बुधवार, 23 जुलाई 2025

हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर…

 हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर… 


छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार हरेली है और इसे सावन मास के अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने खेती किसानी में प्रयुक्त होने वाले औजारो की पूजा करते हैं तो घर घर न केवल पकवान बनते हैं बल्कि घर में आने वाली तमाम तरह की बाधाओं को दूर करने के उपाय किए जाते हैं, तब वह क़िस्सा जो बचपन की स्मृति लिये ज़ेहन में समाया हुआ है उसे आज आपके साथ शेयर कर रहा हूँ…

बात तीस पैतीस साल पुरानी है, कहा जाता है कि यह अमावस्या जादू टोने के लिये सबसे उपयुक्त दिन है, इस दिन तमाम तरह की शक्तियों को जागृत भी किया जाता है इसलिए आज के दिन टोनही झुपने ज़रूर निकलती है।

इस कहा सुना के फेर में हम कुछ दोस्त नदी किनारे रात में पहुँच गये , मान्यता है कि टोनही रात में निकलती है और वह न केवल ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर चलती है बल्कि उसके मुँह से आग भी निकलते रहता है।

इस पहचान के आधार पर हम कुछ दोस्तों के साथ नदी किनारे जा कर चक्कर लगाने लगे।

उस रात हमे कुछ नहीं दिखा, यह सिलसिला कई सालों तक चला…

फिर …

अब भी इस मान्यता पर क्या कहें…

हरेली तिहार के दिन पूजा करने से पर्यावरण शुद्ध और सुरक्षित रहता है और फसल उगती है तो किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं लगती है. हरेली तिहार मनाने से फसल को हानिकारक किट तथा अनेको बीमारिया नही होती है इसलिए हरेली तिहार मनाया जाता है. हरेली त्यौहार के दौरान छत्तीसगढ़ के लोग अपने-अपने खेतों में भेलवा पेड़ की शाखाएँ लगाते हैं. वे  अपने घरों के प्रवेश द्वार पर  नीम के पेड़ की शाखाएँ भी लगाते हैं. नीम में औषधीय गुण होते हैं जो बीमारियों के साथ-साथ कीड़ों को भी रोकते हैं.  लोहार हर घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्ती लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीष देते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है. हरेली पर्व में, गांव और शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. सुबह पूजा-अर्चना के बाद, गांव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली एकत्रित होती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता खेली जाती है. इस प्रतियोगिता में, लोग नारियल को फेंककर दूरी का मापन करते हैं. नारियल हारने और जीतने का सिलसिला रात के देर तक चलता है,  हरेली त्यौहार के दिन गाय बैल भैंस को भी साफ सुथरा कर नहलाते हैं. अपनी खेती में काम आने वाले औजारों को हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को धोकर और घर के बीच आंगन में रख दिया जाता है या आंगन के किसी कोने में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं और उसकी पूजा की जाती है साथ ही अपने कुलदेवता की भी पूजा की जाती है .  

माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं और कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है. अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं के साथ पूजा करते हैं. हरेली के बच्चे गेंड़ी का आनंद लेते हैं. इस अवसर पर सभी के घरों में विशेष प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं. चावल के आटे से बनी चीला रोटी को इस दिन लोग खूब चाव से खाते हैं. कोई इसे नमकीन बनाता है, तो कोई इसे मीठा भी बनाते हैं. यह खाने वालों की पसंद के ऊपर होता है. इस तरह से यह त्यौहार परम्पराओं से भरी हुई है. हरेली तिहार के दिन सभी लोग अपने–अपने दरवाजा पर नीम टहनी तोड़ कर टांग देते है और इसी बहुत गेंड़ी खेल का आयोजन शुरु हो जाता है. हरेली तिहार के दिन सुबह से ही बच्चे से लेकर युवा तक 20 या 25 फिट तक गेंडी बनाया जाता है. उसी दिन सभी युवा एवं बच्चे गेंडी चढ़ते है गावं में घूमते है. बच्चों और युवाओं के बीच गेंड़ी दौड़ प्रतियोगिता भी की जाती है.

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

बिसाहू दास महंत, जिन्होंने बांगो बांध का सपना देखा…

 बिसाहू दास महंत -जिन्होंने बाँगों बांध का सपना देखा…


छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षाअपमान की दास्तान तो उस गांधीवादी राजनेता के साथ भी जुड़ी है जिन्होंने जीवंतपर्यन्त अपने को छत्तीसगढ़ के लिये समर्पित कर दियाकभी चुनाव नहीं हारे और आज़ादी के बाद से 1978 तक विधानसभा मेंछत्तीसगढ़ का नेतृत्व किया। किसानों की पीड़ा को अपनी पीड़ा बनाकर बांगो बांध का  केवल सपना देखा उसे पूरा भी किया कहा जायतो ग़लत नहीं होगा,

राजनीति के गुटबाज़ी ने उन्हें हाशिये पर धकेलने की तमाम कोशिश की लेकिन वे  तो झुके  ही डरेबल्कि डटे रहेलड़ते रहे 

ये थे स्व बिसाहू दास महंत

तब यहाँ शुक्ल बंधुओं की तूती बोलती थीउनके समर्थन के बिना राजनीति कितना कठिन था बताने की ज़रूरत नहीं हैऔर यह सबउनके पुत्र चरण दास महंत को भी आगे जाकर झेलना पड़ा थाचरणदास महंत और उनकी पत्नी ज्योत्सना आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कीराजनीति के चमकदार चेहरे हैं लेकिन आज बात स्व बिसाहू दास की..

बिसाहू दास ही वे नेता थे जिनके दम पर अर्जुन सिंह आगे बढ़े और शायद यही वजह है कि अर्जुन सिंह ने इस परिवार के लिए आगे आकर काम किया, चरण दास की नौकरी, शादी से लेकर एमएलए की टिकिट…


बिसाहू दास महंत (1 अप्रैल 1924 - 23 जुलाई 1978) मध्य प्रदेश के एक सफल  राजनीतिज्ञ थेवह राज्य में कांग्रेस द्वारा निर्मित अबतक के सबसे सफल विधायकों में से एक थेउन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए क्रमशः एकदो और तीन कार्यकालों के लिए बारादुवार काप्रतिनिधित्व कियाजिसे अब नया बाराद्वारनवागढ़ और चांपा के नाम से जाना जाता हैउन्होंने 1952 में बाराडुवर से 1957 और1962 में नवागढ़ और वर्ष 1967, 1972 और 1977 में चांपा से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता. 1952 में जीतना शुरू करने के बादसे वह कभी चुनाव नहीं हारेवे लगातार छह बार चुने गएजब तक उनकी मृत्यु नहीं हुईवे बहुत लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहेअंतमें कार्डियक अरेस्ट के कारण उनकी मृत्यु हो गई.

किसान थे दिल के करीब :1942 और 1947 के बीच स्वमहंत ने अपने कॉलेज जीवन में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थीइसवजह से सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की और उनकी छात्रवृत्ति को भी खारिज कर दिया थाआगे चलकर वह राजनीति में ऊंचे पदोंपर रहेअविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री जैसे पदों पर काम करते हुए उन्होंने किसानों की पीड़ा को समझा और उनके लिए सिंचाई काप्रबंध करने की ठानीकोरबा जिले में निर्मित प्रदेश के सबसे ऊंचे मिनीमाता बांगो बांध के शिलान्यास का श्रेय उन्हें दिया जाता हैजिससे आज लाखों हेक्टेयर खेतों की प्यास बुझती हैकिसानों अपने खेत की सिंचाई कर पाते हैं.

पुत्र और बहू आगे बढ़ा रहे विरासत :स्वर्गीय बिसाहू दास महंत के दो पुत्रों में डॉ चरणदास महंत भी राजनीति में उतने ही सफल हैंजितनेकभी बिसाहू दास महंत थेडॉ चरणदास महंत भी अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री जैसे पदों पर रहेकेंद्र में भी सांसद रहेवर्तमान में वहछत्तीसगढ़ के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैंजबकि चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत कोरबा लोकसभा सीट से सांसद हैं.

सोमवार, 21 जुलाई 2025

बड़े बेआबरू होकर…

बड़े बेआबरू होकर…


उपराष्ट्रपति जगदीप धनगढ़ ने इस्तीफ़ा दे दिया। मानसून सत्र के पहले दिन आये उनके इस्तीफ़े की असली वजह जो भी हो लेकिन इतिहास उन्हें एक बेहद चाटुकार और आलोकतांत्रिक व्यक्ति के रूप में कभी नहीं भूलेगा ! क्या है पूरा मामला उन्हें कौन सी बीमारी थी…

जगदीप धनगड़ का विवादों से नाता रहा है , पहली बार वे विवादों में तब आये जब जनवरी 2023 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की 'मूल संरचना सिद्धांत' के पुनरावृत्ति के संदर्भ में बयान दिया था जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था. उन्होंने कहा...  'संसद के बनाए काननों को अगर अदालत रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा होगा'. इस पर कांग्रेस ने तीखा प्रहार किया तो ममता बेनर्जी ने वहीं टीएमसी की ओर से कहा गया, यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडे को चला रहा है. 


छात्र राजनीति पर टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि कुछ विश्वविद्यालय देश विरोधी विचार धराओ की शरणस्थली बन गये है 

उन पर दिसंबर 2023 में उपराष्ट्रपति धनखड़ पर अधिवेशन में विपक्षी सांसदों को रोकने का आरोप लगा था. विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि संसद के शीत सत्र मे. रोका गया। कांग्रेस प्रेसिडेंट खड़के ने तो यह भी कह दिया कि धनगड़ का बर्ताव बीजेपी प्रवक्ताओं जैसा हो गया है 

 किस बीमारी से जूझ रहे थे धनखड़?

इस साल 9 मार्च 2025 की रात को जगदीप धनखड़को अचानक सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत के बाद एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्हें वहां CCU (क्रिटिकल केयर यूनिट) में निगरानी में रखा गया और वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राजीव नारंग की देखरेख में इलाज हुआ. डॉक्टरों के अनुसार उन्हें दिल से जुड़ी परेशानी थी जिसे तत्काल नियंत्रित कर लिया गया था. करीब तीन दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद 12 मार्च को उन्हें छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन कार्डियक मॉनिटरिंग जारी रखी गई.

डॉक्टरों की रिपोर्ट में बताया गया था कि उपराष्ट्रपति को हाई ब्लड प्रेशर, थकावट और कार्डियक स्ट्रेस जैसी समस्याएं हैं. उम्र के लिहाज से उन्हें गंभीर श्रेणी का मरीज माना गया और मेडिकल टीम ने उन्हें लंबे समय तक विश्राम और कार्यभार में कटौती की सिफारिश की थी. अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.

रविवार, 20 जुलाई 2025

काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…

 काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…


ग़ज़ब दौर है, लोग सच न देखना चाहते हैं और न ही सुनना, सत्ता में बैठे लोग कुछ भी बोलने लगे हैं और लोग ताली बजा रहे हैं । धर्म का नैरेटिव्ह सेट है इसलिए हर चुनाव के पहले इस पर नमक मिर्च का तड़का डाल दिया जाता है और फिर ताली बचाने लगते हैं, कंगना रानौत की हिमाक़त किसी मूर्खता से कम नहीं तो पटना को पुणे बनाने की घोषणा को बेशर्मी नहीं कहा जाना चाहिए…

प्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने कहा था 

बुद्धिजीवी इस समय संशय से भरे हैं और मूर्ख भरपूर आत्मविश्वास से.

हालांकि इन पर बात करना भी नहीं करने के बराबर ही है. लेकिन जरा सोचिए अगर यह सारी धरती इन्हीं लोल लोगों से भर गई तब बातचीत के विषय कैसे होंगे? कोई भी आकर कह देगा देश को आजादी चिड़िया के अंडे से मिली है. या यह देश डेढ़ सौ सालो की लीज पर है.

कोई यह भी कह सकता है कि नेहरू और गांधी एक भूत है.

हवाई जहाज की खोज हमारे पतंग उड़ाने से हुई है. 

कोई पासपोर्ट की रैंकिंग गिरने को उपलब्धि बता सकता है

और इसलिए कंगना कह रही है कि सरदार पटेल को अंग्रेज़ी नहीं आती इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाये और अमित शाह का तो दवा है कि अंग्रेज़ी बोलने वालों को एक दिन शर्म आएगी..

ऐसे में समझो कि कुछ तो झोल है 

क्योंकि सरदार पटेल ने लंदन में बाक़ायदा बेरिस्टरी की है

अब थोड़ी बात नॉनबायोलॉजिकल के लिए हो जाये यानी इस झोल पर…

मोदी जानते हैं कि कहाँ क्या बोलना है क्योंकि यह देश दो धड़ों में बंट चुका है जिनमें मिडिल क्लास वर्ग का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जा रहा। हालात यह है कि ऊंचे दाम और ऊंचे पकवान के क्राइटेरिया में या तो आप खुद को शामिल कीजिए, या फिर अति गरीबी की श्रेणी में जाकर अपना गुजर बसर कीजिए। जाकर 5 किलो राशन की लाइन में लग जाइए तभी आपका घर चल पाएगा।

जनता इतनी मासूम है कि वो साफ साफ ये देख ही नहीं पा रही कि चुनाव आते ही ये मुगलकालीन इतिहास की कब्रें सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने के लिए खोदी जा रही है। बहस के ऐसे ऐसे चिन्हित मुद्दों को उकेरा जा रहा है जिनमें हिन्दू मुसलमान की बहस हो। अब करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का स्टेटमेंट ही देख लीजिए सांसद इकरा हसन के लिए। सत्ता जानती है कि इस मुद्दे पर बहस होनी ही है। सत्ता उकसाती है और जनता उछल उछल कर प्रतिक्रिया देने उतर आती है।

असल मुद्दे जनता के बीच से गायब है। रोजगार का इनके पास कोई मॉडल नहीं है। देश को हलक तक कर्ज में डुबाए बैठे है जिसकी भरपाई जनता की जेबों से की जा रही है। आपके अकाउंट से कभी मेंटेनेंस के नाम पर तो कभी एटीएम चार्ज के नाम पर तो कभी यूपीआई चार्ज के नाम पर बिना बताए पैसे काट ले रहे है। आप ट्रेन की टिकट कटाए तो बिना थर्ड पार्टी ऐप के (जिनका चार्ज लगभग 250 से 300 रुपए ज्यादा लगता है) आप आसानी से कर ही नहीं पा रहे। चिड़ियाघर और म्यूजियम जैसे पर्यटन स्थलों पर 25 रुपए की टिकट अब दो गुनी तीन गुनी होकर बिक रही है। एयरपोर्ट में और तीर्थ स्थलों पर ठेके वाली कैंटीनों में डंके की चोट पर 25 का माल 50 में बेचा जा रहा है। 

तब जब थोड़े लोग सत्ता से न डिग सके इसलिए कुछ विकास का दावा कर दो।

लोगो ने काशी को क्योटा बनते तो देख ही लिया है अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई बनते भी देख ही लेंगे…

शनिवार, 19 जुलाई 2025

तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को

 तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को…


अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पाँच विमान गिरने का दावा कर दिया है तब भी प्रधानमंत्री की चुप्पी देश को अपमानित कराने के अलावा क्या है लेकिन आज हम बात कर रहे है उस लौह महिला की जिन्होंने 19 जुलाई 1969 को वह कर दिया जो आज देश के माध्यम और ग़रीब वर्ग का जीवन है…

56 साल पहले 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। इस कदम ने लाखों आम लोगों और ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं के दायरे में लाया और बैंकिंग संस्थानों को निजी मुनाफे से परे देश के विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ा।  

आज, स्वतंत्रता के बाद के भारत को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण सरकारी कदमों में बैंक राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख स्थान है। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इसके प्रभावों पर आज भी विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा जारी है।  

1969 से पहले, बड़े निजी बैंक मुख्य रूप से अपने मालिकों और अन्य धनी व्यक्तियों के व्यावसायिक हितों के लिए ही ऋण देते थे। कृषि क्षेत्र को केवल 2% बैंक ऋण मिलता था। लेकिन हरित क्रांति के माध्यम से बड़े कृषि परिवर्तन का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए, कृषि क्षेत्र को बैंकिंग समर्थन को कई गुना बढ़ाने की जरूरत थी। यही वह प्रेरणा थी जिसने निजी स्वामित्व से बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का फैसला लिया। 1990 के दशक तक, कृषि क्षेत्र के लिए ऋण 15% तक बढ़ गया, जो राष्ट्रीयकरण का एक सकारात्मक परिणाम था।  

राष्ट्रीयकरण से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएँ बहुत सीमित थीं। उस समय देश में केवल 7,219 बैंक शाखाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश बड़े शहरों और मध्यम आकार के कस्बों में थीं। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद, बैंकिंग गतिविधियाँ उत्साह के साथ ग्रामीण क्षेत्रों तक फैलीं। अगले चौथाई सदी में बैंक शाखाओं की संख्या आठ गुना बढ़ गई।  

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था। विरोधी पक्ष में केवल धनी उद्योगपति ही नहीं थे, बल्कि संगठन परिवार की तत्कालीन राजनीतिक पार्टी जनसंघ और राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी भी थीं, जिन्होंने संसद में बैंक राष्ट्रीयकरण बिल का विरोध किया। कांग्रेस के भीतर भी मोरारजी देसाई जैसे कुछ लोग शुरू में इसके खिलाफ थे। इंदिरा गांधी ने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को हटाकर ही यह फैसला लागू किया। बाद में हुए राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस के विभाजन में भी बैंक राष्ट्रीयकरण एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।  

हालांकि, बैंक प्रशासन में राजनीतिक नियंत्रण और बढ़ते गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के कारण इसे कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा, फिर भी 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के इतिहास में एक निर्णायक आर्थिक कदम के रूप में आज भी चर्चा में रहता है, जो इसकी प्रासंगिकता और महत्व को रेखांकित करता है।(साभार)

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

जब सत्ता ने झूठ बोलकर नफ़रत फैलाया, 70 सब के सब बरी

 जब सत्ता ने झूठ बोलकर 

नफ़रत फैलाया, 

70 सब के सब बरी…


जिन लोगों का पूरा संस्कार ही झूठ अफ़वाह और नफ़रत की राजनीति पर केंद्रित हो उनसे किसी अच्छाई की उम्मीद ही बेमानी है, वे देश का भला तो छोड़िये किसी का भला नहीं कर सकते, यहाँ तक कि वक्त पड़ने पर घर परिवार ही नहीं समाज को भी संकट में डाल सकते हैं। यह बात दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले ने साबित कर दिया कि कुर्सी के लिये सत्ता और उनसे जुड़े लोग किस हद तक गिर सकते हैं । आइये समझते है पूरा मामला…


मामला 2020 का है जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन के तब्लीगी जमात के मरकज के विरुद्ध मीडिया ने कैसा माहौल बनाया था। लगता था जैसे सारा कोविड इन्ही के कारण फैला था। पूरे देश मे लोग इनके खिलाफ हो गए थे। 

दरअसल सारा झमेला इनकी निज़ामुद्दीन की एक धार्मिक सभा को लेकर उत्पन्न हुआ। इस आयोजन में देश-विदेश से हजारों लोग शामिल हुए थे। जब इस सभा में शामिल कुछ लोग कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए, तो सरकार और मीडिया के एक वर्ग ने तब्लीगी जमात पर लॉकडाउन नियमों का उल्लंघन करने और कोरोना वायरस फैलाने का आरोप लगाया। 

दिल्ली पुलिस ने 70 भारतीय नागरिकों और 195 विदेशी नागरिकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), महामारी रोग अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और विदेशी अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए। आरोपों में शामिल था कि मरकज में लोगों ने सामाजिक दूरी और स्वच्छता नियमों का पालन नहीं किया, कुछ जगहों पर तब्लीगी सदस्यों द्वारा थूकने, नर्सों से बदतमीजी जैसे गंभीर आरोप भी लगे। जिन्हें मीडिया और सोशल मीडिया में इस तरह फैलाया गया जैसे हिंदुस्तान में कोरोना का इनसे बड़ा अपराधी कोई दूसरा नही। सोशल मीडिया पर #CoronaJihad जैसे हैशटैग भी ट्रेंड हुए, जिससे सामुदायिक तनाव बढ़ा।

लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 जुलाई 2025 को अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में तब्लीगी जमात के 70 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कर दिया। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि कोई सबूत नहीं है कि इन लोगों ने लॉकडाउन का उल्लंघन किया या जानबूझकर वायरस फैलाया। 


कोर्ट ने पाया कि:

1, मरकज का आयोजन मार्च 2020 की शुरुआत में हुआ था, जब पूर्ण लॉकडाउन लागू नहीं हुआ था। लोग लॉकडाउन के कारण मरकज में फंस गए थे और उनके पास बाहर निकलने का कोई साधन नहीं था।

2, कोविड-19 से संक्रमण का कोई सबूत नहीं, न तो एफआईआर और न ही चार्जशीट से यह साबित हुआ कि वे कोविड-19 से संक्रमित थे या उन्होंने बीमारी फैलाई।

3, कोर्ट ने माना कि धारा 144 CrPC या अन्य कोविड नियमों का उल्लंघन सिद्ध नहीं हुआ।

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली अधिवक्ता आशिमा मंडला ने तर्क दिया कि आरोप "बढ़ा-चढ़ाकर" और "निराधार" थे, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया।

कायदे से ये पूरा मामला एक समुदाय विशेष के खिलाफ पूर्वाग्रह और मीडिया के दुष्प्रचार का जीता जागता उदाहरण है। इससे भी बड़ी बात यहां के बहुसंख्यक वर्ग के मानसिक दिवालियेपन की भी है।

नफरत और वोटों की राजनीति देश को किस गर्त में धकेल रही है उसे समझने में भी ये वर्ग असफल है।(साभार)

गुरुवार, 17 जुलाई 2025

संघ की लाचारी, मोदी सब पर भारी

 संघ की लाचारी, मोदी सब पर भारी 



देश में 2014 के बाद से जो मज़ाक़ बाज़ी का खेल शुरू हुआ है वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दरअसल बचपने का वह दिन मुझे अब भी याद है जब स्कूल से लौटते समय मैं भी उस मजमा का हिस्सा बन गया था जिसमें एक व्यक्ति चीख चीख कर आकाश की ओर देखते हुए कह रहा था कि जिसके जेब में जो भी पैसा है वह उसके सामने बिछे चादर में डाल दे नहीं तो एक लोहे का गोला उस व्यक्ति के ऊपर गिरेगा जो जेब से पैसा नहीं निकलेगा, कुछ लोग डरकर पैसा डालने लगा तो कुछ खिसकने लगे। बस इसी तरह का तमाशा चल रहा है। नये तमाशे में संघ ने फुफकारा 75 साल… लेकिन यदि ज़हर नहीं होने की बात जो जानता है वह भला ऐसे फुफकार से क्यों डरने लगा…

75 की उम्र में संघ सेवा छोड़ना होता है,

पर सत्ता सेवा में कोई रिटायरमेंट नहीं!


अब क्या कोई शक बाकी है?

मोहन भागवत जी ने पहले 75 की उम्र के बाद पद छोड़ने की बात कही — और फिर पलट गए!

क्यों?

क्योंकि वो खुद संघ प्रमुख हैं, पर असली प्रमुख तो कोई और है!

"बिस्वगुरु" की छाया इतनी गहरी है कि संघ भी अब संघ नहीं रह गया,

वो भी आदेशपालक हो गया है — संघ से संघठन तक की यात्रा पूरी हो गई है!

जब भागवत जी जैसे लोग बोलने के बाद बोल पलटें,

तो समझ लीजिए —

"जुगल जोड़ी" ने किसी को नहीं छोड़ा दबाव में लाने से!


तथाकथित नीति, विचारधारा, सिद्धांत सब राजनीतिक जुमले बन चुके हैं —

जहाँ सत्ता के लिए उम्र भी लचीली हो जाती है और संगठन भी झुक जाता है!


अब मत पूछिए "संघ स्वतंत्र है या नहीं"

बस आईना देखिए — और चुपचाप समझ जाइए।

यूं तो आम जीवन में  पचहत्तर वां साल प्लेटिनम जयंती के रुप में जश्न के रूप में मनाया जाता है किंतु यह साल जीवन में सत्ता सुख से वंचित करने वाला सवाल बनके आएगा ऐसा  मोहन भागवत और मोदीजी ने कभी सोचा ना होगा।अपने आपको तुगलक समझने वाले ये लोग अपने बनाए नियमों में इस कदर फंस गए हैं कि कुछ सार्वजनिक तौर पर कहते नहीं बन रहा ।ये मुश्किल वक्त है जब दोनों सितमग़रों के  जन्मदिन सितम्बर की 11(मोहन भागवत) और 17तारीख़ को (नरेंद्र मोदी ) है। यानि मोदी को चादर उढ़ाने की बात प्रतीकत्मक रुप से कहने वाले मोहन भागवत पहले यानि 11सितंबर को 75 के हो जाएंगे। यदि वे चादर पहन बैठ जाते हैं तो 17 को मोदीजी भी शायद अनुसरण कर सकते हैं।पर जैसे कि संकेत मिल रहे हैं कि यह नियम संघ के लिए नहीं बना है यदि भागवत स्थापित रहते हैं तो मोदी को चादर चढ़ाना आसान नहीं होगा।वैसे उनका मूड बता रहा है कि वे पूरे पांच साल पद पर बने रहना चाहते हैं।संघ फुफकार सकता है लेकिन उन्हें काट नहीं सकता है।

तब सवाल यह है कि यह पूरा तमाशा क्या मोदी विरोधियों में संघ के प्रति  विश्वास कम नहीं करेगा। हालाँकि वे लोग यह बात अच्छे से जानते है कि  संघ का एक मतलब झूठ और अफ़वाह उड़ाने वाली संस्था से ज़्यादा कुछ नहीं है…