रविवार, 18 मई 2025

जिसे मानद उपाधि देने का विरोध उसे ज्ञान पीठ…

 जिसे मानद उपाधि देने का विरोध उसे ज्ञान पीठ… 


वैसे तो यह किसी से छिपा नहीं है कि इस दौर में सत्ता का खेल क्या है, अपने लोगों को नवाज़ने के इस दौर में जब रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ देने की घोषणा हुई, तो इसे लेकर कई सवाल खड़े हो गये, अभी ज़्यादा वक्त नहीं बिता है जब अप्रैल २०२५ में उन्हें सागर विश्वविद्यालय ने डी लिट की उपाधि देने की घोषणा को भारी विरोध में निलंबित करना पड़ा। इसकी शिकायत राष्ट्रपति तक हुई , और अब ज्ञानपीठ देने पर सवाल खड़े हो गये है 

क्या है डी लिट.. का मामला 


डॉ. हरिसिंह गौर यूनिवर्सिटी अपने 33वें दीक्षांत समारोह में जगद्गुरु रामभद्राचार्य को डी. लिट की मानद उपाधि देने जा रही है. इसके लिए विश्वविद्यालय को राष्ट्रपति से भी मंजूरी मिल गई है. ये बात सामने आते ही फोरम ऑफ प्रोग्रेसिव एकेडेमिया के बैनर तले देश भर के शिक्षाविद, कानूनविद, पत्रकार, समाजसेवी, पूर्व छात्र और शोध छात्र विरोध में उतर आए हैं. वो जिला और विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष विरोध जता रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस फैसले पर विरोध प्रकट किया है. उनका कहना है कि ये फैसला लोकतांत्रिक, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता के मूल्यों को कमजोर करता है. साथ ही वंचित समुदाय के लिए पीड़ादायक संदेश भी है.

रामभद्राचार्य पर लगा रहे हैं गंभीर आरोप

रामभद्राचार्य को दी जा रही डी. लिट की मानद उपाधि का विरोध करने वालों का तर्क है कि "रामभद्राचार्य विद्वान होने के साथ-साथ विवादास्पद भी हैं. उन्होंने कई बार अपने भाषण और वक्तव्यों में डाॅ. भीमराव अंबेडकर, बौद्ध धर्म और दलित समुदाय के विरुद्ध आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां की है. उनके बयान समाज में विभाजन पैदा करने वाले, जातिवादी और अपमानजनक होते हैं. ऐसे बयान हमारे संविधान के बंधुत्व, समानता और गरिमा के प्रतिकूल हैं."

इसके अलावा उनका कहना है कि"इस यूनिवर्सिटी के संस्थापक डाॅ. हरीसिंह गौर प्रगतिशील सुधारक, विधि विशेषज्ञ और बौद्ध चेतना से युक्त व्यक्ति थे. जिन्होंने दलितों, महिलाओं और पिछड़ों के लिए संघर्ष किया और वैज्ञानिक सोच, लैंगिक समानता और सामाजिक उत्थान को अपने जीवन का आधार बनाया. ऐसे में यूनिवर्सिटी द्वारा ऐसे व्यक्ति को सम्मान देना, उनके मूल्यों के विपरीत, विडंबना पूर्ण और यूनिवर्सिटी की मूल आत्मा का अपमान है."

भारत में साहित्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान—

ज्ञानपीठ पुरस्कार—सिर्फ भाषा और शैली का ही नहीं, बल्कि लेखक के सामाजिक दृष्टिकोण, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का भी सम्मान माना जाता है। इसी सम्मान का 58वां संस्करण 2024 में संस्कृत विद्वान जगद्गुरु रामभद्राचार्य को दिया गया। लेकिन इस निर्णय ने साहित्यिक, सामाजिक और बौद्धिक वर्गों में गहरी चिंता और आलोचना उत्पन्न की है।


रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ क्यों मिला?

सीतामढ़ी के प्रो राजकुमार गुप्ता लिखते हैं जगद्गुरु रामभद्राचार्य को यह पुरस्कार उनके संस्कृत साहित्य में योगदान के लिए दिया गया। वे एक अंध विद्वान हैं और उन्होंने विभिन्न ग्रंथों की रचना व व्याख्या की है, जिनमें धार्मिक-दार्शनिक और काव्यात्मक रचनाएँ प्रमुख हैं। उनके समर्थक उन्हें तुलसीदास की परंपरा का आधुनिक व्याख्याता मानते हैं।

लेकिन सवाल ये उठता है-क्या सिर्फ पांडित्य और भाषिक लेखन ही पुरस्कार के लिए पर्याप्त हैं? क्या लेखक की सामाजिक संवेदनशीलता, जातीय समरसता, और संविधान के मूल्यों के प्रति निष्ठा का कोई मूल्य नहीं रह गया?

विवादित और घृणास्पद बयान:

1. जातिसूचक टिप्पणी: “जो राम को नहीं भजता वो चमार है”-

जनवरी 2024 में रामभद्राचार्य का एक वीडियो सामने आया जिसमें उन्होंने कहा:“जो राम को नहीं भजता, वो चमार है।”

यह कथन न सिर्फ घोर जातिवादी है, बल्कि दलित समुदाय का अपमान भी है। देशभर में इस बयान की निंदा हुई और उनकी गिरफ्तारी की माँग उठी। (TV9Hindi)

बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनका इरादा किसी जाति को अपमानित करने का नहीं था, लेकिन सार्वजनिक मानसिकता और इतिहास को देखते हुए यह माफ़ी अपर्याप्त मानी गई।

2. डॉ. भीमराव अंबेडकर पर अमर्यादित टिप्पणी-

रामभद्राचार्य ने अपने एक भाषण में कहा: "अगर अंबेडकर को संस्कृत आती, तो वो मनुस्मृति को नहीं जलाते।"

यह कथन न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से ग़लत है (क्योंकि अंबेडकर को संस्कृत का ज्ञान था), बल्कि यह मनुस्मृति जैसे जातिवादी ग्रंथ के समर्थन में दिया गया बयान है, जिसने सदियों से शूद्रों, स्त्रियों और अछूतों के साथ भेदभाव किया। (The Sootr)

3. वर्ण–उपवर्ण के बीच जातिगत भेद-

रामभद्राचार्य ने एक मंच से कहा था कि:"चौबे, पाठक, दीक्षित, उपाध्याय नीच कुल के ब्राह्मण हैं।"

इस तरह का बयान ब्राह्मणों के भीतर भी जातिगत ऊँच-नीच को बढ़ावा देता है, जो मनुवादी सोच का स्पष्ट प्रमाण है।

4. पाकिस्तान के खिलाफ उन्मादी भाषण-


नवंबर 2024 में जयपुर में श्रीराम कथा के दौरान उन्होंने कहा:

 “अब वह दिन दूर नहीं जब विश्व के नक्शे से पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जाएगा।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान की ज़मीन वापस लेनी है, और ये हनुमान जी की कृपा से संभव होगा। (Patrika)

यह बयान धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाला है, जो अहिंसा और विवेक आधारित संवाद की भारतीय परंपरा के विरुद्ध है।

5. आरक्षण पर अपमानजनक टिप्पणी-

उन्होंने आरक्षण पर बोलते हुए कहा: “सवर्ण बच्चा 100% लाकर जूता सिलाई करे, और दलित 4% लाकर कलेक्टर बने – ये कैसा न्याय है?”

यह बयान न सिर्फ दलितों की योग्यता का अपमान करता है, बल्कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा पर भी हमला है। (Navbharat Times)


कई संगठनों ने उनकी गिरफ्तारी और पद्म विभूषण/ज्ञानपीठ जैसे सम्मानों को वापस लेने की माँग की है। सोशल मीडिया पर #RevokePadmaVibhushan और #ArrestRambhadracharya जैसे हैशटैग ट्रेंड कर चुके हैं।

सवाल जो देश को सोचने चाहिए-

क्या किसी लेखक या संत को सिर्फ शास्त्र ज्ञान और भाषा के बल पर सम्मानित किया जाना चाहिए, जब वह सार्वजनिक रूप से संविधान, दलित समाज, और सामाजिक समरसता के खिलाफ बोलता हो?

क्या ज्ञानपीठ जैसी संस्था का यह नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वह सिर्फ साहित्यिक गुणवत्ता नहीं, बल्कि लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता को भी तौले?


निष्कर्ष- रामभद्राचार्य भले ही संस्कृत के ज्ञाता हों, लेकिन उनके जातिवादी, दलित-विरोधी और उन्मादी अंधविश्वासी वक्तव्य उन्हें 'ज्ञान' और 'विवेक' के प्रतीक के रूप में अयोग्य बनाते हैं।

भारत में आज आवश्यकता है ऐसे साहित्य और विचारों की जो समावेशिता, संविधानवाद, और सामाजिक न्याय को बढ़ावा दें, ऐसे विचारकों की जो सदियों पुरानी असमानताओं को नए रूप में प्रतिष्ठित करते हो…

जब इंदिरा ने पूरी दुनिया हिला दी…

 जब इंदिरा ने पूरी दुनिया हिला दी…

यह इतिहास की ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नहीं भूल सकता, और यहीं से शुरू हुआ था इंदिरा का आयरन लेडी कहलाने का सफ़र…

बात १८ मई से पहले की थी जब इंदिरा १९७२ में अचानक दौरे में परमाणु केंद्र जा पहुँची थी, शायद उनके मन में एक ध्येय था…



दिन 18 मई 1974, यानि आज का ही दिन।

सम्पूर्ण देश के लिए यह दिन एक इतिहास बन चुका था, ऑपरेशन 'स्माइलिंग बुद्धा' चलाया जा चुका था

अब  भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के पांच स्थायी सदस्यों के अलावा वह देश बन चुका था जिसने परमाणु परीक्षण करने का साहस किया था।

और इस परीक्षण की पूरी पटकथा सन 1972 में लिखी गयी थी जब इंदिरा जी ने 'भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र' का दौरा किया था।

अब समझ में आया इंदिरा जी और परमाणु केंद्र के वैज्ञानिकों के मध्य क्या बात हुई होगी....

इंदिरा जी को इंसानों की काफी तजुर्बेदार परख थी, और वही परख हमारे नायाब परमाणु वैज्ञानिकों में देखकर, सिर्फ बातों ही बातों में उन्हें परमाणु परीक्षण करने की अनुमति दे 

स्माइलिंग बुद्धा ( विदेश मंत्रालय का पदनाम: पोखरण-I ) 18 मई 1974 को भारत के पहले सफल परमाणु हथियार परीक्षण का कोड नाम था। राजस्थान में भारतीय सेना के पोखरण परीक्षण रेंजमें परमाणु विखंडन बम का विस्फोट किया गया था। संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य खुफिया जानकारी के अनुसार , इस ऑपरेशन को हैप्पी कृष्णा नाम दिया गया था । भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस परीक्षण को एक शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटबताया । 

इस बम का निर्माण राजा रमन्ना की अध्यक्षता वाले भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के वैज्ञानिकों ने किया था , जिसमें बीडी नाग चौधरी की अध्यक्षता वाले रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) की सहायता ली गई थी और होमी सेठना की अध्यक्षता वाले परमाणु ऊर्जा आयोग की देखरेख में इसका निर्माण किया गया था। बम के लिए परमाणु सामग्री के उत्पादन में कनाडा द्वारा दिया गया एक CIRUS परमाणु रिएक्टर और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आपूर्ति किया गया भारी पानी ( न्यूट्रॉन मॉडरेटर के रूप में उपयोग किया जाता है) का उपयोग किया गया था । परीक्षण और विस्फोट की तैयारी अत्यधिक गोपनीयता में की गई थी। इसे प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा कड़ा नियंत्रण दिया गया था और वैज्ञानिकों की टीम के बाहर बहुत कम लोगों को परीक्षण के बारे में पता था। 

यह उपकरण प्लूटोनियम कोर के साथ विस्फोट-प्रकार केडिजाइन का था । इसका क्रॉस सेक्शन षट्कोणीय था, व्यास 1.25 मीटर (4 फीट 1 इंच) था, और इसका वजन 1,400 किलोग्राम (3,100 पाउंड) था। इसे इकट्ठा किया गया, एक षट्कोणीय धातु तिपाई पर रखा गया, और रेल पर परीक्षण स्थल पर ले जाया गया। परीक्षण 18 मई 1974 को 8.05 IST पर किया गया था। परीक्षण के सटीक परमाणु उत्पादन पर डेटा अलग-अलग और दुर्लभ रहा है, और स्रोत संकेत देते हैं कि बम ने छह से दस किलोटन के बीच उत्पादन किया होगा ।

यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के बाहर किसी देश द्वारा किया गया पहला पुष्टिकृत परमाणु हथियार परीक्षण था । इस परीक्षण के परिणामस्वरूप परमाणु प्रसार को नियंत्रित करने के लिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) का गठन हुआ । परीक्षण के बाद, भारत ने 1998 में पोखरण-IIनामक एक और परमाणु परीक्षण किया ।

परीक्षण के बाद भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को बहुत लोकप्रियता मिली, जो 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद अपने चरम पर थी। कांग्रेस पार्टी की समग्र लोकप्रियता और छवि में वृद्धि हुई और इसे भारतीय संसद में अच्छी प्रतिक्रिया मिली । 1975 में, सेठना, रमन्ना और नागचौधरी को भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया । पांच अन्य परियोजना सदस्यों को भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री मिला । भारत ने लगातार कहा कि यह एक शांतिपूर्ण परमाणु बम परीक्षण था और इसका अपने परमाणु कार्यक्रम का सैन्यीकरण करने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन स्वतंत्र निगरानीकर्ताओं के अनुसार, यह परीक्षण एक त्वरित भारतीय परमाणु कार्यक्रम का हिस्सा था ।

शुक्रवार, 16 मई 2025

राष्ट्रपति की चिट्ठी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी…

 राष्ट्रपति की चिट्ठी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी…

इन दो खबरों को सिर्फ़ खबर की तरह लेना देश की दशा और दिशा मुँह फेरना जैसा है। सीजफ़ायर की तरह भले ही इस खबर से लोग न चौंके होंगे लेकिन यह खबर उतनी ही चौंकाने वाली है…


हम जस्टिस बेला एम त्रिवेदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की रुख़ पर आयें उससे पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि आख़िर राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र क्यों लिखा ।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के ऐतिहासिक फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई थी। राष्ट्रपति ने इस फैसले को संवैधानिक मूल्यों और व्यवस्थाओं के विपरीत बताया और इसे संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करार दिया। संविधान की अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है। यह प्रावधान बहुत कम उपयोग में आता है, लेकिन केंद्र सरकार और राष्ट्रपति ने इसे इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगता है कि समीक्षा याचिका उसी पीठ के समक्ष जाएगी जिसने मूल निर्णय दिया और सकारात्मक परिणाम की संभावना कम है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें संघीय मुद्दों पर अनुच्छेद 131 (केंद्र-राज्य विवाद) के बजाय अनुच्छेद 32 (नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा) का उपयोग क्यों कर रही हैं। उन्होंने कहा, “राज्य सरकारें उन मुद्दों पर रिट याचिकाओं के माध्यम से सीधे सुप्रीम कोर्ट आ रही हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 131 के प्रावधानों को कमजोर करता है।”

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट इस सवाल को सीधे ख़ारिज कर सकती है…

अब इस सवाल को लेकर राष्ट्रपति पर सवाल उठाये जाने लगे है और इसे सत्ता यानी मोदी सरकार का पत्र कहा जा रहा है

दूसरी खबर भी कम चौंकाने वाला नहीं है , आख़िर वकीलों ने यह क्यों किया 

दरअसल जस्टिस बेला त्रिवेदी, सुप्रीम कोर्ट की एक ऐसी जज जिसके कानूनी योग्यता, संविधान के प्रति निष्ठा तथा आचरण के तौर पर ईमानदारी  एवं सत्यनिष्ठा पर सदैव सवालिया निशान लगा रहा,

गुजरात निवासी बेला त्रिवेदी,मोदी शाह गैंग की ज्यूडिशियल प्यादों में गिनती की जाती थीं, नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में उनकी कानून सचिव थीं। ये कभी किसी हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश नही रहीं, किन्तु सत्ता के दांव पेंच से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया गया। गणपति बप्पा, भक्त पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल में सरकार विरोधी हर केस की सुनवाई इसी बेला त्रिवेदी के बेंच को सौंपते थे, बल्कि नियम परिपाटी को ताख पर रखकर कुछ केस इन्हें दिए गए तब वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण एवं दुष्यंत दवे, सिंघवी जैसे बड़े वकीलों ने इसके खिलाफ सार्वजनिक तौर पर आवाज उठाया था।

जैसे कि वकील प्रशांत भूषण ने जस्टिस बेला त्रिवेदी की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष मामलों के समूह को 'मनमाने ढंग से' सूचीबद्ध करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को पत्र लिखा था। ये मामले त्रिपुरा दंगों पर तथ्यान्वेषी रिपोर्ट के संबंध में पत्रकारों और वकीलों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA Act) लागू करने को चुनौती देते थे।


हालांकि, 29.11.2023 को मामलों के बैच को जस्टिस त्रिवेदी के नेतृत्व वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया। भूषण ने कहा कि यह सूची मनमानी है और सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आधार पर न्यायिक पक्ष पर अभ्यास और प्रक्रिया और कार्यालय प्रक्रिया पर हैंडबुक के खिलाफ है।

पत्र में कहा गया कि लंबित मामलों को सीनियर पीठासीन न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना है और पहले सब-जज को केवल तभी सूचीबद्ध किया जाए, जब सीनियर पीठासीन न्यायाधीश अनुपलब्ध हो।

 और अब प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने शुक्रवार को रिटायर्ड जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी के लिए सामान्य विदाई समारोह आयोजित नहीं करने के ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (एससीबीए) के फैसले की निंदा की...

परंपरा के अनुसार, एससीबीए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए विदाई समारोह आयोजित करता है और न्यायमूर्ति त्रिवेदी के मामले में एक असाधारण निर्णय लिया गया,.. 

अब आप समझ ही गये होंगे कि सत्ता क्यों आवारा हो जाती है…



गुरुवार, 15 मई 2025

देश से आख़िर क्या छुपाया जा रहा है…

 देश से आख़िर क्या छुपाया जा रहा है…



अचानक हुए युद्धविराम यानी सीजफ़ायर के बाद कई तरह के सवाल उठने लगे हैं

अदानी को लेकर 

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के दुश्मन देश की तरह व्यवहार को लेकर

चीन के खुले आम पाकिस्तान के साथ खड़ा होने को लेकर

और अब तुर्की के ख़िलाफ़ हिन्दुवादियों और केट को लेकर



पिछले दिनों में चौंकाने वाली कई खबरें आई लेकिन एक चीन से एक अमेरिका से आई खबर ने हिला कर रख दिया ।चीन से खबर आई कि उसने उसके नक्शे मैं अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा नहीं बताया है चीन  से ही दूसरी खबर आई कि  अंबानी ने चीन की  कंपनी के साथ एक करार किया जिसके बाद भारतीय विमान में बैठने वाले हर यात्री का जो बीमा होता है उसे वह कंपनी अंजाम देगी मतलब भारत से बैठने वाले जितने भी विमान यात्री हैं उसका डाटा हमेशा चीन के पास रहेगा सुरक्षा की दृष्टि से यह कितना उचित रहेगा यह आने वाले दिनों में परीक्षण का विषय होगा!

तीसरी खबर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आई जिसमें उन्होंने आईफोन बनाने वाली कंपनी के निदेशक टीम   कुक    को कहा कि भारत में आईफोन बनाना बंद करें क्योंकि भारत पर टैरिफ का बहुत बड़ा प्रभार लगने वाला है यह दरअसल भारत के संप्रभुता पर हमला है लेकिन क्या इतनी नैतिक ताकत है हमारी सरकार में की अमेरिका के इस कदम का कोई डिप्लोमेटिक विरोध कर सके! 


इसी के साथ ही एक खबर यह भी रही कल अंबानी ने अरब के नवाब  के साहबजादे के साथ किसी व्यापार की डील की !

बचे हुए राफेल के लिए फ्रांस से हिंदुस्तान की डील कैंसिल हो गई!

और भारत के एक और दुश्मन पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश को आज अंतरराष्ट्रीय मुद्रा निगम से अरबो रुपए का लोन दिया गया!

प्रमोद जैन के मुताबिक़ यह सारी खबरें सामान्य खबरें नहीं है!


1_किसी कंपनी को भारत में उद्योग न लगाने के लिए प्रेरित करना भारत के संप्रभुता के साथ एक खिलवाड़ है और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी इस तरह का वाकया सामने नहीं आया है अमेरिका का यह बयान निश्चित रूप से भारत की कूटनीति की अ सफलता का परिचायक है! 


२_एक तरफ ट्रंप कहते हैं उनके कहने से युद्ध रोक दिया और दूसरी तरफ भारत के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है नमस्ते ट्रंप कहने वाली सरकार खामोश बैठी है!


3_दूसरी और सरकार के अत्यंत प्रिय उद्योगपति अंबानी जी अरब गए हैं, जब ट्रंप वहां है क्या ऑपरेशन सिंदूर का सौदा कर दिया गया है! 


4_अंबानी ने तो बेशर्मी की हद कर दी एक तरफ भारतीय जनता पार्टी की आईटी सेल और इनका अनुसांगिक संगठन तुर्की और अजर बेजान की बाय काट की बात करते हैं दूसरी तरफ जिस चीन की मिसाइल ने पाकिस्तान को दुस्साहस करने का मौका दिया उसके साथ इसी सरकार के दत्तक पुत्र बीमा बीमा खेल रहे हैं! 

यह कैसी कूटनीति है! 

5_बचे हुए राफेल का सौदा कैंसिल कर शायद सरकार ने स्वीकार कर लिया है राफेल सेना के लिए उपयोगी नहीं है, राफेल का भ्रष्टाचार भारतीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है!

6_दक्षिण एशिया में पैर जमाने के लिए अमेरिका एक के बाद एक भारत विरोधी राष्ट्रों को एस्टेब्लिश करने की कोशिश कर रहा है बांग्लादेश इसका ताजा उदाहरण है!

एक कहावत है आक्रमण जब किया जाता है जब सामने वाला पक्ष सबसे कमजोर होता है क्या इस तथा कथित युद्ध विराम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति कमजोर हुई है और कूटनीति अ सफल!


और आज भारत की तर्ज पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति शाहबाज शरीफ ने भी एक एयर बेस पर जाकर हजारों की जनसमूह के बीच में टैंक पर खड़े होकर पाकिस्तानी अवाम को अपना भाषण दिया जिसमें उन्होंने कहा हमने भारत का घमंड तोड़ दिया है अपने आप को बहुत संपन्न समझने वाली इंडियन आर्मी के राफेल और एस 400 विमान पाकिस्तान आर्मी की  रक्षा नीति से ध्वस्त कर दिए ! इन खबरों की सच्चाई की पुष्टि सरकार और सेना ही कर सकती है , पर जिस तरह राफेल के बची हुई खरीद के सौदा निरस्त करने की खबर है उसे लगता है कहीं कोई झोल तो है! 

तिरंगा यात्रा की तरह शीघ्र ही आप सुन लेंगे पाकिस्तान में भी उनके ध्वज के साथ यात्रा निकाली जा रही है क्योंकि पाक के प्रधान मंत्री और उनकी सेना का खेल कौन नहीं जानता…।

बुधवार, 14 मई 2025

मोदी के ये दो अफ़सर क्यों निपट गये..

 मोदी के ये दो अफ़सर पंद्रह दिन के भीतर क्यों निपट गये..


देश युद्धविराम के कारणों पर उलझा है, मोदी सत्ता तिरंगा यात्रा निकाल कर चुनावी लाभ लेने तत्पर है,

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप युद्धविराम का श्रेय लेते घूम रहे है

अदाणी को लेकर युद्धविराम के संबंध तलाशे जा रहे है 

तो अंबानी का खेल भी चर्चा में इसलिए है क्योंकि अब मोदी के पसंदीदा दो अफ़सरों पर पंद्रह दिन के भीतर गाज गिर गई, दोनों ही अफ़सर बर्खास्त किए गये.

केंद्र सरकार ने आरपी गुप्ता को भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) के चेयरमैन के पद से बर्खास्त कर दिया। सरकार ने आरपी गुप्ता को को इस पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया है। उनका कार्यकाल एक महीने बचा था। लेकिन अचानक उन्हें हटाए जाने का कोई कारण अभी पता नहीं चला है। सरकार ने शनिवार को आरपी गुप्ता को हटाने का आदेश जारी किया जिसमें फैसले के पीछे कोई वजह नहीं बताई गई है। हालांकि, कई विवादों में निगम और सौर ऊर्जा से संबंधित बड़ी कंपनियों के नाम सामने आ रहे थे। आरपी गुप्ता जून 2023 से भारतीय सौर ऊर्जा निगम के अध्यक्ष थे।

लेकिन मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ भारतीय सौर ऊर्जा निगम का आंतिरक संचालन भी विवादों में आया। पिछले वर्ष अक्तूबर महीने में खबरें आईं कि उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस पावर ने टेंडर लेने के लिए निगम को दिए दस्तावेजों में गड़बड़ी की थी, बावजूद इसके निगम ने उसे टेंडर में बोली लगाने की अनुमति दे दी थी। दूसरी तरफ, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ने जनवरी में सौर ऊर्जा निगम (SECI) की पहली ग्रिड स्तरीय बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) के लिए 2022 में निर्धारित टैरिफ को खारिज कर दिया था।

अमेरिकी सिक्यॉरिटीज एंड एक्सचेंज कमिशन (USSEC) ने दावा किया था कि उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनी अडानी ग्रीन एनर्जी ने उत्पादित बिजली की बिक्री के लिए राज्य सरकारों को रिश्वत देने शुरू किए जिसकी जानकारी उसने अपने अमेरिकी निवेशकों को नहीं दिया। इस कारण गौतम अडानी की इस कंपनी के खिलाफ अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में मुकदमा दर्ज किया गया। हाल में खबर आई थी कि अडानी समूह के प्रतिनिधियों ने इस मुकदमे को रफा-दफा करवाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से लगातार संपर्क किया है।

मंत्रालय ने 2011 में भारतीय सौर ऊर्जा निगम को पहली नवीकरणीय ऊर्जा कार्यान्वयन एजेंसी नियुक्त किया था। इसे सौर, पवन, हाइब्रिड और एफडीआरई (फर्म एंड डिस्पैचेबल रीन्यूएबल एनर्जी) और बैटरी स्टोरेज जैसी रीन्यूएबल एनर्जी प्रॉजेक्ट्स का टेंडर जारी करना था। कुल 40 गीगावॉट में निगम के पास 12 गीगावॉट की खरीद और बिक्री का दायित्व दिया गया था जिस पर काम नहीं हो सका। ज्यादातर प्रॉजेक्ट्स से पैदा हुई ऊर्जा का कोई खरीदार नहीं मिला। अडानी ग्रीन एनर्जी, रीन्यू पावर, सॉफ्टबैंक एनर्जी, अज्योर पावर और एसीएमई सोलर जैसे बड़ी ग्रीन पावर कंपनियों के प्रॉजेक्ट्स इस लिस्ट में शामिल हैं।

इससे पहले केवी सुब्रमण्यन को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के एग्जिक्युटिव डायरेक्ट पद से बर्खास्त कर दिया था। सुब्रमण्यम पर की गई इस कार्रवाई का भी केंद्र सरकार ने कोई कारण नहीं बताया था। हालांकि, इकनॉमिक टाइम्स ने खबर दी थी कि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने सुब्रमण्यम की किताब 'India@100: Envisioning Tomorrow's Economic Powerhouse' की करीब 2 लाख कॉपियों का ऑर्डर प्रकाशन से पहले ही दे दिया था। करीब 7.5 करोड़ रुपये के इस ऑर्डर पर बैंक मैनेजमेंट के अंदर विवाद पैदा हो गया था। आईएमएफ में केवी सुब्रमण्यम का कार्यकाल छह महीने बचा हुआ था।

मंगलवार, 13 मई 2025

युद्ध से भी बड़ा ज़हर…

 युद्ध से भी बड़ा ज़हर…


इसी ज़हर के भरोसे आरएसएस अपनी राजनीति साधते रही है , यह बात हर मंच से उठते रहा है 

क्या है वह ज़हर…

कहते है इंसान की फ़ितरत नहीं बदलती, और जब अमेरिका के सीजफ़ायर की घोषणा से बौखलाए नफ़रती चिंटुओं ने जब कर्नल सौफ़िया पर विषवमन शुरू किया तो इस खेल में बीजेपी के मंत्री विजय शाह ही नहीं पूरी बीजेपी एक्सपोज़ हो गई, क्या विजय शाह को हटाया जाएगा, 

लेकिन शुरुआत तो शिवांगी नरवाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्सी से हो चुकी थी 

इन सभी को गाली देने वाले एक ही थे, 

शालीनता की हर सीमा लांघने में तत्पर ये लोग कुछ भी कर सकते हैं 

यक़ीन मानिए ये लोग आतंकवादियों से भी ख़तरनाक है…

लेकिन आज हम एक और मुद्दा उठाना चाहते है , आख़िर आतंक के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में भारत अकेले क्यों पड़ गया, जबकि पूरा विश्व आतंक के ख़िलाफ़ है

कूटनीति फेल क्यों हो गई जबकि प्रधानमंत्री मोदी सौ देश घूम आए है

क्या इसकी वजह सिर्फ़ अदाणी है 

क्या है हमारे दूसरे देशों से रिश्ते…

भारत आज विश्व में अकेला है।

और ये किसी युद्ध की वजह से नहीं —

बल्कि “नफरती चिंटू” गैंग की वजह से है कहा जाय तो ग़लत नहीं होगा..


11 साल की विदेश नीति देखने के बाद इतना तो कोई भी समझ सकता है —इन नफ़रती चिंटू गैंग ने हमारी कूटनीति का बहुत नुकसान किया है


पहले पड़ोसी देशों को देखिए:


● मालदीव — जहाँ “इंडिया फर्स्ट” था, अब “इंडिया आउट” है। लक्षद्वीप विवाद में “नफरती चिंटू गैंग” ने ट्रोलिंग से देश की छवि डुबो दी। चीन ने मौक़ा देख लिया।


● बांग्लादेश — जिसे आज़ादी दिलाई, उसे हर चुनाव में “घुसपैठिया” कहा गया। CAA-NRC ने रिश्ते जला डाले। सीमा पर गोलीबारी है, ढाका खामोश है।


● श्रीलंका — जब ज़रूरत थी, भारत पीछे रहा। चीन ने बंदरगाह खरीद लिया। “नफरती चिंटू” तमिल भावनाओं की बात तो करता रहा, ज़मीनी मदद नहीं दी।


● नेपाल — 2015 की नाकाबंदी, फिर रामजन्मभूमि की राजनीति। आज हमारी ज़मीन उसके नक्शे में है — नफरती चिंटू उसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है और दिल्ली चुप है।


● भूटान — जो कभी सबसे करीबी था, अब कहता है — "भारत अब दोस्त नहीं, दबाव है।"


● म्यांमार — सेना ने लोकतंत्र कुचला, भारत ने चुप्पी साध ली। नफरती चिंटू गैंग रोहिंग्या पर नफ़रत फैलाकर नैतिक धरातल भी गंवा दिया।


और ग्लोबल मंच पर?


● रूस — शीतयुद्ध का साथी अब चीन के साथ है। भारत बस तेल का ग्राहक बन गया।


● अमेरिका — हथियारों की डीलें हैं, लेकिन लोकतंत्र और प्रेस फ्रीडम पर वहाँ बार-बार भारत को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।


● फ्रांस — राफेल के बाद भी भारत की गिरती रैंकिंग और मुसलमानों के प्रति घृणा को लेकर चिंता ज़ाहिर कर चुका है।


● ईरान — भारत का कभी विरोध नहीं किया ,  “नफरती चिंटू” ने इस्लाम को गाली दी और चाबहार पोर्ट से भारत हटा, चीन आ गया। 


● मलेशिया-इंडोनेशिया — मुस्लिम विरोधी नैरेटिव ने वर्षों पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को भी तोड़ दिया।


● फिलिस्तीन — भारत दशकों तक साथ था। अब सरकार इज़रायल के साथ हथियारों में व्यस्त है, जनता अकेली खड़ी है।


दरअसल दुनिया दोस्ती, भरोसे और स्थिरता की भाषा समझती है।





सोमवार, 12 मई 2025

मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…

 मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…


देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में एक बार फिर साफ़ किया कि पानी और खून साथ नहीं बह सकते, मुँह तोड़ जवाब दिया जाएगा, 

एक बार हमने इसलिए कहा कि यही बात पुलवामा के बाद और फिर पहलगाम के बाद बिहार में वे कह चुके थे

उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले रजत शर्मा को एक टीवी प्रोग्राम में क्या कहा उसे याद करने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि पीएम बनने के पहले की सारी बातें ऐसी ही वे करते रहे हैं

तब सवाल अब की बातों का है, सिजफ़ायर ने एक ही झटके में सब बदल दिया।

ट्रंप पर भी भरोसा न करें, तब किस पर?

ऑपरेशन का नाम चयन की सोच…

अब जब अमेरिका बीच में आ ही गया है और पीएम ने राष्ट्र के नाम संबोधन कर ही दिया है तब क्या इस पूरे प्रकरण की विवेचना अपने अपने ढंग से करने की छूट नहीं होनी चाहिए..

प्रमोद जैन लिखते हैं…

किसी भी प्रकरण की सफलता उसके परिणाम से आकी जाती है!

भले गेंद पूरे टाइम आपके पाले में रही, पर आखिरी मिनट में यदि पेनल्टी कॉर्नर पर सामने वाली टीम में आप पर गोल कर दिया,

तो आप जीता हुआ नहीं कह लाओगे!

पहलगाम के बाद कुछ नकारात्मक पहलू जो जनता को परेशान कर रहे हैं! 


1_सीजफायर यदि भारत की शर्तों पर हुआ है तो क्या भारत को पहलगाम और पुलवामा के आतंकवादियों के संदर्भ में अपनी बात नहीं रखनी चाहिए थी?

 और जो खुखार  आतंकवादी हैं उन्हें गिरफ्तार कर भारत में क्यों नहीं लाया गया? 


2_सीजफायर की घोषणा अमेरिका से करवा कर किसी तीसरे देश को भारत और पाकिस्तान के बीच में क्यों महत्व दिया गया? 


3_क्या भारत की विदेश नीति एक्सपोज नहीं हुई, ?


चीन ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया अमेरिका पर्दे के पीछे पाकिस्तान के साथ गल बहियां करता रहा, और रूस तटस्थ, ना यूरोपीय देशों का समर्थन मिला युद्ध के संदर्भ में ना नाटो के मुस्लिम देश भारत के साथ खड़े हुए ना कोई पड़ोसी मुल्क!


4_और तो और बीएसएफ का एक जवान जो अभी पाकिस्तान के अभिरक्षा में है उसे तक भारत सरकार ने वापस नहीं लिया!


5_हिंदुस्तान के भांड मीडिया ने इतना झूठ क्यों बोला? और भारत की रणनीति को कमजोर क्यों किया?


 इसके बावजूद सरकार द्वारा उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लिया गया! 


6_ट्विटर अकाउंट पर सेना के प्रवक्ता विपिन मिस्त्री को गालियां देकर, और पहलगाम के शहीद की पत्नी हिमांशी को जलील कर आखिर हिंदुस्तान के इन तथाकथित भक्तों ने कौन से संस्कारों का परिचय दिया?


7_अमेरिका और चीन कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीय करण करने की कोशिश कर रहे हैं, भारत सरकार ने यदि उचित  स्टेप नहीं लिए तो यह भारत के लिए बेहद तकलीफ भरा कार्य रहेगा और इसे लेकर भी देश की जनता बहुत चिंतित है!


8_जिस परमाणु युद्ध की विभीषका का डर दिखाकर यह तथाकथित सीज फायर किया गया है तो क्या भारत को इसका पूर्वानुमान नहीं था?

 यानी यह खुफिया तंत्र कीविफलता है !


9_जिस तरह राफेल के लिए फ्रांस में तकनीक देने से मना किया है और जिस तरह राफेल को लेकर बहुत सारी कंट्रोवर्सी है उसके बाद क्या सरकार का चेहरा नंगा नहीं हुआ है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के चलते  देश की सुरक्षा से समझौता किया है?


10_56 इंची सीने का दावा करने वाले मोदी जी स्थितियों का सामना क्यों नहीं कर पाते ?


ना तो आल पार्टी  मीटिंग में आए, न युद्ध विराम की घोषणा की, ना संसद का विशेष सत्र बुलाने की हिम्मत कर पा रहे हैं! 


11,_क्या सीज फायर के बाद पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद की गतिविधियां रुक जाएंगे और क्या अमेरिका की बात पर पाकिस्तान पर भरोसा किया जा सकता है?


12_अग्नि वीर योजना पर भारत के सेना अध्यक्षों ने  जो निराशा जाहिर की है , क्या उसके बाद सरकार एक बार फिर बैक फुट पर आएगी इस योजना केसंदर्भ में?

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लेकिन इन नकारात्मक पहलुओं में भी कुछ  सकारात्मक बातें भी थी, जिसे जनता ने स्वागत किया है! 


1_आतंकवादी गतिविधियों पर पहली बार सीधे पाकिस्तान पर आक्रमण कर भारत सरकार ने यह तो जाहिर किया है इन आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ उनकी नीति जीरो टॉलरेंस की रहेगी!


 अगर भविष्य में सरकार चुनाव के समय ही अपने इस नीति पर काम करेगीतो लोग इसे इवेंट या स्टंट मान ने पर मजबूर होंगे!

पर अभी लोग सेना की वजह से इस पर विश्वास कर रहे हैं!


2_जिस तरह पूरे देश ने तमाम राजनीतिक दलों ने सरकार के और सेना के प्रति समर्थन जाहिर किया वह निश्चित रूप से इस देश की एकता और अखंडता की गारंटी था! 


3_भारतीय सेना ने अद्भुत पराक्रम दिखलाया और भारत की युद्ध क्षमता को सबके सामने जाहिर किया और जो हौसला सेना ने दिखाया वह देश के लिए एक सकारात्मक पहलू था!


4_सेना ने आतंकवादीअड्डे , ध्वस्त किए, टारगेटेड अटैक किया, एयर बेस और एयर डिफेंस नष्ट की और अपने नए दौर के युद्ध कौशल का परिचय दिया!


5_ पहलगाम की घटना के बाद जिस तरह घाटी में बंद रहा कश्मीर में बंद रहा, भारत की तमाम मस्जिदों से उस घटना का विरोध किया, धर्म पूछ जात नहीं इस नॉरेटिव को जिस तरह हिंदुस्तान की जनता ने मुंह तोड़ जवाब देकर भारत के आंतरिक  एकता का परिचय दिया वह भी इस घटना का एक सकारात्मक पहलू था!


6_जिस तरह यह कहा गया है की आतंकवादी हमले को सीधा युद्ध समझ जाएगा अगर यह जुमला साबित नहीं हुआ और भारत सरकार  मजबूती से इस रणनीति  पर खड़ी पाई गई तो यह भी एक बहुत बड़ा सकारात्मक पहलू रहेगा आतंकवाद को खत्म करने के लिए!

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दोनों पक्षों के अपने बचाव है अपने-अपने तथ्य है लेकिन जो एक भावनात्मक सैलाब भारत की जनता में बह रहा था pok के संदर्भ में बलूचिस्तान के संदर्भ में और आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के संदर्भ में पाकिस्तान के टुकड़े करने के संदर्भ में उस झटका लगा है और इसलिए भी लगा मोदी जी की छवि को मीडिया ने आईटी सेल ने और एक राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने इतना ओवररेटेड कर दिया था कि लोगों की आशाएं बहुत ज्यादा थी!

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और निष्कर्ष के रूप में हम यही मान सकते हैं सेना एक बार फिर भारत के लिए गौरव का विषय बनी है और सरकार की नीतियां आलोचना का! 

लेकिन जाते-जाते राहुल गांधी की भूमिका पर भी थोड़ा सा विचार कर ले उसने अग्नि वीर का विरोध किया  और सेना के साथ खड़ा हो गया, राहुल गांधी की सारी बातें सही क्यों निकलती है ?

 और अंत में…

पुलवामा और पहलगाम पर विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं दिया गया है!