शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

पंत के छक्के ने क्यों याद दिला दी फरूख की…

 पंत के छक्के ने क्यों याद दिला दी फरूख की…


वैसे तो विपरीत परिस्थितियों में कई भारतीय क्रिकेटरों ने अपनी जाँबाज़ पारी से लोगों के दिलों में राज किया है । ऋषभ पंत ने जब इंग्लैंड के जोफ़्रा आर्चर और कंबोज की गेंद को उड़ाया तो फरूख इंजीनियर ओ सलीम दुर्रानी की याद ताज़ा हो गई, आज फरूख इंजीनियर की बात इसलिए क्योंकि पंत के उस साहसिक शॉट के कुछ घंटे पहले ही लैंकाशायर ने अपने घरेलू मैदान ओल्ड ट्रैफ़ल के एक पैवेलियन का नाम फरूख और क्लाइव लॉयड के नाम रखा था…

फारुख इंजीनियर द्वारा 1967 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मद्रास ( अब चेन्नई) टेस्ट में हाल, ग्रिफिथ, सोबर्स, गिब्स जैसे दिग्गज गेंदबाजों के सामने बनाए गए शतक को कौन भूल सकता है जिसमे  फारुख इंजीनियर ने लंच से पहले 94 रन बनाए थे। फारुख ने उस पारी में हाल, ग्रिफिथ, सोबर्स जैसे दिग्गज तेज गेंदबाजों के खिलाफ 18 चौके लगाए थे। इस श्रृंखला के पहले दो टेस्ट में फारुख की जगह बुधी कुंदरन को खिलाया गया था। दोनों टेस्ट के हारने के बाद इस तीसरे टेस्ट में उन्हें मौका मिला। पहले ओवर से ही उन्होंने आक्रामक ढंग से खेलते हुए हाल और ग्रिफिथ, जो अब तक भारतीय बल्लेबाजों के लिए काल बन चुके थे, के शॉर्ट पिच गेंदबाजी पर शानदार हुक, पुल और स्कवेर कट शॉट खेलते हुए चौकों की झड़ी लगा दी। जब 129 के स्कोर पर पहले विकेट के रूप में दिलीप सरदेसाई आउट हुए तो उन्होने मात्र 28 रन बनाए थे।जब अंततः लंच के बाद वे 109 रन बनाकर आउट हुए तब तक भारत का स्कोर मात्र 145 रन था। इसी टेस्ट के बाद बुधी कुंदरन ने संन्यास ले लिया और 1974 तक इंजीनियर लगातार भारत के लिए खेलते रहे। 


अगले साल उन्हें लैंकाशायर काउंटी ने अनुबंधित कर लिया। जब उस साल लैंकाशायर और यॉर्कशायर परंपरागत रोज़ जौस्ट खेलों के दौरान क्रिकेट मैच खेला जा रहा था तो फारुख ने उस समय के चोटी के तूफानी गेंदबाज फ्रेड ट्रूमैन की पहली गेंद, जो कि बाउंसर थी, जो इतनी ज़ोर से हुक किया कि गेंद हेडिंगले के पवेलियन के छट से टकराकर वापस मैदान में आ गयी। मैच के बाद जब सारे खिलाड़ी यॉर्कशायर कमिटी रूम में ड्रिंक के लिए इक्कठ्ठा हुए तो ट्रूमैन ने फारुख से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए और उनके द्वारा एक ग्लास बियर की फरमाइश पर ट्रूमैन खुद उठकर बार जाकर उनके लिए टेटले का एक पिंट लाकर उन्हें दिया। यॉर्कशायर के सारे खिलाड़ी यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि कि फ्रेड एक विपक्षी, और वो भी लैंकाशायर के, खिलाड़ी को ड्रिंक सर्व करेंगे।


 दरअसल उन्हें मैच शुरू होने से पहले का किस्सा मालूम नहीं था। मैच शुरू होने से पहले फ्रेड लैंकाशायर ड्रेसिंग रूम में अपने पुराने साथी ब्रायन स्टेथम से मिलने लैंकाशायर के ड्रेससिंग रूम में आए। जब ब्रायन ने फारुख परिचय ट्रूमैन से कराया तो उन्होने ने कहा कि भले ही इसने भारत के लिए सबसे तेज और शानदार शतक लगाया हो, पर जब ये आज बल्लेबाजी के आए और मैं गेंदबाजी कर रहा हूँ और इंजीनियर के लिए कोई फोन आए तो आप फोन करने वाले को कुछ देर के लिए प्रतीक्षा करने के लिए कह सकते हैं क्योंकि कुछ ही देर में ये पवेलियन वापस आ ही जाएंगे। पर अपनी गेंद का हश्र देखकर फ्रेड फारुख के बल्लेबाजी के मुरीद बन गए और फिर उनकी दोस्ती फ्रेड के मृत्युपर्यंत बनी रही।


25 फ़रवरी 1938 को बॉम्बे के एक पारसी परिवार जन्मे  इंजीनियर ने माटुंगा के डॉन बॉस्को हाई स्कूल और बाद में माटुंगा के ही पोद्दार कॉलेज में पढ़ाई की। हालांकि बचपन में इंजीनियर की पहली महत्वाकांक्षा पायलट बनने की थी, पर अपने पिता और बड़े भाई डेरियस, जो कि क्लब क्रिकेट खेलते थे, से प्रभावित होकर क्रिकेट के प्रति आकर्षित हो गए।उनके पिता ने उन्हें दादर पारसी कॉलोनी स्पोर्टिंग क्लब में दाखिला दिलाया, जहां उन्होंने सीनियर्स से खेल की बारीकियां सीखीं और बाद में टीम के नियमित सदस्य बन गए। उन्हीं दिनों एक बार डेरियस फारुख को ब्रेबोर्न स्टेडियम के ईस्ट स्टैंड ले गए, जहां उन्होंने डेनिस कॉम्पटन को क्षेत्ररक्षण करते देखा। फारुख ने कॉम्पटन को बुलाया, उन्होंने उन्हें च्यूइंग गम का एक टुकड़ा दिया, जिसे उन्होंने कई सालों तक अपनी बेशकीमती संपत्ति के रूप में संभाल कर रखा। 


वह 1959 में बॉम्बे रणजी टीम में शामिल हुए , हालांकि उन्होंने 1961/62 तक विश्वविद्यालयों के लिए खेलना जारी रखा।इंजीनियर ने 1 दिसंबर 1961 को अपना टेस्ट डेब्यू किया जब भारत ने कानपुर के मोदी स्टेडियम में इंग्लैंड के साथ खेला। चूंकि उस समय बुधी कुंदरन के रूप में एक और बेहतरीन विकेट कीपर बल्लेबाज भारतीय टीम में थे, इसलिए 1967 में उनके संन्यास लेने तक टीम में उनकी जगह नियमित नहीं थी। उन्होने ने 1961/62 से 1974/75 तक भारत के लिए 46 टेस्ट मैच खेले। उन्होंने पाँच एकदिवसीय मैच भी खेले , जो सभी 1974/75 में खेले गए। उन्होंने टेस्ट मैचों में 31 की औसत से 2,611 रन बनाए, जिनमें दो शतक शामिल हैं और उनका सर्वोच्च स्कोर 121 रहा। उन्होंने 66 कैच लिए और 16 स्टंपिंग की। उनके टेस्ट कैरियर का सबसे स्वर्णिम वर्ष 1971 रहा जब भारत ने पहले वेस्ट इंडीज और फिर इंग्लैंड में जाकर पहली बार श्रृंखला जीती थी। ओवल टेस्ट के ऐतिहासिक विजय में उन्होंने दोनों पारियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। पहली पारी में जहां उन्होंने 59 रन बनाए वहीं दूसरी पारी में जब 174 के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत के 134 रनों पर ही 5 विकेट गिर गए तो 28 नाबाद रनों की महत्वपूर्ण पारी खेलकर भारत को विजयी बनाया।


शायद उनके रन और भी ज्यादा होते अगर वे आक्रामक शैली में थोड़ा ठहराव ले आते। पर वे एंटरटेनर थे और अपनी बल्लेबाजी देखने आए हुए दर्शकों को निराश नहीं करना चाहते थे। कहते हैं कि जब एक बार उनसे इंग्लैंड के महान सलामी बल्लेबाज बायकाट ने कहा कि आप के पास मुझसे अधिक प्रतिभा है, पर अपने टेम्परामेंट के चलते मैंने आपसे अधिक रन बनाए, तो फारुख ने जबाव दिया - '' पर ज्याफ, लोग देखने किसे आते हैं?" कहा जाता है कि भारत और लैंकाशायर में उनकी शानदार चमकदार बल्लेबाजी को देखने के लिए स्टेडियम में लोगों की भीड़ जुट जाती थी। उनकी लोकप्रियता का आलम ये थे कि एक बार मैनचेस्टर में तय सीमा से अधिक तेज गाड़ी चलाने के जुर्म में ट्रैफिक इंस्पेक्टर चालान काटने लगा, पर जब वह उन्हें पहचान लिया तो हंस कर ये कहते हुए चालान नहीं काटा कि अगर मैंने चालान काट दिया तो मेरे पिता मुझ पर बहुत नाराज हो जाएंगे।


फारुख सिर्फ क्रिकेटर ही नहीं थे, बल्कि स्टार थे। अपने डैशिंग लुक और चुम्बकीय आकर्षण के चलते लोगों, खासकर महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय थे। वे खाने-पीने और कपड़ों के शौकीन हैं। तभी उन्हें मिले इस सम्मान की चर्चा के दौरान कमेंट्री बॉक्स में रवि शास्त्री ने ऑन-एयर कहा, 'फारुख अपने समय के पिन-अप बॉय थे। वे बहुत फेमस थे। शुरुआत से लेकर अब तक वे वैसे ही हैं, बिल्कुल नहीं बदले। वे एक बहुत अच्छे स्टोरी टेलर है, लेकिन उनकी जो एक सबसे खास बात ये है कि वह खाते बहुत हैं। आप देखेंगे कि खाने के समय उनकी प्लेट हमेशा भरी रहेगी।''


23 जनवरी 1975 को नए बने वानखेड़े स्टेडियम में वेस्टइंडीज के ही विरुद्ध उन्होंने अपना अंतिम टेस्ट खेला। उसी साल वे प्रथम विश्व कप लिए भारतीय टीम में शामिल थे, पर उसी साल के अंत में न्यूजीलैंड और वेस्टइंडीज के दौरे के लिए उन्हें नहीं चुना गया। लैंकाशायर के लिए 1968 से लेकर 1976 तक उन्होंने 9 सीज़न खेले और इस दौरान  लैंकाशायर, जिसने 1950 से कोई ट्रॉफी नहीं जीती थी, 4 बार जिलेट कप और 2 बार जॉन प्लेयर लीग कप जीता। बाद में वे शादी करके वहीं बस गए।बाद में वे क्लब के उपाध्यक्ष भी बने। 1983 में जब भारत ने विश्व कप जीता था तो वे कमेंट्री बॉक्स में मौजूद थे। 2024 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्रदान किया। पर उन्हें थोड़ा मलाल है कि मुंबई, खासकर ब्रेबोर्न स्टेडियम, जहां कि उन्होने अधिकांश क्रिकेट खेली है, उन्हें इस तरह सम्मान नहीं मिला है। क्या लैंकाशायर काउंटी की तरह बीसीसीआई भी बेबोर्न या वानखेडे के किसी स्टैंड का नाम उनके नाम पर रखेगी? (साभार)

गुरुवार, 24 जुलाई 2025

फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर

 फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर… 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजीत अंजुम के साथ जो कुछ हुआ  वह साधारण घटना नहीं थी, लेकिन ये घटना हिटलर के शासन की याद को फिर से ताज़ा इसलिए कर दिया क्योंकि तब भी लोग राष्ट्रवाद की पट्टी बांधे उस अत्याचार पर ख़ामोश थे जिस तरह से आज धर्म की पट्टी बांध कर अत्याचार से मुँह मोड़े हुए है, अब तो हद हो गई कि जनता सरकार चुनने कि बजाय सरकार वोटर चुनने लगी है…

हिटलर के कुछ सच पर प्रकाश डाले उससे पहले बता दूँ कि भारत इस वक़्त बहुत बड़ी साज़िश में फंस चुका है। दो उद्योगपति और दो गुजराती नेता, इन चार लोगों ने मिलकर पूरे देश पर शिकंजा कस रखा है। हालांकि मैं यह मानता हूं कि राजनीति पब्लिक के सामने समस्या बताने से ज़्यादा, समस्या का निराकरण करना होती है।

आज राहुल जी या कांग्रेस, कितने भी बड़े कांड का खुलासा कर दें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आज जरूरत है कि बीजेपी की कारस्तानियों को पकड़ने के बाद उन्हें पब्लिक करने की जगह उनसे फाइट की जाए। गोपनीयता बनाई राखी जाए, हर मोर्चे पर भाजपा को पटखनी दी जाए। भारतीय जनता सोल्यूशन और रिजल्ट ओरिएंटेड हो चुकी है।

एक वक्त था जब जनता वोट देकर सरकार चुनती थी, अब हालात ये हैं कि आज सरकार वोटर चुन रही है। राहुल गांधी जी ने संसद के बाहर कल जिस बड़े खेल के विषय में पत्रकारों को बताया वो उनकी आई टी टीम द्वारा सालभर की गई मेहनत के बाद का निष्कर्ष है।

बीते वर्षों में ईवीएम मशीन पर खूब बवाल मचा था, भाजपा विरोधी लोग कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि ये खुलकर ईवीएम के खिलाफ नहीं बोल रहे, देश में बड़ा आंदोलन नहीं कर रहे। कल राहुल जी के बयान के बाद बेहद स्पष्ट हो गया है कि तब बड़े स्तर पर विरोध क्यों न हुआ।

क्योंकि राहुल जी की टीम के हाथ कुछ पुख्ता लग चुका था। कर्नाटक में वोटरलिस्ट को पूरी तरह से डिजिटल किया गया जिसमें 6 महीने लग गए और इसके उपरांत जब इसका डेटा एनालिसिस हुआ तब बीजेपी का सारा खेल सामने आ गया। नेक्स्ट लेवल फर्जी वोटिंग का गेम।

हो सकता है कि भाजपा के इस फर्जीवाड़े ईवीएम एक फैक्टर हो, लेकिन अब यह तय है कि यह एकमात्र फैक्टर नहीं। जिस ख़तरनाक खेल का ख़ुलासा हुआ हैं वो भारतीय सोच भी नहीं सकते। महाराष्ट्र, बिहार छोड़िए, कर्नाटक चुनाव में अभी 2 साल का वक़्त है और कर्नाटक में भी फ़र्ज़ी वोटर डाले जा रहे हैं। फ़र्ज़ी वोटर से सरकारें बना कर भारत को लूटा जा रहा है।

तब राहुल के खुलासे का असर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि यह बिलकुल हिटलर की रणनीति की तरह है । अमिता नीरव ने एक बार लिखा था… 1942 में फेलिक्स की उम्र इक्कीस के आसपास रही होगी। उस वक्त तक हिटलर यूथ का हिस्सा होना हर जर्मन युवा के लिए अनिवार्य था तो फेलिक्स भी उसका हिस्सा था। हिटलर उसका हीरो था। वह मानता था कि जर्मनी को फिर से उसका पुराना गौरव सिर्फ हिटलर ही दिला सकता है और हिटलर भगवान की तरह हैं। वह जर्मनों के सारे संताप मिटा देगा। 


उस वक्त यहूदियों और विरोधियों के साथ जो कुछ हिटलर कर रहा था, कंस्न्ट्रेशन कैंप्स और उन कैंप्स में जो कुछ हो रहा था, उसकी कहानियाँ बहुत छन-छनकर, बहुत ही फिल्टर होकर आना शुरू तो हो गई थी। मगर ये समझ नहीं आ रहा था इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी गहराई है, क्योंकि इन कहानियो के स्रोत अपुष्ट थे। 


फेलिक्स को इनमें से किसी भी बात पर यकीन नहीं था। तब भी नहीं जब हिटलर ने आत्महत्या कर ली। हिटलर की आत्महत्या और उसके बाद के दो-तीन महीनों तक फेलिक्स उदास रहा और उसे एलायड फोर्सेस को लेकर गहरा गुस्सा रहा। जब अलायड फोर्सेस ने जर्मनी औऱ आसपास के कंसंट्रेशन कैंप्स की सच्चाई बयान करना शुरू किया तो फेलिक्स को ये हिटलर के खिलाफ दुष्प्रचार लगा। 


बाद में अमेरिकी सेनाओ ने जर्मन नागरिको को जबरन म्यूनिख के पास 1933 में बनाए गए पहले कंसंट्रेशन कैंप डाखाऊ और वीमर शहर के आसपास बसाए गए और कई दूसरे नाज़ी कैंप्स ले जाया गया, ताकि जर्मन नागरिक यह देख सके कि वे इतने वक्त से जिस हिटलर को भगवान मान कर पूज रहे थे, उसने असल में क्या किया?


उन नागरिकों में फेलिक्स भी एक था। जब वह डाखाऊ पहुँचा औऱ वहाँ के हालात देखे तो वह बुरी तरह से डिस्टर्ब हो गया। कई साल उसकी थैरेपी चली औऱ अंत में उसने आत्महत्या कर ली। 

***

यूँ हर तरह की सत्ताएँ अपने विरोधियों को कुचलती रही हैं। इससे कोई पार्टी, कोई विचारधारा नहीं बची है। मगर पिछले कुछ सालों से हमारे यहाँ ये प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ रही है कि यदि कोई आलोचना न करे, लेकिन विपक्षी की तारीफ भी कर दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।


मामला सिर्फ राजनीतिक होता तब भी दिक्कत तो थी, मगर दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब वे दमन की प्रवृत्ति धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों पर भी होने लगे। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, धमकियाँ, बहिष्कार आदि-आदि से अब हम बहुत आगे आ गए हैं। 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजित अंजुमजी के खिलाफ जो कुछ हुआ, वह ताजा उदाहरण हैं। इससे पहले से भी यह होता ही आ रहा है। हर आलोचनात्मक आवाज, हर असहमति, हर प्रश्न को जैसे सत्ता कुचलने को आतुर है। 


इतना विराट जनसमर्थन और इतने नंबर्स, एक प्रशिक्षित ट्रोल आर्मी, प्रोफेशनल आईटी सेल, जमीन पर सन्नद्ध मदर ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, चौबीस घंटे चलने वाले मीडिया चैनल्स, अखबार... स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज के शिक्षक, पत्रकार, फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, व्हाट्सएप ग्रुप्स, रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी औऱ गृहस्थ महिलाएँ... सब मिलकर भी सरकार की असुरक्षा दूर नहीं कर पा रही है। ये बात बहुत चौंकाती हैं।


पिछले कुछ वक्त से फासिज्म, हिटलर और उसके वक्त के जर्मनी को समझने की कोशिश कर रही हूँ। समझा कि टोटेलिटेरियन स्टेट असल में हर तरह के हथकंडों से अपनी सत्ता को बनाए रखने औऱ लगातार ताकत बढ़ाते चले जाने के लक्ष्य पर काम करती है। 

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हिटलर ने पहला कंसंट्रेशन कैंप 1933 में डाखाऊ में बनाया था और प्रारंभिक तौर पर उसमें विरोधियों और आलोचकों को ही रखा गया था। असल में ताकत की भूख और असुरक्षा का बहुत गहरा संबंध होता है। जब सत्ता दावों की खोखली नींव पर खड़ी होती है, तब असुरक्षा गहरी होती है। 


जानकार कहते हैं कि हिटलर ने जर्मन नागरिकों को विरोधियों और यहूदियों के खिलाफ मोबलाइज करने की कोशिश की थी। मगर उसमें उसे सफलता नहीं मिली। जर्मनी में सत्ता संभालते ही गोएबल्स को प्रपोगंडा मंत्री बनाया गया। 


फिर सिलसिला शुरू हुआ कल्चरल डोमिनेंस का... राजनीति को नाटक का रूप दिया गया। जोशीले भाषण, समर्थन और दुष्प्रचार के लिए फिल्में जैसे 1935 में बनाई गई ट्रायम्फ ऑफ द विल, मीन कॉम्फ पर आधारित फिल्में और नाटक... कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों को हिटलर के समर्थन में लाने और काम करने के लिए दबाव औऱ प्रलोभन।


इसके लिए जर्मनी के प्रचार मंत्रालय ने नाजी शासन के लिए जरूरी माने जाने वाले कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों की सूची बनाई जिसे ‘गोटबेग्नाडेटेन-लिस्टे’ (ईश्वर के आशीर्वाद की सूची) कहा गया। रीच के प्रचार मंत्रालय से युद्ध से छूट के लिए जो आधिकारिक पत्र मिला, उसमें 1,041 कलाकारों और बुद्धिजीवियों के नाम थे। 


इसमें से ललित कला, साहित्य, संगीत, रंगमंच और वास्तुकाला के क्षेत्र की 378 हस्तियाँ गोटबेग्नाडेटन लिस्टे में शामिल थी। मतलब तमाम उपायों से नाजी नीतियों औऱ हिटलर के समर्थन में दुष्प्रचार किया गया। उसका असर हुआ और इस असर का उदाहरण था, फैलिक्स... सिर्फ अकेला फैलिक्स नहीं, कई लोग उस दुष्प्रचार का शिकार हुए। 


ये बात नागरिकों के लिए है, वे तमाम बुद्धिजीवी, पढ़े-लिखे प्रोफेशनल्स के लिए नहीं जो प्रत्यक्ष रूप से हिटलर की नीतियों के लिए काम करते रहे थे। उनके गुनाह तो क्षम्य ही नहीं थे। कुल मिलाकर एक ‘नाजी ईश्वर’ ने देश और दुनिया में तबाही मचा दी। ये कैसे हो पाया? 


उस दुष्प्रचार से जो कई सालों तक अलग-अलग माध्यमों से चलता रहा। 

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राजनीति को थियेटर का रूप देना असल में हर उस सत्ता के लिए जरूरी होता है, जिसने ताकत  तो लोकतांत्रिक तरीके से पाई हो, मगर उसे बनाए रखने के लिए तमाम अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक तरीके इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं। 


पिछले कुछ सालों के हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालें, हमारी फिल्में, गाने, साहित्य, बुद्धइजीवी, कलाकार, लेखक, पत्रकार... और हिटलर के जर्मनी को जानें। चकित होना बहुत मामूली शब्द लगेगा।(साभार)

बुधवार, 23 जुलाई 2025

हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर…

 हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर… 


छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार हरेली है और इसे सावन मास के अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने खेती किसानी में प्रयुक्त होने वाले औजारो की पूजा करते हैं तो घर घर न केवल पकवान बनते हैं बल्कि घर में आने वाली तमाम तरह की बाधाओं को दूर करने के उपाय किए जाते हैं, तब वह क़िस्सा जो बचपन की स्मृति लिये ज़ेहन में समाया हुआ है उसे आज आपके साथ शेयर कर रहा हूँ…

बात तीस पैतीस साल पुरानी है, कहा जाता है कि यह अमावस्या जादू टोने के लिये सबसे उपयुक्त दिन है, इस दिन तमाम तरह की शक्तियों को जागृत भी किया जाता है इसलिए आज के दिन टोनही झुपने ज़रूर निकलती है।

इस कहा सुना के फेर में हम कुछ दोस्त नदी किनारे रात में पहुँच गये , मान्यता है कि टोनही रात में निकलती है और वह न केवल ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर चलती है बल्कि उसके मुँह से आग भी निकलते रहता है।

इस पहचान के आधार पर हम कुछ दोस्तों के साथ नदी किनारे जा कर चक्कर लगाने लगे।

उस रात हमे कुछ नहीं दिखा, यह सिलसिला कई सालों तक चला…

फिर …

अब भी इस मान्यता पर क्या कहें…

हरेली तिहार के दिन पूजा करने से पर्यावरण शुद्ध और सुरक्षित रहता है और फसल उगती है तो किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं लगती है. हरेली तिहार मनाने से फसल को हानिकारक किट तथा अनेको बीमारिया नही होती है इसलिए हरेली तिहार मनाया जाता है. हरेली त्यौहार के दौरान छत्तीसगढ़ के लोग अपने-अपने खेतों में भेलवा पेड़ की शाखाएँ लगाते हैं. वे  अपने घरों के प्रवेश द्वार पर  नीम के पेड़ की शाखाएँ भी लगाते हैं. नीम में औषधीय गुण होते हैं जो बीमारियों के साथ-साथ कीड़ों को भी रोकते हैं.  लोहार हर घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्ती लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीष देते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है. हरेली पर्व में, गांव और शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. सुबह पूजा-अर्चना के बाद, गांव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली एकत्रित होती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता खेली जाती है. इस प्रतियोगिता में, लोग नारियल को फेंककर दूरी का मापन करते हैं. नारियल हारने और जीतने का सिलसिला रात के देर तक चलता है,  हरेली त्यौहार के दिन गाय बैल भैंस को भी साफ सुथरा कर नहलाते हैं. अपनी खेती में काम आने वाले औजारों को हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को धोकर और घर के बीच आंगन में रख दिया जाता है या आंगन के किसी कोने में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं और उसकी पूजा की जाती है साथ ही अपने कुलदेवता की भी पूजा की जाती है .  

माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं और कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है. अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं के साथ पूजा करते हैं. हरेली के बच्चे गेंड़ी का आनंद लेते हैं. इस अवसर पर सभी के घरों में विशेष प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं. चावल के आटे से बनी चीला रोटी को इस दिन लोग खूब चाव से खाते हैं. कोई इसे नमकीन बनाता है, तो कोई इसे मीठा भी बनाते हैं. यह खाने वालों की पसंद के ऊपर होता है. इस तरह से यह त्यौहार परम्पराओं से भरी हुई है. हरेली तिहार के दिन सभी लोग अपने–अपने दरवाजा पर नीम टहनी तोड़ कर टांग देते है और इसी बहुत गेंड़ी खेल का आयोजन शुरु हो जाता है. हरेली तिहार के दिन सुबह से ही बच्चे से लेकर युवा तक 20 या 25 फिट तक गेंडी बनाया जाता है. उसी दिन सभी युवा एवं बच्चे गेंडी चढ़ते है गावं में घूमते है. बच्चों और युवाओं के बीच गेंड़ी दौड़ प्रतियोगिता भी की जाती है.

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

बिसाहू दास महंत, जिन्होंने बांगो बांध का सपना देखा…

 बिसाहू दास महंत -जिन्होंने बाँगों बांध का सपना देखा…


छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षाअपमान की दास्तान तो उस गांधीवादी राजनेता के साथ भी जुड़ी है जिन्होंने जीवंतपर्यन्त अपने को छत्तीसगढ़ के लिये समर्पित कर दियाकभी चुनाव नहीं हारे और आज़ादी के बाद से 1978 तक विधानसभा मेंछत्तीसगढ़ का नेतृत्व किया। किसानों की पीड़ा को अपनी पीड़ा बनाकर बांगो बांध का  केवल सपना देखा उसे पूरा भी किया कहा जायतो ग़लत नहीं होगा,

राजनीति के गुटबाज़ी ने उन्हें हाशिये पर धकेलने की तमाम कोशिश की लेकिन वे  तो झुके  ही डरेबल्कि डटे रहेलड़ते रहे 

ये थे स्व बिसाहू दास महंत

तब यहाँ शुक्ल बंधुओं की तूती बोलती थीउनके समर्थन के बिना राजनीति कितना कठिन था बताने की ज़रूरत नहीं हैऔर यह सबउनके पुत्र चरण दास महंत को भी आगे जाकर झेलना पड़ा थाचरणदास महंत और उनकी पत्नी ज्योत्सना आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कीराजनीति के चमकदार चेहरे हैं लेकिन आज बात स्व बिसाहू दास की..

बिसाहू दास ही वे नेता थे जिनके दम पर अर्जुन सिंह आगे बढ़े और शायद यही वजह है कि अर्जुन सिंह ने इस परिवार के लिए आगे आकर काम किया, चरण दास की नौकरी, शादी से लेकर एमएलए की टिकिट…


बिसाहू दास महंत (1 अप्रैल 1924 - 23 जुलाई 1978) मध्य प्रदेश के एक सफल  राजनीतिज्ञ थेवह राज्य में कांग्रेस द्वारा निर्मित अबतक के सबसे सफल विधायकों में से एक थेउन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए क्रमशः एकदो और तीन कार्यकालों के लिए बारादुवार काप्रतिनिधित्व कियाजिसे अब नया बाराद्वारनवागढ़ और चांपा के नाम से जाना जाता हैउन्होंने 1952 में बाराडुवर से 1957 और1962 में नवागढ़ और वर्ष 1967, 1972 और 1977 में चांपा से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता. 1952 में जीतना शुरू करने के बादसे वह कभी चुनाव नहीं हारेवे लगातार छह बार चुने गएजब तक उनकी मृत्यु नहीं हुईवे बहुत लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहेअंतमें कार्डियक अरेस्ट के कारण उनकी मृत्यु हो गई.

किसान थे दिल के करीब :1942 और 1947 के बीच स्वमहंत ने अपने कॉलेज जीवन में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थीइसवजह से सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की और उनकी छात्रवृत्ति को भी खारिज कर दिया थाआगे चलकर वह राजनीति में ऊंचे पदोंपर रहेअविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री जैसे पदों पर काम करते हुए उन्होंने किसानों की पीड़ा को समझा और उनके लिए सिंचाई काप्रबंध करने की ठानीकोरबा जिले में निर्मित प्रदेश के सबसे ऊंचे मिनीमाता बांगो बांध के शिलान्यास का श्रेय उन्हें दिया जाता हैजिससे आज लाखों हेक्टेयर खेतों की प्यास बुझती हैकिसानों अपने खेत की सिंचाई कर पाते हैं.

पुत्र और बहू आगे बढ़ा रहे विरासत :स्वर्गीय बिसाहू दास महंत के दो पुत्रों में डॉ चरणदास महंत भी राजनीति में उतने ही सफल हैंजितनेकभी बिसाहू दास महंत थेडॉ चरणदास महंत भी अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री जैसे पदों पर रहेकेंद्र में भी सांसद रहेवर्तमान में वहछत्तीसगढ़ के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैंजबकि चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत कोरबा लोकसभा सीट से सांसद हैं.

सोमवार, 21 जुलाई 2025

बड़े बेआबरू होकर…

बड़े बेआबरू होकर…


उपराष्ट्रपति जगदीप धनगढ़ ने इस्तीफ़ा दे दिया। मानसून सत्र के पहले दिन आये उनके इस्तीफ़े की असली वजह जो भी हो लेकिन इतिहास उन्हें एक बेहद चाटुकार और आलोकतांत्रिक व्यक्ति के रूप में कभी नहीं भूलेगा ! क्या है पूरा मामला उन्हें कौन सी बीमारी थी…

जगदीप धनगड़ का विवादों से नाता रहा है , पहली बार वे विवादों में तब आये जब जनवरी 2023 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की 'मूल संरचना सिद्धांत' के पुनरावृत्ति के संदर्भ में बयान दिया था जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था. उन्होंने कहा...  'संसद के बनाए काननों को अगर अदालत रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा होगा'. इस पर कांग्रेस ने तीखा प्रहार किया तो ममता बेनर्जी ने वहीं टीएमसी की ओर से कहा गया, यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडे को चला रहा है. 


छात्र राजनीति पर टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि कुछ विश्वविद्यालय देश विरोधी विचार धराओ की शरणस्थली बन गये है 

उन पर दिसंबर 2023 में उपराष्ट्रपति धनखड़ पर अधिवेशन में विपक्षी सांसदों को रोकने का आरोप लगा था. विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि संसद के शीत सत्र मे. रोका गया। कांग्रेस प्रेसिडेंट खड़के ने तो यह भी कह दिया कि धनगड़ का बर्ताव बीजेपी प्रवक्ताओं जैसा हो गया है 

 किस बीमारी से जूझ रहे थे धनखड़?

इस साल 9 मार्च 2025 की रात को जगदीप धनखड़को अचानक सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत के बाद एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्हें वहां CCU (क्रिटिकल केयर यूनिट) में निगरानी में रखा गया और वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राजीव नारंग की देखरेख में इलाज हुआ. डॉक्टरों के अनुसार उन्हें दिल से जुड़ी परेशानी थी जिसे तत्काल नियंत्रित कर लिया गया था. करीब तीन दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद 12 मार्च को उन्हें छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन कार्डियक मॉनिटरिंग जारी रखी गई.

डॉक्टरों की रिपोर्ट में बताया गया था कि उपराष्ट्रपति को हाई ब्लड प्रेशर, थकावट और कार्डियक स्ट्रेस जैसी समस्याएं हैं. उम्र के लिहाज से उन्हें गंभीर श्रेणी का मरीज माना गया और मेडिकल टीम ने उन्हें लंबे समय तक विश्राम और कार्यभार में कटौती की सिफारिश की थी. अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.