गुरुवार, 5 सितंबर 2024

सांप पालने का परिणाम...

 सांप पालने का परिणाम...


आप अपने घर साँप पालकर यह उम्मीद या आशा नहीं कर सकते कि वह आपको नहीं सिर्फ आपके पड़‌ोसी को ही काटेगा।

इसी तरह की बात 2011 में पाकिस्तान से हिलेरी क्लिंटन ने कही थी, तो पंचतंत्र की कहानी में आचार्य विष्णु शर्मा ने भी एक कहानी के माध्‌यम से कहा था कि सांप और बिच्छू को पालकर लम्बे समय तक इन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता ।

लेकिन २०११ की बात को पाकिस्तान ने अनसुना कर दिया और आज पूरी दुनिया में न केवल पाकिस्तान आतंकवाद के पोषक के रूप में बदनाम है बल्कि उसकी समूची अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है , बरबादी के कगार पर पहुंच गया है पाकिस्तान , तो इसकी बड़ी वजह उनका आतंकवाद के रूप में सांप को पालना ही है।

लेकिन भारत में भी पंचतंत्र की कहानियों को अनसुना करना शुरु कर दिया है तो उसका परिणाम धीरे-धीरे ही सही सामने आने लगा है। ताजा परिणाम तो आर्यन मिश्रा की गोरक्षकों के द्वारा की गई हत्या है जिस पर ने दुखी मन से आर्यन के पिता से कहा है कि देश के प्रधानमंची नरेद्र मोदी ने हत्या करने की छूट दे रखी है।

लेकिन इन सांपों ने इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को उत्तरप्रदेश में भी डसा था। गौरक्षक के नाम पर गुण्डागर्दी और हत्या की फेहरिश्त है, सड़क से संसद तक हंगामा तो हो रहा है लेकिन यदि इनको पालने वाला ख़ुद सत्ता हो तो फिर पंचतंत्र की सीख का क्या मतलब रह जाता है।

बजरंग दल के नाम पर सड़‌कों में क्या कुछ नहीं हो रहा है तो विश्वहिन्दू परिषद के नाम पर मंदिरों में।

लेकिन एक बात जान लेना या समझ लेना जरूरी है कि इस देश में कानून का राज है और कानून के राज में न बुलडोजर के लिए जगह है और न ही मॉब लिंचिंग के लिए। और जो लोग धर्म की आड़ में पट्टी बांधे ऐसे अपराधों का समर्थन कर रहे है, वे अपने आर्यन या सुबोध के लिए तैयार रहें।


और कितनी बे-इज्जती…

 और कितनी बे-इज्जती…


गोस्वामी तुलामी दास ने कहा है कि आवत ही हर्षय नहीं 

नैनन नही सनेह, 

तुलसी तहां न जाइए

कंचन बरसे नेह ।

इतनी सी बात यदि स्वार्थ में अंधा हो चुके व्यक्ति को समझ में नहीं आता तो क्या ऐसा व्यक्ति खुद अपनी बेईज्जती के लिए जिम्मेदार नहीं है?

यह सवाल इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी नेता नंद कुमार साय के भाजपा प्रवेश को लेकर उठ रहा है तो यकीन मानिये कि अब भी ऐसे लोग हैं जो मान-सम्मान के नाम पर धन-दौलत और कुर्सी को लात मारने का माद्दा रखते हैं।

दरअसल नंद कुमार साय ने विधानसभा चुनाव से पहले उस भाजपा को लतिया दिया था जिस भाजपा ने उन्हें मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य का अध्यक्ष बनाया था, विधायक से लेकर सांसद तक बनवाया था तो केन्द्र में भी सर आंखों पर बिठाया था। राज्य बनने के बाद एकात्म परिसर में बृजमोहन अग्रवाल के समर्थकों की गुण्डईं के बाद भी नेता प्रतिपक्ष बनाया था। यानी भाजपा ने 'नंद कुमार साय - लखीराम की गाय' जैसे नारों का  परवाह नहीं कर कई महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया था । लेकिन सत्त्रा जाते ही नंद‌कुमार साय ने भूपेश बघेल के प्रभामंडल में आकर पार्टी छोड़ दी।

मजेदार बात तो यह है कि कांग्रेस के हारते ही वे कांग्रेस भी इस आशा से छोड़े होंगे कि उन्हें भाजपा सिर माथे पर बिठा लेगी लेकिन सत्ता अब उन्हीं विष्णुदेव साय और पवन साय के हाथ में हैं जिन्होंने नंदकुमार को कांग्रेस में नहीं जाने के लिए मनाने घर तक गये थे ।

ऐसे में पिछले दरवाजे यानी मिस कॉल के जरिये भाजपा की सद‌स्यता हासिल करने की कोशिश पर यदि बवाल मचा है या चर्चा चल रही है तो इसकी वजह नंद कुमार की करतूत ही जिम्मेदार है।

कहा जाता है कि एक उम्र के पड़ाव में आकर यदि आद‌मी अपनी इज्जत का ध्यान न रखे तो छिछालेदर होना तय है।

कहते भी है कि आद‌मी अपनी बेइज्जती के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है। अच्छा खासा पेंशन तो मिल ही रहा होगा तो फिर भी कोई अपनी बेइज्जती कराए तो इसे क्या कहा जाये ?

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

पवन नहीं यह झोंका है...

 पवन नहीं यह झोंका है...


रिमोट से चलने वाली सरकार के रूप में बदनाम हो चुने साय सरकार कब तक मंत्रिमंडल का विस्तार करेगी, निगम-मंडल में नियुक्ति कौन करेगा के सवालों के बीच पवन साय अचानक भाजपा के संगठन मंत्री पारी नेताकों में सबसे ताकतवर शख्स नजर आने लगे है तो इसकी कई वजह है।

वैसे तो भाजपा में संगठन मंत्री की ताकत क्या होती है यह किसी से छिपा नहीं है, सारंग बंधु से लेकर सौदान सिंह और अब पवन साय की ताकत का अहसास पार्टी के नेताकों को भी है, लेकिन कहा जाता है कि सत्ता आने के बाद भी ताकतवर होने का ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है कि लालबत्ती के लिए भी भीड़ मुख्यमंत्री से ज्यादा संगठन मंत्री जुटा ले। हालांकि कुछ लोग नीतिन नबीन और जामवाल के पास भी पहुंच रहे हैं लेकिन जब सब कुछ तय करने का ईशारा संगठन मंत्री की ओर किया जाए तो फिर क्यों न पवन साय को ही सत्ता केन्द्र मानकर भीड़ बढ़े।

और शायद यही वजह है कि बिल्डर्स से लेकर भ्रष्टाचारी हो या आपराधिक छवि वाले नेता ही क्यों न हो, सत्ता केन्द्र को ही खुश करने में लगे हैं।

ऐसे में यदि मंत्रालय में भी भाई साहब ! वाली संस्कृति का ही प्रभाव बढ़ रहा हो तो फिर अफसरों के काम काज पर इसका असर पड़‌ना तय है।

ऐसे में लालबत्ती की चाह में चक्कर पर चक्कर लगा रहे नेता अब पवन साय को खुश करने में लगे हैं लेकिन पवन साय को जानने वाले कहते हैं कि वे भी सायं सायं  में माहिर है।

सायं साये में माहिर तो सौदान सिंह भी थे लेकिन इतनी भीड़ वे भी नहीं खींच पाये थे, और चर्चा इसी बात की है कि जब इतनी भीड़ नहीं खींच पाने के बाद भी सौदान सिंह इतना खींच गये तो फिर भीड़ वाले कितना खींच रहे हैं। और शायद यही वजह है कि भाजपाई राजनीति में इन दिनों यह नारा जोरों से उछाला जा रहा है—-

  पवन नहीं यह झोंका है

 लालबत्ती का धोखा है...।

सोमवार, 2 सितंबर 2024

गजब पार्टनरशीप राजनीति में भी…

 गजब पार्टनरशीप 

राजनीति में भी…


ये अलग बात है कि गैर परिवार वाले याने जो परिवार नहीं चला पाते वे राजनीति में परिवार बाद का विरोध करते नहीं थकते, लेकिन इस राजनीति में शामिल लोग मौका मिलते ही अपनी संतानों को राजनै‌तिक लाभ दिलाने में कोई कसर भी नहीं छोड़ते ।

लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति में पार्टनरशीप का खेल भी गजब है। कारोबार से लेकर राजनीति तक पार्टनरशीप का  ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलेगा। बाक़ी और किस किस मामले में पार्टनरशीप चल रही है इसका खुलासा बाक़ी है।

रियल स्टेट के कारोबार में पार्टनरशीप के बाद अब रिटेल के क्षेत्र में पार्टनरी करने वाले राजीव अग्रवाल और छगनलाल मुंदडा को लेकर इन दिनों पार्टी के भीतर यदि खूब चर्चा चल रही है तो इसकी वजह साय सरकार की वह प्रतिक्षारत लालबत्ती की सूची है जिसमें एक पार्टनर का नाम धड़ल्ले से वायरल हो रहा है,। रमन सरवार में एक पार्टनर छ‌गन‌लाल मुंदड़ा को लालबत्ती भी मिल चुका है। उसे सीएसआईडीसी वा चेयरमेन बनाया गया था। इस बार वायरल सूची के 18 वे नम्बर में इसी पद पर राजीव आवाल का नाम है। भाजपाई चर्चा की बात करें तो दोनों के राजनैतिक जीवन में भी पार्टनर शीप का जबरदस्त समानता देखने को मिल रहा है। यानी दोनों पार्षद चुनाव लड़ चुके हैं। मुंदड़ा एक बार तो राजीव अग्रवाल दो बार । 

लेकिन वार्ड मेबर का चुनाव नहीं जीत पाने वाले इन दोनों पार्टरों का संगठन में भी प्रभाव कम नहीं है। दोनों ही पार्टनर भारतीम जनता पार्टी का रायपुर शहर का जिलाध्यक्ष भी बन चुके है।

दोनों ही विधानसभा का टिकिट मांगते रहे लेकिन मिला नहीं।

लालबत्ती वाले मामले में जो पार्टनरी की कमी अधूरी रह गई है क्या वह भी पूरा होने जा रहा है क्योंकि वायरल सूची तो यही बता रहा है।

दरअसल इस पार्टनरी में अभी छगन भारी पड़ गये है, लालबत्ती के मामले में। ऐसे में वायरल सूची ही असली हुई तो यह भी एक रिकार्ड ही होगा।

रविवार, 1 सितंबर 2024

जलवा बरकरार है मोहन सेठ का...

 जलवा बरकरार है मोहन सेठ का... 

दबाव में दूसरे पक्ष पर भी एफआईआर लेकिन गिर‌फ्तारी नहीं....


लेन देन के विवाद में कटोरा तालाब चौक में घंरे-दो घंटे तक अपनी गुंडई से धमा चौकड़ी मचाने और गुजरने वालों को दहशत में डालने वाले भाजपाईयों को पकड़‌ने में पुलिस के हाथ पांव फूलने लगे हैं। भारी दबाव में दूसरा पक्ष सचिन मेधानी की रिपोर्ट पर भी एक आई आर तो दर्ज कर ली गई लेकिन सप्ताह बीत जाने के बाद भी किसी भी पक्ष से गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। कहा जाता है कि दोनों ही गुट के लोग रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल के करीबी है।

ज्ञात हो कि लेन देने के विवाद के चलते 27 अगस्त को नेताजी होटल वाले राहुल चंदनानी और नाज का व्यवसाय करने वाले सचिन मेधानी गुट आपस में भीड़ गये थे । दोनों ही गुट के बीच लेन देने का विवाद हाथा पाई में तब्दिल हो चौक हो गया और कटोरा तालाब चौक पर मारपीट और गाली गलौच के साथ धमाचौकड़ी की जाने लगी। लोगों का राह चलना मुश्किल हो गया। अश्लील गाली गलौच के चलते राह चलती महिलाएं शर्मसार होने लगी और लोग  इधर उधर भागने लगे। यह सब धमाचौकडी तब शांत हुआ जब एक जुट वहां से चला गया।

इसके बाद पुलिस ने राहुल चंदनानी की रिपोर्ट पर सचिन मेघनी सहित उनके आधा दर्जन साथियों के खिलाफ रिपोर्ट तो लिख ली लेकिन सचिन मेघानी से सिर्फ आवेदन लिया गया। इसके  बाद दोनों के बीच ‌समझौता कराने का खेल शुरु हुआ। इधर सचिन के आवदेन पर जब दबाव बढ़ा तो पुलिस को एफ़आईआर करनी पड़ी ।

सूत्रों की माने तो इस मामले को लेकर बीजेपी के क़द्दावर नेता के दबाव के चलते पुलिस किसी की भी गिरफ्तारी नहीं कर रही है। जबकि इस घटना के चलते कटोरा तालाब चौक जैसे व्यस्ततम चौक में न केवल चक्काजाम जैसे हालात थे लोगों में दहशत का भी माहौल था।

सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि राजनैतिक द‌बाव के चलते पुलिम गिरफ्तार नहीं कर रही है। कहा जाता है सचिन मेघानी और राहुल चंदनानी दोनों ही रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के करीबी है और इसमें से सचिन मेघानी को तो भाजपा ने पार्षद चुनाव भी लड़‌वाया है।

बहरहाल इस घटना को लेकर जो चर्चा चल रही है उसके मुताबिक़ भले ही बीजेपी ने बृजमोहन अग्रवाल को राज्य की राजनीति से किनारे कर दिया हो लेकिन उनके जलवे का असर अब भी शासन प्रशासन में बरकरार है और इसका प्रचार ख़ुद मोहन समर्थक शान से कर रहे हैं।

शनिवार, 31 अगस्त 2024

लौट के बुद्धू घर को आये...

 लौट के बुद्धू घर को आये...


एक सामान्य आदमी के लिए विदेश जाने का मोह क्या होता है इसका तो पता नहीं, लेकिन सरकारी खर्चे में विदेश यात्रा के मोह से बच पाना हर किसी के बस में नहीं है। कई नेता तो सरकारी खर्च में विदेश जाने का फर्जी उपाय भी कर लेते हैं, कुछ सफल हो जाते हैं तो कुछ….!

ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार के उपमुख्यमंत्री अरुण साव का विदेश जाने के सपने का टूटना कितना गजब है यह बताने की इसलिए जरूरत नहीं है कि रिमोट पर चलने वाली सरकार के काम काज सुपर सीएम देख रहे हैं और अपने से कम होशियार या अनुभवहीन लोगों की फौज, कब किसकी बेइज्जती करवा दे, कहा नहीं जा सकता ।

लेकिन अमेरिका जाने के लिए मरे जा रहे की तर्ज पर दिल्ली में लगभग सप्ताह भर से डेरा डालने के बावजूद यदि ख़ाली हाथ लौट के आना बड़े तो इससे दुर्भाग्यजनक बात शायद दूसरी नहीं हो सकती। कहते हैं कि संघियों का अमेरिका के प्रति मोह नया नहीं है, संघ के प्रचारक से प्रधानमंत्री बने नरेद्र मोदी ने तो प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका जाने के लिए किसी ने सरकारी बुलावे का इंतजार तक नहीं कर सके थे।

ऐसे में यदि अरुण साव अपने अधिकारी कमलप्रीत के साथ वीजा लेने यदि दिल्ली में डेरा डाले थे तो क्या हुआ। 

वैसे भी भारी माकम बजट वाले जल जीवन मिशन में उनके रहते कौन सा भ्रष्टाचार रूक गया है, लेकिन वीजा नहीं मिलने को लेकर मंत्रालय से लेकर पार्टी नेताओ में चल रहे क़िस्से भी कम खतरनाक नहीं है, नवा बईला के चिक्कन सिंग से लेकर अनाड़ी का… सत्यानाश तक की कहावत। 

अब देखना है कि अनुभवहीनता के चलते इस घोर बेईज्जती का हिसाब किस-किस अधिकारियों से लिया जाना है। 

शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

दयाल दास की दुविधा…

 दयाल दास की दुविधा


बलौदा बाजार हिंसा में समाज की नाराजगी की परवाह नहीं कर विष्णु देव साय सरकार के लिए सीना ठोंक कर ढाल बनने वाले प्रदेश सरकार के मंत्री दयालदास बघेल इन दिनों भारी दुविधा में है, और कहा जा  रहा है कि इस दुविधा का असर भी अब दिखाई देने लगा है।

द‌याल दास की दुविधा क्या है यह हम बताये उससे पहले बता देते हैं कि रमन सरकार में दो दो बार मंत्री रह चुके द‌याल दास बघेल ने जब तीसरी पारी की शुरुआत की तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि समाज के गुरु को चुनावी पटखनी देने के बाद उन्हें विष्णुदेव सरकार पर आये मुसिबत के लिए समाज से भी नाराजगी मोल लेनी होगी।

हालांकि आरक्षित सीटों से लड़ने वाले भाजपाई यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि चुनावी जीत में अपने समाज से ज्यादा दूसरे समाज के वोट से ही वे चुनाव जीतते हैं इसलिए बलौदाबार हिंसा को लेकर समाज के बेगुनाहो की पुलिसिया प्रताड़ना पर भी चुप्पी रही।वैसे भी इस तरह की नाराजगी की परवाह भाजपा से जुड़े नेता नहीं करते।

लेकिन दुविधा यह नहीं है कि समाज के लोग नाराज होंगे तो क्या होगा, दुविधा तो यह है कि  क्षेत्र के लोगों को अब मिलने के लिए नया रायपुर तक आना होगा। 

ऐसे में सतनाम सदन कैसे और कब छोड़ा जाए या नहीं छोड़ा जाए। दरअसल नई राजधानी में मंत्रियों के लिए बंगला तैयार हो चुका है और द‌यालदास बघेल के नाम एक बंगला आबंटित भी किया जा चुका है। बंगले के रखरखाव पर खर्च भी हो रहा है ऐसे में उन पर सतनाम सदन छोड्‌ने का दबाव भी बढ़‌ने लगा है।

एक तरफ नये बंगले में जाने का मोह तो दुसरी तरफ जनता से कटने का डर ? अब इस दुविधा से मुक्ति का मार्ग कोई कैसे सुझा सकता है। क्योंकि वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि पार्टी का रवैया क्या होगा।