शुक्रवार, 6 जून 2025

दोस्त दोस्त न रहा…

 दोस्त दोस्त न रहा…


दरअसल न तो ट्रंप किसी के दोस्त हो सकते हैं और न ही अमेरिका ? ऐसे में ट्रंप को जिताने के लिये जिस तरह से नमस्ते ट्रंप का नारा बेकार गया उसी तरह से एलन मस्क की दोस्ती भी छू हो गई । क्या होगा इसका दूरगामी परिणाम..

असल में दोस्ती बेहद ही नाजूक रिश्ता है, और यदि दोस्ती इसलिए हुई हो कि स्वार्थ पूरा हो तब इसका टूटना तय है और शायद यही वजह है कि अपनी दूसरी पारी में ट्रम्प ने इस दोस्ती की पोल खोल दी और न केवल मोदी सरकार बल्कि भारतीयों की बेइज्जत करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा लेकिन मोदी ख़ामोश हैं । क्यों? ये बड़ा सवाल है ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अपने उद्योगपति मित्र की वजह से क्या ब्लेकमेलिंग का शिकार हो रहे हैं 

तो दूसरी तरफ़ एलन मस्क से भी ट्रंप के रिश्ते समाप्त होने की ख़बर हैं लेकिन मोदी की तरह मस्क चुप नहीं हैं बल्कि वे खुलकर सामने आ गये हैं।

हालाँकि दोनों तरफ से आरोपों की झड़ी लग चुकी है , एक दूसरे को बर्बाद करने की कस्मे खाई जा रही है।  मस्क ट्रम्प पर महाभियोग चलाने के लिए कांग्रेस के सदस्यों से अपनी आत्मा जगाने की बात कर रहे है। ट्रम्प सरकारी ठेकों से मस्क को निकालने की बात कर रहे है। 

इसी दौरान मस्क ने ' एप्सटीन ' फाइल को सार्वजनिक करने की मांग कर दी है।  रंगीन मिजाज यौन अपराधी जेफ्री एप्सटीन ने आत्म हत्या कर ली है लेकिन उनके मुक़दमे से संबंधित दस्तावेजों में ट्रम्प का नाम भी आया है। ट्रम्प का चरित्र वैसे भी खुली किताब रहा है। आप चाहे तो दो और दो का जोड़ लगाकर अपनी राय बना सकते है !

दो भैंसों की लड़ाई में हमेशा घाँस कुचली गई है। कल डोजोन्स गिरकर बंद हुआ और टेस्ला के शेयर इतिहास में दूसरी बार 14 परसेंट हलके हुए। मस्क की दौलत के सागर से 34 बिलियन डॉलर की बूंद छलक गई। 

है न ग़ज़ब क़िस्से, दोस्ती के ये दोनों क़िस्से इतिहास में दर्ज तो होंगे लेकिन इसे किस रूप में लिया जाएगा , कहना मुश्किल है।

गुरुवार, 5 जून 2025

संसद का विशेष सत्र बुलाने से डरी मोदी सत्ता…

 संसद का विशेष सत्र बुलाने से डर गई मोदी सरकार…


ढाई सौ सांसदों ने जब मोदी सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग लिखित में की तो सरकार ने साफ़ मना कर दिया, क्यों? सरकार का यह फ़ैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि परिस्थितियाँ सामान्य नहीं है, आतंकवादी अभी भी नहीं पकड़े गये है, सीजफ़ायर क्यों और कैसे हुआ, भारत की कूटनीति इतनी कमजोर क्यों, और सबसे बड़ा सवाल राफ़ेल को लेकर है। तब सत्र नहीं बुलाने को लेकर विश्लेषण ज़रूरी हो जाता है…



पहलगाम के बाद सीजफ़ायर को लेकर  ट्रंप के मुद्दे पर सरकार बुरी तरह घिर गई है! अमेरिकन मध्यस्थता  को लेकर ट्रंप के लगातार बयानों से सरकार बैक फुट पर है! और इसका जवाब सरकार के पास नहीं है !क्योंकि आधिकारिक रूप से सीज फायर की घोषणा होने के पहले टेंप ने यह घोषणा कर दी थी, अगर इसे स्वीकार किया जाता है तो राहुल गांधी का वह नॉरेटिव भारतीय जनता पार्टी और मोदी जी की सरकार के आभा मंडल को धूमिल कर देगा क्योंकि फिर पूरे देश में गूंजेगा

,फ़ोन  आया, नरेंद्रर , हो गये  सरेंडर 

शायद सरकार इस बात से भी भयभीत है की संसद में बहुत सारे सवाल पूछे जाएंगे और यदि उनके जवाब टाले या गलत जवाब दिए गए और वह सिद्ध हो गए तो पूरे देश में सरकार की बड़ी थू  थू होगी!

कुछ तथ्य तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया के द्वारा जाहिर कर दिए जाने की वजह से चर्चा में है लेकिन ऐसा माना जाता है कुछ तथ्य अभी भी ऐसे हैं जिन्हें सरकार बताना नहीं चाहती और ससद बुलाने के बाद उन पर चर्चा होना अनिवार्य हो जाएगा!

और वह सब सरकार का नॉरेटिव खराब करेगी दरअसल पहलगाम के बाद इस सीमित स्ट्राइक के बाद सरकार एक राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरे देश में भुनाना चाहती थी,

पुलवामा के विपरीत इस बार सरकार कामयाब नहीं हो सकी! कुछ स्थितियां ऐसी बनी  जो सरकार के विश्लेषण के बाहर थी! प्लान  असफल हो गया! 

इस योजना के तहत ही इस विवादास्पद स्ट्राइक के बाद मोदी जी प्रदेश प्रदेश स्वयं की पीठ थपथपाने लगे और राष्ट्रवाद का माहौल बनाने लगे लेकिन जिस तरह सारे देश ने घर-घर सिंदूर योजना पर रिएक्ट किया जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की तिरंगा यात्राओं को समर्थन नहीं मिला और मोदी जी की सभाओं के बाद भी राष्ट्रवाद का यूफोरिया नहीं बना, तो सरकार को लगने लगा यह *मुद्दा बैकफायर* कर रहा है !

मोदी जी के एजेंडे में ना देश की विदेश नीति थी ना देश की कूटनीति थी ना देश की अर्थव्यवस्था थी और संसद  बुलाने के बाद इन 12 सालों में यह पहली बार था जब उन्हें जवाब देना पड़ता  इन सारी असफलताओं का जिन्हें अक्सर वह आपदा में अवसर की बात से खारिज करते हैं!

  मोदी जी की एक शैली है आम आदमी से कनेक्ट करने की जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब रहे लेकिन वर्तमान संदर्भ इस आभामंडल को भी अपने नॉरेटिव से प्रभावित करते हुए नजर आ रहे हैं! 

जो एक भ्रामक इमेज अपने खरीदे हुए मीडिया से मोदी जी भारत की बनाना चाहते थे उसका कितना दुष्प्रभाव पड़ा है एक आभासी इंफ्रास्ट्रक्चर की बात पूरे विश्व में की गई एक आभासी अर्थव्यवस्था के नाम पर हिंदुस्तान के उत्कृष्टता  की बात पूरे विश्व में की गई , जबकि स्थितियां देश में अनुकूल नहीं थी बेरोजगारी बढ़ रही थी महंगाई बढ़ रही थी रुपया गिर रहा था मुद्रास्फीति बढ़ रही थी लेकिन बात चौथी इकोनॉमी की जाती थी, विश्व गुरु की की जाती थी, तेजी से विकसित होते एक आधुनिक भारत की बात की जाती थी लेकिन जहां आज भी तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ता है! और इसी भ्रामक इमेज की वजह से भारत विश्व राजनीति का शिकार हो गया क्योंकि पूरी विश्व राजनीति इस समय व्यापार पर आधारित है? और संपन्न राष्ट्र किसी और को अपने बराबर देखना पसंद नहीं करते इसलिए आज भारत चीन की भी आंख की किरकिरी है अमेरिका की भी, और रूस ने भी उसे एक सम्मानजनक दूरी बना रखी है! और वहीं पाकिस्तान को अमेरिका भी आशीर्वाद दे रहा है और चीन भी दूध पिला रहा है!


ससद बुलाने के बाद यह *आभासी इमेज* दरक कर गिर जाती, उनका जो वास्तविक चित्र है इस आभासी इमेज के आगे बहुत छोटा पड़ जाता और शायद सत्ताधारी दल यह नहीं चाहता था इसलिए सवालों से बचने के लिए उसने संसद बुलाना उचित नहीं समझा!

सत्ताधारी दल बिहार चुनाव तक स्थितियों की अनुकूलता चाहता था वह नहीं चाहता था कि देश की मानसिकता किसी नए नॉरेटिव की ओर आगे बढ़ने लगे, 

क्योंकि संसद में

 *सामाजिक जनगणना* को लेकर भी सवाल किए जाते !

चुनाव के पहले सरकार इनसे बचाना चाहती थी! वह नया नॉरेटिव बनाने की कोशिश करेगी ससद बुलाने के पहले बच्चे हुए दिनों में नॉरेटिव को अपना अनुकूल बनाने के लिए! 

और इस सबके अलावा सबसे बड़ा सवाल होगा राफ़ेल पर।राफेल इस पूरी स्ट्राइक में विवादास्पद रहा है लेकिन जिस तरह कांग्रेस सरकार का सौदा खारिज कर कर मोदी जी की सरकार ने ऊंचे दामों पर राफेल का सौदा किया था लेकिन उसके बावजूद तकनीकी स्थानांतरण की सहमति नहीं ली गई थी और उसके बाद जब अभी इतनी विपरीत परिस्थिति में भी एसॉल्ट कंपनी ने राफेल का सोर्स कोड देने से भारत को इनकार कर दिया और भारत के राफेल का गिरना न गिरना सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि भारत में भी चर्चित रहा उसके बाद सरकार को यह भी लगता था यदि संसद बुलाई गई तो उसके ईमानदार चेहरे को भी वैसे तो वह बचा नहीं है लेकिन शीर्ष पर भी आरोपों की बौछार की जाएगी इन स्थितियों में तोउसका बचना बहुत मुश्किल हो जाता!

ऐसी परिस्थिति में सत्ता ने सत्र से भाग जाने के निर्णय को उचित समझा।(साभार)



बुधवार, 4 जून 2025

न्याय पर भरोसा दिलाती-नीरू…

 न्याय पर भरोसा दिलाती-नीरू…


आज के इस दौर में जब न्याय व्यवस्था को लेकर कितने ही सवाल उठ रहे हो, पैसों और रसूख़ के दम पर न्याय को अपने पाले में कर लेने  को लेकर उठते सवाल हो या राष्ट्रहित में न्याय का फ़ैसलो तक पहुँचने से पहले दम तोड़ देना। ऐसे में मलयालम में बनी फ़िल्म नीरू में कोर्ट रूम के ड्रामे  के बीच जज का फ़ैसला  कम से कम न्याय पर भरोसा दिलाती तो है…


यह कहानी है कि एक ऐसी  अंधी लड़की की जिसके साथ बलात्कार होता है, अपराधी इतने शातिरपने से अपराध करता है कि कोई सबूत नहीं छोड़ता. लेकिन अपराधी को पता नहीं होता कि वह अंधी लड़की एक बेहतरीन स्कल्पचर आर्टिस्ट है. 

अपराध के क्षणों में कोई भी व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो सकता है, लेकिन कहते हैं कि जब प्रकृति आपसे कुछ छीन लेती है तो उसके बदले दूसरे अंग अधिक सक्रिय हो जाते हैं,  स्पर्श और सुनने की अद्भुत क्षमता के कारण वह उस पीड़ित समय में अपराधी की शक्ल का जायजा ले लेती है.

अपराधी का जब कोई पता नहीं चलता तब यह अंधी लड़की उस अपराधी की हूबहू मूर्ति बनाती है, जिससे वह पुलिस के गिरफ्त में आ जाता है. लेकिन इसके बाद भी अपराधी के रसूखदार होने के कारण बहुत से छल प्रपंच फिल्म में देखने को मिलते हैं. 

कई सारे घटनाक्रम होने के बाद अदालत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता तब पीड़िता के पक्ष में लड़ने वाले वकील कोर्ट में यह दलील रखते हैं वह अंधी लड़की की कला पर भरोसा रखकर एक नज़ीर पेश की जाएं. जज इसकी अनुमति देते हैं और अंत में यह केस एक उदाहरण बन जाता है.

यह फिल्म न्याय में किया गया एक अद्भुत प्रयोग है और ऐसे ही प्रयोगों के कारण न्याय पर भरोसा बढ़ जाता है. यह फिल्म न्याय के लिए एक प्रयोग के तौर पर याद रखी जा सकती है. कानून के सारे दाव पेंच जब न्याय दिलाने में असमर्थ हो जाते हैं तब कला यह साबित करती है कि कला सिर्फ़ रोमांटिसिज्म नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन का आधार है और अपराधी तक पहुंचाने का जरिया बन सकती है. (साभार)

मंगलवार, 3 जून 2025

G-7 में भारत को क्यों नहीं बुलाया…

 G-7 में भारत को क्यों नहीं बुलाया…


पहलगाम हमला के बाद से विश्व पटल में भारत की लगातार कमजोर होती स्थिति के बाद अब एक और झटका कनाडा ने दिया है। ट्रंप लगातार हमलावर है लेकिन मोदी सत्ता ख़ामोश है । ऐसे में दुनिया भर के देशों की यात्रा करने के बाद भी यदि भारत अलग थलग दिखाई देने लगा है तब सवाल यह है कि क्या खोखले दिखावे की पोल खुल चुकी है…

प्रधानमंत्री मोदी हर साल लाखों रुपये खर्च करके दुनिया के कोने-कोने में घूमते हैं, हाथ हिलाते हैं, गले लगाते हैं, सेल्फियाँ खिंचवाते हैं — लेकिन क्या भारत की असली विदेश नीति मजबूत हो रही है? अगर नहीं, तो फिर सवाल पूछना ही होगा।

इस साल G7 समिट की मेज़बानी कर रहा है कनाडा, और चौंकाने वाली बात ये है कि भारत को आमंत्रण ही नहीं मिला। मोदी जी जो पिछले छह वर्षों से लगातार G7 बैठकों में 'विशिष्ट अतिथि' बनकर गए, इस बार बाहर रह गए।

ये सिर्फ एक इन्विटेशन नहीं है — ये भारत की गिरती साख का तमाचा है।

एक समय था जब भारत को वैश्विक शक्ति माना जाने लगा था, "विश्वगुरु" कहने का भ्रम फैलाया गया था। पर सच्चाई ये है कि आज भारत अपने सबसे बड़े कूटनीतिक मंचों से बाहर हो रहा है, और ये प्रधानमंत्री की विदेश नीति की असफलता का जीता-जागता सबूत है।

क्या सिर्फ विदेश दौरों और भाषणों से ही राष्ट्र की प्रतिष्ठा बनती है? नहीं!

क्या "मन की बात" में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तय होती है? नहीं!

क्या विदेश नीति सिर्फ कैमरों के सामने गले लगने से बनती है? बिल्कुल नहीं!

आज जब भारत को G7 जैसे मंच से बाहर रखा गया है, ये सिर्फ एक अपमान नहीं — ये चेतावनी है।

अब वक्त है कि मोदी सरकार आत्ममंथन करे। दिखावे की कूटनीति से बाहर निकले और धरातल पर मजबूत, विश्वसनीय और संतुलित विदेश नीति बनाए। वरना ‘विश्वगुरु’ का ख्वाब, वैश्विक हंसी का पात्र बनता जाएगा।

सोमवार, 2 जून 2025

नेहरू का यह सच होश उड़ा देंगे…

 नेहरू का यह सच होश उड़ा देंगे…


पहले नेहरू को छोटा करने विषवमन हुआ, उससे भी बात नहीं बनी तो सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो… का मायाजाल बिछाया गया और जब इससे भी बात नहीं बनी तो सरदार पटेल की प्रतिमा बड़ी बना दी गई तब भी नेहरू का क़द वे छोटा नहीं कर पाये। तब सवाल ये है कि आख़िर वे लोग नेहरू को छोटा क्यों बताना चाहते है? झूठ और नफ़रत के आसरे धर्म की राजनीति करने वालो को यह ज़रूर पड़ना चाहिए…

एक दशक से फैलाया जा रहा है कि पंडित नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू को धोखा देकर एडविना के साथ इश्क लड़ा रहे थे। इस दावे में उतनी ही सच्चाई है जितने की उम्मीद किसी संघी से की जा सकती है। 

डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पंडित नेहरू ने विस्तार से कमला नेहरू और उनके अंतिम दिनों के बारे में लिखा है। लगभग 8 से 10 पेज में है। उस दौर की तमाम बातें, कमला नेहरू के साथ उनका रिश्ता, कैसे उम्र के साथ बढ़ती आपसी समझ, कैसे उनकी बीमारी के समय जेल में थे, जेल से छूटे और सीधे स्विटजरलैंड पहुंचे जहां उनका इलाज चल रहा था। कमला नेहरू के साथ इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी पहले से मौजूद थे। 

कमला नेहरू जी 1920 के बाद से ही बीमार रहने लगी थीं। इसके बावजूद आंदोलन में सक्रिय रहती थीं। बीच-बीच उनका अलग-अलग जगहों पर इलाज चलता था। इसके लिए पंडित नेहरू उन्हें अलग जगह ले जाते। कोलकाता और श्रीलंका में भी उनका इलाज चल चुका था। वे लंबे समय तक इलाज के लिए नैनीताल और देहरादून भी रहीं। 

1933 में जब उनकी हालत ज्यादा तो उन्हें अल्मोड़ा के सैनिटोरियम में रखा गया था। पंडित नेहरू भी अल्मोड़ा जेल में ही बंद थे। इस दौर में नेहरू कई बार जेल गए और जब भी जेल से छूटते थे, कमला नेहरू का इलाज कराते थे। 

1935 में जब डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें स्विट्ज़रलैंड ले जाया गया, उस समय पंडित नेहरू जेल में बंद थे। अंग्रेजों ने रिहाई के लिए शर्त रखी कि बाहर निकलकर राजनीति न करें तो छोड़ सकते हैं। नेहरू सावरकर नहीं थे। उन्होंने राजनीति छोड़ने से मना कर दिया। 

कमला नेहरू की बिगड़ती तबियत को देखते हुए अंग्रेज सरकार पर काफी दबाव डाला गया और तब जाकर वे रिहा हुए। रिहा होते ही इलाहाबाद पहुंचे और वहां से 8 दिसंबर 1935 को स्विट्ज़रलैंड रवाना हो गए। 

लंबे समय तक इलाज के बाद 28 फरवरी 1936 को कमला नेहरू का निधन हुआ तब पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी उनके साथ ही थे। 

लौटते समय के बारे में उन्होंने जो लिखा है, वह बहुत मार्मिक है कि सबकुछ खो गया था, जैसे रोशनी चली गई थी। उन्होंने जो लिखा है, उससे पता चलता है कि कैसे वे दोनों एक दूसरे के प्रति स्नेह और सम्मान से भरे हुए थे। 

जब यह सब हुआ, तब एडविना माउंटबेटन सीन में कहीं नहीं थीं। कमला नेहरू की मृत्यु के 11 साल बाद, 1947 में दिल्ली आईं। 

आप सोचिए कि संघी नेहरू को लेकर किस हद तक कुंठित और घृणा से भरे हुए हैं। जिस व्यक्ति ने अपना परिवार, घर सबकुछ देश के लिए कुर्बान कर दिया, जो व्यक्ति आजादी के लिए लगभग 10 साल जेल में रहा, उसके निजी जीवन को लेकर घिनौनी बातें फैलाते हैं। 

वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास न तो नेहरू जैसा कोई है, न अगले हजार साल तक कोई हो सकता है।(kk)

रविवार, 1 जून 2025

शाबाश… मोदी जी वेलडन…

 शाबाश… मोदी जी वेलडन…


अब तो उन लोगों के मुँह में तमाचा है जो कहते हैं कि आख़िर मोदी ने इस देश को क्या दिया है। आइये हम बताते हैं कि मोदी जी ने इस देश को क्या दिया है..,

ये दिया है देश को मोदी ने:


प्रेम शुक्ला,

उच्च,श्रेष्ठ सवर्ण ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण है..

सनातनी संस्कारी हिंदू‌ है..

और सबसे बड़ी बात_"बीजेपिये" है.


राष्ट्रीय चैनल पर बतौर बीजेपी प्रवक्ता_कांग्रेस के प्रवक्ता की मां को सरेआम रंडी कह रहे हैं.

विडियो दिखाता है कि ऐसी गाली गलौज की शुरूआत भी वही करते हैं और अति पर भी वही ले जाते हैं.. ये अलग बात है कि ऐसी भाषा के लिये एंकर दोनों प्रवक्ताओं को दोष देकर बीजेपी प्रवक्ता को अकेला दोषी होने से बचाता है.

(ये दिया है देश को मोदी ने)

प्रेम शुक्ला अकेले बीजेपिये‌ नहीं इस तरह के सनातनी संस्कार प्रदर्शन के..मोदी से लेकर मोदी भक्तों तक सभी भगवो में‌ यही सनातनी संस्कार भरा पड़ा है.

मोदी संघ ने ऐसा एक पूरा इकोसिस्टम बनाया है जो पूरी दुनिया में देश के मान सम्मान को शर्मिंदा कर रहा है.

बेशर्म ‌हद वाहियात भ्रामक और गाली देनेवाली राजनीति का असली अपराधी वो बकलोल, नॉन-सीरियस और उत्पाती कल्चर है..

जो 2013 के बाद से मोदी के साथ बीजेपी के संगठन में आया.

2013 के मध्य से राष्ट्रीय राजनीति में मोदी महत्वाकांक्षा के पदार्पण से सब कुछ बदल गया.

2013 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी साहब को प्रधानमंत्री पद के लिए नामित करती है.फिर मोटा भाई को उत्तर प्रदेश में संगठन का प्रभार दिया जाता है.यहीं से शुरू होता है_

संबित पात्रा, कपिल मिश्रा,प्रेम शुक्ला, नूपुर शर्मा, गौरव भाटिया  जैसे लंपट बकरबाज़ों का बीजेपी मीडिया सेल में प्रवेश.और फिर गोदी मीडिया में अर्णव, अमीश, रुबिका लियाकत और अमन चोपड़ा जैसे

नॉन-सीरियस एंकर्स का प्रमोशन.

यह सब कुछ पूरी प्लानिंग से हो रहा था।

आईटी सेल और गोदी मीडिया का डेडली कॉम्बिनेशन विपक्ष के हर तर्क और तथ्य को झूठ से नेस्तनाबूद करने  की कोशिश कर रह था.

हर तर्क को जुमले से हराना, हर तथ्य की इतिहास से तुलना कर देना_

ये सब एक सोची-समझी स्ट्रेटजी का हिस्सा था. और जब वो किसी बहस में हारते दिखते..

तो वो किसी भी गंभीर चर्चा को गली-चौराहों पर होने वाली गालीबाज ठिठोली में बदल देते.

लोग मुद्दा भूल जाते थे, हँसी में लग जाते थे. वो धर्म से लेकर हर विषय को इतने नीचे स्तर पर ले जाती हैं कि पूरे समाज का स्तर ही नीचे गिर जाता है.


आज इन जहरीले प्रवक्ताओं ने देश‌ की एकता,सहिष्णुता,संस्कार को ही नहीं  देश‌ की छवि,अर्थव्यवस्था,रक्षा और विकास को भी डस लिया है.


लेकिन इसके ज़िम्मेदार ये नहीं हैं..

जिम्मेदार वो सपेरे हैं जिनके इशारों पर ये दिन-रात नाचते हैं और पूरे देश में ज़हर फैलाते हैं।

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#घोरकलजुग #डाटावाणी

शनिवार, 31 मई 2025

इस पूर्व सैनिक ने बता दिया सेना की वर्दी की सच्चाई…

 इस पूर्व सैनिक ने बता दिया सेना की वर्दी की सच्चाई…


ऑपरेशन सिंदूर अभी चल ही रहा है और देश के प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पोस्टर लगवाकर चुनावी प्रचार में कूद पड़े हैं। अब भी कई सवाल का जवाब आना बाक़ी है , सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि पहलगाम में सीआरपीएफ़ किसके कहने से और क्यों हटाया गया जबकि सीजफ़ायर को लेकर सवाल है तो सेना को हुए नुक़सान को लेकर भी धुँध अटा पड़ा है, विजय शाह से लेकर दूसरे भाजपाइयों के विषवमन के बीच अब रेलवे टिकिट में मोदी की फ़ोटो के अलावा वर्दी में मोदी वाले पोस्टर पर सवाल का जवाब पूर्व सैनिक मुकेश कुमार बहुगुणा का लेख की हक़ीक़त ज़रूर पढ़ना चाहिए…


#लोकतंत्र_सेना_की_वर्दी और #युद्ध_का_उन्माद


इन लोगों के नाम तो जानते ही होंगे आप - 


क्लीमेंट एटलीहेरोल्ड मैकमिलनजेम्स कैलाघनएडवर्ड हीथ ( चारों ब्रिटेन ),एहद  बराक , मेनाकम बेगिननताली बेनेटबेंजामिननेतान्यहूएरियल शेरोन (सभी  इजराइल ) , जॉर्ज डब्ल्यू बुश ( सीनियर ), जॉर्ज बुश ( जूनियर ), जिमी कार्टर डी आइजनआवर , गेराल्ड फोर्ड ( सभी अमेरिका ), चार्ल्स डी गाल ( फ्रांस ) .....


 ये सभी वे लोग हैं जो #राष्ट्रपति या #प्रधानमंत्री के रूप में अपने #देश_की_सरकार_के_मुखिया रह चुके हैं... मुखिया होने के अलावाइन सभी ने #सेना_में_सेवा दी है, #युद्ध_में_भाग भी लिया हैऔर इनके मुखिया रहते हुए इनके देश ने #युद्ध_भी_लड़े या#मिलिट्री_आपरेशन  किये हैं...


 ऐसी सूची बहुत लम्बी हैयूरोपीय देशों सहित दुनिया  के कई देशों के बड़े नेता सैन्य सेवा में रह चुके हैंसिर्फ अमेरिका में ही 31 ऐसेराष्ट्रपति हो चुके हैंजो पूर्व सैनिक थे )....  अतःयहाँ सिर्फ कुछ के ही नाम लिखे हैं..


 परआपको इनकी ऐसी कोई तस्वीर नहीं मिलेगीजिसमें मुखिया के रूप में कार्य करते हुए ये सेना की वर्दी में सार्वजनिक रूप से आयेहों..... ऐसा कोई वाकया नहीं मिलेगा ज़ब इन्होंने #वोट_के_लिए_सेना_की_वर्दी या प्रतीक या सेना के कार्यों का प्रयोग किया हो...


 कारण ? कारण यह है कि एक मैच्योर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में #शक्ति_का_श्रोत मूलतः जनता में निहित होता हैजिसकाप्रकटीकरण जनता के चुने हुए प्रतिनिधि के रूप होता है... जो इस शक्ति का प्रयोग राज्य के संवैधानिक संस्थानों ( विधायिकाकार्यपालिकान्यायपालिका )  द्वारा निरुपित व्यवस्थाओं के माध्यम से करते हैं...


विदेशों के अलावाहमारे देश भारत में भी कई ऐसे बड़े लोग हो गये हैं जो #सेना_में_एक्टिव_सेवा करने के बाद जनप्रतिनिधि ( विधायकसांसदमंत्रीमुख्यमंत्री )  के रूप में कार्य कर चुके हैंराज्यपाल और अन्य संवैधानिक पदों भी रह चुके हैं...


लेकिन आपने इनमें से भी  किसी को  जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए सेना की वर्दी में नहीं देखा होगा.. जरूरत हुई तो अपनेमैडल जरूर लगा लेते हैं या अपनी रेजिमेंटल कैप पहन लेते हैं... जिसके लिए अधिकृत  हैं सभी पूर्व सैनिक..


 अबकुछ और नाम भी याद होंगे आपको...


ईदी अमीन ( युगांडा ), कर्नल गद्दाफी ( लीबिया ), हिटलर ( जर्मनी), जोसफ स्टालिन ( USSR), माओ त्से तुंग ( चीन ), बेनिटोमुसोलिनी ( इटली ), किम जोंग- II ( नॉर्थ कोरिया ) ,  सद्दाम हुसैन ( इराक ), याहिया खानपरवेज मुसर्रफअयूब खानजिया उलहक ( सभी पाकिस्तान )...


ये भी अपने देश के मुखिया थेसेना में सेवा कर चुके थे... और देश के मुखिया के रूप में भी अक्सर पूरे रोबदाब से सेना की वर्दी पहनकर रहना पसंद करते थे...


 कारणकारण यह कि ये सभी #विचार_कर्म_स्वभाव_से ही #तानाशाह थे.. #लोकतान्त्रिक_व्यवस्थाओं_को_ठेंगे_पर रखते हुएअपनी शक्ति जनता की बजाय सेना से लेते थे...


 इतिहास गवाह है कि #तानाशाहों #को_सेना_की_वर्दी हमेशा पसंद आती है... क्योंकि वो जानते हैं कि कि उनके पैर बहुत कमजोर हैंतो शक्ति के लिए #वर्दी_का_सहारा लेना पड़ता है....


और  लोकतंत्र और आम नागरिक पर अटूट भरोसा रखने वालेखुद पर विश्वास रखने वाले नेता सैनिक होने के बावजूद नागरिकवेशभूषा  में ही रहते हैं... 


इतिहास यह भी बताता है कि अपनी तमाम ध्वंसक शक्तियों के बावजूद युद्ध खतरनाक स्थिति नहीं होती है.. लेकिन युद्ध का उन्माद  सदैव  ही सदैव ही खतरनाक होता है...क्योंकि युद्ध नवनिर्माण के रास्ते भी तो खोलता हैलेकिन उन्माद हमेशा हमेशा के लिए विध्वंसकही रहा है...


जयहिंद


मुकेश प्रसाद बहुगुणा

पूर्व सैनिक और पूर्व प्रवक्ता राजनीति विज्ञान