शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

खाकी का खूनी सच—क्या रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक?

  खाकी का खूनी सच—क्या रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक?



 बंद कमरों में कानून का कत्ल

जिस खाकी को जनता की सुरक्षा और कानून की रखवाली का जिम्मा सौंपा गया है, जब वही पुलिस लॉकअप के बंद कमरों में जुल्म और हिंसा की सीमाएं लांघ जाए, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही नहीं, बल्कि आम नागरिक की न्याय व्यवस्था पर से आस्था डिगने लगती है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा-बस्तर से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु तक—हिरासत में टॉर्चर और मौत (Custodial Death) के मामले देश की न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से आए एक 7 साल पुराने मामले में अदालत के सख्त रुख ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या कानून के रखवाले ही कानून के हत्यारे बन रहे हैं?

1. अंबिकापुर का पंकज बेग मामला: 7 साल बाद अदालत का बड़ा हथौड़ा

अंबिकापुर (छत्तीसगढ़) के कोतवाली थाने का मामला वर्ष 2019 का है [02:48]। सूरजपुर जिले के अग्नाहारी गांव के रहने वाले आदिवासी युवक पंकज बेग को पुलिस ने केवल एक मामूली चोरी के संदेह में 21 जुलाई 2019 को हिरासत में लिया था [03:02]।

अगले ही दिन (22 जुलाई 2019) पंकज की लाश थाने से कुछ दूरी पर फंदे से लटकी मिली [03:28]। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए एक थ्योरी गढ़ी कि आरोपी लॉकअप से फरार हो गया था और उसने आत्महत्या कर ली [03:41]। दूसरी तरफ, परिजनों का सीधा आरोप था कि पंकज को लॉकअप में ही पीट-पीटकर मार डाला गया और मामले की लीपापोती करने के लिए उसे फांसी पर लटकाकर फरारी का नाटक रचा गया [03:52]।

 विधानसभा से सड़कों तक प्रदर्शन: इस आदिवासी युवक की मौत के बाद भारी राजनीतिक और सामाजिक बवाल हुआ [04:27]। तत्कालीन थाना प्रभारी (TI) समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया और IPC धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया [04:51]।

 फाइल बंद करने की कोशिश और कोर्ट का हस्तक्षेप: समय बीतने के साथ पुलिस प्रशासन ने मामले पर पर्दा डालने और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की कोशिश की [05:08]। परंतु 30 जून 2026 को अंबिकापुर के सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश ने पुलिस की 'आत्महत्या व फरारी' की कहानी को सिरे से खारिज कर दिया [05:36]।

 री-इन्वेस्टिगेशन और SIT का गठन: अदालत ने मामले की दोबारा जांच (Re-investigation) का आदेश देते हुए सरगुजा SP की देखरेख में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का निर्देश दिया [06:08]। परिजन अब भी निष्पक्षता के लिए मामले की CBI जांच की मांग कर रहे हैं [06:19]।

2. देश भर में हिरासत में मौतों के भयावह आंकड़े

अंबिकापुर का मामला कोई इकलौती घटना नहीं है। एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े गवाही देते हैं कि देश में हर साल 2,000 से अधिक लोगों की मौत पुलिस/न्यायिक हिरासत में होती है, जिनमें से 150 से 200 मौतें सीधे पुलिस लॉकअप के भीतर दर्ज की जाती हैं [01:41]।

 उत्तर प्रदेश और बिहार की स्थिति: उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कस्टोडियल टॉर्चर और एनकाउंटर की थ्योरी पर लगातार सवाल उठते रहे हैं [02:05]।

 बिहार का भरत तिवारी एनकाउंटर मामला: हाल ही में बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर सोशल मीडिया और आम जनता में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली, जहाँ पुलिसिया कार्रवाई के वीडियो सामने आने पर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक मंशा पर सीधे सवाल खड़े हुए [02:05]।

3. तमिलनाडु का सात्तांकुलम (Sathankulam) केस: न्याय की एक ऐतिहासिक नजीर

जब भी पुलिस टॉर्चर और हिरासत में मौत की बात होती है, तमिलनाडु का चर्चित सात्तांकुलम (साधना कुलम) मामला सबसे बड़ी नजीर बनकर सामने आता है [06:37]।

 क्या था मामला? लॉकडाउन के दौरान मामूली दुकान समय सीमा का उल्लंघन करने पर पुलिस पिता-पुत्र (जयराज और बेनिक्स) को उठाकर थाने ले गई और रात भर बर्बरतापूर्वक पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी [06:46]।

 अदालत का ऐतिहासिक फैसला: मदुरै कोर्ट और जांच एजेंसियों के कड़े रुख के बाद आरोपी 9 पुलिसकर्मियों को कड़ा सबक सिखाया गया [06:55]। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि "जो कानून के रक्षक हैं, उन्होंने ही कानून का कत्ल किया है।" [07:05]

 अंबिकापुर केस के लिए उम्मीद: तमिलनाडु का यह फैसला देश भर के कस्टोडियल डेथ मामलों के लिए एक नजीर बन चुका है [07:15]। यदि तमिलनाडु में बर्बरता करने वाले पुलिसकर्मी कानून के शिकंजे में आ सकते हैं, तो छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में 5 पुलिसकर्मियों पर कानून का शिकंजा क्यों नहीं कसा जा सकता? [07:27]

4. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस और संवैधानिक अधिकार

भारत के संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार:

1. सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी पुलिस की: यदि कोई व्यक्ति पुलिस की हिरासत में है, तो उसकी शारीरिक सुरक्षा की 100% जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की होती है [07:44]।

2. सामान्य या प्राकृतिक मौत का बहाना नहीं: कस्टडी में हुई किसी भी संदिग्ध मौत को आसानी से 'आत्महत्या' या 'प्राकृतिक मौत' बताकर खारिज नहीं किया जा सकता [07:58]।

3. डी.के. बासु गाइडलाइन्स: सुप्रीम कोर्ट की डी.के. बासु गाइडलाइन्स के तहत गिरफ्तारी के दौरान परिजनों को सूचना देना, मेडिकल जांच कराना और टॉर्चर न करना अनिवार्य है।

निष्कर्ष: क्या अंबिकापुर के पीड़िता परिवार को मिलेगा न्याय?

अंबिकापुर कोर्ट का नया आदेश पुलिस विभाग की कार्यशैली पर करारा तमाचा है। अब देखना यह होगा कि सरगुजा पुलिस की SIT इस मामले में कितनी निष्पक्षता से जांच करती है या परिजनों की CBI जांच की मांग को स्वीकार किया जाता है [08:06]।

सवाल केवल एक पंकज बेग या जयराज-बेनिक्स का नहीं है; सवाल इस बात का है कि क्या खाकी वर्दी पहनने वाले अधिकारियों को कानून से ऊपर रहने की छूट मिलती रहेगी, या न्याय का हथौड़ा इसी तरह चलता रहेगा?

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