लगता है छत्तीसगढ़ सरकार ने खनिज मामले में तय कर लिया है कि खदानों को लीज में देने की बजाय अवैध उत्खनन से पैसा कमाया जाए। तभी तो यहां लीज देने की प्रक्रिया इतना जटिल कर दिया है कि सालों से लीज देने का आवेदन लंबित है। यही नहीं आए दिन खनिज को लेकर नई-नई नीतियां बनाई जाती है ताकि खनिज की चोरी चलता रहे अधिकारियों की जेब गरम होते रहे। चूंकि यह विभाग स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास है इसलिए भी अधिकारियों की दादागिरी चरम पर है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट मची है उसमें खनिज विभाग के अधिकारी भी पीछे नहीं है। खनिज चोरी की बढ़ती घटना से चिंतित नजर आने वाले अधिकारियों की एफआईआर दर्ज कराने की घोषणा भी टांय-टांय फिस्स हो चुका है। एफआईआर कराने की बात तो दूर नई राजधानी जैसे प्रतिबंधित क्षेत्र से भी खनिज चोरी को वह नहीं रोक पाई है।
ज्ञात हो कि नई राजधानी क्षेत्र व उससे लगे गांवों में मुरुम व गिट्टी उत्खनन पर प्रतिबंध है लेकिन आज भी सैकड़ों ट्रके मुरुम व गिट्टी शहर में बेधडक़ परिवहन किया जा रहा है। खनिज नाका तो अवैध उत्खनन को रोकने की बजाय वसूली व कमीशनखोरी का अड्डा बन चुका है। यही नहीं दुर्ग जिले के नंदनी अहिवारा क्षेत्र से भी प्रतिदिन सैकड़ों ट्रकें मुरुम व गिट्टी लेकर रायपुर आ रही है। चूंकि इन दोनों ही क्षेत्रों से आने वाले मुरुम-गिट्टी की कीमत अत्यंत कम है इसलिए भी सडक़ निर्माण से लेकर भवन निर्माण में इसका बेतहाशा उपयोग हो रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि कुम्हारी बीटीओ नाके में 100 रुपए टैक्स वसूलने के बाद भी रायपुर में सस्ते में कैसे आ रहा है यह जांच का विषय है।
इधर उड़ीसा व महासमुंद में खदान चलाने वाले एक व्यापारी का कहना है कि छत्तीसगढ़ में वही काम कर सकता है जो अवैध काम करेगा हमारे जैसे नियम में काम करने वालों के लिए जगह नहीं है। उन्होंने खदान लीज पर देने की प्रक्रिया को भी घुमावदार बताते हुए यहां तक कहा कि वे यहां की खदान को सिर्फ इसलिए चालू नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनसे बेवजह पैसे मांगे जाते हैं। अवैध उत्खनन करने वालों से सांठगांठ की वजह से ही लीज देने की प्रक्रिया को जटिल किया गया है और लीज लेने का आवेदन देने वालों को आफिस का चक्कर लगवाया जा रहा है।
चर्चा तो यह है कि सैकड़ों एकड़ जमीन लीज पर लेने वालों के लिए पूरा अमला लग जाता है और निजी वन जमीनों तक को लीज पर दे दिया जाता है। इसका उदाहरण पलारी के पास स्थित गांव रिंगनी तथा चुआं, मालूकोना, देवरानी जेठानी नामक गांव तक को लीज पर दे दिया गया है और यह सब मंत्री से लेकर अधिकारियों तक से सांठगांठ कर की जाती है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 2 नवंबर 2010
रविवार, 31 अक्टूबर 2010
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
सीएम साहब! बधाई हो 10 साल का...
1 नवम्बर को छत्तीसगढ़ के स्थापना का दस साल पूरा हो जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बधाई हो। छत्तीसगढ़ के स्थापना का दस साल पूरा हो गया। अखबार वाले भी खुश है। उन्हें भी बधाई हो। फिर राज्योत्सव के नाम पर लाखों रुपए के विज्ञापन मिल जाएंगे। सरकारी खजानों से राज्योत्सव की धूम इस बार जोरदार रहेगी। रहनी भी चाहिए। सलमान खान जैसे सुपर स्टार को बुलाया जा रहा है। सब कुछ ठीक ठाक है। राज्य इन दस सालों में बहुत तरक्की की है। फिर क्यों नहीं राज्योत्सव मनाना चाहिए। यही बहाने हम दूसरे प्रदेश की संस्कृति को जान समझ लेंगे। आखिर आम छत्तीसगढिय़ा फिर कब देख पाएगा सलमान खान को।
डा. रमन सिंह सबसे ज्यादा बधाई के पात्र हैं सलमान खान को दिखाने के लिए। संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को छत्तीसगढिय़ा बेवजह कोसते रहते हैं। अरे सुआ नाचा गम्मत तो रोज देखते रहते हैं। बाहर के कलाकारों को देखने समझने का तो यही मौका है। फिर छत्तीसगढ़ कोई गरीब प्रदेश तो है नहीं कि बाहर के कलाकारों को मनमाने ढंग से रुपए न दे सके। बाहर के कलाकारों को भी तो लगना चाहिए कि हमारे प्रदेश के लोग कितने उदार है स्वयं फ्री फंड में काम करते हैं लेकिन मेहमानों को उनकी औकात से अधिक पैसा दे सकते हैं।
अखबार वाले बेवजह यहां के कुछ लोक कलाकारों को प्रश्रय देते हैं। छोटी सोच को तो अखबार में जगह ही नहीं मिलनी चाहिए और न ही सरकार के खिलाफ ही कुछ छापना चाहिए। पत्रिका ने आकर सब गड़बड़ कर दिया वरना सब गुड-गॉड चल रहा था। दो की लड़ाई में जबरदस्ती छापना पड़ रहा है। लेकिन सीएम डॉ. रमन साहब भी कम नहीं है वे भी जानते है कि ये सब जो घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है वह कार्रवाई करने के लिए नहीं बल्कि अपनी कमीज को ज्यादा सफेद बताने की लड़ाई है। 10 साल बिना कार्रवाई के निपट गया। आगे का साल भी निपट जाएगा। बताते रहो मंत्रियों को दुष्ट और अधिकारियों को भ्रष्ट क्या फर्क पड़ता है? कार्रवाई ही जब नहीं होनी ही है। सीएम साहब! ठीक सोचते हैं हर विभाग के भ्रष्ट कारनामों को केवल अखबार के छपने के आधार पर कार्रवाई की जाती रही तो चल गया विभाग।
अब पीएचई का ही मामला ले पत्रिका बेवजह पीछे पड़ गया है। कमल विहार कितनी अच्छी योजना है और अच्छे काम में थोड़ी बहुत गलती होती ही है उसको तिल का ताड़ बना रहे हैं। गली-गली में बाबूलाल गली छाप पर नवभारत क्या साबित करना चाहता है। बेवजह शराब के खिलाफ अखबार लिख रहा है। अब शराब पीकर नशे में कोई हत्या कर दे तो इसमें डॉ. साहब की कहां गलती है वे तो ठेका दे दिए हैं अब बेचने वाले जाने और पीने वाले? जबरदस्ती कहा जा रहा है कि शराब की वजह से हर माह सौ-दो सौ लोग मार रहे हैं। आंकड़े बता कर आम लोगों को भ्रमित करने वालों को तो पकड़-पकड़ कर पिटना चाहिए। गृहमंत्री ननकीराम कंवर की नाराजगी डीजीपी विश्वरंजन से हैं और वे गुस्सा एसपी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहकर उतार रहे हैं इतने में भी बात नहीं बनी तो थानेदारों पर आरोप लगाने लगे कि वे शराब माफियाओं के इशारे पर चल रहे हैं।
नगर भैय्या बृजमोहन अग्रवाल के तो पीछे ही पड़ गए हैं लोग। जब कांग्रेस के समय सडक़ उखड़ती थी तब कोई नहीं बोलता था और न ही शिक्षा व्यवस्था पर ही सवाल उठाता था। कोई ये नहीं कहता कि एक आदमी आधा दर्जन से ज्यादा विभाग मुस्तैदी से संभाल रहा है। उल्टे उसके विभाग के विवादास्पद अधिकारियों को उनसे संबंध जोडऩा कितना उचित है। जब विभाग में विवादास्पद और भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा हो तो कोई इन्हें हटाकर कैसे काम कर सकता है आखिर विभाग चलाना कोई मजाक तो नहीं है।
अब किसानों के नाम पर बेवजह लोग राजनीति कर रहे हैं। अरे भई चुनाव था इसलिए कह दिया 270 रुपए बोनस देंगे। चुनाव में तो ऐसा बोला जाता है। फिर अब किसान किसान कहां रह गए हैं। लोग धंधा-नौकरी कर रहे हैं। गांव-गांव तक सडक़ें इसलिए तो बनाई है कि किसान भी शहर का दर्शन कर सके। अब चप्पू साहू खुद किसान है इसके बाद भी लोगों को उन पर भरोसा नहीं है वे जानते हैं कि किसानों को बोनस से कुछ हासिल नहीं होने वाला। वे जानते हैं कि खेती से सिर्फ घाटा होना है इसलिए खेती की जमीन उद्योगों को दी जा रही है। वे जानते हैं कि यूरिया से खेत बर्बाद होता है इसलिए तो वे दुकानों की अनियमित सप्लाई पर ध्यान नहीं देते। बेवजह लोग किसान मोर्चा बनाकर राजनीति कर रहे हैं। लोगों को तो बहाना मिल गया है कि बृजमोहन अग्रवाल हरियाणवी हैं इसलिए छत्तीसगढ़ की उपेक्षा कर रहे हैं। कोई ये नहीं देख रहा है कि रात-रात भर जाग कर आदमी मेहनत कर रहा है। मंत्री है भई कोई मजाक नहीं है कि सुबह से लोगों से मिलने निकल जाए।
डॉ. साहब तो गांधी जी के सच्चे अनुयायी है इसलिए वे किसी की बात ही नहीं सुनते। गांधी दर्शन से लबरेज डॉ. साहब ने गांधी जी के तीन बंदरों के सिद्धांत को आत्म सात कर लिया है बुरा न देखो, बुरा न सुनों, बुरा न बोलो? कभी डाक्टर साहब के मुंह से किसी के लिए अपशब्द सुना है फिर वे क्यों किसी अधिकारी के खिलाफ सुनेंगे और मंत्री तो उनकी अपनी पार्टी के हैं? जो लोग नाराज है या भ्रष्टाचार से दुखी है वे बेवजह दुखी है घर का मामला है मना लिया जाएगा। और रहा सवाल देखने का तो डॉ. साहब ने तो सत्ता पाते ही आंखे बंद कर ली थी क्योंकि वे जानते है आंख खोलते ही सत्ता की बुराई दिखेगी और पिछली सरकार के काले कारनामों पर कार्रवाई करनी पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने तब से आंखे बंद कर ली है और फिर कांग्रेसी कोई पराये थोड़ी न है? पता नहीं कब सत्ता बदल जाए तो? इसलिए बदले की राजनीति तो होनी ही नहीं चाहिए? आखिर कांग्रेसी भी तो सत्ता की राजनीति ही कर रहे हैं। डॉ. साहब भी जानते हैं कि कांग्रेसी गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी है। वह भी न बुरा देखती है न सुनती है न बोलती है? इसलिए चिंता आम लोगों की करना चाहिए और इसकी चिंता पूरी सिद्दत से की जा रही है एक-दो रुपया किलो चावल दे दो। पेट भरा रहेगा तो सब खुश और जो खुश नहीं है उनके लिए गांव-गांव में दारू तो है ही। दस साल में सब गुड-गॉड है अमन चैन शांति है इसलिए एक बार फिर डॉ. साहब और उसकी पूरी टीम को बधाई!
डा. रमन सिंह सबसे ज्यादा बधाई के पात्र हैं सलमान खान को दिखाने के लिए। संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को छत्तीसगढिय़ा बेवजह कोसते रहते हैं। अरे सुआ नाचा गम्मत तो रोज देखते रहते हैं। बाहर के कलाकारों को देखने समझने का तो यही मौका है। फिर छत्तीसगढ़ कोई गरीब प्रदेश तो है नहीं कि बाहर के कलाकारों को मनमाने ढंग से रुपए न दे सके। बाहर के कलाकारों को भी तो लगना चाहिए कि हमारे प्रदेश के लोग कितने उदार है स्वयं फ्री फंड में काम करते हैं लेकिन मेहमानों को उनकी औकात से अधिक पैसा दे सकते हैं।
अखबार वाले बेवजह यहां के कुछ लोक कलाकारों को प्रश्रय देते हैं। छोटी सोच को तो अखबार में जगह ही नहीं मिलनी चाहिए और न ही सरकार के खिलाफ ही कुछ छापना चाहिए। पत्रिका ने आकर सब गड़बड़ कर दिया वरना सब गुड-गॉड चल रहा था। दो की लड़ाई में जबरदस्ती छापना पड़ रहा है। लेकिन सीएम डॉ. रमन साहब भी कम नहीं है वे भी जानते है कि ये सब जो घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है वह कार्रवाई करने के लिए नहीं बल्कि अपनी कमीज को ज्यादा सफेद बताने की लड़ाई है। 10 साल बिना कार्रवाई के निपट गया। आगे का साल भी निपट जाएगा। बताते रहो मंत्रियों को दुष्ट और अधिकारियों को भ्रष्ट क्या फर्क पड़ता है? कार्रवाई ही जब नहीं होनी ही है। सीएम साहब! ठीक सोचते हैं हर विभाग के भ्रष्ट कारनामों को केवल अखबार के छपने के आधार पर कार्रवाई की जाती रही तो चल गया विभाग।
अब पीएचई का ही मामला ले पत्रिका बेवजह पीछे पड़ गया है। कमल विहार कितनी अच्छी योजना है और अच्छे काम में थोड़ी बहुत गलती होती ही है उसको तिल का ताड़ बना रहे हैं। गली-गली में बाबूलाल गली छाप पर नवभारत क्या साबित करना चाहता है। बेवजह शराब के खिलाफ अखबार लिख रहा है। अब शराब पीकर नशे में कोई हत्या कर दे तो इसमें डॉ. साहब की कहां गलती है वे तो ठेका दे दिए हैं अब बेचने वाले जाने और पीने वाले? जबरदस्ती कहा जा रहा है कि शराब की वजह से हर माह सौ-दो सौ लोग मार रहे हैं। आंकड़े बता कर आम लोगों को भ्रमित करने वालों को तो पकड़-पकड़ कर पिटना चाहिए। गृहमंत्री ननकीराम कंवर की नाराजगी डीजीपी विश्वरंजन से हैं और वे गुस्सा एसपी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहकर उतार रहे हैं इतने में भी बात नहीं बनी तो थानेदारों पर आरोप लगाने लगे कि वे शराब माफियाओं के इशारे पर चल रहे हैं।
नगर भैय्या बृजमोहन अग्रवाल के तो पीछे ही पड़ गए हैं लोग। जब कांग्रेस के समय सडक़ उखड़ती थी तब कोई नहीं बोलता था और न ही शिक्षा व्यवस्था पर ही सवाल उठाता था। कोई ये नहीं कहता कि एक आदमी आधा दर्जन से ज्यादा विभाग मुस्तैदी से संभाल रहा है। उल्टे उसके विभाग के विवादास्पद अधिकारियों को उनसे संबंध जोडऩा कितना उचित है। जब विभाग में विवादास्पद और भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा हो तो कोई इन्हें हटाकर कैसे काम कर सकता है आखिर विभाग चलाना कोई मजाक तो नहीं है।
अब किसानों के नाम पर बेवजह लोग राजनीति कर रहे हैं। अरे भई चुनाव था इसलिए कह दिया 270 रुपए बोनस देंगे। चुनाव में तो ऐसा बोला जाता है। फिर अब किसान किसान कहां रह गए हैं। लोग धंधा-नौकरी कर रहे हैं। गांव-गांव तक सडक़ें इसलिए तो बनाई है कि किसान भी शहर का दर्शन कर सके। अब चप्पू साहू खुद किसान है इसके बाद भी लोगों को उन पर भरोसा नहीं है वे जानते हैं कि किसानों को बोनस से कुछ हासिल नहीं होने वाला। वे जानते हैं कि खेती से सिर्फ घाटा होना है इसलिए खेती की जमीन उद्योगों को दी जा रही है। वे जानते हैं कि यूरिया से खेत बर्बाद होता है इसलिए तो वे दुकानों की अनियमित सप्लाई पर ध्यान नहीं देते। बेवजह लोग किसान मोर्चा बनाकर राजनीति कर रहे हैं। लोगों को तो बहाना मिल गया है कि बृजमोहन अग्रवाल हरियाणवी हैं इसलिए छत्तीसगढ़ की उपेक्षा कर रहे हैं। कोई ये नहीं देख रहा है कि रात-रात भर जाग कर आदमी मेहनत कर रहा है। मंत्री है भई कोई मजाक नहीं है कि सुबह से लोगों से मिलने निकल जाए।
डॉ. साहब तो गांधी जी के सच्चे अनुयायी है इसलिए वे किसी की बात ही नहीं सुनते। गांधी दर्शन से लबरेज डॉ. साहब ने गांधी जी के तीन बंदरों के सिद्धांत को आत्म सात कर लिया है बुरा न देखो, बुरा न सुनों, बुरा न बोलो? कभी डाक्टर साहब के मुंह से किसी के लिए अपशब्द सुना है फिर वे क्यों किसी अधिकारी के खिलाफ सुनेंगे और मंत्री तो उनकी अपनी पार्टी के हैं? जो लोग नाराज है या भ्रष्टाचार से दुखी है वे बेवजह दुखी है घर का मामला है मना लिया जाएगा। और रहा सवाल देखने का तो डॉ. साहब ने तो सत्ता पाते ही आंखे बंद कर ली थी क्योंकि वे जानते है आंख खोलते ही सत्ता की बुराई दिखेगी और पिछली सरकार के काले कारनामों पर कार्रवाई करनी पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने तब से आंखे बंद कर ली है और फिर कांग्रेसी कोई पराये थोड़ी न है? पता नहीं कब सत्ता बदल जाए तो? इसलिए बदले की राजनीति तो होनी ही नहीं चाहिए? आखिर कांग्रेसी भी तो सत्ता की राजनीति ही कर रहे हैं। डॉ. साहब भी जानते हैं कि कांग्रेसी गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी है। वह भी न बुरा देखती है न सुनती है न बोलती है? इसलिए चिंता आम लोगों की करना चाहिए और इसकी चिंता पूरी सिद्दत से की जा रही है एक-दो रुपया किलो चावल दे दो। पेट भरा रहेगा तो सब खुश और जो खुश नहीं है उनके लिए गांव-गांव में दारू तो है ही। दस साल में सब गुड-गॉड है अमन चैन शांति है इसलिए एक बार फिर डॉ. साहब और उसकी पूरी टीम को बधाई!
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
छवि में रमन आगे तो भ्रष्टाचार में मोहन
ईमानदारी में हेमचंद ने बाजी मारी
कांग्रेस में जोगी का जवाब नहीं
भाई-भतीजा वाद में बैस दूसरे नंबर पर
छत्तीसगढ़ के दस साल को लेकर कराए गए सर्वे में छवि के मामले में मुख्यमंत्री रमन सिंह अब भी दूसरे नेताओं से काफी आगे है जबकि भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामले में बृजमोहन अग्रवाल के विभाग सबसे ऊपर है। भाई-भतीजावाद के मामले में जहां बृजमोहन अग्रवाल टॉप पर है वहीं भाजपा सांसद रमेश बैस दूसरे नंबर पर है। कांग्रेसियों में अभी भी जोगी नंबर वन है जबकि दूसरे नंबर पर वीसी शुक्ल है।
छत्तीसगढ़ ने इन दस सालों में कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकार देखी है। चौतरफा भ्रष्टाचार ने जहां विकास को अवरुद्ध किया है वही नेताओं की करतूत को लेकर भी आम आदमी दुखी है। शराब लॉबी की दादागिरी और सरकारी जमीनों के बंदरबांट ने छत्तीसगढ़ के भविष्य को आशंकित कर दिया है। ऐसे में लोगों से जब छत्तीसगढ़ के दस सालों को लेकर सवाल पूछे गए तो लोगों का आक्रोश सामने आना स्वाभाविक था। सर्वे के मुताबिक अब भी रमन सिंह छवि के मामले में छत्तीसगढ़ के तमाम नेताओं से आगे चल रहे हैं। उनके ठीक पीछे विद्याचरण शुक्ल, मो. अकबर का नाम है। हालांकि रमन सिंह की छवि को लेकर लोगों ने उन्हें नंबर वन जरूर बताया है लेकिन ढीला परसन की वजह से अफसरशाही और भ्रष्टाचार से लोगों की नाराजगी भी सामने आई है।
सबसे ईमानदार मंत्री को लेकर पूछे गए सवाल में हेमचंद यादव सब पर भारी पड़े जबकि उनके ठीक पीछे लता उसेंडी का नाम सामने आया है। अमर अग्रवाल को लोगों ने तीसरे नंबर पर रखा है। इसी तरह सबसे भ्रष्ट मंत्री व विभागों के सर्वे में पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों के नाम सामने आए है। पीडब्ल्यूडी, पर्यटन एवं संस्कृति व शिक्षा विभाग में सर्वाधिक भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में भारी आक्रोश है। यहां विवादास्पद अफसरों श्रीमती बाम्बरा, श्रीमती तवारिस, एमजी श्रीवास्तव, अजय श्रीवास्तव तक के नाम लोगों की जुबान पर है। दूसरे नंबर पर डॉ. रमन सिंह के खनिज, विद्युत व जनसंपर्क विभाग का नाम लिया गया। जबकि कश्यप का पीएचई व विक्रम उसेंडी के वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबर भी लोगों के जुबान पर है।
राजनीतिक पदों का दुरुपयोग परिवार द्वारा करने या मंत्रियों द्वारा परिवार वाद के मामले में भी पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल सब पर भारी पड़े है। मंत्री बनने के बाद परिवार के लोगों द्वारा पेट्रोल पंप व्यवसाय में आने, लोडिंग अनलोडिंग में मोनोपल्ली के अलावा व्यापारी वर्ग में प्रभाव स्थापित करने के अलावा छोटे भाई योगेश अग्रवाल को राजनैतिक संरक्षण और जमीन के धंधे में रूचि को लेकर बृजमोहन अग्रवाल का नाम सबसे आगे है। दूसरे नंबर पर भाजपा सांसद रमेश बैस का नाम लिया जा रहा है। भाई को निगम अध्यक्ष के अलावा रिश्तेदारों को प्राथमिकता के आरोप रमेश बैस पर भी लगे हैं। कांग्रेस में अभी भी पसंदीदा नेता में अजीत जोगी टॉप पर है जबकि इसके बाद वीसी शुक्ल का नंबर है। विपक्षी भूमिका को लेकर पूछे गए सवाल पर रविन्द्र चौबे को मिठलबरा की उपाधि दी गई व उसे महेन्द्र कर्मा से भी कम अंक दिए गए। जबकि मो. अकबर व देवजी भाई पटेल का नाम सबसे आगे रहा।
इसके अलावा लोगों ने कई रोचक जानकारी भी दी और छत्तीसगढ़ के विकास के लिए लोगों ने सुझाव भी दिए। खासकर बड़े शहरों की यातायात को लेकर लोगों का कहना था कि चौड़ीकरण के साथ पार्किंग की भी व्यवस्था करनी चाहिए और लीज रद्द कर पार्किंग की जानी चाहिए। शराब नीति की भी आलोचना की गई। हालांकि शराब बंदी से ज्यादा लोगों का कहना था कि शराब दुकान शहर के बाहर होनी चाहिए। लोगों का यह भी सुझाव था कि जिन नेताओं व अधिकारियों का राजधानी में मकान हो उन्हें सरकारी बंगला नहीं दिया जाना चाहिए। जबकि कमल विहार सहित सरकारी जमीनों व कृषि जमीन के उपयोग पर भी लोगों ने सरकार की भूमिका पर नाराजगी जताई।
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
ये कौन सी लड़ाई है अखबारों की...
पिछले हफ्ते फिर पत्रिका के कर्मचारियों ने भास्कर की गाड़ी को चोरी का बंडल ले जाते पकड़ा। प्रशासन हैरान है पर कार्रवाई नहीं कर रहा है। आखिर भास्कर का अपना रुतबा है। वह कानून तोड़े तब भी सरकार में हिम्मत नहीं है कि वह कुछ कर सके। दूसरा कोई होता तो दफा 279 लगाकर अंदर कर दिया जाता और पत्रिका जैसे दमदार होता तो लूट की धाराएं भी लग जाती। लेकिन मामला भास्कर का है इसलिए पुलिस भी चुप है। लड़े-मरे क्या करना है। मर्डर-वर्डर हो तब कार्रवाई होगी। मारपीट तो हो ही चुकी है। वैसे भास्कर पर यह आरोप नया नहीं है। पहले उसकी लड़ाई नवभारत और देशबंधु से हो चुकी है। नवभारत का तो वह कुछ नहीं बिगाड़ पाया लेकिन बेचारा देशबंधु घुन की तरह पीस गया।
वैसे भास्कर पर एक और आरोप लगे हैं छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की छुट्टी कटौती का। होली तक में भास्कर निकल चुका है। इसके अलावा पत्रकारिता को कलंकित करने का आरोप भी कम नहीं है। दो-पांच सौ में पत्रकार मिलते हैं यह जुमला भी काफी चर्चा में रहा है। कहते हैं भास्कर के आने के पहले छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के स्तर को लेकर कसमें खाई जाती थी लेकिन उसके आने के बाद जिस तरह से परिवर्तन आया है वह किसी से छिपा नहीं है। अब तो खबरें भी कालम सेमी में बिकने लगी है।
जब रिपोर्टर को जीआरपी
में बैठना पड़ा...
नया अखबार आया है तो कुछ नए लोग भी पत्रकार बन गए है। ऐसा ही एक पत्रिका का राहुल जैन है। पिछले हफ्ते वह रिपोर्टिंग के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचा तो जीआरपी वाले उन्हें पकड़ कर थाने ले आए। वह चिखता रहा कि वह पत्रकार है लेकिन साहब के आने तक बिठा दिया गया। कुछ बड़े पत्रकारों के हस्तक्षेप के बाद ही उसे जाने दिया गया।
जीम का असर
पिछले हफ्ते मेकाहारा के गार्ड ने पत्रिका के फोटोग्राफर से उलझने की गुस्ताखी की और वह पिटा गया। वैसे हीरा को देखकर कोई नहीं कहेगा की वह पिटाई कर सकता है वह पिटा भी नहीं। हीरा के साथ हुई घटना का दूसरे को पता चला तो अन्य फोटोग्राफर पहुंचकर यह कारनामा कर गए। अब प्रेस क्लब में जिम खुल गया है। पत्रकार अब माफी नहीं मंगवाते तुरंत हिसाब करते हैं। सावधान...।
और अंत में...
जनसंपर्क अधिकारी स्वराज दास की मनमानी की चिट्ठी अखबार में क्या छपी। हालत खराब हो गई। आनन-फानन में फोटोग्राफरों की नियुक्ति का फरमान जारी हो गया। लेकिन आदत से मजबूर मनमानी अब भी जारी है। चुन-चुन कर चहेतों को ही कॉल लेटर भेजा गया। प्रतिभाशाली फोटोग्रॉफर अपनी डिग्री को कोस रहे हैं।
वैसे भास्कर पर एक और आरोप लगे हैं छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की छुट्टी कटौती का। होली तक में भास्कर निकल चुका है। इसके अलावा पत्रकारिता को कलंकित करने का आरोप भी कम नहीं है। दो-पांच सौ में पत्रकार मिलते हैं यह जुमला भी काफी चर्चा में रहा है। कहते हैं भास्कर के आने के पहले छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के स्तर को लेकर कसमें खाई जाती थी लेकिन उसके आने के बाद जिस तरह से परिवर्तन आया है वह किसी से छिपा नहीं है। अब तो खबरें भी कालम सेमी में बिकने लगी है।
जब रिपोर्टर को जीआरपी
में बैठना पड़ा...
नया अखबार आया है तो कुछ नए लोग भी पत्रकार बन गए है। ऐसा ही एक पत्रिका का राहुल जैन है। पिछले हफ्ते वह रिपोर्टिंग के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचा तो जीआरपी वाले उन्हें पकड़ कर थाने ले आए। वह चिखता रहा कि वह पत्रकार है लेकिन साहब के आने तक बिठा दिया गया। कुछ बड़े पत्रकारों के हस्तक्षेप के बाद ही उसे जाने दिया गया।
जीम का असर
पिछले हफ्ते मेकाहारा के गार्ड ने पत्रिका के फोटोग्राफर से उलझने की गुस्ताखी की और वह पिटा गया। वैसे हीरा को देखकर कोई नहीं कहेगा की वह पिटाई कर सकता है वह पिटा भी नहीं। हीरा के साथ हुई घटना का दूसरे को पता चला तो अन्य फोटोग्राफर पहुंचकर यह कारनामा कर गए। अब प्रेस क्लब में जिम खुल गया है। पत्रकार अब माफी नहीं मंगवाते तुरंत हिसाब करते हैं। सावधान...।
और अंत में...
जनसंपर्क अधिकारी स्वराज दास की मनमानी की चिट्ठी अखबार में क्या छपी। हालत खराब हो गई। आनन-फानन में फोटोग्राफरों की नियुक्ति का फरमान जारी हो गया। लेकिन आदत से मजबूर मनमानी अब भी जारी है। चुन-चुन कर चहेतों को ही कॉल लेटर भेजा गया। प्रतिभाशाली फोटोग्रॉफर अपनी डिग्री को कोस रहे हैं।
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
फ्रांस के युवाओं का कमाल...
पिछले हफ्ते फ्रांस से खबर आई कि वहां के युवाओं ने सडक़ पर निकल कर न केवल हंगामा किया बल्कि आगजनी से लेकर तोड़-फोड़ भी जमकर की। फ्रांस की पुलिस को उन्हें संभालने में पसीने छूट गए। ऐसा नहीं है कि हंगामा करने वाले युवा बगैर मतलब के सडक़ पर उतर आए। दरअसल ये युवा फ्रांस सरकार के उस फैसले के खिलाफ सडक़ पर उतर आए जिसमें सरकार ने सेवानिवृत्ति की आयु 60 साल से 62 साल कर दी। लालफीता शाही का दबाव फ्रांस में भी जबरदस्त है और सरकार चंद अफसरों के इशारे पर सेवानिवृत्ति की आयु 2 साल बढ़ाने का निर्णय लिया था। फ्रांस के युवाओं का कहना था कि इस तरह से सरकार का निर्णय नौकरी की निर्धारित आयु सीमा के अंतिम सालों पर खड़े युवाओं के लिए मौत का फरमान है। युवाओं के अपने तर्क थे। कुछ ने इसे वोट बैंक करार दिया तो कुछ ने ऐसे कर्मचारियों का षडय़ंत्र करार दिया जिनके बच्चे स्टेबलीस हो चुके हैं। फ्रांस के युवाओं के इस प्रदर्शन से सरकार को झुकना पड़ा है।
भारत में भी यही सब कुछ हो रहा है। युवाओं को छला जा रहा है। खासकर छत्तीसगढ़ में सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 किए जाने की मांग शुरु हो गई है। लेकिन युवाओं का यहां पता नहीं है। हालांकि कर्मचारियों का एक वर्ग ही इसका विरोध कर रहा है लेकिन 60 से 62 कराने के षडय़ंत्र में शामिल लोगों की कमी नहीं है। यहां तो युवाओं को कांग्रेस व भाजपा ने लालीपॉप थमाकर अपने पाले में कर लिया है कोई एनएसयूआई के बहाने कांग्रेस की राजनीति कर रहा है तो कोई अभाविप के बहाने भाजपा की राजनीति कर रहा है। छात्र नेता अपने आकाओं के इशारे पर काम करते हैं। न उन्हें शिक्षा के व्यवसायीकरण की चिंता है और न ही स्कूल-कॉलेज की मनमानी का ही ख्याल है। यहां तक की कमी और जर्जर भवन के खिलाफ भी छात्र नेता नहीं बोलते।
इसी रायपुर की बात है जब युवाओं पर राजनीति हावी नहीं थी तब टॉकीज में टिकिट की कीमत बढ़ा देने या सिलाई दर बढ़ जाने पर छात्र नेता सडक़ पर उतर आए थे। अब वह सब नहीं दिखता। भाजपा या कांग्रेस का पट्टा डाले युवाओं का जोश चंद रुपयों में ठंडा पड़ चुका है। ऊपर से शिक्षा के व्यवसायीकरण और भारी कोर्स ने उन्हें स्वार्थी बना दिया है। छत्तीसगढ़ शांत प्रदेश जल रहा है। चौतरफा लूट मची है। लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा है युवाओं का जोश ठंडा पड़ चुका है अब तो मशहूर ‘दुष्यंत’ भी दुखी होकर सोचते होंगे कि क्या वे इन्हीं युवाओं के लिए लिखे थे कि
‘कैसे आकाश में सुराख नहीं होगा
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।’
भारत में भी यही सब कुछ हो रहा है। युवाओं को छला जा रहा है। खासकर छत्तीसगढ़ में सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 किए जाने की मांग शुरु हो गई है। लेकिन युवाओं का यहां पता नहीं है। हालांकि कर्मचारियों का एक वर्ग ही इसका विरोध कर रहा है लेकिन 60 से 62 कराने के षडय़ंत्र में शामिल लोगों की कमी नहीं है। यहां तो युवाओं को कांग्रेस व भाजपा ने लालीपॉप थमाकर अपने पाले में कर लिया है कोई एनएसयूआई के बहाने कांग्रेस की राजनीति कर रहा है तो कोई अभाविप के बहाने भाजपा की राजनीति कर रहा है। छात्र नेता अपने आकाओं के इशारे पर काम करते हैं। न उन्हें शिक्षा के व्यवसायीकरण की चिंता है और न ही स्कूल-कॉलेज की मनमानी का ही ख्याल है। यहां तक की कमी और जर्जर भवन के खिलाफ भी छात्र नेता नहीं बोलते।
इसी रायपुर की बात है जब युवाओं पर राजनीति हावी नहीं थी तब टॉकीज में टिकिट की कीमत बढ़ा देने या सिलाई दर बढ़ जाने पर छात्र नेता सडक़ पर उतर आए थे। अब वह सब नहीं दिखता। भाजपा या कांग्रेस का पट्टा डाले युवाओं का जोश चंद रुपयों में ठंडा पड़ चुका है। ऊपर से शिक्षा के व्यवसायीकरण और भारी कोर्स ने उन्हें स्वार्थी बना दिया है। छत्तीसगढ़ शांत प्रदेश जल रहा है। चौतरफा लूट मची है। लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा है युवाओं का जोश ठंडा पड़ चुका है अब तो मशहूर ‘दुष्यंत’ भी दुखी होकर सोचते होंगे कि क्या वे इन्हीं युवाओं के लिए लिखे थे कि
‘कैसे आकाश में सुराख नहीं होगा
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।’
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
अब आम आदमी क्या करे...
पिछले दिनों ठाकुर प्यारे लाल सिंह और हरि ठाकुर की प्रतिमा के सामने जो कुछ भी हुआ वह अराजकता की स्थिति मानी जा रही है। देवांगन समाज के साथ सर्व छत्तीसगढिय़ा समाज ने कानून-व्यवस्था को ठेंगा बताकर जीई रोड पर घंटो हंगामा किया। ये लोग अचानक सडक़ पर नहीं आए थे। बुनकर समाज की जमीन को कब्जे से मुक्ति दिलाने का आंदोलन एकाएक उग्र नहीं हुआ था। उनकी सालों पुरानी मांग रही है। बालकृष्ण अग्रवाल इस शहर के लिए नया नाम नहीं है। और न ही उसके कारनामें से ही लोग अनजान रहे है। अजीत जोगी से लेकर बृजमोहन अग्रवाल से उनके मधुर संबंध जग जाहिर रहे हैं। अग्रोहा सोसायटी से लेकर अपहरण कांड के कितने ही गवाह हैं। लेकिन सरकार ने कभी भी उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं की। पुलिस भी थर-थर कांपती नजर आती है।
मैं एक बात सरकार से पूछता हूं कि जब कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि लीज की जमीन का और लीज नहीं हो सकता फिर भी देवांगन समाज को न्याय मिलने में देर क्यों हो रही है। ऊपर से वहां शराब दुकान का खुलना क्या आम लोगों को चिढ़ाने वाला काम नहीं है। मुख्यमंत्री स्वयं सोचे कि अधिकारी उनकी बात मानते हैं या गुण्डा मवालियों या शराब माफियाओं की। तभी तो स्पष्ट निर्देश के बाद न तो तत्कालीन कलेक्टर संजय गर्ग की ही शराब दुकान हटाने की हिम्मत हुई और न ही वर्तमान कलेक्टर डॉ. यादव की ही हिम्मत हो रही है। देवांगन समाज ने पहले ही चेता दिया था कि वे अपनी मांग को लेकर 20 तारीख को रैली व सभा कर रहे हैं। आमंत्रण मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी था लेकिन वे नहीं पहुंचे। लोग आक्रोशित तो थे ही। ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पुलिस की है।
यानी शराब माफियाओं से लेकर अपराधियों को संरक्षण नेता दे और मामला बिगड़ जाए तो दोष पुलिस पर मढ़ा जाए। ऐसा न्याय छत्तीसगढ़ के अलावा और कहां होगा? देवांगन समाज का यह आंदोलन एकाएक उग्र नहीं हुआ और न ही मठपुरैना के लोग ही एकाएक उत्तेजित हुए थे। सरकार की मनमानी और न्याय की धीमी रफ्तार की वजह से लोग कानून व्यवस्था अपने हाथ में लेने लगे है। मठपुरैना में मासूम छात्र मनीष की हत्या सरकार के लिए शर्मनाक है। गांव-गली में शराब दुकान व अवैध शराब की गंगा बहाई जा रही है। मंत्री से लेकर अधिकारी अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं। शिकायत करने वाले या तो पुलिस की झिडक़ी का शिकार हो रहे हैं या गुण्डा मवाली का। ऐसे में जब भीड़ आक्रोशित हो तो क्या होगा? यह राजधानी की स्थिति है तो प्रदेश के सुदूर इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सरकार को भी सोचना होगा कि छत्तीसगढ़ जैसे सम्पन्न राज्यों में पूरी पीढ़ी को बर्बाद करने के एवज में शराब का राजस्व कितना मायने रखता है? सरकारी जमीनों के बंदरबांट का आखरी हिस्सा क्या विवाद नहीं है? फिर क्यों इस तरह की लीज दी जानी चाहिए। सवाल सब का है कि क्या सरकार सिर्फ मनमानी के लिए होती है या लोगों की तकलीफों को दूर करने के लिए? सवाल यह भी है कि जिम्मेदारी किसकी है जब अधिकरी मुखिया का ही कहना न माने।
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मैं एक बात सरकार से पूछता हूं कि जब कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि लीज की जमीन का और लीज नहीं हो सकता फिर भी देवांगन समाज को न्याय मिलने में देर क्यों हो रही है। ऊपर से वहां शराब दुकान का खुलना क्या आम लोगों को चिढ़ाने वाला काम नहीं है। मुख्यमंत्री स्वयं सोचे कि अधिकारी उनकी बात मानते हैं या गुण्डा मवालियों या शराब माफियाओं की। तभी तो स्पष्ट निर्देश के बाद न तो तत्कालीन कलेक्टर संजय गर्ग की ही शराब दुकान हटाने की हिम्मत हुई और न ही वर्तमान कलेक्टर डॉ. यादव की ही हिम्मत हो रही है। देवांगन समाज ने पहले ही चेता दिया था कि वे अपनी मांग को लेकर 20 तारीख को रैली व सभा कर रहे हैं। आमंत्रण मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी था लेकिन वे नहीं पहुंचे। लोग आक्रोशित तो थे ही। ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पुलिस की है।
यानी शराब माफियाओं से लेकर अपराधियों को संरक्षण नेता दे और मामला बिगड़ जाए तो दोष पुलिस पर मढ़ा जाए। ऐसा न्याय छत्तीसगढ़ के अलावा और कहां होगा? देवांगन समाज का यह आंदोलन एकाएक उग्र नहीं हुआ और न ही मठपुरैना के लोग ही एकाएक उत्तेजित हुए थे। सरकार की मनमानी और न्याय की धीमी रफ्तार की वजह से लोग कानून व्यवस्था अपने हाथ में लेने लगे है। मठपुरैना में मासूम छात्र मनीष की हत्या सरकार के लिए शर्मनाक है। गांव-गली में शराब दुकान व अवैध शराब की गंगा बहाई जा रही है। मंत्री से लेकर अधिकारी अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं। शिकायत करने वाले या तो पुलिस की झिडक़ी का शिकार हो रहे हैं या गुण्डा मवाली का। ऐसे में जब भीड़ आक्रोशित हो तो क्या होगा? यह राजधानी की स्थिति है तो प्रदेश के सुदूर इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सरकार को भी सोचना होगा कि छत्तीसगढ़ जैसे सम्पन्न राज्यों में पूरी पीढ़ी को बर्बाद करने के एवज में शराब का राजस्व कितना मायने रखता है? सरकारी जमीनों के बंदरबांट का आखरी हिस्सा क्या विवाद नहीं है? फिर क्यों इस तरह की लीज दी जानी चाहिए। सवाल सब का है कि क्या सरकार सिर्फ मनमानी के लिए होती है या लोगों की तकलीफों को दूर करने के लिए? सवाल यह भी है कि जिम्मेदारी किसकी है जब अधिकरी मुखिया का ही कहना न माने।
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