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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

राष्ट्रवाद के मुखौटे में ज़मीन का खेल? एक छत्तीसगढ़िया डॉक्टर की बेबसी की कहानी

 राष्ट्रवाद के मुखौटे में ज़मीन का खेल? एक छत्तीसगढ़िया डॉक्टर की बेबसी की कहानी


सत्ता
का दम और बेदम होता कानून: जब अपनी ही ज़मीन के लिए 'अपराधी' बन गया एक नागरिक

 स्वदेशी का नारा, ज़मीन पर कब्ज़ा और बेबस प्रशासन: रायपुर से ग्राउंड रिपोर्ट


क्या सत्ता और रसूख का नशा इस कदर हावी हो सकता है कि कानून की धज्जियां उड़ाते हुए किसी आम नागरिक की पुश्तैनी ज़मीन पर ही कब्ज़ा कर लिया जाए? क्या धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले संगठन धरातल पर सादगी का चोला उतारकर भू-माफिया जैसा बर्ताव करने लगे हैं? ये सवाल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के न्यू शांति नगर से उठ रहे हैं, जहाँ एक पढ़ा-लिखा छत्तीसगढ़िया युवक अपनी ही खरीदी हुई ज़मीन पर एक ईंट रखने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

मुख्य मामला: पुश्तैनी ज़मीन और 'स्वदेशी' की नज़र

मामला जांजगीर-चांपा के निवासी डॉ. अजय देवांगन का है। [02:52] उनके पिता ने साल 1995 (सन सतानवे) में रायपुर के न्यू शांति नगर में एक डाइवर्टेड (विपत्तित) प्लॉट खरीदा था। [02:59] पिता का ट्रांसफर होने के कारण वे उस समय वहां निर्माण नहीं करा सके। लेकिन जब यह ज़मीन डॉ. अजय देवांगन के संरक्षण में आई, तो उन्होंने पिछले तीन साल में करीब 5 से 6 बार अपनी ज़मीन की बाउंड्री वॉल कराने का प्रयास किया। [03:10]

विडंबना देखिए, डॉ. देवांगन की इस ज़मीन के ठीक बगल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अनुसांगिक संगठन 'स्वदेशी जागरण मंच' का कार्यालय 'स्वदेशी भवन' स्थित है। [03:28] डॉ. देवांगन का आरोप है कि जब भी वे अपनी ज़मीन पर काम शुरू कराने आते हैं, स्वदेशी भवन के कर्मचारी शुभ्रराज चाकी और अन्य लोग कभी पुलिस भेजकर, तो कभी धमकियां देकर काम रुकवा देते हैं। [03:37]

आरोप: 'ओने-पौने दाम में बेचो, नहीं तो...'

डॉ. देवांगन का कहना है कि उनकी मूल ज़मीन में से लगभग 800 स्क्वायर फीट का हिस्सा कम हो चुका है, जिसे कथित तौर पर बगल के निर्माण द्वारा दबा लिया गया है। [05:07] इतना ही नहीं, पीड़ित का आरोप है कि उन्हें अलग-अलग नंबरों से फोन पर धमकियां दी जा रही हैं कि 'इस ज़मीन पर मत घुसना, यह हमारी है।' [04:27] डॉक्टर ने बातचीत में खुलासा किया कि उन्हें यह तक कहा गया—"ज़मीन हमारे कब्ज़े में है, तुम्हें इसे ओने-पौने (चना-मुर्मुरा) के भाव में हमें ही बेचना पड़ेगा।" [06:24]

मददगार की भूमिका में छत्तीसगढ़ क्रांति सेना

जब शासन-प्रशासन से हताश होकर पीड़ित डॉक्टर ने 'छत्तीसगढ़ क्रांति सेना' से संपर्क किया, तब जाकर इस मामले में स्थानीय स्तर पर हलचल मची। [07:29] क्रांति सेना के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित अपनी ही ज़मीन पर बाउंड्री करा पाए और वहां ताला लगवाया गया। [08:46] क्रांति सेना के पदाधिकारियों का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में बाहर से आने वाले कुछ लोग रसूख और संगठनों का नाम लेकर स्थानीय छत्तीसगढ़िया लोगों की ज़मीनों को निशाना बना रहे हैं। [09:25]

प्रशासनिक रवैये पर सुलगते सवाल

इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू प्रशासनिक रवैया है। आरोप है कि छुट्टी के दिन (ईद/बकरीद जैसी राजपत्रित छुट्टी) भी तहसीलदार और पुलिस अमला स्वदेशी भवन के इशारे पर मौके पर पहुंच जाता है। [08:53] जब पीड़ित अपनी ही ज़मीन पर अवैध ढांचा हटवाने के लिए जेसीबी (JCB) चलाता है, तो रसूखदारों के दबाव में उस पर 'ध्वनि प्रदूषण' का मामला दर्ज कर उसे थाने में दो-दो घंटे बैठाया जाता है। [03:51], [05:38]

यह स्थिति रायपुर में 'पुलिस कमिश्नर प्रणाली' लागू होने के बाद की है। [02:35] ऐसे में पत्रिका के माध्यम से यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या कमिश्नरेट प्रणाली आम जनता की सुरक्षा के लिए है या फिर रसूखदारों के अवैधानिक कामों को संरक्षण देने के लिए? [10:12]

निष्कर्ष (Conclusion):

कल तक जो संगठन विपक्ष में रहते हुए सादगी, स्वदेशी और संस्कारों की दुहाई देते थे, सत्ता के नजदीक आते ही उनके इस रूप को देखकर आम जनता हैरान है। एक तरफ जहां भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक डॉक्टर अपनी वैध ज़मीन के कागज़ात जेब में लेकर इंसाफ की भीख मांग रहा है। यह कहानी सिर्फ एक ज़मीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि रसूख बनाम न्याय की उस जंग की है जिसमें कानून और निष्पक्षता दांव पर लगी है।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/ovGJnVXqN_0?si=DDtlMdu6SA3-tE3x


सोमवार, 29 जून 2026

सीजी के अफसरों में 'रेंटल किंग' बनने होड़

 सीजी के अफसरों में 'रेंटल किंग' बनने होड़ 

साहबों की 'सफेद कमाई' का काला सच: आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की घोषित संपत्तियों के पीछे का पूरा खेल



रायपुर। जिनके हाथों में जिलों की कमान है, जिनके पास नीतियों को बदलने और मोड़ने की ताकत है, और जिनके एक दस्तखत से कॉरपोरेट जगत के फैसले तय होते हैं—वे साहबान आजकल एक नए धंधे के बेताज बादशाह बन चुके हैं। यह धंधा है 'रेंट' यानी किराएदारी का। छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली और गुरुग्राम के प्राइम लोकेशंस तक, नौकरशाही के रसूखदारों ने प्रॉपर्टी का ऐसा जाल बुना है कि आज वे 'रेंटल किंग' कहलाने लगे हैं।

यह कोई कोरी अफ़वाह या विरोधी दलों का आरोप नहीं है, बल्कि खुद इन आला अफसरों द्वारा सरकार को सौंपे गए अचल संपत्ति के ब्यौरे (IPR) की वो हकीकत है, जो चीख-चीखकर तंत्र की रीढ़ में समाई विलासिता को बयां कर रही है। सवाल सीधा है—क्या यह सिर्फ निवेश से होने वाली आय है, या फिर रसूख के दम पर काली कमाई को 'सफेद' करने की कोई सोची-समझी तरकीब?

आईएफएस (IFS) ने मारी बाजी: जब 'जंगल के रखवाले' बने जमीनों के सौदागर

आमतौर पर माना जाता था कि अकूत संपत्ति और जमीनों के मामले में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के बीच ही रेस चलती है। लेकिन हालिया आंकड़ों ने चौंका दिया है। इस बार वन सेवा के अफसरों (IFS) ने सबको पीछे छोड़ दिया है।

 तपेश कुमार झा: इन्हें किराए से हर महीने ₹60,000 की आय हो रही है।

 अनिल कुमार साहू: इनकी रेंटल इनकम ₹84,000 प्रति माह दर्ज है।

 प्रेम कुमार: ₹64,000 की कमाई सिर्फ किराए से कर रहे हैं।

 संजीता गुप्ता: इन्हें भी हर महीने ₹94,000 का भारी-भरकम किराया मिल रहा है।

 अरुण कुमार पांडे: ₹61,000 की रेंटल इनकम इनके खाते में जा रही है।

इनमें से कई अफसरों की प्रॉपर्टीज या तो प्राइम लोकेशंस पर हैं या फिर परिवार के सदस्यों के साथ 'साझेदारी' के खेल में उलझी हुई हैं। जंगल की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले इन साहबों के पास शहर के पॉश इलाकों में आलीशान बंगले और कमर्शियल स्पेस कहां से आए, इसका जवाब कानून के गलियारों में गुम है।

खाकी का 'खास' रेंट: करोड़ों के घोटाले के साए और लाखों का किराया

कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियों का रसूख रखने वाले आईपीएस अधिकारियों की फेहरिस्त और भी ज्यादा चौंकाने वाली है। इनमें उन चेहरों के नाम भी शामिल हैं जो बड़े विवादों और घोटालों की जांच के दायरे में रहे हैं।

 दीपांशु खाबरा: कोयला घोटाले में ईडी (ED) की पूछताछ का सामना कर चुके इस चर्चित चेहरे की सालाना या मासिक रेंटल इनकम के आंकड़े दंग करने वाले हैं। इन्हें किराए से ₹18 लाख की मोटी रकम मिल रही है।

 विवेकानंद: इनका साम्राज्य छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में फैली संपत्तियों से इन्हें ₹2 लाख 40 हजार का किराया मिल रहा है।

 पवन देव: इन्हें हर महीने ₹1,74,000 का किराया मिलता है।

 अरुण देव गौतम: ₹1,90,000 की रेंटल इनकम के साथ यह भी इस रेस में काफी आगे हैं।

 प्रदीप गुप्ता: इनका नेटवर्क उत्तर प्रदेश (UP) तक फैला हुआ है, जहां की संपत्तियों से इन्हें ₹60,000 का किराया मिल रहा है।

कुर्सी का 'कलेक्शन': आईएएस बिरादरी के वीआईपी रेंटर्स

नीति निर्माताओं और मंत्रालय में बैठने वाले आईएएस अफसरों की सूची भी कम दिलचस्प नहीं है। इनकी प्रॉपर्टी रायपुर के शंकर नगर, टैगोर नगर, समता कॉलोनी, चौबे कॉलोनी, छेरीखेड़ी और नया रायपुर जैसे उन इलाकों में हैं जहां आम आदमी जमीन की कीमत सुनकर ही पीछे हट जाता है।

 मनोज पिंगवा: कृषि भूमि के साथ-साथ कई फ्लैट्स के मालिक पिंगवा साहब को किराए से ₹1,800,000 (18 लाख) की भारी-भरकम रकम मिल रही है।

 गौरव द्विवेदी: इनकी रेंटल आय ₹36,000 घोषित है।

 विकासशील: उत्तराखंड से लेकर रायपुर तक फैले इनके प्रॉपर्टी एम्पायर से इन्हें ₹71,000 का रेंट मिल रहा है।

 रेणू पिल्ले: नया रायपुर के प्राइम फ्लैट्स से इन्हें ₹68,000 का किराया आ रहा है।

 रिचा शर्मा: छत्तीसगढ़ कैडर की इस अफसर की प्रॉपर्टी दिल्ली से सटे गुरुग्राम (गुड़गांव) में है, जहां से इन्हें भारी किराया मिल रहा है।

खोजी पड़ताल: रसूख और कॉरपोरेट का 'नेक्सस'

आखिर इन संपत्तियों का इतना ज्यादा और मनमाना किराया दे कौन रहा है? जब इस सच की तह तक जाने की कोशिश की गई, तो जो खेल सामने आया वह बेहद गंभीर है।

अधिकांश प्रभावशाली अधिकारियों ने अपनी संपत्तियां, बंगले और कमर्शियल स्पेस आम किरायेदारों को नहीं, बल्कि देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों और निजी कंपनियों को किराए पर दे रखे हैं।

राजधानी रायपुर का 'मॉल श्री विहार' इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। एक दौर में मॉल श्री विहार के कई आलीशान बंगले असल में छत्तीसगढ़ के बड़े कॉरपोरेट घरानों के 'गेस्ट हाउस' या 'रेस्ट हाउस' बने हुए थे। कंपनियां इन प्रभावशाली अफसरों को खुश रखने के लिए बाजार दर से कहीं ज्यादा किराया चुकाती हैं। यह सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) का मामला है। जिस कंपनी के प्रोजेक्ट्स को क्लीयरेंस अफसरों की कलम से मिलना है, वही कंपनी साहब के बंगले का लाखों का किराया दे रही है—इसे आप क्या कहेंगे?

तीखे सवाल: क्या यह 'काली कमाई' का नया लॉन्ड्री सिस्टम है?

साल 2014 के बाद से इन अफसरों की प्राइम लोकेशंस पर संपत्तियों की बाढ़ सी आ गई है। घोषित संपत्ति तो सिर्फ 'टिप ऑफ द आइसबर्ग' (बर्फ का सिरा) है, असली खेल बेनामी संपत्तियों और करीबियों के नाम पर खरीदी गई जमीनों का है।

1. बाजार मूल्य का खेल: क्या इन संपत्तियों का वास्तविक किराया उतना ही है जितना दिखाया जा रहा है, या फिर कैश में ली गई घूस को 'रेंट' दिखाकर बैंक खातों में वैध किया जा रहा है?

2. कॉरपोरेट मेहरबानी क्यों?: बड़ी कंपनियां इन अफसरों की ही संपत्तियों को महंगे दामों पर किराए पर लेने के लिए इतनी आतुर क्यों रहती हैं? क्या यह सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण की कीमत है?

3. सरकार की चुप्पी: रेंटल किंग बन चुके इन नौकरशाहों पर सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती? क्या कोई ऐसा कड़ा कानून आएगा जो अफसरों के कॉरपोरेट डीलिंग्स और बेनामी किरायों पर नकेल कस सके?

निष्कर्ष:

जनता टैक्स देती है ताकि व्यवस्था सुचारू रूप से चले, लेकिन व्यवस्था चलाने वाले खुद 'जमींदार' और 'रेंटल किंग' बनकर बैठ गए हैं। जब तक इन घोषित किरायों और इन्हें देने वाली कंपनियों के संबंधों की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक 'सफेद' कागजों के पीछे छिपा 'काला सच' कभी बाहर नहीं आएगा।

वीडियो देखे 

रविवार, 28 जून 2026

जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे रसूखदारों पर किसका वरदहस्त?

 जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे रसूखदारों पर किसका वरदहस्त?


 मेडिकल घोटाला: ईओडब्ल्यू के पूरक चालान ने खोले राज, लेकिन 'अदृश्य शक्ति' के दबाव में 'बड़ी मछलियों' को बचाने का खेल जारी!


छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के बीच, जनता की जिंदगी और सेहत से खिलवाड़ करने वाले करोड़ों रुपये के छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन (CGMSC) घोटाले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा विशेष न्यायालय में पेश किए गए पूरक चालान के बाद पूरे प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक ही चर्चा है—आखिर भ्रष्टाचारियों और रसूखदार अधिकारियों को बचाने के लिए कौन सी 'अदृश्य शक्ति' सरकार और जांच एजेंसियों पर दबाव बना रही है? विधानसभा में जिन नामों की गूंज उठी थी, वे अचानक चालान की फाइलों से गायब कैसे हो गए?

₹50 करोड़ की सरकारी क्षति और 'पूल टेंडरिंग' का खेल

ईओडब्ल्यू (EOW) के आधिकारिक बयानों और जांच में यह तथ्य सामने आया है कि राज्य की गरीब और आम जनता को मुफ्त डायग्नोस्टिक जांच (हमार लैब योजना) उपलब्ध कराने के नाम पर भारी जालसाजी की गई। जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के लिए खरीदे जाने वाले मेडिकल उपकरणों, रीएजेंट्स और कंज्यूम बेस की खरीदी में नियमों को ताक पर रख दिया गया।

जांच के अनुसार, 'पूल टेंडरिंग' के जरिए साठगांठ करके मोक्षित कॉरपोरेशन जैसी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। तय एमआरपी (MRP) दरों से कई गुना अधिक कीमत पर मेडिकल उपकरण खरीदे गए, जिससे सरकारी खजाने को सीधे तौर पर ₹50 करोड़ से अधिक का चूना लगा। ईओडब्ल्यू ने अपनी विवेचना में इसे एक गहरी आपराधिक साजिश और षड्यंत्र का हिस्सा माना है।

छोटे मोहरों पर गिरी गाज, असली 'मगरमच्छ' अब भी आजाद?

मामले में अब तक 10 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है। हालिया पूरक चालान में अभिषेक कौशल (डायरेक्टर, रिकॉर्ड्स एंड मेडिकल सिस्टम प्रा. लि.), राकेश जैन (शारदा इंडस्ट्रीज), प्रिंस जैन (लायजनिंग एजेंट और शशांक चोपड़ा का सगा जीजा), और कुंजल शर्मा (मार्केटिंग हेड, डायसिस इंडिया प्रा. लि.) जैसे कारोबारियों और दलालों के नाम शामिल हैं। इसके अलावा पांच अधिकारियों—बसंत कौशिक, कमलकांत पाटनकर, डॉक्टर अनिल परसाई, रुद्र रावटिया और दीपक कुमार बांधे की गिरफ्तारियां भी दिखाई गई हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पूरी कार्रवाई सिर्फ 'चेहरे देखकर' और छोटे मोहरों को फंसाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश है?

विधानसभा का वो वादा और गायब हुए बड़े नाम

विधानसभा के पटल पर सरकार के मंत्रियों ने खुद दावा किया था कि इस महाघोटाले में स्वास्थ्य विभाग के 14 बड़े अधिकारी आरोपी हैं और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जब ईओडब्ल्यू की अंतिम चार्जशीट और पूरक चालान सामने आया, तो स्वास्थ्य विभाग के उन शीर्ष नीति-निर्माताओं, सचिवों और अनुमोदन (Approval) देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के नाम गायब मिले, जिनकी कलम के बिना यह घोटाला मुमकिन ही नहीं था।

सूत्रों और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि आईएएस अधिकारियों और शीर्ष प्रबंधन के कुछ चेहरों को बचाने के लिए जांच की दिशा को सीमित कर दिया गया है। जिन बड़े नामों को जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए था, वे आज भी रसूख के दम पर व्यवस्था के 'नाक के बाल' बने हुए हैं। जनता पूछ रही है कि क्या इन रसूखदारों से कोई गुप्त 'सेटिंग' हो चुकी है या फिर उन पर किसी भारी राजनीतिक संरक्षण का हाथ है?

इतिहास खुद को दोहरा रहा है: क्या सबक सीखेगी सरकार?

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग में घोटालों का इतिहास पुराना है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान भी गर्भाशय कांड, नसबंदी कांड और आंखफोड़वा कांड जैसे अमानवीय और शर्मनाक हादसे हो चुके हैं। उस दौर में हुए घोटालों और बदइंतजामी के कारण तत्कालीन सत्ता को जनता के भारी आक्रोश का सामना करना पड़ा था। क्या वर्तमान सरकार भी उसी ढर्रे पर चल रही है, जहां दो-तीन दर्जन से अधिक दवाइयों के सैंपल लगातार फेल हो रहे हैं और कार्रवाई के नाम पर केवल मामूली जुर्माना या ब्लैकलिस्टिंग का नाटक किया जा रहा है?

पीपीपी (PPP) मॉडल या भ्रष्टाचार का नया जरिया?

घोटाले की जड़ें केवल उपकरणों की खरीदी तक सीमित नहीं हैं। राज्य में 'पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप' (PPP) मॉडल के नाम पर जो नया खेल शुरू हुआ है, वह भी संदेह के घेरे में है। अस्पताल सरकार का, मशीनें सरकार की, जगह सरकार की, बिजली-पानी सरकार का और जांच की फीस का भुगतान भी सरकार करेगी—तो फिर लैब चलाने का ठेका किसी निजी कंपनी को क्यों सौंपा जा रहा है? क्या छत्तीसगढ़ में प्रशिक्षित पैथोलॉजी वर्कर्स या बेरोजगार युवाओं की कमी है? जानकारों का मानना है कि यह पीपीपी मॉडल कुछ और नहीं, बल्कि चहेती कंपनियों और अपने लोगों को उपकृत करने और भ्रष्टाचार की नई राहें खोलने की सोची-समझी रणनीति है।

अंतिम सवाल: क्या मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इस बात का जवाब देंगे कि विधानसभा में किए गए दावों के बावजूद बड़े अधिकारियों पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? क्या दिल्ली तक गूंजने वाले इस घोटाले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर ₹50 करोड़ का यह दवा-उपकरण घोटाला फाइलों के नीचे हमेशा के लिए दफन हो जाएगा?

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शनिवार, 27 जून 2026

45 करोड़ की बर्बादी के बाद अब 30 करोड़ के नए टेंडर की तैयारी

 स्मार्ट सिटी का 'स्मार्ट' खेल: 45 करोड़ की बर्बादी के बाद अब 30 करोड़ के नए टेंडर की तैयारी, किसका भरेगा पेट?



 एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार अपनी महत्वकांक्षी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए लगातार कर्ज के दलदल में डूबती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ टैक्सपेयर्स (जनता) की गाढ़ी कमाई के पैसों को किस बेरहमी से सफेद हाथी योजनाओं में फूंका जा रहा है, इसका सबसे घिनौना और जीता-जागता उदाहरण देखना हो तो नया रायपुर चले आइए। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वकांक्षी '100 स्मार्ट सिटी योजना' के तहत रायपुर में विकास के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, वह अब पूरी तरह आईने की तरह साफ हो चुका है। सवाल उठने लगा है कि क्या स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट सिर्फ अफसरों और रसूखदारों के लिए 'पैसा उगाहने और भ्रष्टाचार का जरिया' बनकर रह गया है?

सात समुंदर पार 'श्रीलंका' से आई थीं साइकिलें, आज कबाड़खाना बना सिस्टम

कहानी शुरू होती है साल 2016-17 में। रायपुर की सड़कों पर 'स्मार्टनेस' का तड़का लगाने के लिए करीब 45 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से 102 किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक बनाया गया। भारतीय साइकिलों को ठेंगा दिखाकर, भारी कमीशनखोरी के आरोपों के बीच, सात समुंदर पार श्रीलंका से हाईटेक साइकिलें मंगवाई गईं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे, खूब ढिंढोरा पीटा गया।

लेकिन हकीकत क्या है? शुरुआती दो-चार महीनों के बाद ही यह पूरा प्रोजेक्ट फुस्स हो गया। आज नया रायपुर के साइकिल स्टैंड्स पर नजर डालेंगे तो 10 में से 8 स्टैंड पूरी तरह खाली पड़े हैं। जो साइकिलें बची हैं, उनके टायर फट चुके हैं, चेनों में जंग लग चुका है और विदेशी तकनीक से लैस बताया जाने वाला यह पूरा सिस्टम खुद 'पंचर' होकर कबाड़खाने में तब्दील हो चुका है। जनता के 45 करोड़ रुपये सीधे पानी में बह गए।

उल्टा लटकाने के दावे हवा, भ्रष्टाचारियों को अभयदान!

हैरानी की बात यह है कि जब वर्तमान सत्ताधारी दल विपक्ष में था, तब मंचों से चीख-चीखकर बड़े-बड़े दावे किए जाते थे कि 'सत्ता में आते ही भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाकर सीधा कर देंगे।' लेकिन आज नया रायपुर में जनता के 45 करोड़ रुपये डुबाने वाले उन नीति-निर्माताओं और अफसरों पर कोई आंच नहीं आई। श्रीलंका से कबाड़ साइकिलें मंगवाने का तुगलकी फरमान जारी करने वाले किस रसूखदार अफसर के खिलाफ अब तक कार्रवाई हुई? जवाब है- शून्य। अफसरों को खुला संरक्षण मिला हुआ है और फाइलों पर धूल जम रही है।

डूब चुके प्रोजेक्ट को 30 करोड़ का नया 'ऑक्सीजन', या फिर बंदरबांट की तैयारी?

हद तो तब हो गई जब इस पूरी तरह फेल हो चुके, मरे हुए प्रोजेक्ट को जिंदा करने यानी 'ऑक्सीजन' देने के नाम पर अब 30 करोड़ रुपये का नया टेंडर लाने का खेल खेला जा रहा है। गजब की जिद है- सब कुछ फेल हो चुका है, फिर भी जनता का पैसा बहाने की सनक बरकरार है।

सवाल यह उठता है कि क्या साय सरकार इस बात की लिखित गारंटी देगी कि जो नए 30 करोड़ रुपये फूंकने की तैयारी है, उसका हश्र भी पहले जैसा नहीं होगा? या फिर यह नया टेंडर भी सिर्फ नई कमीशनखोरी और पैसों की बंदरबांट का एक नया जरिया है?

प्रचार पर करोड़ों का धुआं, जेब में सौ तो दिखावे में एक

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही इसके प्रचार-प्रसार के खर्चों पर गंभीर उंगलियां उठती रही हैं। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ या दुर्ग जैसे शहरों को जितना बजट बुनियादी सुविधाओं के लिए नहीं मिलता, उससे कहीं ज्यादा रकम सिर्फ विज्ञापनों और बुकलेट्स की छपाई में फूंक दी गई। अंदरखाने की चर्चाओं की मानें तो प्रचार के नाम पर '₹1 खर्च कर ₹100 जेब में डालने' का खेल खेला गया। महंगे ब्रोशर और प्रचार सामग्री कागजों पर हजारों-लाखों की संख्या में छपवाकर सरकारी खजाने को जमकर चूना लगाया गया।

असमंजस में सिस्टम: नगर निगम, प्लेसमेंट एजेंसियां और सियासी रंजिश

सिर्फ साइकिल ट्रैक ही नहीं, रायपुर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनी अन्य संरचनाएं भी राजनीतिक रंजिश और अव्यवस्था की शिकार हैं। साइंस कॉलेज के पास करोड़ों की लागत से बनी चौपाटी को सरकार बदलते ही सिर्फ एक विधायक की राजनीतिक जीत की जिद के चलते नेस्तनाबूत (ढहा) कर दिया गया। वहां भी करोड़ों की सीधी बर्बादी हुई। इसके अलावा, नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रबंधन के बीच आपसी खींचतान जगजाहिर है। प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिए रखे गए गरीब कर्मचारियों को कम तनख्वाह देकर ज्यादा राशि के वाउचर पर दस्तखत कराने जैसे गंभीर शोषण के आरोप भी इस विभाग पर लगते रहे हैं।

विधानसभा में मंत्रियों के रटे-रटाए जुमले: 'दिखवा लेंगे, अकेले में रिपोर्ट देख लेना'

जब-जब जनप्रतिनिधियों या विधायकों द्वारा सदन में इन घोटालों और फिजूलखर्ची पर तीखे सवाल दागे जाते हैं, तब-तब मंत्रियों के पास वही पुराने, रटे-रटाए तीन जुमले तैयार मिलते हैं:

1. "मामला संज्ञान में आया है, दिखवा लेंगे।"

2. "दोषी पाए जाने पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।"

3. "आपको ज्यादा जानकारी चाहिए या रिपोर्ट देखनी है, तो अकेले में केबिन में आकर देख लीजिए।"

सदन के भीतर की यह लीपापोती साफ बताती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। बहरहाल, नया रायपुर की सड़कों पर दम तोड़ चुकी साइकिलें और अब 30 करोड़ का नया टेंडर, चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि विकास की इस 'स्मार्ट' परिभाषा में जनता सिर्फ मूकदर्शक है और मलाईदार अफसरशाहों व ठेकेदारों का नया सिंडिकेट एक बार फिर तिजोरियां भरने की फिराक में है। देखना होगा कि इस नए खेल पर मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस की नीति का हंटर चलता है या फिर यह फाइल भी 'दिखवा लेंगे' की भेंट चढ़ जाती है।

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