत्र में लीपापोती के दावे करते हुए पुलिस की पूरी कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला के मुताबिक कांग्रेस पार्टी इस घटना की न्यायिक जांच चाहती है। भाजपा सरकार की नीयत शुरू से ही आरोपियों को बचाने की थी। सांसद बृजमोहन अग्रवाल के बयान को ही आधार बनाते हुए पुलिस द्वारा आरोप पत्र तैयार करना प्रतीत हो रहा है।

छत्तीसगढ़ जैसे शांत प्रदेश में धर्म के नाम पर इस तरह की वारदात ने डबल इजन वाली विष्णुदेव साय सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। क्योंकि हाल के दिनों में भाजपा ने जिस तरह की  राजनीति शुरू की है उसका असर मी पड़ने लगा है, । बस्तर के नारायणपुर में धर्मान्तरण को लेकर हुए विवाद में तत्कालीन एसपी सदानंद कुमार का उपद्रकीयों ने सर फोड़ दिया था, तो बीरमपुर की घटना पर बवाल मचा  था। 

यही नहीं झंडा लगाने के मामूली विवाद के चलते कवर्धा में कर्फ्यू तक लगाना पड़ा था तो वर्तमान गृह‌मंत्री विजय शर्मा पर उपद्रव मचाने के आरोप में जुर्म दर्ज हुआ था और विजय शर्मा सहित दर्जनों भर लोगों को जेल भी जाना पड़ा था।

ऐसे में इस शांत प्रदेश में हुए मॉब लिचिंग की घटना किसी भी सत्ता के माथे पर कलंक है।

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

संघ- तिलमिलाहट कम, नौटंकी ज्यादा...

 प्रतिष्ठा का प्रश्न कहाँ 

आफत में अस्तित्व... 

तिलमिलाहट कम, नौटंकी ज्यादा...


कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते लगाते स्वयं को भगवान के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रयास में लगे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर इन दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत के शब्द बाण की चर्चा खूब सुर्खियां बटोर रही है। तो इसकी वजह क्या है। क्या मोदी ने इन दस सालो में संघ की प्रतिष्ठा को इतना धूमिल कर दिया है कि मोहन भागवत नये सिरे से संघ की प्रतिष्ठा बचाने की कवायद कर रहे हैं या फिर स्वयं सेवकों  के ग़ुस्से पर पानी छिड़क रहे हैं!

पिछले दस सालों में यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर संघ के प्रचारक नरेद्र मोदी के बैठने के बाद संघ और उसके अनुषंकिक संगठनों की गतिविधियों पर नजर डाले तो यह साफ़ दिखाई देता है कि कांग्रेस मुक्त नारे  से खुश संघ के तमाम अनुशंकिक संगठनों ने नरेंद्र मोदी के आगे स्वयं को नतमस्तक कर लिया था।

पचाल साल तक बीजेपी की सरकार  बने रहने का सपना इतना बड़ा  हो गया कि संघ के उद्देश्य को तिलांजलि दे दी गई। निजीकरण से लेकर तीन कृषि बिल हो या नोटबंदी से लेकर जीएसटी से होने वाली तकलीफ़,श्रम कानून से लेकर प्रधानमंत्री के हर घोषणा पर संघ ने यही सोचकर चुप्पी ओढ़ ली  कि  नरेंद्र मोदी का हर कदम हिन्दू राष्ट्र की ओर उठ रहा है?

संघ तो बीजेपी  के 240 सीट आने पर भी आँखें नहीं खोलता यदि सत्ता जाने के अंदेशे में सर्वाधिक ख़तरा संघ के स्वयंसेवकों को ही है यह बात स्वयंसेवक जोर-शोर से नहीं उठाते ।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता का ऐसा चकाचौंध खड़ा कर दिया था कि संघ प्रमुख की आँखें चौधियां गई थी, उन्हें सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़ से मंह‌गाई और बेरोजगारी से जूझ रहे लोग दिखाई ही नहीं दे रहे थे। झूठ और अफवाह की जिस राजनीति के आसरे नफरत का बीज बोकर राजनीति साधी जा रही थी, वह सब कुछ संघ को अपने अनुकूल लग रहा था कहा जाय तो भी गलत नहीं होगा ?

लेकिन राइल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा, भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह से संघ पर सीधा प्रहार किया और आलोचना करने लगे, संघ ने तब भी इसकी परवाह इसलिए नहीं की थी, क्योकि उन्हें लगता रहा कि नरेंद्र मोदी ने जब दावा किया है तो 400 सीट न सहीं 350 सीट तो आ ही जायेगी।

लेकिन जब परिणाम आये तो स्वयं सेवकों की बेचैनी बढ़ गई । सत्ता जाने के बाद के ख़तरे दिखाई देने लगे तब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मोदी के अहंकार और भगवान बनने को लेकर अपरोक्ष बोलना शुरू  किया है यानी अब भी नाम लेकर बोलने की हिम्मत नहीं है तो इसकी दो ही वजह है या तो नरेंद्र मोदी ने समूचे संघ पर क़ब्ज़ा जमा लिया है और इस ताक़त से उनके मन में  डर घर कर गया है या सत्ता की मलाई छोड़ा नहीं जा रहा।

लेकिन जिस तरह से इस दौर में संघ की प्रतिष्ठा को आँच पहुंची है वह अब स्वयंसेवकों में बेचैनी का सबब है। सत्ता के प्रभाव में संघ ने शाखाओं का विस्तार ही नहीं किया बल्कि भव्य और सुविधा युक्त कार्यालय  भी बने लेकिन उसने कभी सपने में नहीं सोचा रहा होगा कि जिस नरेंद्र मोदी की छवि बिग‌ड़‌ने की बात वह ऑर्गेनज़र में कर रहा है उस नरेंद्र मोदी ने तो संघ की छवि ही नहीं प्रतिष्ठा पर तो प्रश्न चिन्ह लगाए है बल्कि अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लगा दिया है?

गुरुवार, 18 जुलाई 2024

भूपेश को चौतरफा घेरने में लगी भाजपा...

 भूपेश को चौतरफा घेरने में लगी भाजपा...


छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश वघेल को घेरने में लगी भाजपा ने अब नया दांव खेला है, क्या इस नये दांव में भूपेश बघेल भाजपा के घेरे में आ जायेंगे या फिर भूपेश बघेल को बदनाम कर यह राजनीति साधने का सिर्फ जरिया मात्र बनकर रह जायेगा।

राजनीति के जानकारों का अपना अपना दावा है, लेकिन भूपेश सरकार के दौरान हुए घपले-घोटालों को लेकर विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी-शाह  के जो तेवर थे, वह कुंद पड़   गया  है कहा जाय तब भी ग़लत नहीं होगा।

करोड़ो रूपये के कोयला और शराब घोटाले में कार्रवाई तो जरूर हुई है लेकिन इस कार्रवाई को लेकर कई तरह के सवाल भी उठने लगे है। भाजपा लगातार दावा करती रही कि भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जायेगा। गृह मंत्री अमित शाह तो एक कदम आगे बढ़‌कर भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाकर सीधा कर देने का दावा करते रहे लेकिन इन दोनों मामलों में कार्रवाई पर नजर डाले तो गिरफ्‌तारी से आईपीएस अफसरों और बड़े नेताओ को छोड़ दिया गया है। यहां तक की कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल को भी  अभी तक ढूंढा नहीं जा सका है जबकि पूर्व मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल से तार जुड़े होने का दावा मी धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है।

कहा जाता है कि यही स्थिति महादेव एप के मामले में भी बन गई । इस मामले में भी अब तक केवल छोटी मछ‌लियों पर ही कार्रवाई  की गई है। कहने को तो महादेव एप से जुड़े तीन सौ लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है. कुछ लोगों को तो नौकरी से बखस्ति तक कर दिया गया है। लेकिन इस मामले में भी अब तक जिन्हें बड़ा खिलाड़ी बताया जा रहा था   उनकी गिरफ्तारी तो दूर एफ़आईआर में नाम तक नहीं है।

कहा जाता है कि इस मामले में भी आईपीएस अधिकारियों को बख्श दिया गया।

तब सीजी पीएससी घोटाले की जांच जब सीबीआई ने शुरू कर ही है तो क्या अब बड़े राजनेताओं पर गिरफ्तारी का फन्दा कसेगा ।

सीबीआई सूत्रों की माने तो पीएससी घोटाले को लेकर दर्ज एफ आई आर में भी किसी नेता का नाम नही है। हालांकि सीबीआई ने जाँच कल ही शुरू की है और उसने शुरुआती कार्रवाई में पीएससी  के पूर्व अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी, सचिव जीवन  किशोर ध्रुव और परीक्षा नियंत्रन वासनिक के घर और दफ्तर में कागजात जब्त किये है।

ऐसे में सबसे बड़ा‌ सवाल यह है कि क्या इस पूरे खेल में कोई राजनैतिक ध्येय छिपा है और आईपीएस और नेताओ को छोड़ा गया है।

इधर सूत्रों का दावा है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को घेरे में लेने की कोशिश अब अंतिम चरण में है और इसके बाद क्या होगा यह देखना होगा।

बुधवार, 17 जुलाई 2024

विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 उद्योग पति और शासन-प्रशासन का गठ‌जोड़ छतीसगढ़ में भी


विकास के नाम पर सत्ता कैसे-कैसें खेल खेलती है, यह सिर्फ तूतीकोरिन में उद्योगपति के इशारे पर मारे गये  पुलिस द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों से समझ पाना मुश्किल है। इस तरह का खेल इन दिनों सत्ता के लिए सहज और आम हो गई है। क्योंकि इस तरह की घटना के बाद जाँच और न्यायालयीन प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि न्याय का कोई मतलब ही नहीं रहता।


स्टरलाइट कंपनी के इशारे पर पुलिम द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने के मामले में मद्रास हाइकोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी  पर बात


करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़

को लेकर उठते सवाल क्यों महत्वपूर्ण हो चले है। विकास किस शर्त पर होना चाहिए और सत्ता की पैसों की भूख की सीमा क्या है? इस दौर में यह सवाल इसलिए बेमानी है क्योंकि राजनेताओं का संगठित गिरोह ने लूट का नया तरीका अख़्तियार किया है। जिसने अब सीधे सीधे लोगों की जान से खिलवाह करना शुरू कर दिया है।

सवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र प्रेम का नहीं है, और न ही सवाल इलेक्ट्राल बाण्ड लेने के चलते उन दवा कंपनियों की जांच रोक देने का है जो जहर परोसने आमादा थे। सवाल तो यही है कि क्या अब सत्ता में बैठे लोगों ने यह तय कर लिया है जब तक वे हैं, मौज कर ले, मरने के बाद किसने देखा है कि दुनिया का क्या होगा?

और इसी ख़तरनाक सोच ने आम आदमी का जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।


छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड सत्ता और कार्पोरेट का विभत्स चेहरा नहीं था? या फिर दुर्ग जिले के बेरला स्थित स्पेशल ब्लास्ट  फैक्टरी में हुए मौत का तांडव !

 घटना के बाद खूब हो हल्ला हुआ लेकिन क्या इस कंपनी के सभी संचालक गिरफ्तार हुए। कार्रवाई के पर किस तरह की खाना-पूर्ति की गई। उस पर क्या कांग्रेस भी सवाल उठायेगी?

छत्तीसगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार को लेकर तिल्दा और रायगढ़ में जनसुनवाई हो रही है। किसानों के जनसुनवाई स्थगित करने के एलान के बाद भी शासन - प्रशासन मुस्तैद है। और यदि सत्ता चाह ले तो किसानो से जमीन छिने जाने से कौन रोक सकता ।


क्या हर तरह के विरोध के बाद हसदेव अरण्य की कटाई को रोका गया, विरोध करने वालों को हिरासत में लेकर जिस तरह से वृक्षों  की कटाई की गई उसके आगे पर्यावरण को लेकर बनी तमाम संस्थाएं किस तरह मौन है? आख़िर यह परियोजना भी तो मित्र-प्रेम की इबादत है।

तब मद्रास हाईकोर्ट में चल रहे स्टरलाईट कंपनी से जुड़े इस मामले पर न्याय होगा !

कहना कठिन इस लिए भी है क्योंकि 2014 के बाद से सुनवाई के दौरान न्यायालय का ग़ुस्सा और फ़ैसले में एका दिखाई ही नहीं देता।

 स्टरलाईट के विस्तार के विरोध में ही प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने की इस घटना की सुनवाई के दौरान मद्रास हाइकोर्ट के जजों ने जिस तरह से सीबीआई की जाँच पर नाराजगी जाहिर करते हुए इस मौत को नियोजित बताया है क्या फ़ैसले में यह दिखाई देगा?

घटना 2018 की है, २२ और 23 मई 2018 की यह घटना स्टालाईट् के विस्तार को लेकर जनसुनवाई के दौरान हुई। जनसुनवाई के विरोध में आसपास के क्षेत्रों के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। और जब पुलिस ने कार्रवाई शुरु की तो प्रदर्शनकारी भागने लगे और इन्हीं भागते प्रदर्शनरियों को यानी उनकी पीठ पर गोली मारी गई। 13 लोगों की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण स्टरलाईंट् के कापर स्मेलटर इकाई को बंद करने की माँग कर रहे थे।

छत्तीसगढ़ के तिल्दा और रायगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार का विरोध हो या हसदेव अरण्य की कटाई का विरोध प्रदूषन संबंधी चिंता ही प्रमुख वजह है।

तब सवाल यही खड़ा होता है कि क्या हसदेव की कटाई नहीं रोक देनी चाहिए। हालांकि इस मामले में कांग्रेस ने विरोध जरूर किया है लेकिन क्या यह विरोध सिर्फ बयानबाजी तक रहेगा या कटाई के दौरान कांग्रेसी हसदेव को बचाने वहां जायेंगे?

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...

 खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...


यह तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को ही चरितार्थ करता अन्यथा छत्तीसगढ़ में बदहाल होती कानून व्यवस्था को लेकर वे लोग आग बबूला नहीं होते जिन पर अपराधियाँ को ही संरक्षण देने का आरोप है या अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए गलत काम करने वालों को प्रश्रय देने का आरोप है।

दरअसल डबल इंजन की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ में कानून व्यवस्था की स्थिति दिनों दिन बदतर होते जा रही है, अपराधियों के हौसले बुलंद है, सरे आम चाकू बाजी और धमकी चमकी की ही खबर बस नही है, नशे का कारोबार तो फल-फूल रहा ही है, राजनैतिक संरक्षण के चलते कोल माफिया रेत माफिया, भू-माफिया सहित कई तरह के माफियाओं ने अपना खेल बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है, ऐसे में कांग्रेस ने भी सरकार को घेरने की रणनीति के तहत विधानसभा घेराव का निर्णय ले लिया है।

कांग्रेस के बढ़ते दबाव और आक्रामक रवैये के चलते सत्ता में बेचैनी बढ़ गई है । और इसी के तहत पिछले दिनों मंगलवार को गृहमंत्री विजय शर्मा ने रायपुर जिले के जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई थी। यह जनप्रतिनिधियो की बैठक थी या केवल भाजपाई विधायक और सांसद को ही बुलाया गया था, यह कहना पर मुश्किल है। लेकिन बैठक में पहुंचे जनप्रतिनिधियो से कानून व्यवथा सुधारने के लिए सुझाव मांगे गये।

कहा जाता है कि इस टेबल टॉक के दौरानअन्य विधायकों ने सुझाव भी दिये किसी ने नाईट गश्त बढ़ाने की बात कही तो किसी ने  नशे के बढ़ते कारोबार पर चिंता जताई।

लेकिन कहा जाता है कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो अपने को किनारे लगाने की भड़ास ही निकाल ली, मंत्री पद से मजबूरी में इस्तीफ़ा देने वाले मोहन सेठ ने तो यहां तक कह दिया कि कानून व्यवस्था की ऐसी बदतर स्थिति मैंने आज तक नहीं देखी।तो रायपुर पश्चिम के विधायक ने भी जमकर भड़ास निकाला ।

कहा जाता है कि दोनों ही नेताओका ग़ुस्से की असली वजह क़ानून व्यवस्था  के बहाने स्वयं की उपेक्षा को लेकर अधिक था। जबकि अन्य जनप्रतिनिधि सामान्य लहजे में सुझाव दे रहे थे। सूत्रों का कहना है कि मोहन सेठ और मूणत सेठ के इस तेवर से न केवल गृहमंत्री हतप्रभ रह गये बल्कि इसे लेकर पार्टी में भी कई तरह की चर्चा है।

हालांकि अंत भला तो सब भला की तर्ज पर मीडिया में वहीं खबरें छपी जो दोनों को कानून व्यवस्था का चिंतक साबित करें।