बुधवार, 24 जून 2026

'दो दर्जन' रसूखदार अफसरों का 'सिंडिकेट' आज भी हावी!

 मुख्यमंत्री बदले, चेहरे बदले; लेकिन व्यवस्था पर 'दो दर्जन' रसूखदार अफसरों का 'सिंडिकेट' आज भी हावी!



छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद यह माना जा रहा था कि प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा शुद्धिकरण देखने को मिलेगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाली सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन राज्य के प्रशासनिक गलियारे की एक कड़वी हकीकत यह भी है कि चेहरों के बदलने से व्यवस्था का बुनियादी ढर्रा नहीं बदला है। सूत्रों और दस्तावेजी कड़ियों की मानें तो राज्य में करीब दो दर्जन ऐसे आईएएस अधिकारियों का एक मजबूत 'नेक्सेस' (प्रशासनिक सिंडिकेट) सक्रिय है, जिसके रसूख के आगे सत्ता की चाबुक भी बेअसर साबित हो रही है। यह सिंडिकेट इस कदर हावी है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों से आने वाले कड़े निर्देश और जांच की चिट्ठियां भी राज्य के सचिवालय में कहीं न कहीं फाइलों के नीचे दबा दी जाती हैं।

केंद्र की चिट्ठियां रद्दी की टोकरी में!

प्रशासनिक हलकों में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग (DoPT) और गृह मंत्रालय की उन गोपनीय और अर्ध-शासकीय चिट्ठियों की है, जो राज्य के रसूखदार अफसरों के खिलाफ आई गंभीर शिकायतों के बाद भेजी गई थीं। इन पत्रों में टेंडर प्रक्रियाओं में गड़बड़ी, पद का दुरुपयोग, आय से अधिक संपत्ति और वित्तीय अनियमितताओं की तत्काल जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश थे। विडंबना यह है कि इन निर्देशों के बावजूद न तो कोई ठोस जांच आगे बढ़ी और न ही संबंधित अधिकारियों पर कोई गाज गिरी।

इस मुद्दे पर समय-समय पर खुद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर तथा अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता जैसे लोगों ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), राष्ट्रपति और केंद्रीय जांच एजेंसियों को लगातार शिकायतें भेजी हैं। इसके बावजूद राज्य के सिस्टम के भीतर बैठा यह कॉरपोरेट-प्रशासनिक गठजोड़ इतना ताकतवर है कि वह हर कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डालने का हुनर जानता है।

दागी और विवादित चेहरों की लंबी फेहरिस्त

यदि राज्य के प्रशासनिक इतिहास और हालिया विवादों पर नजर डालें, तो कई ऐसे बड़े नाम सामने आते हैं जिन पर गंभीर आरोप लगने या केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) की रडार पर आने के बावजूद लंबे समय तक मुख्यधारा के पदों पर संरक्षण मिलता रहा।

इस नेक्सेस या विवादों के दायरे में आए प्रमुख नामों में निम्नलिखित अधिकारी विभिन्न समय पर चर्चा का विषय बने रहे:

 अनिल टूटेजा और समीर बिश्नोई: अनुपातहीन संपत्ति और फॉरेन एक्सचेंज मामलों से लेकर विभिन्न नीतिगत विवादों में घिरे रहे।

 विवेक ढांड तामन सिंह सोनवानी: नजूल जमीन के मामलों से लेकर अन्य कई गंभीर प्रशासनिक विसंगतियों के आरोप इन पर लगते रहे।

 डॉ. आलोक शुक्ला निरंजन दास: सरकारी धन के कथित विचलन और आबकारी से जुड़े बड़े नीतिगत फैसलों को लेकर लगातार सुर्खियों में रहे।

 संजय कुमार अलंग, कुलदीप शर्मा, सुरेंद्र कुमार जायसवाल, गौरव द्विवेदी: इनके कार्यकाल के दौरान टेंडर प्रक्रियाओं, सर्व शिक्षा अभियान और आईसीटी प्रोजेक्ट्स में गड़बड़ियों की शिकायतें समय-समय पर राजनेताओं और शिकायतकर्ताओं द्वारा उठाई गईं।

 इसके अलावा नरेंद्र दुग्गा, सुधाकर खलगो, राजेश सिंह राणा, डीडी सिंह, एस प्रकाश, अमृत खलगो, नुपुर शर्मा, किरण कौशल, टी राधा कृष्णन, संजीव कुमार झा और भुवनेश कुमार यादव जैसे अधिकारियों के नाम भी किसी न किसी विभागीय स्तर पर या शिकायतों के संदर्भ में इस प्रशासनिक चक्रव्यूह के इर्द-गिर्द चर्चा में बने रहे।

प्यादों पर गाज, वजीर सुरक्षित: कैसा है ये शतरंज का खेल?

प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब भी भ्रष्टाचार पर हल्ला मचता है, तो कार्रवाई केवल 'प्यादों' पर क्यों होती है? उदाहरण के तौर पर, हाल ही में आबकारी विभाग के करीब 29 अधीनस्थ अधिकारियों व कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई की गई, लेकिन इस पूरे खेल की नीति बनाने वाले और पर्दे के पीछे बैठे 'शतरंज के बड़े मोहरों' को छूने से भी व्यवस्था बचती नजर आती है।

इस पूरे खेल के पीछे एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी काम करती है:

1. मलाईदार पदों का प्रबंधन: बड़े सप्लायर, रसूखदार ठेकेदार और बिचौलिए मिलकर सत्ता के शीर्ष गलियारों को इस तरह प्रभावित करते हैं कि उनके अनुकूल काम करने वाले अफसर हमेशा मलाईदार या नीतिगत रूप से महत्वपूर्ण पदों पर बने रहें।

2. संविदा का खेल: यदि इस सिंडिकेट का कोई मुख्य मोहरा सेवानिवृत्त (Retire) भी हो जाता है, तो उसे व्यवस्था को सुचारू रूप से "मैनेज" रखने के लिए संविदा नियुक्ति देकर दोबारा महत्वपूर्ण कुर्सी पर बिठा दिया जाता है।

क्या 2005 बैच का एक सिंडिकेट चला रहा है समानांतर व्यवस्था?

गलियारों में सबसे चौंकाने वाली चर्चा यह है कि मौजूदा दौर में 2005 बैच के एक प्रभावी अधिकारी के इर्द-गिर्द पूरा प्रशासनिक चक्रव्यूह घूम रहा है। इस गुट ने मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर नीति-निर्धारक विभागों तक अपनी ऐसी अदृश्य घेराबंदी कर रखी है कि जमीनी हकीकत और ईमानदार अफसरों की आवाजें शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार की जवाबदेही बड़ी है या फिर सालों से कुर्सियों को जकड़े बैठे इन चंद नौकरशाहों का सिंडिकेट? यदि केंद्र सरकार की चिट्ठियों और जांच एजेंसियों की रिपोर्टों को इसी तरह ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा, तो छत्तीसगढ़ की जनता के साथ 'सुशासन' का वादा सिर्फ कागजी बनकर रह जाएगा।

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