रविवार, 28 जुलाई 2024

बाबा की बोलती बंद...

 बाबा की बोलती बंद... 


प्रदेश कांग्रेस के कद्‌दावर नेताओं में शुमार टी एस सिंहदेव उर्फ बाबा की इन दिनों बोलती बंद है। कहा जाता है कि जिस स्वास्थ विभाग में घपले - घोटाले की विधानसमा में गूंज हुई उसे लेकर कांग्रेसी भी हैरान है कि आख़िरकार बाबा के विभाग में यह सब हो क्या रहा था। कैग की रिपोर्ट को लेकर स्वास्थ विभाग के जिस मामले की विधानसमा में चर्चा हुई, उससे कांग्रेस की ऐसी फजीहत कभी नहीं हुई थी।

मुख्यमंत्री बनने के लिए दस साल तक धमा चौकड़ी मचाने वाले बाबा की इस स्थिति को लेकर कहा जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कांग्रेस जब भी सत्ता में आयेगी वे मुख्यमंत्री बन ही जायेंगे लेकिन सत्ता आते ही जब कई नेता सक्रिय हो गये तो वे भूपेश बघेल के साथ मिलकर ढाई साल मुख्यमंत्री बनने तैयार तो हो गये लेकिन यह होशियारी भी काम नहीं आई और मुख्यमंत्री का पद तो मिला नहीं उल्टे विधायकी भी चली गई।

और विधायकी क्या गई, उनकी सक्रियता भी ढूंढने नहीं मिल रहा है। और कहा जा रहा है कि अब तो उन्हें कांग्रेस की बैठनों में भी नहीं बुलाया जाता।.

उपर से विधानसमा में कैग की रिपोर्ट पर जिस तरह से स्वास्थ विभाग में घपलेबाजी की खबर सामने आई है उससे रही सही हज्जत का भी पलीता लग गया।

भूपेश सरकार के दौरान स्वास्थ विभाग वे कितना संभाल रहे थे इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। और इसमें हुए घपले घोटाले की चर्चा के दौरान एक बाबा समर्थक का कह दिया कि बाबा का घपले- घोटाले के खेल से क्या  लेना देना है, तो दूसरे ने कहा  कि यदि इस घपले घोराले से उनका लेना देना नहीं है तो पंचायत मंत्री की तरह स्वास्थ विभाग भी छोड़ देना था। और जब विभाग ही नहीं संभाल पा रहे थे तो फिर प्रदेश संभालने का सपना क्यों देख रहे थे।

यानी यहां भी फूल बेहज्जती। 

कांग्रेस तो कांग्रेस है, और कांग्रेसी कब किसी को बख्शते हैं, पीठ फेरा की बुराई शुरू।

ऐसे में बाबा कि दुविधा यह है कि वे कांग्रेस छोड्‌कर कहाँ जाये। क्योंकि उन्होंने भाजपा में नहीं जाने को लेकर जनम जन्मान्तर की बात पहले ही कह दी है।


शनिवार, 27 जुलाई 2024

हसदेव में जन सुनवाई से पहले एनआईए का छापा…

 हसदेव में जन सुनवाई से पहले एनआईए का छापा

अर्बन नक्सली होने का संदेह...


छत्तीसगढ़ के जामुल निवासी श्रमिक नेता कलादास डहरिया के निवास पर एनआईए की दबिश को लेकर श्रमिक संगठनों में हंगामा मच गया है। नक्सलियों से संबंध को लेकर की गई इस कार्रवाई में छत्रीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़े कलादास डह‌रिया लंबे समय से मजदूरों की हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और  इसी कड़ी में उन्होंने अदानी के सब द्वारा खरीदे गये सीमेंट कंपनी एसीसी  में भी मजदुरों के हक में आवाज उठाई थी। कहा जाता है कि वे हसदेव बचाओ आंदोलन को लेकर भी बेहद सक्रिय हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ एनआईए की टीम ने छापेमारी के दौरान न केवल कलादाएस डह‌रिया से पांच घंटे पूछ‌ताछ की बल्कि घर की तलाशी लेकर लेपटाप, पेन ड्राइव और मोबाईल फोन को जब्त किया है।

बताया जाता है कि एन आई ए की टीम ने यह कार्रवाई  रेला नाम के एक एनजीओ को लेकर की है जिसका पर्चा भी डह‌रिया के घर से बरामद हुआ है जिसका संबंध झारखंड से है, कलादास डहरिया को एक अगस्त को पूछताछ के लिए रांची बुलाया गया है।

रेला संगठन  के बारे में कहा जाता है कि यह संस्था किसान, मजदूर और आदिवासियों को संगठित करने का काम करता है। 

पांच अलग- अलग गाड़ियों में पहुंची एन आईए की टीम ने कलादास डहरिया की लड़की से भी पूछताछ की है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि फिलहाल कोई संदिग्ध वस्तु बरामद नहीं हुई है।

इधर कलादास डह‌रिया ने आरोप लगाया है कि एनआईए की पूरी कार्रवाई  सरकार के इशारे पर की जा रही है। चूंकि वे एसीसी सीमेंट कंपनी में मजदुरों की आवाज उठाते रहते हैं और अब जब एसीसी को अडानी ने खरीद लिया है तब भी वे मजहरों के हक की आवाज बुलंद कर रहे हैं। इस‌लिए सरकार उनकी आवाज बंद कर देना चाहती है। उन्होंने एक अगस्त को रांची जाने की बात कहते हुए कहा कि मजदूर किसान और आदिवासियों की  हितों की बात वे करते रहेंगे। ऐसी कार्रवाइयों से उन्हें और बल मिलता है।

इधर दो अगस्त को अडानी की एक अन्य कंपनी के मामले में होने वाले जनसुनवाई से भी इसे जोड़कर देखा जा रहा है।

राजस्थान बिजली कंपनी के लिए हसदेव की कटाई को लेकर दो अगस्त को होने वाली जन सुनवाई को लेकर जबरदस्त विरोध की खबर के बीच एनआईए की कार्रवाई को लेकर एक बार मोदी सरकार फिर निशाने पर है। देखना है कि अदानी की कंपनियों के विस्तार को लेकर और क्या क्या खबरें आती है। 

राजनीति में खत्म हो चुकी मानववाद को पुर्नजीवित करने की कोशिश...

 राजनीति में खत्म हो चुकी मानववाद को पुर्नजीवित करने की कोशिश... 




अपनी जिस जूती को पहनकर आदमी घर के भीतर इसलिए नहीं जाता कि घर अपवित्र हो जायेंगा, तब दूसरे की जूती को अपने जंघे पर रख लेना भले ही लोगों को राजनीति लगे, लेकिन सच तो यही है कि यही मानवता है जिसका  रास्ते का सफ़र गांधीवाद से शुरू होता है।

मंच से दलित-वंचित के लिए लंबे चौड़े भाषण देना उनके साथ,  उनके काम के साथ उनकी ज़िंदगी जीना आसान नहीं है । क्या कोई नेता सप्ताह नहीं, कुछ घंटे ही वैसी ज़िंदगी बिता सकता है?

धर्म और जाति की राजनीति के इस दौर में जब जन‌कल्याण और मानवता से लोगों ने दूरी बना ली है। सत्ता में बैठे लोगों को वेलफेयर की अवधारणा बकवास लगने लगी हो तब यह बात भाजपा और संघ को भी समझना होगा कि असली धर्म और जाति मानवता ही है जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ कर रखती है।

क्या मोची की दुकान पर आकर उसने बातचीत करते हुए उसके काम को समझ लेना ही गांधी है ? नहीं क़तई नहीं..।

लेकिन यह गांधीवाद का एक रास्ता है।

 जरा सोचिये कि एक सामान्य घर का लड़का यदि चाय बेचने की बात बताकर खुद को महान होने का दंभ भरता है तो वह कितना महान होगा जिसकी तीन पीढ़ियां इस देश में सत्ता संभाली हो वह कभी बढ़ई के पास काम सीखने लगता है तो कभी गैराज में जाकर मोटर साइकिल बनाता है तो कभी किसान के साथ खेत में, और इसमें भी उसका मन नहीं भरता तो मोची की दुकान में पहुंचकर जूते बनाने की बारिकियां सीखने लगता है।

इसे कोई फोटो आपुर्चनिटी भी कह सकता है लेकिन यह दलितों और वंचितों को राजनीति में प्रासंगिक बनाये रखने का एक मात्र जरिया है।

गांधी इसलिए महात्मा हुए क्योंकि वे शौचालय की सफाई और सङ्‌क में झाडू लगाने से परहेज नहीं करते थे महात्मा ने सच का प्रयोग किया, सादगी के साथ जन सेवा को आत्म सात किया।

नेहरू इसलिए लोकदेव नहीं कहलाये कि विनेबा भावे ने उन्हें यह तमगा  दिया बल्कि नेहरू इसलिए लोकदेव कहे जाने लगे कि वे आजादी के बाद के भारत को संभालने में स्वयं को न्यौछावर करने से कभी हिचके नहीं। लाठी डंडा लिये हिंसक भीड़ में सीना ताने घूसते चले जाते थे।

तब राहुल गांधी ने जिस तरह से अपने सरनेम को सार्थक करने में सड़क से लेकर संसद तक समर्पित दिखाई दे रहे हैं यह भारत की पुर्नजागरण का ऐसा दौर है जो  धर्म और जाति के स्थान नाम पर मानवता को स्थापित करता है।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

लोकसभा चुनाव में पाँच करोड़ वोट का असामान्य बढ़ जाना…

लोकसभा चुनाव में पाँच करोड़ वोट का असामान्य बढ़ जाना…


वोट फॉर डेमोक्रेसी ने लोकसभा चुनाव 2024 के संचालन पर रिपोर्ट जारी की है, इस रिपोर्ट में चुनाव के प्रथम और अंतिम सातवें चरण के बीच असामान्य रूप से लगभग पांच करोड़ वोट बढ़ जाने, और इसका सीटवार तथा राज्यवार चुनाव नतीजों पर प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।रिपोर्ट न केवल चौंकाने वाला है बल्कि कई सवाल खड़ा करता है…।

रिपोर्ट में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुई कथित गड़बड़ियों पर भी रोशनी डालने की कोशिश की है। वोटों में बढ़ोतरी और दर्ज मतों में संख्यात्मक विसंगतियों के बारे में भी जानकारी दी गई है। 

वोट फॉर डेमोक्रेसी (महाराष्ट्र) ने 22 जुलाई को मुंबई के वाईबी चव्हाण सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान लोकसभा चुनाव 2024 के संचालन पर अपनी व्यापक चुनाव रिपोर्ट जारी की। “रिपोर्ट: लोकसभा चुनाव 2024 का संचालन – ‘वोट हेरफेर’ और ‘मतदान और मतगणना के दौरान कदाचार’ का विश्लेषण” शीर्षक वाले प्रकाशन में चुनाव चक्र के दौरान सामने आईं कथित गड़बड़ियों, भारत के चुनाव आयोग और रिटर्निंग अधिकारियों की भूमिका, ईवीएम में डाले गए वोटों और गिनती के बीच रिपोर्ट की गई विसंगतियों और चरणवार, राज्यवार और राष्ट्रीय स्तर पर वोटों में बढ़ोतरी (“डंप किए गए” वोट) का वर्णन किया गया है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि शुरुआती मतदान और अंतिम मतदान के बीच कुल 5 करोड़ वोट बढ़े (“डंप किए गए”), जो यह दर्शाता है कि इस बढ़ोतरी ने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को असंगत रूप से मदद की।


वीएफडी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि "कुल डाले गए वोटों और गिने गए वोटों के बीच विसंगतियों के बारे में गंभीर सवाल उठाए गए हैं, साथ ही, भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा मतदान प्रतिशत में पर्याप्त अस्पष्ट वृद्धि के बारे में भी सवाल उठाए गए हैं। हालाँकि हमें ईसीआई की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं है, लेकिन इस लोकसभा चुनाव के दौरान इसके आचरण ने हमें, नागरिकों और मतदाताओं के रूप में, चुनावी प्रक्रिया के निष्पक्ष परिणाम के बारे में गंभीर रूप से चिंतित कर दिया है।"




रिपोर्ट में कुल 4 अध्याय हैं, जिसमें तालिकाओं की एक श्रृंखला के माध्यम से चुनाव परिणामों में संभावित हेरफेर का विश्लेषण किया गया है, जिससे पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल को अपनी सीटों की संख्या में कुल कमी के बावजूद अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने में मदद मिली है। उम्मीदवारों को किसी निर्वाचन क्षेत्र में संभावित कदाचार की पहचान करने में मदद करने के लिए, रिपोर्ट में संभावित हेरफेर का पता लगाने के लिए एक चेकलिस्ट संलग्न की गई है। इसके अलावा, एक कानूनी संसाधन के रूप में, चुनाव प्रक्रिया की अखंडता पर जोर देने के लिए, रिपोर्ट प्रासंगिक न्यायिक मिसालें और चुनाव कानून भी प्रदान करती है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव के संचालन के लिए मौलिक हैं। विशेष रूप से, मुंबई उत्तर पश्चिम और फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्रों में चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाली कदाचारों का प्रकाशन में विस्तार से वर्णन किया गया है।

चुनाव आयोग पर सवाल

चुनावी गड़बड़ियों, शुरुआती मतदान के आंकड़ों की घोषणा में देरी और अंतिम मतदान के आंकड़ों में भारी वृद्धि को उजागर करते हुए, वीएफडी ने इन मुद्दों पर भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) की चुप्पी की आलोचना की। शुरुआती मतदान के आंकड़ों को जारी करने में देरी और अंतिम मतदान के आंकड़ों में अस्पष्ट वृद्धि को चिह्नित करते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि चरण 1 के लिए "ईसीआई ने यह नहीं बताया कि अंतिम आंकड़ों में पर्याप्त वृद्धि क्यों हुई, न ही चुनाव निकाय ने अंतिम आंकड़े जारी करने में लंबी देरी (11 दिन!) और वह भी केवल प्रतिशत में" के बारे में बताया। इसने आगे कहा कि ईसीआई ने अंतिम वोटर टर्नाउट में उछाल और ईवीएम वोटों और आज तक की गिनती के बीच विसंगतियों के बारे में किसी भी विशिष्ट प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि कुछ उम्मीदवारों को फॉर्म 17C जारी नहीं किया गया था या नहीं दिया गया था, जो मतदान के दिन के अंत में डाले गए वोटों का लेखा-जोखा रखता है।

वोटों में बढ़ोतरी से सत्तारूढ़ गठबंधन को फायदा 

वीएफडी ने पाया कि शुरुआती मतदान के आंकड़ों की तुलना में अंतिम मतदान में पर्याप्त वृद्धि से पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल को इन बढ़ोतरी से सबसे अधिक लाभ हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि "यह ध्यान देने योग्य है कि इस चरण 2 में मतदाता मतदान (वोटर टर्नाउट) वृद्धि की इस पद्धति से, एनडीए/बीजेपी के लिए बहुत लाभकारी परिणाम आए हैं: अधिकांश राज्यों में जैसे पश्चिम बंगाल 3/3, उत्तर प्रदेश 8/8, मध्य प्रदेश 6/6, छत्तीसगढ़ 3/3, त्रिपुरा 1/1, जम्मू और कश्मीर 1/1, कर्नाटक 12/14, राजस्थान 10/13 और असम 4/5। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, राजस्थान जैसे राज्यों सहित मतदान के अन्य 6 चरणों में ऐसा रुझान नहीं देखा गया है। इस चरण 2 में केरल का उदाहरण अनूठा है, क्योंकि इस चरण में भाजपा को एक सीट मिली, दूसरी सीट पर दूसरे स्थान पर रही और राज्य की कुल 20 सीटों में से 14 पर तीसरे स्थान पर रही! यहां स्पष्ट रूप से हेरफेर हुआ है।" इसके अलावा, इसमें कहा गया है कि करीब 5 करोड़ वोटों की बढ़ोतरी से भाजपा/एनडीए को कम से कम 76 सीटें हासिल करने में मदद मिली है, जो ऐसी बढ़ोतरी के अभाव में उसे खोनी पड़ सकती थी।

रिपोर्ट में विशेष रूप से तीन तालिकाएँ दी गई हैं, जिसमें उन सभी संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों (पीसी) की सूची प्रदर्शित की गई है, जहाँ जीत/हार का अंतर 1 लाख वोट से कम रहा है; जहाँ ईवीएम में डाले गए वोटों और 50000 वोट या उससे कम के हार के अंतर वाले ईवीएम वोटों के बीच विसंगतियाँ पाई गई हैं; और उन निर्वाचन क्षेत्रों को शामिल करते हुए शॉर्टलिस्ट की गई तालिकाएँ दी गई हैं, जहाँ कथित तौर पर गड़बड़ी की सूचना दी गई है। इनके अलावा, मतदाता मतदान में वृद्धि, वोटों की कुल संख्या में वृद्धि और संभावित गड़बड़ी के कई पहलुओं का विश्लेषण करने वाली एक दर्जन से अधिक तालिकाएँ दी गई हैं।

डॉ. हरीश कार्निक ने कहा कि ईवीएम और वीवीपीएटी के वोटों का पूर्ण क्रॉस-सत्यापन करने से चुनाव आयोग का इनकार अनुचित है, खासकर शुरुआती मतदान के आंकड़ों को जारी करने में हुई अस्पष्ट देरी और उसके बाद अंतिम मतदान के आंकड़ों में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए। डॉ. कार्निक ने कहा कि वीवीपीएटी के पूरे मामले से लेकर मतदाता के यह जानने के अधिकार के हनन तक कि उन्होंने किसे वोट दिया है, इन हेराफेरी के रिकॉर्ड मौजूद हैं लेकिन कोई जवाब नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ईवीएम ने चुनावी प्रक्रिया में मौजूदा कुछ कमियों को और बढ़ा दिया है और लगता है कि चुनाव आयोग ने उन कमियों का फायदा उठाया है।

उक्त रिपोर्ट में उठाई गई शिकायतों और मुद्दों के बाद, विभिन्न नागरिक समाज समूहों के सदस्यों द्वारा 18 जुलाई को ईसीआई को एक संयुक्त कानूनी नोटिस भेजा गया था। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और चुनाव आयुक्तों ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को संबोधित नोटिस में ईसीआई से निम्नलिखित हस्तक्षेप की मांग की गई थी:

1. मतदाताओं की जानकारी के लिए, जो किसी भी चुनाव में वास्तविक हितधारक होते हैं, नोटिस में उठाए गए मुद्दों और बताई गई अनियमितताओं/अवैधताओं की गहन जांच की जाएगी।

2. उठाए गए सभी मुद्दों पर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी।

3. संविधान या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम या इस अधिनियम के तहत बनाए गए किसी नियम या आदेश के प्रावधानों का अनुपालन न करने के आधार पर अवैध रूप से निर्वाचित उम्मीदवारों के निर्वाचन को रद्द करना।

4. आरपीए 1951 की धारा 129, आईटी अधिनियम 200 की धारा 65, 66, 66एफ और आईपीसी धारा 171एफ/409/417/466/120बी/201/34 के तहत तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए और ईसीआई अधिकारियों, बीईएल और ईसीआईएल इंजीनियरों और लाभार्थी पक्षों सहित इसमें शामिल सभी लोगों की भूमिका की जांच की जाए।

5. अनुलग्नक में दी गई सूची के अनुसार, उन निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव रद्द करना जहां बड़े पैमाने पर फर्जी वोट डाले गए हैं तथा पुनः चुनाव कराने का आदेश देना।

6. तथ्यों के आधार पर तथा भविष्य में भी चुनावों की सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ऐसे अन्य आदेश तथा आगे के आदेश पारित करना, जो आवश्यक समझे जाएं।

 

पूरी रिपोर्ट अंग्रेजी में है तथा https://votefordemocracy.org.in पर उपलब्ध है।

कौशिक की कुलबुलाहट…

 कौशिक की कुलबुलाहट…


कभी विधानसभा में अध्यक्ष रहे धरमलाल कौशिए इन दिनों सत्ता होने के बाद भी विपक्ष की भूमिका में खूब नाम कमा रहे हैं, जल जीवन मिशन के बपले घोटाले को लेकर तो उन्होंने अपने ही उपमुख्यमंत्री अरुण साव की बोलती बंद कर दी। वह तो विधानसमा स्पीकर डॉ रमन सिंह ने स्थिति को भांपते हुए हस्तक्षेप कर दिया नहीं तो धरमलाल कौशिक अधिकारियों और ठेकेदारों से वसूली करवा  कर ही दम लेते। स्वास्थमंत्री को तो ऐसा तगड़ा कि वे कभी नहीं भूल पायेंगे।

कहा जाता है कि असल में कौशिए मंत्री बनना चाहते  हैं लेकिन पहले ही बिलास‌पुर से मंत्रियों की भरमार और उपर से जाति समीकरण में अपने से जूनियर टंकराम वर्मा से मात खाने के बाद वे कुलबुलाने लगे है। 

कहा जाता है कि जिसके सहारे वे मंत्री बनना चाहते थे उन्होंने भी उनकी सिफारिश करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि लगातार चुनाव तो वे जीत नहीं पाते हैं फिर मंत्री किस काम को देखकर बनाया जाए। 

अविभाजित मध्यप्रदेश में भी विधायक रहे धामलाल कौशिक के बारे में कहा जाता है कि उनकी दाऊ गिरी के अपने क़िस्से हैं लेकिन लाल बत्ती का सपना संजोने वाले कौशिक को फटका तब लगा जब इस बात की चर्चा होने लगी कि अब विधायकों को निगम -मंडल या आयोग में भी नहीं बिठाया जायेगा।

तब से उनका ग़ुस्सा बेक़ाबू हो गया है।

गुरुवार, 25 जुलाई 2024

योगी के ख़िलाफ़ ऐसा षड़यंत्र…

 मोदी के बाद योगी'

पर लग रहा पलीता.


लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा बेचैन संघ है लेकिन मोदी के आगे घुटने टेक चुके संघ प्रमुख की दिक्कत यह है कि वे इस बात का विरोध भी नहीं पा रहे हैं कि आखिर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इतनी छिछालेदर क्यों की जा रही है।

दरअसल योगी आदित्यनाथ पर प्रहार तो लोकसभा चुनाव के बहुत पहले जब उत्तरप्रदेश में विधानसभा का चुनाव हुआ था तभी से योगी के खिलाफ षड़यंत्र शुरु हो चुका था। और इसकी एक मात्र वजह सोशल मीडिया में चलने वाला वह नारा था 'मोदी के बाद योगी।

इस नारे से भाजपा के गुजराती लॉबी में बेचैनी की खबर आने लगी। तब सवाल यह था कि आख़िर मोदी के बाद योगी वाले नारे से किसे दिक़्क़त थी और यह नारा किसे सबसे  ज्यादा परेशान कर रहा है।

क्या वे लोग परेशान हैं जो योगी के मुख्यमंत्री बनने से पहले अमित शाह को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे या ख़ुद अमित शाह।

यह गंभीर सवाल है, जिसका जवाब सीधे कोई नहीं देना चाहेगा। लेकिन उत्तरप्रदेश में अमित शाह के बढ़ते हस्तक्षेप की जो चर्चा रही, उससे यह समझा जा सनता है कि योगी के बढ़ते कद को कौन रोक रहा था या किसे दिक़्क़त है…?

तब लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद केशव‌प्रसाद मोर्या को क्या आगे ला कर फिर योगी को बदनाम करने की कोशिश हो रही है?

लेकिन भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत आज भी संघ है। क्योंकि कहा जा है कि यदि संघ ने इस मामले में कड़ा रुख़ अख़्तियार नहीं करता तो योगी बहुत पहले ही हटा दिये जाते।तब मोदी के प्रभाव का डंका भी बज रहा था।

लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में योगी को हटा पाना इसलिए मुश्किल है क्योंकि लोकसभा के परिणाम से साफ़ है कि अब मोदी के चेहरे से यूपी में चुनाव नहीं जीता जा सकता?

हालोकि भाजपा के भीतर खाने में चर्चा यह भी है कि योगी को बचाने में संघ की भूमिका केवल बतौलेबाजी है। असल बात तो यह है कि मोदी-शाह भी जानते और मानते हैं कि उत्तरप्रदेश में योगी से बड़ा न तो कोई बड़ा नेता है और न ही किसी भाजपा नेता में वह दम है कि उत्तरप्रदेश में सरकार अपने बूते पर बना ले।

तब क्या यह पूरा खेल योगी को हटाने नहीं बल्कि योगी की छवि को बिगाड़‌ने का है ताकि मोदी के बाद योगी के नारे पर पलीता लग जाए?

मंत्री पद जाने का असर…

 मंत्री पद से  इस्तीफ़ा का असर...


कहा जाता है कि मंत्री पद का अपना जलवा है और मंत्री पद के साथ मिलने वाली सुविधा का अपना मिजाज । और मंत्री पद ही छिन जाये तो सबसे ज्यादा परिवार वालों पर इसका असर होता है। बंगला छिने जाने का असर के कई किस्से है। और नेता के परिवार वालों का बंगला छिने जाने के बाद बंगले के दीवार, खंभे से लिपटकर रोने के भी किसे चर्चा में रहे हैं। तो चेहरे से हंसी गायब हो जाने और भूख नहीं लगने , कुछ भी अच्छा नहीं लगने के किस्से भी जान चर्चा में रहे हैं। 

ऐसे में रायपुर के सांसद बने बृजमोहन अग्रवाल के मंत्री पद से इस्तीफा का असर भी जनचर्चा में है।

बड़े भाई गोपाल अग्रवाल ने तो सोशल मीडिया में अपना तेवर भी दिखाना शुरू कर दिया है। 



वे लगातार भाजपा की सरकार को कोस रहे हैं। जबकि वे खाटी संघी है और महानगर प्रमुख भी रह चुके हैं। पहले वे मीडिल क्लास की तकलीफ के बहाने गरियाते रहे तो अब बजट पर को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है।

दूसरे छोटे माई योगेश आग्वाल के अपने ही क़िस्से हैं। चला मुरारी हीरो बनने की तर्ज़ पर कवर्धा कांड  के किस्से तो सभी जानते ही हैं कि होटल में क्या क्या हुआ अब चेंबर की बैठक में उनके हरकतों को तिलमिलाहट की संज्ञा दी जा रही है। क्योंकि चेम्बर चुनाव में मोहन सेठ की सत्तावाली ताकत के बाद भी वे बुरी तरह हार गये थे।

एक और छोटे भाई तो रायपुर दक्षिण से विधायक बनने का सपना ही पाल लिया है और कहा जा रह है कि पत्रकारों से अपनी दावेदारी को सबसे सक्षम बताने और मोहन सेठ का सही उत्तराधिकारी बताने में लग गये है। इस सबसे  दूर यशवंत का मिजाज भी कम चर्चा में नहीं है उनके इस तरह से राजनीति से दूरी पर कई तरह की चर्चा है जो पारिवारिक बताया जा रहा है।

यानी मंत्री पद चले जाने का असर इस तरह चर्चा में है।।